Monday, December 7, 2015

FUN-MAZA-MASTI ओह माय फ़किंग गॉड--11

FUN-MAZA-MASTI

ओह माय फ़किंग गॉड--11



दोपहर को मैं खा-पीकर लेटा था की आँख लग गयी. किसी ज़ोरदार आवाज ने मेरी नींद तोड़ दी, मैंने देखा कि चारो ओर धुंध छाया है. आंधी के कारण पुरे आसमान में धुल भरा था. मैंने जल्दी से सारे खिड़की-दरवाजे बंद किये और बाहर छत पर आ गया. हवेली के सामने छत पर लाली कपड़े समेटने में लगी थी. तेज बेपरवाह हवा बार-बार उसकी साड़ी उसकी बदन से अलग कर रही थी और हर-बार मुझे उसकी गदराई हुस्न की दीदार करा रही थी. तंग ब्लाउज में कसी हुई उसकी मोटी चूचियां खजुराहो की मूरत जैसी लग रही थी. मैं छत पर खड़े होकर काफी देर से उसकी हुस्न के मज़ा ले रहा था. अचानक उसकी नज़र मुझपे पड़ी, और वह शरमाते हुए साड़ी को समेट ली. मै लाली को देख मुस्कुराया और वापस अपने कमरे में आ गया.
कुछ देर के बाद हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो गयी. दोपहर की गर्मी केबाद हल्की बारिश के कारण मौसम उमस से भर गया. कमरे में रहना मुश्किल हो गया क्योंकि आंधी के कारण बिजली भी गयी हुई थी. बारिश के वावजूद मैं छत पर आ गया. बारिश की बुँदे बड़ा सुकून दे रही थी. मुझे वह रात याद आ गयी जो सोमलता के साथ घर के छत पर बितायी थी. सोमलता मेरे दिल में जैसे पक्की तौर पर घर कर गयी थी. याद है कि जाता ही नहीं. अब बारिश तेज़ हो गयी. पता नहीं कब से मैं ख्यालों में खोया भींग रहा था. अचानक किसी की आवाज मेरे कानो में पड़ी जैसे की मुझे पुकार रही हो. मुझे लगा कि सोमलता मुझे पुकार रही है, “ओओऊ.... बाबु... अरेएए ओ बाबु...” पर मेरा ख्याल टुटा तो मैंने पाया की हवेली के बरामदे से लाली मुझे पुकार रही है. उसकी बगल में ठकुराईन खड़ी है. मैं थोड़ा झेंप गया. “बाबु, इधर आ जाओ” वह मुझे हाथ के इशारे से पास बुलाई. मैं पहले झिझका लेकिन जब दुबारा पुकारी तो दौड़ते हुए चला गया. ऊपर के कमरे के आगे एक खुला बरामदा बना हुआ था. एक बड़े झूले में ठकुराइन बैठी थी और बगल के सोफेनुमे कुर्सी में लाली. मैं भींगे कपड़ो में बरामदे में खड़ा हो गया. ठाकुराइन किसी एक्स-रे मशीन की तरह मुझे घुर रही थी. मैं थोड़ा झेंप गया. अब ठाकुराइन बोली, “बरसात में भींगने का मज़ा बहुत है लेकिन सर्दी लग जाएगी” मैं सिर्फ “जी” कहकर चुप हो गया और बाहर असमान को देखने लगा. बहुत अजीब लग रहा था इन दो अजनबी औरतों के बीच. फिर ठकुराईन बोली, “बाबु, तुमने अपना नाम क्या बताया था? मुझे याद नहीं.” मैं देखा की वह झूले से उतर मेरे सामने खड़ी थी. “जी मेरा नाम बिनय है” मैंने जवाब दिया. वह बिल्कुल मेरे बगल में खड़ी हो गयी. उसकी बदन से किसी फूल की महक आ रही थी. काले बरसते आसमान की ओर देखते हुए बोली, “लगता है आज रात भर बारिश होगी. बिनय बाबु, आज रात बाहर निकलने की जरूरत नहीं है. हमारे रसोई में जो बनेगा लाली दे आएगी. ठीक है?” मैं क्या बोलता. “जी, ठीक है” ठकुराइन एक बार फिर मुझे सर से पाँव तक देखने के बाद अन्दर के कमरे में चली गयी.
ठकुराइन के जाने के बाद लाली मेरे करीब आ गयी. चुहल करते हुए बोली, “लगता है साहब को आज किसी माशूका की याद आ रही है. क्यों?” मैं थोड़ा उदास लहजे में बोला, “हाँ.....” वह बदन से बदन चिपकाते हुए धीरे से बोली, “कौन है वह हुस्न की रानी? कोई मौसी, काकी या बुआ हो नहीं?” और जोर से हंस पड़ी. अन्दर के कमरे से ठकुराईन लाली को बुला रही थी. मेरे गाल पे एक चुम्मा दे जाते हुए बोली, “तैयार रहना मेरे छोटे साहब. रात को आ रही हूँ.” और कमर मटकाते हुए अन्दर चली गयी. बारिश कम होने का नाम नहीं ले रहा था, मेरे पुरे कपड़े गिले हो गये थे. मैंने कमर के नीचे देखा तो पाया की मेरा पायजामा बिल्कुल चिपक गया था और मेरा लंड का उभार साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था. अब मुझे समझ में आया की ठकुराइन मुझे इतना घुर क्यों रही थी! मैं वापस कमरे ने आ गया. गीले कपड़े बदल कर सिर्फ एक बॉक्सर पहन लिया, वैसे भी आज कपड़ो को ज्यादा जरूरत है नहीं. घड़ी देखी, रात के आठ बज रहे थे. बारिश अभी भी जारी है, लेकिन धार जरूर कम हो गयी है. मैं बड़ी बैचैनी से लाली का इंतज़ार कर रहा था. अचानक बिजली आ गयी. मैंने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया की चलो रात को कोई दिक्कत तो नहीं होगी. मैंने लाइट बंद की और छत की और देखने लगा. मन में सोचा था कि जैसे ही लाली अँधेरे कमरे में आएगी मैं उसको कसके पकड़ लूँगा. करीब आधे घन्टे इन्तेजार के बाद मैंने किसी को छत से मेरे कमरे की ओर आते देखा. मैं अन्दर दीवार के पीछे खड़ा हो गया. वह कमरे के अन्दर आई, किसी को नहीं देख खाने का डब्बा निचे रख बाहर जाने लगी. जैसे ही वह दरवाजे के पास आई उसको कमर से कसकर पकड़ लिया. वह कसमसा कर रह गयी, जैसे खुद को मुझसे छुड़ाना चाहती हो. उसको और कसकर पकड़ते हुए मैं बोला, “कहाँ जा रही हो लाली रानी? इतनी जल्दी भी क्या है? खाना तो खाने दो!” वह बिल्कुल फुसफुसाते हुए बोली, “साहब, मैं लाली नहीं कुसुम हूँ” मुझे काटो तो खून नहीं. पीछे हटने के बाद बड़ी मुश्किल से बोला, “क..क......कु....कुस्स्सुम” 

 “ठीक है मैं खा लूँगा” मैं इतना धीरे बोला कि मुझे भी ठीक से सुनाई नहीं दी. कुसुम अब धीरे धीरे मेरी ओर बढ़ रही थी और मेरा दिल जोर से धड़क रहा था. बिल्कुल मेरे करीब आकर बोली, “लगता है लाली दीदी से आपका काफी लगाव हो गया है. बहुत ख्याल रखती है क्या साहब आपका?” यह सवाल मुझे किसी और बात की तरफ इशारा कर रहा है. “नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. वह तो रोज़ यहाँ आती है सफाई करने तो बात हो जाती है.” मैंने बात को घुमाने की कोशिश की. लेकिन वह मुझे इतनी आसानी से छोड़नेवाली नहीं थी. मेरे सामने खड़ी कुसुम की नज़र मेरे बॉक्सर के उभरे हिस्से पर थी. साड़ी के पल्लू को चढ़ाते हुए बोली, “बातचीत तो ठीक है साहब लेकिन अकेले में कसकर पकड़ना तो कुछ और बात है. कल तो दीदी आपके लंड की मालिश कर रही थी” यह औरत अब बिल्कुल नंगेपन पर उतार आई थी. मै टालने के इरादे से बोला, “तो तुमको क्या? तुम आपना काम करो समझी?” मेरे आवाज में गुस्सा तो था लेकिन दिल में डर भी था अगर ये हवेली में हल्ला मचा दे तो मेरा रहना मुश्किल हो जायेगा और अगर ऑफिस में बात पंहुच गया तो हद से ज्यादा बदनामी होगी. मेरे तेवर देख कुसुम थोड़ा सहम गयी. अपने हाथो को मलते हुए बोली, “मैं कहाँ किसी को बोलने जा रही हूँ. आप तो बेकार में नाराज़ हो रहे है” मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आखिर ये औरत चाहती क्या है. मै पूछा, “तुम आखिर चाहती क्या हो?” अब कुसुम की हिम्मत बढ़ गयी. मेरे इतने करीब आ गयी कि उसकी छाती मेरे सीने से चिपक गये. मेरी नंगी पीठ को सहलाते हुए बोली, “साहब आप जो प्रसाद लाली दीदी को देते हो उसका कुछ हिस्सा मुझे भी दिया करो ना. वैसे कितनी बार आपने दीदी की ली है?” अब मैं भी खुल गया, बोला, “कहाँ कुसुम, सिर्फ एक बार लाली ने मेरा मुठ मारा था जो तुमको पता है.” यह सुनकर वह जोरसे ठहाके मार हंसने लगी. “इसका मतलब है की आपने सिर्फ रसगुल्ला को देखा, ना तो उसे दबाया, ना ही चूसा और ना ही खाया!” उसकी हंसी से मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था. यहाँ सब चूत खोल के बैठी है और मैं लंड पकड़ के बैठा हूँ. सच में बहुत बड़ा चुतिया हूँ. अपनी हंसी को रोकने के बाद कुसुम बोली, “साहब दिल छोटा क्यों करते हो? चलो आज मैं तुमको रसगुल्ला के साथ गुलाब जामुन भी खिलाऊँगी. पहले मैं देख तो लूँ कि मेरे साहब का खीरा कैसा है” वह मेरा बॉक्सर उतरने लगी. लेकिन तभी मुझे लाली की बात याद आ गयी, कहीं यह औरत मुझे बाद में ब्लैकमेल तो नहीं करेगी? मैंने कुसुम की हाथ को पकड़ रोक दिया. वह मुझे अचरज से देखने लगी. मैं बोला, “आखिर तुम चाहती क्या हो? यह सब से तुम्हे क्या मिलेगा?” वह बॉक्सर के ऊपर से ही लंड को मसले जा रही थी. उसकी आँखों में चुदास थी. गहरी आवाज में बोली, “साहब तुम खाना क्यों खाते हो?” अब ये ‘आप’ से ‘तुम’ पर आ गयी थी. मैंने कहा, “भूख मिटने के लिए”. कुसुम होंठो को मेरे करीब लाते हुए बोली, “मैं भी अपनी बदन की भूख मिटने के लिए यह सब कर रही हूँ. मुझे जोरो की भूख लगी है.” मैं खामोश रहा. कुसुम मेरे सर को पकड़ कर झुका दी ताकि उसके करीब आ सकूँ और मेरे होंठो को अपने होंठो से चिपका दी. कुछ देर वह मेरे होंठो को ऊपर से ही चूसने लगी फिर जैसे ही मैं मुँह खोला, वह मेरे मुँह के अन्दर जीभ डाल दी. मैं उसकी जीभ को लोल्लिपोप की तरह चूसने लगा. हम दोनो के लार आपस में घुलकर एक नया स्वाद पैदा कर रहा था. कुसुम मेरी नंगी पीठ को कसकर पकडे थी और मैं उसकी गांड का दोनों हाथो से जायजा ले रहा था. उसकी गांड इतनी नरम थी की मेरी उँगलियाँ उसमे धंसने लगी. तभी मेरा ध्यान दरवाजे की तरफ गया, जो खुला था. बाहर जोर से बारिश हो रही थी, जैसे आज ही सारा पानी बरसने वाला है.कुसुम मुझे बेतहासा चूमे जा रही थी. मैंने उसे अलग किया हो मेरी ओर देखने लगी. मैंने कहा, “पहले दरवाजा तो बंद कर ले”. वह मुझे वापस बाँहों में जकड़ बोली, “छोडो ना साहब, इतनी बारिश में यहाँ कौन आएगा? यहाँ तो आप अकेले रहते हो.” बात तो सही है लेकिन फिर भी मुझे अजीब लग रहा था इस तरह दरवाजा खोल सेक्स करना!


हम दोनों के बदन आपस में उलझ गये. मेरा लंड बॉक्सर में तना हुआ था और कुसुम की मम्मे उसकी ब्लाउज में. लेकिन हमारे होंठ चिपके रहे. लगभग दस मिनट तक चुम्मा-चाटी के बाद कुसुम ने मुझे धकेल दिया मेरे छोटे बिस्तर पर. मेरा बिस्तर एक पलंग पर बिछा था जो सिर्फ एक इंसान के सोने के लिए था. बिस्तर पर पड़ा मैं कुसुम को हैवानियत भरे नज़रों से देख रहा था. कुसुम ने अपनी साड़ी उतार दी और मेरे पैरों के पास आ खड़ी हो गयी. ख़ुदा कसम क्या कयामत लग रही थी! काले रंग की ब्लाउज में कसा गोरा बदन बड़े बड़े संतो का दिमाग घुमा दे, मैं तो फिर भी आम इन्सान हूँ. उसकी पेटीकोट छोटी थी जो सिर्फ घुटनों के कुछ इंच नीचे तक ही आती थी. कुसुम एक बार दरवाजे की ओर देखी फिर मेरे पैरों के बैठ गयी. मैं प्यास भरी नज़रों से उसको देखने लगा. मेरा बॉक्सर अब तम्बू में तब्दील हो चूका था. वह दायें हाथ से लंड को सहलाने लगी और बाएं हाथ से मेरी जांघ को. जीभ से अपनी होंठो को चाटते हुए बोली, “साहब, अब तुम्हारा हथियार देख लूँ. औरतों के लायक है या बच्चियों के खेलने के” और एक ही झटके में बॉक्सर उतार दी. मेरा लिंग किसी ताड़ के पेड़ की तरह सर उठाये खड़ा था. मैंने उसको छेड़ने के इरादे से कहा, “क्यों रानी, कैसा है मेरा हथियार?” कुसुम बिना कुछ बोले मेरे अन्डो को सहलाने लगी. बीच-बीच में वह अण्डों को जोर से दबा देती थी और मेरी सिसकारी निकल जाती. मेरे ऊपर झुकते हुए कुसुम बोली, “तुमने किसी औरत की चूत पर मुँह मारा है?” मेरी नज़र तो ब्लाउज से झांकती मम्मो पर थी. मै हाँ में सर हिलाया. अचानक वह उठ खड़ी हुई और बाथरूम के अन्दर चली गयी. मैं नंगा खड़े लंड लिए बिस्तर पे पड़ा सोचने लगा कि आखिर यह हुआ क्या? लगभग पांच मिनट के बाद कुसुम बाथरूम से बाहर आई तो मैं हैरान था. वह बिना पेटीकोट के थी. चौड़ी नितम्बों के बीच में झांटो से ढकी चूत से पानी टपक रहा था. मेरे सवालिया नज़रों से घूरने पर थोड़ा शरमाते हुए बोली, “वो क्या है ना साहब, आज तक किसी ने मेरी चूत पे मुँह नहीं मारा. मेरी बड़ी इच्छा है की कोई मेरी चूत को चुसे चाटे. इसलिए इसको धोने गयी थी.” मेरी हंसी निकल गयी. एक कुसुम है जो मुझे धोकर चूत परोस रही है और एक सोमलता है जो पेशाब करने के बाद सीधे मेरे मुँह पर बैठ जाती है. मैं खड़ा हो गया और कुसुम को बाँहों में जकड़ने के बाद उसकी होंठो को चूमने लगा. साथ ही साथ उसकी चूत को मसलने भी लगा. कुसुम अब मेरी बाँहों में छटपटाने लगी. मैंने उसको बिस्तर पर लेटाया और उसकी टांगो के बीच बैठ गया. उसकी चूत की फांको को अलग कर जीभ डाल दी. ज़ोरदार सिसकारी के साथ कुसुम का बदन ऐंठ गया. वह दोनों हाथो से मेरे सर को पकड़ लिया. सोमलता के साथ मैंने काफी ट्रेनिंग की है. मैं कभी उसकी चूत के अन्दर जीभ घुमाता तो कभी भगनासा को चूसता. साथ-साथ मैं उसकी गांड को दोनों हाथों से दबा भी रहा था. कुसुम जी खोलकर चिल्ला रही थी. मुझे डर लग रहा था, कहीं कोई सुन ना ले. लेकिन बाहर जोरो की बारिश के कारण ऐसा सोना शायद नामुमकिन था. जहाँ मैं उसकी चूतड़ को दोनों हाथों से मसल रहा था, कुसुम उत्तेजना के मारे खुद अपनी मम्मों को मसल रही थी. मैं उसकी चूत को जीभ से चोदना जारी रखा. वह बिन पानी मछली की तरह बिस्तर पर तड़प रही थी. उसका बदन कमान की तरह मुड़ जाता फिर धम्म से बिस्तर पर सीधी हो जाती. दस मिनट के बाद दोनों टांगो को घुटने से मोड़ने के बाद कुसुम कांपने लगी. मैं समझ गया की समय आ गया है. मैंने एक ऊँगली उसकी गीली चूत में डाल दी. इस बार उसकी सिसकारी लम्बी थी, “इस्स्स्सस..... हाययय.... दैय्या रेरेरे....” मैं जीभ और ऊँगली दोनों से चोदने लगा. दोहरे चुदाई के आगे कुसुम की चूत जवाब दे गयी और रस का दरिया निकल पड़ा. कुसुम का बदन अब शांत था लेकिन सांसे तेज़ चल रही थी. कुछ देर उसकी चूत मसलने के बाद मैं उठा तो नज़र दरवाजे की तरफ गई. दरवाजे पर लाली को देख मेरी सांसे रुक गयी, मेरा लंड जो सरिये जैसा सख्त था एक ही झटके में पिचक गया. लाली दरवाजे पर खड़े घूर रही थी लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह काफी गुस्से में है.


मैं बुत बनकर लाली के तमतमाते चेहरे को देखने लगा. कुसुम अभी भी मदहोश होकर अधनंगी लेती हुई थी. कमरे के अन्दर आकर गुस्से में बोली, “वाह साहब, वाह! ये छिनाल यहाँ चूत खोल लेती है और आप भूखे कुत्ते के जैसे चाट रहे हो” मैं तो इतना डर गया था कि यह होश नहीं था कि मैं नंगा खड़ा हूँ. मैं चुपचाप जमीन को देख रहा था. लाली की आवाज़ सुन कुसुम भी बिस्तर के नीचे आ गयी. वह डर और हैरानी से लाली को देख रही थी. लाली की नज़र उसकी टपकती चूत पर थी. अचानक लाली दरवाजे की ओर मुड़ी और कहते हुए जाने लगी, “बताती हूँ मैं मालकिन को. इस छिनाल को हवेली से नहीं फेंकवाया तो मेरा भी नाम लाली नहीं” कुसुम डर से मेरी तरफ देखने लगी. लाली दरवाजा पार कर छत पर जा चुकी थी. पता नहीं मुझमे इतनी हिम्मत कहाँ से आया, मैं नंगे ही दौड़ के गया और लाली को पीछे से पकड़ लिया. “एकबार मेरी बात सुन लो लाली, इसमें कुसुम की कोई गलती नहीं है. पुरी बात तो सुनो” लाली अपने आपको छुड़ाने के लिए कसमसाने लगी, “मुझे कुछ नहीं सुनना है साहब, मुझे जाने दो” बाहर ज़ोरदार बारिश हो रही थी. मैं लाली को जबरदस्ती खिंच के कमरे में ले आया, “ठीक है चली जाना, पांच मिनट हमारी बात तो सुन लो” बड़ी मुश्किल से लाली अन्दर आई. मैं पुरी तरह भींग गया था, लाली की भी साड़ी गीली हो चुकी थी. तबतक कुसुम अपनी साड़ी को कमर से लपेट ली और कोने में किसी मुजरिम की तरह खड़ी थी. लाली अभी भी गुस्से में थी, कुसुम के पास जाकर बोली, “तो इसको भी अपने जाल में फंसा ही लिया तूने. तेरी आदत नहीं जाएगी हर किसी मर्द का लंड नापने की.” कुसुम सर झुकाए खड़ी थी. शायद कुछ बोलना चाहती थी लेकिन हिम्मत नहीं थी. मैं लाली के दोनों कंधो को पकड़ बिस्तर पर बैठाया और सामने जमीन पर बैठते हुए बोला, “पहले मेरी बात सुनो” लाली का गुस्सा थोड़ा कम हुआ. बगल झाकते हुए बोली, “बोलो, क्या बोलना चाहते हो” मैं उसकी दोनों घुटनों को पकड़े बैठा था. मैंने बोलना शुरू किया, “शाम को जब तुमने कहा तुम रात को आओगी खाना लेकर तो मैं कमरे में बत्ती बुझाकर तुम्हारा इंतज़ार करने लगा. कुछ देर बाद कुसुम खाना लेकर आई. मैंने सोचा तुम हो. मैं उसको पीछे से पकड़ लिया. बाद में पता चला की तुम नहीं ये है. बस इसके बाद यह सब हो गया.” अब लाली बिल्कुल सामान्य हो गयी जब उसे पता चला कि मैं उसके लिए इंतज़ार कर रहा था. मेरी ओर देखते हुए बोली, “क्या करूँ साहब? बीबीजी की तबियत ठीक नहीं थी. मालिश कर रही थी, इसलिए नहीं आ पाई.” फिर कुसुम की ओर देखते हुए बोली, “लेकिन इसे तो मालूम था. इस औरत की आदत है दुसरे के मर्द पर डोरे डालने की” इस बार कुसुम चुप नहीं रह सकी. शायद इतना संगीन झूठा इलज़ाम कोई भी औरत बर्दास्त नहीं करेगी. वह बोल पड़ी, “दीदी, आप उसी पुरानी बात को लेकर बैठी है. मेरा और पवनजी के बीच में कुछ नहीं था और ना ही मैं उसपर कोई डोरी डाली थी. खुद उसकी बुरी नज़र मुझपर थी. एक दिन मेरे घर में घुसकर मेरे साथ जबरदस्ती करने लगे. मुझे नंगी कर मसलने लगे. लेकिन किस्मत से उस दिन महीने चल रहा था इसलिए छोड़कर भाग गया. मैं आपको बोलने ही वाली थी कि वह पहले जाकर मेरी शिकायत कर दी. अब इस अकेली औरत की कौन सुनता है?” बोलते बोलते कुसुम की आँखें गीली हो गयी. लाली अब भी उसको घूरे जा रही थी. कुछ देर बाद कुसुम बोली, “मुझे पता था कि आपका ब्याह पवनजी के साथ होना है. यह जानकर मैं आपको धोखा कैसे दे सकती हूँ? आपलोगों ने हमको ठिकाना दिया है” बोलते बोलते बेचारी रो पड़ी. मुझे अब समझ में आया की पवनजी लाली से इतना कतराते क्यों है. यह पवन तो बहुत पहुंची हुई चीज़ है!


लाली का दिल अब पिघल गया था. वह कुसुम को बाँहों में जकड़कर बोली, “हमको माफ़ कर दे कुसुम. ग़लतफ़हमी के कारण तुमसे बहुत गन्दा बर्ताव किया. यह सब मर्द होते ही ऐसे है. एकदम भूखे भेड़िये!!!” और मेरी तरफ देख मुस्कुराने लगी. मैं चुपचाप रहा. वह कुसुम को पकड़ कर बिस्तर पर बिठाई और बोली, “अच्छा, यह बता साहब का लंड कैसा लगा?” कुसुम थोड़ा शरमाते हुए बोली, “अभी तक हमने ठीक से देखा नहीं हैं” लाली चौंकते हुए बोली, “हें! अभी तक साहब ने तुमको चोदा नहीं. क्या साहब डर लग रहा है क्या?” मैं भी तैश में आ गया, “डर किस बात का? अभी तुम्हारी जैसी दस को चोद दूँ. मौका ही नहीं मिला लंड डालने का.” लाली के होंठो पे शैतानी मुस्कान आ गयी. बोली, “अच्छा जी, बड़ा घमंड है अपने आप पर” मैं कुछ नहीं बोला. इस बीच कुसुम बहुत असहज महसूस कर रही थी. वह उठी और अपने कपड़े समेटते हुए बोली, “आप लोगो को जो करना है करो मैं जाती हूँ. दीदी मुझे माफ़ कर दो.” उसको जाते देख लाली हडबडा गयी और जल्दी से उसको पकड़ कर बोली, “अरे पगली क्यों हमको और शर्मिंदा कर रही है. ये साहब ना तो मेरा पति है ना मैं इसकी बीवी. चल आ मिल के मजे लेते है.” मैं अभी भी पूरा नंगा कोने में खड़ा सास-बहु सीरियल का ये एपिसोड देख रहा था. लाली ने कुसुम के बदन से साड़ी उतार ऊपर से नंगी कर दी. कुसुम का बदन औसत दर्जे का था लेकिन उसकी चूचियां बड़ी और कसी हुई थी. निप्पल का घेरा बड़ा और गहरे रंग का था जो उसकी गोरी देह पर खूब फब रही थी. लाली कुसुम को बाँहों में जकड़े हुए धीरे-धीरे पीठ और चूतड़ को सहला रही थी. लाली में मुझे इशारों से पास बुलाया, “ओ साहब क्या देख रहे हो? पास आओ और दिखाओ अपने लंड का कमाल” मेरा लंड उछालें मार रहा था. मैं पीछे गया और कुसुम की चूतड़ को जोर से दबा दिया. उसकी सिसकारी जैसे गले में ही घुट गयी और पूरा बदन थरथरा गया.


कुसुम अभी भी शरमा रही थी. लाली के कंधे पर सर रख कर चुपचाप दोनों और से प्यार ले रही थी. मै भी पीछे से कुसुम को जकड़ लिया. मेरा लंड उसकी चूतड़ की फांक में फंस गया और मेरे दोनों हाथ उसकी चिकनी पेट का जायजा लेने लगे. कुसुम एक मर्द और एक औरत के बीच पीसने लगी. उसकी सांसे गहरी होने लगी. मैं एक हाथ उसकी चुचियों पे ले गया और दूसरी हाथ कमर के नीचे झांटों को टटोलने लगा. झांटो के ऊपर से उसकी चूत को जोर से मसलने लगा जिससे कुसुम बैचैन होकर सीत्कार करने लगी. उसकी मम्मों के निप्पल खड़ी हो गयी जिसे मैं उँगलियों में फँसाकर मसलने लगा. लेकिन इन सबके दौरान लाली एकदम खामोश थी. वह बस कुसुम को जकड़े खड़ी थी. मैंने उसकी आँखों में देखा जिसमे एक सूनापन नज़र आया. मुझे अपनी ओर ताकते देख बोली, “साहब खड़े खड़े ही पूरा काम करोगे क्या? चलो बिस्तर पर”. फिर कुसुम को बिस्तर पर बैठाकर खुद उसकी बगल में बैठ गयी. मेरी ओर देख बोली, “आ जाओ मेरे राजा” मैं लाली के सामने खड़ा हो गया, मेरा तना हुआ लंड उसकी मुँह के सामने था. लंड को हलके हाथो से सहलाते हुए बोली, “साहब पिछले दिन तुम्हारे लंड को ठीक से प्यार नहीं कर पाई. लेकिन आज पूरा प्यार दूंगी” कुसुम बड़े गौर से हमारी ओर देख रही थी. लाली ने कमर से पकड़ मुझे सामने खींच ली और झट से मेरे लंड को मुँह के हवाले कर दी. मेरे लंड को पूरा निगल कर चूसने लगी. मेरी नज़र कुसुम पर गयी जो बड़े आश्चर्य से लाली को देख रही थी. शायद उसके लिए यह तरीका बिल्कुल नया था. मैंने लाली के सर को पीछे से पकड़ा और उसकी मुँह को चोदने लगा. उसकी मुँह से “सक्क सक्क” की आवाज आ रही थी. सड़प सड़प की आवाज के साथ वह किसी शातिर खिलाडी की तरह मेरे लंड को चुसे जा रही थी. मेरा लंड जो इतनी देर दो नंगी औरतों को देख बार-बार गरम हो चूका था ज्यादा देर तक मैदान में टिक नहीं पाया और ढेर सारा प्यार का रस लाली के मुँह में उढ़ेल दिया. कुसुम का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया. उसकी आँखों के सामने दो बदन चुदाई के खेल में लगे है और वह नंगी होकर देख रही थी. मुठ निकलने के साथ-साथ मेरी टांगो की जान निकल गयी और मैं निढाल होकर लाली के कन्धों पर गिर गया. लाली के पीठ पीछे मैं कुसुम को देखा, बेचारी हैरानी और शर्म से पानी-पानी हो रही थी. इतनी गरम सीन देख वह भी गरम हो रही थी. भले लाली की तरह खुल के मैदान में नहीं थी लेकिन उसके गोर गाल लाल हो गये थे.


मुझे संभलने में मिनट भर का वक़्त लगा. मैं सीधा खड़ा था लेकिन मेरा मुरझाया लंड अभी तक लाली के हाथों में खेल रहा था. कुसुम बहुत आस भरी नज़रों से इसे देख रही थी लेकिन मुँह से कुछ बोल नहीं पा रही थी. लाली मेरे लंड की धीरे से मालिश करते हुए कुसुम की ओर देख बोली, “क्यों बन्नो? देख कर मज़ा आया ना?” बेचारी कुसुम की हालत ऐसे ही ख़राब हो रही थी, हम दोनों के घूरने से और ख़राब हो गयी. वह नंगे बदन अपने में सिमट कर नज़रे झुका ली. मैं और कुसुम, हम दोनों के बदन पर कपड़े का एक धागा तक नहीं था लेकिन लाली अभी भी पुरे कपड़ों में थी. हालाँकि उसकी साड़ी का पल्लू गिर गया था और ब्लाउज के ऊपर से दोनों पहाड़ों के बीच की घाटी दिख रही थी. शायद इसमें भी उसकी कोई चाल है! खैर कुसुम अब भी छुईमुई बनी बैठी थी. लाली ने उसको खींचकर अपने से सटा ली और बोली, “ले अब तू साहब के इस हथियार को तैयार कर” मेरा लंड बिल्कुल कुसुम के मुँह के पास लटक रहा था लेकिन वह इसे देख भी नहीं रही थी. लाली में मेरा लंड को नीचे से पकड़ा और कुसुम की बंद होंठो पर रगड़ने लगी. कुसुम आँख और मुँह दोनों बंद कर ली. लाली थोड़ा तैश में आकर बोली, “अरी छिनाल अपना मुँह तो खोल! अपना चूत चुसवाकर पानी गिरा सकती है तो लौड़ा नहीं चूसेगी?” लाली के कहने से वह अपना मुँह तो खोल दी लेकिन लंड को ना तो हाथ लगाई ना ही उसको चूसने में कोई दिलचस्पी दिखाई. लाली एक हाथ से उसकी सर को पीछे से धर और दूसरी हाथ से मेरी गांड को पकड़ आपस में मिला दी जिससे मेरा लंड उसकी मुँह में समा गया. लंड गला के अन्दर जाने के कारण कुसुम को साँस लेने में दिक्कत आई और लंड को मुँह से निकल खांसने लगी. लाली हँसते हुए बोली, “सुनती नहीं है मेरी बात! प्यार से चूस, तो तुझे भी मज़ा आएगा और तेरी मरद को भी.” बाहर बारिश की रफ़्तार थोड़ी धीमी हो गयी थी. कुसुम की झिझक थोड़ी कम हुई और वह खुद मेरे लंड को मुँह में डाल चूसने लगी. लाली बोल पड़ी, “शाबाश बन्नो! साहब के अन्डो को भी सहलाते रह और कमर से पकड़ कर चूस” लाली दोनों पैर फैला कर कुसुम के पीछे बैठ गयी और उसकी गर्दन को चुमते हुए उसकी मम्मो को दबाने लगी. अब कुसुम के हलक से हल्की “गुर्राहट” की आवाज निकल रही थी. मैं उसको माथे के पीछे से पकड़ हल्के हल्के लंड को आगे-पीछे करने लगा. लाली मेरी ओर देख बड़ी कामुकता से मुस्कुरा रही थी. जो अब एक हाथ से कुसुम की स्तनों को मसल रही थी और दूसरी से उसकी झांटो से भरी चूत को.



मेरा लंड अब अपने पुरे आकार में आ चूका था. मैं कुसुम के मुँह से लंड निकाला और बांहों में उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया. लाली उठ खड़ी हुई, मेरे लंड को पकड़ कर बोली, “साहब तुम सब मज़ा करो, मैं जाती हूँ अब” मैं हैरानी से उसको देख बोला, “लेकिन आज रात तो हमदोनो का होने वाला था?” लाली मेरी कान में फुसफुसाते हुए बोली, “हमको जो मज़ा लेना था सो हमने ले लिया. वैसे भी आज मेरी मुनिया साफ़ नहीं है. तुम अपने लौड़े से कुसुम की सेवा करो. हमारी सेवा का मौका फिर कभी मिलेगा.” फिर मेरे लंड को एक बार जोर से दबाकर हँसते हुए बाहर निकल गयी. कुछ देर बाहर देखने के बाद वापस कुसुम को देखा तो उसकी नज़रों में प्यास साफ़ झलक रही थी. लाली की नहीं तो कुसुम की चूत ही सही! कुसुम टांगो को हल्का फैलाकर लेटी हुई थी. लेटने के कारण उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ढलक गयी थी. उसकी आँखों में थोड़ा शर्म, थोड़ा प्यार था मेरे लिए. मैं उसको एक तक देखते रहा जबतक की वह खुद मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने ऊपर खींच नहीं ली. धीरे से अपने ऊपर खींचने के बाद उसने मेरे होंठो को अपने होंठो पर लगा ली और बेतहाशा चूसने लगी. मैं भी खुलकर उसका साथ देने लगा और दोनों हाथों से उसकी चुचियों का मर्दन करने लगा. 



मेरा लंड अब अपने पुरे आकार में आ चूका था. मैंने कुसुम के मुँह से लंड निकाला और बांहों में उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया. लाली उठ खड़ी हुई, मेरे लंड को पकड़ कर बोली, “साहब तुम सब मज़ा करो, मैं जाती हूँ” मैं हैरानी से बोला, “लेकिन आज रात तो हमदोनो का होने वाला था?” लाली मेरी कान में फुसफुसाते हुए बोली, “हमको जो मज़ा लेना था सो हमने ले लिया. वैसे भी आज मेरी मुनिया साफ़ नहीं है. तुम अपने लौड़े से कुसुम की सेवा करो. हमारी सेवा का मौका फिर कभी मिलेगा.” मेरे लंड को एक बार जोर से दबाकर हँसते हुए बाहर निकल गयी. कुछ देर बाहर देखने के बाद वापस कुसुम को देखा तो उसकी नज़रों में प्यास साफ़ झलक रही थी. लाली की नहीं तो कुसुम की चूत ही सही! कुसुम टांगो को हल्का फैलाकर लेटी हुई थी. लेटने के कारण उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ढलक गयी थी. उसकी आँखों में थोड़ा शर्म, थोड़ा प्यार था मेरे लिए. मैं उसको एक तक देखते रहा जबतक की वह खुद मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने ऊपर खींच नहीं ली. धीरे से अपने ऊपर खींचने के बाद उसने मेरे होंठो को अपने होंठो पर लगा ली और बेतहाशा चूसने लगी. मैं भी खुलकर उसका साथ देने लगा और दोनों हाथों से उसकी चुचियों का मर्दन करने लगा. मेरा लंड कुसुम की जांघों के बीच फंसा था जो उसकी चूत से बहती पानी से गीली हो रही थी. लगभग पांच मिनट लम्बे चुम्बन को तोड़ते हुए कुसुम मेरी आँखों में झांकते हुए बोली, “साहबजी, आप बहुत सही से चुम्मी लेते हो. देखो, मैं तो आपकी चुम्मी से ही झड़ गयी. अब अपना लौड़ा डाल भी दो.” मैं अपना दांया हाथ उसकी झांटो से भरी चूत के मुहाने पर ले गया जो पहले से गीली हो चुकी थी, लेकिन झांटो के कारण चूत की मुँह का पता नहीं लगा पाया. मैं हँसते हुए कुसुम को बोला, “कुसुम रानी, अपनी सबसे प्यारी जगह हो साफ़ रखा करो. मेरे लौड़े को पता ही नहीं चल रहा है कि कहाँ डेरा डालना है!” मेरी बातों से कुसुम शरमाते हुए धीमी आवाज में बोली, “जी साहब!” तब तक मुझे चूत की मुँह का ठिकाना मिल गया, मैं अंगूठे से उसकी चूत की दीवारों को मथने लगा. कुसुम की आँखें बंद हो गयी और मुँह खुल गया.


मैं कुसुम की खुली होंठो को फिर से चूमना चुसना शुरू किया और उसके साथ-साथ उसकी चूत को अंगूठे से पिसना. कुसुम शायद सिसकना चाहती थी लेकिन उसकी सिसकारी मेरे मुँह में दबकर रह गयी. अब मैं बड़ी बेदर्दी से उसकी चूत की दीवारों को रगड़ रहा था और साथ ही साथ भगनासे को भी छेड़ रहा था. कुसुम मेरे नीचे तड़प रही थी. आखिर मैं जब उससे रहा नहीं गया तो हाथों से मुझे रोक दी. मैं उसकी मुँह से हट गया तो वह जोर जोर से साँस लेने लगी. थोड़ा वक़्त लगा उसको सामान्य होने में. मैं समझ गया कि काफी दिनों के बाद इसकी मारी जा रही है. कुसुम की आँखें अधखुली थी. मैं उसकी मम्मो को धीरे धीरे सहलाना दबाना चालू किया. कुसुम की मुँह से “हम्म्म्म.... आअह्ह्ह्ह... ह्म्म्म....” की आवाजे आ रही थी. अब और देर ना करते हुए मैंने लंड के सुपाड़े को चूत की मुँह पर टिकाया और बहुत सावधानी के साथ हल्का सा धक्का लगाया जैसे कि मैं किसी अनछुई चूत मार रहा हूँ. चुदाई के अभाव में कुसुम की चूत वाकई किसी कुंवारी की चूत जैसी तंग लग रही थी. लंड का सिर्फ सुपाड़ा की अन्दर गया और ऐसा लगा की और अन्दर नहीं जायेगा. मैं उसकी कमर को कसकर पकड़ा और जोर से एक धक्का मर दिया. चूत की दिवार को फाड़ते हुए आधा लंड अन्दर फंस गया. इसके साथ-साथ कुसुम की मासूम चीख़ निकल गयी. मैं बड़ी मुश्किल से उसकी जुबान बंद किया. लेकिन फिर भी वह “गों...गों...” की आवाज़ कर रही थी. कुछ सेकंड रुकने के बाद मैं दोबारा ज़ोरदार धक्का मारा और पूरा का पूरा लंड अन्दर चला गया. धक्का इतना ज़ोरदार था कि बिस्तर की चरचराहट निकल गयी और हमदोनो के कमर-पेट आपस में गूँथ गये. लेकिन इसबार मैंने कुसुम की होंठो को अपने होंठो से सील कर दिया था, जिससे वह चीख़ नहीं पायी. शायद इतने दिनों बाद चुदने के कारण उसकी काफी दर्द हुए, जिससे उसकी आँखों में आंसू आ गये. मैं बिना किसी हरकत के कुछ देर उसकी चुचिओं को सहलाते हुए चूमता रहा ताकि दर्द का एहसास कम हो जाये. धीरे से उसकी कान में पूछा, “कुसुम रानी, तुम ठीक हो ना?” वह सिर्फ हाँ में सर हिलाई. अब मैं धीरे-धीरे कमर हो आगे-पीछे करने लगा. मेरा लंड अब कुसुम की चूत में अपनी पहचान बना चूका था और आसानी से हरकत करने लगा. कुसुम की होंठो को छोड़ मैं उसकी चुचियों को चूसने लगा और उसकी चूत मरना शुरू किया. बीच-बीच में कुसुम की सिसकारी निकल रही थी लेकिन धीमी आवाज में. कुसुम की बेचैनी बड़ने लगी. उसकी सिसकारी भी तेज़ हो गयी. मेरे सर को अपने छाती पर दबा दी और मेरे बालों को सहलाने लगी. मैं जब-जब उसकी चुचियों को काट देता तो उसकी सिसकारी चीख़ में बदल जाती. अब मैंने चोदने की रफ़्तार तेज़ कर दी. कुसुम की चीख़ भरी सिसकारी वीरान रात में गूंजने लगी. मैं भी किसी सांड की तरह हांफते हुए उसको बेरहमी से चोद रहा था. कुसुम का बदन बिन-पानी मछली की भांति तड़प रहा था. अचानक उसका शारीर ऐंठ गया और बुरी तरह कांपने लगा, फिर शांत हो गया. मेरे लंड पर रस की बारिश कर वह तो झड़ गयी लेकिन मेरा अभी तक खड़ा था. कुछ और धक्को के बाद मैं उसकी चूत में झड़ गया और उसके उपर निढाल हो गया. कुसुम का बदन बिल्कुल शांत था जैसे की उसमे जान ही नहीं हो. मैं उसको तंग करना ठीक नहीं समझा और उसकी ओर करवट ले सो गया. थकान और मस्त चुदाई के कारण जल्द ही गहरी नींद में चला गया. 
 














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