Monday, September 14, 2020

सुनीता के बहकते कदम-5

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सुनीता के बहकते कदम-5



घड़ी की सुइया 5 बजा रही थी। उसके कानो मे फिर से एक बार गाड़ी के हॉर्न की आवाज सुनाई दी। बच्चे स्कूल से आ चुके थे, अब सुनीता के पास साड़ी पहनने का टाइम नहीं था, उसने जल्दी से एक सिल्की गाउँन को अपने बदन पर डाला और तेजी से बाहर की तरफ निकल पड़ी। बाहर रोड पर स्कूल की बस खड़ी थी बस का कंडक्टर बच्चो के स्कूल बैग को हाथ मे लिए इंतजार कर रहा था, सुनीता ने तेज कदमो से जाकर मैन गेट खोलकर बस की तरफ बढ़ी। सिल्की गाउँन मे सुनीता के दोनों स्तन हिलते हुये साफ नजर आ रहे थे। उसके हिलते हुये मदमस्त जोबन को देख कर कंडक्टर की साँसे अटक सी गई। वो आखे फाड़ फाड़ कर सुनीता की जोबन के झोल का नज़ारा देखने लगा। उसका सिल्की गाउँन सुनीता के गदराए जिस्म से चिपका हुआ था, उसके स्तनो का आकार उस गाउन मे भी साफ साफ उजागर हो रहा था, उसे देखकर कोई भी सहज ही अंदाजा लगा सकता था की सुनीता के जोबन अंदर बिना ब्रा के है। कंडक्टर उसकी गोलाइयों का भरपूर नाजारा ले रहा था। जैसी ही सुनीता करीब आई अब उसके चुचको का आकार भी साफ साफ कंडक्टर को दिखने लगे, जिसे देख कर कंडक्टर से सहज ही अंदाजा लगा लिया की सुनीता के चूचको का आकार बड़े वाले अंगूर के जैसा था। उसके बड़े जोबन की चोटी पर उसके चूचक ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे की किसी पहाड़ की चोटी का शिखर हो। सुनीता ने कंडक्टर के हाथो से बैग लेने चाहा लेकिन वो तो सुनीता के मदमस्त यौवन मे डूबा हुया था, सुनीता उसकी इस हरकत पर उसे टोकना ही चाहती थी की उसे एहसास हुया को वो कंडक्टर उसके जिस्म को घूर रहा है, उसने नजरे अपने सीने पर डाली तब उससे पता चला की उसका जिस्म उस गाउन को ढक कम रहा और उजागर ज्यादा कर रहा है, गाउन उसके जोबन पर ऐसे चिपका था की उसके जोबन कर उभार स्पष्ट रूप से उजागर हो रहा था, उसके जोबन कर हर कटाव गाउन के ऊपर से बखुबी दर्शा रहे थे, यहा तक की गाउन के ऊपर से ही उसके चूचक की size का अंदाजा लगाया जा सकता था। ऐसी अवस्था मे उसे देखकर किसी भी मर्द की हालत कंडक्टर जैसी हो जानी थी। उसने बैग को थोड़ा ज़ोर लगाकर खीचा तब जाकर कंडक्टर को होश आया। वो अपने आपको संभालते हुये सुनीता की तरफ देख कर बोला “लगता है आप “काम” मे लगी हुयी थी, तभी आपको आने मे देर हुई” कंडक्टर ने “काम” शब्द पर ज़ोर लगाकर बोला जिससे की वो द्वियार्थी हो गया। बच्चे अंदर जा चुके थे, सुनीता उनके बेग को उठाए बिना कुछ बोले मुड़ कर तेजी से मैन गेट की तरफ बढ़ चली, वो बेग लेकर जैसे ही गेट के करीब उसकी हाथो से बैग फिसकर कर नीचे गिरने लगा वो बैग को संभालने के लिए नीचे झुकी, उसके नीचे जुकते ही उसका विकराल कूल्हो के दोनों फाके फैलकर अपनी विकरालता का प्रचंड रूप दिखाने लगे, हालाकी सुनीता ने panty पहनी हुयी थी लेकिन वो तो पहले ही सुनीता के कूल्हो के गहराई मे समाकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी, सुनीता का सिल्क गाउन उसकी उसके कूल्हे पर चिपक गया जिससे उसके कूल्हो का भौगोलिक नक्शा उभर कर दिखने लगा। सुनीता के कूल्हो की विशालता देखकर कंडक्टर के आखे पथराने लगी, उसने पल भर मे ये जान लिया की सुनीता ने अंदर panty नहीं पहनी है, अगर पहनी होती तो panty का किनारा उस सिल्की गाउँन से जरूर उभर जाता लेकिन अभी उसके कूल्हे चिकने सपाट दिखाई दे रहे तो जो इस बात के गवाह थे की वो गाउन के अंदर पूरी तरह से नंगे है। सुनीता के झुकने से उसके कूल्हो के दरार भी खुल गए थे और उस गाउन के ऊपर से ही उसकी दरार की गहराई का अंदाजा होने लगा था। दोनों फाको के बीच के गहराई का अंदाजा होते ही कंडक्टर आहे भरने लगा और उसका मन सुनीता के कूल्हो पर सवारी करने के मचलने लगा। सुनीता जैसे ही बेग को संभालकर सीधी खड़ी हुयी किसी कपाट की तरह उसके दोनों खुले हुये कूल्हे आपस मे तेजी से चिपक गए और उसका सिल्की गाउन भी अपने आपको गहरे कूल्हो मे फसने से न रोक सका। सुनीता के कूल्हो मे अंदर तक गाउन फसा हुया था, ये नजारा देखकर कंडक्टर बेचैन हो गया। सुनीता भी समझ चुकी थी की गाउन गहरी दरार मे फस गया है, उसने धीरे से अपना हाथ पीछे कर के कूल्हो मे फसे हुये गाउन को बाहर खीच लिया। ये सब कंडक्टर बड़ी तल्लीनता से देख रहा था। सुनीता ने ये सुनिश्चित करने के लिए की कोई उसे पीछे से देख तो नहीं रहा है, वो पीछे मुड़ी, उसे समझते देर न लगी की वो कंडक्टर उसकी सारे हरकतों को देख रहा था, और शायद मोबाइल मे रेकॉर्ड भी कर लिया था। सहसा उसे लगा की उसके हाथ मे मोबाइल भी था। लेकिन वो अपने इस शंका को दूर कर पाती इससे पहले ही कंडक्टर ने मुसकुराते हुये बस को थपथपा दिया। उसकी अश्लील मुस्कान को देखकर सुनीता झेप से गई और अंदर चली गई।
अंदर आकर वो बच्चो के साथ व्यस्त हो गई। “असलम भी आने वाला होगा” और इस हालत मे उसने देखा तो... पहले ही उस कंडक्टर ने जी भर के घूरा मेरे जिस्म को। ये सोचकर वो बाथरूम मे चली गई।
शाम को 6-30 बजे के करीब असलम अनुराग का बैग लेने के लिए घर आया। सुनीता ने उस समय कुर्ता और लेगी पहनी हुयी थी असलम सुनीता के जिस्म के उतार चढ़ाव को अपनी नजरों से नापते हुये बोला “कैसी है भाभी जी?” “ठीक हू असलम जी” सुनीता मे मुसकुराते हुये जवाब दिया। असलम सुनीता से उम्र मे लगभग 10-12 साल बड़ा था इसलिए सुनिता कभी उसे भाई साहब या असलम जी कह कर ही बुलाती थी। सुनीता ने अनुराग का छोटा से ट्रैवल बेग लाकर असलम को दे दिया।
“कहा जा रहे हो आपलोग?” “ये तो मुझे नहीं पता भाभी जी, बस साहब ने कहा की चलना है, ये नहीं बताया की कहा चलना है”
हम्म सुनीता ने गंभीर होते हुये कहा। असलम मौका देखकर सुनीता के मन को टटोलने लगा।
“अच्छे भाभी जी... वो site कैसी लगी आपको” सुनीता ऐसे सवालो के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी, वो थोड़ी हकलाते हुये बोली
“कौन सी साइट?”
“अरे वही जो मैंने उस दिन दी थी जब मैन साहब के साथ आउट ऑफ स्टेशन गया था... याद आया ....आपको?”
“अरे वो.... हा हा याद है... हा गई थी ... लेकिन ज्यादा देर तक मै रुकी नहीं उसपर, नींद आने लगी थी मुझे” सुनीता ने सफ़ेद झूठ बोल दिया
“साली कैसे झूठ बोल रही है उस दिन तो मेरे ल्ंड के बारे मे बाते करके भरभरा के पानी निकाला था अपनी चूत से... और कह रही है की नींद आ रही थी मुझे” असलम ने मन ही मन कहा।
इधर सुनीता को भी असलम के नाम की चुदाई याद आने लगी, उसके जिस्म उस रात की बातो को याद कर के फिर से गुदगुदाने लगा। लेकिन सुनीता ने वक्त की नजाकत को समझते हुये अपनी भावनाओ पर काबू किया हुआ था।
“वैसे कमेंट तो आए होंगे आप के लिए काफी सारे”
“नहीं ऐसा कुछ नहीं है सब नॉर्मल ही था” सुनीता ने बात को खतम करना चाहा।
असलम भी उसका मूड भाप चुका था इसलिए वो गाड़ी स्टार्ट करते हुये बोला “ये तो हो ही नहीं सकता भाभीजी” उसकी मुस्कान मे कोई राज छुपा हुआ सा सुनीता को महसूस हुया।
“क्यो? क्यो नहीं हो सकता” सुनीता के मूह से निकाल गया।
“फिर कभी बताऊंगा फुर्सत मे” ये कहकर असलम गाड़ी लेकर चल दिया।
सुनीता उसे पीछे से जाते हुये गंभीरता से देखती रही। “आखिर असलम ने ऐसा क्यो कहा” उसके जेहन मे ये सवाल उभरने लगा।
रात को करीब 10-00 बजे अनुराग और रघु पब मे बैठे जाम छलकाते हुये अपने बचपन की बातो को याद कर रहे थे। दोनों के चेहरे मे नशे के असर साफ झलक रहा था। अचानक बातो बचपन की शरारतों से उठकर लड़कपन की आवारगी पर चलने लगी।
हमउम्र लड़के लड़कियो की बात होने लगी। जो शादी से पहले बिलकुल पतली दिखती थी वो अब दो बच्चो की माँ है और उसके स्तन 38 के लगते है देखने मे... कुछ ऐसी बाते होने लगी उन दोनों के बीच... बात शादी के बाद की सेक्स लाइफ पर होने लगी... रघु इतराते हुये बोला
रघु – अरे यार मेरी बीवी तो कई बार ऐसे बोलती है की “तुम तो ऐसी हरकते करते हो, जैसे अभी नई नई शादी हुयी है तुम्हारी”।
अनुराग – क्यो बे साले! ऐसा क्या करता है तू? अनुराग चुस्की लेते हुये बोला।
रघु – देख भाई... अब मेरी शादी को 15 साल हो चुके है, एक वक्त के बाद हर चीज़ से इन्टरेस्ट कम होने लगता है... अनुराग किसी सेक्स के प्रोफ़ेसर की तरह गंभीर होके बोला।
अनुराग – मतलब... अब तेरा sex मे इन्टरेस्ट कम हो गया है।
रघु – नहीं बे चूतिये..... तूने वो फिल्म देखी है क्या?
“कौन सी”?
“अरे वो विवेक, अजय देवगन वाली”
“अच्छे वो... कंपनी” अनुराग घूट भरते हुये बोला
“अरे नहीं वो वाली जिसमे अजय देवगन इंस्पेक्टर है, और उसमे रितेश देशमुख भी है यार... क्या नाम है उसका मस्ती....”
“अच्छे वो वाली.... हा देखी है न तो” अनुराग ने पूछा
“उस फिल्म मे अजय देवगन बोलता है न की “घर का खाना कितना भी अच्छा क्यो न हो... रोज रोज खाकर आदमी बोर हो ही जाता है”
अनुराग – इसका मतलब तू भाभी से बोर हो गया है अब और तुझे अब बाहर का खाना चाहिए। अनुराग उसकी बातो अर्थ निकलते हुये बोला।
रघु – साले पूरी बात तो सुन ले तू... फिर वो बोलता है की “बीवी को चाहिए की वो घर मे ही कुछ ऐसा खाना पकाए की.... पतियों को कभी बाहर खाने के जरूरत ही न पड़े”
अनुराग – अरे यार तू कहना क्या चाहता है साफ साफ बोल ना, क्यो पका रहा है (अनुराग झुंझुलाते हुये बोला)
रघु – मेरे कहने के मतलब ये है की बहुत टाइम के काम को एक ही स्टाइल से करते करते आदमी बोर हो जाता है चाहे वो सेक्स ही क्यो न हो। इतने लंबे टाइम के बाद वो उतावलनापन नहीं होता है जो की शादी के कुछ सालो बाद तक दिखता है।
अनुराग – हा ये तो स्वभाइक बात है यार… ये तो सबके साथ होता है (अनुराग अभी खुद भी इसी स्थिति से गुजर रहा था)
रघु – मगर तू जरा सोच की अगर तू घर पर जाये और तेरे बिस्तर पर तेरी बीवी की जगह तेरी खूबसूरत पड़ोसन हो तो... क्या करेगा बता?
अनुराग – जम के पेलुंगा और क्या.... मगर ऐसा होगा क्यो? मेरे कमरे मे तो मेरी बीवी रहेगी ना... मेरी पड़ोसन कैसे आएगी? बता?  
रघु – मुझे पता है नहीं आएगी... लेकिन तू कल्पना तो कर सकता है ना की तेरी बीवी की जगह पड़ोसन है, जरा कल्पना कर के देख?
शराब के नशे के साथ रघु की बातो का नशा भी अनुराग पर चढ़ने लगा था। वो अपनी पड़ोस मे रहने वाली भावना भाभी को अपने कल्पना मे जीवंत करने लगा। मात्र ऐसी कल्पना से ही उसके अंगो मे तनाव आने लगा था। ऐसा तनाव वो कई सालो बाद महसूस रहा था। उसकी आखो की पुतलीया फैलने लगी थी। रघु उसकी मनोदशा को भापते हुये बोला।
रघु – अब सोच अगर तेरी बीवी भी “भावना” बन कर तेरा साथ दे तो।
अब अनुराग को सब साफ साफ समझ मे आ गया था की रघु उसको क्या बताना चाह रहा है। उसके चेहरे के भावो से रघु भी समझ गया की उसकी बातो को अनुराग समझ चुका है।
रघु – बस मेरी बीवी और मै ऐसा ही कुछ नया सा आजमाते रहते है, जिससे की दोनों को काफी मजा आता है और हम काफी एंजॉय करते है...  अच्छे चल अब भूख लग रही है खाना ऑर्डर करता हू मै.... waiter…..
असलम होटल के पार्क मे अपनी गाड़ी खड़ी करके उसमे बैठा हुया था... रात के 11.00 बज चुके थे। तभी उसके मोबाइल की लाइट जल उठी, स्क्रीन पर भाभीजी फ्लैश हो रहा था।
“सुनीता भाभी का फोन, इतनी रात को मेरे पास” रोमांच और जिज्ञासा से फोन को रीसिव किया।
सुनिता – हैलो... असलम भाई साहब?
असलम – हा बोलिए बोल रहा हो मै/ क्या बात है?
सुनीता – ऐसे ही... आपके साहब ने खाना खाया की नहीं... फोन भी नहीं उठा रहे है वो।
असलम – वो मीटिंग मे व्यस्त है क्लाइंट के साथ.... इसलिए नहीं उठा पाएंगे होंगे फोन। असलम ने सफाई दी।
सुनीता – जब वो फ्री हो तो बोल देना की फोन कर ले एक बार ठीक है।
असलम – ठीक है भाभी जी....
सुनीता – अच्छा भाई साहब सुनो.....
असलम – (उतावलेपन से) हा बोलो ना भाभी जी
सुनीता – वो शाम को आप क्या कहना चाह रहे थे... बोल रहे थे फुर्सत मे बताऊंगा... अब बताओ।
असलम – वो.... अरे वो तो बस मै ऐसे ही बोल दिया था... असलम ने हसते हुये कहा।
सुनीता – नहीं नहीं ... कोई तो बात आप बोलना चाह रहे थे, अब आप बता नहीं रहे है।
असलम- छोड़िए ना भाभीजी... अब उस बात को यही खतम कर दीजिये
सुनीता – (थोड़ी strict होती हुयी बोली) नहीं पहले बताओ क्या कहना चाह रहे थे?
असलम – मै तो बस ये बोल रहा था कि .....
सुनीता – कि .....
असलम – यही कि मै ये मान ही नहीं सकता कि आपकी पिक पर लोगो ने कमेंट नहीं किए होंगे।
सुनीता – क्यो नहीं मान सकते (सुनीता का लहजा नर्म हो चुका था)







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सुनीता के बहकते कदम-4

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सुनीता के बहकते कदम-4


सुबह सुनीता की आख खुली तो अपने आपको शीशे मे देखकर वो ताज्जुब करने लगी। उसके अस्त व्यस्त कपड़े, बिखरे बाल, बिस्तर की हालत और हाथो मे सुख चुका सफ़ेद पानी रात की कामुक कहानी को बयान कर रहा था। ऐसी हालत तो अनुराग ने सुहागरात पर भी नहीं की होगी जो की उस अंजान आदमी से बात करने के बाद उसका हुया था। और हो भी क्यो ना उस मर्द की कामुक बाते अब भी सुनीता के जेहन मे थी, उसका एक एक शब्द उसकी उत्तेजना को ऐसा भड़का रहा था जैसे आग को घी भड़काता है। कुछ भी हो उस आदमी ने जो बाते उसके जिस्म की खूबसूरती को बयां करने के लिए बोली थी वो सुनने मे भले ही उदण्ड थी पर उनका एहसास बड़ा ही कामुक था। सुनीता को अब ये नई काल्पनिक दुनिया रास आने लगी थी। इसमे न तो कोई रिस्क था, ना बदनाम होने का डर, और ना ही उसके जिस्म को कोई गैर मर्द छू रहा था। सुनीता का जिस्म एक नई उमंग को महसूस करने लगा था। जो जिस्मानी अधूरापन अनुराग पूरा नही कर पा रहा था वो अब सुनीता खुद ही पूरा करने लगी थी, वो भी बिना रिस्क के। इसलिए उसे अपने इस कृत्य पर कोई पछतावा नहीं था और ना ही उसे आत्मग्लानि महसूस होती थी। क्योकि वो सब कुछ करके भी कुछ नहीं कर रही थी।
उधर असलम भी रात मे सुनीता जिस्म का दीदार कर उसकी यादों मे अपना पानी निकाल कर सो चुका था, सुबह अनुराग के उठने से पहले ही असलम उठ गया और अपनी हालत को दुरुस्त कर लिया था। अनुराग लेट उठा और फ्रेश होकर अपना काम निपटाया और कार से वापस अपने शहर आ गया। अनुराग ने असलम को दुकान पर उतार दिया और कार की ड्राइविंग सीट पर खुद बैठते हुये असलम से बोला
अनुराग – असलम तुम ऐसा करो... तुम घर चले जाओ आराम कर लो... मैं भी घर जा रहा हू... और आ सुनो... वो कल मैंने दवाई के लिए बोला था न... तो अगर इंतजाम हो जाये तो मुझे बताना.... ये कहकर अनुराग गाड़ी अपने घर की तरफ बढ़ा दिया... उसे जाते हुए असलम एक रहस्म्यी मुस्कान के साथ देख रहा था।
अनुराग के जाने के बाद असलम ने भी अपना लोडिंग कार लिया और घर की तरफ चल पड़ा। उसके जेहन मे सुनीता के मदमस्त जिस्म कर गदराया जोबन, मखमली मांसल पेट, उसकी मोटी चिकने जांघे, चौड़े पुष्ट कूल्हे और सुनीता की टपकती चूत घूम रही थी। उसे इस बात का गुमान था की उसके लंड की दीवानी सुनीता जैसे पढ़ी लिखी और बड़े घरे की बहू है। और तो और सुनीता को असलम से चुदने की बाते करने मे कोई झिझक भी नहीं हो रही थी। इसका मतलब की वो मेरे से चुदने के लिए बिलकुल तैयार बैठी है। ये ख्याल आते ही उसके चेहरे की चमक दोगुनी हो गई। तभी उसके उम्र के अनुभव ने उसके जेहन पर दस्तक दी।
“अरे तूने कैसे सोच लिया की सुनीता तुझसे चुदने को तैयार बैठी है, आज तक कभी उसने तेरे को जरा सा भी भाव दिया है? आज तक उसने तेरे और खुद के बीच एक दूरी बना रखी है” ये बात दिमाग मे आते ही असलम के चेहरे पर गंभीरता छा गई। बात बिलकुल सही थी, क्योकि सुनीता असलम के बारे मे बाते जरूर कर रही थी, लेकिन उस समय वो कामज्वाला मे जल रही थी, और एक कामवासना मे डूबे हुये इंसान से आप कोई भी कामुक बाते कर सकते हो, ये बात असलम भी अच्छे से जानता था। लेकिन जिस्म का ज्वार शांत होने के बाद सुनीता का असलम के बारे मे सोचना इतना आसान नहीं है जितना देखने मे लगता है।  और वो ऑनलाइन किसी गैर मर्द से बात कर रही थी ना की असलम से। इसका मतलब साफ है की सुनीता कोई भी ऐसा कृत्य नहीं करना चाहती जिसे की उसकी पारिवारिक जीवन मे कोई भूचाल आए। इसलिए सुनीता को पाना इतना आसान नहीं था असलम के लिए, जितना वो समझ बैठा था। लेकिन हा एक बात तो तय थी की ये काम मुश्किल जरूर था लेकिन नामुमकिन नहीं। इसके लिए असलम को काफी धैर्य रखने की जरूरत थी, असलम भी किसी उतावलेपन मे आकर अपनी नौकरी और सामाजिक इज्जत को नहीं खोना चाहता था। अब असलम का दिल और दिमाग इस बात को समझ चुका था की “दिल्ली” अभी काफी दूर है। पिछली रात की कहानी का सुरूर उसपर अब भी छाया हुआ था, वो जल्द से जल्द घर पहुचना चाहता था। असलम अपने घर पर आ चुका था। उसका घर एक सामान्य सी बस्ती मे एक छोटा सा सामान्य घर था। वो गाड़ी खड़ी करके जैसे ही घर मे घुसा बाहर वाले कमरे मे उसका साला जिसकी उम्र लगभग 30 साल की होगी, जिसका नाम रफीक था वो कुर्सी पर बैठा था। सामने के तख्त पर उसकी बीवी परवीन जो की करीब 40 के उम्र की थी वो बैठी थी साथ मे उसके साली की बीवी सलमा जो 28 के करीब थी, वो भी बैठी थी। तीनों आपस मे बाते कर रहे थे।
असलम को देखकर उसके साले ने दुआ सलाम की, और एक दूसरे का हाल पूछने के बाद घर की बाते करने लगी। तभी परवीन ने रफीक से कहा “रफीक, तेरे जीजा तो कल से ही काम पर गए हुये थे, उनको थकान हो रही होगी, तू मेरे साथ बाजार चल, कुछ सामान ले आते है” रफीक ने हामी भरते हुए खड़ा हुया, परवीन ने सलमा से कहा की वो असलम के लिए चाय बना दे। ये कहकर वो अंदर कीचेन की तरफ चली गई, सलमा भी उसके पीछे किचन की तरफ चली गई। असलम ने अपनी जेब मे हाथ डाल कर 500 का एक नोट निकाला और उसे रफीक की तरफ बढ़ा दिया। दोनों एक दूसरे की आखो मे देखकर मुस्कुराए और रफीक बाहर निकाल गया। दरअसल रफीक को शराब की लत थी, असलम ये बाते जानता था इसलिए उसने रफीक को शराब लाने के लिए पैसे दिये थे। परवीन सामान के लिए थैला लेकर बाहर चली गई। असलम उनके जाने के बाद हाथ मूह धोकर कीचेन की तरफ बढ़ा।
अंदर सलमाँ चाय बना रही थी। उसने सलवार सूट पहना हुया था। उसकी कसी हुई ब्रा की किनारे असलम कपड़ो के ऊपर से ही देख सकता था। उसके कुर्ते के पीछे की तरफ चेन लगी हुयी थी। कमर का कटाव साफ़ झलक रहा था उसके कुर्ते से। हालाकी उसका कुर्ता नीचे से काफी घेरदार और ढीला था बावजूद इसके वो सलमाँ के कूल्हो की विकरालता को छुपाने के लिए नाकाफी था। असलम सलमा को कई बार चोद चुका था लेकिन वो सलमा को लगभग ढाई साल के बाद देख रहा था। सलमा दूसरी बार बच्चे पैदा कर चुकी थी। दूसरी बार बच्चा होने के बाद सलमा का जिस्म काफी भर गया था। ऐसा नहीं है की रफीक सलमा को चोदता नहीं था लेकिन शराब की लत से और शादी के कई साल गुजारजाने के बाद से वो सलमा को पहले जैसे लगातार नहीं चोदता था। पहला बच्चा होने के बाद रफीक का जिस्मानी झुकाव सलमा की तरफ कम होता चला गया। और इसी का फायदा उठाकर अनुभवी असलम ने सलमा को अपनी ल्ंड की चहेती बना लिया था। असलम आहिस्ता से सलमा के पीछे जाकर खड़ा हुआ और अपने गरम होठो को उसके खुले कंधे पर रख दिया। सलमाँ असलम के तपते होठो को एहसास को अच्छी तरह समझती थी। वो थोड़ी कसमसाई तो असलम ने अपने हाथो का घेरा बनाकर सलमा को अभी मजबूत बाहो मे भर लिया, असलम की सख्त हथेली सलमा के मोटे स्तनो को दबोच का भोपू की तरह दबाने लगी।
सलमा – इश्श्श्श्श्स... छोड़ो न जीजाजी... ये क्या कर रहे हो?
असलम पर सलमा की बातो को कोई असर नहीं हुया। वो अपने ल्ंड को सलमा की चौड़ी गांड पर घिसते हुए उसके उभारो को और ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा। असलम के मसलने से सलमा के चौड़े गले मे से उसके आधे से ज्यादा उभार दिखने लगे...
असलम – दूसरा बच्चा निकालने के बाद तो और मस्त हो गई है तू... तेरे को देख कर ही मर्दो का ल्ंड सलाम ठोकता होगा तेरे को... असलम के मूह से अपनी गंदी तारीफ सुनकर सलमा के चेहरे पर मुस्कान फ़ेल गई।
सलमा – आप भी ना... औरतों को जाल मे फसाना आप से सीखे॥ असलन ने उसके दुपट्टे को हटाकर एक तरफ रख दिया और उसके गरदन पर kiss करते हुये उसके कुर्ते की चैन के निब को अपने दाँतो से पकड़ कर धीरे धीरे नीचे की तरफ सरकाने लगा। सलमा के कुर्ते की निब उसके कूल्हो के ऊपरी हिस्से तक थी। असलम के सामने सलमाँ की उभरती गांड थी, असलम घुटनो के बल बैठ कर अपनी दोनों हथेलियो मे सलमा की गांड की दोनों फाको को सलवार के ऊपर से ही मसलते लगा। सलमाँ दर्द और आनंद मिश्रित सिसकारी लेने लगी। असलम सलवार के ऊपर से ही उसकी गांड की दोनों फाको को फैलाकर अपना चेहरा उसकी गांड की दरार मे डालकर अपने चेहरे को हिलाने लगा। असलम की साँसो की गर्माहट सलमा अपनी गांड की छेद पर महसूस करने लगी। असलम अपना मूह मे उसकी मांसल गांड को भर कर हल्के हल्के दाँतो से काटने लगा। और अपने एक हाथ को उसकी चौड़ी टाँगो के बीच मे डालकर उसकी फुली हुयी चूत को सलवार के ऊपर से ही अपनी मुट्ठी मे भर कर ज़ोर से मसलने लगा। सलमा ने दर्द से सिसकारी लेते हुये अपनी गांड को थोड़ा पीछे की तरफ खिसकाना चाहा तो असलम ने अपने दाँतो का दबाव उसकी मांसल गांड पर बढ़ा दिया। अब सलमा अगर आगे की तरफ कमर हिलाती तो असलम चूत को ज़ोर ज़ोर से मसलने लगता और अगर कमर पीछे की तरफ हिलाती तो गांड पर असलम की दाँत दबाव बना रहे थे। इस मीठे दर्द से सलमा की चुचिया तनने लगी थी और उसकी चूत मे सुगबुगाहट होने लगी थी। कुछ देर बाद असलम ने सलमा की चूत से हाथ हटाया और उसकी सलवार के नाड़े को खोलने का प्रयास करने लगा, सलमाँ ने उसका साथ निभाते हुए अपने हाथो से अपने नाड़े को खोल दिया। नाड़ा ढीला होते ही सलमाँ का सलवार जमीजोद हो गया और उसके बड़े कूल्हे छोटी सी पैंटी मे असलम के सामने आधे से ज्यादा खुल गए।
असलम जानता था की परवीन कुछ ही देर मे आ जाएगी। असलम खड़ा होकर उसकी panty को नीचे सरका दिया और सलमा के एक पैर को उठाकर सलवार और पैंटी के पर से निकाल दिया ताकि सलमाँ को टाँगे खोलने मे परेशानी न हो। असलम सलमा की गांड की दरार मे अपनी बीच वाली उंगली डालकर उसकी गहरी दरार का जायजा लेने लगा।
असलम – उफ़्फ़ साली अब तो तेरी गांड और भी मस्त हो गई है... लगता है खूब मर्द सवारी कर रहे है इस गाँड की...
सलमा- गांड तो सवारी करने के लिए ही होती है जीजाजी... शौहर नहीं करेगा तो कोई और करेगा... सलमा ने बेशर्मी से बोला
असलम – हा साली तेरे जैसे रंडी की चुदासी गांड बिना सवारी के कैसे रह सकती है॥
असलम ने अपने पाजामे का नाड़ा खोल कर अपने तन्नाए ल्ंड को बाहर निकाल लिया था। सामने के स्लैब पर रखी सरसों के तेल के बोतल को खोलकर उसने तेल के एक धार सलमा के गांड की दरार के बीच मे गिरा दिया और अपनी उंगली डालकर उसकी दरार मे अच्छे से तेल लगाने लगा। तेल लगने से सलमा की गांड चमकने लगी थी। असलम को पता था की कुछ देर मे ही उसकी बीवी और साला आ जाएगा। इसलिए वो समय बर्बाद न करते हुये अपने हाथो मे तेल लेकर अपने तन्नाए ल्ंड पर अच्छे से लगाया और अपना चिकना सुपाड़ा सलमा की गांड को दोनों हाथो से फैलाकर उसके गांड की छेद पर टिका दिया। सलमा आगे की सिचुएशन को समझते हुये अपने टाँगे चौड़े कर के कीचेन की पट्टी पर झुक चुकी थी। असलम ने अपना लंड का दबाव सलमाँ के गांड पर बनाना शुरू किया, चिकने टोपे पर सरसों के तेल की वजह से चिकनाहट काफी हो गई थी। सलमा की गांड असलम के लंड की अभ्यस्त थी, तेल के वजह से गांड लो भीतरी छल्लों मे भी काफी चिकनाहट थी। परिणाम स्वरूप असलम के मोटा लंड सलमाँ की गांड मे ऐसे धसने लगा जैसे की मक्खन मे गरम रॉड घुसती हो। जैसे जैसे असलम का ल्ंड सलमा की गांड के छल्ले को बड़ा कर के अंदर जा रहा था वैसे ही सलमा के मूह भी बड़ा हो रहा था। आधे से ज्यादा ल्ंड के अंदर घुस जाने के बाद असलम ने लंड को हल्के हल्के अंदर बाहर करना शुरू किया। इस धक्कम पेल से सलमा की सिसकारी तेज होने लगी। कुछ देर बाद उसकी गांड मे असलम का ल्ंड आराम से आने जाने लगा। असलम ने अपने हाथ उसकी खुली हुयी कमीज मे डाल कर उसके अधनंगे चुचे को अपने हाथो मे पकड़ कर एक ज़ोर का झटका दिया। इस अप्रतायशित झटके से सलमा के मूह से चीख निकल पड़ी “अमीईईईईई” अब असलम का ल्ंड जड़ तक सलमा की गांड मे पेबस्त हो चुका था। अब असलम ने सलमाँ के चुचो को अपने हथेली मे थाम कर एक रिदम के साथ धक्के लगाना शुरू कर दिया। कुछ धक्को के बाद ही सलमा की सिसकारी फिर कीचेन मे गूंजने लगी। असलम के धक्को के स्पीड पहले से डबल हो चुकी थी। असलम अपना ल्ंड पूरा बाहर खिचकर फिर तेजी से अंदर सलमा की गांड मे पेल देता, किच्चन मे हर धक्के के साथ फट फट फट की आवाज सुनाई दे रही थी। सलमा खुद अपनी गांड को पीछे की तरफ धकेल रही थी ताकि असलम का अपने अंदर ज्यादा से ज्यादा महसूस कर सके।
असलम तेजी से सलमा की गांड मारते हुये बोला “कैसा लग रहा है मेरा लवड़ा अपनी गांड मे लेकर.... बहन की लवड़ी”
“आहहआहह.... बहुत अच्छा जीजाजी... और ज़ोर से मारो मेरी इस निगोड़ी गांड को...” पूरा किचेन चुदाईमयी सिसकारियों से गूंज उठा था।


अनुराग अपने बिजनेस मे काफी उलझा हुआ था, वैसे तो उसे सुनीता से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं थी लेकिन पिछली रातो ने उसके जेहन मे घर कर लिया था वो सोचने लगा था की खान पान, बढ़ती उम्र और काम के स्ट्रेस की वजह से उसके “मर्दाना” ताकत पर फर्क तो पड़ा है, क्योकि आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ की सुनीता के डिस्चार्ज होने से पहले वो कभी स्खलित हुया (हालाकि ये महज उसका भ्रम था)। वो ये अच्छे से जानता था कि स्ट्रैस और खानपान पर असर सेक्स कि जिंदगी पर काफी पड़ता है, और कोशिश करने पर अपनी “ताकत” को काफी बढ़ा सकता है। इंसान कि फितरत ही ऐसे ही होती है वो अपनी कमी को किसी के सामने जल्दी से उजागर नहीं करता, फिर ये बात तो ऐसी है कि इसपर वो किसी खास से भी डिस्कशन नहीं कर सकता था। वो इस विषय मे किसी से खुल के बात करना चाहता था लेकिन इसके लिए कोई सही आदमी उसकी नज़र मे नहीं आ रहा था। अनुराग अपने ऑफिस मे बैठा इसी कशोकश मे डूबा हुया था कि उसके मोबाइल पर एक अननोन नंबर से कॉल आया कुछ सोचकर उसने कॉल रिसीव किया –
अनुराग – हैलो... कौन
फोन पर – हैलो, कौन.... अनुराग बोल रहा है क्या?
अनुराग – जी.... अनुराग बोल रहा हू, लेकिन आप कौन बोल रहे है? अनुराग कि आवाज मे जिज्ञासा था कि इस तरह से बोलने वाला कौन है।
फोन पर – अरे किया जी जी लगा रखा है मैं बोल रहा हु तेरा लंगोटिया यार... राघव... पहचाना?
अनुराग – (दिमाग पर ज़ोर डालते हुए) राघव.... कौन राघव.... माफ करना भाई.... मैंने नहीं पहचाना।
फोन पर – सही है बेटा..... अब तू क्यो पहचाहने लगा अपने बचपन के दोस्तो को... साले गाव के नहर मे बिना चड्ढी के साथ साथ नहाया है और... बोल रहा है कि पहचाना ही नहीं... सही कहते है लोग कि शहर का पानी ही अलग होगा है.... लोग यंहा आकर अपनों को भूल जाते है... मैं तो फिर भी तेरा दोस्त ही हू साले......... (उसकी आदमी कि आवाज मे एक अपनेपन वाला गुस्सा उबलने लगा था)
अनुराग – अरेरेरे..... तू रघु बोल रहा है ना.... साले तू है ना... रघु है ना (अनुराग के आवाज मे एक बच्चे कि तरह तरह उतावलपन था)
फोन पर – हा साले... रघु हु बोल रहा हू.... अब पहचाना?
अनुराग – (हसते हुये) हा यार..... तो भी क्या राघव राघव बोल रहा है? साले तू रघु है और रघु ही रहेगा मेरे लिए समझा। राघव होगा तू अपने दफ्तर मे। अच्छे ये बता तेरे को मेरे नंबर कहा से मिले?
रघु – अरे यार ऑफिस के काम से आया था यहा पर... तू तो अब गाव आता नहीं.... मैंने तो अक्सर गाव जाता रहता हू... मैंने तेरे चाचाजी से तेरा नंबर लिया, सोचा कि जब तेरे शहर मे आया हु तो तुझसे मिलता भी चलू!
अनुराग – बिलकुल ठीक किया तूने... इस भाग दौड़ कि ज़िंदगी मे कब इतने साल बीते पता ही नहीं चला... लेकिन तेरी आवाज सुनकर आज फिर से मुझे वो 30 साल पहले वाला बचपन याद आ गया, क्या दिन थे यार वो, ना कुछ पाने कि चाहत, और ना कुछ खोने का गम (अनुराग कि आवाज गंभीर हो उठी थी)
रघु – हा यार सच कहा तूने कभी कभी लगता है कि सब कुछ होते हुये भी मेरे पास कुछ नहीं नहीं है... दोस्त के टिफिन से चुरा कि खाई हुयी रोटी मे जो स्वाद था ना वो इस फाइव स्टार होटल के खाने मे कहा है यार (रघु भी बचपन के अनमोल लम्हो को याद कर के संजीदा हो उठा)
अनुराग – अच्छे अब ये सब छोड़... अब तू ऐसा कर जल्दी से घर आ जा घर पर आज साथ साथ खाना खाएँगे।
रघु – हा खाना तो साथ साथ ही खाएँगे ... लेकिन घर पर नहीं... कही बाहर।
अनुराग – बाहर क्यो?
रघु – यार कल सुबह कि मेरी वापसी कि फ्लाइट है, मुझे कल निकालना है। घर पर कुछ बंदिशे होंगी, वहाँ भाभी, बच्चे होंगे... इतने दिनो बाद मिल रहे है दो बचपन के दोस्त, एक दो पेग मारेंगे और साथ साथ और बचपन कि यादों मे डूबकिया लगाएंगे, मैं तेरे को होटल का एड्रैस msg करता हु, तू फ्री होकर आजा यहाँ, समझा!
अनुराग – हा बात तो सही कह रहा है, तो ठीक है मैं आज शाम को तेरे पास आ जाता हु, बाकी कि बाते वही करेंगे फिर।
रघु – हा ठीक है, मैं तेरा wait कर रहा हू होटल मे। ये कहकर रघु ने फोन काट दिया।
रघु अनुराग के बचपन का दोस्त था, दोनों ने साथ मिलकर बचपन मे खूब शैतानी कि थी, कभी किसी बगीचे मे जाकर आम, अमरूध चुरा कर खाना, घरवालो के लाख मना करने पर भी गाव कि नहर मे जाकर नहाना और भी न जाने क्या क्या। रघु से बात करके अनुराग फिर से अपने आपको 10 साल के बच्चे कि तरह उमंगीत महसूस करने लगा था। फिर वो अपने जरूरी कामो को जल्दी से जल्दी निपटाकर होटल जाना चाहता था। उसने सुनीता को भी कॉल करके बोल दिया था कि उसे किसी जरूरी काम से बाहर जाना था। हर बार कि तरह असलम भी साथ जाएगा उसके। उसने सुनीता से कहा कि वो असलम को घर भेजेगा तो उसके एक जोड़ी कपड़े पैक कर के वो असलम को दे दे। अनुराग ये सब इसलिए कर रहा था कि सुनीता को सबकुछ नार्मल लगे।
बच्चे रोज कि तरह अपने स्कूल मे थे, असलम भी अनुराग के कपड़े शाम को लेने आने वाला था, सुनीता के पास अभी काफी टाइम था, वो शॉपिंग पर जाने के इरादे से तैयार होने लगी। उसने एक ट्रान्सप्रेनसी साड़ी पहनी, वैसे तो वो अक्सर ही अपनी साड़ी को नावेल के नीचे ही रखती थी, उसने अपने आपको एक बार आईने मे देखा और साड़ी को थोड़ा और नीचे खिसका दी, उसकी साड़ी उसकी नावेल से लगभग 4-5 इंच नीचे थी, जिससे उसके गोरा पेट का अधिकतर हिस्सा उजागर हो रहा था, उसके पेट और जांगों के अंदरूनी हिस्सो का कटाव भी साफ नज़र आने लगा था, उसका मांसल पेट किसी भी मर्द को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए मजबूर करने मे काफी था। अपने इस आकर्षक और खूबसूरत जिस्म को देखकर सुनीता के होठो पर एक शरारती मुस्कान तैरने लगी। उसने साड़ी के मैचिंग का डोरी वाला ब्लाउज़ पहना था, आज ये ब्लाउज़ सुनीता को थोड़ा टाइट लग रहा था, उसके दोनों स्तन इसमे दबकर थोड़े उभर कर ब्लाउज़ के गले से अपनी उपस्थिती दर्ज करा रहे थे। उसके दोनों उभारो के बीच कि ऐसी लग रही थी जैसे को दो बड़े पहाड़ो कि बीच मे कोई गहरी घाटी हो। और इस घाटी के बीच मे मर्दो कि नजरों का उलझना आम बात थी। सुनीता के गले मे सोने कि चैन मे लटका मंगलसूत्र उसके दोनों जोबन के बीच कि घाटियो मे फसा कसमसा रहा था ठीक वैसे ही जैसे कुछ दिन पहले अनुराग सुनीता के जोबन के बीच मे कसमसाने लगा था। सुनीता ने पल्लू को अपने सीने पर रख लिया। उसकी ट्रान्स्स्प्रेनसी साड़ी मे से उसके ब्लाउज़ के ऊपरी हिस्से से दिखता उसके cleavage और भी मादक लगने लगे। उसके ट्रांसप्रनसी साड़ी उसके जिस्म कि खूबसूरती ऐसे झलक रही थी जैसे कि पूनम के चाँद के आगे किसी ने एक झीनी सी चादर डाल दी हो।
कुछ देर बाद सुनीता एक शॉप पर कुछ कपड़े लेने के लिए थी। मैं काउंटर पर एक 40-42 साल का आदमी जो कि हाव भाव से उस दुकान का मालिक लग रहा था। उसकी नज़र सुनीता कि कामुक बदन पर उलझ सी गई। सुनीता के जिस्म कि उतार चढ़ाव, हर कदम पर उसके भारी कमर के बलखाव, उसके उभारो के उठानों को नापता हुया वो आदमी अपने चेहरे पर मुस्कान लाते हुये बोला। “आईये मैडम, क्या सेवा करू आपकी?” उसकी बात करने का लहजा बिलकुल प्रॉफेश्नल था।
“मुझे कुछ ब्लाउज़ और अंडरगोरमेंट चाहिए” सुनीता ने कहा।
उस आदमी कि नजरे सुनीता को के वक्ष का जायजा लेने लगी, सुनीता कि ट्रांसप्रेसनी आँचल से झाकता उसके दूधिया स्तनो के बीच उसकी नजरे उलझ गई, सुनिता के स्तनो को अपनी आखो मे उतारते हुये वो उनकी विशालता को ऐसे देखने लगा जैसा कोई जोहरी किसी हीरे कि कौसटी जाचते समय देखता हो। सुनीता को अपने जोबन पर उसके नजरों के मीठे तीर चुभने लगे थे। इससे पहले कि सुनीता कुछ बोलती वो दुकानदार बोला “38 सी कप की size ठीक रहेगी शायद आपके लिए” उसका लहजा इतना प्रोफेशनल था की सुनीता का सिर अपने आप हा मे हिल गया। उसने एक लड़के को आवाज लगते हुये कहा, “मैडम को कपड़े दिखा राहुल!” और उसने सुनीता की इशारे से दुकाने मे दूसरे काउंटर पर जाने का इशारा किया। सुनीता दूसरे काउंटर की तरफ बढ़ गई। उसकी पीठ दुकानदार के नजरों के सामने थी, सुनीता का डोरी वाला ब्लाउज़ पीछे से बैकलेस था जिसमे से उसकी गोरी चमकदार पीठ की चमक से उसकी आखे चौधियाने लगी। सुनीता की चिकनी मांसल पीठ पर उसकी नजरे ज्यादा देर ठहर न सकी और फिसल कर उसकी गोरी और गदराई कमर पर आ गई। कुछ देर उसकी नजरे कमर की खम के साथ हिचकोले खाती रही पर उसकी चिकनी कमर पर उसकी नजरे की और ज्यादा ठहरने की हैसियत नहीं थी। उसकी गिरती नजरे सुनीता की कूल्हो को उठानों पर आकर फिर से अटक गई, लेकिन इस बार सुनीता के कूल्हो की विकरालता उसकी आखो मे समा न सकी उसे सुनीता के कूल्हो को अपनी आखो मे उतारने के लिए उसे अपनी पुतलियों को काफी फैलाना पड़ा। “उफ़्फ़ क्या पिछवाड़ा है” दुकानदार की होठो अपने आप बुदबुदा उठे। सुनीता के पुष्ट कूल्हे हर कदम के साथ थिरक रहे थे, एक तो सुनीता के कूल्हे पहले सी ही काफी कटाव वाले थे उसपर उसकी उची हील की सैंडल ने उसके पिछवाड़े के उठान को इतना कातिल बना दिया था की हर कदम से उसके कूल्हो के झटके का असर उस दुकानदार को अपने जिस्म पर महसूस हो रहा था। इधर सुनीता भी काउंटर से हटने के बाद जब मुड़ कर दूसरे काउंटर के तरफ बढ़ी तो अपने जोबन पर दुकानदार के नजरों को महसूस कर रही थी। “उफ़्फ़ कैसे मेरे स्तनो को घूर रहा था, ऐसा लग रहा था की जैसे खा जाएगा इन्हे। लेकिन एक बात तो है काफी एक्सपिरियन्स है कमीने को, केवल नजरों से देख कर ही सही नाप बता दिया उसने... पता नहीं क्यो ऐसा लग रहा है जैसे वो अब भी मुझे घूर रहा है, क्या देख रहा है वो अभी ... शायद मेरी अधनंगी पीठ... या फिर मेरी कमर या फिर कभी मेरे कूल्हे….. हे भगवान... पक्का वो वही देख रहा होगा” ये सोचते ही सुनीता अपनी कूल्हो की दरार मे उसकी पैनी नजर महसूस करने लगी... सुनीता ने अपने इस संशय को दूर करने के लिए पलट के देखा और दुकानदार की नजरों के अपनी कूल्हो को निहारता हुआ पाया। “उफ़्फ़ मेरा शक सही था... कमीना मेरे कूल्हो को घूर रहा है”। सुनीता के अचानक इस तरह पलटने से दुकानदार अपनी चोरी पकड़े जाने से थोड़ा हदबड़ा गया। सुनीता उसकी हड़बड़ाहट देखकर मुस्कुरा उठी और काउंटर पर खड़े सेल्समेन से बाते करने लगी।
20-25 मिनट मे सुनीता ने अपने पसंद के चीजे लेकर वापस कैश काउंटर पर दुकानदार के पास आ गई। इस दौरान और भी कस्टमर दुकान मे आ जा चुके थे इसलिए वो दुकानदार भी अब सहज हो चुका था। सुनीता के हाथो से पाकेट लेकर वो बिल बनाते हुये बोला।
“मैडम... कभी भी किसी चीज की जरूरत हो तो हमारी दुकान पर आइएगा... यंहा पर आपको आपकी जरूरत की सभी ब्रांडेड चीजे किफ़ायती rate मे मिलेगी” वो सुनीता की तरफ देखकर मुसकुराते हुये बोला। सुनीता ने भी संजीदा तरीके से मुसकुराते हुये कहा “बिलकुल भाई साहब.....अब से मैं इसी शॉप पर ख़रीदारी करने आऊँगी”
फिर सुनीता ने पेमेंट किया और जाने लगी तभी वो बोला “एक मिनट मैडम, रुकिए” उसकी आवाज सुनकर सुनीता जिज्ञासा भरी नजरों से उसे देखते हुये रुक गई।
“वो क्या है न मैडम... हम अपने खास कस्टमर्स को एक सर्प्राइज़ गिफ्ट देते है” ये कह कर उसने 4-5 पैकेट काउंटर पर रख कर बोला “आप कोई भी एक पैकेट ले उठा लीजिये... अब आपकी किस्मत है की इसमे क्या निकलता है?” सुनीता ने भी हसते हुये एक पैकेट उठा लिया।
“उम्मीद करता हूँ मैडम..... इसमे ऐसा कुछ होगा... जिसे use करके आपको मेरी और दुकान की याद जरूर करेंगी”। सुनीता मुसकुराते हुये दुकाने से बाहर निकल पड़ी। उसे जाते हुये उसके मटकते कूल्हो को देखकर ठंडी आहे भरता हुआ दुकानदार तब तक उसे निहारता रहा जब तक वो उसकी आखो से ओझल न हो गई।
सुनीता पूरे रास्ते उसकी नजरों को अपनी शरीर पर महसूस कर रही थी। सुनीता दुकान मे हुये वाकये को याद करके काफी रोमांचित महसूस कर रही थी। जिस जिस्म को वो मोटापा साझाने लगी थी वो जिस्म इतना आकर्षित है की मर्दो की आखे उसके जिस्म पर अटक कर रह जाती है। उसे अपने जिस्म की खूबसूरती पर फ़क्र महसूस होने लगा था। पूरे रास्ते वो उस अंजान दुकानदार की नजरों को अपने जिस्म पर महसूस करती रही। घर पहुच कर उसने कपड़े के पैकेट को अपने बेड पर फेका और बिस्तर पर निढाल होकर पड गई। उसकी नजरे छत को घूरते हुये फिर से दुकान के वाकया क्रमबद्ध सोचने लगी। कैसे वो दुकानदार उसके जिस्म को घूर रहा था... लेकिन कुछ भी हो उसने देख कर ही मेरे स्तनो का सही साइज बता दिया। आज तक अनुराग को उसके जिस्म का सही साइज़ नहीं पता है लेकिन आज एक गैर मर्द ने अपनी नजरों से देख कर उसके स्तनो का एकदम सही साइज़ बता दिया। ये बात सोच कर उसके स्तनो मे रक्त इकठ्ठा होने लगा और वो कठोर होने लगे। उसे अपना ब्लाउज़ टाइट लगने लगा, उसकी साँसे भारी होने लगी। वो उठकर बैठगई और अपने हाथो को अपने गर्दन के पीछे और नीचे वाले दोनों ब्लाउज़ की डोरी को खोल दिया। डोरी खुलते ही ब्लाउज़ ढीला होकर स्तनो का साथ छोड़ दिया। सुनीता ने अपने ढीले ब्लाउज़ मे अपने दोनों हाथ डाल कर अपने स्तनो को मसलने लगी। उसके मोटे निपप्ल खड़े होकर अपने वजूद को दर्शाने लगे। वो अपने निप्पल को अपनी उँगलियो से दबा दबा कर मसलने लगी।
“उफ़्फ़ कमीने ने ब्लाउज़ के ऊपर से ही इसे देख लिया, ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आखे नहीं x-ray मशीन थी, उसके नजरे कपड़ो के अंदर घुस कर मेरे स्तनो को नाप ले रहे थे, मेरे स्तन तो उसके सामने ब्लाउज़ मे थे तो वो इन्हे इतना घूर रहा था। अगर बिना ब्लाउज़ के होते तो कितना घूरता वो इन्हे! केवल घूरता???? साले को देख कर लगता नहीं की वो सिर्फ घूरता.... वो तो अपने हथेलियो मे मेरे स्तनो को लेकर मसल देता” ऐसा सोचते ही सुनीता के हाथ अपने आपने अपने जोबन पर कसने लगे, ठीक वैसे ही जैसे की उस दुकानदार के हाथ उसके जोबन को मसलते। आवेश मे आकार सुनीता ने अपने स्तनो को इतनी तेज मसला की उसके मूह से सिसकारी निकाल गई “आहह... क्या कर रहे हो ये”, “कुछ नही मैडम, मैं तो बस ब्रा और ब्लाउज़ के लिए नाप ले रहा हु” सुनीता की भावनाए काल्पनिक दुनिया मे बहने लगी। वो उस दुकानदार को अपने साथ इमेजीन करने लगी। “ठीक है, ध्यान रहे, फिटिंग अच्छी होनी चाहिए” सुनीता कसमसाती हुयी बुदबुदा उठी। “अच्छी फिटिंग के लिए नाप अच्छे से लेना पड़ेगा” सुनीता को उस दुकानदार की काल्पनिक आवाज़े अपने कानो मे सुनाई देने लगी थी। “तो ले लो ना अच्छे से नाप, कौन मना का रहा है” उस दुकादार के हाथो को अपने जोबन पर काल्पनिक अनुभव कर सुनीता के जिस्म के कामज्वाला भड़कने लगी। उसने अपनी बाहो मे उलझे ब्लाउज़ को अपने तन से दूर कर दिया और आखे बंद किए हुये वो बेड पर लेटकर अपनी स्तनो को ज़ोर ज़ोर से मसलने लगी। “उफ़्फ़ कैसे देख रहा था वो मेरे स्तनो को, और जब मैं पीछे मुड़कर देखा तो उसकी नजरे मेरे कूल्हो पर थी, कैसे आखे फाड़ फाड़ कर वो मेरे कूल्हो को देख रहा था, मेरे कूल्हो को भी अपने x-ray वाली आखो से नंगा कर के देखा होगा उसने... इसको भी नाप लिया होगा उसने पक्का... सब कुछ नाप लिया होगा उसने... चौड़ाई... उचाई और दरार मे घुस कर गहराई भी... उफ़्फ़” अचानक सुनीता की अपने पुष्ट कूल्हो के दरार मे दुकानदार की नजरे चुभती हुयी महसूस होने लगी। “मेरी कूल्हो की गहराई नापने के लिए उसे पहले इसे फैलाना पड़ेगा”.... कामाग्नि मे जलती सुनीता फिर बुदबुदाने लगी। उसे अपने पेटीकोट के अंदर गीलापन महसूस होने लगा उसे अंदाजा लगते देर न लगी की उसकी नीचे वाली गली मे बागवात के सुर उठने लगे है। उसने अपने साड़ी को पेटीकोट समेत ऊपर कमर तक समेट दिया और अपने हाथ को अपनी पैंटी पर रख कर सुरत-ए-चूत का जायजा लेने लगी। उसकी पैंटी पूरी गीले हो चुकी थी। उसने अपनी पैंटी की कमर के पास वाले इलास्टिक से पकड़ नीचे की तरफ सरका दिया कुछ ही देर बाद उसकी पैंटी उसकी रसीली चूत से दूर हो चुकी थी। उसने अपनी उंगली को अपनी चूत की दरार पर फेरना शुरू किया उसकी चूत की फाके योनिरस से पूरी चिपचिपी हो चुकी थी। वो अपने उंगली को तेजी से अपनी चूत के अंदर बाहर करने लगी। तभी उसकी नजरे सामने रखे पैकेट पर गई। सहसा उसे कुछ याद आया और वो पैकेट को खिचकर कर उसमे कुछ ढूढ़ने लगी। कुछ देर बाद उसके हाथ मे दुकानदार का दिया हुआ surprise गिफ्ट था, वो उसे उतावली होकर खोलने लगी। पैकेट के अंदर के ब्रांडेड महंगी पैंटी थी, पैंटी क्या थी पैंटी के नाम पर पतली पतली डोरिया थी। जिसपर पर L size का स्टिकर लगा हुया था (जिन औरतों की कमर 29-30 इंच और हिप 39-40 इंच के करीब होती है उसके लिए L size होती है) उसे देखकर सुनीता के होठो पर एक कामुक मुस्कान फ़ेल गई “सचमुच कमीने ने सब कुछ नाप लिया” और सुनीता ने अपने कमर से साड़ी और को हटा दिया अब वो बिना पैंटी के सिर्फ पेटीकोट मे थी। उसने अपने दोनों पैरो मे पैंटी को फंसाया और उसे कमर पर चढ़ाने लगी। पैंटी की डोरी नुमा तो थी ही और उसकी डोरी भी इतनी पतली थी की सुनीता के कूल्हो के गहरे दरार मे गायब होने लगी थी, आगे भी उसकी फैली हुयी चूत के मोटे होठो को बीच फसी हुयी थी। सुनीता ने अपने आपको शीशे मे निहारती हुयी  पेटीकोट के नाड़े को ढीला कर दिया। नाड़ा खुलते ही जमीन पर धराशायी हो गया। अब सुनीता केवल उस सेक्सी पैंटी मे शीशे के सामने खड़ी थी। वो अपने आपको निहारती हुयी एक बार फिर दुकानदार के बातो को याद करने लगी “जब भी आप इसे उसे करो मुझे जरूर याद करोगे” सच कहा था उसने सुनीता को अपने कूल्हो के दरार फसी पैंटी की छुवन उस दुकानदार के उंगलीयो की लगने लगी थी, उसे ऐसा अनुभव होने लगा जैसे की वो दुकानदार अपनी मोती उंगलिया उसके गहरी दरार मे डाल कर ऊपर नीचे घिस रहा रहा है। ऐसा लगने लगा उसे जैसे की उसकी कूल्हो की दरार मे वो दुकानदार अपनी पूरी उंगली डाल कर उसके गुड़ाद्वार को अपनी उँगलियो से छेड्ने लगा। सुनीता आखे बंद करके अपने पैंटी की खिचने लगी जिस से उसके कूल्हो के फाको मे पैंटी और अंदर तक घुस गई और आगे से उसकी चूत की clitoris पर भी पैंटी रगड़ खाने लगी। सुनीता फिर panty की रगड़ को दुकानदार की उगलिया imagine करके काल्पनिक सागर मे गोते लगाने लगी। वो अपने इस रंगीन दुनिया से तंद्रा तब टूटी जब उसकी कानो मे गाड़ी के तेज हॉर्न सुनाई देने लगा। उसने नजरे दीवार पर लगी घड़ी पर दौड़ाई। 5 बज चुके थे।








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Monday, June 1, 2020

FUN-MAZA-MASTI ओह माय फ़किंग गॉड--12

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ओह माय फ़किंग गॉड--12




अचानक उसका शरीर ऐंठ गया और बुरी तरह कांपने लगा, फिर शांत हो गया. मेरे लंड पर रस की बारिश कर वह तो झड़ गयी लेकिन मेरा अभी तक खड़ा था. कुछ और धक्को के बाद मैं उसकी चूत में झड़ गया और उसके उपर निढाल हो गया. कुसुम का बदन बिल्कुल शांत था जैसे की उसमे जान ही नहीं हो. मैं उसको तंग करना ठीक नहीं समझा और उसकी ओर करवट ले सो गया. थकान और मस्त चुदाई के कारण जल्द ही गहरी नींद में चला गया.



पक्षियों की चहचहाहट ने मेरी नींद तोड़ दी. बिस्तर पर मैं अकेला था, पता नहीं कुसुम कब उठी और चली गयी. घड़ी की सुइयां सुबह के छह बजा रही थी. बारिश थम गयी थी लेकिन आसमान में अभी भी घना बदल था. कल रात हमने दरवाजा बंद नहीं किया था. अचानक बाथरूम से पानी गिरने की आवाज आई. कुछ देर बाद कुसुम बाथरूम से निकली. उसकी बदन पर कोई कपड़ा नहीं था. मुझे अपनी और घूरते देख सकपका गयी. मारे शर्म के अपनी मम्मों और चुत को दोनों हाथों से छिपाने की कोशिश की.

 मैं उसको देख मुस्कुराते हुए बोला, “रात को नींद अच्छी हुई?”

 कुसुम बाहर की और देखते हुए बोली, “साहब, दरवाजा बंद कर दो ना. सुबह हो गयी है”

 मैं भी नंगा ही था. उठकर दरवाजा बंद किया, तब तक कुसुम पेटीकोट पहन ली. मैं उसके सामने खड़ा हो गया और उसकी कमर को पकड़ अपने करीब खींच लिया. कसमसाते हुए खुद को मुझसे अलग करना चाहती तो थी लेकिन मेरी पकड़ के आगे हारकर बोली, “साहब, ऐसा मत करो ना, जाने दो मुझे. सुबह हो गयी है. मेरी बहन परेशां होगी घर पर” 

उसकी गर्दन को चुमते हुए मैं बोला, “तुम्हारी बहन ठीक होगी. तुम चिंता मत करो. कल रात को ठीक से तुम्हे देखा नहीं था. आज तो देखने दो.” 

मेरी बात सुन कुसुम शर्म से लाल हो गयी. रात की बात अलग है, लेकिन दिन के उजाले में अपनी जिस्म की नुमाइश करने मैं हर औरत थोड़ी-बहुत तो जरूर शर्माएगी. मैं पीछे हट कर उसको घूरने लगा. बेचारी कुसुम शर्म से जमीन में गड़े जा रही थी. सर की झुकाकर बेचारी नाख़ून से फर्श को खरोंचने लगी. 


मैं धीरे धीरे उसके पास गया और दोनों कन्धो से पकड़ अपने करीब खींच लिया. कुसुम की निगाहें अभी भी जमीन पर गड़ी थी. मरे शर्म के मुझसे नज़र नहीं मिला पा रही थी. एक बार मेरी और देखने के बाद फिर से नज़र झुकाकर उसने पेटीकोट को ऊपर खिसकाकर छाती के ऊपर बांध ली. मैंने कुसुम को बाँहों में जकड़कर उसकी गर्दन और कान को चूमने लगा. धीरे-धीरे कुसुम भी गर्माने लगी. 

मुझे जकड कर मेरी छाती में मुंह गड़ा “ऊन्ह्ह्ह.....हम्म्म्म....उन्ह्ह्हूँ” की आवाज निकलने लगी.

 मेरा लिंग जो वैसे ही सुबह-सवेरे खून से भरा था और चूत के अन्दर जाने को बेताब था. और ज्यादा देर करना बिल्कुल गलत था इसलिए मैं कुसुम को पलट कर दीवाल के सहारे खड़ा कर दिया और पेटीकोट ऊपर उठा उसकी चूत के मुंह पर लिंग को रख कर एक हल्का धक्का मारा. कुसुम के मुंह से “इस्सस्स्स” की एक तेज़ आवाज के साथ पूरा जिस्म थरथरा गया.


 मैं कुछ सेकंड के लिए रुक गया और उसकी चुचियों का मर्दन के साथ-साथ उसकी गर्दन और पीठ को चूमने लगा. 

अबकी बार कुसुम के मुंह से सिसिकारी के आलावा भी कुछ निकला. मेरी और घूमकर बोली, “साहब, आप एकदम फ़िल्मी हीरो जैसे प्यार करते है”

 मेरी हंसी निकल गयी. दोनों के होंठ मिल गये और हम जीभ से एक दुसरे के हलक की गहराई मापने लगे. दोनों के लार आपस में घुलकर बड़ा मजेदार स्वाद दे रहा था. 

कुसुम पेटीकोट को छोड़ दोनों हाथों से दीवार पकड़ ली. उसकी चूचियां सुबह की ठण्ड की वजह से सख्त हो गयी थी. मैंने चुमना जारी रखते हुए एक बांह से कसकर उसकी कमर को लपेट लिया और दूसरी हाथ से उसकी चुचियों को मसलने लगा. 

चुचियों के निप्पल को दो उँगलियों के बीच फँसाकर मरोड़ा था कि कुसुम की साँस अटक गयी. होंठों को मुझसे अलग कर जोर जोर से हिचकी लेने लगी. मैं चोदना छोड़ कुसुम की पीठ को सहलाने लगा लेकिन उसकी हिचकी है कि थम ही नहीं रही. हारकर मैं उसको पकड़ कर बिस्तर पर बैठाया और पानी पीने को दिया. पानी पीने के बाद वह सहज हुई और शर्माती हुई मुझे देखने लगी मानो खुद से कोई शर्मिंदगी का काम हो गया हो.



मैं जैसे उसके करीब गया, उसकी आँखें बंद और होंठ खुल गये जैसे मुझे आमंत्रण दे रही हो कि आओ और मेरे होंठो का रस चखो. कुसुम को कन्धों से पकड़ कर उसकी खुली होंठो को अपनी होंठो से लगा उसकी रसदार जीभ को चूसने लगा. बिना होंठो को अलग किये धीरे से उसको बिस्तर पे लिटा कर मैं उसके ऊपर आ गया. कुछ सेकंड की चुम्मी के बाद मैंने पाया कि कुसुम मेरे लंड को सहला रही है, जो उसकी मुलायम हाथ के प्यार पा और ज्यादा अकड़ गया था.



मैं कुसुम के हाथ से लंड ले उसकी चूत के मुहाने पर लगाकर आगे-पीछे रगड़ने लगा. वह बेकरारी के मारे कमर को आगे पीछे करने लगी. 

समझदार को इशारा काफी है. मैंने अपने शरीर का पूरा वजन अपने लंड पर दाल दिया और मेरा लंड सरसराते हुए उसकी चूत के अन्दर तक चला गया. इसके साथ-साथ मेरे टट्टे उसकी गांड से चिपक गये. उसकी कमर को पकड़ कर मैं जोर-जोर से झटके देने लगा जिसने उसकी जिस्म को झकझोर कर रख दिया.


 हमारे चुम्मी की लय टूट गयी और कुसुम अब जोर जोर से सीत्कार करने लगी. उसकी बदन के रोंये कांटे के जैसे खड़े थे और कांप रहे थे. मैं समझ गया कि यह अब जल्द ही झड़ने वाली है. मैंने उसकी दोनों टांगो को अपने कंधे के सहारे सीधा कर कमर पकड़ जोरदार धक्का मरना चालू किया. 

मेरे धक्को के जोर से बिस्तर बुरी तरह से हिल रही थी. कुसुम अपने सर को जोर से पटक रही थी और उसकी सीत्कार अब चीत्कार में बदल गयी थी, “हैईईईईई.... माई रीईईईईई.... फट गयी रे ऐ... हाय रेरेरे.....”


 मेरे सर पे हवास का हैवान सवार था जो इन चीखों को अनसुना कर सिर्फ लंड पेलने में लगा था. अचानक कुसुम का बदन ऐंठ गया. वह एकदम से ऊपर उठ फिर धड़ाम से गिर पड़ी. साथ-साथ उसकी चीख भी बंद. बस जोर-जोर से साँस ले रही थी. मेरे लंड में भी लावा भर चूका था जो एक विस्फ़ोट के साथ कुसुम की रसदार चूत में उगल पड़ा. लगभग आधा मिनट तक मैं झड़ा और फिर उसकी बगल में गिर पड़ा.
कुछ मिनट के बाद कुसुम उठी, अपने कपड़े समेट बाथरूम में चली गयी. मेरा पेट हल्का लग रहा था, पैरों में जैसे जान ही नहीं थी. कुछ देर बाद कुसुम कपड़े पहन बाहर आई, मेरी और एकबार देखने के बाद दरवाजा खोल चली गयी. मैं अपने बिस्तर पे नंगा लेटा रहा. लेटे-लेटे नींद आ गयी थी कि फ़ोन की घंटी ने मेरी नींद तोड़ दी. मैंने देखा माँ का फोन आ रहा था. मैंने फ़ोन उठाया तो सुबह-सुबह एक बुरी खबर सुनने को मिली. मेरे नानाजी का अचानक स्वर्गवास हो गया और मेरा पूरा परिवार उनके घर को निकल पड़े है. माँ का कहना था कि मैं जल्द-से-जल्द घर को रवाना दूँ. दिन के शुरुआत मे ऐसी खबर सुन मेरा मन भरी हो गया. तैयार हो के प्लांट की और निकला. वहां जाकर ऑफिस में छुट्टी के लिए ईमेल किया और मेरे बॉस से फ़ोन पर बात की. यहाँ प्लांट का काम लगभग हो चूका था मेरे डिपार्टमेंट का. इसलिए छुट्टी मिलने में कोई दिक्कत नहीं हुई. एक हफ्ते की छुट्टी मिली. मैंने दोपहर की बस से निकलने का फैसला किया.

दोपहर को मैं हवेली लौटा. नीचे दरवाजे पर कुसुम और उसकी बहन खड़ी थी. मुझे देख कुसुम की नज़रे शर्म से नीची हो गयी. मैं ध्यान नहीं दिया क्योंकि मेरे दिमाग में कुछ और ही था. फटाफट सामान एक छोटे बैग में भर दिया और कमरा बंद कर नीचे आ गया. कुसुम सवालिया नज़रों से मुझे घुर रही थी लेकिन मैं सीधे ठकुराईन के हवेली में गया. दरवाजा पर दस्तक देने से लाली बाहर आई. इससे पहले कि वह मुझसे कोई सवाल करती मैं खुद बोला, “लाली, घर में एक जरूरी काम आ गया है. मैं अभी निकल रहा हूँ. वापस आने में हफ्ता लग सकता है. आकर भाड़ा दे दूंगा. चलता हूँ” उसको बोलने का कोई मौका दिए बगैर मैं तेज़ी से हवेली से बहार निकल गया. रिक्शा लिया और बस स्टैंड की और चल पड़ा. आधे घंटे के अन्दर मैं बस में था. दिमाग में सिर्फ नानाजी की यादें घूम रही थी. शाम के वक़्त ऑफिस पहुंचा. पहले ही फ़ोन और ईमेल किया हुआ था. इसलिए सिर्फ बॉस से मुलाकात कर सारा मामला समझाने के बाद मैं अपने फ्लैट में आ गया. अगले दिन तड़के मेरी गाड़ी थी. सुबह ५ बजे ट्रेन पकड़ कर मैं घर की और रवाना हुआ. रस्ते में माँ को फ़ोन भी किया. माँ ने बताया कि घर की चाभी रीता काकी के पास है. शाम के सात बजे मैं स्टेशन पर उतरा. स्टेशन से रिक्शा लेकर जब मैं घर की ओर निकला तब अँधेरा हो चुका था. रिक्शा नेहा का पार्लर होकर गुजरा तो एकबार मन मैं आया कि अन्दर जाकर सोमलता से मिलूँ, लेकिन फिर उसी वक़्त खुद को रोक लिया. सीधे रीता काकी के दरवाजे पर दस्तक दी. कुछ देर बाद काकी दरवाजा खोली. उन्होंने मुझे सर से पांव तक अजीब नज़रों से घूरी, जैसी कि किसी चीज़ की तलाश हो. मैं डरते हुए कहा, “काकी, घर की चाभी ......” काकी का ध्यान टूटा और वह बिना कुछ बोले अन्दर चली गयी और चाभी का गुच्छा लेकर बहार आई. चाभी देते हुए बोली, “बेटा, तुम थककर आये हो, मैं रात का खाना भिजवाती हूँ.” मैं जवाब में बस “जी” कहा और चाभी लेकर घर आ गया. दो दिन के सफ़र के कारण बदन दर्द से चूर था. नहाने के बाद थोड़ी देर के लिए लेट गया तो पता नहीं कब नींद लग गयी. दरवाजे की घन्टी से नींद खुली. घड़ी देखा तो रात के नौ बज रहे थे.


थकी आँखों से दरवाजा खोला तो डब्बे लिए काकी खड़ी थी. काकी अन्दर आ गयी. टिफिन का डब्बा मेज़ पर रखने के बाद बोली, “अकेले हो?” मैं आश्चर्य होकर पूछा, “हाँ काकी, मेरे सिवा और कौन होगा घर पर?” काकी कुछ देर खामोश रही जैसे कुछ सोच रही हो. फिर मेरी आँखों में झांकती हुई बोली, “तुम कब निकल रहे हो नानी के घर?” मैं बोला, “जी, कल सुबह की पहली ट्रेन से निकल जाऊंगा.” काकी बिना कुछ बोले दरवाजे की तरफ मुड़ गयी और धीमी क़दमों से बाहर चली गयी. मैंने दरवाजा बंद किया लेकिन मेरा मन चिंता की कुहरे में खो गया. काकी को जब पता है कि घर में मैं अकेला हूँ तो बार-बार क्यों पूछ रही है. उनको किस बात पर शक है? मुझे इस मामले में कोई सुराग नहीं मिला. खाना खाकर सो गया, अगली सुबह जल्दी उठाना था. अगले तीन दिन नानी के घर में बीताने के बाद मैं घर वापस आ गया क्योंकि घर में किसी ना किसी को रहना था. पिछले कुछ दिनों से मोहल्ले में चोरो का काफी उत्पात है. घर खाली रखना समझदारी का काम नहीं है. माँ-पिताजी कुछ दिन और वहां गुजरने वाले है. मैं शाम ढलते-ढलते घर आया. स्नान करने के बाद चाय लेकर बैठा ही था कि दरवाजे की घंटी बजी. खोला तो रीता काकी थी, लेकिन खाली हाथ. मुस्कुराते हुए बोली, “आ गया तू? कैसे है सब वहां? तेरी माँ नहीं आई?” मेरे दिल में पिछले दिन से ही डर बैठा हुआ था. “अभी घंटे भर पहले आया हूँ. माँ और पिताजी अगले हफ्ते आयेंगें. अभी कुछ दिनों की छुट्टी है मेरी.” काकी दरवाजा बंद का अन्दर आ गयी और सोफे पर आराम से बैठ गयी. मैं खड़ा देखता रहा कि क्या बात है? मुझे खड़े देख बोली, “बैठ जाओ बेटा. खड़े क्यों हो?” मैं भी सोफे के दुसरे किनारे बैठ गया. लेकिन दिल में अभी भी अजीब-सी घबराहट थी. काकी मेरी तरफ एकटक देखे जा रही थी. आँख से आँख मिलते ही बोली, “तेरे घर में जो औरत काम करती थी, वह आजकल कहाँ है?” मेरा दिल धक्क से रुक-सा गया. इसलिए काकी मुझसे बार-बार पूछ रही थी, मैं अकेला हूँ या नहीं. तो क्या इसको पता चल गया कि सोमलता मेरे घर में थी. मैं चुप रहा. फिर काकी पूछी, “विवेक की बीबी की पार्लर में मैंने देखा था एकबार. वहां काम करती है क्या?” मैं डरते-डरते उसको देख बोला, “जी हाँ”



“तूने ही काम दिलवाया होगा. विवेक तो तेरा दोस्त है ना” सोफे पर और जमकर बैठते हुए बोली. मैं समझ गया कि बेटा अब बचने का कोई उपाय नहीं है. इसको सब पता चल गया है. मैं नज़रे नीची कर चुप हो गया. कोई जबाब ही नहीं सूझ रहा था. “उस औरत के साथ तो खूब मस्ती की तूने जब सुमित्रा दीदी घर पर नहीं थी” मैं डर गया, पता नहीं अब आगे क्या होगा? अचानक मेरे दिमाग में क्या सुझा, मैं झट से उठा और काकी के पैर पकड़ कर बैठ गया. मेरे इस हरकत से काकी अकचका उठी. “प्लीज काकी, माँ को नहीं बताना इसके बारे में. मैं आपके पैर पकड़ता हूँ.” लगभग गिडगिडाते हुए मैं बोला. काकी मेरी ओर देख मुस्कुराई और बोली, “वाह रे मेरे कन्हैया! गोपियों को घर लाकर रासलीला करते हुए डर नहीं लगा, अब क्यों डरता है?” मैं और कसकर पैर पकड़ते हुए बोला, “नहीं काकी अब कभी ऐसा नहीं करूँगा. आप किसी को नहीं बताना. प्लीज!” काकी सोफे पर ढल गयी. उनके चेहरे पर जीत की मुस्कान थी और मेरी हालत हलाल होने वाले बकरे की तरह. मारे डर के मेरा लंड चमड़ी के अन्दर चला गया. काकी सोफे पर धंस कर बैठी थी मानो कोई महारानी हो और मैं उनका दास. मेरी ओर देख शैतानी मुस्कराहट के साथ बोली, “बेटा, मूठ मारते हो?” काकी के मुंह से यह सवाल सुनकर मुझे मेरी कानों पर यकीं नहीं हुआ, “क्या?” रीता काकी अब सीधी बैठ गयी और धीरे लहजों में बोली, “ज्यादा भोले बनने की कोई दरकार नहीं है. किसी औरत की याद में मूठ तो मारते होगे ना? क्या?” मैंने नज़र झुका ली, “जी काकी, कभी कभी!” वह फिर सोफे पर ढल गयी और बोली, “मेरे सामने करो” मैं चौंक गया, “क्या???” आँख बंद कर काकी बोली, “पतलून उतार और मेरे सामने मूठ मार. देखूं तेरा हथियार कितना बड़ा है”



मरता क्या ना करता? मेरे सामने कोई उपाय नहीं है. ऐसा नहीं है कि मुझे कोई शर्म आ रही है. पिछले दो महीनों से मेरे साथ जो जो हुआ है उसके सामने यह कुछ नहीं है लेकिन रीता काकी? मेरे पड़ोस की काकी, मेरी माँ की सहेली, राजेश भैया की माँ. अगर मेरी करतूत बाहर किसी को पता लग गया तो मेरी इज्जत गयी नाली में. मैंने धीरे से पेण्ट और चड्डी उतारा और काकी के सामने खड़ा हो गया. काकी आंख खोल देखी और बोली, “जरा नजदीक आ” मैं हडबडाहट में एकदम सामने चला गया कि मेरा लंड काकी के मुंह के बिल्कुल सामने आ गया. काकी गुस्से में धक्का दे चिल्लाई, “क्या कर रहा है कलमुंहे, मुंह में घुसायेगा क्या?” मैं डर से बोला, “सॉरी काकी” काकी सहज हो बोली, “ठीक है अब हाथ चलाओ” और सीधी बैठ गयी. वह एकटक मेरे लंड को घुर रही थी, लेकिन मेरा लंड मारे डर के पिचक गया था और सख्त होने का नाम नहीं ले रहा था. मैं तेज़ी से हाथ चला रहा था लेकिन कोई फायदा नहीं. लंड जब अपने आप पर आ जाए तो किसी की बाप की नहीं सुनता. यह देख काकी बोली, “क्या हुआ कन्हैयालाल? तेरा हथियार तो बेकार-सा लगता है” लंड की बदनामी कोई मर्द बर्दाश्त नहीं करता. मैं थोडा तैश में बोला, “आपके डर के कारण उठ नहीं रहा है, वरना कितनी की फाड़ चूका है” काकी हँसते हुए बोली, “अच्छा बेटा! ला मैं ही इसे उठा देती हूँ. इधर आ” मैं काकी के सामने खड़ा हो गया. मेरा दिल बाग़-बाग़ हो रहा था. काकी दांये हाथ से लंड को नीचे से उठा चमड़ी खींच कर सुपारे को निहारने लगी. मैं खड़ा काकी को अब एक औरत के हिसाब से देखने लगा. लेकिन देखने को कुछ था नहीं. काकी एक बंद गले का ब्लाउज पहने थी जिससे उनकी मम्मो के कोई हिसाब नहीं लग रहा था. एक बार नंगा देखने की तमन्ना जरूर है. खैर काकी अब मेरे लंड को धीरे-धीरे आगे पीछे करने लगी. काकी के हाथ का प्यार पाकर लंड की नसों में खून दौड़ने लगा और सख्त होना शुरू हुआ. जब लंड पुरे आकर में आ गया तो काकी मेरे तरफ देख बोली, “लो शैतान तैयार हो गया” मैं चुपचाप मज़ा ले रहा था. काकी ने अब पूरा ध्यान मेरे लंड को देकर उसकी मालिश करने लगी. अब मेरी सिसकारी छूटने लगी. काकी हँसते हुए बोली, “खूब मजे लो बेटा काकी के हाथ का” काकी की रफ़्तार बदने लगी और साथ में मेरी सिसिकारी की. अब मैं छूटने वाला था. मेरा लंड जोर की पिचकारी मार दी बिना किसी चेतावनी के. गाड़ा सफ़ेद वीर्य उछल कर काकी के गले और छाती को पोत दिया. काकी को इसकी उम्मीद नहीं थी. वह गुस्से में चिल्लाई, “हरामी क्या किया तूने? बोल नहीं सकता था साले. सारा कपड़ा ख़राब कर दिया. हट सामने से....” मुझे धकेल कर बाथरूम में घुस गयी. मैं धम्म से सोफे पर बैठ गया. जो अभी-अभी हुआ वह सपने जैसा लग रहा था. यहाँ तक कि मैंने सपने में भी नहीं सोचा था. लगभग दस मिनट के बाद काकी दनदनाते हुए बहार आई और दरवाजा खोल जाने लगी. पीछे मुड़ के बोली, “आगे से हद में रहना, समझे” मैं कुछ बोलता इससे पहले ही वह निकल चुकी थी. “आगे से” का मतलब? क्या जो अभी हुआ वह फिर होगा? क्या काकी सचमुच में? सोचते सोचते मैं सोफे पर ही निढाल हो गया. 










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Sunday, March 22, 2020

FUN-MAZA-MASTI ओह माय फ़किंग गॉड--11

FUN-MAZA-MASTI

ओह माय फ़किंग गॉड--11



दोपहर को मैं खा-पीकर लेटा था की आँख लग गयी. किसी ज़ोरदार आवाज ने मेरी नींद तोड़ दी, मैंने देखा कि चारो ओर धुंध छाया है. आंधी के कारण पुरे आसमान में धुल भरा था. मैंने जल्दी से सारे खिड़की-दरवाजे बंद किये और बाहर छत पर आ गया. हवेली के सामने छत पर लाली कपड़े समेटने में लगी थी. तेज बेपरवाह हवा बार-बार उसकी साड़ी उसके बदन से अलग कर रही थी और हर-बार मुझे उसके गदराए हुस्न का दीदार करा रही थी. तंग ब्लाउज में कसी हुई उसकी मोटी चूचियां खजुराहो की मूरत जैसी लग रही थी. मैं छत पर खड़े होकर काफी देर से उसकी हुस्न के मज़ा ले रहा था. अचानक उसकी नज़र मुझपे पड़ी, और वह शरमाते हुए साड़ी को समेट ली. मै लाली को देख मुस्कुराया और वापस अपने कमरे में आ गया.


कुछ देर के बाद हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो गयी. दोपहर की गर्मी केबाद हल्की बारिश के कारण मौसम उमस से भर गया. कमरे में रहना मुश्किल हो गया क्योंकि आंधी के कारण बिजली भी गयी हुई थी. बारिश के वावजूद मैं छत पर आ गया. बारिश की बुँदे बड़ा सुकून दे रही थी. मुझे वह रात याद आ गयी जो सोमलता के साथ घर के छत पर बितायी थी. सोमलता मेरे दिल में जैसे पक्की तौर पर घर कर गयी थी. याद है कि जाता ही नहीं. अब बारिश तेज़ हो गयी. पता नहीं कब से मैं ख्यालों में खोया भींग रहा था. अचानक किसी की आवाज मेरे कानो में पड़ी जैसे की मुझे पुकार रही हो. मुझे लगा कि सोमलता मुझे पुकार रही है, “ओओऊ.... बाबु... अरेएए ओ बाबु...” पर मेरा ख्याल टुटा तो मैंने पाया की हवेली के बरामदे से लाली मुझे पुकार रही है.


 उसकी बगल में ठकुराईन खड़ी है. मैं थोड़ा झेंप गया. “बाबु, इधर आ जाओ” वह मुझे हाथ के इशारे से पास बुलाई.

 मैं पहले झिझका लेकिन जब दुबारा पुकारी तो दौड़ते हुए चला गया. ऊपर के कमरे के आगे एक खुला बरामदा बना हुआ था. एक बड़े झूले में ठकुराइन बैठी थी और बगल के सोफेनुमे कुर्सी में लाली. मैं भींगे कपड़ो में बरामदे में खड़ा हो गया. ठाकुराइन किसी एक्स-रे मशीन की तरह मुझे घुर रही थी. मैं थोड़ा झेंप गया.

 अब ठाकुराइन बोली, “बरसात में भींगने का मज़ा बहुत है लेकिन सर्दी लग जाएगी” 

मैं सिर्फ “जी” कहकर चुप हो गया और बाहर असमान को देखने लगा. बहुत अजीब लग रहा था इन दो अजनबी औरतों के बीच.

 फिर ठकुराईन बोली, “बाबु, तुमने अपना नाम क्या बताया था? मुझे याद नहीं.”

 मैंने देखा की वह झूले से उतर मेरे सामने खड़ी थी.

 “जी मेरा नाम बिनय है” मैंने जवाब दिया.

 वह बिल्कुल मेरे बगल में खड़ी हो गयी. उसकी बदन से किसी फूल की महक आ रही थी. काले बरसते आसमान की ओर देखते हुए बोली, “लगता है आज रात भर बारिश होगी. बिनय बाबु, आज रात बाहर निकलने की जरूरत नहीं है. हमारे रसोई में जो बनेगा लाली दे जाएगी. ठीक है?”


 मैं क्या बोलता. “जी, ठीक है” ठकुराइन एक बार फिर मुझे सर से पाँव तक देखने के बाद अन्दर के कमरे में चली गयी.

ठकुराइन के जाने के बाद लाली मेरे करीब आ गयी. चुहल करते हुए बोली, “लगता है साहब को आज किसी माशूका की याद आ रही है. क्यों?” 

मैं थोड़ा उदास लहजे में बोला, “हाँ.....”


 वह बदन से बदन चिपकाते हुए धीरे से बोली, “कौन है वह हुस्न की रानी? कोई मौसी, काकी या बुआ तो नहीं?” और जोर से हंस पड़ी. अन्दर के कमरे से ठकुराईन लाली को बुला रही थी. मेरे गाल पे एक चुम्मा दे जाते हुए बोली, “तैयार रहना मेरे छोटे साहब. रात को आ रही हूँ.” और कमर मटकाते हुए अन्दर चली गयी.


 बारिश कम होने का नाम नहीं ले रहा था, मेरे पुरे कपड़े गीले हो गये थे. मैंने कमर के नीचे देखा तो पाया की मेरा पायजामा बिल्कुल चिपक गया था और मेरा लंड का उभार साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था. अब मुझे समझ में आया की ठकुराइन मुझे इतना घुर क्यों रही थी! मैं वापस कमरे ने आ गया. गीले कपड़े बदल कर सिर्फ एक बॉक्सर पहन लिया, वैसे भी आज कपड़ो की ज्यादा जरूरत है नहीं. घड़ी देखी, रात के आठ बज रहे थे. बारिश अभी भी जारी है, लेकिन धार जरूर कम हो गयी है. मैं बड़ी बैचैनी से लाली का इंतज़ार कर रहा था.


 अचानक बिजली आ गयी. मैंने ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया की चलो रात को कोई दिक्कत तो नहीं होगी. मैंने लाइट बंद की और छत की ओर देखने लगा. मन में सोचा था कि जैसे ही लाली अँधेरे कमरे में आएगी मैं उसको कसके पकड़ लूँगा. करीब आधे घन्टे इन्तेजार के बाद मैंने किसी को छत से मेरे कमरे की ओर आते देखा. मैं अन्दर दीवार के पीछे खड़ा हो गया. वह कमरे के अन्दर आई, किसी को नहीं देख खाने का डब्बा निचे रख
 बाहर जाने लगी. जैसे ही वह दरवाजे के पास आई उसको कमर से कसकर पकड़ लिया. वह कसमसा कर रह गयी, जैसे खुद को मुझसे छुड़ाना
 चाहती हो. उसको और कसकर पकड़ते हुए मैं बोला, “कहाँ जा रही हो लाली रानी? इतनी जल्दी भी क्या है? खाना तो खाने दो!” 

वह बिल्कुल  फुसफुसाते हुए बोली, “साहब, मैं लाली नहीं कुसुम हूँ” 

मुझे काटो तो खून नहीं. पीछे हटने के बाद बड़ी मुश्किल से बोला, “क..क......कु....कुस्स्सुम” 



 “ठीक है मैं खा लूँगा” मैं इतना धीरे बोला कि मुझे भी ठीक से सुनाई नहीं दी. 

कुसुम अब धीरे धीरे मेरी ओर बढ़ रही थी और मेरा दिल जोर से धड़क रहा था. बिल्कुल मेरे करीब आकर बोली, “लगता है लाली दीदी से आपका काफी लगाव हो गया है. बहुत ख्याल रखती है क्या साहब आपका?” 

यह सवाल मुझे किसी और बात की तरफ इशारा कर रहा है. “नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. वह तो रोज़ यहाँ आती है सफाई करने तो बात हो जाती है.” मैंने बात को घुमाने की कोशिश की.


 लेकिन वह मुझे इतनी आसानी से छोड़नेवाली नहीं थी. मेरे सामने खड़ी कुसुम की नज़र मेरे बॉक्सर के उभरे हिस्से पर थी. साड़ी के पल्लू को चढ़ाते हुए बोली, “बातचीत तो ठीक है साहब लेकिन अकेले में कसकर पकड़ना तो कुछ और बात है. कल तो दीदी आपके लंड की मालिश कर रही थी” 

यह औरत अब बिल्कुल नंगेपन पर उतर आई थी. मै टालने के इरादे से बोला, “तो तुमको क्या? तुम आपना काम करो समझी?” मेरी आवाज में गुस्सा तो था लेकिन दिल में डर भी था अगर ये हवेली में हल्ला मचा दे तो मेरा रहना मुश्किल हो जायेगा और अगर ऑफिस में बात पंहुच गई तो हद से ज्यादा बदनामी होगी. 

मेरे तेवर देख कुसुम थोड़ा सहम गयी. अपने हाथो को मलते हुए बोली, “मैं कहाँ किसी को बोलने जा रही हूँ. आप तो बेकार में नाराज़ हो रहे है” 

मुझे समझ में नहीं आ रहा कि आखिर ये औरत चाहती क्या है. मै पूछा, “तुम आखिर चाहती क्या हो?” 

अब कुसुम की हिम्मत बढ़ गयी. मेरे इतने करीब आ गयी कि उसकी छाती मेरे सीने से चिपक गई. मेरी नंगी पीठ को सहलाते हुए बोली, “साहब आप जो प्रसाद लाली दीदी को देते हो उसका कुछ हिस्सा मुझे भी दिया करो ना. वैसे कितनी बार आपने दीदी की ली है?”


 अब मैं भी खुल गया, बोला, “कहाँ कुसुम, सिर्फ एक बार लाली ने मेरा मुठ मारा था जो तुमको पता है.”


 यह सुनकर वह जोरसे ठहाके मार हंसने लगी. “इसका मतलब है की आपने सिर्फ रसगुल्ला को देखा, ना तो उसे दबाया, ना ही चूसा और ना ही खाया!” 

उसकी हंसी से मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था. यहाँ सब चूत खोल के बैठी है और मैं लंड पकड़ के बैठा हूँ. सच में बहुत बड़ा चुतिया हूँ. 


अपनी हंसी को रोकने के बाद कुसुम बोली, “साहब दिल छोटा क्यों करते हो? चलो आज मैं तुमको रसगुल्ला के साथ गुलाब जामुन भी खिलाऊँगी. पहले मैं देख तो लूँ कि मेरे साहब का खीरा कैसा है” वह मेरा बॉक्सर उतारने लगी. 

लेकिन तभी मुझे लाली की बात याद आ गयी, कहीं यह औरत मुझे बाद में ब्लैकमेल तो नहीं करेगी? मैंने कुसुम की हाथ को पकड़ रोक दिया.

 वह मुझे अचरज से देखने लगी. मैं बोला, “आखिर तुम चाहती क्या हो? यह सब से तुम्हे क्या मिलेगा?” 

वह बॉक्सर के ऊपर से ही लंड को मसले जा रही थी. उसकी आँखों में चुदास थी. गहरी आवाज में बोली, “साहब तुम खाना क्यों खाते हो?” अब ये ‘आप’ से ‘तुम’ पर आ गयी थी. 

मैंने कहा, “भूख मिटाने के लिए”.

 कुसुम होंठो को मेरे करीब लाते हुए बोली, “मैं भी अपने बदन की भूख मिटाने के लिए यह सब कर रही हूँ. मुझे जोरो की भूख लगी है.” 

मैं खामोश रहा. कुसुम मेरे सर को पकड़ कर झुका दी ताकि उसके करीब आ सकूँ और मेरे होंठो को अपने होंठो से चिपका दी. कुछ देर वह मेरे होंठो को ऊपर से ही चूसने लगी फिर जैसे ही मैंने मुँह खोला, वह मेरे मुँह के अन्दर जीभ डाल दी. मैं उसकी जीभ को लोल्लिपोप की तरह चूसने लगा. हम दोनो के लार आपस में घुलकर एक नया स्वाद पैदा कर रहा था. कुसुम मेरी नंगी पीठ को कसकर पकडे थी और मैं उसकी गांड का दोनों हाथो से जायजा ले रहा था. उसकी गांड इतनी नरम थी की मेरी उँगलियाँ उसमे धंसने लगी.

 तभी मेरा ध्यान दरवाजे की तरफ गया, जो खुला था. बाहर जोर से बारिश हो रही थी, जैसे आज ही सारा पानी बरसने वाला है.कुसुम मुझे बेतहासा चूमे जा रही थी. मैंने उसे अलग किया हो मेरी ओर देखने लगी. मैंने कहा, “पहले दरवाजा तो बंद कर ले”.


 वह मुझे वापस बाँहों में जकड़ बोली, “छोडो ना साहब, इतनी बारिश में यहाँ कौन आएगा? यहाँ तो आप अकेले रहते हो.”

 बात तो सही है लेकिन फिर भी मुझे अजीब लग रहा था इस तरह दरवाजा खोल कर सेक्स करना!





हम दोनों के बदन आपस में उलझ गये. मेरा लंड बॉक्सर में तना हुआ था और कुसुम के मम्मे उसकी ब्लाउज में तने हुए थे. लेकिन हमारे होंठ चिपके रहे. लगभग दस मिनट तक चुम्मा-चाटी के बाद कुसुम ने मुझे धकेल दिया मेरे छोटे बिस्तर पर. मेरा बिस्तर एक पलंग पर बिछा था जो सिर्फ एक इंसान के सोने के लिए था. बिस्तर पर पड़ा मैं कुसुम को हैवानियत भरी नज़रों से देख रहा था. कुसुम ने अपनी साड़ी उतार दी और मेरे पैरों के पास आ खड़ी हो गयी. ख़ुदा कसम क्या कयामत लग रही थी! काले रंग के ब्लाउज में कसा गोरा बदन बड़े बड़े संतो का दिमाग घुमा दे, मैं तो फिर भी आम इन्सान हूँ. 


उसका  पेटीकोट छोटा था जो सिर्फ घुटनों के कुछ इंच नीचे तक ही  आता था. कुसुम एक बार दरवाजे की ओर देखी फिर मेरे पैरों के पास बैठ गयी. मैं प्यास भरी नज़रों से उसको देखने लगा. मेरा बॉक्सर अब तम्बू में तब्दील हो चूका था. वह दायें हाथ से लंड को सहलाने लगी और बाएं हाथ से मेरी जांघ को. जीभ से अपने होंठो को चाटते हुए बोली, “साहब, अब तुम्हारा हथियार देख लूँ. औरतों के लायक है या बच्चियों के खेलने के” और एक ही झटके में बॉक्सर उतार दी. 

मेरा लिंग किसी ताड़ के पेड़ की तरह सर उठाये खड़ा था. मैंने उसको छेड़ने के इरादे से कहा, “क्यों रानी, कैसा है मेरा हथियार?”

 कुसुम बिना कुछ बोले मेरे अन्डो को सहलाने लगी. बीच-बीच में वह अण्डों को जोर से दबा देती थी और मेरी सिसकारी निकल जाती. मेरे ऊपर झुकते हुए कुसुम बोली, “तुमने किसी औरत की चूत पर मुँह मारा है?” 


मेरी नज़र तो ब्लाउज से झाकते मम्मो पर थी. मैने हाँ में सर हिलाया.

 अचानक वह उठ खड़ी हुई और बाथरूम के अन्दर चली गयी. मैं नंगा खड़े लंड लिए बिस्तर पे पड़ा सोचने लगा कि आखिर यह हुआ क्या? लगभग पांच मिनट के बाद कुसुम बाथरूम से बाहर आई तो मैं हैरान था. वह बिना पेटीकोट के थी. चौड़ी नितम्बों के बीच में झांटो से ढकी चूत से पानी टपक रहा था. मेरे सवालिया नज़रों से घूरने पर थोड़ा शरमाते हुए बोली, “वो क्या है ना साहब, आज तक किसी ने मेरी चूत पे मुँह नहीं मारा. मेरी बड़ी इच्छा है की कोई मेरी चूत को चुसे चाटे. इसलिए इसको धोने गयी थी.” 


मेरी हंसी निकल गयी. एक कुसुम है जो मुझे धोकर चूत परोस रही है और एक सोमलता है जो पेशाब करने के बाद सीधे मेरे मुँह पर बैठ जाती है. मैं खड़ा हो गया और कुसुम को बाँहों में जकड़ने के बाद उसके होंठो को चूमने लगा. साथ ही साथ उसकी चूत को मसलने भी लगा. कुसुम अब मेरी बाँहों में छटपटाने लगी. मैंने उसको बिस्तर पर लेटाया और उसकी टांगो के बीच बैठ गया. उसकी चूत की फांको को अलग कर जीभ डाल दी. 


ज़ोरदार सिसकारी के साथ कुसुम का बदन ऐंठ गया. वह दोनों हाथो से मेरे सर को पकड़ लिया. सोमलता के साथ मैंने काफी ट्रेनिंग की है. मैं कभी उसकी चूत के अन्दर जीभ घुमाता तो कभी भगनासा को चूसता. साथ-साथ मैं उसकी गांड को दोनों हाथों से दबा भी रहा था. कुसुम जी खोलकर चिल्ला रही थी. मुझे डर लग रहा था, कहीं कोई सुन ना ले. लेकिन बाहर जोरो की बारिश के कारण ऐसा सोना शायद नामुमकिन था. जहाँ मैं उसकी चूतड़ को दोनों हाथों से मसल रहा था, कुसुम उत्तेजना के मारे खुद अपनी मम्मों को मसल रही थी. मैंने उसकी चूत को जीभ से चोदना जारी रखा. वह बिन पानी मछली की तरह बिस्तर पर तड़प रही थी. उसका बदन कमान की तरह मुड़ जाता फिर धम्म से बिस्तर पर सीधी हो जाती.


 दस मिनट के बाद दोनों टांगो को घुटने से मोड़ने के बाद कुसुम कांपने लगी. मैं समझ गया की समय आ गया है. मैंने एक ऊँगली उसकी गीली चूत में डाल दी. इस बार उसकी सिसकारी लम्बी थी, “इस्स्स्सस..... हाययय.... दैय्या रेरेरे....” 


मैं जीभ और ऊँगली दोनों से चोदने लगा. दोहरी चुदाई के आगे कुसुम की चूत जवाब दे गयी और रस का दरिया निकल पड़ा. कुसुम का बदन अब शांत था लेकिन सांसे तेज़ चल रही थी. कुछ देर उसकी चूत मसलने के बाद मैं उठा तो नज़र दरवाजे की तरफ गई. दरवाजे पर लाली को देख मेरी सांसे रुक गयी, मेरा लंड जो सरिये जैसा सख्त था एक ही झटके में पिचक गया. लाली दरवाजे पर खड़े घूर रही थी लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह काफी गुस्से में है.





मैं बुत बनकर लाली के तमतमाते चेहरे को देखने लगा. कुसुम अभी भी मदहोश होकर अधनंगी लेटी हुई थी. कमरे के अन्दर आकर गुस्से में बोली, “वाह साहब, वाह! ये छिनाल यहाँ चूत खोल लेटी है और आप भूखे कुत्ते के जैसे चाट रहे हो” 

मैं तो इतना डर गया था कि यह होश नहीं था कि मैं नंगा खड़ा हूँ. मैं चुपचाप जमीन को देख रहा था.

 लाली की आवाज़ सुन कुसुम भी बिस्तर के नीचे आ गयी. वह डर और हैरानी से लाली को देख रही थी.


 लाली की नज़र उसकी टपकती चूत पर थी. अचानक लाली दरवाजे की ओर मुड़ी और कहते हुए जाने लगी, “बताती हूँ मैं मालकिन को. इस छिनाल को हवेली से नहीं फेंकवाया तो मेरा भी नाम लाली नहीं” 

कुसुम डर से मेरी तरफ देखने लगी. लाली दरवाजा पार कर छत पर जा चुकी थी. पता नहीं मुझमे इतनी हिम्मत कहाँ से आई, मैं नंगे ही दौड़ के गया और लाली को पीछे से पकड़ लिया. “एकबार मेरी बात सुन लो लाली, इसमें कुसुम की कोई गलती नहीं है. पुरी बात तो सुनो” 


लाली अपने आपको छुड़ाने के लिए कसमसाने लगी, “मुझे कुछ नहीं सुनना है साहब, मुझे जाने दो” 

बाहर ज़ोरदार बारिश हो रही थी. मैं लाली को जबरदस्ती खिंच के कमरे में ले आया, “ठीक है चली जाना, पांच मिनट हमारी बात तो सुन लो” बड़ी मुश्किल से लाली अन्दर आई. मैं पुरी तरह भींग गया था, लाली की भी साड़ी गीली हो चुकी थी. तबतक कुसुम अपनी साड़ी को कमर से लपेट ली और कोने में किसी मुजरिम की तरह खड़ी थी.

 लाली अभी भी गुस्से में थी, कुसुम के पास जाकर बोली, “तो इसको भी अपने जाल में फंसा ही लिया तूने. तेरी आदत नहीं जाएगी हर किसी मर्द का लंड नापने की.”

 कुसुम सर झुकाए खड़ी थी. शायद कुछ बोलना चाहती थी लेकिन हिम्मत नहीं थी. 

मैं लाली के दोनों कंधो को पकड़ बिस्तर पर बैठाया और सामने जमीन पर बैठते हुए बोला, “पहले मेरी बात सुनो” 

लाली का गुस्सा थोड़ा कम हुआ. बगल झाकते हुए बोली, “बोलो, क्या बोलना चाहते हो”

 मैं उसकी दोनों घुटनों को पकड़े बैठा था. मैंने बोलना शुरू किया, “शाम को जब तुमने कहा तुम रात को आओगी खाना लेकर तो मैं कमरे में बत्ती बुझाकर तुम्हारा इंतज़ार करने लगा. कुछ देर बाद कुसुम खाना लेकर आई. मैंने सोचा तुम हो. मैं उसको पीछे से पकड़ लिया. बाद में पता चला की तुम नहीं ये है. बस इसके बाद यह सब हो गया.” 

अब लाली बिल्कुल सामान्य हो गयी जब उसे पता चला कि मैं उसके लिए इंतज़ार कर रहा था. मेरी ओर देखते हुए बोली, “क्या करूँ साहब? बीबीजी की तबियत ठीक नहीं थी. मालिश कर रही थी, इसलिए नहीं आ पाई.” फिर कुसुम की ओर देखते हुए बोली, “लेकिन इसे तो मालूम था. इस औरत की आदत है दुसरे के मर्द पर डोरे डालने की” 

इस बार कुसुम चुप नहीं रह सकी. शायद इतना संगीन झूठा इलज़ाम कोई भी औरत बर्दास्त नहीं करेगी. वह बोल पड़ी, “दीदी, आप उसी पुरानी बात को लेकर बैठी है. मेरा और पवनजी के बीच में कुछ नहीं था और ना ही मैंने उसपर कोई डोरी डाली थी. खुद उसकी बुरी नज़र मुझपर थी. एक दिन मेरे घर में घुसकर मेरे साथ जबरदस्ती करने लगे. मुझे नंगी कर मसलने लगे. लेकिन किस्मत से उस दिन एमसी चल रहा था इसलिए छोड़कर भाग
 गया. मैं आपको बोलने ही वाली थी कि उसने पहले जाकर मेरी शिकायत कर दी. अब इस अकेली औरत की कौन सुनता है?” बोलते बोलते कुसुम की आँखें गीली हो गयी.

 लाली अब भी उसको घूरे जा रही थी.

 कुछ देर बाद कुसुम बोली, “मुझे पता था कि आपका ब्याह पवनजी के साथ होना है. यह जानकर मैं आपको धोखा कैसे दे सकती हूँ? आपलोगों ने हमको ठिकाना दिया है” बोलते बोलते बेचारी रो पड़ी. मुझे अब समझ में आया की पवनजी लाली से इतना कतराते क्यों है. यह पवन तो बहुत पहुंची हुई चीज़ है!


लाली का दिल अब पिघल गया था. वह कुसुम को बाँहों में जकड़कर बोली, “हमको माफ़ कर दे कुसुम. ग़लतफ़हमी के कारण तुमसे बहुत गन्दा बर्ताव किया. यह सब मर्द होते ही ऐसे है. एकदम भूखे भेड़िये!!!” और मेरी तरफ देख मुस्कुराने लगी. 

मैं चुपचाप रहा. वह कुसुम को पकड़ कर बिस्तर पर बिठाई और बोली, “अच्छा, यह बता साहब का लंड कैसा लगा?”

 कुसुम थोड़ा शरमाते हुए बोली, “अभी तक हमने ठीक से देखा नहीं हैं” 

लाली चौंकते हुए बोली, “हें! अभी तक साहब ने तुमको चोदा नहीं. क्या साहब डर लग रहा है क्या?” 

मैं भी तैश में आ गया, “डर किस बात का? अभी तुम्हारी जैसी दस को चोद दूँ. मौका ही नहीं मिला लंड डालने का.”

 लाली के होंठो पे शैतानी मुस्कान आ गयी. बोली, “अच्छा जी, बड़ा घमंड है अपने आप पर”

 मैं कुछ नहीं बोला. इस बीच कुसुम बहुत असहज महसूस कर रही थी. वह उठी और अपने कपड़े समेटते हुए बोली, “आप लोगो को जो करना है करो मैं जाती हूँ. दीदी मुझे माफ़ कर दो.”

 उसको जाते देख लाली हडबडा गयी और जल्दी से उसको पकड़ कर बोली, “अरे पगली क्यों हमको और शर्मिंदा कर रही है. ये साहब ना तो मेरा पति है ना मैं इसकी बीवी. चल आ मिल के मजे लेते है.”

 मैं अभी भी पूरा नंगा कोने में खड़ा सास-बहु सीरियल का ये एपिसोड देख रहा था. लाली ने कुसुम के बदन से साड़ी उतार ऊपर से नंगी कर दी. कुसुम का बदन औसत दर्जे का था लेकिन उसकी चूचियां बड़ी और कसी हुई थी. निप्पल का घेरा बड़ा और गहरे रंग का था जो उसकी गोरी देह पर खूब फब रही थी. लाली कुसुम को बाँहों में जकड़े हुए धीरे-धीरे पीठ और चूतड़ को सहला रही थी. लाली ने मुझे इशारों से पास बुलाया, “ओ साहब
 क्या देख रहे हो? पास आओ और दिखाओ अपने लंड का कमाल” 

मेरा लंड उछालें मार रहा था. मैं पीछे गया और कुसुम के चूतड़ को जोर से दबा दिया. उसकी सिसकारी जैसे गले में ही घुट गयी और पूरा बदन थरथरा गया.


कुसुम अभी भी शरमा रही थी. लाली के कंधे पर सर रख कर चुपचाप दोनों और से प्यार ले रही थी.

 मै भी पीछे से कुसुम को जकड़ लिया. मेरा लंड उसके चूतड़ की फांक में फंस गया और मेरे दोनों हाथ उसके चिकने पेट का जायजा लेने लगे. कुसुम एक मर्द और एक औरत के बीच पिसने लगी. उसकी सांसे गहरी होने लगी. मैं एक हाथ उसकी चुचियों पे ले गया और दूसरा हाथ कमर के नीचे झांटों को टटोलने लगा. झांटो के ऊपर से उसकी चूत को जोर से मसलने लगा जिससे कुसुम बैचैन होकर सीत्कार करने लगी. उसके मम्मों की निप्पल खड़ी हो गयी जिसे मैं उँगलियों में फँसाकर मसलने लगा. लेकिन इन सबके दौरान लाली एकदम खामोश थी. वह बस कुसुम को जकड़े खड़ी थी. मैंने उसकी आँखों में देखा जिसमे एक सूनापन नज़र आया. 

मुझे अपनी ओर ताकते देख बोली, “साहब खड़े खड़े ही पूरा काम करोगे क्या? चलो बिस्तर पर”.

 फिर कुसुम को बिस्तर पर बैठाकर खुद उसकी बगल में बैठ गयी. मेरी ओर देख बोली, “आ जाओ मेरे राजा” 

मैं लाली के सामने खड़ा हो गया, मेरा तना हुआ लंड उसकी मुँह के सामने था. लंड को हलके हाथो से सहलाते हुए बोली, “साहब पिछले दिन तुम्हारे लंड को ठीक से प्यार नहीं कर पाई. लेकिन आज पूरा प्यार दूंगी” 

कुसुम बड़े गौर से हमारी ओर देख रही थी. लाली ने कमर से पकड़ मुझे सामने खींच ली और झट से मेरे लंड को मुँह के हवाले कर दी. मेरे लंड को पूरा निगल कर चूसने लगी. मेरी नज़र कुसुम पर गयी जो बड़े आश्चर्य से लाली को देख रही थी. शायद उसके लिए यह तरीका बिल्कुल नया था. मैंने लाली के सर को पीछे से पकड़ा और उसके  मुँह को चोदने लगा. उसके मुँह से “सक्क सक्क” की आवाज आ रही थी. सड़प सड़प की आवाज के साथ वह किसी शातिर खिलाडी की तरह मेरे लंड को चुसे जा रही थी.

 मेरा लंड जो इतनी देर दो नंगी औरतों को देख बार-बार गरम हो चूका था ज्यादा देर तक मैदान में टिक नहीं पाया और ढेर सारा प्यार का रस लाली के मुँह में उढ़ेल दिया. कुसुम का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया. उसकी आँखों के सामने दो बदन चुदाई के खेल में लगे है और वह नंगी होकर देख रही थी. वीर्य निकलने के साथ-साथ मेरी टांगो की जान निकल गयी और मैं निढाल होकर लाली के कन्धों पर गिर गया. लाली के पीठ पीछे मैंने कुसुम
 को देखा, बेचारी हैरानी और शर्म से पानी-पानी हो रही थी. इतना गरम सीन देख वह भी गरम हो रही थी. भले लाली की तरह खुल के मैदान में नहीं थी लेकिन उसके गोर गाल लाल हो गये थे.


मुझे संभलने में मिनट भर का वक़्त लगा. मैं सीधा खड़ा था लेकिन मेरा मुरझाया लंड अभी तक लाली के हाथों में खेल रहा था. कुसुम बहुत आस भरी नज़रों से इसे देख रही थी लेकिन मुँह से कुछ बोल नहीं पा रही थी. लाली मेरे लंड की धीरे से मालिश करते हुए कुसुम की ओर देख बोली, “क्यों बन्नो? देख कर मज़ा आया ना?” 

बेचारी कुसुम की हालत ऐसे ही ख़राब हो रही थी, हम दोनों के घूरने से और ख़राब हो गयी. वह नंगे बदन अपने में सिमट कर नज़रे झुका ली. मैं और कुसुम, हम दोनों के बदन पर कपड़े का एक धागा तक नहीं था लेकिन लाली अभी भी पुरे कपड़ों में थी. हालाँकि उसकी साड़ी का पल्लू गिर गया था और ब्लाउज के ऊपर से दोनों पहाड़ों के बीच की घाटी दिख रही थी. शायद इसमें भी उसकी कोई चाल है! खैर कुसुम अब भी छुईमुई बनी बैठी थी. लाली ने उसको खींचकर अपने से सटा लिया और बोली, “ले अब तू साहब के इस हथियार को तैयार कर” 

मेरा लंड बिल्कुल कुसुम के मुँह के पास लटक रहा था लेकिन वह इसे देख भी नहीं रही थी. लाली ने मेरे लंड को नीचे से पकड़ा और कुसुम के बंद होंठो पर रगड़ने लगी. कुसुम आँख और मुँह दोनों बंद कर ली. लाली थोड़ा तैश में आकर बोली, “अरी छिनाल अपना मुँह तो खोल! अपनी चूत चुसवाकर पानी गिरा सकती है तो लौड़ा नहीं चूसेगी?” 

लाली के कहने से वह अपना मुँह तो खोल दी लेकिन लंड को ना तो हाथ लगाई ना ही उसको चूसने में कोई दिलचस्पी दिखाई. लाली ने एक हाथ से उसके सर को पीछे से पकड़ा और दूसरे हाथ से मेरी गांड को पकड़ आपस में मिला दी जिससे मेरा लंड उसके मुँह में समा गया. लंड गले के अन्दर जाने के कारण कुसुम को साँस लेने में दिक्कत आई और लंड को मुँह से निकाल कर खांसने लगी.

 लाली हँसते हुए बोली, “सुनती नहीं है मेरी बात! प्यार से चूस, तो तुझे भी मज़ा आएगा और तेरे मरद को भी.”

 बाहर बारिश की रफ़्तार थोड़ी धीमी हो गयी थी. कुसुम की झिझक थोड़ी कम हुई और वह खुद मेरे लंड को मुँह में डाल चूसने लगी.

 लाली बोल पड़ी, “शाबाश बन्नो! साहब के अन्डो को भी सहलाते रह और कमर से पकड़ कर चूस” 

लाली दोनों पैर फैला कर कुसुम के पीछे बैठ गयी और उसकी गर्दन को चुमते हुए उसकी मम्मो को दबाने लगी. अब कुसुम के हलक से हल्की “गुर्राहट” की आवाज निकल रही थी.

 मैं उसको माथे के पीछे से पकड़ हल्के हल्के लंड को आगे-पीछे करने लगा. लाली मेरी ओर देख बड़ी कामुकता से मुस्कुरा रही थी. जो अब एक हाथ से कुसुम की स्तनों को मसल रही थी और दूसरी से उसकी झांटो से भरी चूत को. 



मेरा लंड अब अपने पुरे आकार में आ चूका था. मैंने कुसुम के मुँह से लंड निकाला और बांहों में उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया.

 लाली उठ खड़ी हुई, मेरे लंड को पकड़ कर बोली, “साहब तुम सब मज़ा करो, मैं जाती हूँ अब” 

मैं हैरानी से उसको देख बोला, “लेकिन आज रात तो हमदोनो का होने वाला था?”

 लाली मेरी कान में फुसफुसाते हुए बोली, “हमको जो मज़ा लेना था सो हमने ले लिया. वैसे भी आज मेरी मुनिया साफ़ नहीं है. तुम अपने लौड़े से कुसुम की सेवा करो. हमारी सेवा का मौका फिर कभी मिलेगा.” फिर मेरे लंड को एक बार जोर से दबाकर हँसते हुए बाहर निकल गयी.

  



कुछ देर बाहर देखने के बाद वापस कुसुम को देखा तो उसकी नज़रों में प्यास साफ़ झलक रही थी. लाली की नहीं तो कुसुम की चूत ही सही! कुसुम टांगो को हल्का फैलाकर लेटी हुई थी. लेटने के कारण उसकी बड़ी-बड़ी चूचियां ढलक गयी थी. उसकी आँखों में थोड़ा शर्म, थोड़ा प्यार था मेरे लिए. मैं  उसको एक तक देखते रहा जबतक की वह खुद मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपने ऊपर खींच नहीं ली. धीरे से अपने ऊपर खींचने के बाद उसने मेरे  होंठो को अपने होंठो पर लगा लिया और बेतहाशा चूसने लगी. मैं भी खुलकर उसका साथ देने लगा और दोनों हाथों से उसकी चुचियों का मर्दन करने लगा. 




मेरा लंड कुसुम की जांघों के बीच फंसा था जो उसकी चूत से बहती पानी से गीली हो रही थी. लगभग पांच मिनट लम्बे चुम्बन को तोड़ते हुए कुसुम मेरी आँखों में झांकते हुए बोली, “साहबजी, आप बहुत सही से चुम्मी लेते हो. देखो, मैं तो आपकी चुम्मी से ही झड़ गयी. अब अपना लौड़ा डाल भी दो.”

 मैं अपना दांया हाथ उसकी झांटो से भरी चूत के मुहाने पर ले गया जो पहले से गीली हो चुकी थी, लेकिन झांटो के कारण चूत की मुँह का पता नहीं लगा पाया. 

मैं हँसते हुए कुसुम को बोला, “कुसुम रानी, अपनी सबसे प्यारी जगह हो साफ़ रखा करो. मेरे लौड़े को पता ही नहीं चल रहा है कि कहाँ डेरा डालना है!” 

मेरी बातों से कुसुम शरमाते हुए धीमी आवाज में बोली, “जी साहब!”

 तब तक मुझे चूत की मुँह का ठिकाना मिल गया, मैं अंगूठे से उसकी चूत की दीवारों को मथने लगा. कुसुम की आँखें बंद हो गयी और मुँह खुल गया.



मैं कुसुम की खुली होंठो को फिर से चूमना चुसना शुरू किया और उसके साथ-साथ उसकी चूत को अंगूठे से पिसना. कुसुम शायद सिसकना चाहती थी लेकिन उसकी सिसकारी मेरे मुँह में दबकर रह गयी. अब मैं बड़ी बेदर्दी से उसकी चूत की दीवारों को रगड़ रहा था और साथ ही साथ भगनासे को भी छेड़ रहा था.

 कुसुम मेरे नीचे तड़प रही थी. आखिर मैं जब उससे रहा नहीं गया तो हाथों से मुझे रोक दी. मैं उसकी मुँह से हट गया तो वह जोर जोर से साँस लेने लगी. थोड़ा वक़्त लगा उसको सामान्य होने में. मैं समझ गया कि काफी दिनों के बाद इसकी मारी जा रही है.

 कुसुम की आँखें अधखुली थी. मैं उसकी मम्मो को धीरे धीरे सहलाना दबाना चालू किया. कुसुम की मुँह से “हम्म्म्म.... आअह्ह्ह्ह... ह्म्म्म....” की आवाजे आ रही थी. अब और देर ना करते हुए मैंने लंड के सुपाड़े को चूत की मुँह पर टिकाया और बहुत सावधानी के साथ हल्का सा धक्का लगाया जैसे कि मैं किसी अनछुई चूत मार रहा हूँ

. चुदाई के अभाव में कुसुम की चूत वाकई किसी कुंवारी की चूत जैसी तंग लग रही थी. लंड का सिर्फ सुपाड़ा की अन्दर गया और ऐसा लगा की और अन्दर नहीं जायेगा. मैं उसकी कमर को कसकर पकड़ा और जोर से एक धक्का मार दिया. चूत की दिवार को फाड़ते हुए आधा लंड अन्दर फंस गया. इसके साथ-साथ कुसुम की मासूम चीख़ निकल गयी. मैं बड़ी मुश्किल से उसकी जुबान बंद किया. लेकिन फिर भी वह “गों...गों...” की आवाज़ कर रही थी.

 कुछ सेकंड रुकने के बाद मैं दोबारा ज़ोरदार धक्का मारा और पूरा का पूरा लंड अन्दर चला गया. धक्का इतना ज़ोरदार था कि बिस्तर की चरचराहट निकल गयी और हमदोनो के कमर-पेट आपस में गूँथ गये. लेकिन इसबार मैंने कुसुम की होंठो को अपने होंठो से सील कर दिया था, जिससे वह चीख़ नहीं पायी. शायद इतने दिनों बाद चुदने के कारण उसको  काफी दर्द हुआ, जिससे उसकी आँखों में आंसू आ गये. 

मैं बिना किसी हरकत के कुछ देर उसकी चुचिओं को सहलाते हुए चूमता रहा ताकि दर्द का एहसास कम हो जाये. धीरे से उसकी कान में पूछा, “कुसुम रानी, तुम ठीक हो ना?” 

वह सिर्फ हाँ में सर हिलाई. 

अब मैं धीरे-धीरे कमर हो आगे-पीछे करने लगा. मेरा लंड अब कुसुम की चूत में अपनी पहचान बना चूका था और आसानी से हरकत करने लगा. कुसुम की होंठो को छोड़ मैं उसकी चुचियों को चूसने लगा और उसकी चूत मारना शुरू किया. बीच-बीच में कुसुम की सिसकारी निकल रही थी लेकिन धीमी आवाज में. कुसुम की बेचैनी बढ़ने लगी. उसकी सिसकारी भी तेज़ हो गयी. मेरे सर को अपने छाती पर दबा दी और मेरे बालों को सहलाने लगी. मैं जब-जब उसकी चुचियों को काट देता तो उसकी सिसकारी चीख़ में बदल जाती. अब मैंने चोदने की रफ़्तार तेज़ कर दी. कुसुम की चीख़ भरी सिसकारी वीरान रात में गूंजने लगी. मैं भी किसी सांड की तरह हांफते हुए उसको बेरहमी से चोद रहा था.

 कुसुम का बदन बिन-पानी मछली की भांति तड़प रहा था. अचानक उसका शरीर ऐंठ गया और बुरी तरह कांपने लगा, फिर शांत हो गया. मेरे लंड पर रस की बारिश कर वह तो झड़ गयी लेकिन मेरा अभी तक खड़ा था. कुछ और धक्को के बाद मैं उसकी चूत में झड़ गया और उसके उपर निढाल हो गया. कुसुम का बदन बिल्कुल शांत था जैसे की उसमे जान ही नहीं हो. मैं उसको तंग करना ठीक नहीं समझा और उसकी ओर करवट ले सो गया. थकान और मस्त चुदाई के कारण जल्द ही गहरी नींद में चला गया.  



















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