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Sunday, August 30, 2015

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--193

  FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--193




 और कहाँ गयी ,…………………… रीत
 
जब यह कहानी बनारस से आजमगढ़ की ओर मुड़ी थी , आनंद ने गुड्डी के साथ विदा ली , उस समय किसी मेरे मित्र ने कहा , अब कहानी में कैसे रहेगी ,और तभी मैंने वायदा किया था , उनसे ज्यादा खुद से और रीत से ,जब तक यह कहानी चलेगी ,रीत उसमें रहेगी। और जब रीत नहीं रह पायेगी ,तो मैं इस कहानी के उड़ते ,बिखरे पन्नो को समेट कर , टाटा बाई बाई कर लूंगी।

लेकिन यह सवाल तो रहेगा ही , पाठकों को बताना ही पड़ेगा हुआ क्या रीत का ,

इतना तो हम सब को याद ही है की रीत -करन पर हजीरा में हुए हमले के बाद आई बी ने सारा प्रोग्राम चेंज कर दिया। उन्हें एक हेलीकाप्टर से बड़ौदा ले आया गया और उसके बाद ,वहां से एयरफोर्स के स्पेशल प्लेन से ,

फिर ,

बताती हूँ ,बताती हूँ।


करन को भी नहीं मालूम था प्लेन कहाँ लैंड करेगा , और शायद पायलट को भी नहीं। क्योंकि २-३ बार लास्ट मिनट इंस्ट्रक्शंस चेंज हुए। रीत तो खैर पूरी तरह डेज्ड थी।

८. ३० ,९. ०० बजे के आसपास , प्लेन पंजाब की किसी छोटी सी एयरफील्ड पर उतरा और वहां तुरंत उन लोगों को एक अम्बुलन्स में पीछे लिटा दिया गया और इंस्ट्रक्शन तेह की वो लेटे ही रहेंगे। एम्बुलेंस की सारी खिड़कियों पर काली स्क्रीन और मोटे परदे लगे थे। ड्राइवर ने भी रास्ते में उन लोगों से कोई बात नहीं की।

एक घंटे की ड्राइव के बाद गाडी खड़ी कर दी , और उतर कर चला गया।

कुछ देर बाद करन के फोन पर मेसेज आया की अब वो दोनों बाहर निकल सकते हैं।

ये एक फार्म हाउस था जिसके चारों ओर ऊँची ऊँची दीवारें थीं।

यह वह सेफ हाउस था जो अगले ४ महीने तक उन का घर रहा।


दोनों की प्लासिटक सर्जरी की गयी , रीत की थोड़ी कम , करन की थोड़ी ज्यादा।

रीत ने भूरे कांटैक्ट लेंस पहनने की प्रैक्टिस की।

और उस के साथ ही लैंग्वेज , लोकल कल्चर का कोर्स।

दोनों को पंजाब में लोकेट किया गया था , और ६ महीनो के अंदर रीत पक्की पंजाबी कुड़ी बन गयी।

नव रीत देवल।

और करन होगया शुभ करन।

दोनों को चाल ढाल ,बात करने का अंदाज सब कुछ बदलना पड़ा। रीत ने ५ किलो वजन भी बढ़ाया।


मोहाली के पास के एक कसबे में , जो उस फार्म हाउस से बहुत दूर नहीं था ,रीत ने कालेज में एडमिशन लिया।

करन को पास के एक बैकं में नौकरी मिली , लेकिन रीत के कालेज में उसने भी इवनिंग मैनेजमेंट कोर्स के लिए उसने एडमिशन लिया और इससे दोनों को मिलन का मौका मिलता था।

दोनों बनारस या पहले के किसी भी परिचित से बात नहीं कर सकते थे , हिंदी बोलने की मनाही थी।

आई बी के कई लोग उन दोनों पर नजर रखते थे , और इससे ज्यादा इस बात पे की उनपर कोई नजर तो नहीं रख रहा है।

एक साल के बाद ये मान लिया गया की उनका 'रिलोकेशन ' परफेक्ट होगया है। 

रीत : नव रीत देवल


आई बी वालों एक पक्की पर्सनैलिटी उसके लिए गढ़ दी थी , डॉक्युमेंट्स , बैकग्राउंड ,फिजकल अपीयरेंस ,

लेकिन मन में उमड़ती घुमड़ती यादों का क्या करे।

अक्सर वह हँसते हँसते उदास हो जाती थी , कोई लाख पूछे बोल भी नहीं सकती थी, अतीत की दरवाजे खिड़कियां तो छोड़िये , रोशनदान तक खोलना मुश्किल था।



अब वह पूरी तरह आई बी की हो चुकी थी ,और करन रॉ का।



गुड्डी की शादी में रीत नहीं आई।


गुड्डी को मालूम भी था वो नहीं आ पाएगी।

सुहाग के लाल जोड़े में सजी वो गुमसुम बैठी थी , और जब वह मंडप में जाने के लिए उठने ही वाली थी , किसी ने फोन पकड़ा दिया।


रीत का फोन ,

बहुत देर तक दोनों फोन पकड़े रहीं।

बातें कुछ भी नहीं हुईं।

लेकिन दोनों रोयीं बहुत। 
 
सुखिया सब संसार है , खाए और सोये।

दुखिया दास कबीर है ,जागे और रोये।
 
टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा
उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है
पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा

यह रक्तपात अब कब समाप्त होना है
यह अजब युद्ध है नहीं किसी की भी जय
दोनों पक्षों को खोना ही खोना है

अन्धों से शोभित था युग का सिंहासन
दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा
दोनों ही पक्षों में जीता अन्धापन

भय का अन्धापन, ममता का अन्धापन
अधिकारों का अन्धापन जीत गया

जो कुछ सुन्दर था, शुभ था, कोमलतम था
वह हार गया....द्वापर युग बीत गया
 


 समाप्त




FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--192

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   फागुन के दिन चार--192


 गुड्डी


भाभी तभी आ पहुंची और पहुंचते ही मुझे डांट पड़ी और गुड्डी की तारीफ।

' किचेन में क्या कर रहे हो , डिस्टर्ब कर रहे होगे उसको ,तुम भी न '

उन्होंने ऊँगली से ही थोड़ी सी तहरी चखी और फिर गुड्डी की तारीफ पे तारीफ ,


फिर वो काम की बात पे आयीं। हम लोग खाना खा लें और जब जाने वाले हों तो उन्हें आवाज देके बुला ले। वो और भैया दोपहर को ही खायंगे।


मैं गुड्डी को घूर के देख रहां था और वो मुस्करा रही थी।

भाभी ऊपर गयीं और रंजी अंदर आई।
" आज चलो तुम महारानी की तरह बैठो , हम दोनों लोग तुम्हे सर्व करेंगे " और पकड़ कर जबरदस्ती गुड्डी को डाइनिंग टेबल पे बिठा दिया।

किचेन में घुसते ही उसने परेशान होके , फुसफुसा के पूछा ,

" कैसी है , कुछ दवा "

और बिना बोले मैंने स्मार्ट फोन से खींची उसकी फोटो रंजी के सामने रख दी।

रंजी चेहरा राख हो गया।

" डाक्टर को दिखाया था ,उसने चेक भी किया। बैंडेज टाइम पे लग गयी थी इसलिए , .... लेकिन अभी भी ,.... चलते हुए किसी हॉस्पिटल में दो इंजेक्शन लगवाने होंगे। दर्द उसको है। डाक्टर ने दायें हाथ से शाम तक कुछ भी करने से मना किया है। शायद हल्का सा स्कार रह जाए , लेकिन उसकी भी क्रीम लगाने से १०-१५ दिन में चला जाएगा। हिम्मत है उसमें। "

रंजी ने बिना बोले सर हिलाया , जैसे कह रही हो मुझसे कह रहे हो , तुमसे कम मैं नहीं जानती उसको।

बिना बोले हम दोनों ने टेबल लगाई।
और जैसे ही गुड्डी ने खाने के लिए हाथ बढ़ाया , रंजी ने झपट के उसे रोक दिया ,

" ये ६ फिट का मर्द तुझे दिया है तो क्या इसी लिए " और मुझे डाँट पड़ गयी
' चल अपने हाथ से खिला इसे '
और मैंने जैसे ही चम्मच उठायी , गुड्डी ने जिद्दी बच्चों की तरह दायें बाएं जोर जोर से सर हिलाया , नहीं नहीं की मुद्रा में और बोला उसके वकील रंजी ने।

तुझे इतना मालूम नहीं , तहरी चम्मच से नहीं हाथ से खायी जाती है , चल हाथ से खिला।

गरम बहुत हैं मैंने कहने की कोशिश की लेकिन उसके साथ ही रंजी ने हल भी बता दिया , अरे चल बनारस में बर्नाल लगवा दूंगीं।

और मैंने हाथ से जैसे खिलाया , गुड्डी रंजी दोनों ही मुस्कराने लगी , आज गुड्डी की ओर से सारे तीर रंजी चला रही थी।

" कोहबर में क्या चम्मच से खिलाओगे उसको , वहां तो आगे बढ़के , सास साली सलहज होंगी न यहाँ बिचारी अकेली है न। ये कत्तई अकेली नहीं है मैं हूँ न इसके साथ। "

रंजी और मैं दोनों माहौल को नार्मल बनाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन तूफान हम दोनों के मन से गुजर रहा था।


और कितना खतरा उठाया था गुड्डी ने , ये सिर्फ मैं जानता था।

अगर वह चाकू सिर्फ दो ढाई इंच और ,.... सीधे छाती में पैबस्त होता और फिर ,…सोचना भी असंभव था।

किस्मत थी की ग्लाक के रिक्वॉयल ने गुड्डी को तेजी से झटक दिया , फिर अँधेरा भी इतना ज्यादा था। असली बात थी , काशी के कोतवाल उसकी रक्षा कर रहे थे। और उसके बाद ,… कोई नर्व्स डैमेज्ड नहीं हुयी थी। लेकिन जो चोट थी दर्द भयानक हुआ होगा .



चल खुसरो घर आपने




किस्मत थी की ग्लाक के रिक्वॉयल ने गुड्डी को तेजी से झटक दिया , फिर अँधेरा भी इतना ज्यादा था। असली बात थी , काशी के कोतवाल उसकी रक्षा कर रहे थे। और उसके बाद ,… कोई नर्व्स डैमेज्ड नहीं हुयी थी। लेकिन जो चोट थी दर्द भयानक हुआ होगा .

गुड्डी ने इशारा किया और जल्दी जल्दी खिलाऊँ ,

मेरी उंगलिया उसके मुंह में थी की भाभी नीचे आ गयीं और उन्होंने देख लिया , मुस्कराहट आँचल में छिपाते गुड्डी से पुछा ,

' काटा की नहीं '

और जैसे अपनी होनेवाली जेठानी की आज्ञा मानना उसका परम धर्म हो , कचकचा के उसने मेरी उँगलियाँ काट लिया।

मैं चीखा।भाभी और रंजी जोर से हंस पड़े।

भाभी पूजा वाले कमरे में गयीं और वहीँ से मुझे और गुड्डी को बुला लिया।
सारे देवी देवताओं के सामने , वो खड़ी हो के पूजा कर रही थीं और मुझे और गुड्डी अपने बगल ठीक ऐसे खड़ा कर दिया , जैसे गाँठ जोड़ के खड़े हों।

हम लोगों से सर झुकवाया ,साथ साथ।
और पूजा की अलमारी से ही एक डिब्बा निकाला ,एक बड़ी पुरानी मटरमाला , खूब भारी। उसे अपने हाथ से उन्होंने गुड्डी को पहना दिया और सर पे सहलाते हुए बोला , ये इनकी दादी की निशानी है , जब मैं इस घर में आई थी तो मुझे मुंह दिखाई में दिया था। खूब खुश रहो। "

बाहर निकल के उन्होंने रंजी से पूछा , गाडी आई की नहीं , तो वो बोली

' कब की आ गयी और मैंने सारे सामान भी रख दिए "

चलने के पहले रंजी एक मेसज खोल कर बार बार देख रही थी ,मैंने और गुड्डी ने भी झाँक कर देखा।

वह गुड्डी के साथ ज्यादा देर नहीं रह पाएगी। एजेंसी का मेसज था , बनारस में दो दिन बाद ही उसे होटल ताज में रिपोर्ट करना था , जहाँ उसका बूट कैम्प था।

गुड्डी के पूछने के पहले ही वो बोल पड़ी
, 'लेकिन घबड़ाओ मत दो दिन तो अभी रहूंगी तुम्हारे साथ और उसके अलावा रंगपंचमी में भी , एक रात पहले ही आ जाउंगी।फिर रंगपंचमी का दिन रात , तेरे हवाले। '

करन का मेसेज भी जस्ट आया था उसके और रीत बारे में लेकिन मैंने सोचा बनारस पहुँच कर ही गुड्डी और दूबे भाभी दोनों को बताऊंगा। अभी मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी।

तब तक भाभी किचेन से निकल कर आयीं और हम लोग बाहर बरामदे में आ गए।
गुड्डी भाभी का पैर छूने के लिए झुकी लेकिन भाभी ने पकड़ के उठा लिया और अंकवार में भेंट लिया , खूब जोर से और उसके कान में बोली,

" बच्ची की तरह जा रही हो , दुल्हिन बन कर लौटोगी , और तब परछन कर उतारूंगी ".

पांच फूल लौंग भाभी ने गुड्डी के चारो ओर उतार कर के पीछे फ़ेंक दिए ,

मैंने गुड्डी का बायां हाथ पकड़ कर सम्हाल कर कार में बैठाया , और दूसरी ओर से रंजी। वो बीच में।


भाभी अशीष रही थीं ,

' कासी क कोतवाल , लहुराबीर वाले बीर बाबा , बड़ादेव क बड़देव बाबा , काली माई क चौरा क माई , रास्ते क देवता पित्तर , रच्छा करिहा इन लोगन क।

जब हम लोगों की टैक्सी मुड़ी , भाभी तब भी बरामदे में खड़ी अशीष रही थीं


और दो ढाई साल बाद ,....






.


.


रंजी



पैडर रोड के फ्लाईओवर से उतरते हुए , या बांद्रा सी लिंक से मुड़ने पर या फिर जब आप अँधेरी से इंटनेशनल एयर पोर्ट की ओर जाएंगे , तो बड़ी बड़ी होर्डिंग्स , खूब इल्युमिनिटेड , औरउनपर मशहूर , स्किनी जींस में लपटी दो लम्बी खूबसूरत टाँगे ,गाड़ियों की रफ्तार थोड़ी कम कर देती हैं।


जींन्स का नाम बताना तो गलत होगा , लेकिन उनके अंदर जो दिलफरेब टाँगे थी , वो रंजी की थीं।


और सिर्फ इन महंगी होर्डिंग्स पर ही नहीं , चमकते दमकते मॉल्स में उन जींस के जो स्टोर थे उनके बाहर भी , रंजी की आदमकद तस्वीर , खैर मकदम करती नजर आती थी। और इन टांगो पर चलकर रंजी काफी दूर चली आई थी।

लेकिन उन महंगे , स्किनी अल्ट्रा लो राइज जींस और टॉप के पीछे वही पारे की तरह चुलबुली , ताज़ी हवा की तरह , वही रंजी ही थी।

जिस जीन्स कंपनी के साथ उसने शुरुआत की थी , उसने तो बनारस की शूटिंग के बाद ही उसका कांट्रैक्ट एक साल के पक्का कर दिया। अप्रैल में उसकी एक और शूट कोडाइकनाल में हुयी। और फिर उसकी एक महीने की छुट्टी मिली , १२ मई से। और सारे मॉडलिंग विज्ञापन , २१ जून को लांच होना था। इसलिए जब वो गुड्डी की शादी में थी तो उसके ऐड्स , कहीं छपे नही थे।

लेकिन एक बार कैम्पेन लांच होने के बाद उसने मुड़ के नहीं देखा। १५ % मार्केट पेन्ट्रेशन और २७ % विजिबिलिटी , के बाद छ महीने के अंदर ही कांट्रैक्ट का पीरियड बढ़ के दो साल हो गया और शर्तें भी कुछ मुलायम हो गयीं।


और फिर वो मुम्बई चली आई।


अपरैल के साथ कॉस्मेटिक्स ,हेयर केयर ऐसे सिग्मेंट में भी उसने एंट्री ले ली। एक मल्टीनेशनल कम्पनी ने उससे एक्सक्ल्यसिव कांट्रेक्ट नेल्स और लिपस्टिक के लिए कर लिया।

लेकिन फैशन इंडस्ट्री बहुत ही क्लोज सर्किल है और यहाँ घुसपैठ करना मुश्किल भी है और समझौते की मांग करता है , जिसे करने से रंजी को मंजूर नहीं था , इसलिए स्ट्रगलकुछ ज्यादा पड़ा।


लेकिन क्योंकि शुरुआत उसने एक मल्टीनेशनल कम्पनी के ब्रांड के साथ की थी इसका उसे फायदा भी हुआ। और सबसे बड़ी उसकी किस्मत चमकी , जब उसे फ्लोरेंस फैशन वीक में एक ब्रेक मिल गया। लेकिन वो बात कुछ आगे।

मुम्बई में लोखंडवाला में एक उसने दो बी एच के फ्लैट लिया था और वहां उसके साथ रहने के लिए एक कोई आगया।

गलत मत समझिए , वो मीनल थी , जिसे थियेटर का भी शौक था और फाइन आर्ट्स से तो उसने पढ़ाई ही की थी। और अब बड़ौदा से मुम्बई पहुँच गयी थी।

थोड़ा बहुत पेंटिंग भी वो कर लेती थी और वहीँ से वो शौक लगा रंजी को भी। कुछ ही दिनों में एक कमरा स्टूडियो में तब्दील हो गया और बेड रूम मीनल , रंजी कॉमन होगया।

और महीने में १०-१२ दिन जब रंजी फोटो शूट से फ्री होती थी तो वो मीनल के साथ कभी पृथ्वी थियेटर, कभी एन सीपीए तो कभी जहांगीर आर्ट गैलरी में।

और रंजी जो कभी सोच भी नहीं सकती थी वो एकदिन हो गया।

उसकी भी ८ पेंटिंग कुछ और आर्टिस्ट्स के साथ जहांगीर आर्ट गैलरी में लगी।

उसकी इंक और पेन स्केचेज जो कुछ तो बॉम्बे की स्ट्रीट लाइफ के बारे में थे ,कुछ बेहरामपाड़ा की , बांद्रा के पास की एक बस्ती जहाँ मीनल कुछ एन जी ओ , मज़लिस और आगाज के साथ काम करती थी।

और एक इतालवी दर्शक को वो पेंटिंग्स बहुत पसंद आ गयीं और फिर वो और रंजी बाद में समोवार में बैठ कर गप्प मारते रहे ,अचानक उसने पूछाः की आप माडिलिंग में क्यों नहीं काम करती , लेकिन रंजी फिस्स से मुस्करा के रह दी। उसे विक्टोरियन गोथिक में भी बहुत दिलचस्पी थी और रंजी को भी हेरिटेज वाक में और रंजी ने उसे न सिर्फ साउथ बॉम्बे में घुमाया बल्कि उसे राजाबाई टावर के ऊपर तक ले गयी और दोनों ने सेल्फी भी खींची। पर रास्ते में एक बुक शाप में एक फॉरेन मैगजीन में लोरियल के विज्ञापन में उसे रंजी दिख गयी , वो कुछ बोला नहीं बस मुस्करा दिया।


और अपने पत्ते उसने टावर के उपर खोले ,वो फ्लोरेंस और मिलान के फैशन शो से जुड़ा हुआ था न उसने सिर्फ रंजी को इन्वाइट किया , बल्कि १५ दिन बाद एक फैशन कैटलॉग में रंजी की फोटो आगयी और साथ ही १२ दिन का एक ऑफर भी टिकट के साथ दोनों फैशन फेस्टिवल के लिए मिल गया।

और उसके बाद रंजी ने मुड के नहीं देखा। १२ दिन के बाद फिर वहां से जेनेवा, और पेरिस, जहाँ वह जिस कॉस्मेटिक कंपनी के लिए काम करती थी उसने एक शूट के लिए ऑफर दिया था। और वहीँ एक फेमस फैशन डिजाइनर जो बहुत रिक्लयूज थे उनसे मुलाकात हो गयी और अपनी एक लाइन के लिए उन्होंने चुन लिया।


फिर क्या था जैसे कहते हैं आग लगा दी बस वही।

उसी के आस पास उस ने स्पोर्ट्स वियर में भी काम करना शुरू कर दिया था। वह खुद एथलेटिक थी और पिछले मुम्बई मैराथन में उसने और मीनल ने हाफ मैराथन में बहुत अच्छी टाइमिंग की थी और अबकी दोनों फुल मैराथन की तैयारी कर रही थीं और हाफ मैराथन में ही उसे दो स्पोर्ट्स कम्पनीज ने स्पांसर कर दिया था। \\

और इन्ही में से एक के कॉन्टैक्ट्स से पेरिस में वो स्पोर्ट्स इलेस्ट्रेटेड के शूट में भी शामिल हुयी। आने वाले ऐनुअल इशू में वो कवर पर तो नहीं थी न लेकिन मैगजीन में उसे जगह मिल गयी थी।

इनर वियर में भी वो सिर्फ टीन सिग्मेंट में काम करती थी , और वो भी कुछ हाई एंड ब्रांड्स के साथ , जो एक्सक्ल्यूिसव शो रूम में थे।


टीवी पर भी उस के कॉस्मेटिक के ऐड्स ज्यादार इंग्लिश वाले चॅनेल्स पर वो भी लाइफस्टाइल वालों पर आते थे।


इस एक्स्क्लूसिविटी का उसे फायदा था , वो शहर में आराम से घूम फिर सकती थी और उसे पहचानने वाले कम थे। हाई एंड के चक्कर में नेट्वर्किंग,जो मॉडलिंग की दुनिया में बहुत जरूरी है ,भी उसकी बहुत लिमिटेड थी और वो भी सोबो या बांद्रा तक। और हाई एंड होने के कारण कम काम में भी उसे काफी मिल जाता था।


मुम्बई में भी कोई भी आये स्ट्रगल बहुत होती है लेकिन उसमें उसे दो लोगों से बहुत हेल्प मिली , एक तो एन पी ( नो प्राबलम सर ) से जिसने उसके मुम्बई पहुंचते ही लोकल गार्जियन बनने का जिम्मा ले लिया था , मकान से लेकर हर मामले में और दूसरे ए टी एस के चीफ जो अब प्रमोट होकर एक गलियारे में कर दिए गए थे डी जी हाउसिंग के तौर पर लेकिन मुम्बई पुलिस के हर सेक्शन में उनकी अभी भी बहोत इज्जत थी।


जैसे फैंटम का एक स्वस्तिक का निशान जहाँ लगा होता था वो फैंटम के प्रोटेक्शन में होता था और रंजी के दरवाजे पर तो दो दो स्वस्तिक के निशान लगे थे। उस के साथ महीने में एक एक बार डिनर के लिए रंजी और मीनल का वहां जाना कम्पलसरी था। उसके साथ मुम्बई छोड़ते समय रंजी दोनों लोगों को बता के ही जाती थी।

मीनल और रंजी दोनों , अगर रंजी का शूट नहीं है तो वो मीनल के साथ होगी किसी प्ले का रिहर्सल वाच करती और अगर मीनल फ्री होगी तो रंजी के शूट पर होगी।


लेकिन रंजी की अभी मुम्बई की बारिश से दोस्ती नहीं हो पायी है। और उस समय काम भी कुछ ज्यादा नहीं होता वहां , इसलिए १०-१२ वो बाहर घूमने निकल जाती है और २० -२५ दिन गुड्डी के पास। अगर आनंद बाबू कहीं बिजी भी होते तो दोनों कम से कम १५ दिन के लिए गुड्डी के गाँव , जहाँ न उसके एइड्स दिखते न होर्डिंग और वो सिर्फ गुड्डी बिन्नो की ननद रहती। झूला , अमराई ,कजरी , मेंहदी और ,छेड़छाड़ और ,… फुल टाइम मस्ती।



गुड्डी और आनंद बाबू





आनंद बाबू का प्रमोशन हो गया था कुछ महीने पहले और वो वहीँ बनारस में सिटी एस पी बन गए थे। वह दनदनाते हुए अपनी कप्तानी कर रहे थे। जनता में उनकी इज्जत थी और गुंडों में दहशत।

ढाई साल से बम क्या कोई पटाखा भी नहीं फूटा था शहर में। वह आफिस में कम नजर आते थे और सड़को पर ज्यादा. बात कम करते थे और मारते थे ज्यादा। शहर में सारे बदमाशों की सिट्टी पिट्टी गुम थी।

लेकिन आनंद बाबू की भी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती थी दो जगह , एक तो औरंगाबाद के एक मकान में और दूसरे बी एच यू के महिला कालेज में। महिला कालेज में गुड्डी पढ़ती थी अब , और वहां की उसकी सारी सहेलियों के आगे उनकी जुबान बंद हो जाती थी और उससे भी बुरी हालत थी उनकी ससुराल की। औरंगाबाद में सास और दो छोटी सालियां छुटकी और मझली ( जो अब इत्ती छोटी भी नहीं थी ) . शुरू में कुछ दिन तो शादी के बाद जब तक आनंद की ट्रेनिंग चली , वो कई महीने वहीँ रहे , लेकिन पोस्टिंग के बाद बड़ी मुश्किल से उन्हें इजाजत मिली सरकारी बंगले में शिफ्ट होने की , इस शर्त के साथ वो हर वीकेंड , और हर तीज त्यौहार वहीँ मनायेगें।

वैसे भी छुटकी मझली का स्कूल उन के घर के बगल में ही था तो कई बार वो सीधे स्कूल से छोटे कप्तान साहब के घर में ,

और वैसे भी औरंगाबाद वाले घर के अलावा उस घर पे भी पूरा हुक्म उनके सास का ही चलता था। और छोटे कप्तान साहब को भी आराम था वो 'आज खाने में क्या बनेगा ' और ' घर में कोई सब्जी नहीं है ' की चिखचीख से बचे रहते थे और अपना पूरा समय दुष्ट दमन के कार्यक्रम में देते थे।

बड़े माफिया टाइप गुंडे तो उन के आने के २-४ महीने में शहर क्या प्रदेश छोड़ कर चले गए थे जब उन्होंने एक हफ्ते के अंदर ,पांच माफिया ह्रदय सम्राट टाइप लोगों की इहलीला समाप्त कर दी ,और उस आपरेशन में सिर्फ सिद्द्की ही उनका राजदार था , और वो उन्होंने तब किया जब प्रदेश के मुख्यमंत्री ,१२ दिन के विदेश के दौरे पर गए थे और जिले के प्रभारी मंत्री अपनी पत्नी के साथ चारो धाम की यात्रा पर निकल गए थे , क्योंकि किसी नर्स के साथ उनका एमएमस और सीडी बनने की खबर अ रही थी और उसको विपक्ष अगले सत्र में बड़े धूमधाम के साथ सदन के पटल पर पेश करना चाहता था। लेकिन आनंद बाबू ने न सिर्फ वह सीडी जब्त कर उनको अपने दूत के द्वारा प्रेषित कर दी , बल्कि एम एम एस और सीडी को समूल नष्ट कर दिया और बनाने वाली की भी चार पांच एम एम एस पकड़ ली।


पिछले गणत्रंत्र दिवस पर उन्हें राष्ट्रपति का पुलिस मेडल भी मिला।

लेकिन यह बहुत कुछ उनके उस कंट्रीब्यूशन का नतीजा था जिसमें आतकंवादी हमले की बखिया उधेड़ी गयी थी। वह एक कवर्ट आपरेशन था इसलिए इसके लिए तो उन्हें अवार्ड मिल नहीं सकता था , हाँ होम मिनिस्ट्री की रिकमंडेशन बहुत स्ट्रांग थी इसलिए जो पुलिस मेडल दस बारह साल के बाद मिलता वो इनको एक संक्षिप्त सेवा के बाद ही मिलगया।

लेकिन होम मिनिस्ट्री ने एक काम किया जो ज्यादा अच्छा था , उन्हें सपत्नीक , अक्टूबर में तीन हफ्ते की ट्रेनिंग के लिए स्विट्जलैंड भेज दिया गया। जो हनीमून ज्यादा था।

 हां तो जहाँ कहानी छोड़ी थी उसके बाद के महत्वपपूर्ण पायदान , … रंगपंचमी में वो बनारस नहीं रह पाये क्योंकि उस के पहले वाली शाम को अचानक उन्हें दिल्ली बुला लिया गया। लेकिन उसके पहले दो दिन पूरे उन्होंने रंजी और गुड्डी के साथ बनारस में बिताये। हाँ रंगपंचमी की मस्ती बनारस में कुछ कम नहीं हुयी क्योंकि रंजी थी न वहां , रंगपंचमी केएक दिन पहले वो आगयी थी गुड्डी के घर और उस रात , रंगपंचमी के दिन।

भाभी का फरमान आया और वो अप्रैल में फिर पेश हुए बनारस में , और बनारसी स्टाइल में इंगेजमेंट भी हुआ। दो दिन के लिए आये लेकिन गए साढ़े तीन दिन बाद।

१७ मई को वो फील्ड ट्रेनिंग के लिए बनारस आ गए और फिर दो दिन बाद वो अपने शहर और गुड्डी अपने गाँव , शादी की ढेर सारी रस्में , टिपकल देहात गाँव की लेकिन भाभी का हुकुम तो , बारात २५ मई की सुबह ही रवाना हो गयी , और दोपहर का खाना सीधे गुड्डी के गाँव में , बारात वहीँ रुकी आम के बड़े और गझिन बाग़ में। लेकिन जैसा की पहले कहानी में बार बार शीला भाभी ने , गुड्डी ने संकेत दिया था की आनंद जी के मायकेवालियों के साथ क्या होनेवाला है , कोहबर में क्या होनेवाला है ,वैसा कुछ भी नहीं हुआ।






उससे बहुत बहुत ज्यादा हुआ , लेकिन सबने खुल कर मजा लिया।


२७ मई को बारात लौटी और रात को , जो होता है वो सब हुआ।


जून के खत्म होने के पहले गुड्डी अपने मायके ,उसका कालेज खुलने वाला था ,और आनदं जी की फील्ड ट्रेनिंग इसलिए वो भी बनारस।


देश की आबादी ,खासतौर से बनारस की वैसे ही पहले से काफी बढ़ी हुयी है , इसलिए न तो उसकी जल्दी गुड्डी को थी और न आनंद को। अभी पांच साल का इंटरवल प्लान हुआ था उसके बाद ही उसपर कोई फाइनल डिसीजन होता। बनारस में ही पोस्टिंग होने से गुड्डी की पढ़ाई भी डिस्टर्ब नही हुयी न आनंद से दूर रहना पड़ा। और अगर कभी वो दो तीन घंटे के लिए भी कभी अपने मायके गयी या किसी सहेली के यहाँ ,तीन घंटा पूरा होने के पहले आनंद वहां हाजिर। गुड्डी को देख कर लोग कहते ,पतंग आ गयी है , बस डोर पीछे पीछे आती होगी।

रंजी का फोन भी दूसरे तीसरे जरूर आता था। और साल में २०-२५ दिन के लिए वो गुड्डी के पास ही ,।

सब लोग खुश थे सिवाय गुंडों के। 


दास्तान तीन शहरों की


मुम्बई ,




ये कहानी जितनी इस कहानी के पात्रों की है उससे कहीं ज्यादा उन शहरों की भी है जिनके तन आतंक के घाव से छलनी हो चुके थे , लोग सुबह निकलते थे पर शाम की कोई गारंटी नहीं थी। कहीं भी ,… कुछ भी ,… तो चलिए शुरू करते हैं इस कहानी की आखिरी लड़ाई जहाँ हुयी , मुम्बई से।

मुम्बई , बम्बई या बॉम्बे। नाम शायद १९९६ में बदला लेकिन यह वह दशक था , जिसने बहुत कुछ बदल कर रख दिया , और सबसे बढ़ कर मुम्बई का एक कॉस्मोपॉलिटन चरित्र।

लेकिन चलिए शुरू से , मुम्बई या बंबई कोई बहुत पुराना शहर नहीं। जेराल्ड आँजियर जिन्हे सच्चे मायनों में मुम्बई के फाउंडर का नाम दिया जा सकता है जब यहाँ के गवर्नर बने (१६७२ -१६७५ ) तो यहाँ की अाबादी मात्र १०,००० थी जितने लोग आज शायद चार पांच लोकल ट्रेनों में समा जाते हों।

आँजियर की मृत्य के समय तक यह बढकर ८०,००० यानी आठ गुना बढ़ गयी। यहाँ से होने आमदनी उनके पहले २,८२३ ब्रिटिश पाउंड थी जो बढ़कर ९,२५४ पाउंड हो गयी। जादू जो उन्होंने चलाया वो था धार्मिक सहिष्णुता , और अच्छे प्रशासन की गारंटी। उन्होंने दावत दिया हर जाती ,धर्म के लोगों को बॉम्बे में आकर बसने के लिए और उन्हें बाकायदा गारंटी दी गयी को वह अपना रीत रिवाज , धर्म ,तौर तरीके फॉलो कर सकते हैं और इन नए बसने वालों पर एक लम्बे अरसे तक कोई टैक्स नहीं लगेगा।

फिर बॉम्बे ( उस समय के लिए बॉम्बे ही कहना ठीक होगा ) ने फिर मुड़ कर नहीं देखा।

सिर्फ हिन्दुस्तान ही नहीं हिन्दुस्तान से बाहर से आके बसे , कोई भी ऐसी जाति धर्म के लोग नहीं होंगे जिन्होंने इसको बढ़ाने में काम नहीं किया। बगदादी यहूदी , ( डेविड सासून ,जैकब सासून - सासून डॉक्स ,सासून लाइब्रेरी ,काला घोडा ),पारसी , ( जमशेद जी टाटा , सर जमशेद जी जीजाभाय ,रेडिमनी अनगिनत नाम है ), गुजराती व्यापारी ( प्रेमचंद रायचंद - राजबाई टावर , बॉम्बे शता एक्सचेंज के फाउंडर ) आर्मेनियन , दाउदी बोहरा, … और उसके बाद १९ शताब्दी के उत्तरार्ध में जब सर बार्टल फ्रेयरे ने फोर्ट की दीवालें तुड़वा दीं( १८६२) , तो एक बार फिर तेजी से उसका विकास हुआ। अगर आप कभी सी इस टी एम स्टेशन जो यूनेस्को का वर्ड हेरिटेज भी है , को देखें तो भित्ति मूर्तियों में गढ़ित ,तरह तरह की पगड़ियाँ इस बात का अहसास दिलातीं है की कितने तरह के लोग यहाँ आकर काम करते थे।

कांग्रेस,क्रिकेट ,सिनेमा , टेक्सटाइल्स इंडस्ट्री , ये सब १९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बॉम्बे से ही शुरू हुए। और उस का एक बहुत बड़ा कारण कॉस्मोपॉलिटन कल्चर है।

लेकिन शताब्दी का आखिरी दशक , हमेशा घातक रहा है मुंबई के लिए। उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी दशक में दंगे हुए १८९२ में और उसके कुछ दिन बाद १८९६ में प्लेग जिसमें हजारो लोग मरे. १८९१ में बॉम्बे की आबादी, ८,२०,००० थी और १९०१ में यह घटकर ,७,८०,००० रह गयी। यह पहला दशक था जब निगेटिव ग्रोथ हुयी। १९९२-९३ में दंगों की दहशत से मुम्बई जूझता रहा और इन दंगों में करीब २६५० लोग मरे ,और मुम्बई अभी उसके घावों से उबरी भी नहीं थी की बम्ब ब्लास्ट्स ने पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया। १३ बम के धमाके हुए १२ मार्च को जिसमें ३५० लोग मरे और हजार से ऊपर घायल हुए। और उसके बाद तो जैसे ग्रह लग गया हो , २००६ ,२००८।



अब बम्बई से बम का भय जाता रहा लेकिन इस लिए हो पाया की हर आम आदमी भी इस लड़ाई में जुड़ा।


ये लड़ाई दिखती नहीं जैसे करन और रीत ने जिस जंग में हिस्सा लिया , उसके बारे में मीडया को कानोकान खबर नहीं हुयी लेकिन एक बड़ा हमला मुम्बई पे न सिर्फ नाकाम रहा बल्कि कितने स्लीपर सेल्स का पर्दाफाश हुआ।

एंटी टेरर जंग की सक्सेस इसी बात में है कित्ते टेरर आपरेशन लांच होने के बाद खत्म कर दिए गए या लांच नहीं हो पाये। और कुछ दिन बाद उन टेरर आपरेशन की कास्ट इतनी ज्यादा हो जाती है की वो काउंटर प्रोडक्टिव हो जाते हैं। और अगर एंटी टेरर आपरेशन के साथ जहाँ से वो मुहीम चल रही है वहां घुस के मार के कोई आ जाए , और जो उनको अंदरुनी सपोर्ट मिलता है वो खत्म हो जाए तो बस , और मुंबई बस अब इसी दौर से गुजर रहा है और ये दौर खूब लम्बा चले, बस।  


बड़ौदा


बड़ौदा ने आतंकी हमलों की मार नही झेली लेकिन दंगो के घाव उसके भी जिस्म पर हैं। और ये बात नहीं है की वहां हमले की कोशिश नहीं हुयी। जैसे इस कहानी में है बड़ौदा एक अट्रैक्टिव टारगेट है , एक बड़ा इंडस्ट्रयल सेंटर है ,पेट्रोकेमिकल हब होने के साथ ही बड़ी कंपनियों का सेंटर है , लेकिन जब गुजरात में कई बार कई जगहों पर हमले हुए तो भी बड़ौदा बचा रहा और अभी भी ,… और ये सिक्योरटी एजेंसीज की सतर्कता के साथ वहां के लोगों की भी क्रेडिट है। और बड़ौदा की एक सांस्कृतिक नगरी के रूप में भी पहचान है। जहाँ नृत्य , कला , नाट्य , मूर्ती कला , सब कुछ , …रवि वर्मा ने वहीँ अपनी अमर कृत्यों का सृजन किया वहीँ आज कल के ज़माने में गुलाम शेख ने इस शहर का नाम पेंटिंग से जोड़े रखा। मीनल इसी मिजाज की प्रतिनिधि है जिसके नाटकों ने अभी मुंबई में धूम मचा रखी है.


बनारस







बम की आवाज अभी भी बनारस में गूंजती , लेकिन भगवान आशुतोष के जयकारे के रूप में।

बम बम भोले के रूप में।

लेकिन इस शताब्दी के दशक में जो कुछ हुआ , संकटमोचन , शिवगंगा ट्रेन , कैंट स्टेशन , शीतला घाट ,


बहुत लोगों ने बहुत कुछ खोया , और रीत और और करन ऐसे कितने थे , जिनके हाथ में सिर्फ मुट्ठी भर यादें बची थीं , लेकिन फिर एक दूसरे का हाथ पकड़ वो फिर खड़े हुए , उठे और चलना शुरू कर दिया।


ये वो शहर भी है जो गंगा जमनी तहजीब का नमूना है जहाँ सोनारपुरा के बुनकर की बनायीं साड़ियों के बिना किसी दुल्हन की शादी पूरी नहीं होती , जहाँ की हवा में मंदिर के सामने बजाई गयी बिस्मिलाह खां की शहनाई अभी भी घुली हुयी है।

यहाँ शताब्दियों को तो छोड़िये , सहस्त्राब्दियाँ साथ गुजर बसर करती हैं।

पिछले सालों से फिर वो अपन चैन कायम है , बस हम मनाते है की फिर किसी रीत , फिर किसी करन के सपने ऐसे लहूलुहान और चोटिल न हों।



और अंत में उस शहर के नाम जहाँ से ये दास्ताँ शुरू हुयी , जहाँ से तमाम पोशीदा राज खुले और जिसकी मस्ती से हर कोई सराबोर होना चाहता है ,


और अंत में उस शहर के नाम जहाँ से ये दास्ताँ शुरू हुयी , जहाँ से तमाम पोशीदा राज खुले और जिसकी मस्ती से हर कोई सराबोर होना चाहता है ,

एक कविता -

















इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्*वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्*थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़

इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज़ जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाँव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है

आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्*यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं भी है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्*थंभ के
जो नहीं है उसे थामें है
राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्*थंभ (स्तम्भ)
आग के स्तम्भ
और पानी के स्तम्भ
धुऍं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तम्भ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्*य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर!
 
एक शहर और ,…





इन तीन शहरों के अलावा भी एक और शहर का जिक्र इस कहानी में बार बार आया है ,आड़े तिरछे ही सही।

वो आनंद बाबू का शहर , जहाँ बैठ कर दूर लड़ रही , रीत को , एन पी को और तमाम लोगो को आंनद ने न सिर्फ हौसला दिया , बल्कि उस उलझी हुयी गुत्थी को सुलझाया और रास्ता सुझाया ,उस जंगली जानवर के दांत तोड़ने का।

पूर्वांचल के अनेक शहरों की तरह जिसका दर्द ,दुःख समझने की न तो किसी को फुरसत है , न ,…

एक दो सुधी पाठको को छोड़ कर ( जो इस कहानी का अभिन्न अंग रहे ) शायद कम को अंदाज लगा हो नाम का , लेकिन अब वो भी चाहता है उस का शुमार हो ही जाय।


यह वह शहर है जिसने बम के धमाके तो नहीं झेले लेकिन उस की आग ने उसका मुंह झुलसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


हर मिडिया कर्मी के लिए चीजों को सफेद स्याह ( स्याह ज्यादा ) और बीच के ग्रे के शेड्स को भूलाकर देखना और दिखाना , ( और टी आर पी ) बटोरना ,बस रिमोट की लड़ाई में सबसे सुलभ होता है।


एक छोटे से स्टेशन के अंत में लगे नाम पट्ट के साथ खड़े होकर ,… मैं,.... बोल रही हूँ। और यह शहर अब आतंकगढ़ के नाम से जाना जाता है , आइये मिलते हैं यहाँ के लोगों से, … और मेरे साथ हैं कैमरामैन ,…


ट्रेन में चलते हुए किसी सहयात्री ने पुछ लिया आप कहाँ के हैं और अगर आप ने बता दिया , तो पट्ट से जवाब मिलता है , अच्छा अबू सालेम जहाँ का है और साथ में एक व्यंग भरी , जुगुप्सा मिश्रित मुस्कान , उनके पढ़े लिखे होने का सबूत देती।

और अगर आप ने कहीं गलती से जवाब दे दिया , जी नहीं जहाँ के अल्लामा मरहूम शिबली नोमानी थे ,

तो उसका कुछ फरक नही पडेगा , और वो बाहर देखता रहेगा।

आप शिबली से शम्शुरामान फारुकी तक का नाम गिना दें , अयोध्या सिह उपाध्याय 'हरिऔध और राहुल सांस्कृत्यायन की दुहाई दे दें , लेकिन वह मुस्कान मिट नहीं सकती।

एक अबु सलेम और किसी गाँव का नाम , भारी पड़ता है बिगेडियर मोहमद उस्मान की शहादत पर , जिन्होंने १९४७ में बजाय उस पार जाने के हिन्दुस्तान मेंरहना तय किया और जब उनके ३६ साल भी नहीं पूरे हुए थे वो नौशेरा का शेर , पाकिस्तान से जंग में १९४८ शहीद हुआ। और उस लड़ाई में जान देने वाले सबसे ऊँचे रैक के अधिकारी थे।

और यह ,सिर्फ एक शहर की किस्मत नहीं है , कित्तने शहरों के कित्तने हिस्से , एक छोटी सी डॉक्यूमेंट्री है आई एम फ्रॉम बहरामपाड़ा आप उसे देखें और रूबरू हो सकेंगे। 
 
और यह ,सिर्फ एक शहर की किस्मत नहीं है , कित्तने शहरों के कित्तने हिस्से , एक छोटी सी डॉक्यूमेंट्री है आई एम फ्रॉम बहरामपाड़ा आप उसे देखें और रूबरू हो सकेंगे।

और साथ में टी वी चैनेल वाले ये भी बताना नहीं भूलंगे की यहाँ के लोग पढने काम ढूंढने बाहर जाते हैं , कोई खास रोजगार का जरिया नहीं ,


लेकिन ये दर्द सिर्फ एक शहर का नहीं , शायद पूरे पूर्वांचल का है। और जमाने से है।मॉरीशस , फ़िजी ,गुयाना , पूर्वांचल के लोग गए , और शूगर केन प्लांटेशन से लेकर अनेक चीजें , उनकी मेहनत का नतीजा है।

वहां फैली क्रियोल , भोजपुरी ,चटनी संगीत यह सब उन्ही दिनों के चिन्ह है।


और उसके बाद अपने देश में भी , चाहे वह बंगाल की चटकल मिलें हो,

बम्बई ( अब मुम्बई ) और अहमदाबाद की टेक्सटाइल मिल्स

पंजाब के खेत ,

काम के लिए ,

और सिर्फ काम की तलाश में ही नहीं ,

इलाज के लिए बनारस ,लखनऊ ,दिल्ली जाते हैं।

पढने के लिए इलाहबाद , दिल्ली जाते हैं।

लेकिन कौन अपनी मर्जी से घर छोड़ कर काले कोस जाना चाहता है ?


उसी के चलते लोकगीतों में रेलिया बैरन हो गयी ,

और अभी भी हवाओं में ये आवाज गूँजती रहती है
,




भूख के मारे बिरहा बिसरिगै , बिसरिगै कजरी ,कबीर।

अब देख देख गोरी के जुबना,उठै न करेजवा में पीर।
 
 
 



FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--191

  FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--191



जीत गयी रीत



और रीत ने गिरते हुए उस हमलावर के डूंगरी से कमांडो नाइफ निकाल ली थी।

हमलावर के हाथ में अभी भी पिस्तौल थी और अब वो मरते हुए भी करन पर गोली चलाने की कोशिश कर रहा था।


लेकिन रीत अब अपने रौद्र रूप में आगयी थी।

करन की गोली ने जो हमलावर के माथे में छेद किया वह सारा खून ,और कुछ मांस मज्जा निकल कर रीत के बालों में भर गया था।

दुःशाशन के वध के बाद जैसे पांचाली ने अपने खुले केश उसके रक्त से धोये थे , बस उसी तरह , रक्त टप टप टप टपक रहा था।

और जब उसने गिरे हुए हमलावर को करन की ओर निशाना लगाते देखा तो बस ,

चिघ्घाड़ के साथ वो हवा में उछली , उसके हाथ का चाक़ू सीधे हमलावर के गर्दन में पैबस्त था सामने से और फिर गिरते हुए हुए उस हमलावर के सीने पर वह सवार होगयी।

फव्वारे की तरह खून निकल कर रीत के चेहरे पर पड़ रहा था।

लेकिन चाक़ू पर उसकी पकड़ कमजोर नहीं हुयी और दोनों हाथों से नीचे तक , पसलियों के बीच ,


उसके मुंह से अभी भी भीषण आवाजें निकल रही थीं जिसे सुनकर ही कोई डर के बेहोश हो जाये ,

चाकू अभी भी अंदर धंसा था। लग रहा था वो सिर्फ अपने हाथों से उसके वक्ष से , उसका सीना चीरकर उसका कलेजा निकाल कर बाहर कर देगी।

रीत की आँखों के सामने अब वो हमलावर नहीं था ,

वो संकट मोचन का दृश्य देख रही थी जब बॉम्ब विस्फोट हुआ , एक शादी शुदा जोड़ा चीथड़ों में बदल गया।

वो एक के बाद एक शव उठा रही थी अपने माता पिता के शव को ढूंढने के लिए।

रेलवे स्टेशन पर वह पुलिस के साथ गयी , करन के माता पिता के शव को पहचानने , और एक और शव मिला पूरी तरह विक्षत ,करन का कोट पहने


मणिकर्णिका पर एक के बाद एक , …कोई नहीं बचा था ,न उसके घर में न करन के घर में।

दोनों के माता पिता को अंतिम विदा उसी ने दी। .

और फिर शीतला घाट पर , ३ साल की बच्ची खेलती हंसती , बॉम्ब के धमाके में उड़ गयी।

वह बार बार चाक़ू का वार कर रही थी , चीख रही थी।

पेट उसने फाड़ दिया था , अंदर की आते बाहर निकल आई थीं। और उस हमलावर के मृत देह पर बैठी , उसके खून में सनी , बिना रुके वह चीख रही थी और उसके उसके अंग अंग को चीर रही थी, फाड़ रही थी।

उसकी देह पर खड़ी होकर हमलावर के जिस हाथ में अभी भी पिस्टल थी , उसे उसना पकड़ा और जोर से मोड़ दिया।

हाथ टूट गया।

श्मशान में विचरण करने वाली जैसे शाकिनी डाकिनी हों उस तरह की आवाज ,

सब लोग शांत देख़ रहे थे , करन मीनल ,

चुप ,भयाक्रांत।

और उस आधे मरे हमलावर ने जैसे मौत देख ली हो। मौत से भी कुछ ज्यादा भयंकर।

काली की तरह , रक्त स्नात ,शत्रु हंता ,मृत्यु रुपी साक्षात काल।

मीनल ने करन को इशारा किया ,

वही रीत के मन को स्थिर कर सकता था।

इस जंग में दोनों ने ही खोया था , अपना सब कुछ।

और दोनों ने ही पाया था , एक दूसरे को और जिंदगी का एक मकसद। इन हमलावरों से मुक्ति दिलाने का।


करन जाकर रीत के सामने खड़ा हुआ।

रीत कुछ देर तक उसे पथरायी निगाहों से देखती रही जैसे पहचान न रही हो।

फिर अचानक उसने एक जोर की आवाज निकाली , जिसमें सदियों का दर्द ,चीख ,डर सब मिला था।


करन ने आगे बढ़ कर रीत के खून से सने हाथ पकड़ लिए और दूसरे हमलावर के पास ले गया और उसके कान में बोला।

" तुम कुछ मत करना , बस सिर्फ इसके सामने बैठ जाओ। "

रीत को पास में देख कर जोर से वो चीखा ,

लेकिन मीनल बोली , ये कुछ नहीं करेगी जब तक तुम हमारे सवालों के जवाब दोगे।

और करन ने सवाल करना शुरू किया ,

तुम्हे किसने भेजा , सेंटर कहाँ है।

उसे बहुत कम मालूम था ,लेकिन जो भी था ,तोते की तरह उसने उगल दिया।

काम की बात तब पता चली जब करन ने पुछा ,

तुम्हे यहाँ से क्या मेसेज देना था और उसने नीचे जेब की ओर इशारा किया , जिसमें एक कम्युनिकेशन डिवाइस थी , दो मेसेज प्री फेड थे ,

लाल बटन - टारगेट एलीमैनेटड , मिशन अचीव्ड।

हरा बटन -मिशन अबॉर्टेड।

मिशन सक्सेसफुल होने पर उन्हें लाल बटन दबाना था , और ये मेसेज सीधे कमांड सेण्टर पर जाता।

इस एक मेसज को देने के बाद वो डिवाइस बेकार हो जाती। यानी इसका इस्तेमाल कर के कमांड सेंटर का पता नहीं लग सकता था।

तब तक मीनल ने देखा उस ने गले में ताबीज सा कुछ पहन रखा है और उस का दायां हाथ , जो अभी भी थोड़ा बहुत काम का था उधर बढ़ रहा था।

मीनल ने झटके से वो ताबीज तोड़ दी और उसे अपने हाथ में ले लिया।

वह एक सायनाइड कैप्स्यूल था.

रीत ने पहचाना और फुसफुसा कर बोली।

मीनल और करन ने एक दूसरे को आँखों में देखा और हलके से मुस्कराये।

रीत धीरे धीरे नार्मल हो रही थी।

रीत ने अधमरे हमलावर पर हाथ रखा , और पूछा ,
वापस लौटने का क्या प्रोग्राम था।

और उस ने सारी कहानी बयान कर दी।

"टार्गट्स को खत्म करने के बाद , हमें मेसेज देना था। और मेसेज भेजने के १५ मिनट के अंदर हमें बीच पर पहुँच जाना था जहाँ वो बोट हमें मिलती। १५ मिनट की विंडो उसकी थी ,मेसेज देने के १० मिनट से २५ मिनट तक। और वह हमें हाई सीज तक ले जाती जहाँ सबमैरीन हमें पिक अप करती। "

सब का ध्यान उसकी बात सुनने में लगा था ,

अचानक वह अपना दायां हाथ अपने मुंह के पास ले गया। उसमे एक गंडा ऐसा बंधा था और जब तक लोग कुछ समझ पाते , रोक पाते ,वह उसके मुंह में था।

सबसे पहले रीत के मुंह से निकला सायनाइड।

और अगले पल ही उसके नीले पड़ते शरीर ने उसकी ताईद भी कर दी।

अब करने को कुछ नहीं बचा था और बहुत कुछ बचा था।


 रैन भई चहुँ देस



अब करने को कुछ नहीं बचा था और बहुत कुछ बचा था।

रीत और करन ने मिल कर दोनों हमलावर जिस खिड़की से आये थे , उसी खिड़की से उन्हें वापस बाहर फ़ेंक दिया।

करन ,रीत खिड़की के पास खड़े थे और करन कुछ सोच रहा था , फिर उसने वो कम्युनिकेशन डिवाइस उठाई और कुछ सोच कर मिशन अकम्पलीश् होने का मेसेज दिया। तुरंत जवाब आया कॉंग्रेट्स।


पर अगले पल रीत ने चिल्लाकर करन को वार्न किया।

उस डिवाइस के पीछे कोई लाइट जल रही थी , और करन ने तुरंत उसे खिड़की के बाहर फेक दिया।

वह उन दोनों हमलावरों की बाड़ी के बीच में गिरा , और अगले ही पल जोर का धमाका हुआ।

१० फिट दूरी का सब कुछ उस धमाके में उड़ गया।


इस का मतलब उस डिवाइस में ही दोनों के खत्म करने का पूरा प्लान बना ,हुआ था।

रीत और मीनल ने मिल के कमरे को पूरी तरह ठीक किया और उसके बाद मीनल पकड़कर रीत को बाथरूम में ले गयी और करन बाहर कंट्रोल रूम में गया।

और रिवाइंड करने पर उसे हमलावरों की सारी हरकतें पता चल गयी जैमर लगाना , आने के रास्ते में माइन्स लगाना , सारी बातें. पहले करन ने जैमर ठीक किया।
और आई बी के चीफ से बात की और उन्हें सब कुछ बताया।

उन्होंने उसे दो मिनट वेट करने को कहा और खुद रॉ के डायरेक्टर को और एडिशनल सेक्रेटरी होम ( इंटरनल सिक्योरिटी) को जगा के बताया। रा को वैसे भी इन्वॉल्व होना था क्योंकि करन रॉ का आपरेटिव था।

और जब आई बी डायरेकटर का फोन आया तो उनके इंस्ट्रक्शन बहुत साफ थे ,

' बेहोश कंट्रोल रूम सिक्योरिटी आपरेटिव्स को बेहोश ही रहने दे और उन्हें हाथ न लगाएं। कंट्रोल रूम के फूटेज से हमलावरों की फूटेज के वीडियो को अपने पास कापी कर के , कंट्रोल रूम के सिक्योरटी कैमरे से उसे डिलीट कर दें। लोकल सिक्योरिटी को न इन्वाल्व करें , सिर्फ आई बी के आपरेटिव को जो पुलिस पोस्ट पर वेट कर रहा है उसे काॅन्टेक्ट करें और उस के साथ मिल कर सब कुछ 'नार्मल ऐसा' कर दें.उनका एक्सट्रैकशन प्री पोंन किया जा रहा है और २० -२५ मिनट में उन लोगों को वहां से निकलना होगा। '

करन ने पहले कंट्रोल रूम के फूटेज टैम्पर किये , हमलावर के सारे फूटेज अपने मोबाईल में और एक पेन ड्राइव में ले कर उसे आई बी और रा को भी भेज दिया। उसके बाद आई बी के आदमी को फोन किया। उसके पास भी मेसेज जस्ट पहुंचा था।

जब तक वो आये , उसके पहले करन ने पेरीमीटर का चक्कर लगाया और फेन्स को कटा पाया। साथ में एक लूप लगा था। ये साफ था की हमलावर यही से घुसे थे।

करन ने फेन्स ठीक की। और सबूत बताने वाला वो लूप अपने पास रख लिया।

बाहर रास्ते में आकर उसने माइंस ढूंढी , जोउसके लिए इस लिए मुश्किल नहीं थी की उसने सी सी टीवी की फूटेज में लोकेशन साफ साफ देखी थी।

बहुत सम्हालकर उसने दोनों माइंस डिफ्यूज की और रास्ते के बाकी 'कांटे ' हटाये।

कुछ ही देर में आई बी का ऑपरेटिव वहां पहुँच गया और दोनों पिछवाड़े गए जहाँ करन ने खिड़की से दोनों हमलवारों की बाड़ी बाहर फेंकी थी।

उस के बगल में कम्युनिकेशन डिवाइस जो एक्सप्लोड हो चुकी थी , वो भी पड़ी थी। और उसके विस्फोट से दोनों बॉडीज अब इतनी क्षत विक्षत हो चुकी थीं की उन्हें पहचानना मुश्किल था।

करन और उस आपरेटिव ने मिल कर बारी बारी से दोनों बॉडीज को समुद्र तक पहुँचाया , और फिर किनारे पड़े पत्थर उनमें बाँध कर उन्हें समुद्र तल में डुबो दिया। उस समय टाइड का समय था , थोड़े ही देर में लहरे उन्हें समुद्र तट से दूर पहुंचा देती।

यही वो समय था जब उस हमलावर के मुताबिक़ बोट को उनका इन्तजार करना था , लेकिन आस पास कोई बोट नजर नहीं आई।

दूर अचानक क्षितिज पर उस समय एक तेज रोशनी हुयी ,आग के गोले जैसी और फिर समुद्र में समां गयी।

करन ने बदले हुए प्रोग्राम के बारे में मीनल और रीत को बता दिया था।

आई बी का आपरेटिव बाहर कंट्रोल रूम में कहीं से बात कर रहा था।

जब करन अंदर गया तो मीनल और रीत दोनों बाथरूम में थी , कमरा एकदम साफ कर दिया गया था , और सामान पैक था।

करन दूसरे बाथरूम में दाखिल हो गया। उसकी देह पर भी हमलावरों के खून के छींटे थे। नहाकर वह तैयार हो रहा था की मीनल ने दरवाजा खटखटाया , गाडी आ गयी है। वो जल्दी जल्दी बाहर निकला। मीनल और रीत तैयार थीं। रीत अब नार्मल लग रही थी लेकिन वो और मीनल दोनों एकदम चुप थीं।


गाडी एक दूध बांटने वाली मिल्क वान थी , जिसे देख के किसी को शक न हो लेकिन उसके सारे शीशे ब्लैक टिंटेड ग्लासेज थे और परदे पड़े थे। ड्राइवर गाडी से नहीं उतरा और करन ,मीनल रीत तीनो लगेज एरिया में बैठ गए ,अपने सामान के साथ।

२० मिनट में वह एक मैदान में थे जहाँ एक चॉपर खड़ा था ,और उनका सामान उस में रख दिया गया। तीनो उस में बैठ गए।

और जब हेलिकाप्टर उड़ा तो उस समय प्रत्युषा का आगमन हो चूका था।

किसी सुहागन के मांग में सिन्दूर की तरह एक पतली सी अरुणिम आभा क्षितिज पर दिख रही थी।

२० मिनट बाद वह वड़ोदरा में लैंड किये। लेकिन वह सिविलयन एयरपोर्ट पर नहीं थे।

वह तीनो वड़ोदरा एयरफोर्स बेस पर उतरे। और बगल में एयर फोर्स का एक प्लेन तैयार खड़ा था।

रीत थोड़ा सा मुस्कराई जब मीनल विदा लेते हुए उससे गले मिली।

और करन ने मुस्कराकर हलके से मीनल से कहा , " सिर्फ दी से , …"

और मुस्कराते हुए मीनल सीधे करन के पास पहुँच गयी और उसे बाँहो में ले के धीमे से बोली ,' जीजू फिर कंब.। "

करन ने बिना जवाब दिए उस की पीठ थपथपा दी।

रीत की आँखों में थोड़ी सी पुरानी चपलता लौट आई थी।

और अब वो दोनों एयर फोर्स के जहाज में बैठ गए और उनके बैठते ही जहाज उड़ चला।


करन को मालूम था , वो दोनों बनारस नहीं जा रहे हैं।

वह बनारस से बहुत दूर जा रहे थे।

और सिर्फः बनारस से ही नहीं अपनी पुरानी जिंदगी से दूर जा रहे थे शायद हमेशा के लिए।



आई बी ने उनके ऊपर हुए इस हमले के बाद ये फैसला किया था की उनकी सिक्योरटी के लिए और नेशनल सिक्योरटी के लिए ये जरुरी है की उन्हें एक प्रोटेक्शन प्रोग्राम में रखा जाय ,जिसमे उनकी पूरी आइडेंटिटी नयी होगी। थोड़ा बहुत प्लास्टिक सर्जरी , नया माहौल , नया बैकग्राउंड। करन ने जो मेसेज दिया था उसे उनके कमांड सेंटर को ये इन्फो मिल गयी होगी की दोनों एलिमिनेट हो चुके हैं। लेकिन उनके जानने वालों पर वह तब भी निगाह रखेंगे और अगर इन्होने उनसे कांटैक्ट रखा तो इस कवर स्टोरी को मेंटेन करना मुश्किल होगा।

करन ने सिर्फ आनंद को मेसेज किया था , और ये कहा था की गुड्डी , दूबे भाभी और फेलू दो को सिर्फ ये बताएं की वो सेफ हैं।

यह करन को भी नहीं मालूम था वो और रीत कहाँ जा रहे हैं , उनकी नयी आई डी क्या होगी।


रीत एक कोने में प्लेन की खिड़की से सर टिकाये गुमसुम बैठी थी।






बनारस में दूबे भाभी ने आँचल के कोने से , आंसू का एक टुकड़ा पोछा और अशिषा ,

' बिटिया जहाँ रहो खुश रहो। करन है न तोहरे साथ। '

और फिर आसमान की ओर भरी निगाह से देख बुदबुदाया ,


' वकील साहब आप जहाँ हों ,बिटिया को आशीष दो।
'

 " बाथरूम जाओगी , भाभी थोड़ी देर में आती होंगी। "
वो बाएं हाथ का सहारा लेकर उठी , और जब मैंने पेशकश की मैं भी आ जाऊं उसकी हेल्प केलिए , तो उसके चेहरे पे फिर वही शरारत , …आँख नचा के बोली ,

" तुझे पीटने के लिए मेरा एक हाथ काफी है। "

और बाथरूम के दरवाजे पर से रुक के उस परीजाद ,सुर्खरू ,शोख ने मुड़ के मुझे देखा और बोली ,

" चलो तेरी वो भी ख्वाहिश पूरी कर दूंगी। तुम भी क्या याद करोंगे , बनारस वाली हूँ कोई मजाक नहीं। बस २७ मई का इन्तजार करो। "

कोई और वक्त होता तो मैं उसकी बात पे मुस्कराता , लेकिन आज बामशक्कत मैंने आँखे नम होने से रोकी।

और वो बाथरूम में घुस गयी। दरवाजा खोलने के लिए उसने अनजाने में दायां हाथ इस्तेमाल किया और जो चिलक उठी तो बड़ी मुश्किल से उसने चेहरे पर आये दर्द के अहसास को तुरंत पोछ के साफ किया।


कुछ देर बाद ही हुक्मनामा आया , बाथरूम के बंद दरवाजे के पीछे से ,


" चाय मिलेगी क्या ?

" एकदम ,गरमगरम कड़क , *** गढ़ स्पेशल। " मैंने जवाब दिया और किचेन में लग लिया। भाभी का मेसेज आया था की वो लोग बस १५ -२० मिनट में पहुँच रहे हैं और मैं गुड्डी से कह दूँ चाय बनाने के लिए। वो लोग बहुत चयासी हो रही हैं। और मैंने पानी बढ़ा दिया।


कुछ देर में गुड्डी बाथरूम से निकली , अपने कमरे में गयी और जब तक बाहर निकली तो टेबल पर टीकोजी से ढंकी केटली में चाय हाजिर थी , और साथ में मैं,खड़ा , कंधे पर छोटी टॉवेल,एकदम रामू काका की तरह।

और गुड्डी ने बैठ कर जैसे ही मुझे देखा , बस बेसाख़्ता मुस्करा पड़ी।


जोश का एक शेर याद आया ,

यह बात, यह तबस्सुम, यह नाज, यह निगाहें,
आखिर तुम्हीं बताओं क्यों कर न तुमको चाहे।

लेकिन फिर याद आया , रामू काका शेर थोड़े ही पढ़ते हैं।

और गुड्डी ने हुक्म दिया , अब चलो तुम भी पी ही लो।

बस मैं बैठ गया , और चाय ढालने के लिए जो केतली पकड़ी तो उसकी आँखों ने मना कर दिया और ,और फिर बाएं हाथ से ,… बाएं हाथ के इस्तेमाल में वो एकदम सौरभ गांगुली हो रही थी।

चाय की पहली चुस्की के बाद ही उसने मुंह बनाया और बोली , चीनी कम.

इस जुमले ने क्या क्या न याद दिलाया , ये बात रोज मैं बोलता था जब गुड्डी बेड टी लेकर आती थी और ये बहाना होता था गुलाब की टटकी पंखुड़ियों से एक चुम्बन चुराने का।

वह चीनी का डिब्बा बढ़ा देती थी , अपने सुर्खरू लब।

और आज मैंने अपने होंठ।

होंठो का वो आलिंगन कब तक चलता पता नहीं , लेकिन बाहर दरवाजे पर घंटी बज गयी। भाभी आ गयी थी।


.............



उपसंहार











भाभी आज एकदम अलग ही लग रही थीं।

खूब चुलबुली , एक अलग सी मस्ती आँखों से पूरे चेहरे से टपक रही थी। हाँ बस थोड़ी थोड़ी थकी लग रही थीं।


भैया ,हरदम की तरह ,सीधे अपने कमरे में चले गए ,ये कह के उन्हें नींद आ रही है ,भाभी थोड़ी देर में आ जाएँ,ऊपर।


और भाभी की नजर सीधे टेबल पे बैठी गुड्डी और सामने रखी गरम केतली पर पड़ी।

और वो धम्म से हम दोनों के बीच बैठ गयीं।

और गुड्डी ने अपनी चुस्की ली प्याली मेरी ओर सरका दी और मेरी अनपीयी प्याली , भाभी के लिए सरका दी।

मैंने ' एक्स्ट्रा मीठी' प्याली अपने होंठों से लगाई ,गुड्डी की शैतान लेकिन मीठी मीठी निगाहों को देखता रहा और उसके लिए चाय निकाल दी।

" वाह क्या मस्त चाय है ,सारी थकान गायब , एकदम गुड्डी ने बनायीं होगी। तेरे हाथ में तो जादू है। " भाभी ने चाय की दो चुस्की के बाद ही फैसला सूना दिया।

और गुड्डी भी , सीधे मेरी आँख में देखती बोली , " एकदम आपके देवर को तो कुछ आता है नहीं ,एकदम नौसिखिये हैं। न किचेन का काम न कुछ ,… "

भाभी भी गुड्डी की मुस्कराहट केसाथ मुस्करा के हामी भर रही थीं , लेकिन उन्होंने एक इम्पोर्टेन्ट सवाल दाग दिया ,

" कब तक निकलना है तुम लोगों को " और भाभी का सवाल निकलने के पहले ही मैंने लपक लिया। अगर कहीं गुड्डी ने उलटा सीधा जवाब दे दिया तो गड़बड़ हो जाता।

" वैसे तो टैक्सी ११ बजे बुलाया है ,लेकिन वो थोड़ा शायद पहले ही आ जाय। और रंजी तो एकदम सुबह ही निकल गयी थी वो भी साढ़े नौ ,पौने १० बजेतक आ ही जाएगी। गुड्डी ने सब पैक वैक कर लिया है तो बस जैसे टैक्सी आएगी साढ़े दस के आसपास। "

मैंने एक साँस में पूरा जवाब दे दिया और भाभी के कप में दुबारा चाय भी ढाल दी।


उन्होंने चाय पीनी शुरू की ही थी की ऊपर से बुलावा आ गया.

लेकिन भाभी भी , चाय पीते पीते गुड्डी को समझा रही थी ,' सुन क्या बनाएगी खाने में , अब ज्यादा टाइम भी तो नहीं रह गया। "

कल रात की बात याद कर के मैं बोला , बिरयानी बना लो। ( कल उसने और रंजी ने रेड़ी टू ईट के पैकेट से बनायीं थी )

लेकिन जैसे होता है , भाभी और गुड्डी दोनों एक साथ चढ़ पड़ीं मेरे उपर।

" रसोइये के खानदान से हो क्या ,… " गुड्डी ने आँख नचा के बोला।

" सही कह रही है तू , सासु जी आएँगी न तो उनसे पूछना पड़ेगा कही , किसी बावर्ची के साथ ,कोई ठिकाना नहीं ,...." और दोनों खिलखिलाने लगी।

मैंने पूरी तरह अनसुना कर दिया।

मेरी आँखे और ध्यान पूरी तरह गुड्डी की चोट लगे दायें हाथ पर लगा था। गनीमत थी की उसने कुहनी तक बांह वाला एक अनारकली सूट पहन रखा था। किचेन का काम ,… इस हालत में।

" टाइम कम है , सुन तू झटपट तहरी बना ले , आलू , टमाटर ,गोभी ,गाजर सब डाल के। और हाथ खाओगी किस से ,तो बस फ्रेश टमाटर की चटनी बना लेना। " भाभी ने फैसला सुना दिया।

तब तक हेडक्वारटर्स से कॉल आ गयी , और भाभी ने एक घूँट में बाकी चाय खत्म कर दी और उठने वाली थी की गुड्डी धीरे से बोल उठी ,

" वो तो ऊपर सोने गए थे तो आप क्या लोरी सुनाने , .... "

क्या जोर का भाभी ने ब्लश किया और एक हाथ सीधे गुड्डी की पीठ पे ,

' बस दो ढाई महीने की बात है ,आएगी इसी घर में फिर पूछूंगी , दिन दहाड़े जब जुम्हाई आएगी। "

और अगले पल भाभी ऊपर और हम दोनों किचेन में ,


बहुत मुश्किल से गुड्डी मानी ,

और फिर उस की हिदायतें और मेरा काम ,


उस दिन पहली बार अजवायन ,सौंफ धनिया और जीरा में अंतर पहचाना।

बोल सब वही रही थी , बीच में झुंझला भी रही थी।
पानी में चावल भिगोओ।

तेल गरम करके कटे प्याज डालो।

फिर गार्लिक और जिंजर पेस्ट खड़े मसाले सारे ,

बीच में उसने कूकर उठाने की कोशिश की तो फिर चिलक उठी , और मैंने उसे फिर एकदम मना कर दिया।

लेकिन तब भी मिक्सी का काम , सास बनाने का ,…

और आधे घंटे में हम दोनों ने मिल के तहरी चढ़ा दी।
और मैं उसे खींचता हुआ , अपने कमरे में ले गया।

और उसकी बैंडेज खोली।

मैंने एक डाकटर से सुबह ही बात की थी लेकिन उन्होंने बोला था की बिना देखे कुछ बताना मुश्किल है।

बस इसलिए , उसके दो चार फोटो लिए और उन्हें तुरंत व्हाट्सऐप किया।

और उनका जवाब भी आ गया , चिंता की बात नहीं है , वूंड हील होना शुरू हो गया है , अब ज्यादा पट्टी की जरूरत नहीं है मैं सिर्फ एक इलेस्टोप्लास्ट लगा दूँ। हाँ इस हाथ से अगले सात आठ घंटे तक कुछ भी उठाना मना है , जितना इस हाथ को आराम मिलेगा उतनी जल्दी ठीक हो जाएगा। और उन्होंने दो इंजेक्शन भी लिखवाये , जो मुझे बनारस जाते समय कहीं लगवा लेने थे। चोट लगने के ७-८ घंटे के अंदर पेन किलर एक बार और देने के केलिए बोला उन्होंने।

बस मैंने उसे आ करवा के गोली खिलवायी , बैंडेज जैसा उन्होंने कहा था वो लगवाया ,लेकिन गुड्डी की बस एक रट तहरी ख़राब हो जायेगी।


तहरी का तो कुछ नहीं लेकिन अगर हम दस मिनट लेट आते तो पकड़े जाते।

किचेन में पहुँच कर कूकर से मैंने तहरी निकाल के सर्विंग वाले बर्तन में रख दिया था और गुड्डी दही रख रही थी।

भाभी तभी आ पहुंची और पहुंचते ही मुझे डांट पड़ी और गुड्डी की तारीफ।




FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--190

  FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--190


हमला





रीत कबर्ड में कपड़ों के पीछे छुपी दबी खड़ी थी। न वह कुछ सोच रही थी , न तैयारी , बस एकदम सन्नद्ध। उसकी हर इन्द्रियां ,खुली, सचेत, सजग, हमले को तैयार।

बिना देखे उसे पता चल गया की कब दोनों खिड़की के पास खड़े हुए।

उसके कान जरा सी हरकत को सुनने के लिए तैयार थे और जब चाकू से शीशे के काटने की बहुत हलकी सी आवाज आई और शीशे की गिरने की वो भी उसने सुनी।

लेकिन हर चीज पता करने के लिए सुनना देखना जरूरी नहीं होती।

महा विद्याओं का आशीर्वाद, योग की शिक्षा या दीक्षा , उसकी पूरी देह आँख भी थी कान भी। शीशे के हटते ही जो हवा का झोंका आया बस उससे उसे अंदाज लग गया की बस अब खिड़की खुल गयी है और हमला होने वाला है।

बहुत हलकी सी रोशनी जो बाहर से आ रही थी , उस के अवरुद्ध होने से रीत को ये भी पता चल गया की वो अंदर आ गया है और उसकी लोकेशन कहाँ है।

वह कबर्ड और पलंग के बीच खड़ा था।

और आते ही उसने जो पहला हमला किया उसके लिए रीत और करन दोनों तैयार थे , और न तैयार होते तो तो पहली बाजी क्या पूरा मैच हार जाते।

दो स्टन ग्रेनेड , एम 84 पहले तो घुसते ही उसने पलंग की ओर फेंके।

इनका असर तेज फ्लैशिंग लाइट और धमाकेदार आवाज (जो १७०-१८० डेसीबेल की रही होगी ) -हुआ। और , नॉर्मली , लोग ऐसी तेज आवाज में करीब आधे मिनट से एक मिनट तक अपना ओरिएनेटशन खो देत्ते हैं ,कुछ करने की हालत में नहीं रहते है। बैलेंस समाप्त हो जाता है और कुछ दिखाई पड़ना भी मुश्किल होता है।

इतने समय में अटैक करने वाले को सिचुएशन पूरी तरह कंट्रोल करना आसान होता है।

लेकिन रीत ने इसकी तैयारी पूरी कर रखी थी।

कबर्ड में पड़े क्विल्ट से उसने अपने चेहरे ,कान को अच्छी तरह ढक रखा था , खुद टंगे हुए कपड़ों के पीछे खड़ी थी और कबर्ड एक झिर्री के अलावा पूरी तरह बंद था , इसलिए कबर्ड , कपड़ों और क्विल्ट ने स्टन ग्रेनेड के असर से उसको अच्छी तरह इन्सुलेट कर दिया।

हाँ फायदा ये हुआ की अटैकर की लोेकशन अब उसे पूरी तरह कन्फर्म हो गयी थी।

पलंग के नीचे छुपे करन और मीनल को पलंग का पूरा प्रोटेक्शन तो मिला ही , जो उन्होंने रजाई खींच रखी थी नीचे तक उसने भी ब्लाइंडिंग फ्लैश और साउंड को अब्सॉर्ब कर लिया। इसके साथ ही रजाई से निकाल कर करन ने रुई अपने और मीनल के कान में ठूंस रखी थी , दोनों हाथों से कान जोर से बंद कर रखे थे और अपने को फर्श से चिपका रखा था।

लेकिन हमलावर ने स्टन ग्रेनेड का असर खत्म होने के पहले ही स्मोक ग्रेनेड एक पलंग के ऊपर और दूसरा पलंग के नीचे की ओर लांच किया।

लेकिन उनका असर शुरू हो उसके पहले तेजी से कबर्ड का दरवाजा खुला , कपड़ों का एक बण्डल सीधे उसके ऊपर और जबतक वह सम्हले रीत सीधे उसके कंधो पर।

स्मोक में नाइट विजन गॉगल्स के बावजूद हमलावर के लिए देखना मुश्किल था।

लेकिन रीत को किसी नाइट विजन की कभी जरूरत नहीं पड़ी।

काली अँधेरी रात में घने जंगल में चीता शिकार की घात में बैठा रहता है , और तेजी से भागते सारंग को जिस झटके से दबोच लेता है , या सुंदरबन में जंगलों और सागर के बीच नाव पर बैठे शिकार को जिस तरह झपट्टा मार कर बंगाल का बाघ अपना शिकार बना लेता है , सिर्फ अपनी शक्ति, स्वभाव और प्रकृति के कारण बस वही हालत रीत की थी।

महाविद्या स्त्रोत और महाविद्या कवच का पाठ अभी उसने किया था , और बस सब का आशीर्वाद सब की शक्ति ले कर उतरी थी , विनाश की दूती बन कर। सीधे वह उसकी पीठ पर चढ़ी थी , बायां हाथ सीधे काल का फन्दा बना उस हमलावर के गले में लिपटा था और दायें हाथ की कुहनी ने , उस हाथ पर पूरी ताकत से चोट की , जिसमे उसने एच & के ( हेकलर एंड कोच ) यूनिवर्सल मशीन पिस्टल पकड़ रखी थी और उसकी उँगलियाँ ट्रिगर पर थीं।

कुहनी के साथ पैर की पूरी ताकत भी उसी हाथ की कुहनी पर पड़ी , और अचानक हुए इस हमले का लाभ ये हुआ की गन उसके हाथ से छूट गयी और फर्श पर गिर पड़ी।


रीत






कुहनी के साथ पैर की पूरी ताकत भी उसी हाथ की कुहनी पर पड़ी , और अचानक हुए इस हमले का लाभ ये हुआ की गन उसके हाथ से छूट गयी और फर्श पर गिर पड़ी।

ये नेवल सर्विस ग्रूप का फेवरिट हथियार था और बहुत ही घातक , खास तौर पे शार्ट रेंज पे। और उसको और घातक बनाता था ,. ४५ एसीपी कार्ट्रिज।

ये गोलियां अपनी बड़ी साइज के कारण ,पेन्ट्रेशन और एक्सपैैंशन दोनों ही में तेज और बड़ा असर करती हैं। इससे रक्तस्त्राव तेज होता है और मारक क्षमता बहुत अधिक है। यह सेमी आटोमेटिक ,ऑटोमेटिक दोनों ही तरह से सेट हो सकती है लेकिन अभी सेमी आटोमेटिक मोड़ में थी।

इससे बचने का सिर्फ एक तरीका था की ये दुश्मन के हाथ में न रहे और अब इस का मालिकाना बदल चुका था। क्राल करके बिस्तर के नीचे से निकले करन ने बन्दूक पर अब कब्ज़ा कर लिया था और अब ट्रिगर पर उसकी उंगलियां थीं।

ऐसा बहुत कम होता है की रीत का पहला हमला निर्णायक न हो , लेकिन इस बार ऐसा न हुआ।

हाँ एक बहुत बड़ा फायदा ये मिला की गन हमलावर के हाथ से निकल कर कर करन के हाथ में पहुँच गयी थी और मुकाबला अब फायर आर्म्स से हट कर अनआर्म्ड कॉम्बैट में बदल चुका था।


और इस लिए भी था की अनआर्म्ड कॉम्बैट में अमेरिकन नेवी सील के साथ जब वह ट्रेनिंग में था तो हर मुकाबले में पहले या बहुत रेयरली दूसरे नंबर पे रहता था और फिर कराते और जूडो की ट्रेनिंग चाइनीज स्पेशल आॅप्रेशन फोर्सेज की मरीन ब्रिगेड के साथ उसने की थी और ज्वाइंट एक्सरसाइज में भी पार्टिसिपेट किया था।

इस लिए वह रीत से मुकाबले में २० तो नहीं लेकिन १७ भी नहीं था , हाँ १८ ,१९ जरूर रहा होगा।


दूसरे उसके पास अभी भी उसकी पिस्टल और कॉम्बैट नाइफ तेह जिसकी तेज धार का एक हमला काफी होता था।

भले ही उसके दाहिने हाथ ने एच & के पिस्टल से पकड़ छोड़ दी हो लेकिन वो हथियार बन गया था और उसकी कुहनी ने एक पिस्टन की तरह सीधे उसकी पीठ लदी रीत के पेट में वार किया।

कोई दूसरी होती तो उसकी स्प्लीन बर्स्ट हो गयी होती और पेट के अंदर के कई अंगो से इंटरनल हैमरेज चालू हो जाता।

लेकिन रीत की रक्षा तो खुद काशी के कोतवाल कर रहे थे और उसने कवच धारण कर रखा था महा विद्या के मन्त्र और आशीर्वाद का।

अपने आप उसकी सांस गहरी हो गयी ,पेट अंदर खिंच गया और उसकी देह गेंद की तरह मुड़ गयी , और हमले का असर बस नाम मात्र के लिए हुआ।


कोई दूसरा होता तो शायद ये 'नाम मात्र ' बेहोश करने के लिए काफी था।

लेकिन रीत रीत थी।

हाँ इसका असर ये जरूर हुआ की हमलावर रीत की पकड़ से पल भर के लिए छूट गया।

और हमलावर को मुड़ कर अब रीत को फेस करने का मौका मिल गया था , लेकिन ये मौका इतना भी नहीं था की वो कमांडो नाइफ निकाल सकता। उसने मुक्के का सहारा लिया की पल भर अगर वो रीत को डिस्ऑरिएंट कर पाता तो फिर एक बार चाक़ू उसके हाथ में आने की बस देरी थी।


हमलावर ने मुड़ते ही दुहरा हमला किया , पैर की किक सीधे रीत के घुटने पे नी कैप को टारगेट करके। और एक जोरदार मुक्का रीत के चेहरे पे।

कोई दूसरा होता तो शायद बत्तीसी बाहर होती और घुटना , नी रिप्लेसमेंट के लिए तैयार हो जाता।
और ऊपर से उसके जूतों में लोहे के कैप लगे थे।

और रीत के लिए भी मुश्किल था बचना , लेकिन रक्षा की जिम्मेदारी तो उसने कोतवाल के जिम्मे कर रखी थी , और बस अपने आप उसका शरीर उछला और हवा में ही मुड़ा , नतीजा ये हुआ की मुक्का बजाय चेहरे पे लगने के उसके कंधे पे लगा और पैर का वार खाली गया।

हमलावर को भी ये अंदाज नहीं था , और उससे बढ़ कर ये अंदाज भी उसे नहीं था की उसका मुक्के वाला हाथ रीत की गिरफ्त में होगा।

रीत की गिरफ्त की ताकत भी उसे तभी पता चली।

लोहे की सँडसी मात थी।

उस कोमल कलाई में , पल भर में कलाई तोड़ देने की ताकत थी।

और रीत ने यही किया , एक बार एंटी क्लॉक वाइज और दुबारा क्लॉक वाइज।

एक बार और एंटी क्लॉक वाइज करने पर कलाई के सारे लिगामेंट टूट जाते और वो हाथ पूरी तरह बेकार हो जाता।


रीत उसके पैरों का हमला देख चुकी थी और उसकी निगाह काउंटर अटैक के लिए उसके पैरों पर थी ,पर रीत को यह नहीं अंदाज था की , वो सव्यसाची था दोनों हाथों से बराबर का वार करता था।

और हमलावर कराते में ब्लैक बेल्ट था। जो हाथ दस ईंटों को एक साथ तोड़ सकता था रीत की कलाई पर बिजली की तेजी से पड़ा।

बल्कि पड़ने वाला था ,और रीत ने उसके पहले ही झटके से हमलावर की कलाई छोड दी।

पूरी तरह दूटने से उस हमलावर की दायीं कलाई तो बच गयी लेकिन दो चार लिगामेंट तो टूट ही गए और अब वह करीब ७०% बेकार हो चुकी थी।

दूसरे रीत का हाथ हटने से कराते का हमला पूरी तरह बेकार हो गया लेकिन उस की उँगलियों का अगला भाग जो रीत के हाथ को छूता निकल गया , लगा जैसे बिजली का करेंट लगा हो और किसी दूसरे के हाथ को बेकार करने के लिए काफी था।

लेकिन ये रीत थी।

और हमले से बचते समय भी अगला हमला करने के लिए तैयार थी। उसकी निगाह अभी भी उस दुष्ट के पैरों पर टिकी थी और वो जानती थी अगला हमला यहीं से आएगा।

और हुआ भी यही।

बायां पैर हवा में लहराया , टारगेट रीत की रिब्स।

और रीत हलके से मुस्कराई। अब हमलावर पहले से तयशुदा स्क्रिप्ट पर आ गया था और उसको पढ़ना ज्यादा आसान था।
रीत न सिर्फ साइड में सरकी ,बल्कि अबकी उसके दोनों हाथों ने बाएं पैर को जूते के ठीक ऊपर जोर से पकड़ लिया और वही क्लॉक वाइज , एंटी क्लॉक वाइज और फिर क्लॉक वाइज।

एक पैर फंसा हो तो दूसरे पैर से हमला करना मुश्किल था। ऊपर से दायें होते में लिगामेंट टूटने से होने वाले दर्द ने उसे थोड़ा डिस्ऑरिएंट भी कर दिया था। इसलिए बायां हाथ भी अब थोड़ा स्लो हो चूका था।

बायां पैर ५ सेकेण्ड में रीत ने बेकार कर दिया ,सारी कार्टिलेज टूट चुकी थी और उसी के साथ रीत ने जोर से हेड बट किया ,उसके एक्सपोज्ड पेट की ओर ,

बचो बचो , मीनल और करन दोनों की घबड़ाई आवाज तेजी से आई।

करन के हाथ में दुश्मन की गन थी और वो उसकी ओर ट्रेन किये हुए था लेकिन मुश्किल ये थी की रीत और हमलावर एक दूसरे से इस तरह गूंथे हुए थे की फायर करना इम्पॉसिबल था।


डेडलॉक , रीत ,हमलावर ,करन



बचो बचो , मीनल और करन दोनों की घबड़ाई आवाज तेजी से आई।

करन के हाथ में दुश्मन की गन थी और वो उसकी ओर ट्रेन किये हुए था लेकिन मुश्किल ये थी की रीत और हमलावर एक दूसरे से इस तरह गूंथे हुए थे की फायर करना इम्पॉसिबल था।


रीत की निगाह जब हमलावर के बाएं पैर पर लगी थी और पूरी ताकत से वह उसे तोड़ रही थी , हमलावर का दायां हाथ वो बेकार कर चुकी थी. आलमोस्ट। उसी समय दर्द से जूझते , हमलावर ने समझ लिया था की सामने वाला उससे २० है और अनआर्म्ड कॉम्बैट में उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है , उसने दो काम किया।

अपने हेड फोन से अपने साथी को एस ओ एस किया और किसी तरह झुक कर अपनी डुंगरी से कमांडो नाइफ निकाली और पूरी ताकत से ,


रीत हेड बट्ट के लिए झुकी थी और उसकी गर्दन पूरी तरह एक्सपोज्ड थी।

ये उसके लिए सबसे बढ़िया मौका था , पूरी ताकत से सीधे कारटायड आर्टरी पे , सीधे गर्दन पे।



डर कर मीनल ने आँख बंद कर ली।

करन की सांस रुकी हुयी थी , सेकेण्ड का दसवां हिस्सा रहा होगा , और रीत पर लग रहा था कोई दैवीय शक्ति सवार हो गयी।

बिना उंसके पैरों को छोड़े उसने पैतरा बदला और जैसे हवा में नाच गयी हो। उसके लम्बे बाल खुल गए और पूरा चेहरा जैसे काली अमावस की रात में ढँक गया।

जब उसके हाथों ने पैर छोड़ा तो वो पूरी तरह टूट चूका था।

और ऊपर से ही रीत ने चाकू वाले हाथ को दबोच लिया।

जोर की चिग्घाड़ निकली रीत के गले से और अब उसके हाथों में जो शक्ति थी , वो उसकी नहीं थी। अबकी बायां हाथ जिसमें चाक़ू था उसके कब्जे में था और वो उसे मरोड़ रही थी। वह सब कुछ भूल चुकी थी और उसकी पूरी देह की ताकत उस हाथ को तोड़ने में लगी थी।

वैसे भी उस हमलावर का दायां हाथ लगभग बेकार हो चुका था , बायां पैर टूट गया था , इसलिए काउंटर अटैक के चांसेज कम ही थे और अब वह उसे खत्म ही करना चाहती थी।

जैसे ही उस हमलावर ने चाक़ू छोड़ा वह रीत के हाथ में पहुँच गया।

लेकिन उसके साथ ही साथ हमलावर के साथी ने खुली खिड़की से इंट्री मारी , रीत की पीठ उसकी ओर थी।
,
करन ने उसे अपने गन पे निशाने पे लेने की कोशिश की , लेकिन उसके पहले ही वो रीत के ठीक पीछे था , और उसका एक हाथ रीत की गर्दन में फंसा था , और दूसरे हाथ में पिस्तौल सीधे रीत की गर्दन पर।

और उस पिस्टल का दबाव रीत के साथ करन भी महसूस कर रहा था।

पहला हमलावर तो गिर गया था। उसका एक हाथ और पैर एकदम बेकार हो चुके थे और बाकी दोनों भी सिर्फ २० % काम कर रहे थे। १०-१२ हड्डियां ,लिगामेंट ,कार्टिलेज टूट चुके थे , और वह अब किसी काम का नहीं रह गया था।

लेकिन दूसरे हमलावर का पिस्टल का दबाव अब रीत के गर्दन के पिछले भाग पर बढ़ता जा रहा था।

रीत के हाथ से चाक़ू छूट का बिस्तर के नीचे गिर गया था।

लेकिन करन के हाथ में जो गन थी उसका निशाना भी सीधे दूसरे हमलावर के माथे के बीच था , और २०० फिट से करन का निशाना नहीं चुकता था यहाँ तो यह मुश्किल से ६-७ फीट की दूरी पर रहा होगा।

और ये बात हमलावर भी जानता था , एक साथ एक बार में वह रीत और करन को एलिएमनेट नहीं कर सकता था , जैसे उसकी पिस्टल चलेगी वो जानता था करन की गोली भी चल निकलेगी। यह सिर्फ रीत थी जो उसके और उसकी मौत के बीच में थी।



स्टेलमेंट।

करन को भी मालूम था की इस हमलावर को मौत का डर नहीं और वह रीत पर किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहता था

एक पल का गलत फैसला और,… मौत।

रीत भी जानती थी उसके पीछे खड़ा मौत का सौदागर ,प्रोफेशनल है और उसका कोई भी वार कुहनी का , घुटने का सिर्फ एक रिएक्शन करायेगा। वो ट्रिगर दबा देगा और पिस्टल एकदम उसके गले पर सरवाइकल वर्टिब्रा के ठीक ऊपर उसने सटा रखी थी। हलकी सी चोट भी दिमाग से जोड़ने वाली सारी धमिनयों , शिराओं और नर्व्स को तोड़ देता साथ ही ट्रेकिया को भी। डेथ इन्सटनटेनियस होती।


हमलावर अपने पिस्टल से करन को इशारा कर रहा था था की वो अपनी गन जमीन पर फ़ेंक दे वरना रीत पर गोली चल जायेगी।

उस काली रात की चादर में लिपटे कमरे में तीनो सिर्फ सिलयुहेट से लग रहे थे।

उस हमलावर को कमरे में घुसे एक मिनट भी मुश्किल से हुआ होगा लेकिन लग रहा था की युग बीत गया।

बिना कुछ बोले , वो एक दूसरे को चैलेन्ज कर रहे थे , और दिमाग पढ़ रहे थे।

करन ने देखा की हमलावर की भौंहे तनती जा रही हैं , उसका चेहरा और कड़ा हो गया है।

इसका मतलब उसने फैसला ले लिया है। और वह फैसला एक ही हो सकता है ,उसने रीत को शूट करना तय कर लिया है।


करन ने अपनी आँखों में थोड़ा डर पैदा किया और हमलावर को इशारा किया की वो अपनी गन नीचे कर रहा है।

करन जानता था की जैसे ही उसकी गन जमींन छूएगी , हमलावर की पिस्टल पहले रीत का शिकार करेगी फिर उसका।



मुस्कराकर हमलावर ने उसकी बात मान ली और रीत की गर्दन पर से हाथ और पिस्टल का दबाव कुछ कम किया।

लेकिन वह नहीं देख पाया की रीत और करन ने क्या बात की , सिर्फ हलके से मुस्कराकर।


और फिर बिजली की तेजी से कई घटनाएं हुईं।

रीत ने आँख बंद कर स्मरण किया और एकदम से अपनी साँस रोक ली।

उसकी देह एकदम लकड़ी सी हो गयी और सरककर वह दो इंच नीचे हो गयी।

अपनी गरदन भी उसने झुका ली , और उसी समय


करन के गन से गोली निकली। रीत के बालों को रगड़ती सीधे हमलावर के दोनों आँखों के बीच।

हमलावर ने जिस हाथ से रीत को पकड़ रखा था वो थोड़ी और ढीली हुयी और रीत सरक कर नीचे।

उसे मालूम था की गोली की आवाज सुनते ही रिएक्शन के तौर पर वह ट्रिगर दबा देगा , और यही हुआ।

हमलावर की दो गोलियां रीत से आधे इंच बगल से गुजरीं।

लेकिन करन का निशाना , पहली गोली ने जो छेद किया था दूसरी गोली भी उसी में लगी।

और रीत ने गिरते हुए उस हमलावर के डूंगरी से कमांडो नाइफ निकाल ली थी।








FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--189

  FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--189


 रीत





मिलन के बाद की नींद बहुत गाढ़ी होती है , और ऊपर से जब इत्ती लम्बी जंग खत्म हुयी हो , उसका टेंशन दूर हुआ हो , इतने दिन बाद साजन से भेंट हुयी हो।

तीनो गाढ़ी नींद में थे , बस नींद में कुछ उल्टा पुल्टी हुयी और अब रीत और मीनल अगल बगल और करन ,किनारे।


इतने दिनों तक दुर्दांत परस्थितियों से लड़ने के कारण ,या काशी के कोतवाल और दसों महाविद्याओं के आशीर्वाद के कारण , उसकी योग की दीक्षा के कारण या पता नहीं क्यों , रीत की छठी इन्द्रिय कुछ ज्यादा जागृत थी। कोई भी खतरा अानेवाला हो उसे १०-१२ मिनट पहले ही अंदाजा लग जाता था

और इसके कारण , कितनी बार वो दुश्मनों के खतरनाक से खतरनाक वार बचा ले जाती थी।

जहाँ किसी को कुछ भी हवा नहीं रहती थी वो खतरे को सूंघ लेती थी और भले ही उसकी सारी इन्द्रियां सुषुप्तावस्था में हो , उसके दिमाग में खतरे की घंटी बज जाती थी और पल भर में न वो सिर्फ चैतन्य हो जाती थी बल्कि , आनेवाले संकट से लड़ने उसे पराजित करने को , अपने आप उसकी दैहिक शक्तियां ,मेधा सब कुछ १०० गुना ऊर्जा के साथ जागृत होजाती थी।

और यही हुआ।

रीत की आँख खुली। सब कुछ वैसा का वैसा था।

कमरे में अँधेरा था , खिड़की का पर्दा हलका सा खुला था जिससे पास की समुद्र की हलकी हलकी लहरें दिख रही थीं।

दरवाजा खिड़की सब बंद थी , कोई भी आवाज नहीं आ रही थी। उसके कान एकदम जग चुके थे और अगर कोई चूहा भी चलता तो उसे सुनाई देता।

लेकिन चारो ओर चुप्पी थी।


उसकी खुली आँखे अब अँधेरे की अभ्यस्त हो गयी थी और बिना सर हिलाये अपने पेरीफेरल विजन से उसने देख लिया था , कहीं कुछ भी गड़बड़ नहीं था।

फिर भी उसके दिमाग में घंटी जोर जोर से बज रही थी।

बिना हिले चुपचाप उसने बगल में लेती मीनल का हाथ दबाया , वो भी जग चुकी थी।

अब तक उन दोनों की फिजिक्स केमिस्ट्री सब परफेक्ट हो चुकी थी और बिना कहे , बिना इशारे के दोनों एक दूसरे की मन की बात समझ लेती थीं। मीनल ही अब आपरेशन मोड़ चुकी थी।

उसने बगल में रखा रिमोट दबा दिया , जो पहले से ही म्यूट मोड़ में था।

कंट्रोल रूम की फीड आनी शुरू हो गयी।

मीनल ने पहले तो उसे स्लो रिवाइंड किया , फिर फास्ट रिवाइंड।

तीन -चार मिनट पीछे तक।

दोनों बिना हिले दम साधे देखते रहीं।

'गडबड 'मीनल फुसफुसाई।

'महा गड़बड़ ' रीत उससे भी धीमे से बोली और मीनल का हाथ जोर से दबा दिया।

कंट्रोल रूम की फीड में एक आपरेटर मॉनिटर से देख रहा और दूसरा टेलिस्कोप से खिड़की से बाहर देख रहा था।


लेकिन तीन मिनट की रिवाइंड में दोनों के पोस्चर में कोई चेंज नहीं था , और न ही कोई हरकत।

इसका मतलब साफ था की कंट्रोल रूम पर दुशमन का कब्ज़ा हो चूका था। और उसने वहां की फीड को लूप पे लगा दिया था।

इसलिए यहाँ से देखने पे बजाय कंट्रोल रूम दिखने के ,वहां की कुछ देर पहले की रिकार्डेड सीन ही बार बार दिखती। और यही हालत बाहर से आने वाले फीड की होती।

मीनल ने टीवी बंद कर दिया।

रीत ने मीनल की चार उंगलिया मोड़ दी और खुद , पलंग के किनारे से सरक कर नीचे उतर गयी और जमीन से एकदम सट कर क्राल करते हुए दीवाल से लगे हुए कबर्ड् के पास पहुंची।

ऊँगली मोड़ के उसने अपना असेसमेंट मीनल को बता दिया था , ४-५ मिनट के बीच में हमला होगा , और उन्हें निशब्द, हमले के लिए तैयार रहना होगा। कंट्रोल रूम कम्प्रोमाइज होने के बाद बाहर से किसी हेल्प की इतनी कम समय में आने की उम्मीद करना बेकार होगा।

उन्हें खुद न्यूट्रलाइज करना होगा।
डेढ़ मिनट में रीत न सिर्फ कबर्ड के अंदर थी ,बल्कि एक बार पूरी तरह 'ड्रेस्ड ' थी।

रीत ने अपने शस्त्रों से अपने को पूरी तरह लैस करना शुरू कर दिया। उसके सबसे बड़े शस्त्र थे, उसकी तत्परमती, धैर्य और उसकी देह। कबर्ड के अंदर घुस कर उसने सारे टंगे कपडे अपने आगे कर लिए , जिससे अब वह पूरी तरह ढकी छुपी थी ,सिर्फ एक छोटी सी झीर्री थी और कबर्ड के दरवाजे भी उसने आलमोस्ट चिपका के रखे थे और वहां भी उसने सिर्फ एक हलकी सी झिर्री छोड़ रखी थी।

इतना काफी था उसके लिए बाहर की खबर रखने के लिए। आँखे उसने बंद कर ली , और अब देखने के लिए कान थे उसके पास। हलकी सी आहट ,हवा की सरसराहट , भी उसे सूचना दे देती आने वाले खतरे की।

जोर से उसने साँसे भींची और फिर अंदर की सारी हवा बाहर और साथ में सारा तनाव , दुश्मन के बारे में सोच ,सब कुछ बाहर। एक बार उसने फिर आँख बंद की , गहरी सांस ली काशी के कोतवाल के साथ सारी महाविद्याओं को याद किया , और धीमे धीमे ,… अब वह रीत नहीं रही। उसका पूरा शरीर एक अमोघ अस्त्र बन चूका था जिसका संधान किया जा चूका था और अब सिर्फ छोड़ने की देर थी।


और इन तीन मिनटों में करन भी पूरी तरह अलर्ट हो चुका था।

वह भी अपने अस्त्रों से लैस था और मीनल के साथ बिस्तर से उतरकर नीचे पलंग के छिपा था। मीनल भी उसके साथ थी और दोनों फर्श से एकदम चिपके थे।

बिस्तर से उतरने के पहले तकिये और कुशन उन्होंने इस तरह से लगा दिए थे की कोई पास से भी देखता तो उसे यही लगता की लोग रजाई के अंदर सो रहे हैं। यही नहीं उस बड़ी रजाई को उन्होंने इस तरह नीचे भी खींच दिया था की ,खिड़की की ओर वह करीब फर्श छो रही थी और बिना उसके हटाये , पलंग के नीचे झांकना भी मुश्किल था।

उन्हें आशंका यही थी की हमलावर खिड़की की ओर से ही घुसेंगे और उसके बाद की स्क्रिप्ट उनके घुसने के बाद ही तय होनी थी।

रीत कबर्ड के अंदर।

मीनल,करन पलंग के नीचे।

और बाहर से जो भी अंदर घुसेगा उसे यही लगेगा की वो सारे रजाई के अंदर गहरी नींद सो रहे हैं।

कुछ देर इन्तजार में गुजरा।

वो दो चार मिनट घण्टो ऐसे लगे।

रीत को लग रहा था की कंट्रोल को न्यूट्रलाइज करने के बाद हमले में ६-७ मिनट का समय लग सकता है।

उन्हें ये मालूम था की ये लोग कहीं बाहर नहीं जा सकते। इसलिए उनकी पहली प्रायरिटी होगी , सेफ हाउस चेक करना की वहां कोई और सपोर्ट स्टाफ या सिक्योरिटी स्टाफ तो नहीं है और अगर है तो उसे सिक्योर करना। उन लोगों के बेड रूम और कंट्रोल के अलावा , किचेन समेत तीन कमरे और थे।

इन कमरों के बाद , वह बाहर से आनेवाले किसी खतरे के लिए भी प्रोटेक्शन करते , और सारे कम्युनिकेशन डिस्ट्राय करते। इन सारे कामों में ६-७ मिनट का समय लगना था और रीत और करन के पास यही समय था , काउंटर अटैक के लिए तैयार होने का और डिफेंस सोचने का।

उस में से ४-५ मिनट निकल गए थे और अब किसी भी पल दुश्मन अंदर घुस सकता था।



हमलावर





दोनों क्राल करके बाहरी पैरामीटर तक पहुँच गए , और नाइट विजन ग्लासेज की सहायता से दूर से ही उन्होंने इलेक्ट्रिफाइड फेंस और कैमरे देख लिए थे।

उनके लिए उस फेन्स को काटना इंसुलेटेड वायर कटर से ज्यादा आसान था , लेकिन करेंट डिसकनेकट होते ही सर्किट ट्रिप होती और अलार्म बज जाता , दूसरे किस जोन में सर्किट ट्रिप हुयी थी ये पता चलते ही उनकी लोकेशन भी पता चल जाती।

कैमरे रोटेट कर रहे थे और उन्होंने ये भांप लिया था की दो मिनट का एक गैप आता है , जब करीब चार फिट फेन्स कैमरे की जद में नहीं आती।

बस उसी दो मिनट का इस्तेमाल कर के , उन्होंने तार का एक लूप जेब से निकाला और इलेकट्रिफाइड फेंस में लगा दिया। और पीछे क्रॉल कर गए।

अब अगले दो मिनट के गैप में उन्होंने उस लूप के बीच वायर काट दिया। लूप के कारण , इलेक्ट्रिल सर्किट ब्रेक नहीं हुयी और एकदम जमींन से सट कर घिसटते अंदर घुस गए।

एक के अंदर घुसने तक दूसरा बाहर इन्तजार करता रहा और जब कोई अलार्म नहीं बजा तो अगले गैप में दूसरा भी अंदर था।

इलेक्ट्रिफाइड फंस और कैमरे ने ये स्पष्ट कर दिया था की वो टारगेट पर हैं।

एक ने दायें ओर से दूसरे ने बायें से घर का चक्कर काटना शुरू कर दिया।

अब उन्हें मालूम था की अगर कैमरे होंगे भी तो दरवाजे के ऊपर या रास्ते पे।


एक खिड़की थी जिसका पर्दा हल्का सा हटा था। उसके शीशे पे सक्सन माइक लगा के कुछ देर उसने सुना , हलके हलके खर्राटे की आवाज आ रही थी। ये साफ था की करन, रीत यहीं सो रहे होंगे।

सक्शन कप चिकने से चिकने सर्फेस पर चिपक जाता था और अंदर की बात चीत को न सिर्फ सुनता था बल्कि वायरलेस माइक के जरिये डिस्पैच भी करता था। मुश्किल से दो पल रुकने के बाद वो वहां से आगे के लिए चल दिया ,क्योंकि अब इस कमरे की बातचीत उसके कान में लगे बड़ माइक में उसे सुनाई पड़ती।

यह बात जरूर थी की पर्दों के चलते आवाज काफी हलकी आती लेकिन इतना भी उसके लिए काफी था।

अब वह खड़ा हो गया था और उसकी पीठ दीवाल से एकदम सटी थी। अगर छत पर कोई कैमरा लगा होता तो भी दीवाल से सटे होने के कारण वो उसकी पहुँच के बाहर होता।

दूसरे अगर मकान से बाहर निकल कर कोई चक्कर लगा के भी देख रहा होता तो उसके कैमोफ्लाज और दीवाल से चिपके होने के कारण , उसे दिखाई देना मुश्किल था। दो और खिड़कियां थी ,लेकिन उनसे न कोई आवाज आरही थी न लाइट और परदे भी उनके पूरे बंद थे। उसे पक्का विश्वास था की टारगेट वहीँ थे जहाँ उसने खिड़की पे माइक लगाया था।



घर के वो जबतक सामने पहुंचा , वहां उसका साथी झुका बैठा था , और ऊपर की खिड़की से हलकी रौशनी भी आ रही थी और आवाजें भी। सक्शन माइक उसकी खिड़की पर लग चुका था , और उसके साथी ने उसे कान में लगाने का इशारा किया।

फीड हलकी थी लेकिन साफ थी।

" अरे यार चलो अब बस तीन साढ़े तीन घंटे बचे है , फिर ये रतजगा बंद। वो अपने रास्ते ,हम अपने। "

" कहाँ जाएंगे " ये दूसरी आवाज थी।


" क्या मालूम और मुझे पता करने की जरूरत भी नहीं , तुम्हे आधे घंटे हो गए जा के एक चक्कर लगा के आ जाओ। "
" अरे यार यहाँ कौन आएगा , आधे घंटे पहले तो गया था। "

तब तक फोन की घण्टी बजी और स्पीकर फोन के बटन के दबाने की हलकी आवाज आई।

' आल ओके ' फोन से आवाज आई।

' हाँ '

' और एक्सटर्नल पेरीमीटर '

अबकी दूसरा बोला , " हाँ आधे घंटे पहले लौटा हूँ , सब ठीक है , बस जा रहा हूँ। "

' ओके , आधे घंटे में दुबारा फोन करूँगा , इन का एक्सट्रैक्शन हो सकता है थोड़े पहले हो जाए पौने छ तक मैं पन्दरह मिनट पहले कन्फर्म करूँगा। "

और इसके बाद फोन कटने की आवाज आई।

इन दोनों को काम की सारी बातें मिल गयी थीं। आधे घंटे में इनका कंट्रोलर चेक करता है , और अभी चेक किया है इसका मतलब आधे घंटे में दुबारा फोन करेगा। और जवाब न मिलने पर वो दुबारा ४-५ मिनट चेक कर के हो सकता है आये , यानी करीब ८-१० मिनट और।

इसका मतलब उनके पास ३०-३५ मिनट की क्लियर विंडो है।

और अंदर दो लोग हैं ,एक आधे घंटे बाद बाहर निकलकर चेक करता है और दूसरा कैमरे के जरिये नजर रखे है। दोनों ही ट्रेंड कमांडो होंगे।

तबतक अंदर से फिर आवाज आई ," अच्छा ,अब तुम चलो। "

और दरवाजा खुलने की आवाज आई।
दोनों अलर्ट हो गए। 


 एक आदमी अंदर से निकल कर जैसे ही मुड़ा , वो दोनों तैयार थे।

पीछे से अँधेरे से निकलकर एक ने उसे पीछे से दबोचा और सीधे हाथ मुंह पे जिस से कोई चीख न निकल पाये। साथ में क्लोरोफार्म में डूबा पैक नाक पे।

उन्हें इंस्ट्रक्शन साफ थे की आखिरी टारगेट तक फायर आर्म का इस्तेमाल नहीं करना है , और सिक्योरिटी फोर्सेज को सिर्फ न्यूट्रलाइज करना है , बिना कोई आवाज किये।

उनका सबसे बड़ा वेपन सरप्राइज था।

क्लोरोफार्म के साथ एक चाप उसकी गर्दन पे भी पड़ा और वो बेहोश होके नीचे , लेकिन रोकते हुए ,गिरते गिरते आवाज हलकी सी हो हो गयी , और अंदर कंट्रोल रूम से आवाज आई , क्या हुआ ?


दरवाजा दुबारा खुला , लेकिन अबकी पहला हमलावर तैयार था और दरवाजा खुलते ही दो स्मोक बॉम्ब उसने कंट्रोल रूम के अंदर फेंके और जब तक कंट्रोल रूम का ऑपरेटिव कुछ समझता , टेजर गन के दो डाट उसके अंदर पैबस्त थे और वो आलमोस्ट बेहोश था।

क्लोरोफार्म का पैच उसके मुंह पर भी लगा , और उसके बाद उसे गैग कर प्लास्टिकफ से उसके हाथ पीछे कर बाँध दिए और पैर भी। यही नहीं एक काले कपडे की पट्टी उसके आँख पे भी कस के बाँध दी गयी।

और यही काम बाहर गिरे आपरेटिव के साथ भी हुआ। वैसे क्लोरोफार्म का असर कम से कम ४५ मिनट रहता और उसके बाद भी पूरी तरह गैग और बंधे वो किसी काम के नहीं थे।
एक पल के लिए उनकी नजर कंट्रोल मॉनिटर पर पड़ी लेकिन अचानक एक पैनल देख के दोनों चौक गए। उन दोनों की पूरी तस्वीर वहां आ रहा था।


दोनों ने चारो ओर निगाह डाली और ढूंढते हुए आखिर वो कैमरा मिल गया जो कंट्रोल रूम पे निगाह रख रखा था।

पहले तो उन्होंने उस कैमरे को उतारा , और पिछले ५ मिनट की रिकॉर्डिंग डिलीट की , जिसमे उनके कंट्रोल रूम पे कब्जा करने की दास्तान कैद थी।

" ये कैमरा इन दोनों के लिए तो रहा नहीं होगा , कोई और मॉनिटर कर रहा होगा " एक बोला और फिर उसने कैमरे की रिकारिडंग थोड़ी पीछे कर के लूप बना कर सेट कर दी लेकिन कैमरे की क्लॉक भी टिंकर कर दी।

अब जो भी उस कैमरे की फीड देखता , पांच मिनट से पहले की तीन मिनट की फीड देखता जो बार बार लूप होती लेकिन क्लॉक चलती रहती।

अभी भी काफी काम बाकी था .

जिसने रीत के कमरे के बाहर माइक लगाया था ,उसने घर चेक करने की जिम्मेदारी सम्हाली और दूसरे ने बाहर की एरिया सिक्योर करने की , और तुरंत बाहर निकल लिया। उन लोगों के बोट से उतरे १२ मिनट हो चुके थे और ५-६ मिनट में उन्हें आपरेशन शुरू कर देना था। १५ मिनट आप्रेशन के और ५-१० मिनट वापस तट पर पहुँचने के , कुल ४५ मिनट समय उन्होंने तय किया था। और आपरेशन सक्सेसफुल होते ही उन्हें प्रीफेड कनफर्मेंशन मेसेज करना था।

बाहर का इलाका सिक्योर करने का पहला स्टेप था , जैमर लगाना और टेलीफोन केबल काटना।


 बाहर का इलाका सिक्योर करने का पहला स्टेप था , जैमर लगाना और टेलीफोन केबल काटना।

अब वहां से बाहर कम्युनिकेशन इम्पॉसिबल था।

जो आदमी एक्सटरनल पेरीमीटर पर एक नजर डाल रहा था ,फेन्स सिर्फ एकजगह से खुली थी जहाँ से सड़क का रास्ता था।

कोई आएगा तो इधर से ही आएगा। उन लोगों ने जो फोन सुना था , उसके हिसाब से आधे घंटे पे उसका फोन आना था और कोई जवाब न मिलने पर ४०-४५ मिनट पर ही वो आता , लेकिन उसके पहले भी अगर वो या और कोई आया तो उसका 'इंतजाम 'तो करना था।


सड़क पर करीब ५०० मीटर दूर उसने कुछ डिटोनेटर लगा दिए , और अब कब कोई भी वेहिकल वहां से गुजरती या पैदल भी तो प्रेशर पैड्स से वो अलरम ट्रिप होते जो साउंड अलार्म ट्रिगर करते।

फिर घर के एकदम पास करीब २०० मीटर दूर उसने दो एंटी पर्सोनल माइंस लगा दीं और उन्हें मार्क भी कर दिया। कोई भी वेहिकल अगर उसके ऊपर से गुजरती तो प्रेशर से वो माइंस ब्लास्ट होतीं। ये एम १६ माइंस थीं और इनका कैजुअल्टी रेट २० से २५ मीटर तक था। दोनों माइन उसने अच्छी तरह कैमोफ्लाज कर दिया। रात के अँधेरे में कुछ भी दिखना मुश्किल था , और ऊपर से कोई इन्हे सस्पेक्ट नहीं करता।

अब अगर अंदर से टारगेट कोई हेल्प मांगते भी तो जैमर की वजह से मुश्किल था और अगर कोई हेल्प आई भी तो ये दो माइंस उनके लिए काफी थे।

तबतक उसके पास उसके साथी का मेसेज आया इनर एरिया सिक्योर।


और वह वापस घर की ओर बढ़ लिया।


उसके साथी ने ,जिसने रीत का कमर आडेंटीफाई किया था , घर के अंदर के सारे कमरे ,किचेन बाथरूम के साथ चेक कर लिए थे।

सारे कमरे खाली थे। कंट्रोल रूम के दोनों आपरेटिव के अलावा कोई नहीं था।

फिर भी उसने सारे कमरों के दरवाजे बाहर से बंद कर के उसमे प्लास्टिकफ़ लगा के लाक कर दिया।

अगर कोई रिजक्यू टीम आई तो हो सकता है वो इन कमरों की खिड़कियों से घुसने की कोशिश करे , तो अगर वो कमरे में घुस भी गए तो उन्हें दरवाजे को तोडना पडेगा।
रीत का कमरा भी उसने बाहर से लाक कर दिया था। अब रीत करन अपने बिल में बंद थे और सिर्फ उन्हें उस कमरे में घुस के एलिमिनेट करना था। न वो कहीं बाहर भाग सकते थे ,न कहीं बाहर से हेल्प आ सकती थी।

उसने एक बार फिर ध्यान से फीड सुना , रीत के कमरे से कोई आवाज नहीं आ रही थी।

इसका मतलब वो सभी निश्चिन्त सो रहे थे।

दोनों एक साथ बाहर रीत के कमरे के सामने इकट्ठे हुए। खिड़की से उनकी नाइट विजन ग्लासेज से साफ दिख रहा था , बिस्तर पर सब सो रहे थे , रजाई से ढंके , हाँ रजाई थोड़ी सी सरक गयी थी एक ओर , जो अक्सर अगर एक पलंग पे कई लोग सोएं तो हो जाता है।


जो आदमी एक्सटर्नल एरिया चेक कर के आया था उसने अपने को कंट्रोल रूम के बाहर पोजीशन किया , जहाँ से वो बाहर का रास्ता देख सकता था , कंट्रोल रूम में कोई फोन आये तो सुन सकता था और वहां से रीत की खिड़की के बाहर खड़े अपने साथी के विजुअल कांटैक्ट में भी था। दोनों के बीच की दूरी मुश्किल से ८० -८५ मीटर थी और कोई बात होने पे वो १५-२० सेकेण्ड पे पहुँच जाता।

और दोनों इयर बड और फेस माइक के जरिये कांटैक्ट में थे ही।

पहला आदमी खिड़की से घुस के टारगेट को एलिमिनेट या न्यूट्रलाइज करता और चार मिनट के बाद दूसरा भी अंदर पहुँच जाता।

फिर दोनों को बोट पर बैठे अपने कंट्रोल को सक्सेस मेसेज देना था जहाँ से सेट फोन से वो सब मेरीन को और कमांड सेण्टर को मेसेज भेजता।



पहले हमलावर ने एक पल के लिए खिड़की से अंदर कमरे को देखा और चारो ओर की पोजीशन चेक की। पहली बार से कोई फरक नहीं था। या तो वो खिड़की शीशा तोड़ के दाखिल होता लेकिन वो रीत और करन के बारे में अच्छी तरह ब्रीफ किया गया था और उसकी सक्सेस ९०% सरप्राइज पर ही डिपेंड करती थी।

उसने अपनी डुंगरी की जेब से मल्टी पर्पज ५.११ डबल रिस्पॉन्डर नाइफ निकाला , और खिड़की के शीशे पर एक निशान खींचा और दुबारा जब परपेँडिकुलर प्रेशर लगा कर उसने काटना शुरू किया तो पूरा का पूरा ग्लास नीचे से कट गया लेकिन वो अलर्ट था और शीशे के टूट कर गिरने के पहले उसने एक शीट पर सारा ग्लास कलेक्ट कर लिया जिससे कोई आवाज न हो। अब पूरी खिड़की बिना शीशे के थी और कोई भी जैग्गड एजेज नहीं थी।

कमरे में अभी भी कोई हरकत नहीं थी।

उसके बाद कमरे में घुसना बच्चे का खेल था।

















( लेकिन उसे नहीं मालूम था आगे क्या होना है। )







Monday, August 3, 2015

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--188

  FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--188


 एक नयी सुबह



कोई और वक्त होता तो मैं उसकी बात पे मुस्कराता , लेकिन आज बामशक्कत मैंने आँखे नम होने से रोकी।

और वो बाथरूम में घुस गयी। दरवाजा खोलने के लिए उसने अनजाने में दायां हाथ इस्तेमाल किया और जो चिलक उठी तो बड़ी मुश्किल से उसने चेहरे पर आये दर्द के अहसास को तुरंत पोछ के साफ किया।


कुछ देर बाद ही हुक्मनामा आया , बाथरूम के बंद दरवाजे के पीछे से ,


" चाय मिलेगी क्या ?

" एकदम ,गरमगरम कड़क , *** गढ़ स्पेशल। " मैंने जवाब दिया और किचेन में लग लिया। भाभी का मेसेज आया था की वो लोग बस १५ -२० मिनट में पहुँच रहे हैं और मैं गुड्डी से कह दूँ चाय बनाने के लिए। वो लोग बहुत चयासी हो रही हैं। और मैंने पानी बढ़ा दिया।


कुछ देर में गुड्डी बाथरूम से निकली , अपने कमरे में गयी और जब तक बाहर निकली तो टेबल पर टीकोजी से ढंकी केटली में चाय हाजिर थी , और साथ में मैं,खड़ा , कंधे पर छोटी टॉवेल,एकदम रामू काका की तरह।

और गुड्डी ने बैठ कर जैसे ही मुझे देखा , बस बेसाख़्ता मुस्करा पड़ी।


जोश का एक शेर याद आया ,

यह बात, यह तबस्सुम, यह नाज, यह निगाहें,
आखिर तुम्हीं बताओं क्यों कर न तुमको चाहे।


लेकिन फिर याद आया , रामू काका शेर थोड़े ही पढ़ते हैं।

और गुड्डी ने हुक्म दिया , अब चलो तुम भी पी ही लो।

बस मैं बैठ गया , और चाय ढालने के लिए जो केतली पकड़ी तो उसकी आँखों ने मना कर दिया और ,और फिर बाएं हाथ से ,… बाएं हाथ के इस्तेमाल में वो एकदम सौरभ गांगुली हो रही थी।

चाय की पहली चुस्की के बाद ही उसने मुंह बनाया और बोली , चीनी कम.

इस जुमले ने क्या क्या न याद दिलाया , ये बात रोज मैं बोलता था जब गुड्डी बेड टी लेकर आती थी और ये बहाना होता था गुलाब की टटकी पंखुड़ियों से एक चुम्बन चुराने का।

वह चीनी का डिब्बा बढ़ा देती थी , अपने सुर्खरू लब।

और आज मैंने अपने होंठ।

होंठो का वो आलिंगन कब तक चलता पता नहीं , लेकिन बाहर दरवाजे पर घंटी बज गयी। भाभी आ गयी थी।

मैं उठ के दरवाजा खोलने गया और बेसाख़्ता मेरे दिल में ख्याल आया ,पता नही रीत करन कैसे होंगे। अब कुछ देर में उनके फ्लाइट का टाइम होगा।










( अब बिचारे आनंद बाबू के पास वो जादुई शीशा तो हैं नहीं ,जिसमें कहीं का नजारा नजर आ जाय , लेकिन उन्हें दरवाजे पर छोड़ कर चलते हैं हजीरा ,रीत के पास जहाँ वो मीनल और करन के साथ बेख्वाब नींद में ग़ाफ़िल थी , क्या हो रहा है वहां ).


 हमला



गाढ़ी काली स्याही की चादर में लिपटा अरब सागर गहरी नींद में सो रहा था। शांत ,थका। बस कभी कभी छोटी छोटी कोई लहर चली आती। ऊपर आसमान भी जैसे उसी का प्रतिविम्ब हो रहा था।

बादलों ने चादर तान रखी थी और न चाँद न तारे ,सिर्फ काला आसमान।

हवा भी एकदम बंद थी।

जैसे कुछ होने की आशंका से चाँद अपना काम निपटा के जल्दी जल्दी पग भरता ,अपने घर की ओर भागा जा रहा था। पर रात अभी बाकी थी।

आखिरी पहर था रात का।

प्रत्युषा ने अभी अंगड़ाई भी लेनी नहीं शुरू की थी। और वैसे भी पश्चिमी तट पर सुबह थोड़ी देर से ही होती थी।

और अरब सागर के उस कोने में वैसे भी कोई आबादी नहीं थी , बस सन्नाटा था।


लेकिन तभी एक काली नीली रंग की इंफ्लेटबेल बोट क्षितिज पर उभरी। लहरों के बीच छुपी ढकी।

करीब ५ मीटर लम्बी , ढाई मीटर चौड़ी।

जिसे मिलेट्री आपरेशन के बारे में थोड़ा भी ज्ञान होता वो पहचान लेता की ये सी आर आर सी ( कॉम्पैक्ट रबर रेडिंग क्राफ्ट ) है , या जिसे अकसर ज़ोडियक के नाम से भी जानते है। यह उछलती कूदती लहरों पर भी तैर लेती है और अगर जहाँ चार फिट तक ही पानी हो वहां भी उसे समस्या नहीं आती।

कैमोफ्लाज रंग के चलते रात के अँधेरे में पास से भी उसका पता करना लगभग असंभव था।

तट पर आने के पहले वो कुछ देर ठिठकी , ठहरी और जब उसे लग गया की इस काली रात में उसे किसी ने नहीं देखा तो , दो आदमी उसमे से निकल कर हलके पानी में कुछ देर तैर कफिर चल के तट पर आगये।

काली डुंगरी के साथ उनके चेहरे बालाक्लवा से ढंके थे और उनपर भी कैमोफ्लाज पेंट पुता हुआ था।

आँखों पर बहुत हलकी नाइट विजन गॉगल्स बी एन वी डी ( बयानोक्यूलर नाइट विजन डिवाइस ) लगे हुए थे जिसका तकनीकी नाम एल 3 एन / पी वी एस 31 है।

वह दोनों स्पेशल सर्विस ग्रुप ( नेवी ) के चुने हुए लोगों में से थे। १२ घंटे में ५५ किलोमीटर मार्च, सारे सामान के साथ आधे घंटे में ८ किलोमीटर दौड़ना , अंडरवाटर डाइविंग के साथ साथ हाई अल्टीट्यूड हाई ओपनिंग और है अल्टीट्यूड लो ओपनिंग पैराशूट ट्रेनिंग उन्होंने डिस्टिंक्शन के साथ पूरी की थी।

लेकिन उससे महत्वपूर्ण बात ये थी की उन्होंने अमेरिकन नेवी सील्स के साथ ट्रेनिंग की थी और उन गिने चुने लोगों में थे जिन्हे २४ हफ्ते की बड्स ट्रेनिंग ( बेसिक अंडरवाटर डिमॉलिशन ट्रेनिंग ) के साथ साथ सील क्वालिफिकेशन ट्रेनिंग ( एस क्यू टी ) और सील ट्रूप ट्रेनिंग ( एस टी टी ) भी की।

नेवी सील के साथ कई बार स्पेशल बोट सर्विस ( एस बी एस ) जो ब्रिटिश नेवी की स्पेशल यूनिट है ,उन्होंने ज्वाइंट एक्सरसाइज में भाग लिया था। अभी कुछ दिनों पहले तक वह कराची में पी एन एस इकबाल के पार्ट थे , लेकिन उसके बाद कराची में ही बेस्ड के स्पेशल अंडरकवर आपरेशन के पार्ट हो गए थे जिसके बारे में आई एस आई के भी कुछ लोगों को ही पता था।

वह इन्फ्लेटेबल बोट एक मिडगेट सबमैरीन के जरिये आई थी और सी कोस्ट के कुछ दूर पहले कुछ देर के लिए सरफेस हुयी थी जहाँ पर उसने इन्फ्लेटेबल बोट उतारी थी।

टारगेट सी कोस्ट से ४५० मीटर दूर था।

घुप्प अँधेरे में भी वो साफ दिख रहा था। 




टारगेट



टारगेट सी कोस्ट से ४५० मीटर दूर था।

घुप्प अँधेरे में भी वो साफ दिख रहा था।


सी कोस्ट से ही वो क्राल करके आगे बढ़ रहे थे , हालंकि उनके नाइट विजन से साफ दिख रहा था की आस पास कोई नहीं है। शोल्डर ,हिप्स एक लेवल पर थे और वो सिर्फ ऐंकल को पुश करते करते बढ़ रहे थे।

करीब २०० मीटर क्राल करके वो रुक गए। टारगेट अब २५० मीटर के आसपास था। सारी खिड़कियां बंद थी और पर्दों से ढंकी। सिर्फ एक खिड़की का पर्दा कुछ हटा था।

उनका अंदाज था की एक्सटर्नल सिक्योरटी पैरामीटर २५० मीटर पर सेट किया गया होगा , इसलिए उसके १०-१५ मीटर पहले ही वो रुक गए।


 सेफ हाउस





हाथी को कहाँ छुपा सकते हैं ,

हाथियों के बीच। ये एक बड़ा पुराना सवाल जवाब है।

लेकिन अगर उस हाथी के साथ आप दो चार एक्स्ट्रा महावत रखें , उसका हौदा बुलेट प्रूफ बना दें। तो क्या वो हाथी बाकी हाथियों में छिप सकेगा ?


बिलकुल यही समस्या सेफ हाउस की होती है।

उसकी सबसे बड़ी सिक्योरिटी है , इंटेलिजेंस। उसके बारे में किसी को पता न चले। और दूसरी है आसपास के माहौल में वो खप जाय।

उसके साथ वो चीज भी जुडी है जो सारे सिक्योरिटी आपरेटस के साथ जुडी है ,सिक्योरटी का लेवल ,थ्रेट परसेप्शन के हिसाब से होता है। अगर थ्रेट परसेप्शन काम हो गया है तो सिक्योरिटी का लेवल जाएगा।

और दूसरी बात मौके की है , अगर बहुत पहले से मालूम है की ऐसा कुछ इंतजाम करना है , जैसे किसी टेररिस्ट को पकड़ कर इंट्रोगेट करना है और उसे छुड़ाने वाले ग्रुप के हमले की आशंका है तो पहले से ही तैयारी की जा सकती है।

लेकिन अगर कोई मेहमान अचानक आ जाए तो फिर दाल में पानी बढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।


इस हालत में भी यही हुआ।

जब करन ,रीत और मीनल चले थे बड़ोदरा से , तो किसी को नहीं मालूम था की ऐसी कोई जरूरत पड़ेगी। हाँ ,जब रास्ते में कालिया के स्ट्राइक की बात पता चली तो ये तय हुआ की मीनल को रास्ते में उतार लिया जाय और उसे हजीरा में एक रेस्ट हाउस में रखा जाय जिसे सेफ हाउस में कन्वर्ट कर दिया गया। मीनल की एक सहेली सूरत में आई पी एस ट्रेनी थी और उस से ये चीज और आसान हो गयी।

लेकिन मीनल का थ्रेट परसेप्शन बहुत ज्यादा नहीं था , क्योंकि उसे रीत के साथ लोगो ने देखा जरूर था पर कालिया एक पेड असेसेन था जो सिर्फ एक बार स्ट्राइक करता था और वो उसने कर दिया था। उम्मीद ये थी की वो शायद इसके बाद देश के बाहर चला गया हो। लेकिन तब भी जब तक मुम्बई का आपरेशन पूरा न हो यानी एकदो दिन के लिए मीनल को आइसोलेट कर के सिक्योरटी के साथ रखना था। इसलिए उसे एक आइसोलेटड रेस्ट हाउस दे दिया गया , जिसमें और लोग नहीं रह रहे थे। उसके साथ कुछ देर तक उसकी सहेली थी फिर एक महिला पी एस ओ ( पर्सनल सिक्योरटी आफिसर ) उसके साथ दे दिया गया था साथ में इलेक्ट्रानिक सरवायलेन्स और एक पुलिस मोबाइल जो हर दो घंटे पर वहां चक्कर काटती।

और उस से काम बखूबी चल भी गया।

ये इंतजाम लोकल पुलिस का था जिससे ज्यादा शेयर किया भी नहीं जा सकता था।

और करन रीत के मीनल के पास एक दिन रुकने की बात भी जिस सुबह वो लोग आई एन एस आश्विन , नेवी के हॉस्पिटल से रिलीज हो के चले उसी समय पता चली। उस समय वो लोग नेवल सिक्योरिटी के अधीन थे।

उन के साथ भी मुम्बई के सफल आपरेशन के बाद , सिक्योरिटी थ्रेट लेवल लो कर दिया गया था क्योंकि काफी सारे लोग पकड़े जा चुके थे।

दूसरी बात ये भी थी एजेंट्स का सारा पकड़ने, समेटने और उन्हें इंट्रोगेट करने के चक्कर में आई बी भी पूरी तरह ओवर स्ट्रेच्ड थी। तब भी एक डिप्टी डायरेकटर लेवल के आफिसर ने सारा सिक्योरटी डिटेल रिव्यू किया था और कुछ चीजों में उन्हें फर्दर स्ट्रेंथन भी किया।

सेफ हाउस में चार पांच चीजें इम्पार्टेंट होती हैं ,जैसे लोकेशन, इलेक्ट्रानिक सरवायलेन्स, ट्रेंड सिक्योरिटी पर्सोनल , रिजक्यू रिस्पांस टीम और कमांड कंट्रोल सेंटर और वहां से कम्युनिकेशन।



लेकिन सबसे इम्पोर्टेंट है लोकशन।

सेफ हाउस की सबसे बड़ी मजबूरी है वहां खुल के सिक्योरिटी ज्यादा डिप्लॉय नहीं की जा सकती , वरना ये तो बोर्ड लगाना हो जाएगा की हमारा एक इम्पोरटेंट असेट यहाँ है। इसलिए लोकेशन की इम्पोरटेंस बढ़ जाती है। और सिक्योरिटी एजेंसीज हमेशा उलटा सोचते हैं , इसलिए पहले ये देखा जाता है की हमला किधर से होगा। अगर हमला एक साथ तीन चार दिशाओं से हो सकता हो तो उसे तुरंत खारिज कर दिया जाता है।

और सबसे अच्छी लोकेशन वो होती है जिससे आने जाने का रास्ता सिर्फ एक ओर हो और उसे ट्रैक करना और सील करना ज्यादा आसान होता है।

इस मामले में ये लोकेशन बेहतर थी इसके पीछे की ओर समुद्र था और सामने से सिर्फ एक आने जाने की सड़क थी , और उसी से खतरे के आने की आशंका थी और उसे ट्रैक करना सुगम भी था।

ये नहीं था की समुद्र के रास्ते का असेसमेंट नहीं हुआ था।

नेवल सिक्योरटी और कोस्ट गार्ड दोनों ने उसका थ्रेट असेसमेंट किया था और उसे लो थ्रेट बताया था। इसके पहले २६/११ को हुए हमले में 'वो ' फिशिंग बोट से मुम्बई में मच्छीमार नगर में रात में आये थे जहाँ सैकड़ों मछली मारने की नावें रात में आती हैं। फिर उन्होंने एक अपहृत हिन्दुस्तानी नाव इस्तेमाल की थी। इसलिए उन नावों के बीच उनकी नाव भी आ गयी थी।

और इस जगह कोई मछली मारने की नावों की जेट्टी आसपास पचास साठ किलोमीटर तक नहीं थी।

बीस किलोमीटर दूर एक फर्टिलाइजर जेटी थी ( जहाँ नेवल शिप से रीत और करन आये थे ) और दूसरी ओर एक नया बन रहा पोर्ट था। दोनों को तीन दिन के लिए बंद कर दिया गया था। और वहां वैसे भी बड़ेकार्गो शिप ही आते थे।

समुद्र का तट राकी था और दिन में १६ -१८ घंटे समुद्र चापी रहता था। और किनारे पर गहराई ४-५ फिट ही थी करीब ६०० मीटर तक। इसलिए वहां लैंडिंग की सम्भावनाये नगण्य थी।

फिर भी तट से करीब ८-१० किलोमीटर दूर , कोस्टगार्ड की बोट्स नजर बनाये हुए थीं। ( चापी समुद्र , रॉक्स और कम गहराई के कारण उन्हें भी दूर से ही नजर रखना था ).


सड़क की ओर एक कमांड पोस्ट बना दी गयी थी और आधी सड़क को रिपयेअर के नाम पे बंद कर दिया गया था , जिसे कोई बड़ी वेहिकल जैसे ट्रक आदि एक्सप्लोसिव के साथ न आ सके। वहां से सेफ हाउस के बीच कम्युनिकेशन लाइन भी बना दी गयी।

उस रेस्ट हाउस के चारो ओर फेंसिंग पहले से थी , मीनल के आने के बाद उसे और स्ट्रांग कर दिया गया था और सरवायलेन्स कैमरे भी फिट कर दिए गए थे। 




जब करन और रीत आये तो उसे एलेक्ट्रिफाई भी कर दिया गया।




सिक्योरिटी अरेंजमेंट



उस रेस्ट हाउस के चारो ओर फेंसिंग पहले से थी , मीनल के आने के बाद उसे और स्ट्रांग कर दिया गया था और सरवायलेन्स कैमरे भी फिट कर दिए गए थे।

जब करन और रीत आये तो उसे एलेक्ट्रिफाई भी कर दिया गया।
घर के अंदर ही एक कंट्रोल रूम भी बना दिया गया था ,एक बाहरी कमरे में जहाँ सारे कैमरे की फीड्स आती थीं।
सरवायलेन्स कैमरे 110 डिग्री तक रोटेट कर सकते थे ,और कम रोशनी में भी काम कर सकते थे। इसके साथ ही वो और इलेक्ट्रिफाइड फेन्स ,एक ऑक्सिलरी सोर्स आफ पावर से भी जुड़े थे ,जिससे अगर में पॉवर सोर्स किसी तरह डिस्कनेक्ट हो जाय तो भी वो आधे घंटे तक काम कर सकते थे।

कैमरे एक प्रोटेक्टिव डिवाइस से कवर थे , जिससे तेज हवा, बर्ड हिट आदि से वो डैमेज न हों। वो सारे कैमरे आई पी बेस्ड थे यानी उन की फीड इंटरनेट के जरिये कंट्रोल रूम तक पहुंचती थी।

कंट्रोल रूम में १४ विंडो कंट्रोल मॉनिटर पर लगी थीं ,जिससे सारे कैमरे अलग अलग देखे जा सकते थे। इसके साथ साथ वहां से कैमरे का रोटेशन ,ज़ूम ,एंगल इत्यादि कंट्रोल किया जाता था। वहां पर ३ दिन की रिकॉर्डिंग हार्ड ड्राइव पे रखी जा सकती थी और ४ घंटे की रिकॉर्डिंग सर्वर में भी रहती थी ,जिसे रिवाइंड कर के किसी भी एरिया को देखा जा सकता था।


इस कंट्रोल रूम से बाहरी सड़क के पास जहाँ 'सड़क बन रही है ' के नाम पर आधी सड़क बंद कर के सेफ हाउस की एंट्री कंटोल की जाती थी ,वहां से भी था। एक बुलडोजर पर वहां एक स्पेशल फोर्स का आदमी था ,जो 'फुल्ली इक्विप्ड ' था और पास में रखी मोटर साइकिल से ७ मिनट में किसी इमरजंसी में 'सेफ हाउस ' में पहुंच सकता था।

वो आदमी वहां से ४ किमी दूर एक पुलिस पोस्ट को किसी इमरजंसी में मेसज दे सकता था। वहाँ आई बी का एक आफिसर बैठा था , जो स्टेट गवर्नमेंट से 'लियाजन कर रहा था।


एक स्पेशल टास्क फोर्स आन काल थी और १४ मिनट में उस पुलिस पोस्ट तक पहुँच सकती थी। उसी तरह एम्बुलेंस ,फायर ब्रिगेड की यूनिट भी अलर्ट पर थी। लेकिन न तो टास्क फोर्स को न एम्बुलेंस या फायर ब्रिगेड को इससे अधिक कुछ मालूम था की एक रिहर्सल होने वाली है।

कंट्रोल रूम में दो लोग थे और रोड सिक्योर किये आदमी को जोड़ के कुल तीन लोग सेफ हाउस के प्रोटेक्शन में थे जो नॉर्म्स के अनुसार सही थे। लेकिन उन तीनो को भी रीत और करन के बारे में कुछ नहीं मालूम था ,हाँ मीनल से वो जरूर मिले थे। ये तीनो पूरी तरह आर्म्ड थे।

कंट्रोल रूम में बैठे दो लोगों में एक लगातार कैमरे की मानिटरिंग करता और दूसरा हर आधे घंटे में निकल कर एक्सटर्नल पेरीमीटर का १५ मिनट में धीमे धीमे चक्कर काटता। दोनों अपने काम काम बदल के करते। हर दो घटे के डूयटी के बाद आधे घंटे के लिए रिलेक्स भी करना होता था जिससे अलर्टनेस पीक पर रहे।

करन ने आने के बाद सिर्फ एक चेंज किया की कंट्रोल रूम में आ रही फीड के साथ साथ कंट्रोल रूम में भी एक कैमरा लगा कर ये सारी फीड उन लोगों के कमरे में लगे ४० इंच के दीवार पर लगे टीवी पे कनेक्ट करवा ली ,जिससे अब उस टीवी पे ,टीवी के प्रोग्राम , रंगबिरंगी फिल्मों के साथ साथ वो रिमोट से चैनेल बदल कर कंट्रोल रूम में लगे कैमरे से कंट्रोल रूम और वहां आरही फीड को जब चाहें तब देख सकें।


दूसरी बात उस ने ये की ,की आई बी आपरेटिव के साथ एक हाट लाइन कनेक्टिविटी इस्टैब्लिश की , जहाँ बस बटन दबाते ही उसे मालूम हो जाए की खतरा है।

करन को मालूम था की एक तो दुश्मन अभी इस हालात में नहीं है की कुछ करे , और अगर कुछ हुआ तो वो उस ताकत के साथ होगा की अल्टीमेटली उसको और रीत को ही उन से निबटना होगा।
 




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