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Saturday, June 7, 2014

FUN-MAZA-MASTI शिकस्त ---02 लास्ट पार्ट

FUN-MAZA-MASTI

  शिकस्त ---02 लास्ट पार्ट

सर, अब आगे नही. किसी भी मर्द को इस मौके पर रुकावट पसंद नही. वो भी चिड़े हुए स्वर मे बोले

" क्या है". मैने खुलासा किया,

" मैं अभी तक कुँवारी हूँ, सर". झट से जवाब आया,

" हर लऱ'की पह'ले कुँवारी ही होती है और तब तक रह'ती है जब तक कोई मर्द उसे औरत न बना दे. " और बिना मेरे जवाब की दरकार किए , उन्हो ने अपना लंड अंदर घूसा दिया. आगे वही हुआ जो सब जानते है. कुच्छ ही पल मे मैं लड़की से औरत बन गयी.

जब मुझे आहेसास हुआ की क्या हो गया है तो इस तरह अपना कौमार्या खोने पर मैं थोड़ी उदास हो गयी. वो भी मेरे मूड को समझे. शाम हो रही थी. मुझे कहा ,

मैं ज़रा बाहर हो आता हूँ. उनके जाने के बाद मैं गुम सूम लेटी रही और अपने जीवन का मुआयना करती रही. घंटे भर मे वो वापस आए, एक थैली मुझे दी और कहा ये ले, तैयार हो जेया. मैने देखा तो अंदर नया ड्रेस था. चावी वाले पुतले की तरह, बिना कोई भाव'ना के, मैं उठी और ड्रसस पहन लिया. वो मुझे साथ लिए बाहर चल दिए. गाड़ी रुकी तो वो एक सुना मंदिर था. वो दर्शन करने गये, तो मैं भी गयी. दर्शन कर के आँखे खोली तो, ..... आश्चर्य चकित हो गयी. वो हाथ मे मंगल सट्रा लिए खड़े थे. मुझे भीने स्वर मे कहा,

"भगवान को साक्चि मान कर, मैं तुझे अपनी पत्नी स्वीकार करता हूँ". मैं देखती ही रह गयी... कहीं ये सपना तो नही?? उन्हो ने मेरे गले मे वो मंगल सट्रा पहना दिया. मैं खुश हो गयी. उस रात मैने बेड पर तूफान मचा दिया. वो भी पूरी तरह से खिले थे. ना जाने रात भर मे कितनी बार चुदाई हुई. सुबह होते होते नींद लगी और दोपहर को खुली. फिर एक बार हम'ने कामसुख भोगा. जब वापस चले तो हम दोनो पूर्णा टाइया तृप्त थे. मुझे लगा वो बादल है और मैं धरती. बादल रत भर बरसा और पानी बनकर धरती मे समा गया. खुद खाली हो गया और धरती को तृप्त कर दिया. मैं अपने आप को मिसिज. राजन समझने लगी थी. संगीता के बाद मेरा ही तो है सब.

वापस लौट के आने के बाद उन्हों ने मेरे लिए एक फ्लॅट ले लिया और मुझे वहाँ ठहरा दिया. डॉक्टर ने भले ही संगीता को 20-25 दिन की मेहमान होने का कहा था, उस की तबीयत कुच्छ सुध'री और हॉस्पिटल मे ही उसने चार महीने और खींचे. तब तक रोज, राजन सर मेरे फ्लॅट पर आते थे , मुझे भोगते थे और चले जाते थे. मैं कुछ बोल भी नही सकती थी. एक बार आत्म-समर्पण जो कर चुकी थी और उनकी पत्नी बनने के सपने भी देखती थी. संगीता की डेत के बाद वो बोले, हमारे घर्मे एक साल का शोक मानते है. तो एक साल शादी की बात फिर ताल गयी. साल भी बीत गया और दूसरा साल भी आ गया. राजन सर कोई ना कोई बहाना बना कर शादी टाल देते थे, पर मुझे चोदना नही भुलाते थे. मेरी जवानी का और सुंदरता का पूरा पूरा लुत्फ़ (आनंद) उठाया, मज़ा लिया.

मैं भी समझने लगी थी,... की .. पत्नी बनने के चक्कर मे मैं उनकी रखैल बन चुकी हूँ!! फिर अपना बॅकग्राउंड देख कर और जॉब ढूँढने के समय के अनुभवों को याद कर, मान को मनाती रही ; रखैल भी बन गयी तो ठीक ही है. फिर एक दिन एक नई बात बनी. उस रात ऑफीस की और से पार्टी थी. मैं भी तैयार हो के गयी थी और मेहमानों की देख भाल देख रही थी. ये सब मैं पहले भी कई बार कर चुकी थी. सारी व्यवस्था पर नज़र रख रही थी. जब पार्टी ख़त्म होने मे थोड़ी देर बाकी थी, तो राजन सर आए और मुझे एक कोने मे ले जेया के प्यार भरे सुर मे कहा,

" अनु, वो ब्राउन सूट मे मिस्टर. शरमा खड़े है, देख रही हो ?" मैने हामी भारी. आवाज़ और धीमी और गंभीर करते हुए कहा.

"हमारे लिए बहोट इंपॉर्टेंट गेस्ट है. उनसे हमे 25 करोर का कांट्रॅक्ट मिल सकता है. बड़े रंगीन मिज़ाज आदमी है. कांट्रॅक्ट पेपर्स को लड़की के खुले स्तन पर रख के साइन करने का शौक रखते है. तू ही इनको संभाल सकती है. उन को ओबेरोई मे ड्रॉप करने जेया और खुश कर के सुबह लौटना, समझी ??" और मेरे जवाब की परवाह किए बिना ही मुझे ले चले और मिस्टर. शर्मा से इंट्रोडक्षन करवा दिया,

"सर, यह है हमारी हॉट ब्यूटी क्वीन, अनुपमा." आँख विंक करते हुए आड किया,

"`हर काम' मे माहिर है. आप को होटेल पर छ्चोड़ने आ रही है. आप कांट्रॅक्ट पर दस्तख़त ज़रूर कर देना." शर्मा ने लोलुप नज़रों से मेरे स्तनों को देखा और बोला,

"साइन करने की जगह तो सही है" और गंदी तरह से हंस पड़ा. राजन सर भी उसकी हँसी मे शामिल हो गये और मुझे उसकी और पुश करते हुए कहा,

"गुड नाइट तो बोत ऑफ योउ". सब कुच्छ इतना फास्ट हो गया, की बिना कोई प्रतिक्रिया किए मैं ओबेरोई मे शर्मा की बेड पर पहुँच गयी. . मैने सोचा, अब आ ही गयी हूँ तो काम पूरा कर दूं. .. और मैने शर्मा को खुश कर दिया.... सुबह होते उसने कोंटर्कत पेपर्स निकले और मेरे नंगे स्तनों पर रख कर साइन कर दिया. वापस आ के पेपर्स राजन सर को दिए तो बहोट खुश होते हुए कह उठे,

"मैं जनता था, तुम ये काम ज़रूर कर सकती हो". उस के बाद तो ये सिलसिला ही बन गया. मैं रखैल से कब रंडी बन गयी पता ही नही चला. धीरे धीरे राजन सिर का मेरे फ्लॅट पर आना कम हो गया. और एक दिन देखा की उन्हों ने ऑफीस मे एक नई प. ए. भी रख ली थी. अब मेरा ऑफीस मे पहले जैसा रेस्पेक्ट भी नही रहा था. मुझे कहीं भी कुच्छ भी अच्च्छा नही लग रहा था. तो मैने राजन सर को एक दिन अपने फ्लॅट पर बुला लिया. वो आए. मैं साज धज के तैयार हुई थी, उन्हे आकर्षित करने के लिए. उन्हों ने जाम के मेरी चुदाई भी की. जब लगा मुझे की वी संत्ुस्त है तो मैने बात निकली और जो हो रहा था उसके प्रति नाराज़'गी व्यक्त करते हुए कहा,

" सर, आप ने तो मुझे मंदिर मे भगवान को साक्षी मान कर पत्नी बनाया था, फिर आपने पत्नी की जगह रखैल बना दिया, मैने वो भी सह लिया, लेकिन अब तो आपने मुझे रंडी बना दिया है, क्या ये ठीक है?" वो हंसते हुए बोले,

"छ्होटी बच्ची थोड़ी हो की मैं काहु और तुम चली जाओ किसी के साथ सोने के लिए ? तुम्हे भी तो खुजली थी शर्मा से चुदाने की." अब आवाज़ तीखी हुई,

" एक तो रहने को आलीशान फ्लॅट दिया है, पैसे की तकलीफ़ नही है, तुम्हे रोज नई वेराइटी मिलती है, फिर भी नखरे दिखती है ? और तुम्हे क्या फ़र्क पड़ता है, मैं चोदु या कोई और चोदे ? चुदाई तो चुदाई ही है ना ? समाज ले अपना शरीर मुझे ही दिया है."
उनका ये रूप देख कर मैं तो हक्का बक्का रह गयी. थोड़ी देर तो क्या बोलना है, कुच्छ सूझा ही नही. फिर जब संभाली तो मैने भी कसर नही छ्चोड़ी. दोनो गुस्से मे आ गये. बात बिगड़ती गई. बड़ा झगड़ा हो गया. मैने कह दिया,

"राजन, तूने मुझे धोखा दिया है. मैं तुझे नही छ्चोड़ूँगी. देख लूँगी. " इस पर तो वो लाल-पीला हो गया. बड़ी हस्ती थी. उसे कोई ऐसा कह जाए तो कैसे सुन लेता ? वो भी बिगड़ा,

"तू ? तू मुझे देख लेगी ? तेरी हैसियत ही क्या है ? मेरे सामने तेरा क्या वजूद है ? मेरे पास पैसे की ताक़त है, सोशियल स्टेटस है, पोलिटिकल कॉंटॅक्ट है, बड़े बड़े नेता से संबंध है, पोलीस और अंडरवर्ल्ड मे पहेचन है. और तू ? एक रंडी मात्रा !! तेरी क्या औकात है की मुझे देख लेगी ? चल खाली कर ये घर अभी का अभी !!" मेरे पास कोई चारा नही था. लेकिन घर छ्चोड़ते हुए मैने अपनी सारी भादश निकल दी,

"राजन, तू देखना , इन सब के बावजूद मैं तुझे हरा दूँगी, मॅट दे दूँगी !! तुझे ये रंडी शिकस्त देगी, शिकस्त !!! " घर तो छ्चोड़ दिया, पर जिए कैसे... कहाँ जाए.... ये सारे प्रश्ना सामने आ गये. मैने फिर एक बार शहर छ्चोड़ दिया. लेकिन जल्द ही भूख-प्यास से मैं उब गई. रातों को हाइवे पर खड़ी रह के ट्रक द्रिवेरोन के साथ सोई और खनेका पैसा जुटाया. एक भले ड्राइवर ने बताया ,

"देल्ही जितना सेक्स का व्यवसाय कहीं नही होगा अपने देश मे. तू सुंदर है. वहाँ तेरी कदर होगी. मैं देल्ही जेया रहा हूँ ये ट्रक ले के, मैं वहाँ कोठे भी जानता हूँ, बैठ जेया, तुझे वहाँ पहुँचा दूँगा." इस तरह नसीब मुझे देल्ही ले आया. मजबूरी मे मुझे वाकई रंडी ही बनना पड़ा. मैने भी वो कोठा पकड़ लिया. सुंदर तो मैं थी ही. मेरा काम चल पड़ा. बहोट कस्टमर आते थे. एक रात मे दस कस्टमर्स को बैठा लेती थी. कोठे की मेडम भी खुश और मैं भी. अब रहने की और खनेकी चिंता तो ना रही. कुच्छ कस्टमर तो खाश हो गये.

यूँ दिन बीत रहे थे.... कुच्छ साल भी बीत गये. अब पैसे भी बन गये थे. लेकिन मैं राजन को नहीं भूली थी. कैसे उस से बदला लूँ, ये सोचती रहती थी.

[दोस्तों, अनुपमा की ज़िंदगी मे फिर कुच्छ ऐसी बात बनी , जो कहानी के रस को ध्यान मे रखते हुए मैं आगे बताऊँगा. ]

फिर एक दिन कुच्छ ऐसी बात हुई की मुझे मेरा हथियार मिल गय....ऱजन को हराने के लिए. और मैं चल पड़ी वापस मुंबई की और.

मुंबई आ के दो महीने तक मैं उस'से नही मिल पाई, क्यों की वो विदेश गया हुआ था. लेकिन उस समय मे मैने अपना काफ़ी काम कर लिया. अब अंतिम वार करने का समय आ गया. राजन के लौटते ही मैं उसे मिली. सेक्सी ड्रेस मे साज धज के गयी थी. मुझे देख के उसे आश्चर्या हुआ. मुहे उपर से नीचे तक देखते हुए बोला,

"थोड़ी फीकी पद गयी हो" मैने कहा,

"हन, आप के बिना ये हाल हो गया मेरा." उसके चेहरे पर अभिमान भारी मुस्कान च्चाई,

"तो अब तेरी अककाल ठिकाने आ गयी ! चली थी मुझे हराने की चॅलेंज दे कर !! कहाँ पिघल गया तेरा वो सब गुमान ?" विनती भारी आवाज़ मे मैं ने कहा,

" अब भूल भी जाइए वो सब, सर ! मैं लौट आई हूँ हमेशा के लिए आप की होने के लिए. आप जो कहेंगे वो सब मैं करूँगी." गंदा हास्या करते हुए वो बोला,

"तो अब घर, पैसा और सुविधा के लिए तू रंडी बनने को भी तैयार हो गयी." मैं ने एक सेक्सी आवाज़ मे कहा,

"वो तो है ही, पर एक बात और भी है, सर,... जिसने मुझे मजबूर किया है." आचरजभरी निगाह से वो मुझे देखता रह गया, लेकिन जब बात समझ मे नही आई तो पुच्छ बैठा,

" और वो क्या है ? " मैं ने एक सेक्सी अंगड़ाई ली और ड्रेस की स्लिट से पूरी जाँघ उसे दिखाते हुए बोली,

"आप की जैसी चुदाई भी तो कोई नही करता, ना !!, आप मुझे रंडी बनके चाहे जिस'के पास भेजे, लेकिन आप को भी मुझे रोज चोदना होगा ! " वो घमंड से फूला ना समाया. वैसे भी सारे मर्द को यही लगता है की उसके जैसी हार्ड चुदाई कोई नही करता. वह भी खुशी भरा चेहरा ले कर बोला,

" तो ये बात है ! ठीक है, तेरे साथ एक प्रोग्राम बनता हूँ" मैं जेया के उसके लॅप मे बैठी और उसके गले मे हाथ डालते हुए कहा,

" मुझे वहीं ले चलो, जहाँ पहली बार चोदा था." उसे सब याद था, बोल पड़ा,

"तो 'डूक्स' खंडाला मे जाने का इरादा है मेडम का !" मैने मंडी हिला के हन कही और उसके रलोब पर एक गरम किस और बीते दे दी. उसने वीकेंड का प्रोग्रामे बना लिया... और दूसरे दिन शनिवार की दोपहर हम वही सूट मे पहुँच गये.... जहाँ मैने अपना कौमार्या खोया था ! अंदर पहॉंच के मैं उस'से लिपट गयी और उसके गले मे बाहें डालते हुए मेरे होठ उसके होठ पर रख दिए. वो भी शुरू हो गया.

तुरत ही दोनो की जीभ एक दूसरे के मूह मे फिर रही थी... मैने ये चुंबन बहोट लंबा चलाया ..और दोनो के मूह की लार एक दूसरे मे घुलमिल गयी. थोड़ी ही देर मे जब दोनो नंगे हो गये और वो बेड पर लेत तो मैं उसके मूह पर जेया के इस तरह बैठी की मेरी चूत उसके होत पर आ जाए. वो उसे चूमने लगा. मैने सेक्सी आआहएं भारी तो समझा मुझे मज़ा आ रहा है, और चूत को फैला के जीभ अंदर डाल के चाटने लगा. मैं यहाँ भी लंबे समय तक लगी रही. उसे भी मैने पूरा गरम किया और उसने मुझे जाम के चोदा. थोड़ी ही देर मे मैं फिर उठी और उसे कहा,

चलो आज साथ नहाते है. बाथरूम मे फिर एक और रौंद हो गया. रात भर मैं लगी रही. (देल्ही मे दस दस को बैठा के मेरी केपॅसिटी भी तो बन चुकी थी !) सुबह तक में तो मैने उसे निचोड़ ही डाला. सनडे का दिन और रात भी ऐसे ही तूफान भरे बिताए. उसे भी बड़ा असचर्या हो रहा था, मेरा ये रूप देख कर. कुच्छ अजीब भी लग रहा था उसे, मेरा इस तरह अचानक आना और उसे यहाँ ले आना, और उसके बाद इस तरह से चुदते रहना.... पर समझ नही पा रहा था. मंडे की सुबह को लौटने से पहले जब मैने उसे फिर एक बार उकसाया तो आखरी चुदाई करते हुए बोल ही पड़ा,

"अनु, तुम किस बात पर उतार आई हो, समझ मे नही आता !!! ऐसा लग रहा है, कोई राज है !!!" मैने रंग बदलते तीखी आवज़ मे कहा,

"तो मैं समझा देती हू.... की... मैं किस बात पर उतार आई हू ! तू सही कहता है, एक राज है, और ले, वो राज भी मैं खोल देती हू." उसे धक्का दे कर मेरे उपर से हटाया और मेरी पर्स से एक एन्वेलप निकलके उसकी और फैंकते हुए मैने कहा,

" पढ़ इसे, ये तेरी मौत का परवाना है !" वो बिना कुच्छ समझे मेरा मूह ताक'ता रहा. मैने आवाज़ मे सारी नफ़रत घोलते हुए कहा,

" राजन, मुझे एड्स हुआ है !!!!! उसका रिपोर्ट है उस एन्वेलप मे . इतना ही नही, और एक फटल एस टी डी (सेक्षुयली ट्रॅन्स्मिटेड डेसीज़) का भी मैं शिकार हो गयी हू, जो बहोत बहोत ही चेपी (कंटेजियस) है . जो मेरे साथ एक बार भी सोएगा , उसका शिकार हो जाएगा. .डॉक्टर्स ने हाथ उठा लिए है !!! मैं इस धरती पर अब कुच्छ ही महीनों की मेहमान हू !!! और मैने ये दो दिन मे तुझे भी ये रोग लगा दिया है. अब तू भी कुच्छ ही महीने का मेहमान है. इतना ही नही..... जब तुम पिच्छाले दो महीने से विदेश मे था, मैने तेरे तीनो बिटो को भी ये रोग पूरी तरह लगा दिया है. अब तो बड़े लड़'के की पत्नी (एक बेटे की शादी इस दौरान हो गयी थी) भी इसका शिकार हो गयी होगी." दुख, घृणा, संतोष और आनंद मिश्रित स्वर मे मैने कहा,

" राजन, मैने सिर्फ़ तुझे ही नही तेरे सारे खानदान को सत्यानाश कर दिया है !!!!!! अब लगा ले अपनी पैसों की ताक़त ! कर ले उपयोग अपने सोशियल स्टेटस का !! इस्तेमाल कर अपने पोलिटिकल कॉंटॅक्ट्स !!! बुला उन सारे बड़े बड़े नेताजी को !!!! बुला तेरे वो पोलीस वालों को और अंडरवर्ल्ड वालों को !!!!!! किसी तरह बचा ले तुझे !!!!!!!! राजन, इस अकेली औरत ने तेरी उन सारी ताकतों के बावजूद तुझे हरा दिया !!!!!!!! बेवकूफ़, ये दो दिन से तू मुझे यहाँ चोद नही रहा था !!!!!! मैं तुझे शिकस्त दे रही थी, शिकस्त !!!
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

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`·.¸.·´ -- raj









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FUN-MAZA-MASTI शिकस्त--01

FUN-MAZA-MASTI

  शिकस्त--01





दोस्तों, राज शर्मा एक बार फिर हाज़िर है अपनी नई कहानी ले के. थोड़ी लंबी हो गयी है, पर इतमीनान से पूरी पढ़े. तब ही उसका सही स्वाद मिलेगा.

अनुपमा मेरे साथ पढ़ती थी. वो तब बहोट ही खूबसूरत हुआ करती थी. उसने कभी हिस्सा नही लिया, नही तो ब्यूटी क्वीन हो सकती थी. लेकिन उसकी पढ़ाई पूरी नही हो पाई थी. इस के लिए उसका साथ छूट गया था. कई साल बाद मुझे वो रास्ते मे मिल गई. पहले जैसा नूवर नही था. उसकी तबीयत ठीक नही लग रही थी. मैं उसे घर ले गया. वहाँ उसने मुझे जो कहानी बताई उसे मैं अनु की ज़ुबानी पेश कर रहा हू
मैं अनुपमा हू. अभी अभी 24 साल की हुई हू. दस साल पहले मेरी मया का देहांत हो गया. उसके डेढ़ साल बाद पिताजी ने दूसरी शादी कर ली. नई मया ने कुच्छ ही समय मे अपना रंग दिखाया और ढाई साल मे तो मुझे घर छ्चोड़'ने पर मजबूर कर दिया. उस वक्त मैं करीब 18 साल की थी. मुझे पढ़ाई भी छ्चोड़नी पड़ी. मैने वो शहर ही छ्चोड़ दिया.

मैं मुंबई आ गयी. नौकरी की तलाश शुरू की. जहाँ भी गयी, मुझे नौकरी तो टुरट ही ऑफर होती थी, लेकिन वो मेरी खूबसूरती का जादू था. कोई कोई तो पहले ही बेझिझक हो कर प्रपोज़ल रखता था, तो कोई इशारों मे समझाने की कोशिश करता था. लेकिन मतलब एक ही था, मुझे जॉब दे कर वो मेरे रूप को भोगना चाहते थे. ऐसी करीब बीस ऑफर मिले. मैने वो सारी ऑफर ठुकरा दी.

एक जगह जहाँ ऐसी बात नही हुई, तो मैने वो जॉब टुरट ले ली. लेकिन एक ही वीक मे वोही अनुभव हुआ. मैने वो भी छ्चोड़ दिया. एक और मिली तो वहाँ भी बीस दिन ठीक जाने के बाद वही बात हुई. मैने वो भी छ्चोड़ दिया, लेकिन अब मैं दर गयी थी. जान चुकी थी की मेरा ही रूप मेरा बैरी बन चुका है. लोगो पर से और ईश्वर पर से विश्वास उठता जेया रहा था. मान ही मान सोच'ने लगी की शायद यही इस दुनिया का दस्तूर हो. इसे स्वीकार कर'ने के ख़याल भी मान में आने लगे.

लेकिन तब मेरी किस्मत बदलने वाली थी. इत्तेफ़ाक़ से मैं एक ऑफीस मे जेया पहुँची. बड़ी साफ सुथरी ऑफीस थी. मेरा इंटरव्यू खुद बड़े सेठ ने लिया. राजन नाम था उनका. एकदम साफ इंटरव्यू रहा. मेरे रूप की और तो जैसे नज़र ही नही थी. मैं पास हो गयी और मुझे वो जॉब मिल गयी. सॅलरी भी मेरी ख्वाहिश से दुगनी थी. यहाँ कोई आल्टू फालतू बात नही होती थी. बस काम से काम रहता था. मैं राजन सिर की प.आ. थी.

वो करीब 45 की उमरा के थे. उनके तीन बेटे थे, मझला मेरी उमरा का था. सभी भाइयों मे 2 साल का अंतर था. वी पढ़ते थे लेकिन कभी कभी ऑफीस आ जया करते थे किसी काम से. मैं उन सब से परिचित हो गयी थी. राजन सिर की पत्नी पिच्छाले एक साल से बीमार रहा करती थी. उसे ले कर राजन सिर चिंतित भी रहते थे. कभी कभी मेरे पास भी वी अपनी चिंता व्यक्त करते थे. उनकी पत्नी के बच'ने के चान्स कम थे. मुझे राजन सिर से हमदर्दी होने लगी थी और शायद....... प्यार भी. कच्ची उमरा का पक्का प्यार....... आख़िर जीवन मे पहली बार कोई ऐसा आदमी मिला था जो संपूर्णा था, श्रीमंत था, स्वरूपवान था, शिक्षित था, अच्च्चे शरीर सौस्ठव का और बहुत ही अच्च्चे व्यव'हार वाला था. यूँ कह सकती हूँ, चुंबकिया व्यक्तित्वा था उनका. वक्त गुजरता जेया रहा था. यूँ ही चार महीने बीत गये. एक रोज़ शनिवार के दिन दोपहर को वो बोले,

"अनु चलो" ( अब वो मेरा पूरा नाम अनुपमा नही कहते थे, अनु से बुलाते थे). मैने पुचछा,

"कहाँ ?" वो कड़क टोने मे बोल उठे,

"चलो भी" और खुद चल दिए. मैं भी साथ हो गयी. नीचे आ कर वो अपनी नई होंडा क्र्व मे बैठे. मेरे लिए बाजुवाला दरवाज़ा खोल दिया. मैं भी बाजू मे बैठ गयी. पुचचाने की हिम्मत ही नही हुई कहाँ जेया रहे है. कार चल पड़ी और थोड़ी देर मे हम शहर से बाहर आ गये. वो गुमसूँ थे. मैं भी कुच्छ बोली नही. गाड़ी पहाड़ो मे होती हुई खंडाला जेया पहुँची और 'डूक्स' रिट्रीट मे एंट्री ली. बड़ी शानदार जगह थी. उन्हों ने एक सूट ऑफीस से फोन कर के बुक किया हुआ था. यहाँ उन्हे सब जानते थे. काउंटर पर रिसेप्षनिस्ट ने मुस्कराते हुए कहा,

"युवर सूट इस चिल्ड, सिर, आंड मिनी फ्रीज़ इस फुल वित स्टॉक". उसने रूम की की दे दी, राजन सिर ने कार की की वहाँ दे दी और हम अंदर चले गये. सूट आलीशान था और एकदम ठंडा भी. एर-कंडीशनर पहले से ही ओं था. रूम बॉय आ कर कार मे से राजन सिर की छ्होटी सी बाग ला कर रख गया और कार की चाबी छ्चोड़ गया. अंदर पहुँच के उन्होने कोट उतार फैंका और नेक्टिये ढीली करते हुए सोफे मे जेया गिरे, जुटे उतरे और पावं लंबा कर के सेंटर टिपोय पर रखते हुए बोले

" अनु, तुम सोच रही होगी , ये सब मैं क्या कर रहा हूँ, है ना ?" मैने मंडी हिलाई. उन्हों ने पास बैठने का इशारा किया. मैं बाजू मे जेया कर बैठी. उन्हों ने मुझे नज़दीक खींचते हुए कहा (मैं उनके इतने पास कभी नही बैठी थी पहले)

" अनु, आज डॉक्टर ने जवाब दे दिया. संगीता (उनकी पत्नी) अब 20-25 दिन की मेहमान है." गिड़गिड़ती आवाज़ मे आयेज कहा,

"हमारा 23 साल का साथ च्छुत जाएगा, मैं अकेला हो जौंगा". मैने सांत्वना दी,

" ये सब तो उपरवाले के हाथ मे है. लेकिन आप खुद को अकेला ना सम'झे. मैं जो साथ हूँ." वो आयेज झुके और मेरी आँखों मे झाँकते हुए कहा,

"सच ? क्या तुम वाकई मेरे साथ हो ?" मेरी आँखों मे झाँकति हुई उनकी आँखों मे कुच्छ अजीब से भाव मैने महसूस किए पर मैं समझ नही पाई और बोली,

"हन, सिर" उनका दूसरा प्रश्ना पिच्चे ही आया,

"संगीता की तरह ?" मैं चौंकी, पर बोल उठी,

"हन, सिर". वापस सोफे की बॅक का सहारा लेते हुए बोले,

"चलो अच्च्छा है..... ज़रा फ्रीज़ से विस्की और सोडा ला. और तुम भी सफ़र से ताकि होगी. जेया, नहा के फ्रेश हो जेया." मैने उनका पेग भरते हुए कहा,

"मैं तो कपड़ा भी नही लाई. नहा के क्या पहनूँगी ? मुझे नही नहाना." मुस्कराते हुए उन्हों ने अपनी बाग से कुर्ता और लूँगी निकल के फैंकते हुए कहा,

" ले, ये तुझ पर बहोट जाचेगा." मैं ने उसे उठाया और शरमाते हुए बोली,

"लेकिन आप की बाग मे ब्रा और पनटी थोड़ी होगी ?" विस्की की सीप लेते हुए वो बोल उठे,

" अब जेया भी, एक दिन ब्रा-पनटी नही पहनेगी तो नंगी नही दिखेगी" खिल खिल हंसते मैं कपड़े उठा के अंदर चली गयी. बातरूम बड़ा लग्षूरीयस था. पूरे कद का मिरर लगा हुआ था. मैने अपने कपड़े उतरे और अपने ही फिगर को आडमाइर करते हुए देख'टी रही. सोचा, वे सब लोग जो मुझे जॉब देते समय मेरे रूप के पागल होते थे....... आख़िर ग़लत तो नही थे !! मैं हूँ ही ऐसी.

फिर पानी भरे टब मे लेती और आज के बारे मे सोचने लगी. टुरट ख़याल आया, राजन सिर आज कुच्छ बदले बदले लग रहे है. वैसे भी औरत किसी भी मर्द की नियत को जल्दी ही समझ लेती है. मुझे भी वो पल याद आया, जब उन्हों ने मेरी आँखों मे अपनी आँखो से झाँकते हुए कहा था ;

"सच ? क्या तुम वाकई मेरे साथ हो ?" और दूसरा प्रश्ना था,

"संगीता की तरह ?" मुझे बात समझ मे आने लगी. भले ही इतने समय राजन सिर ने नेक व्यवहार किया हो, आज की बात कुच्छ और है. आज वो भी उसी लाइन पर है और मुझे भोगना चाहते है. लेकिन आश्चर्या !!!! पहले जहाँ मैं ऐसे हर मौके पर जॉब ठुकरा के भागी थी, इस बार मान मे कोई विरोध उठना तो दूर रहा, एक मीठी गुदगुदी सी हो रही थी. मैने टब मे अपने ही स्तन को सहलाते हुए अपने मान को टटोला. नतीजा सामने था. इन चार महीनो मे मैं मान ही मान उन्हे पसंद करने लगी थी. और संगीता की जान लेवा बीमारी की बात ने तो ये आशा भी जगाई थी की उसकी मृत्यु के बाद मैं म्र्स. राजन भी बन सकती हू.

ये ख़याल आते ही मान पुलकित हो उठा. फ्रेश हो के बाहर आई तो वो दूसरी ही अनु थी. मैं बाहर आई तो देखा की राजन सिर सोफे से बेड पर आ गये थे, कपड़े बदल के अब सिर्फ़ शॉर्ट्स मे थे. उपर का बदन खुला था, मैं उनके कसे हुए सिने को लोलूपता से देख रही थी. वो दो पेग पी चुके थे. उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो आँखे फाड़ कर देखते ही रह गये. कुर्ता लूँगी मे, बिना ब्रा-पनटी के, मैं बहोट ही सेक्सी लग रही थी. बालों से पानी तपाक रहा था, और मेरे स्तनों के उपर गिर के कुर्ते के उस भाग को गीला कर रहा था.

गीला कुर्ता मेरे स्तनों से चिपक कर , मुझे और सेक्सी लुक दे रहा था. मैं बेड पर उनके बाजू मे बाईं और जेया के लेती और एक गहरी साँस ले के मेरे स्तनों को उभरा. कुर्ते का उपरी बटन भी खुला छ्चोड़ रखा था मैने. मेरी आधी क्लीवेज सॉफ नज़र आ रही थी. उनके दिल मे हल्का सा तूफान तो उठा ही हुआ था. अब मेरी हरकत से उनके दिल मे खलभाली मची. उन्हों ने पेग साइड टेबल पर छ्चोड़ दिया और मेरी और मुड़े.

एक ही झट'के मे उनका डायन पैर मेरी दोनो जाँघो पर आ गया, उनका डायन हाथ मेरे बाएँ मुममे पर आ गया, और उनके होत मेरे दाएँ कान के पास आ गये. वी बिना कुच्छ कहे, जैसे अपना अधिकार समझ कर, शुरू हो गये. मेरे कान की बूट्ती (र्लोबस) को अपने मूह मे ले कर छुआस'ने लगे, साथ ही जो हाथ मेरे मुममे पर था उस से उसे सहलाने लगे और जो पावं मेरी जाँघो पर आ चक्का था उसे उपर नीचे करने लगे.

उनके लिए यह सब नया नही था, सिर्फ़ पात्रा बदल गया था. पर मैं तो जीवन मे पहली बार किसी मर्द का अनुभव कर रही थी. बदन पर एक साथ तीन तीन जगह स्पर्श हो रहा था. कान, मुममे और जाँघ पर. मुममे और जाँघ पर तो कपड़े के उपर से हो रहा था, लेकिन कन-बूट्ती पर तो सीधा ही हो रहा था. एक झंझनाहट सी महसूस हो रही थी. यह कहानी आप याहू ग्रूप्स; देशिरोमंसे में पढ रहें हैं. मैं आँखे मूंद कर पड़ी रही. कान तो एकदम गरम हो रहा था. उतने मे उन्हों ने एक हल्की सी बीते ले ली, रलोब पर. मेरे मुँह से सिसकारी निकल गयी. दर्द हो रहा था... पर अच्च्छा भी लग रहा था.

जाँघो पर उनके वज़नदार पावं उपर नीचे हो रहे थे. उस वजन के नीचे सिल्की लूँगी का मुलायम स्पर्श मेरी लचीली जांघों को उत्तेजित कर रहा था. और साथ ही मेरा मुम्मा पहली बार किसी मर्द के हाथों दबाया जेया रहा था. (वैसे ये अनुभव पूरी तरह से नया नही था. हर लड़की यौवन प्रवेश पर अपने ही हाथों अपने स्तनों को दबा के ये अनुभव ले लेती है. मैने भी लिया था. पर मान'ना पड़ेगा... मर्द के हाथों स्तन दबाने पर जो अनुभव होता है, वो अपने हाथों चाहे कितना ही दबा लो, उस से अलग ही होता है). अब उनका मुँह मेरे कान छ्चोड़ कर गालों पर आ गया. उनकी साँसे मेरे गाल पर टकरा रही थी और उनके होत जो अब गीले हो चुके थे गाल पर किस कर रहे थे.

पूर गाल को चूमते हुए, वो थोड़े उपर उठे और मेरे रसीले होठों पर अपने गरम गीले होत रख दिए. वो पूरी तरह उपर नही उठे थे. सिर्फ़ सीना और मुँह उपर उठाया था. उपर उठ के आने की वजह से अब उनका खुल्ला सीना मेरे दाएँ मुममे को दबा रहा था. स्तनों पर मर्द का वजन कैसा रंगीन लगता है, ये तो लड़कियाँ ही जानती है. साथ ही बायन मुममे जो अब तक सहलाया जेया रहा था, अब मसाला जेया रहा था. जांघों पर पावं की मूव्मेंट भी थोड़ी तेज हो गयी. लूँगी सिल्की थी. इतनी लंबी और अब तो तेज मूव्मेंट से खुल गयी और नीचे की और उतार गयी. मैने आप'नी और से सह'योग देते हुए, अपने पावं चौड़े किए. अब पावं की मूव्मेंट के साथ उनका खुल्ला घुटना मेरी खुली छूट को टच करने लगा. उपर से नीचे तक सब जगह मज़ा आ रहा था....
मेरे कान छ्चोड़ कर गालों पर आ गया. उनकी साँसे मेरे गाल पर टकरा रही थी और उनके होठ जो अब गीले हो चुके थे गाल पर किस कर रहे थे.

पूर गाल को चूमते हुए, वो थोड़े उपर उठे और मेरे रसीले होठों पर अपने गरम गीले होत रख दिए. वो पूरी तरह उपर नही उठे थे. सिर्फ़ सीना और मुँह उपर उठाया था. उपर उठ के आने की वजह से अब उनका खुल्ला सीना मेरे दाएँ मुममे को दबा रहा था. स्तनों पर मर्द का वजन कैसा रंगीन लगता है, ये तो लड़कियाँ ही जानती है. साथ ही बायां मुममे जो अब तक सहलाया जा रहा था, अब मसाला जा रहा था. जांघों पर पावं की मूव्मेंट भी थोड़ी तेज हो गयी. लूँगी सिल्की थी. इतनी लंबी और अब तो तेज मूव्मेंट से खुल गयी और नीचे की और उतार गयी. मैने आप'नी और से सह'योग देते हुए, अपने पावं चौड़े किए. अब पावं की मूव्मेंट के साथ उनका खुल्ला घुटना मेरी खुली चूत को टच करने लगा. उपर से नीचे तक सब जगह मज़ा आ रहा था....

अचानक एक ख़याल मान मे उठा, `ये मैं क्या करने जा रही हू ? क्यों उन्हे रोकती नही हू? ऐसे तो मेरा यौवन भ्रष्टा हो जाएगा.' पर मन की कौन सुनता था ! अब तो दिल ही हावी था !! कहयाल जैसा उठा वैसा ही दफ़न हो गया. मैं वापस मज़ा लेने मे मगन हो गयी... अब उन्हों ने पूरा बदन उठाया और मेरे उपर आ गये. उनका पूरा बदन मेरे बदन पर ही था. मैं उनके भारी वजन के नीचे दबति जा रही थी. क्रश हो रही थी. और क्या मज़ा आ रहा था !! मैने अपने हाथ उनकी खुली पीठ पर फैलाए और पसारने लगी. कभी कभी नीचे शॉर्ट्स के उपर से हिप्स पर भी फिरा लेती थी. वो अब तेझी से मेरे पुर चह'रे पर किस किए जा रहे थे. मैं भी अब उन्हे किस मे साथ दिए जा रही थी. मैने उनके होठों पर मेरे होठ रख दिए और एक लंबी किस शुरू की. दोनो ने होठ थोड़े खोले और मैने अपनी जीभ उनके मुँह के अंदर डाल दी. अंदर चारो और फिरते हुए उनकी जीभ से जीभ टकराई. होठ से होठ तो मिल ही रहे थे.

उनका दायां हाथ जो अब तक मेरे बाएँ मुममे को मसले जा रहा था, तेज़ी से नीचे खिसका और कुर्ते के अंत तक पहुँच कर उस के नीचे घुसा और वापस उपर आ गया. आप को ये पढ़ने मे जितना वक्त लगा , उस से भी कम समय मे एक ही आक्षन मे ये सारा मूव्मेंट हो गया. अब उनका दायां हाथ कुर्ते के अंदर मेरे बाएँ स्तन पर सीधा स्पर्श कर रहा था. पहली बार मेरे मुममे को किसी मर्द ने च्छुआ था. वो तेज़ी से मसालने लगे उसे. अच्च्छा तो लग रहा था, पर कब से ये बायां मुममे ही मसला जा रहा था.... तो मेरे दाएँ मुममे मे भी एक कसक उठी, वो भी दबावाने के लिए बेताब हो उठा.

मैने शर्म छ्चोड़ कर उनका बायां हाथ थमा और उसे मेरे दाए मुममे पर ले गयी. वो समझे, और मुस्कराते हुए दोनो हाथ नीचे ले गये, और कुर्ता उपर की और उठाया. मैं भी सिर के बाल हल्की सी उपर हुई और उन्हों ने कुर्ता मेरे गले तक खिसका लिया. मैने बदन नीचा किया और मंडी उपर उठाई, उन्होने कुर्ता पूरा बाहर निकल दिया और फैंक दिया एक कोने मे. लूँगी तो पहले ही खुल के घुटनो तक उतार चुकी थी. उन्हों ने पावं उपर ले के उस मे उसे फसा के पावं जो नीचे किया तो वो भी मेरे सहयोग के साथ बाहर हो गयी.

अब मैं पूरी नंगी थी और उनके नीचे दबी हुई थी. वापस फेस पर किस करते हुए अब वो दोनो हाथो से मेरे दोनो स्तनों को मसल रहे थे. ऐसा लग रहा था, जीवन भर कोई ऐसे ही मसला करे इन्हे. ! लेकिन थोड़ी ही देर मे मैं बेचैन हो उठी.....!!!

पहले स्तनों को सहलाए जाने का मज़ा लिया, लेकिन फिर दबावाने की इच्च्छा हो रही थी, दबाए गये तो मसले जाने की कसक उठी, अब मसले गये तो चूसाए जाने की चाह उठी. और उसी चाह ने मुझे बेचैन कर दिया था... मैने उनका मुँह - जो मेरे फेस पर किस करने मे लगा हुआ था - पिच्चे से बालों से पकड़ के हल्के से नीचे मेरे स्तनों की और खींचा.

वो तो अनुभवी थे, इशारा समझे और नीचे उतार बाएँ मुममे की और लपके. पर मेरा तो डायन मुम्मा कब से भूखा था. मैने फिर बालों से मुँह को दाएँ मुममे की और खींचा. वो उसको चारो साइड से चूमने लगे. इस खेल के मंजे हुए खिलाड़ी जो थे ! निपल को केन्द्रा बना कर पुर मुममे पर निपल से डोर सर्क्युलर मोशन मे चूम रहे थे. धीरे धीरे सर्कल छ्होटा करते जा रहे थे. मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी. निपल मर्द के मुँह मे जाने के लिए उतावला हो रहा था. एक दो बार तो मैने उनका फेस निपल की और घसीटना चाहा. पर वो तो अपनी स्टाइल से ही चूमते रहे. मुझे टीज़ जो कर रहे थे. निपल मोटा और कड़क होता जा रहा था. सर्कल एकदम छ्होटा हो गया तब तो निपल से उनकी गर्म साँसे टकराने लगी, लेकिन उसे तो उनके मुँह का इंतेजार था. जब एकदम छ्होटा हो गया तो उन्हों ने जीभ निकली और अब तक कड़क हो चुके निपल पर टकराई. मेरे मुँह से आ निकल गई.

शरारती नज़र से मेरी और देखते हुए उन्हों ने जीभ झड़प से निपल की चारो और फिरा दी... और फिर लपक के निपल मुँह मे ले ली. मेरी धड़कन तेझ हो गई. जिस के लिए काब्से निपल बेताब हुए जा रहा था, वो अनुभव होना शुरू हो गया. वो मस्ती से उसे चूस रहे थे. आहा ! क्या फीलिंग थी !! निपल से जैसे करेंट बह रहा था और पुर बदन मे फैल रहा था......एक नशा सा च्छा रहा था ! कितना आनंदप्रद अनुभव होता है ये !!

यही सब दूसरे मुममे के साथ भी किया गया. बड़े आराम से वो लगे रहे, दोनो स्तनों पर. एक चूसाते थे तो डुअसरे को मसलते थे. मैं नारी तो जन्मा से थी लेकिन नारितवा आज महसूस कर रही थी. एक अरसे के बाद नशा तोड़ा कम हुआ तो मैने उनकी खुली पीठ पर रखे अपने दोनो हाथ से उन्हे अपनी और दबाते हुए एक आलिंगन दिया. उन्होने भी अपने हाथ मेरे स्तनों से हटा के साइड से होते हुए, मुझे हल्का सा उठाते हुए, मेरे बदन के नीचे पहुँचा दिए.. और आलिंगन दिया. मुझे साथ ले कर रोल ओवर हो के मेरी साइड मे आ गये और आलिंगन पर बड़ा ज़ोर दिया. आहहाअ....... मैं उनकी बाहों मे क्रश हो गयी...... बड़ा सुकून मिल रहा था......... लगता था वक़्त ठहर जाए तो कितना अच्च्छा होता.

उन्हों ने पकड़ ढीली कर के एक हाथ नीचे अपनी एलास्टिक शॉर्ट्स मे सरकया, और उसे नीचे खींचा. मैने देखा तो मैने भी शॉर्ट्स मे पावं फसा के उसे नीचे उतार दिया. पता नही मैने ये क्यों किया. उनका लंड बाहर निकल आया. फिर मुझे आलिंगन मे क्रश कर के वो रोल ओवर होते हुए वो मुझ पर आ गये. लेकिन अब दोनो बिल्कुल नंगे थे. वो पूरी तरह तैयार हो चुके थे. उन्हों ने अपने हिप्स उठाए और लंड को मेरी चूत के मूह पर ले आए. तब मुझे ख़याल आया , क्या होने जा रहा है. एक पल के लिए मैं सहमी और उनको कहा,


साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

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