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Monday, December 15, 2014

FUN-MAZA-MASTI माँ-बेटे की चाँदी--3

FUN-MAZA-MASTI

 माँ-बेटे की चाँदी--3

 थोड़ी देर बाद माँ बोली "अब पेल दे अपना घोड़े वाला लंड मेरे लाल, फार के रख दे अपनी माँ की चूत को" मैं भी तैयार था इसलिए चूमना छोड़ कर माँ को डौगी के स्टाइल में पोज बताया और कहा "इसी तरह तुम बनो" तो तो माँ उसी पोज में बनते हूवे बोली "तुम बहोत बिगर गए हो. ये सब तुम कहाँ से सिखा? किसी को चोदा तो नहीं है इससे पहले?" तो मैं बोला "मेरी माँ, मेरी जान, मैं तो ख्वाबो में तुझे रोज चोदता था! आज जाके ये मौका मिला" तो फिर माँ बोली "अच्छा! तो अपनी माँ को इससे पहले क्यूँ नहीं चोदा? पहले चोद दिया होता तो मैं इतना तरपती तो नहीं" तो मैं अपना लंड उनके चूत पे टिकाते हूवे बोला "मेरी जानेमन! अब जो होना था वो हो गया. अब तो बस तो हमेशा तुम्हे चोदुंगा" कहते हूवे मैंने लंड पे जोर डाला और एक ही धक्के में अध से ज्यादा लंड अन्दर घुसा दिया. अचानक घुसा देने की वजह से माँ तिलमिला गयी और बोली "बता दो दिया होता ऐसा लगा फट गयी मेरी चूत" तो मैं लंड को थोरा बाहर खीचते हूवे कहा "अभी तो चोदा था तो कैसे फट जाता माँ" और फिर से एक जोर का झटका दे दिया!

माँ अचानक रोने लगी.. और रोते हूवे बोली "तुम मेरी जान ले लोगे. बता के तो छोड़ो बहोत दर्द होता है. एक तो तुम्हारा लंड मेरे चूत के साइज़ का नहीं है. और फिर तुम अचानक घुसा देते हो मै मार जाऊंगी. कुछ तो रहा म करो अपनी माँ पे." और फिर रोने लगी. तो मैं धीरे-धीरे लंड अन्दर बाहर करते हूवे बोला "रोती क्यूँ हो माँ? मैं तो तुम्हे खुश करने के लिए ये सब करता हूँ! अब देखो मैंने अचानक लंड घुसाया तो इसका दर्द कैसा होता है ये तो तुम्हे पता चल ही गया. अगर नहीं करता तो तुम्हे थोड़े ना पता चलता." और फिर मैं उनकी कमर को पकरकर थोडा स्पीड बढाया! अब माँ के मूंह से हर धक्के के साथ आह्ह.. आह्ह्ह.. सीईईईइ.. सीईईईई... निकलने लगी जिससे घर के अन्दर का माहौल मदहोश सा होने लगा था! शायद अब बाहर का तूफान थम चूका था पर अन्दर का तूफ़ान अभी जारी था! तभी माँ अचानक बदन ऐंठने लगी. और चाँद सेकंड बाद उनके चूत से ढेर सारा पानी निकलने लगा और तभी माँ के मूंह से निकल पड़ा "आज मैं मर गयी" मैं इन बाते पे गौर नहीं किया और लगातार चोदता रहा! अप लंड माँ की चूत की पानी को पीके और फ़ैल चूका था और अन्दर-बाहर भी आसानी से हो रहा था जिससे स्पीड भी बढ़ गयी.

मैं पिछले २५ मिनट से माँ को चोद रहा था माँ ३ बार झड चुकी थी. अब तो उसके पैर भी कांप रहे थे. शायद ताकत ख़त्म हो गयी थी उनकी! मैं भी सोचा जल्दी फिनिश करके माँ को सोने दू और खुद भी सो जाऊं. इसलिए मैंने जोर-जोर से धक्के लगाने लगा माँ के मुंह से सुरुवात में आआअ.. आआ.... की आवाज आया और फिर बंद हो गया मैं समझ गया माँ अब थक के चूर हो चुकी है. इसलिए लगातार धक्के लगता जा रहा था. हैंह... हैंह... हैंह... हैंह... की आवाज मेरे मुंह से निकल रहा था. करीब १२०-१२५ धक्के के बाद मैं भी झरने लगा माँ की चूत में सारा वीर्य भर दिया. माँ कुछ बोल नहीं रही थी. मैं आखिरी कतरा तक डाल दिया फिर. वैसे ही चूत में लंड डाले ही सो गया.


 माँ की चूत को वीर्य से भरने के बाद मैंने कम्बल उठाया और माँ को बाँहों में लेकर ऊपर के कम्बल डालकर सो गया| दोनो को ऐसी नींद आई कि बस पता ही नहीं चला|
सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि मैं बिना कपड़ो के ही कम्बल में था. और माँ बिस्तर पर नहीं थी| बारिश रुक चुकी थी| मैंने उठकर बनियान और लुंगी पहनी और माँ को आवाज़ दी| माँ बाहर भैंस दुह रही थी| दूध लाकर माँ ने बाल्टी को कमरे में रखा और मुझसे बिना नज़रे मिलाये पूछा, "बेटा चाय पिएगा?"
मैंने शरारत में जाकर माँ को पीछे से पकड़ते हुए कहा, "जो पिला दोगी वोह पी लूँगा माँ|"
माँ ने अचानक से चौंककर मुझे अपने से दूर करते हुए कहा, "सुबह हो गयी है हरिया, कोई देख लेगा|"
मुझे माँ कि बात ठीक लगी और मैं माँ से अलग हो गया, मैंने बाहर कि तरफ जाकर दरवाजे कि कुण्डी लगाईं और जल्दी से आकर माँ को बाँहों में भर लिया और कहा, "अब कोई नहीं देखेगा माँ|" माँ मेरी इस हरकत पे एकदम से घबरा गयी और बोली, "रात को न जाने क्या क्या हो गया हरिया, मुझे डर लग रहा है| कहीं किसी को पता चल गया तो, जीना मुश्किल हो जायेगा." मैंने माँ को अपनी तरफ मोड़ा और पीठ से पकड़ कर अपने सीने से लगा कर कहा, "तुम बेकार ही चिंता कर रही हो माँ, किसी को पता नहीं चलेगा| हमें जो भी करना है हम चोरी छुपे करेंगे. घर के बाहर हम माँ और बेटा बनकर ही रहेंगे और घर के अंदर पति पत्नी बनकर|" माँ ने आश्चर्य भरी नजरो से मेरी तरफ देखा और बोली, "तू क्या कह रहा है बेटा, मैं तो अभी भी तेरी माँ हूँ. तेरे पापा मेरे पति हैं. मैं तो अभी भी उन्ही कि अमानत हूँ. " कहकर माँ ने चेहरा ऐसे झुका लिया जैसे कोई नयी नवेली दुल्हन शरमा जाती है.
मैंने माँ के चेहरे को अपने हाथ से ऊपर उठाया और माँ से पूछा, "लाल सिंह कि पत्नी बनकर तुने क्या पाया है माँ. साल में १५ दिन के लिए तुझे पत्नी बन ने का सुख मिलता है. और बाकी पुरे साल तो तू अकेली ही रहती है. मैं उस बाकी पुरे साल के लिए भी तुझे सुहागन देखना चाहता हूँ माँ. मैं चाहता हूँ कि तू भी साल भर वो सुख भोगे जिस पर किसी पत्नी का अधिकार होता है. "
माँ अभी भी मेरे सीने से लगी हुई थी. उसकी साडी का पल्लू एक तरफ गिरा हुआ था, और स्तन मेरे सीने से टच कर रहे थे. मेरे हाथ माँ कि कमर को पकडे हुए थे, ताकि वो मेरे सीने से अलग न हो जाये. माँ के दोनों हठ मेरे सीने पर थे ताकि उसके स्तन पूरी तरह से मेरे सीने से न लग सके. एकदम ऐसा सीन था जैसे कि कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को बाँहों में जकड़ने कि कोशिश कर रहा हो, और प्रेमिका अधूरे मन से उससे अलग होने कि कोशिश कर रही हो.
सुहाग के सुख कि बात करके शायद मैंने माँ कि दुखती राग पर हाथ रख दिया था. माँ कि आँखों में आंसू आ गए और माँ ने अपने हाथ मेरे कंधो पे रख लिए और थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी. मैं माँ के कुछ कहने का इन्तेज़ार कर रहा था और माँ बस भीगी आँखों से दूध कि उस बाल्टी को देख रही थी जो उसने अभी अभी लाकर रखी थी.



 चुप्पी तोड़ते हुए माँ बोली, "बेटा हमने रात में जो भी किया, शायद हमें वो नहीं करना चाहिए था. जो भी हुआ, शायद तेरे पापा के दूर रहने कि वजह से हो गया." मैंने मौका सही जानकार तुरत अगला पैंतरा मारा, "हाँ, माँ फिर इसमें गलत क्या है, तुने मुझसे वो सुख लेने कि कोशिश कि है जो तेरा हक है. २० साल से तुने जुदाई की जो तड़प सही है, मैं तुझे और नहीं सहने दूँगा. मैं तुझे अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ. बोल माँ, लाल सिंह को छोड़कर, हरिया कि पत्नी बनेगी तू? मैं शिव जी कि सौगंध खाकर कहता हूँ कि तेरा पूरा ख़याल रखूँगा और तुझे वो हर सुख दूँगा, जो मेरे बाप ने तुझे नहीं दिया है."
इन बातों ने मुझे उत्तेजित करना शुरू कर दिया था, और मैंने लुंगी के अंदर कुछ पहना भी नहीं था. लंड ने कसमसाना शुरू कर दिया था, और शायद माँ को इस बात का एहसास हो चुका था, क्यूंकि माँ भी अपने कूल्हे हिलाकर लंड कि जगह बना रही थी. मैंने एक हाथ से फिर से माँ के सर को थमा, और माथे पर तीन चार चुम्मी लेकर कहा, "बता न माँ, क्या तू मुझे अपने पति के रूप में देखना स्वीकार करेगी?"
माँ ने आँखों में ढेर सारी ममता भरकर दोनों हाथो से मेरे चहरे को थामा, और बोली, "मेरे हरिया, तू क्या बिना सोचे समझे ये सब बोल रहा है. जानता है मेरी उम्र क्या है, मेरे जवानी तो ढल गयी है और तू तो अभी जवानी में कदम रख ही रहा है. एक दो साल में मुझे छोड़कर तू तो अपना घर बसा लेगा, शादी कर लेगा. और मैं फिर से उसी मोड पर आ जाउंगी."
माँ कि सहमति को मैं पढ़ रहा था. उनके कहने में कोई और डर था. अब. लेकिन मेरे लिए तो उनकें मन कि ये पहली सहमति ही बहुत थी. मैंने तुरंत माँ कि आँखों पर दो चुम्बन लिए और उसके चेहरे को थामकर कहा, "माँ मैंने तो हमेशा से तुझे ही अपनी पत्नी माना है. मेरे दिल और दिमाग में बस तू ही है. मैं तुझी से शादी करना चाहता हूँ. तेरे साथ ही अपना घर बसाना चाहता हूँ." मैंने माँ का हाथ लेजाकर लुंगी के ऊपर से लंड पे रख दिया और बोला, "देख ले माँ मेरे दिल और दिमाग में बस तू ही है." उसके सर पर हाथ रखकर मैंने कहा, "तेरे सर कि कसम खाकर कहता हूँ माँ कि जो कह रहा हूँ सच कह रहा हूँ, मैंने बचपन से लेकर आजतक सिर्फ तुझसे ही प्यार किया है. गांव कि किसी लड़की कि तरफ आँख उठाकर नहीं देखा. बोल माँ, लाल सिंह कि जगह इस हरिया को देगी ना. बचपन से लेकर आजतक बस एक ही मेरी हसरत रही है कि मैं तुझे अपनी पत्नी के रूप में देखूं. बोल माँ, मुझे अपने माथे का सिन्दूर बनाएगी ना."
माँ ने भाव विभोर होकर अपना सर मेरे सीने पे रख लिया और मुझे कसकर अपनी बाँहों से जकड लिया. माँ कि इस मूक सहमति से लंड में जान और भी बढती जा रही थी. मेर एक हाथ माँ के ब्लाउज के पास और दूसरा उसके चुतद पर था. माँ के सर पर मैंने अपनी ठोड़ी रख ली और उसकी पीठ सहलाने लगा.
४-५ मिनट ऐसे ही गुजर गए. मेरा दिल बहुत जोर से धक् धक् कर रहा था. पता नहीं था कि जिस हुस्न कि रानी को मैंने सपनो में अपनी रानी माना है, वोह आज मेरी बनेगी या नहीं.
ठोड़ी देर ऐसे ही रहने के बाद माँ ने अपनी चुप्पी तोड़ी. मेरे सीने पर से बिना अपना सर हटाये, माँ ने कहा, "कल रात जो सुख तुने मुझे दिया है, उसके बाद मैं तेरे बिना नहीं रह सकती हरिया.लाल सिंह कि जगह अब तुझे ही लेनी है मेरे लाल. मेरे हरिया." माँ ने अपना सर उठाया, और मेरी आँखों में आंखें डालकर और मेरे चहरे को अपने होंठो के पास खिंचा और बोली, "बाप के बाद अब बेटा ही सम्हालेगा मुझे. आज से मेरी जवानी का बोझ तू ही उठाएगा. आज से मेरी मांग में सिन्दूर तू ही भरेगा मेरे हरिया."
मैं खुशी से पागल हो गया था. मैंने माँ को तुरत गोद में उठा लिया और बिस्तर पर लेजाकर डाल दिया और तुरंत उसके ऊपर जाकर लेट गया. लंड में तुरंत एक उछाल आया और लुंगी से बाहर निकल गया. मैं माँ के ऊपर था और मैंने उसके होंठों को चूसना शुरू कर दिया. माँ ने ठोड़ी देर तो मेरी बेसब्री में मेरा साथ दिया मगर फिर हंसकर, मेरा चेहरा अपने से अलग किया, और स्नेह और वासना में सनी हुई एक मुस्कान के साथ मुझे प्यार से देखते हुए कहा, "मेरे लाल, आज से मैं तेरी पत्नी होने की हर ज़िम्मेदारी पूरी करुँगी, और तू भी मुझे वचन दे कि मेरा पूरा ख्याल रखेगा." एक हाथ में माँ ने लंड को थाम लिया, और कुटिल मुस्कान चेहरे पर लाकर बोली, "वादा कर कि तन और मन दोनों से मेरी हर ज़रूरत को पूरा करेगा." मैं माँ के ऊपर से उतर कर साइड में हो गया, ताकि माँ लंड को ठीक से पकड़ सके, और मैंने ब्लाउज के हुकों को खोलते हुए कहा, "कसम खाता हूँ माँ कि हर तरह से तेरी हर ज़रूरत को पूरा करूँगा." कहकर मैंने माँ के होंठो को अपने होठो में थाम लिया और एक नयी जिंदगी कि शुरुआत माँ की ममता के आंचल से शुरू की.


 मैं कमर के बल बिस्तर पर लेता हुआ था, और छत कि तरफ देख रहा था| माँ मेरे बाएं हाथ कि तरफ लेती थी. उसके बाल खुले हुए थे. मैंने अपना बनियान निकाल दिया था और माँ ने ब्लौसे के अंदर कुछ भी नहीं पहना था. माँ ने अपना सर मेरे कंधे पर रखा हुआ था और मेरी छाती के बालो में उँगलियाँ चला रही थी. उसके स्तन मेरे सीने से लग रहे थे और एक हाथ से माँ मेरे लिंग को सहला रही थी. मैंने माँ के साथ ही जिंदगी गुजारने कि कसम खा ली थी. और मेरा मन आगे कि जिंदगी को रोमांचक बनाने के खयालो से भर रहा था. मैंने माँ कि तरफ प्यार भरी नजरो से देखा, तो मुझे ख़याल आया कि माँ कभी सिन्दूर नहीं लगाती थी. सिन्दूर भरी मांग के साथ माँ की कल्पना करते ही मेरे लिंग में एक उछाल आ गया. माँ ने अपनी साडी को ऊपर सरका कर अपनी एक टांग को मेरी जांघों पर रखा हुआ था, और उसकी आँखों में सुरक्षित महसूस होने वाला अनुभव था. मेरा एक हाथ माँ को सर को सम्हाल रहा था और दूसरा उनकी कमर को सहलाने में लगा था.





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FUN-MAZA-MASTI माँ-बेटे की चाँदी--2

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 माँ-बेटे की चाँदी--2

 करीब २ मिनट तक माँ मेरे लंड को चाटी तो फिर मेरा लंड पहले जैसा तन के फुफकार छोरने लगा. तो मैं माँ को बोला "माँ अब मुझसे नहीं रहा जाएगा, चलो जल्दी से सो जाओ." माँ झट से पीठ के बल पर सो गयी. मैंने माँ के कमर के निचे एक ऊँचा तकिया लगाया ताकि चोदने में कोई दिक्कत ना हो. इससे चूत का पूरा मूह खुल गया. ऐसा लग तारा था जैसे गुलाब फूल कलि से अभी-अभी फूल बनी हो. पर मेरी माँ तो मेरे जन्म से पहले ही फूल बन चुकी थी. मैं बड़े गौर से उस चूत को देखने लगा. तभी माँ बोली " देख ले गौर से, इसी चूत के रास्ते तूं बाहर आया था २२ साल पहले." तो फिर मैं बोला "और आज मैं उसी बूर को चोदने जा रहा हूँ." कहते हूवे मैंने माँ के पैर को फैलाया और उनके दोनों पैर के बिच में आकर अपना लंड चूत के छेद पर रखा तभी माँ के मूंह से आह्ह्ह्ह....!! निकल गयी तो मैंने पूछा "क्या हुवा ? अभी तो मैंने रखा है बस" तो माँ बोली "ऐसा लगा जैसे कोई गर्म लाल लोहा रख दिया हो मेरे बूर पर." मैंने लंड को चूत पर टिकाये रखा और माँ की ओर झुकते हूवे माँ के दोनों हाथ को अपने कब्जे में किया. मैं अब उनको इस तरह अपने गिरफ्त में रखा था की कितनी भी कोशिश करने के बाद भी वो मेरे गिरफ्त से छोट नहीं सकती थी.

अब मैंने माँ के चेहरे को देखा, ये देखते ही की मैं उनके चेहरे को देख रहा हूँ माँ ने अपनी आँखे बंद करली. मैंने एक चुम्मा उनके होठ पर लिया और कहा "
आँख क्यूँ बंद करती हो माँ ? देखो ना मेरी तरफ, आज तुम्हारे सेज पर तुम्हारा पतिदेव नहीं बल्कि तुम्हारा बेटा चढ़ा हुवा है. खोलो ना आँखे." तो माँ बोली "नहीं मुझे शर्म आ रही है." तो मैं बोला "इसमें शर्माने वाली कौन सी बात है? आँख में आँख डाल के करेंगे तो और मजा आएगा." कितना कहने के बाद शर्माते हूवे आँख खोली. क्या खुबसूरत लग रही थी शर्माहत तो उनके चेहरे पे चार चाँद लगा रहा था. मैं चुमते हूवे कहा "माँ तुम कितनी खुबसूरत हो. तुम्हे तो मिस वर्ल्ड होना चाहिए. खैर दुनियां के लिए तू मिस वर्ल्ड नहीं हो तो क्या मेरे लिए तो उससे भी बढ़ कर हो." तो माँ बोली "क्यूँ..? मैं इतनी पसंद हूँ तुम्हे." मैं बोला "हाँ तुम बहोत खुबसूरत हो माँ." कहते हूवे मैंने फिर से उनके ऊपर अपनी पाकर मजबूत कर ली. और बोला "अब तैयार हो अपने इस बेटे का लंड खाने के लिए?" माँ ने हाँ में सर हिलाया. मैंने फिर से लंड को ठीक जगह पर लगाया, माँ को कब्जे में लिया और एक बहोत जोरदार धक्का मार दिया! माँ बदन ऐंठने लगी और बोली "मररर्रर्रर्ररररर्र्रर्र्र्रर्
र्रर्र्रर्र्र....! ग़ेईईईई...! म...ए...!
और बदन इस कदर ऐंठने लगी की जैसे किसी दुर्घटना से किसी की जाँ निकल रही हो.

पूरे बदन से पसीना निकल रहा था. मैं थोडा देर वैसे ही रूका रहा जब ५ मिनट बाद माँ थोडा शांत हूई तो मैं उनको चूमने लगा. और उनके चूची को चूसने लगा.
"मैं एक बात यहाँ बता दूं अगर कभी भी ऐसा हो आपके साथी को बहोत ज्यादा दर्द हो तो उन्हें फिर से जोश में लाने के लिए ये सब करना बेहद जरूरी है. नहीं तो शायद वो ना भी कर सकती है." लंड को वहीँ फसाया हुवा था. माँ को चूमता रहा.


कभी माँ की निचले होठ को मुह में लेकर चूसता तो कभी ऊपर के होठ को, और साथ ही साथ उने चूची को भी मसल रहा था! अभी मैं लंड को वही रोक रखा था, करीब ८-१० मिनट तक मैं माँ को ऐसे ही चूमता-चाटता रहा और चूची को मसलता रहा. तब जाके माँ शांत हूई! तो मैंने माँ से पूछा "अब कैसा लग रहा है माँ..? अब दर्द कम हुवा..?" तो माँ बोली "हाँ अब जाके कुछ दर्द कम हुवा है, पर तुम अपना लंड मेरे चूत से निकाल नहीं तो मैं मर जाऊंगी" तो मैंने बारे प्यार से उनके होठो को चूमा और बोला "कैसी बाते करती हो माँ! ये लंड तेरे बेटे का है ये चूत के लिए ही तो है, भला लंड से कोई मरता है. और मैं भी तो इसी चूत से निकला हूँ. जब तुम्हे तब कुछ नहीं हुवा तो अब क्या होगा..?" तो फिर माँ बोली "हाँ! पर उस दिन मुझे तुझे निकालते समय इतना दर्द नहीं हुवा था जितना आज हो रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे मेरे दोनों टांग अलग कर रहे हो तुम मेरी चूत को चीरते हूवे!"

फिर मैंने सोचा माँ ऐसे मानने वाली नहीं है. तो मैंने लंड को वही रोक कर माँ को फिर से चूमने-चाटने लगा. मैं होठ को चूमा और बोला
"माँ तुम्हारी होठ कितनी रशिली है! पापा तो तुमपे पागल हो जाते होंगे!" और फिर मैं उनके गर्दन को चूमने लगा. तो फिर माँ बिली "तुम्हारे पापा तो मुझे कभी चुमते -चाटते नहीं है बस चूत में लंड डाल के १०-२० धक्के लगाते है और बस सो जाते है." मैं माँ की ध्यान से ये हटाना चाहता था की उसके चूत में मेरा लंड है! मैं मैं कुत्ते की तरह उनके गाल, गर्दन, और होठ को चूम रहा था. कभी-कभी माँ में कान के निचे मैं अपना दांत गारा देता जिससे माँ चींख उठती "आःह्ह.. क्या कर रहा है जालिम... अपनी माँ को इतना सताएगा...." तो मैं बोला "मैं अपने प्यारी माँ को प्यार कर रहा हूँ. आप चुप रहो.." माँ भी इस क्रिया का आनंद उठा रही थी आखिर उसे इस तरह पापा ने कभी प्यार किया नहीं था. माँ अब भूल चुकी थी की उनके चूत में उनके बेटे यानी मेरा होता तगर लंड परा हुवा है, जो अन्दर जाने के लिए तरप रहा है..!

माँ मेरे बाल सहला रही थी तो कभी मेरे पीठ पे हाथ फेर कर मेरा हौसला बाधा रही थी. थोड़ी देर तक ऐसे ही चलता रहा. फिर मैं माँ को चुमते हूवे ही, ताकि उन्हें पता ना चले, मैं अपने दोनों हाथ से उनको अपने गिरफ्त में ले चूका था! मुझे मालूम था की माँ बचने की भरपूर कोशिश करेगी.. इस लिए मैंने इस तरह पाकर की कितना भी कोशिश कर ले माँ मुझसे बच ना सके! मैं माँ को इस बात का खबर नहीं होने दिया. जब वो मेरी गिरफ्त में पूरी तरह आ गयी तो मैंने एक और जोरदार धक्का दिया.. माँ चिल्लाने लगी
"मैं मर्र्र्रर्र्र्रर..... गेईई..... मुझे छोड़ दीईईए.... आआहहह्ह्ह... मेरी चूत फत्त्त्त गेई...." माँ रोने लगी और बोल रही थी "मैं तुम्हारे हाथ जोरती हूँ. मुझे छोड़ दे मैं मार जाऊंगी..." पर इस बार मैं माँ की बातो पे ध्यान नहीं दे रहा था. मैं चोदे जा रहा था.


मेरी तो बस एक ही तमन्ना थी की आज इस छुट की धज्जिया उड़ा दू जिससे मैं बाहर निकला. माँ पसीने से नहा चुकी थी. उनके बाल गर्दन सब पसीने से तर हो चूका था, पसीने की बदबू मुझे और मदहोश कर रहा था. मैं माँ को सरक की रंडी की तरह छोड़ रहा था हालांकि लंड अभी भी पूरा नहीं घुसा था अभी भी लगभग १-२ इंच अन्दर जाना था. माँ मुझसे लगातार विनती कर रही थी "बेटा मुझे छोड़ दे मैं तुम्हारी माँ हूँ.. मैं मार जाऊंगी.. ये तेरा लंड मेरे जैसे छोटे छुट के लिए नहीं हैं. आअआआहहह्ह्ह.... मार्र्र माँआरररररररररर्रर्र डाला रेईई..!" मैं कुछ नहीं सुन रहा था लगातार चोदे जा रहा था. एक तरह से मैं माँ का रेप (बलात्कार) कर रहा था.

करीब १५ मिनट के चुदाई के बाद वो नोर्मल हूई और अपना चुतर ऊपर उछलने लगी. तभी मैंने बारे प्यार से माँ को चूमा और पूछा
"मजा आ रहा है माँ..?" तो माँ बोली "तुम तो बरे जालिम हो.. मैन तो मार ही जाती आज. भला इतना मोटा तगरा लंड किसी का होता है. ये आदमी का लंड है या घोड़े का.." तो मैं बड़े प्यार से उसके forehead (सर, आँख के ऊपर का हिस्सा, कपार) को चूमा और कहा "माँ ये तेरे बेटे का लंड है जो इसी चूत से निकला था." तभी माँ बोली "और आज इसी चूत को फारने पे लगा हुवा है.." और हसने लगी..! तभी मैं बोला "हर माँ को ऐसा बेटा नसीब थोड़े होता है जो उसी की चूत की प्यास बुझाए" तो माँ बोली "हम्म! ये भी सही है."

इसी तरह बात-चित जारी थी. तभी माँ बोली
"अब मैं झर रही हूँ जोर से धक्के मार." मैंने भी जोर से एक धक्का मारा की माँ फिर से तिलमिला उठी. तभी उनके चूत से ढेर सारा पानी बहने लगा...! मेरा लंड माँ की चूत की पानी में नहा के और फूल गया.. और चिकना हो गया. (जो १ इंच के लगभग बाकी था मै वो भी घुसा चूका था इस लिए माँ तिलमिलाई थी.) अब लंड भी थोडा आसानी से बाहर-अन्दर हो रहा था. मैंने लंड को माँ के चूत में पूरा घुसा कर उनको बांहों में भरा और उठा कर पलंग से निचे ले आया, तो माँ बोली "क्या कर रहा है..? कहाँ ले जा रहा है..?" मैं बोला "कहीं नहीं माँ. बस तुम देखती रहो.." फिर मैंने माँ के कमर तक का हिस्सा पलंग पर रखा, और टांग को मैंने हाथ से पाकर लिए और फिर छोड़ने लगा तो माँ बोली "कैसे-कैसे छोड़ रहा है. कहाँ से सिखा ये सब..?" तो मैं बोला "कही से नहीं माँ बस चुदाई की कुछ फोटो देखे हैं इस तरह के." और मैं छोड़ने लगा..!! बाहर कुछ अलग ही तूफान बह रहा था और घर में कुछ अलग ही, मुझे तो घर के अन्दर की तूफ़ान पसंद था.

इसी बीच माँ फिर से एक बार जहर गयी..!! अब घर में फच-फच की आवाज गूंजने लगी. घर का बातावरण एकदम बदल चूका था. कभी-कभी माँ मेरी आँख में देख कर हंस भी देती थी फच-फच की आवाज सुन कर. एक बार ऐसे ही हसते हूवे बोली
"कितना कमीना है मेरा बेटा..!! अपनी माँ को चोद दिया आज. तू अब माधर चोद है बेटा." मैं हंस दिया और चोदता रहा करीब १ घंटे की चुदाई के बाद मैं अब झरने वाला था तो मैं बोला "माँ मैं अब झरने वाला हूँ." तो माँ बोली "थोडा संभल अपने आप को मैं भी झरनेवाली हूँ..!" फिर मैंने धोरा संभाला अपनाप को और फिर १०-१२ जोरदार धक्के दिए फिर हम दोनों झर गए. मैं उनके ऊपर वैसे ही लेट गया. मुझमे उतनी ताकत नहीं थी की मैं ऊपर चढ़ सकू.


करीब १५ मिनट तक मैं वैसे ही लेटा रहा, उसके बाद जब थोडा होश आया तो मैंने माँ के चेहरे को देखा, माँ पूरी संतुष्टता भरी नजरो से मुझे देख रही थी. तो मैंने उनके निचले होठ के निचे चूमा और कहा "क्या देख रही हो ऐसे माँ..?" तो माँ मेरे बाल सहलाते हूवे बोली "कुछ नहीं बेटा! बस पुरानी यादो में खो गयी थी." तो मैंने पूछा "कैसी पुरानी यादे माँ..?" तो माँ बोली "यही की जिस छोटे से बच्चे को मैंने वर्षो पहले जन्म दिया था, वो आज अपनी माँ को चोद कर, अपनी माँ को खुश करके, बेटा होने का फ़र्ज़ अदा कर दिया." तबतक मैं अपने लंड को माँ की पेटीकोट से साफ़ कर चूका था. और पलंग पर चढ़ चूका था. फिर मैंने माँ को अपने दोनों बांहों के बिच भरा और कहा "माँ! ये तो बस शुरुवात है तेरा कर्ज चुकाने का. मैं तुम्हारी ख़ुशी के लिए कुछ भी कर सकता हूँ." तो माँ मेरे गाल पे चिकोटी काटते हूवे बोली "तो क्या तू मेरा सैयां बन के रहेगा..?" मैंने भी माँ के गाल पे दांत काटते हूवे कहा "तो इसमें बुराई क्या है मेरी माँ...?" माँ की चूत से मेरा वीर्य बाहर बह रहा था. उनके दोनों जांघ पर और गांड पे भी बह कर जा चूका था. माँ बोली "अब तो मैं भी चाहती हूँ की तू मेरा सैंया बन के रहे पर अगर कभी लोगो को पता चल गया तो हम..." तभी मैं माँ की बात को काटते हूवे माँ को अपने बांहों में जोर से भर कर उनके होठो को जोर से चूमा और फिर बोला "मेरी प्यारी माँ! तुम दुसरे की चिंता क्यूँ करती हो..?" और फिर मैंने माँ के गाल पे दांत काट लिया! फिर से मेरा लंड खड़ा हो चूका था. बस माँ को फिर से गरम कर रहा था. माँ "आआह्ह्ह..." की चीख निकली. और फिर मैंने बोला "जब हम और तुम किसी को नहीं बताएँगे तो किसी को कैसे पता चलेगा?" और फिर मैं उनके गर्दन को जानवर की तरह चाटने-चूमने लगा. तो माँ मुझे हटाते हूवे बोली "और अगर तेरे पापा को पता चल गया तो.. फिर तो मुझे मार डालेंगे." तो मैंने बड़े प्यार से उनके बाल को सहलाया, माँ मेरी आँखों में बेबस भरी नजरो से देख रही थी. मैं भी उनके आँखों में देखते हूवे कहा "तुम चिंता मत्त करो जब तक मैं हूँ आपको कुछ नहीं होगा. और पापा को भी तभी पता चलेगी ना जब कोई बताएगा! और हम दोनों मेसे तो कोई बताने वाला है नहीं. तो तीसरा कौन बतायेगा.?" फिर मैंने उन्हें अपने सिने से जोर से चिपका लिया. माँ ने भी मुझे जोर से पकड़ ली और बोली "तुम दुनिए में सबसे प्यारे बेटे हो जो अपनी माँ के बारे में इस तरह सोचता है." तो मै बोला थोडा मजाकिया अंदाज में "हां माँ उसके कई कारण है" तो माँ बोली "अच्छा! कौन-कौन सी..?" तो मैं बोला "पहला आप मेरी माँ हैं, दूसरा आपसे मैं बहोत प्यार करता हूँ, तीसरा आप बहोत खुबसूरत भी है, चौथा आपका हाल पापा के बिना क्या होता है वो मैं समझता हूँ" तभी माँ बोली "बस-बस! नहीं तो आगे बोलेगा की आपने मुझे चोदने दिया. और आगे भी चोदने देंगी.

तो मैंने पूरे मस्ती भरे अंदाज में अपने दोनों पैरो में फसाया उनके टांगो को और फिर दोनों हाथ से उनको अपने बांहों में भरते हूवे बोला
"तो मेरी माँ अब मेरे मन की बात समझने लगी है." और फिर मैं माँ के गर्दन और छाती के उपरी हिस्से को चूमने लगा. जब मैंने दोनों टांगो से उनके टांगो को दबाया तो शायद उन्हें मेरा वीर्य जो उनके चूत से निकल रहा था वो चिप-छिपा सा लगा, तो माँ बोली कुछ चिप-चिप कर रहा है और उठ कर बैठी फिर देखने लगी तभी उन्हें मेरा वीर्य गांड पे भी महसूस हुवा. तो माँ बारे आश्चर्यचकित होकर मेरे तरफ देखने लगी. फिर अपने पेटीकोट से साफ़ करने लगी तो मैं बोला "क्या देख रही थी प्यारी माँ?" तो माँ वीर्य साफ़ करते हूवे बोली "इतना वीर्य तो तेरे पापा ने कभी नहीं गिरग मेरी चूत में" तो फिर मैं मस्ती भरे अंदाज में बोला "जो काम बाप से नहीं हो पाया वो बेटा कर रहा है ना माँ." और फिर मैं माँ को अपनी तरफ झपटा, और माँ के होठो को चूमने लगा! माँ मुझे हटाने की कोशिश कर रही थी उम्मममम... उम्म्ममम्म...!! पर मेरा लंड फिर से धूम मचने के लिए तैयार था इसलिए मैं छोड़ नहीं रहा था. और फिर मैंने एक हाथ से माँ की चूत को सहलाने लगा! माँ मुझसे बचने की कोशिस करती रही पर जब बात नहीं बनी तो आख़िरकार उन्हें अपने बेटे के सामने आत्म समर्पण करना पड़ा और फिर माँ भी साथ देने लगी. अब हम दोनों एक दुसरे को चूमने-चूसने-चाटने लगे. मैं माँ की चूत सहला रहा था तो माँ ने अपने हाथ से मेरा लंड सहलाने लगी. करीब १५ मिनट तक ऐसा चला!
 
 
















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FUN-MAZA-MASTI माँ-बेटे की चाँदी--1

FUN-MAZA-MASTI

 माँ-बेटे की चाँदी--1


 मैं २२ साल का युवक एक छोटे से गावं का रहने वाला हूँ. मेरे घर में मेरे अलावा मेरी माँ और पापा है. मान गृहणी है पापा बाहर मुंबई रहते हैं. मेरा गावं बहोत ही पिछरा हूवा है. यहाँ के ९९% लोग रोजी-रोटी के लिए घर छोड़ कर बाहर ही जाते हैं. मेरे पापा साल भर बाद या साल भर ६ महीने बाद घर आते रहते हैं. २५-३० दिन रुकते हैं फिर चले जाते है. मैं बी. ए. अंतिम साल में हूँ. गावं मेरे मेरे जितना पढ़ा अभी तक कोई नहीं है. ज्यादातर लोग १०वि या १२वि करके बाहर चले जाते हैं.

मैं माँ पापा का अकेला संतान हूँ इस लिए मुझे पढ़ा रहे हैं. पढ़ने में भी अच्छा हूँ. हर इम्तेहान में ७०% से ज्यादा ही अंक अर्जित किये हैं. अरे मैं आपको इन बातो से क्यूँ पकाने लगा. मैं आपको एक सच्ची, आपबीती और बहोत ही हसीन हादसा सुसने जा रहा हूँ.

बात २ महिना पुरानी उससे पहले मैंने कई सारे चुदाई की कहानियां पढ़े थे जिसमे से कई सारे कहानियां बहन-भाई की चुदाई की थी तो कई सारे माँ-बेटे की चुदाई की और कई सारे तो बाप-बेटी की भी थी. इन कहानियो को पढ़-पढ़ कर मेरा भी रौड की तरह तन कर खड़ा हो जाता था. पर बूर न मिलने की वजह से मुझे मुठ मर कर ही काम चलाना पड़ता था. इन कहानियो को पढ़कर मेरा भी मन अब अपनी माँ को छोड़ने का करता था. पर मैं उसे चोदता कैसे? वो मेरी माँ थी कह भी नहीं सकता था, कभी-कभी मन करता सीधा रेप कर देना चाहिए! शर्म के मारे किसी को बोलेगी भी नहीं. पर मुझे उन्हें राजी करके चोदना था ताकि कभी भी बूर की जरूरत पड़े तो आसानी से मुझे मिल जाए. पर कैसे होता ये सब...? कैसे में माँ को राजी करता....? कुछ समझ में नहीं आ रहा था. इधर मेरा मुठ मार-मार कर बूरा हाल था. कितने मिन्नते किये भगवान् से कितनी पूजा की. आख़िरकार भगवन ने मेरी सुन ली. मेरा घर कच्छा है मिटटी का घर है. एक में ईंट का पाया (खम्भा) है. उसके छत पे खपरा है. और एक घर में बाम्बू का खम्भा है, उसके छत पे खर-पतवार है. उसी में मैं रहता हूँ. माँ दुसरे घर में रहती है.

कुछ और लिखू इससे पहले थोडा माँ के बारे में बता दूं. ३८ साल की उम्र गोरी चिट्टी काया, जूसी लिप्स, फिगर तो कभी मापा नहीं पर अंदाजन ३४ चूची, २८ कमर, ३४ हिप्स. अभी भी १८ साल की लड़की को पानी पिला दे अपनी खुबसूरत सेक्सी शरीर से. मेरा तो देख देख कर बूरा हाल हो जाता था पहले. पर उस रात ने सब कुछ बदल दिया. उसके बाद तो मानो हम दोनों माँ-बेटे की चंडी ही हो गयी.
मुझे तो अभी भी यकीन नहीं होता की मैं ऐसा करता हूँ.

चलिए मैं आपको और ना पकाते हूवे सीधा मुद्दे पे आते है! हम लोग वैसे ९ बजे तक सो जाते हैं. गावं में बिजली है नहीं हर जगह अँधेरा ही अँधेरा रहता है. ९:३० हो रहा होगा मैं भी सो रहा था माँ भी सो रही थी. गावं के लोग भी सो रहे होंगे. तभी अचानक मुझे लगा जैसे मैं भीग रहा हूँ! जब में टौर्च देखा तो पानी चाट से आ रता था. अरे ये क्या बाहर बारिस हो रही है आंधी-तूफ़ान के साथ. मैंने बिस्तर हटाये और माँ को बोला "माँ ये घर पानी से भर गया है. दरवाजा खोलो" २-३ आवाज लगाने के बाद माँ ने दरवाजा खोला, मैं देखता ही रह गया. मैं माँ को आज पहली बार पेटीकोट और ब्रा में देख रहा था. तभी माँ बोल पारी "बारिस तो बहोत तेज हो रही है." फिर मैं अपने-आप पे काबू किया. और बोला "मेरा सारा बिस्तर भीग गया अब मैं कहाँ सोऊंगा? अभी तो ९:४५ ही हूवा है." तो माँ बोली "लगता है अब उसको फिर से रिपेयर करवाना परेगा. पैसा भी नहीं है कैसे होगा ये सब?" तो मैं बोला "माँ वो सब बाद में सोचेंगे. अभी मैं कहाँ सोंऊ? "चलो मेरे बिस्तर पे ही सो जाओ " मैं ये सुनते ही मन-ही-मन इतना खुश हूवा की मैं क्या बताऊँ.?


 मेरा लण्ड तो फुफकार मार रहा था पर मैं सब्र कर रहा था. वैसे भी किसी ने कहा है सब्र का फल मीठा होता है. फिर मैं माँ के कमरे में घुसा माँ भी दरवाजा बंद करके अन्दर आ गयी. मैंने माँ को बोला "माँ तुम दिवार के साइड जाओ". मेरा प्लान तो कुख्ह और ही था. मुझे इस मौके को किसी भी हाल में गवाना नहीं था चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े. माँ दीवाल साइड चली गयी. मैं भी बनियान और अंडर बीयर पहना था वैसे ही बिस्तर पर लेट गया. ओढने के लिए एक ही कम्बल था. इसलिए हम दोनों ने एक कम्बल में ही ढक गए. फिर मैं बोला "बारिस बहोत तेज हो रही है, कहीं वो घर गिर ना जाए!" तो माँ बोली "उसको जितना जल्दी हो सके रिपेयर करवाना होगा. पर पैसे कहाँ से आयेंगे? लगता है फिर से कर्ज लेना होगा" तो मैं बोला "छोरो ना माँ...!!! इतनी चिंता क्यूँ कर रही हो? जो होगा देखा जायेगा". ऐसे ही काफी देर तक बात करता रहा. लगभग ११:०० बजने वाले थे. मैं बात करते-करते माँ की तरफ खिसकता चला जा रहा था. माँ दीवाल से बिलकुल चिपक चुकी थी.

अब मैं अपना मकसद पूरा करना चाहता था. इसी लिए मैंने टॉपिक चेंज किया. और बोला "माँ तुमपे ये ब्रा बहोत अच्छा लगता हैं" माँ को अपनी तारीफ सुनने में बहोत अच्छा लगता था. २-४ तारीफ़ की पूल बाँध देने से माँ उसके प्रति भाऊक हो जाती थी. इसीलिए मैंने यही सही समझा. तो माँ बोली "ऐसी बाते मत करो तुम." तो मैं माँ को बांहों में लेते हूए बोला "माँ मैं झूठ थोरे ना बोल रहा हूँ. पापा ने कभी बताया नहीं क्या की आप कितनी खूबसूरत हैं...?" "ये क्या कर रहे हो तुम? मुझे छोरो बेटा...!!" कहते हुवे मुझसे छूटने की कोशिश करने लगी. तो मैं भी छोरते हूवे कहा "माँ मुझे ठंढ लग रही है इसलिए सोचा आपके बदन की गर्मि से....!" माँ बात को काटते हूवे बोली " क्या मैं कोई आग हूँ जो मुझसे तुम्हारे ठंढ दूर हो जाएगा..?" तो मैं बोला "आप आग तो नहीं है पर उससे कम भी तो नहीं हैं."


और मैं उनसे एकदम चिपक गया. दर भी रहा था और ये मौका भी नहीं गवाना चाहता था. हम दोनों करोट सोये हुए थे, माँ का दया हाथ निचे था और मेरा बायाँ हाथ निचे था. मैं अपने पैर से उनके पैर को भी रगर रहा था. तभी माँ बोली "आज तुझे क्या हूवा है? ऐसा क्यूँ कर रहा है? मुझे ये सब अच्छा नहीं लगता." शायद माँ को समझ आ रहा था की मै क्या चाहता था? इससे मेरा भी हौसला बढ़ गया. तो मैं उनके बदन पे अपना हाथ फेरते हुवे कहा "मैं तो बस आपको प्यार करना चाहता हूँ. मैं अच्छी तरह जनता हूँ की आप पापा की कमी हमेशा महसूस करते हैं" तो माँ एक लम्बा सांस लेकर बोली "वो तो मैं हमेशा महसूस करती हूँ पर कर भी क्या सकती हूँ. अगर वो बहार नहीं जायेंगे तो पैसा कहाँ से आएगा?" तभी मैं बात काटते हुवे बोला "इसी लिए तो मैं बोल रहा हूँ आप मुझे प्यार करने का मौका दिजिये, मैं आपको हमेशा खुश रखूंगा. मैं आपको इस तरह तडपते हूवे नहीं देख सकता"

और मैं उनके होठ पे किस्स करने लगा तो माँ मुझे हटाते हुवे बोली "
तुम्हे शर्म नहीं आती अपनी माँ के साथ ऐसा करते हूवे. जब लोगो को पता चलेगा तो क्या होगा? तुमने ने कभी सोचा है?" तो मैं माँ को फिर से जोर से बांहों में कसते हूवे कहा "लोगो का क्या माँ? लोगो को कैसे पता चलेगा? जब हम दोनों मेसे कोई किसी को बोलेगा ही नहीं तो लोगो को क्या पता होगा माँ? बस तुम एक बार हाँ कर दो बंकि सब मुझ पर छोड़ दो." मैं माँ को दोनों पैरो से और हाथो से कास के पकड़ रखा था. माँ मुझसे छूटने की कोशिश करते हूवे बोली "ये गलत है ये पाप है. तुम समझते क्यूँ नहीं मैं तुम्हारी माँ हूँ तुम्हारी बीबी नहीं बेटा" तो मैं बोला "हाँ माँ मैं जानता हूँ की तुम मेरी सेक्सी माँ हो और मैं तुम्हारा बेटा. पर तुम ये मत्त सोचो तुम ये सोंचो तुम एक औरत हो जिसको मर्द की जरूरत है, और मैं एक मर्द हूँ जिसे एक औरत की जरूरत है. इससे हम दोनों एक दुसरे का प्यास बूझा सकते हैं." तो फिर माँ बोली "पर ये सही नहीं है बेटा, ये गलत है" तो फिर मैं बोला "कुछ गलत नहीं है माँ, इससे दो फाईदे ही हैं." तो माँ बोली "क्या क्या?" मुझे ये सुन कर लगा की अब माँ पटती जा रही है. फिर मैं बोला "ऐसा करने से तुम्हारी भी प्यास बूझ जाएगी और मेरी भी. और घर की इज्ज़त घर में"


तो फिर माँ बोली "पर बेटा अगर किसी को पता चल गया तो क्या होगा. हम किसी को समाज में मूह दिखने लायक नहीं रहेंगे. हमारी नो नाक कट जाएगी." तो फिर मैं उनके ऊपर आ कर एक जोरदार किस्स लिया और कहा "माँ तुम्हे अपने बेटे पे भरोसा नहीं है. ये बात किसी को मालूम नहीं होगी, यहाँ तक की पापा को भी नहीं. जब पापा घर पर होंगे तो आप पापा से प्यार करवाना. और जब चले जाएंगे तो फिर मैं आपको प्यार करूंगा. इससे आपको पापा की कमी कभी नहीं महसूस होगी." और फिर मैं अपनी माँ ले होठो पर अपना होठ रख कर चूमने लगा! माँ अब कुछ नहीं बोल रही थी. शायद अब उनको मुझ पर भरोशा हो गया. बहार बारिस बहोत तेज हो रही थी और अंडर मेरी और माँ की गर्मी बढ़ रही थी. माँ को मैं बेतहासा चूम रहा था. अब माँ भी मेरा साथ देने लगी! अब वो भी मेरे होठो को चूम रही थी. मैं मन-ही-मन इतना खुश हुवा की मैं आपको शब्दों मैं बता नहीं सकता.

ये वही समझ सकता है जो अपनी माँ को चोदता है. अब मैं माँ की गाल को चूम रहा था एक-दो बार दांत भी गारा दिया जिससे माँ के मूंह से
आह्ह्हह्ह!!! निकल जाता था! अब मैं उनके कंधो और गर्दन को चूम रहा था और माँ मेरे शरीर पर अपना हाथ फेर रही थी. मैं इतनी जोश में आ चूका था की कह नहीं सकता बस मैं इस मौके को भूनाना चाहता था. इस लिए माँ को मैं होश में नहीं आने देना चाहता था. फिर मैं माँ की चूची को ब्रा के ऊपर से दवाते हूवे कहा "आह..!! माँ क्या मस्त चूची है तुम्हारे. जरा इसकी दर्शन करवाओ माँ. अपनी ब्रा को हटा दो." तो माँ ने अपनी छाती को ऊपर उठाया और बोली "निचे से हूक खोल ले. मैं हूक खोलने की कोशिश की पर खुल नहीं रहा था! इसके बारे में मुझे मालूम भी नहीं था की कैसे खुलता है. मैं इतना समय बर्बाद नहीं करना चाहता था इसीलिए मैं ब्रा के दोनों तरफ पाकर के खीचा जिससे ब्रा की हूक टूट गयी. तो माँ बोल पड़ी "मैं कहीं भागी नहीं जा रही हूँ तुम इतनी जल्दी में क्यूँ हो. मालूम है ना जल्दी का काम सैतान का" तो मैं बोला "मुझसे खुल नहीं रहा था माँ तो मैं क्या करता?" कहते हूवे ब्रा को एक तरफ फेक दिया! माँ की चुचिया देख कर मेरी आँखे चौंधिया गया था. क्या मध्य प्रकार की गोरी-गोरी मखमल से भी मुलायम कासी-कासी चुचिया थी. मैं माँ की चूची पर पर टूट पड़ा! कभी मसलता को कभी चूसता! माँ के मूंह से "सीईईई....... सीईईईई...!!" की आवाजे आने लगी थी. चुचिया धीरे-धीरे शख्त होते जा रहे थे. माँ को शायद अब जब मैं चुचियों को मसलता तो दर्द होने लगा था.

शायद इसी लिए जब भी मैं माँ की चुचियो को मसलता तो वो मेरे हाथ को हटाने की कोशिश करती. पर मैं नहीं हटाता! आखिर कार माँ से रहा नहीं गया और बोली "
चूची पे ही लगा रहेगा क्या? निचे नहीं जाएगा?" बस मैं तो यही चाहता था की माँ खुद बोले. तब मैंने २-४ बार जोर से चूची मसल दिया! माँ दर्द से छटपटाते हूवे बोली "आह्ह्ह्हह्ह......!!! मर्रर्रर्र गयीईईईई.....!!!"

फिर मैंने उनके चूची को छोड़ कर अब उनके पेटीकोट खोलने लगा! पेटीकोट का नाडा खोला और पेटीकोट को निचे की ओर ले गया मैंने देखा माँ निचे पिंक कलर का चड्डी पहन रखी थी जो पूरी तरह से भींग चूका था! जब मैंने माँ की चड्डी को निकला तो मेरे मूंह से बरबस निकल गया "वाहह..! क्या बूर है! बूर पूरी तरह से बाल से भरा हुवा था और पानी निकल रहा था! मैं अपना समय ख़राब ना करते हूवे एक तकिया लिया और माँ की कमर के निचे रख दिया! जिससे माँ की बूर और ऊपर उठ गया. फिर क्या था मैंने अपना मूंह उस बूर पर रख दिया! और कुत्ते कीतरह चाटने गला! मेरा मूंह अपने बूर पर पाते ही माँ के मूह से
आह्ह्ह..!! निकल गयी.



मैं उनके उस चूत के रस के को पि रहा था पहले तो कुछ अजीब सा लगा. थोडा सा नमकीन, पर थोड़ी देर बाद अच्छा लगने लगा! मैं खूब मस्ती में चाट रहा था. माँ को भी मज़ा आ रहा था उनके मूंह से लगातार सीईईईईई....!!! सीईईईईइ............!!!! का आवाज़ आ रहा था. और अपने जांघों के बिच मेरे सर को दबा रही थी. मैं कुत्ते की तरह माँ के चूत को चाटे जा रहा था. अब सब रस मैं चाट चूका था. फिर मैंने उनके छुट में अपना जीभ डाल दिया. माँ तरप उठी "आह्ह्ह..!! क्या पेल दिया बेटा." मैं कुछ नहीं बोला और अपनी जीभ को अन्दर-बहार करने लगा. क्या मज़ा आ रहा था. जब भी जीभ अंडर जाता माँ आह्ह्ह्ह!!! कर बैठती. मस्ती से माँ की बूर को अपने जीभ से चोदे जा रहा था. माँ भी मस्ती में थी उसे भी मज़ा आ रहा था. करीब १० मिनट के बाद माँ बोली "बेटा अब मैं नहीं रोक सकती मेरा आ रहा है" माँ के इतना कहते ही मुझे महसूस हुवा की माँ के चूत से कुछ गरमा-गरम पानी जैसा लस्से दर द्रव निकल रहा था. माँ अपने शरीर को पूरी तरह टाईट का रखी थी! मैंने अपने दोनों होठ से माँ के चूत के छेद पर कब्ज़ा जमाया और सारा द्रव पिता चला गया. ये पीते ही जैसे मेरे लंड में और ताकत आ गया! लंड और मोटा और टाईट हो गया. मैं तब-तक माँ के चूत को चाटता रहा जब-तक एक-एक कतरा ना पि गया.

माँ अब बिलकुल ढीली पर चुकी थी. तब मैंने माँ से पूछा "
कैसा लगा माँ? मेरी मेहनत काम आया या नहीं. अब कैसा लग रहा है तुमको? मजा आया." तो माँ बोली "मैं तो जन्नत की सैर करके चली आई बेटा. ऐसा लग रहा था जैसे मैं जन्नत में हूँ. आज १ साल और ४ महीने बाद मैं झड़ी हूँ. दिल खुश कर दिया तुने मेरे लाल." अब मुझसे भी रहा नहीं जा रहा था. मेरा भी लंड माँ की बूर में हलचल मचने के लिए तैयार था. मैंने पलंग परसे सारे एक्स्ट्रा कपडे हटा दिए माँ की पेटीकोट और चड्डी भी निकाल कर एक तरफ फेक दिया जो अभी तक माँ की पैसे में था. रजाई तोशक भी हटा दिए. अब केवल मैं था मेरी पूरी तरह नंगी माँ थी. क्या लग रही थी गजब की फिगर गोरी-गोरी बदाग बदन मखमल से भी मुलायम स्किन, त्वचा. जूसी होठ.

मुझसे रहा नहीं गया मैं फिर से माँ को बांहों में लेकर चूमने लगा. माँ भी साथ देने लगी. करीब ५ मिनट तक एक-दुसरे को चूमने-चाटने के बाद मैं बोला "
माँ अब मुझसे नहीं रहा जायेगा बस अब पीठ के बल सो जावो." तो माँ बोली "सोती हूँ बेटा, पर तूं अपना चड्डी तो खोल जरा मैं भी तो देखू की मेरे बेटे ला लंड कितना बड़ा है..? जो आज अपनी माँ को ही छोड़ने जा रहा है. जरा खोल तो इसे." तो फिर मैं को कहा "माँ तुम खुद ही खोल कर देख लो ना. मैं तो रोज खोलता हूँ. आज तुम खोल दो." तो फिर माँ बोली "कोई बात नहीं लाओ मैं ही खोल दूँ." तो मैं पलंग पर खड़ा हो गया माँ बैठे हूवे ही मेरे चड्डी को निचे की ओर खिंच दी. ज्यूँ ही लंड चड्डी के कैद से आजाद हुवा नाग की भांति माँ को ललकारने लगा. माँ मेरा ९ इंच लम्बा और ४ इंच मोटा लंड देखते ही डर गयी. "ये तो तुम्हारे बाप के लंड से बहोत बड़ा है. मेरी बूर तो फट जाएगी इससे." माँ बोली! तो मैं उनको हौसला देते हूवे कहा "अरे माँ! ऐसा कुछ नहीं होता. बूर बने हैं लंड के लिए, और लंड बने हैं बूर के लिए! तो फिर बूर कैसे फट जायेगा. तुम चिंता मत्त करो तुम्हे कुछ नहीं होगा." मैं ये कहते हूवे अपने लंड को माँ के मूंह पे सता दिया औ कहा "माँ जरा चुसो इसे." तो माँ बोली "छिं मैं लंड को अपने मूंह से कैसे चुसू. ये अछि बात नहीं है. मुझे घृणा होती है." तो मैं बोला "माँ मैं जैसा कहता हूँ वैसा करो बहोत मज़ा आएगा. बस जैसा-जैसा कहती हूँ वैसा-वैसा करती जाओ." पहले तो नहीं मान रही थी पर कितना कहने के बाद चूसने के लिए राजी हो गयी.

माँ का कोमल हाथ जैसे ही मेरे लंड पर पड़ा लंड और फूल गया. माँ के कितनी दिक्कत से मान की मूंह में गया. माँ का मूंह मेरे लंड से पूरी तरह भर चूका था. वो चूसने लगी हाय! क्या मजा आने लगा. मुझे ऐसी ख़ुशी कभी नहीं मिली थी. और उसमे माँ से चुस्बाने की तो मजा ही कुछ और था. मैं आनंदित हो रहा था. मैंने कई किताबो में सुना था. जब मर्द पहली बार सेक्स करता है तो वो जल्दी झड जाता है. माँ पिछले ५-७ मिनट से चूस रही थी. तो मैं माँ को बोला "
माँ झड जाऊं तो मेरा लंड फिर से चाटना. चाट-चाट कर इसे फिर से खड़ा करना." माँ ने ओके! के इशारे में सर हिलाया. तभी मुझे एक इडिया आया क्यूँ ना अभी माँ की मूंह को छोड़ा जाए. फिर मैं माँ को दीवार की ओर ले गया और उनके सर के पीछे तकिया रखा और उनको दीवार में सटाते हूवे कहा "माँ अब तुम चुसना मत्त मैं तुम्हे एक दूसरा मजा देता हूँ. बस मूंह खोले रखना. और ढीला रखना."

वैसे लंड तो उनके मूंह में भरा हुवा पहले से ही था. फिर मैंने लंड को थोडा बाहर निकला. सुपाडा मूंह में ही था. फिर धीरे से लंड को अंडर की ओर धक्का दिया! अभी ३-४ इंच लंड से माँ के मूंह को छोड़ रहा था. धीरे-धीरे अन्दर-बाहर करने लगा! करते-करते धीरे-धीरे रफ़्तार बढ़ता गया. जब रफ़्तार तेज पकड़ लिया तो मैंने अचानक एक बहोत ही जोरदार धक्का माँ के मूंह में मार दिया. लगभग ७ इंच लंड माँ के मूंह में घुस गया! वो तड़पने लगी. माँ सांस नहीं ले पा रही थी. मैंने ४०-४५ सेकेण्ड लंड को माँ की मूंह में रखा फिर बाहर निकल दिया. माँ जोरजोर से सांस लेने और छोड़ने लगी. जब नॉर्मल हुवा तो बोली "
ये क्या किया था तुमने मेरी सासे रुक गयी थी."
फिर मैंने अपना लंड उनके मूंह में डालते हूवे कहा "अब ऐसा नहीं करूंगा." और फिर मैं माँ के मूंह को छोड़ने लगा इस बार ५-६ इंच लंड से! करीब ८-१० मिनट तक की मूंह चुदाई के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे लंड से अब वीर्य निकलने वाला है तो मैं माँ को बोला "माँ मैं अब झाड़ने वाला हूँ अब तुम चूसो. और फिर खड़ा करो मेरे लंड को." इतना कहते ही मैंने अपने लंड से माँ के मूंह में एक पिचकारी छोड़ दी. माँ का मूंह वीर्य से लबा-लब भर गया. पर मैं लंड को माँ के मूंह से नहीं निकाल रहा था क्यूंकि मैं चाहता था माँ मेरा वीर्य पि जाए! आखिर कार उसे पीना पड़ा. मैं क्या बताऊँ की कितना मजा आया. मजे की कोई सीमा नहीं थी. कुछ देर बाद मैंने अपना लंड को माँ के मूंह से बाहर निकला. अभी भी कुछ कम नहीं लग रहा था मेरा लंड. माँ मेरे लंड की तरफ देख कर बोली "ये तुम्हारा लंड है या किसी घोड़े का..?" तो मैं बोला "तुमने अगर घोड़े को जनम दिया है तो घोड़े का ही है" माँ हस्ते हूवे फिर से मेरा लंड चाटने लगी.
 












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