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Saturday, December 13, 2014

हिंदी सेक्सी कहानिया अधूरा प्यार--1 एक होरर लव स्टोरी

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अधूरा प्यार--1 एक होरर लव स्टोरी


दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ दोस्तो इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....
कुच्छ ऐसा ही रोहन के साथ कहानी में हुआ.. हमेशा अपनी मस्ती में ही मस्त रहने वाला एक करोड़पति बाप का बेटा अचानक अपने आपको गहरी आसमनझास में घिरा महसूस करता है जब कोई अंजान सुंदरी उसके सपनों में आकर उसको प्यार की दुहाई देकर अपने पास बुलाती है.. और जब ये सिलसिला हर रोज़ का बन जाता है तो अपनी बिगड़ती मनोदशा की वजह से मजबूर होकर निकलना ही पड़ता है.. उसकी तलाश में.. उसके बताए आधे अधूरे रास्ते पर.. लड़की उसको आख़िरकार मिलती भी है, पर तब तक उसको अहसास हो चुका होता है कि 'वो' लड़की कोई और है.. और फिर से मजबूरन उसकी तलाश शुरू होती है, एक अनदेखी अंजानी लड़की के लिए.. जो ना जाने कैसी है...
इस अंजानी डगर पर चला रोहन जाने कितनी ही बार हताश होकर उसके सपने में आने वाली लड़की से सवाल करता है," मैं विस्वाश क्यूँ करूँ?" .. तो उसकी चाहत में तड़प रही लड़की का हमेशा एक ही जवाब होता है:

"मरने के बाद भी जीवन है "


नीचे महफ़िल जम चुकी थी.. कुच्छ देर रवि का इंतजार करने के बाद अमन ने वहीं प्रोग्राम जमा लिया.. गिलासों को खड़खड़ाते अब करीब आधा घंटा हो चुका था.. शराब के नशे में रोहन वो सब कुच्छ बोलने लगा था जिसको बताने में अब तक वो हिचक रहा था...

"ओह तेरी.. फिर क्या हुआ?" अमन जिगयासू होकर आगे झुक गया...
"छ्चोड़ो यार.. क्यूँ टाइम खोटा कर रहे हो.. आइ डॉन'ट बिलीव इन ऑल दीज़ फूलिश थिंग्स.. एक सपने को लेकर इतना सीरीयस और एमोशनल होने की ज़रूरत नही है.. " शेखर सूपरस्टिशस किस्म की बातों में विस्वाश नही कर पा रहा था...

"पूरी बात तो सुन ले डमरू... रोहन ने शेखर को डांटा और कहानी सुनाने लगा....

"कौन डमरू.. मैं.. हा हा हा...!" शेखर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा...," डमरू.. हा हा हा!"

"तुझे नही सुन'नि ना.. चल.. जाकर सामने बैठ.. और अपना मुँह बंद रख.. मैं मानता हूँ.. और मुझे सुन'नि हैं..." अमन आकर सामने वाले सोफे पर शेखर और रोहन के बीच में फँस गया.. शेखर उठा और बड़बड़ाता हुआ सामने चला गया," डमरू.. हा हा हा!"

बातें अभी चल ही रही थी की मुस्कुराते हुए रवि ने कमरे में प्रवेश किया..," अच्च्छा.. अकेले अकेले..!"

शेखर उसके आते ही खड़ा हो गया," साले डमरू! अकेले अकेले तू फोड़ के आया है या हम.. ? बात करता है...

"भाई तू मेरे को डमरू कैसे बोल रहा है.. वो तो रोहन बोलता है..." रवि ने उसके पास बैठते हुए कहा...

"क्यूंकी मेरे अंदर रोहन का भूत घुस आया है.. हे हे हा हा हो हो!" शेखर ने भूतों वाली बात का मज़ाक बना लिया....

"चुप कर ओये जॅलील इंसान.. ऐसी बातों को मज़ाक में नही लेते.. किसी के साथ भी कुच्छ भी हो सकता है..." अमन ने प्यार से उसको दुतकारा...

"किस के साथ क्या हो गया भाई? मुझे भी तो बता दो.." रवि ने अपना गिलास उठाया और सबके साथ चियर्स किया...

"वो बात बाद में शुरू से शुरू करेंगे.. अब सबको सीरीयस होकर सुन'नि हैं.. पहले तू बता.. दी भी या नही.. मुझे तो उसकी चीख सुनकर ऐसा लगा जैसे तू अपना हाथ में पकड़े उसके पिछे दौड़ रहा है.. और वो बचने के लिए चिल्लाती हुई कमरे में इधर उधर भाग रही है...हा हा हा.. साली ने नखरे बहुत किए थे पहले दिन... मैं ऐसी नही हूँ.. मैं वैसी नही हूँ.. पर डालने के बाद पता लगा वो तो पकई पकाई है..." अमन ने अपना अनुभव सुनाया....

रवि ने छाती चौड़ी करके अपने कॉलर उपर कर लिए," देती कैसे नही... !"

"अरे... सच में.. चल आ गले लग जा.. बधाई हो बधाई.." अमन आकर उसके गले लग गया..," हां.. यार.. बात तो तू सही कह रहा है.. सलमा की खुश्बू आ रही है तेरे में से.... पर वो चिल्लाई क्यूँ यार.. साली एक नंबर. की नौटंकी है.. तुझे भी यही कह रही थी क्या कि पहली बार मरवा रही हूँ.." अमन ने वापस रोहन के पास बैठते हुए कहा...

" नही यार.. वो तो साना की चीख थी... उसकी पहली बार फटी है ना आज!" रवि ने अपनी बात भी पूरी नही की थी कि अमन ने गिलास रखा और उच्छल कर खड़ा हो गया..," तूने साना की मार ली????"

"हां.. कुच्छ ग़लत हो गया क्या?" रवि ने मरा सा मुँह बनाकर कहा...

"ग़लत क्या यार..? ये तो कमाल हो गया.. साली को तीन बार बुला चुका हूँ.. सलमा के हाथों.. पर वो तो हाथ ही नही लगाने देती थी यार.. तूने किया कैसे.. अब तो ज़ोर की पार्टी होनी चाहिए यार.. ज़ोर की.. तूने मेरा काम आसान कर दिया...!" अमन जोश में पूरा पैग एक साथ पी गया...

"वो कैसे? " रवि की समझ में नही आई बात....

"क्या बताउ यार.. तुझे तो पता होगा.. वो और सलमा दोनो सग़ी बेहन हैं..!"

अमन को रवि ने बीच में ही टोक दिया," क्या? सग़ी बेहन हैं.. ?"

"हां.. चल छ्चोड़ यार.. लंबी कहानी है.. उसके बारे में बाद में बात करेंगे... पहले रोहन भाई की सुनते हैं.. चल भाई रोहन.. अब सब इकट्ठे हो गये हैं.. शुरू से शुरू करके आख़िर तक सुना दे.. पहले बोल रहा हूँ शेखर.. बीच में नही बोलेगा.. देख ले नही तो...!" अमन शेखर को चेतावनी सी देते हुए बोला..

"नही बोलूँगा यार... चलो सूनाओ!" कहकर शेखर भी रोहन की और देखने लगा....

रोहन ने कहानी सुननी शुरू कर दी.....



"आबे, ये क्या था?" रोहन अचानक ही आसपास की घनी झाड़ियों से अपनी और उच्छल कर आए गिलहरी नुमा जानवर को देखकर उच्छल कर तीव्रता से एक और हट गया.. जानवर की उछाल में जिस प्रकार की तीव्रता थी, उस'से यही प्रतीत हुआ की उसने उन्न पर हमला करने का प्रयास किया था...," तूने इसके दाँत देखे?"

करीब 10 - 10 फीट की लंबी छलान्ग लगाता हुआ वो उस उबड़ खाबड़ रास्ते के दूसरी तरफ की झाड़ियों में खो गया..
दोनो 2 पल वहीं खड़े होकर उस अजीबोगरीब गिलहरी को आँखों से औझल होते देखते रहे.. और फिर से अपनी अंजान मंज़िल की और बढ़ चले..

"अफ.. कहाँ ले आया यार...? कितना सन्नाटा है यहाँ? यहाँ पर तो आदमी की जात भी नज़र नही आती... कितना अजीब सा लग रहा है यहाँ सब कुच्छ... तुझे लगता है यहाँ तुझे तेरी नीरू मिल जाएगी..? ... देख मुझे तो लगता है किसी ने तेरा उल्लू बनाया है.. क्यूँ बेवजह अपनी रात बर्बाद कर रहा है... और मेरी भी.. चल वापस चल!" नितिन ने बोलते हुए सावधानी बरत'ने के इरादे से रिवॉल्वेर निकाल कर अपने हाथ में ले ली..

"ऐसी बात नही है यार.. वो यहीं रहती है.. आसपास, देखना! कोशिश करेंगे तो वो हमें ज़रूर मिलेगी.. वो अगर नही मिली तो मैं पागल हो जाउन्गा यार!" रोहन ने आगे चलते चलते ही बात कही...

नितिन आगे आगे बहुत चौकन्ना होकर चल रहा था.. चौकन्ना होना लाजिमी भी था.. जहाँ इस समय वो थे, उस जगह के आसपास कोई शहर या गाँव नही था.. हर तरफ सन्नाटे की भयावह सी चादर पसरी हुई थी... आवाज़ें अगर आ रही थी तो मैंधको के टर्रने की, और रह रह कर झाड़ियों के झुरपुट में कुच्छ रेंगते होने की...दूर दूर तक कृत्रिम रोशनी का नामोनिशान तक नही था.. बस आधे चाँद और टिमटिमाते हुए तारों की हुल्की फुल्की रोशनी ही थी जो उनको रास्ता दिखा रही थी.. रास्ता भी ऐसा जो ना होने के ही बराबर था.. कहीं उँचा, कहीं नीचा.. बीच बीच में गहरे गहरे गड्ढे.. इतने गहरे की ध्यान से ना चला जाए तो अचानक पूरा आदमी ही उनमें गायब हो जाए.. दोनो और करीब 4 - 4 फीट ऊँची झाड़ियाँ थी...

"अब रास्ता सॉफ होता तो गाड़ी ही ले आते.. तुझे क्या लगता है..? यहाँ पर कोई इंसान रहता होगा.. और वो भी लड़की.. सच बताना, खुद तुझे डर नही लग रहा, यहाँ का माहौल देख कर..." नितिन ने चलते चलते रोहन से सवाल किया...

"डर लग रहा है तभी तो तुम्हे लेकर आया हूँ भाई.. नही तो मैं अकेले ही ना चला आता.." रोहन ने जवाब दिया..और अचानक ही उच्छल पड़ा," नितिन देख.. आगे पक्की सड़क दिखाई दे रही है.. मैं ना कहता था.. हम ज़रूर कामयाब होंगे... आगे ज़रूर कोई बस्ती मिलेगी... देख लेना!"

"आबे बस्ती के बच्चे.. उस'से कोई ढंग का रास्ता भी तो पूच्छ सकता था तू.. आख़िर वो लोग भी तो शहर जाते होंगे..?" नितिन को भी आगे का रास्ता पिच्छले रास्ते के मुक़ाबले बेहतर देख कर कुच्छ उम्मीद बँधी....
"यार, क्या करूँ, जब यही एक रास्ता बताया उसने...!" रोहन ने तेज़ी से चलना शुरू कर चुके नितिन के कदमों से कदम मिलाते हुए कहा....

"अजीब प्रेमिका है तेरी.. एक तो रात में मिलने की ज़िद करी और उपर से रास्ता ऐसा बताया.. चल देख.. लगता है हम पहुँचने ही वाले हैं.. उधर लाइट दिखाई दे रही है.." नितिन ने अपनी बाई तरफ हाथ उठा कर इशारा करते हुए कहा...

दोनो बाई तरफ मुड़े ही थे की अचानक ठिठक गये..," यहाँ तो पानी है..यार!" रोहन ने अपने कदम वापस खींचते हुए कहा..
"हुम्म.. कोई तालाब लगता है..चल.. आगे से रास्ता होगा... !" नितिन ने रोहन से कहा और दोनो फिर से सीधे रास्ते पर चल पड़े..

कुच्छ आगे जाकर उनको एक पगडंडी सी बाई और जाती दिखाई दी.. दोनो ने आँखों ही आँखों में उस रास्ते पर सहमति जताई और उस और बढ़ चले...

"ओह तेरी मा की आँख.. यहाँ तो कीचड़ है..! चल वापस चल.. ये रास्ता नही है.." मन ही मन नितिन उस लड़की को कोस रहा था जिसके प्यार में पागल रोहन अपने साथ साथ उसकी भी दुर्गति कर रहा था...

"यार, आधे रास्ते तो आ ही चुके हैं... आगे चलकर तलब में धो लेंगे पैर.. अब वो लाइट भी नज़दीक ही दिखाई दे रही है..." रोहन ने मायूसी से नितिन को देखते हुए कहा..

"चल साले.. अगर फिर भी लड़की नही मिली तो देख लेना... ऐसी बकवास जगह मैने आज तक नही देखी" बड़बड़ाता हुआ नितिन फिर से रोहन के आगे आगे चलने लगा...
"देखी क्यूँ नही है? तू तो मास्टर है ऐसे ठिकानो का... आधी जिंदगी तो तूने जंगलों में गुज़ार दी.. मुझ पर अहसान करने के लिए बोल रहा है क्या?" रोहन ने उस पर मजाकिया व्यंग्य किया...

"हां.. गुज़ारी है.. मगर ऐसे थोड़े ही.. पूरे बंदोबस्त के साथ चलना पड़ता है.. तू तो मुझे ऐसे ले आया जैसे हम उनके जन्वाइ हैं और हमारे इंतज़ार में वो किसी एरपोर्ट पर पलकें बिच्छाए बैठे होंगे.. राम जाने किस घड़ी कौन जानवर बाहर निकल आए? वो तो अच्च्छा हुआ में कम से कम अपनी रिवॉल्वेर साथ रखता हूँ.. कोई भरोसा है ऐसी बीहड़ सुनसान जगह का.." नितिन ने संभाल संभाल कर पैर रखते हुए बोला... दोनो की पेंट कीचड़ के छ्चींटों से घुटनो तक सन गयी थी..

उसके बाद ज़्यादा देर उनको चलना नही पड़ा.. कुच्छ दूर और चलने पर वो एक सॉफ सुथरे रास्ते पर पहुँच गये.. रास्ता पुराने जमाने की छ्होटी छ्होटी ईंटों से बना हुआ था.. वो जगह कोई चौराहा लग रही थी.... पानी का 'वो' तालाब यहाँ तक भी फैला हुआ था.. " चल, अपने पैर सॉफ करके आगे चलते हैं.. अब वो घर भी ज़्यादा दूर नही लगता..." रोहन ने गहरी साँस लेते हुए कहा..

दोनो ने वहाँ पानी में अपने पैर धोए और फिर से आगे बढ़ गये...

"यार, यहाँ गलियाँ और दीवारें तो इतनी दिखाई दे रही हैं.. पर घर कहाँ हैं.. ? क्या इस गाँव में वो एक ही घर है जहाँ लाइट जल रही है...?" नितिन ने हैरानी से रोहन की और देखा...

"मैने पूचछा नही यार.. क्या पता एक ही हो.. चल.. तू चलता रह!" रोहन ने खिसियाई हुई बिल्ली की तरह से बेतुका सा तर्क दिया और अपने प्यार को पाने की उम्मीद में आगे बढ़ता रहा.. नितिन के साथ साथ..

बड़े ही विस्मयकारी अनुभव का सामना दोनो को करना पड़ रहा था.. काफ़ी देर तक चलने के बाद भी वो 'रोशनी' उनसे अभी भी उतना ही दूर लग रही थी.. उन्होने गलियाँ भी बदली, पर हर बार कुच्छ दूर चलते ही फिर से वो रोशनी ठीक उनके सामने आ जाती.. और फिर से उनको उसी रास्ते पर चलते रहने का अहसास होता...

"धात तेरे की... देख.. रोहन.. मुझे तो सब कुच्छ गड़बड़ लग रहा है.. भला ऐसी जगह पर भी आजकल कोई घर बनाता है.. 'वो' लड़की सच में यहाँ होगी ना...?" नितिन थक हार कर खड़ा हो गया...

"है ना भाई.. तू मेरा.. अरे.. देख बच्चा!" रोहन एक दम उच्छल पड़ा..

रोहन की बात सुनते ही नितिन का दिल उसकी बल्लियों पर आ गया..," बच्चा.. रात के 11 बजे.. घर से बाहर, वो भी ऐसी सुनसान जगह पर? आख़िर तू मुझे बात क्लियर क्यूँ नही कर रहा.. कौन है वो लड़की.. यहाँ आख़िर करते क्या होंगे उसके घर वाले..!" नितिन का दिमाग़ चकराने लगा था.. जिस तरह सी परिस्थितियाँ वहाँ उत्पन्न हो रही थी.. ऐसा होना लाजिमी ही था...

रोहन ने बिना कुच्छ बोले नितिन का हाथ पकड़ा और उस 'बच्चे' की और लपका..

दीवार के साथ खड़ा वो बच्चा झुक कर कुच्छ कर रहा था.. जैसे ही वो दोनो उसके करीब पहुँचे.. वो पलट कर मुस्कुराया...
बड़ा ही मासूम सा बच्चा था.. करीब 8 साल की ही उमर होगी.. दोनो उसकी शकल देखते ही हैरान रह गये.. उसके मुँह पर ऐसा लगता था जैसे किसी चोट का घाव बना हुआ हो.. ताज़ा घाव.. उसके होंटो के पास से खून रिस रहा था.. उसकी आँखों में गहरी चमक थी.. और चेहरे पर अजीब सा मैलापन...

दोनो उस'से कुच्छ दूरी पर ठिठक गये.. बच्चा उनकी और लगातार, बिना पलकें झपकाए देख रहा था.. उसकी आँखों में ना तो आसचार्य का भाव था.. ना ही किसी तरह के भय का.. पर आँखों की तेज चमक में भी अजीब से सूनेपन ने उनको चौंका दिया...
नितिन ने उस'से फासला बनाए हुए ही सवाल किया," यहाँ क्या कर रहे हो, बेटा.. इतनी रात को...?"

"अपने पैरों का कीचड़ सॉफ कर रहा हूँ अंकल.." बड़ी ही मासूमियत से बच्चे ने जवाब दिया.. उसकी आवाज़ और बात करने के ढंग से उनको कहीं से भी ये अहसास नही हुआ की उसकी उमर 4 साल से उपर होगी.. हालाँकि कद काठी से पहले उन्होने उसके 7-8 साल का होने का अनुमान लगाया था...

"यहाँ कोई नीरू रहती है.. ? बता सकते हो उसका घर कौनसा है?" रोहन का दिल बैठने लगा था.. यहाँ तो सब कुच्छ अजीब ही हो रहा था.. उसने जल्दी से वहाँ से टलने में ही भलाई समझी...

लड़के ने उंगली उठा कर रोशनी की और इशारा कर दिया..," वहाँ! हम सब वहीं रहते हैं.. उस हवेली में!"

"मतलब... मतलब तुम.. तुम्हारी कुच्छ लगती है क्या वो?" रोहन को रह रह कर झटके से लग रहे थे....

"पर उस 'हवेली' का रास्ता किधर से है.. हम तो ढूँढते ढूँढते थक गये.. और तुम घर क्यूँ नही गये अभी तक.. यहाँ क्या कर रहे हो..?" नितिन ने बच्चे से सवाल किया..

"मैं खो गया हूँ अंकल.. मुझे भी रास्ता नही मिल रहा.. इतने दीनो से ढूँढ रहा हूँ.." लड़के ने उतनी ही मासूमियत से जवाब दिया..

"क्क्कितने दीनो से..?" लड़के के हर जवाब के साथ दोनो के दिल की गति बढ़ती जा रही थी..

" 74 साल से....?"

"भाग नितिन.. भाग.. हम फँस गये नही तो.. समझ ले मारे गये.." रोहन ने नितिन का हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा.. भागने के लिए.. पर जाने क्यूँ नितिन वहाँ से हिल नही पाया...शायद उत्सुकतावश," क्यूँ मज़ाक कर रहे हो यार? क्यूँ झूठ बोल रहे हो..?"
इस बार लड़के के चेहरे पर शिकन और शदियो पुरानी तड़प उभर आई," मैं मज़ाक क्यूँ करूँगा अंकल? मरे हुए लोग झूठ नही बोलते!"



रोहन की वहीं खड़े खड़े घिघी बाँध गयी.. जिस तरह की अजीबोगरीब परिस्थितियाँ वहाँ उत्पन्न हो रही थी, जिस तरह से वो बच्चा उन्हे मिला और जो कुच्छ उसने बोला.. दोनो के कलेजे बाहर निकल आने पर उतारू हो गये.. रोहन को अहसास हो रहा था की उसने यूँ पागलपन में यहाँ आकर कितनी बड़ी भूल की है.. वो खड़े पैर वहाँ से भागना चाहता था, पर नितिन को वहाँ छ्चोड़कर कैसे भागे.. वो बस नितिन के इशारा करने का इंतज़ार कर रहा था, जिसने घबराहट में अपनी रिवॉल्वेर उस बच्चे पर तान दी," गेट आउट फ्रॉम हियर?"

"क्या अंकल?" नन्हे से बच्चे के चेहरे से नादानी और मासूमियत छू छू कर टपक रही थी..

"दफ़ा हो जाओ यहाँ से! भाग जाओ..."

" पर मुझे एक बार घर छ्चोड़ आओ ना.. मुझे घर नही मिल रहा है..!" बच्चे ने विनम्रता से प्रार्थना की...

सिर्फ़ उस लड़के की वो प्यारी सी आवाज़ ही थी जो अब तक उन्हे पैरों पर खड़े रहने लायक साहस दे रही थी.. पर आगे बढ़ने की तो बात सोचना भी अब दुश्वार था.. नितिन ने रोहन की आँखों में देखा और वो उल्टे पाँव हो लिए.. कुच्छ दूर तक यूँही सावधानी पूर्वक पिछे देखते देखते जब वो उस बच्चे की आँखों से औझल हो गये तब जाकर रोहन की आवाज़ निकली," रास्ता याद है ना भाई...?"

"सीधा चलता रह.. अब अपनी बकबक बंद रख थोड़ी देर" नितिन ने गुस्से से उसको झिड़क दिया..

उसके बाद तो उन्होने कीचड़ वाले रास्ते से होते हुए सड़क पर जाकर ही दम लिया.. तब तक तो शायद साँस भी गिन गिन कर ले रहे थे... दोनो तेज़ी से एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए आगे बढ़ने लगे.. अब मेंधकों का टर्राना उनको किसी भूत नगरी में चल रहे रहस्यमयी संगीत से कम नही लग रहा था.. झाड़ियों में ज़रा सी भी सरसराहट होते ही दोनो की साँसे जम जाती थी.. राम का नाम जप्ते जप्ते आख़िरकार वो अपनी गाड़ी तक पहुँच ही गये... पर जहाँ पैदल जाने में उनको एक घंटे से भी ज़्यादा का समय लगा था.. वापस आने में आधा घंटा भी नही लगा...

"साले, कहाँ मौत के मुँह में ले गया था तू मुझे..?" नितिन ने गाड़ी स्टार्ट करके बे-इंतहा पसीने से सना अपना चेहरा पौच्छा..

"सॉरी भाई.. मुझे नही पता था कि...." रोहन भी अब ढंग से साँसे ले पा रहा था..

"आबे सॉरी के बच्चे.. ये बता आख़िर नीरू है कौन? क्या लॅफाडा है तेरा उस'से.. और उसने तुझे यहाँ क्यूँ बुलाया था..." नितिन ने बनावटी गुस्से से कहा.. उसको इस बात का सुखद अहसास था कि वो सकुशल वापस लौट आए.. 'वहाँ से'
गाड़ी ने जैसे ही रफ़्तार पकड़ी.. उसको अहसास हो गया की कुच्छ ना कुच्छ गड़बड़ ज़रूर है," गाड़ी पंक्चर हो गयी है.. शायद.. अब क्या करें?" कहकर नितिन ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी करते हुए उसको साइड में रोक दिया...

रोहन सहमी हुई नज़रों से नितिन को देखने लगा," सॉरी यार.. मेरी वजह से..."
नितिन उसकी बात पर ध्यान दिए बिना गाड़ी से उतरा और टाइयर चेक किए.. चारों टाइयर ज़मीन में धाँसे हुए से थे.. सबकी हवा गायब थी.. नितिन वापस गाड़ी में आया और अपना सिर पकड़ कर बैठ गया...," अब क्या करें.. एक में पंक्चर होता तो.."

"अगला गाँव कितनी दूर है भाई.." रोहन खुद की नासमझी से नितिन को भी परेशानी में डाल देने के कारण शर्मिंदा था..

"होगा कोई 5-7 काइलामीटर और.. क्यूँ?" नितिन अब सामान्य हो चुका था.. जो होना था वह तो हो ही चुका था.. गनीमत थी जो हो सकता था, वह नही हुआ..

"वहाँ तक ले चलो किसी तरह.. शायद वहाँ कोई पंक्चर लगाने वाला मिल जाए.."
और कोई चारा भी नही था.. नितिन ने गाड़ी धीरे धीरे लुढ़कानी शुरू की...

गाँव आते ही उन्होने पहले ही घर के सामने गाड़ी रोक दी.. ये घर गाँव से बाहर था.. कुच्छ अलग हटकर," यहाँ पूछ्ते हैं.. गाँव में कोई पंक्चर लगाने वाला हो तो..."

दोनो गाड़ी से उतरे और दरवाजे के सामने जाकर उस पर थपकी लगाई..

"कौन?" घर के अंदर से आई निहायत ही मीठी आवाज़ ने उनके कानो में मिशरी सी घोल दी... आवाज़ किसी नवयौवना की लगती थी..

"जी.. हम बाहर से आए हैं.. थोड़ी मदद चाहिए..!" नितिन ने रोहन के बोलने से पहले ही जवाब दे दिया...

"बापू! वो आ गये.." अंदर से लड़की की वही सुरीली आवाज़ बाहर तक आ रही थी..
यहाँ तो रह रह कर झटके लग रहे थे.. नितिन ने रोहन की और देखा और धीरे से बोला," ये तो इस तरह से कह रही है जैसे ये हमारा इंतजार ही कर रहे थे.." कहकर दोनो सावधान हो गये....

'छर्र्र्र्र्र्र्र्र्ररर..' दरवाजा पुराना था.. इसी आवाज़ के साथ खुला.. एक बार को तो इस आवाज़ ने भी उनको डरा दिया था.. कहते हैं ना 'दूध का जला छाछ को भी फूँक फूँक कर पीता है...

करीब 60 साल के अधेड़ आदमी ने दरवाजा खोला.. उसकी आवाज़ में भी उतनी ही मधुरता थी.. उपर से नीचे तक दोनो को देखा और बोला," पुराने टीले से आए हो ना...?"

"ज्जई.. क्या मतलब? पुराना टीला? हम कुच्छ समझे नही..." दोनो की हालत देखने लायक थी.. रोहन मन ही मन सोच रहा था.. ये रात किसी तरह से गुजर जाए..

"तुम्हारे पैरों में ये चिपचिपा सा कीचड़ लगा है ना.. इसीलिए पूचछा.. ये वहीं का कीचड़ है!" बुड्ढे ने बिना किसी शंका के उनसे कहा..

दोनो ने जैसे ही नीचे झुक कर देखा..," हां पर..?"

"तुमने खूनी तलब के पास से गुज़रे होगे बेटा... आ जाओ.. अंदर आ जाओ!" बुद्धा कहकर पिछे घूमने लगा...

"ज्जिई.. जी.. नही.. धन्यवाद.. वो.. हमें बस.. यही पूच्छना था कि.. यहाँ पंक्चर कोई लगाता हो तो.. हमारी गाड़ी.." रोहन के लिए पल पल काटना मुश्किल हो रहा था...

"हे हे हे हे.. आ जाओ.. अंदर आ जाओ..!" बुड्ढे ने बड़े प्यार से रोहन की बाँह पकड़ी और हौले से अंदर खींच लिया... रोहन में जैसे प्रतिरोध करने की ताक़त बची ही ना हो.. कठपुतली की तरह वो अंदर उसके साथ घुस गया...

अब नितिन के पास भी कोई चारा नही बचा.. रोहन को यूँ छ्चोड़कर भागता कैसे? नही तो हालत अब तक उसकी भी पतली हो चुकी थी.... वो भी पिछे पिछे हो लिया....
"आओ बैठो! यहाँ आ जाओ..अर्रे भाई शर्मा क्यूँ रहे हो? आओ बैठो ना!" बुड्ढे ने उनको कमरे में ले जाते हुए पूरी शराफ़त के साथ उन्न पर हक़ जताते हुए बात कही.. पर शराफ़त और मासूमियत के पिछे छिपि भयावहता को उन्होने घंटा भर पहले ही महसूस किया था.. इसीलिए दोनो के मन में उथलपुथल जारी थी.. दोनो ने एक दूसरे की आँखों में देखा और पूरी सतर्कता बरत'ते हुए दीवार के साथ बिछे पलंग पर जा बैठे.. उनकी कमर के पिछे सिर्फ़ एक सपाट दीवार थी.. वो वहाँ इसीलिए बैठे ताकि कमरे में होने वाली हर गतिविधि पर नज़र रख सकें...

" श्रुति बेटा.. ज़रा कुच्छ पानी वानी ले आओ.. इतनी देर क्यूँ लगा रही हो..?" बुड्ढे ने उन्न दोनो के सामने बैठते हुए बाहर मुँह करके आवाज़ लगाई...

"लाई बापू..!" बाहर से वही सुरीली आवाज़ दोनो के कानो में पड़ी...

"तो.. वहाँ क्या करने गये थे तुम लोग? शहरी मालूम होते हो..!" बुड्ढे ने बड़ी ही आत्मीयता से दोनो से पूचछा..

"ज्जई.. हम रास्ता भटक गये थे..!" नितिन ने बात को गोलमोल करते हुए जवाब दिया.. ये कहना उनको कतयि मुनासिब नही लगा की वो किसी लड़की की तलाश में वहाँ अपनी ऐसी तैसी करने गये थे...

"हुम्म.. तुम दो ही गये थे या कोई वहीं रह गया...?" बुड्ढे ने सहजता से बात कही...

"जी.. क्या मतलब?.. हम दो ही थे बस..!" इस बार भी नितिन ने ही जवाब दिया.. रोहन तो चुपचाप ही उनकी बातें सुन रहा था.. वो इसी उधेड़बुन में था की यहाँ से निकलेंगे कब...

"शुक्र है.. दोनो ठीक ताक वापस आ गये..!" बुड्ढे ने गहरी लंबी साँस लेते हुए बीड़ी सुलगा ली," पीते हो क्या?" कहकर बुड्ढे ने बीडीयों का बंड्ल उनकी और बढ़ाया..

"जी नही.. शुक्रिया...!" नितिन ने विनम्रता से मना कर दिया..

तभी रोहन पलंग से लगभग उच्छल कर खड़ा हो गया," नी...?"

नितिन ने चौंकते हुए पहले रोहन की और देखा और फिर उसकी नज़रों का अनुसरण करते हुए निगाहें दरवाजे पर जमा दी..
"क्या हुआ बेटा? तुम खड़े क्यूँ हो गये...?" बुड्ढे ने भी रोहन से बात कहकर दरवाजे की और देखा," ये मेरी बेटी है.. श्रुति.. आ जाओ बेटी.. "

रोहन की साँसें उसके हलक में ही अटकी हुई थी अभी तक.. दरवाजे से अंदर आने वाली लड़की नीरू ही तो थी.. वही नीरू जिसके लिए रोहन पागल हुआ जा रहा था.. सुंदरता की अद्भुत मिशाल थी वो.. सिर से लेकर पाँव तक.. छर्हरा लंबा बदन, हल्की सी लंबाई लिए हुए लगभग गोलाकार गोरे चेहरे पर अद्भुत कशिश लिए हुए लंबी कजरारी आँखें.. हल्का गुलबीपन लिए हुए रसीले होंठ, सुरहिदार लुंबी गर्दन.. और..

खैर यूँ कहें की सौंदर्या रस उसके बदन में सिर्फ़ दिख ही नही रहा था.. मानो टपक रहा हो.. उसकी मासूमियत से, उसके शर्मीले पन से, उसके यौवन से.. उसकी हर अदा से..

बिना एक बार भी पलकें उठाए उसने उनके सामने टेबल पर पानी रखा और वापस चलने लगी..

"बेटी.. खाना बना देना.. जाने कब से भूखे होंगे बेचारे..!"

"जी बापू.. मैने सब्जी रख दी है.." नज़रें झुकाए हुए ही उसने मुड़कर अपने लरजते होंटो से बात कही और बाहर निकल गयी..
"जी नही.. हमें भूख नही है.. हम अब बस निकलेंगे.. आप बस किसी टाइयर पंक्चर वाले का घर बता दें" नितिन ने खड़ा होते हुए कहा.. दरअसल रोहन को इस तरह चौंकते देख नितिन के मन में अनेक सवाल खड़े हो गये थे.. और वह जल्द से जल्द बाहर निकल कर सब क्लियर करना चाहता था...

"नही भाई.. ऐसे कैसे जाने दूँगा तुम्हे? ये भी कोई जाने का टाइम है.. और इस गाँव में कोई पंक्चर लगाने वाला भी नही है.. अभी आराम से खाना खाकर सो जाओ.. सुबह देख लेना.." बुड्ढे ने नितिन का हाथ पकड़ कर उसको वापस चारपाई पर बैठा दिया...

नितिन ने रोहन की और देखा.. उसकी आँखों की चमक बता रही थी की उसको अपनी मंज़िल मिल गयी है..

" ठीक है अंकल जी.. जब आप इतना दबाव डाल रहे हैं तो यही सही.. आपका बड़ा अहसान होगा.." रोहन को मानो मुँह माँगा मिल गया...

"इसमें अहसान की क्या बात है बेटा..! आदमी ही आदमी के काम आता है.. और फिर मेहमान तो भगवान होता है अपने देश में.. किसी बात की चिंता मत करो.. इसे अपना ही घर समझो!" बुड्ढे ने बड़ी आत्मीयता से मुस्कुराते हुए कहा...

बुड्ढे की बातों ने दोनो को तसल्ली सी दी.. कम से कम यहाँ अब तक कुच्छ वैसा नही हुआ था, जिसस'से उन्हे यहाँ भी कुच्छ अजीबोगरीब होने का डर रहे..

"अंकल जी.. ये खूनी तालाब का क्या चक्कर है?" नितिन ने हिचकिचाते हुए बात चला ही दी...

नितिन के ज़िक्र करते ही बुड्ढे की आँखें अतीत का कुच्छ याद सा करने के अंदाज में सिकुड सी गयी," उसके बारे में हम गाँव के लोग किसी को बताते नही बेटा.. बस इतना ख़याल रखना की दोबारा कभी उस तरफ भूल कर भी मत जाना.. और ना ही किसी से इसका जिकर करना.. तुम सही सलामत वापस आ गये, इसके लिए भगवान का धन्यवाद करो..!"

" हम किसी से नही कहेंगे.. पर बताने में हर्ज़ क्या है? कुच्छ तो बताइए..!" नितिन और रोहन दोनो उत्सुकता से कुच्छ बताने का मूड बना रहे बुड्ढे की और देख रहे थे...

"हूंम्म.. किसी से भूल कर भी जिकर मत करना.. हमारे बड़े कहते थे कि पुराने टीले की 'आत्मायें' बाहर के लोगों से नफ़रत करती हैं.. एक बार कोई अंग्रेज तुम्हारी ही तरह भटक कर वहाँ चला गया था.. सुबह उसकी लाश तालाब के किनारे पर मिली थी.. इतने बड़े बड़े कीड़े चल रहे थे उसकी आधी खाई हुई लाश में.." बुड्ढे ने कीड़ों का साइज़ बताने के लिए अपनी उंगली को लंबा कर दिया.. लाश का सिर तो बिल्कुल ही गायब था.. उसके पेट को चीर सा दिया गया था.. और दिल छाती से बाहर लटक रहा था.. बस फिर क्या था.. उसकी मौत का कारण जान'ने के लिए अँग्रेज़ों ने वहाँ डेरा डाल लिया... बहुत कोशिश की पर किसी को कुच्छ हासिल ना हुआ.. पर उसके बाद मौत बहुत हुई.. पर सारी बाहर के लोगों की.. इसीलिए अब हम किसी को कुच्छ नही बताते.. पढ़े लिखे लोग इन्न बातों में विस्वाश नही करते ना.. फिर कोई वहाँ का 'राज' जान'ने जाएगा और खम्खा मारा जाएगा.. क्या फायडा..?" कहकर बुद्धा अपने चेहरे पर पीड़ा के भाव लिए चुप हो गया..

"हम ऐसी ग़लती नही करेंगे अंकल जी.. किसी से कुच्छ कहेंगे भी नही.. बताइए ना.. और.. ऐसा क्या है वहाँ? और वो खूनी तालाब..?" नितिन की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी...

"तुम अब मानोगे नही पूच्छे बिना.. दरअसल वो तालाब बहुत पुराना है.. हज़ारों साल पुराना.. उसका पानी कभी नही सूखता.. पर जो वहाँ से तुम्हारी तरह बचकर वापस आ जाते हैं.. वो बताते हैं कि रात को तालाब का पानी लाल हो जाता है.. खून के जैसा.. इसीलिए हम उसको खूनी तालाब कहते हैं... 'आत्मा' के प्रकोप से बचने के लिए गाँव वाले वहाँ खड़े पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं.. देखने वाले बताते हैं की रात भर पेड़ पर रोशनी रहती है.. पर रात में आज तक कोई उसके पास पहुँच नही पाया.. या जो पहुँचा होगा.. मरा गया होगा.. सुना है वहाँ एक छ्होटे बच्चे की आत्मा भी भटकती रहती है.."

"हाँ.." रोहन बच्चे के बारे में बोलने ही वाला था की नितिन ने उसका हाथ दबा दिया और उसने अपनी बात पलट दी," हां.. आत्मा होती हैं.. मैने भी सुना है!"

"सुना क्या है बेटा.. गाँव वालों ने तो उस बच्चे को देखा भी है.. बताते हैं की 'वो' बच्चा वहाँ जाने वाले लोगों को उसके घर छ्चोड़ आने को कहता है.. पीपल के पेड़ पर....

" पर वो आत्मायें आख़िर हैं कौन? और बाहर वाले लोगों से ही नफ़रत क्यूँ करती हैं वो?" बुड्ढे के हर खुलासे के साथ नितिन की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.. सब कुच्छ जान लेने के लिए.. हालाँकि वो 'आत्मा' के चक्कर को नही मानता था.. पर आज रात का अनुभव उसको उनके बारे में और सुन'ने को विवश कर रहा था...

"अब सच्चाई तो भगवान ही जानता है बेटा.. हुमारे पास तो सुनी सुनाई बाते हैं.. कहते हैं कि उस पीपल के पेड़ की जगह पहले किसी राजा का महल हुआ करता था.. तीन रानियाँ थी उसकी.. तीनो एक से एक सुंदर.. फिर किसी मुघल स्म्रात ने उस राजा को हरा कर रानियों के सामने ही उस पर चकला (रोलर) चलवा कर मरवा दिया और उस महल को अपना 'हरम' बना लिया.. तीनो रानियों समेत महल की सभी औरतों को अपना बंदी बनाकर रखा... जो कुच्छ 'वो' उन्न रानियों और औरतों के साथ करता था वो बताने लायक है नही.. तुम मेरे बेटों के जैसे हो.. पर हां.. हर सुबह एक अर्थी उठती थी महल से.. ये सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक की महल में एक भी औरत बची... कहते हैं की ये 'आत्मायें' उसी राजा और उन्ही रानियों की हैं..."

"ऑश..!" नितिन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा...

तभी श्रुति खाना ले आई और उसको टेबल पर सजाने लगी.. रोहन लगातार उसकी आँखों की और देख रहा था.. इस ताक में की श्रुति उसकी और देखे और वो उसकी आँखों में अपने लिए 'अपनापन' ढूँढ सके.. पर बदक़िस्मती से ऐसा हुआ नही.. श्रुति ने नज़रें उपर ही नही उठाई और खाना लगाकर बोली," आपके लिए भी ले आउ बापू?" आवाज़ में इतनी मिठास थी की रोहन उसके मुँह से अपना नाम सुन'ने को तरस गया.. अगर बापू ना होता तो वो कब का उसको टोक चुका होता...

"नही बेटी.. थोड़ी देर पहले ही तो खाया था.. तुम जाओ.. जाकर सो जाओ.. मैं आता हूँ थोड़ी देर में..."

"अच्च्छा बापू.. मैं कुण्डी नही लगाउन्गी.. आप आकर बंद कर लेना.." श्रुति ने अपने पिता की और देखते हुए कहा और फिर वापस मूड गयी...

"आपके घर में और कौन कौन हैं अंकल जी?" रोहन का इंटेरेस्ट सिर्फ़ नीरू के बारे में जान'ने को ही था..

"बस हम दो जान ही हैं बेटा.. बीवी इसको जनम देते ही गुजर गयी थी.. सो और कोई औलाद नही है.. कुच्छ दिन बाद तो मैं अकेला ही रह जाउन्गा.." बुड्ढे ने जवाब दिया..

"वो क्यूँ?" खाना खाते हुए ही रोहन ने उसकी और देखा...

" शादी नही करूँगा क्या बेटा.. लड़की तो पराया धन होती है.."

रोटी का टुकड़ा रोहन के हलक में ही अटक गया," कब.. कब कर रहे हैं शादी..?"

"अभी तो ये मान ही नही रही.. कहती है पढ़ाई पूरी करने के बाद सोचूँगी... नादान और भोली है पर जिद्दी भी बहुत है.. जो सोच लिया वो सोच लिया.. फिर किसी की नही सुनती ये.."

"श.. " रोहन की जान में जान आई.. पहले उसको लगा था कि कहीं शादी पक्की ना हो गयी हो इसकी..

खाना खाने के बाद बुड्ढे ने बर्तन उठाए और उनको सुबह मिलने को कहकर चला गया..

उसके जाते ही रोहन ने आँखें मटकाते हुए नितिन की और देखा," क्यूँ..? कैसी लगी..?"

"यही है वो?" नितिन को शक तो था.. पर ताज्जुब उस'से कहीं ज़्यादा...

"हुम्म.." रोहन खुशी से फूला नही समा रहा था.. अजीब सी खुमारी में उसने तकिये को अपनी छाती के नीचे दबाया और पेट के बल लेट गया..

"पर इसका नाम तो श्रुति है.. तू तो नीरू कह रहा था..?" नितिन ने दूसरे पलंग पर लेट'ते हुए दूसरा सवाल किया...

"नाम में क्या रखा है यार.. बस.. इतना जान ले, जिसके लिए मैं आया था.. मुझे मिल गया है.. मैं तेरे इस अहसान का बदला कभी नही चुका पाउन्गा.. मैं ना कहता था.. मेरी नीरू मुझे ज़रूर मिलेगी.." रोहन पर प्यार का भूत सवार था..
"आबे साले.. इसने तेरे को देखा तक नही और तू ऐसे उच्छल रहा है.. कहीं तुझे भूल ना गयी हो... कितने टाइम पहले मिली थी..?" नितिन उठकर बैठ गया..

"वो सब मैं तेरे को बाद में बताउन्गा.. पर तू ये तो बता की लगी कैसी तुझे..?"

"बहुत प्यारी है.. सच बोलूं तो.. इसके जैसी कोई लड़की मैने आज तक नही देखी.. अगर ये नीरू ना होती तो मैं इसके बारे में अपने लिए सोच रहा था.. और अब भी क्या पता.. ये श्रुति ही हो.. तेरी नीरू की हमशकाल.. तेरी नीरू तो तुझे वहीं मिलेगी.. पुराने टीले पर... हे हे हे" नितिन ने शरारती मुस्कान अपने चेहरे पर लाते हुए कहा...

" ऐसी बात मत कर यार.. मुझे अच्च्छा नही लगता.." रोहन ने मुँह बनाकर कहा..

"मज़ाक कर रहा हूँ बे.. पर एक बात मेरी समझ में नही आई...!" नितिन ने को जैसे कुच्छ अचानक याद आ गया हो..

"वो क्या?" रोहन भी उठकर बैठ गया..

"इसने तेरे को वहाँ क्यूँ बुलाया..? और बुलाया भी तो वहाँ मिलना चाहिए था.. अब किसको पता था कि हुमारी गाड़ी में पंक्चर हो जाएगा और हम वापस आकर इसी घर का दरवाजा खटखटाएंगे.. अगर हम सीधे निकल जाते तो शायद ही कभी दोबारा आते.. यहाँ पर.." नितिन की बात में दम था...

"हां यार.. वो तो है.. जब बात करेगी तो ज़रूर पूछोन्गा ये बात..." रोहन ने जवाब दिया...

" पर अब तो बता दे ये तुझे कहाँ मिली? कैसे मिली.. और कैसे पाटी?" नितिन जान'ने के लिए उत्सुक था...

"एक बार बात हो जाने दे.. फिर सब कुच्छ बताउन्गा.. हमारा मिलना अंकल जी की भूतो वाली कहानी से कम दिलचस्प नही है.. मुझे खुद विस्वास नही था कि मैं इस'से मिल पाउन्गा..."

"अभी बता दे ना.. अभी क्या दिक्कत है..?" नितिन ने इस बार ज़ोर देकर कहा था..
"ना.. अभी नही.. बहुत दिलचस्प बात है.. पर अभी कुच्छ नही कह सकता.. पहले इस'से बात कर लूँ...!" रोहन ने कहा और वापस लेट गया," चल अब सो जाते हैं.. सुबह जल्दी उठना है.."

"ठीक है बेटा.. लोग मतलब निकल जाने के बाद किस कदर रंग बदलते हैं.. ये मैं देख रहा हूँ.. चल अच्च्छा है.. मैं इंतजार करूँगा, तेरी इस'से बात होने की.. गुड नाइट!"

"गुड नाइट भाई गुड नाइट!" रोहन ने कहा और सिर के नीचे से तकिया निकाल कर सीने पर रख लिया.. दोनो हाथों में दबोच कर.....
कहानी अभी बाकी है फिर मिलेंगे अगले पार्ट के साथ
दोस्तो ये कहानी आपको कैसी लगी बताना मत भूलना
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj
































































































































































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Monday, April 5, 2010

हिंदी सेक्सी कहानिया अधूरा प्यार--18 एक होरर लव स्टोरी

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गतांक से आगे ...............................

"आज तो बड़ी सी पार्टी होनी चाहिए... क्यूँ?" अमन रोहन और रवि के साथ आज सारा दिन घर पर ही रहा.. शेखर घंटा भर पहले ही यहाँ से निकल कर गया था...

रोहन को छ्चोड़ कर दोनो के चेहरे खिले हुए थे.. हालाँकि सबको विस्वास था कि रोहन बे-कसूर है और जल्द ही वापस आ जाएगा... पर सुबह उनके थाने में जाने से पहले ही रोहन को वापस आया देख तीनो की खुशी का ठिकाना ही नही रहा था... तभी सुबह से ही सभी के चेहरे पर उल्लास सॉफ नज़र आ रहा था....

"काहे की पार्टी यार... बेवजह नीरू के सामने ज़िल्लत का सामना करना पड़ा.. पता नही क्या समझ रही होगी वो? मैं तो श्रुति वाला हादसा उसको बताना ही नही चाह रहा था.. बिना बात किरकिरी हो गयी..." रोहन ने कहा....

"अरे, कुच्छ नही होता.. शेखर ने शिल्पा को फोन करके सब कुच्छ बता दिया था....अब तक तो नीरू को पता लग भी गया होगा की तू बेक़ुसूर है.. पर यार ये तो कमाल ही हो गया.. श्रुति की आत्मा खुद चल कर तुझे बचाने गयी.. इट'स अम्ज़िंग यार!" अमन ने रोहन को निसचिंत करने की कोशिश की...

"अरे बचाना ही नही.. वो तो रोहन और नीरू को मिलवाना भी चाहती है... उसके घर पर भी तो लेटर मिला है.. कमाल हो रहा है यार..." रवि ने उनको बीच में टोका....

"हूंम्म... मुझे तो शाहरुख की उस फिल्म का डाइलॉग याद आ रहा है.. वो क्या है.. ' इतनी शिद्दत से मैने तुम्हे पाने की कोशिश की है, कि जर्रे जर्रे ने हमें मिलाने की साज़िश की है!' सच में यार.. तुमको मिलने के लिए तो जैसे पूरी कयनात ने अपनी ताक़त झोंक दी है... तुम्हे मिलने से अब कोई नही रोक सकता.. बेफ़िकर रहो.." अमन गहरी साँस लेते हुए रोहन की और देख मुस्कुराने लगा...

बात सुनकर रोहन का दिल खुश हो गया और वो भी मुस्कुराने लगा....

"अबे तू क्यूँ इतना खुश हो रहा है... कोशिश तूने नही, टीले पर तुम्हारे इंतजार में तड़प रही भाभी जी के दिल ने की है.. हम'में से किसी ने थोड़ी बहुत की है तो मैने.. ये देखो मेरा सिर.. मुझे तो लगता है, भाभी जी ने पर्मनेंट निशानी दे दी मुझे.. कम ही नही होता.." रवि ने कहा और तीनो हँसने लगे....

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" ऋतु!" शाम को नीरू ने सीरीयस होकर ऋतु से बात करनी शुरू की.. अगले दिन शाम को दोनो नीरू के घर पर ही थी....

"हुम्म.. बोल!" ऋतु ने कहा...

"अब क्या करूँ यार? मेरा तो दिमाग़ खराब हो रहा है सोच सोच कर.." नीरू ने अपना सिर पकड़ रखा था...

"देख... मैं तो यही कहूँगी की घर वालों की मान लेने में ही भलाई है.. क्या फायडा बेकार में उलझ कर.. जब कुच्छ हो ही नही सकता...!.... और फिर शादी करने में बुराई ही क्या है? मेरी ये समझ में नही आ रहा की तू शादी से इनकार क्यूँ कर रही है.. कोई और पसंद कर रखा है क्या?" ऋतु ने सीरीयस होते हुए कहा...

"तू बकवास क्यूँ कर रही है.. कुच्छ आइडिया है तो बता..!" नीरू ने गुस्से से कहा..," वो कल आ रहे हैं.. और तुझे मज़ाक सूझ रहा है..."

"मज़ाक नही कर रही यार... ठीक ही तो कह रही हूँ.. आख़िर बुराई क्या है शादी करने में.. वो तो सभी करते हैं...!" ऋतु ने ज़ोर देकर कहा...

"मुझे नही पता.. पर मुझे पक्का पता है कि शादी करते ही मैं मर जाउन्गि.." नीरू ने उदास होकर कहा....

"अच्च्छा! आज तक तो कोई मरा नही... तुझे ऐसा क्यूँ लगता है.." ऋतु लगातार जिरह कर रही थी...

"मेरा दिल कह रहा है, इसीलिए.. और मुझे पता है ये झूठ नही है.. मरना ही है तो क्यूँ ना शादी से पहले ही मर जाउ?" नीरू ने हताशा के भाव चेहरे पर लाते हुए कहा,"अपने घर में तो मरूँगी...."

"देख.. अब बकवास तू कर रही है... प्लीज़.. ऐसा मत बोल.. कुच्छ नही होगा.. अंकल आंटी तुम्हारा बुरा थोड़े ही चाहते हैं..." मरने की बात पर ऋतु को गुस्सा आ गया...

"ठीक है तो जा! तू भी उन्ही का ही पक्ष ले ले.. मुझे जो करना होगा मैं कर लूँगी..!" नीरू ने कहा और लॅटेकार तकिये के नीचे अपना चेहरा दबा लिया...

ऋतु ने नीरू के पास सरक कर उस'से तकिया छ्चीन लिया," अच्च्छा बोल.. क्या करना है.. मैं तेरे ही साथ हूँ पागल!" ऋतु उसके बालों में हाथ फेरने लगी....

ऋतु की बात सुनकर नीरू खुश होकर बैठ गयी....."देख.. मैं कल से ही मम्मी पापा के पिछे पड़ी हूँ... पर उनके कान पर जू तक नही रैंग रही.. अब तो बस एक ही इलाज है..." कहकर नीरू चुप हो गयी...

"वो क्या?" ऋतु ने संशय से पूचछा....

" गरिमा के पास होस्टल में चली जाउ 2-4 दिन के लिए.. उसको कुच्छ पता भी नही है इस शादी के चक्कर के बारे में.. मैं जाकर मम्मी को फोन भी कर दूँगी कि शादी ना करने का वादा करो तो मैं आ जाउन्गि.... फिर 'ये' आराम से मेरी शादी करने की अपनी ज़िद भी छ्चोड़ देंगे..." नीरू ने कहा....

"तूने अपनी तो सोच ली... उनकी जो बे-इज़्ज़ती होगी वो?" ऋतु ने उसको घूरते हुए कहा....

"तो मैं और क्या कर सकती हूँ यार.. मैने मम्मी से उनका नंबर. लेने की भी कोशिश की.. पर वो मानी ही नही... बता मैं क्या करूँ..." नीरू ने मायूस होकर कहा....

"हूंम्म.. देख, मैं तो सॉफ बता रही हूँ.. मुझे तो तेरा ऐसा करना अच्च्छा नही लगता... कल जो होता है होने दे.. बाद में सोच लेंगे....!" ऋतु ने समझाने की कोशिश की...

"अरे, तुझे पता नही है... वो कल मँगनी के लिए आ रहे हैं.. खाली देख कर जाने की बात होती तो मैं मान लेती.. पर घर वालों का जल्दी शादी करने का प्रोग्राम बन गया है... उन्ही के कहने पर... अब तू खुद ही सोच.. अब ज़्यादा बे-इज़्ज़ती होगी या बाद में...?" नीरू ने ज़ोर देकर पूचछा...

"देख, मैं कुच्छ नही कहती... तुझे जो करना है कर ले!" ऋतु गुम्सुम सी बैठकर कुच्छ सोचने लगी...

"देख! तू मेरा प्लान लीक तो नही करेगी ना?" नीरू ने उसको घूरते हुए पूचछा...

"कुच्छ नही करती मैं.. जो करना है कर ले.. मैं जा रही हूँ.." ऋतु खड़ी होते हुए बोली.. उसके चेहरे पर उदासी और बे'बसी सॉफ झलक रही थी.....
ऋतु को पूरी रात नींद नही आई.. सारी रात करवटें बदलते हुए वह नीरू के इस कदम के होने वाले असर के बारे में ही सोचती रही... केयी बार उसके मंन में आया की फोन करके आंटी जी को सब कुच्छ बता दे.. पर इसके लिए ज़रूरी हिम्मत वह जुटा नही सकी...

सुबह मम्मी उसको उठाने आई तो आते ही बोली," क्या बात है बेटी? तबीयत तो ठीक है?" मम्मी ने माथे पर हाथ लगा कर देखा.. वो तेज बुखार से तप रही थी.. उसकी आँखें लाल थी और चेहरा बोझिल सा लग रहा था....

"ओह्हो.. तुझे भी आज ही बीमार होना था... आज तो नीरू को देखने आने वाले हैं ना? चल चाय के साथ कुच्छ खा ले.. और गोली ले लेना... ठीक हो जाएगी..." मम्मी ने उसको पुच्कार्ते हुए कहा...

ऋतु फफक सी पड़ी... उसने अपना सिर घुटनो में दबा लिया और सिसकने लगी... अब तक तो सारे मोहल्ले को ही पता लग चुका होगा कि आज नीरू की मँगनी है.. अब क्या होगा....

अचानक उसको इस तरह से व्यवहार करते देख मम्मी जी विचलित सी हो गयी," क्या हुआ बेटा! ऐसा क्यूँ कर रही है तू..? कुच्छ बात है क्या?" मम्मी बुरा सा मुँह बनाकर उसके साथ बैठ गयी और उसका चेहरा अपनी छाती से लगा लिया...

"कुच्छ नही मम्मी!" और ऋतु और ज़्यादा तेज़ रोने लगी.....

"आए.. मेरी लाडली! ऐसा क्यूँ कर रही है? कोई बात है तो बता ना.. तू भी मुझसे कुच्छ छुपाती है कभी?" मम्मी अधीर होकर उसको दुलार करने लगी...

"ममियैयीई... वो... नीरू!" ऋतु लगातार मोटे मोटे आँसू गिराती हुई सिसक रही थी.....

"क्या हुआ? फिर से लड़ाई हो गयी क्या..? ले तू चाय ले.." मम्मी ने टेबल से ठंडी हो रही चाय उसको उठाकर दी.....

"वो शादी नही करना चाहती मम्मी... इससलिए घर से जा रही है..." अपने दिल का गुबार निकलते ही ऋतु फुट फुट कर रोने लगी.....

"हाए राम! ये क्या कह रही है तू? घर वाले समझाते क्यूँ नही... अब क्या होगा?" मम्मी के हाथ से चाय का कप छ्छूट'ते छ्छूट'ते बचा...

"उनको नही पता मम्मी... वो बिना बताए जाएगी....." ऋतु ने कहा...

"हे भगवाअन... मैं अभी उनके घर जाती हूँ.. ऐसे कैसे चली जाएगी...?" मम्मी ने एक पल भी गँवाए बिना अपनी चप्पल पहनी और तेज़ी से बाहर निकल गयी...

"उनको ये मत बताना मम्मी.. कि मैने बताया है.. वो बोलेगी नही कभी मुझसे.." ऋतु ने जब तक बात कही.. मम्मी जी बाहर निकल चुकी थी.. पता नही सुना या नही सुना....
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ऋतु की मम्मी ने नीरू के घर की बेल बजाई.. बाहर उसकी मम्मी ही निकल कर आई," आओ बेहन.. हम तो आज बड़ी लेट उठे..." नीरू की मम्मी जी ने मुस्कुरकर उसका स्वागत किया...

"नीरू कहाँ है?" ऋतु की मम्मी ने सीधा यही सवाल किया....

"सो रही है उपर.. क्यूँ?"

"ज़रा बुलाना.. मुझे कुच्छ काम है.. चलो रहने दो.. मैं उपर ही चली जाती हूँ..." ऋतु की मम्मी उनको बात बताए बिना ही नीरू को समझाना चाहती थी....

"अरे क्यूँ परेशान होती हो... आओ चाय पी लो तब तक.. मैं बुलाकर लाती हूँ..." कहते हुए नीरू की मम्मी उपर चली गयी.....

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दिन निकलने से पहले ही नीरू घर से बाहर निकल चुकी थी.. जाने क्या बात थी, पर उसका शादी ना करने का दृढ़ निस्चय निसचीत तौर पर नियती द्वारा निर्धारित ही लगता था.. बाहर निकलने से पहले उसके मन में इतनी घबराहट नही थी, जितना वो घर से बाहर कदम रखने के बाद महसूस कर रही थी. ये तो शुक्र था कि उसके सामने एक मंज़िल थी.. अमृतसर का गर्ल'स होस्टल ! वरना क्या हाल होता उसका... कभी घर वालों का ख़याल और कभी उनकी इज़्ज़त का.. उसका मॅन कहीं ना कहीं उसको ऐसा करने से रोक रहा था... पर उसके कदम आगे ही आगे बढ़ते चले गये..

बस-स्टॅंड पर जाकर उसने अनमने मंन से अमृतसर की एक टिकेट खरीदी और बस में बैठ गयी......
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"हे भगवान! ये क्या हो गया...? क्या जवाब देंगे हम उनको... इस'से अच्च्छा तो हम उसकी मान ही लेते...." सारी बात का पता लगते ही मम्मी पापा दोनों के पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी.... ऋतु के पापा भी वहीं आ चुके थे... सबके माथे पर चिंता की लकीरें थी....

"मैं गाड़ी लेकर देख कर आता हूँ... " विचलित से पापा ने कहा और बाहर निकल गये....
........................................................
"अंकल जी! कितनी देर में चलेगी बस?" नीरू ने बस में चढ़े कंडक्टर से पूचछा...

"5-7 मिनिट और लगने हैं बेटी बस.. एक बार मिस्त्री क्लच ठीक कर दें.. फिर तो यहाँ से सीधी 5वें गियर में चलनी है...... हे हे" कंडक्टर ने कहा और आगे चला गया.....

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नीरू के पापा सीधे बस-स्टॅंड ही पहुँचे... अंदर आए और अमृतसर जाने वाली बस के पास जाकर खड़े हो गये.. अचानक उनको घर से फोन आ गया.. वो वापस पलटे और थोड़ी दूर खड़े होकर घर फोन निकाल लिया..

"हांजी" मम्मी की आवाज़ सुनकर पापा ने रुनवासी आवाज़ में पूचछा....

"ऋतु कह रही है कि वो अमृतसर जाने की बोल रही थी.. अपनी सहेली 'गरिमा' के पास...." मम्मी ने बताया....

ऋतु भी तब तक वहीं आ चुकी थी..

"षुक्र है भगवान का....!" पापा ने राहत की साँस ली..," वही ना जो हॉस्टिल में रहती है.....?"

"हांजी.. वही!" मम्मी ने हामी भारी....

"ठीक है... तुम वहाँ फोन मत करना... मैं उसको लेकर ही आउन्गा... रख दो!" पापा ने कहा और फोन काट दिया.....

फोन वापस जेब में डाल कर पापा अमृतसर वाली बस में चढ़ गये...

उन्होने सवारियों पर नज़र डाली, पर नीरू वहाँ नही थी... वो सीधे कंडक्टर के पास पहुँचे..,"इस'से पहले कोई बस गयी है क्या अमृतसर....?"

"हांजी.... बस 15 मिनिट पहले ही निकली है... क्यूँ?" कंडक्टर ने विनम्रता से पूचछा....

"नही... कुच्छ नही..." पापा ने कहा और तेज़ी से उतरते हुए बाहर निकल कर अपनी गाड़ी में बैठे और गाड़ी अमृतसर की और दौड़ा दी.....

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5-7 मिनिट का टाइम मिलने पर नीरू बस से उतर कर बस-स्टॅंड के PCओ बूथ में चली गयी थी... वहीं से उसने गरिमा के हॉस्टिल में फोन मिलाया.. पर किसी ने फोन उठाया नही....

वह बाहर निकालने ही वाली थी कि उसने पापा को बस से बाहर खड़े देख लिया... नीरू एक दम सहम गयी और वापस पी.सी.ओ. में घुस गयी...

"हांजी मेडम! फोन कर लिया हो तो बाहर आ जाइए... मुझे भी करना है..." बाहर नीरू के बाहर आने की प्रतीक्षा कर रहे आदमी ने कहा...

"एक मिनिट प्लीज़...." कहकर नीरू ने मजबूरी में रिसीवर उठाकर नंबर. रिडाइयल कर लिया...

पर फोन नही उठाया गया... नीरू ने बाहर देखा.. पापा बस से उतरे थे... नीरू ने एक बार और फोन मिला लिया....

"हेलो!" इस बार किसी ने फोन उठा लिया था....

"एक बार रूम नो. 13 से गरिमा को बुला देंगे प्लीज़!" नीरू ने रिक्वेस्ट की...

"कॉलेज में 3 दिन की छुट्टिया हैं... सभी बच्चे घर पर गये हुए हैं... आप कौन?" उधर से आवाज़ आई...

सुनते ही बुरी तरह से हताश होकर नीरू ने फोन रख दिया... पापा जा चुके थे और उसी वक़्त बस भी चल पड़ी... वह बाहर निकली और बस-स्टॅंड के पिछे चली गयी...

"हे भगवान! अब क्या करूँ..." विडंबना और असमन्झस के मारे नीरू की आँखों से आँसू छलक उठे....

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पापा ने बस पकड़ने में ज़्यादा देर नही लगाई... बस को रुक्वाकर वो गाड़ी में चढ़े.... पर उस'में भी नीरू को ना पाकर हताश हो गये... बस से उतरकर उन्होने गाड़ी अमृतसर की और ही दौड़ा दी... होस्टल में जाकर नीरू का इंतजार करने के अलावा उनके पास कोई चारा बचा ही नही था...

उधर नीरू के पास भी कोई चारा नही बचा था... लगभग वह आधे घंटे तक इसी असमन्झस में फँसी रही कि घर वापस जाउ या नही..... फिर अचानक उसके मंन में जाने क्या ख़याल आया कि वह बाहर निकली और एक ऑटो में बैठ गयी..,"चलो भैया!"

ओह माइ गोद! नीरू अमन की कोठी के सामने खड़ी थी...

"वो घर पर हैं?" नीरू ने बाहर खड़े नौकर से पूचछा....

"जी.. एक मिनिट!" कहकर राजू अंदर चला गया... सबसे पहले उसको रवि मिला अंदर...

"साहब! एक मे'म साहब आई हैं.. पूच्छ रही हैं आप लोगों को.. क्या बोलूं?"

"कौन है?" कहते हुए रवि बाहर निकल आया...

बाहर आते ही एक पल को तो वो जड़ सा होकर रह गया.. पागलों की तरह उसको कुच्छ देर तक दूर से ही देखता रहा.. फिर अपने सिर को पकड़ कर बेतहाशा अंदर की और भागा..,"भाई.... भाई!"

"क्या हो गया? चिल्ला क्यूँ रहा है..." रोहन ने पूचछा....

"ववो... वो आप खुद ही देख लो... मैं नही बताता..." रवि के चेहरे की चमक बता रही थी कि कुच्छ ना कुच्छ अच्च्छा ही हुआ है!

"कहाँ देख लूँ.. बता तो सही... तू इतना उतावला क्यूँ हो रहा है..." रोहन ने आस्चर्य से पूचछा...

"नही नही... तुम मत देखो... तुम कपड़े बदल लो... मैं लेकर आता हूँ उन्हे अंदर...." रवि ने कुच्छ सोचते हुए कहा...

"कपड़े बदल लूँ?" रोहन की कुच्छ समझ में नही आया.. रवि को घूर कर देखता हुआ रोहन बाहर निकल आया...

"आअ...आप!" रोहन की भी नीरू को देखते ही हवाइयाँ उड़ने लगी... वह तेज़ी से गेट की तरफ गया और फिर से बोला..,"आप... यहाँ?"

"अंदर आ जाउ?" नीरू ने मुरझाए चेहरे से ही कहा...

"ह..हां हां.. आइए ना... आप... क्या हो गया?" रोहन नीरू के साथ साथ चलता हुआ बोल रहा था,"सब ठीक तो है ना...."

नीरू के चेहरे से लग नही रहा था कि सब ठीक है... इसीलिए वो गहरी असमन्झस में था....

"हुम्म... वो... तुम क्या कह रहे थे पुराने टीले के बारे में!" नीरू ने सहजता से पूचछा...

"वो.. मुझे सच में सपने आते हैं.. आप की.... रवि की कसम.. भगवान की कसम... मैं कुच्छ भी झूठ नही बोल रहा था.." रोहन बात को समझ नही पाया था... तब तक अमन और रवि भी वहीं आ चुके थे...

"आप बैठिए ना!" अमन ने आग्रह किया....

"मेरा वो मतलब नही है" नीरू ने बैठते हुए कहा..," आप कह रहे थे ना कि टीले पर चल कर मुझे सब याद आ जाएगा..."

"जी... वो कह रही थी.. नीरू... सपने में.. सच कह रहा हूँ...." रोहन अब तक खड़ा ही था...

"तो चलो...!" नीरू ने कहा....

"कहाँ?" रोहन ने पूचछा....

"पुराने टीले पर..." नीरू ने जवाब दिया....

"क्या? सच ?" रोहन की खुशी का कोई ठिकाना नही रहा.. पर अगले ही पल वा मायूस होते हुए बोला,"पर वो तो यहाँ से बहुत दूर है.. आज चलकर वापस नही आ सकते..."

"कितने दिन लग जाएँगे... 3, 4, हफ़्ता?" नीरू ने पूचछा...

"हां.. हफ्ते में तो सब कुच्छ हो जाएगा... मतलब हम आराम से जा सकते हैं... पर....?" रोहन पूच्छना चाहता था कि घर वाले क्या कहेंगे.... पर नीरू ने बीच में ही टोक दिया...

"ठीक है... चलो!" नीरू ने उदासी भरे चेहरे से ही कहा...
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"हे भगवान! पता नही कहाँ चली गयी वो पागल! यही करना था तो बता तो देती... हम रहने देते शादी से...." घर वापस आकर उसके पापा सबके साथ गहरी सोच में बैठे हुए थे....

"पर अगर होस्टल बंद है तो कहाँ गयी होगी... कहीं कुच्छ हो गया तो उसको.. वो तो अकेली कहीं जाती भी नही थी..." मम्मी लगातार आँसू बहाए जा रही थी....

"भाई साहब! उनको तो मना कर दो.. कम से कम वहाँ वाला पंगा तो नही रहेगा..!" ऋतु के पिताजी ने कहा....

"क्या कहूँ? ... कैसे कहूँ? मैं अमृतसर जा रहा था तो उनका फोन आया था.. मैने तब तो कुच्छ कहा भी नही.. अब तो उनके रिश्तेदार भी आ चुके होंगे... ये कैसा दिन दिखाया भगवान!" पापा की आँखें भी गीली हो गयी...

अचानक उनको बाहर दो गाड़ियाँ रुकने की आवाज़ सुनाई दी.. सब सहम गये... बाहर निकले तो देखा वही थे...

"अब क्या किया जाए?" बड़बड़ाते हुए नीरू के पापा मानव के पापा की और बढ़े...

मानव के पापा बड़ी ही गरम जोशी से आकर उनसे गले मिले...," अरे! ऐसे चेहरा क्यूँ लटका रखा है यार... ये लो! संभलो. मेरा बेटा और शीनू बिटिया को मुझे सौंप दो..." उन्होने खिलखिलाते हुए कहा..

मानव ने आकर उनके इज़्ज़त से चरण च्छुए... पर ग्लनीवश नीरू के पापा उनको आशीर्वाद तक देना भूल गये...

"मेरे साथ आएँगे प्लीज़.. कुच्छ बात करनी है...!" नीरू के पापा ने आहिस्ता से कहा....

"देखो भाई.. दहेज की बात मत करना.. हम बेटा दे रहे हैं.. दहेज नही देंगे..." कहकर मानव के पापा ने अट्टहास किया...

"आप आइए तो सही.. एक बार.. उपर.." नीरू के पापा ने उनका हाथ पकड़ा और उपर जाने लगे... ऋतु के पापा भी उनके साथ ही थे... आने वाली पार्टी में हर किसी के चेहरे से उल्लास झलक रहा था... सब नीचे ही रहकर घर वालों से मेल मिलाप में लग गये.....

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"ये क्या कह रहे हैं भाई साहब! आपको पहले ही पूच्छ लेना चाहिए था... अब.. ये तो मेरी पगड़ी उच्छलने वाली बात हो गयी" सारा माजरा सुनते ही मानव के पिताजी के होश फाख्ता हो गये.. चेहरा का सारा रंग उड़ सा गया...

"भाई साहब मैं मानता हूँ... पर आप किसी तरह से आज का कार्यक्रम टाल दीजिए.. कुच्छ दिन बाद तो वो वापस आ ही जाएगी... आपको तो पता है नीरू के नेचर का... वो ऐसी नही है... उसके आने के बाद हम कोशिश करेंगे कि 'वो' मान जाए..." नीरू के पापा ने सिर झुका कर कहा...

"कमाल कर रहे हैं आप, भाई साहब! मेरे रिश्तेदारों को में क्या कहूँ? ये कि मेरी बहू आज कहीं चली गयी है बिना बताए... और फिर आने के बाद भी उसको ज़बरदस्ती शादी के लिए तैयार करने का क्या फायडा.. कल को फिर चली जाएगी.. हमारे घर से... नही नही! ये नही हो सकता भाई साहब!" मानव के पापा खफा से हो गये....

"तो फिर आप ही बतायें.. मैं क्या करूँ? ये तो उन्होनी है..." नीरू के पापा ने सिर झुकाए हुए ही कहा...

"ना ना! उन्होनी नही, ये आपकी नादानी है.. ज़बरदस्ती आपको अड़ना ही नही चाहिए था, रिश्ते के लिए.. वो मना कर रही थी तो आप कल तक भी फोन करके बात टाल सकते थे... हम कुच्छ भी कह देते.. पर आज की तरह ज़िल्लत का सामना ना करना पड़ता..." मानव के पापा ने गहरी साँस ली....

"अब पिच्छली बातों को दोहराने से क्या फायडा भाई साहब.. जो होना था, वा हो चुका.. ये सोचिए की अब क्या कर सकते हैं.. " ऋतु के पापा ने बीच में बोलते हुए कहा....

"यार, अब करने को रह क्या गया... मैं तो किसी को मुँह दिखाने लायक रहा नही.. मुझे तो बहू चाहिए थी.. वो यहाँ है ही नही..." मानव के पापा बहुत ज़्यादा हताश थे...

"एक बात कहूँ.. भाई साहब! अगर पसंद आए तो...." कहकर ऋतु के पापा रुक गये...

बिना कुच्छ बोले ही नीरू और मानव के पापा उनकी और देखने लगे...

"अगर आपको मेरा घर बार पसंद हो तो मैं अपनी बेटी देने को तैयार हूँ..." ऋतु के पापा ने कहा...

नीरू के पापा अवाक से उसके मुँह की और देखने लगे....

"वो तो लंबी कहानी हो गयी भाई साहब.. मानव उसको देखेगा.. अब शीनू तो उसको बेहद पसंद थी... आप तो समझते होंगे आज कल के बच्चों को.... फिर क्या पता आपकी बेटी को भी ऋतु की तरह मानव पसंद नही आया तो...और फिर ये सब एक ही दिन में तो नही हो सकता ना..." मानव के पापा के चेहरे पर अब भी हताशा और निराशा ही थी...

"मेरी बेटी नीचे है.. मैं उसकी मा और ऋतु को बुला लेता हूँ.. आप मानव को बुला लीजिए.. देख लीजिए अगर बात बन'ती है तो?" ऋतु के पापा ने कहा...

और कोई चारा अब बचा भी तो नही था... वो बाहर निकले और मानव को उपर बुलाया.....
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मानव भी सारी बात सुनकर सन्न रह गया.. अगले ही पल उसको अहसास हुआ कि हो ना हो नीरू रोहन के पास ही है... पर फिर वही बात होती.. ज़बरदस्ती का रिश्ता... मानव ने अपने पापा के चेहरे पर फैली चिंता की लकीरों को देखा और भरे गले से कहा," ठीक है पापा! जैसा आप ठीक समझे करें.. मुझे कोई ऐतराज नही है..."

पापा ने लपक कर खड़ा होते हुए अपने बच्चे को बाहों में भर लिया,"ऐसी होती है औलाद.. मुझे तुम पर.. गर्व है बेटा...!" आँसू उनकी आँखों से निर्झर बहने लगे....

"आप ऐसा क्यूँ कर रहे हैं पापा.. मैने ऋतु को देखा है... मुझे पसंद है ये रिश्ता... मैं ही पागल था... मैं कभी नीरू की आँखों के भाव पढ़ ही नही पाया.. आप ऋतु से पूच्छ लें... अगर उनको मजूर हो तो ये मेरा सौभाग्य ही होगा...." मानव का गला रुंध सा गया था....

"हमें माफ़ कर देना बेटा... हमसे चूक हो गयी..." नीरू के पापा ने खड़े होकर पासचताप सा प्रकट किया...

"आप भी अंकल... उपर वाले की मर्ज़ी के बगैर कभी कुच्छ होता है क्या? कोई ग़लती नही हुई आपसे.. प्लीज़ मुझे शर्मिंदा ना करें..." मानव ने कहा तो नीरू के पापा भी खुद को उसको अपनी बाहों में भरने से ना रोक सके....
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जब ऋतु उपर आई तो उसको आभाष भी नही था कि क्या से क्या हो गया है.. वह तो यही सोच रही थी कि नीरू के बारे में पूच्छने के लिए ही उसको बुलाया गया है....

"बेटी... अगर मानव से शादी करने में तुम्हे कोई ऐतराज ना हो तो हमारी इज़्ज़त बच जाएगी.." मानव के पापा ने सीधे सीधे ही पूच्छ लिया....

ऋतु को अपने कानो पर यकीन ही नही हुआ.. लंबा छर्हरा इनस्पेक्टर उसके सामने खड़ा उसको ही देख रहा था," म्म..मैं?"

"कोई ज़बरदस्ती की बात नही है बेटी.. तुम्हारे पापा ने हम पर उपकार करने के बहाने ही ये उपाय सुझाया है... पर अगर तुम्हे कोई ऐतराज है तो....

ऋतु ने मानव से नज़रें मिलाई और शर्मकार अपनी मम्मी के पहलू में छिप गयी....

"बोल दे बेटा.. जो कुच्छ भी तेरे मंन में है बोल दे...!" मम्मी ने उसको दुलार्ते हुए कहा...

"मुझे क्यूँ ऐतराज होगा मम्मी... मेरे लिए तो ये सौभाग्य की बात होगी.. और फिर इस'से अच्च्छा हल निकल भी नही सकता..."ऋतु ने मम्मी के कान में धीरे से कहा.. पर सुन सबने लिया.....

इसके साथ ही घर में फिर से खुशियाँ फैल गयी...

मौका देखकर नीरू के पापा ऋतु के पापा के पास गये," आपने मुझे बचा लिया भाई साहब! मैं तो बर्बाद ही हो जाता... ये ग्लानि लेकर जी नही पाता मैं...." और दोनो एक दूसरे से गले मिलकर मिनूटों आँसू बहाते रहे... खुशी के भी, और गम के भी.....



क्रमशः..................................






आपका दोस्त राज शर्मा
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj

































































































































































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गतांक से आगे ...............................

"ओहू! आप एक बार बात तो कर लो उनसे.. इतना अच्च्छा रिश्ता खुद चलकर आया है.. मैं तो कहती हूँ, बात बन जाए तो चट माँगनी पर ब्याह कर देंगे अपनी शीनू का...." मानव के निकलते ही मम्मी जी ने फोन लगा लिया था...

"अच्च्छा ठीक है.. मैं अभी बात करके बताता हूँ... पर उनको बोलूं क्या?" पापा ने असमन्झस से पूचछा...

"अब ये बात भी क्या मैं ही सम्झाउ? बोल देना की मानव को पसंद है.. और हम भी बहुत खुश हैं इस रिश्ते से....." मम्मी ने बात पूरी भी नही की थी कि नीरू दरवाजा खोलकर अंदर आ गयी

"किसके रिश्ते की बात हो रही है मम्मी..?" नीरू आते ही मम्मी से लिपट गयी...

"अच्च्छा रखती हूँ जी.. आप बता देना मुझे भी..." मम्मी ने कहा और फोन रख दिया...

"क्या हुआ मम्मी? मानव आया था! कुच्छ पता चला...." नीरू ने मम्मी के फोन रखते ही पूचछा...

"मानव आया था!" मम्मी ने मुँह चढ़ा कर मज़ाक मज़ाक में उसकी नकल उतारी," तू तो जैसे घर वालों के अलावा किसी को जानती ही नही.. सामने से बोल नही सकती थी क्या?"

"मैं क्यूँ बोलूं..? मुझे अच्च्छा नही लगता ऐसे किसी को राह चलते में टोकना.. बताओ ना.. आपने उस लेटर की बात की या नही..... और मुझे क्यूँ बुलाया है?" नीरू ने जवाब देते हुए पूचछा....

"हां.. कह रहा था कि अब मैं सब संभाल लूँगा... और कुच्छ हो ना हो.. हमें बहुत अच्च्छा दूल्हा मिल गया; अपनी गुड़िया रानी के लिए.." मम्मी ने नीरू का चेहरा अपने हाथों में लेकर गालों को चूमते हुए कहा...

नीरू बात सुनते ही बिदक गयी," ये क्या कह रही हैं मम्मी.. मैने कह दिया ना मुझे नही करनी शादी वादी.. आप बार बार ये जिकर ना किया करें.. मेरा दम घुटने लगता है...."

"अरी.. सुन तो ले एक बार की रिश्ता किसका आया है... अपने 'मानव' का.. कितना सुंदर और छैल छबिला है.. और थानेदार है.. तू मौज करेगी उसके साथ!" मम्मी ने समझाते हुए कहा...

"थानेदार होगा, अपने घर में.. मुझे नही करनी किसी से शादी... देख लेना, आगे बात बढ़ाई तो!" गुस्से से भरी नीरी ने अपनी किताब उठाई और पैर पटकती हुई वापस चली गयी.. कॉलेज में....!

"ये लड़की भी ना!" मम्मी ने बड़बड़ाते हुए अपने माथे पर हाथ मारा ही था की फोन की घंटी बज उठी..,"मम्मी ने लपकते हुए झट से फोन उठा लिया...,"हां जी!"

"सच में आज का दिन तो बहुत ही शुभ है... वो भी बहुत खुश हुए बात सुनकर.. झट से तैयार हो गये..!" पापा की आवाज़ थी...

"आच्छाआअ!" मम्मी जी चहकति हुई बोली और फिर अचानक नीरू की बात याद आते ही मायूस हो गयी," पर शीनू का क्या करें? ये तो उल्टी ही रामायण पढ़ रही है..."

"क्यूँ क्या हुआ? पापा ने आशंकित होकर पूचछा...

"कह रही है, इसको नही करनी शादी वादी.. मुझसे लड़ाई करके वापस गयी है..." मम्मी का चेहरा उतर गया....

"ओह्हो.. तुमने तो मुझे डरा ही दिया था.. ऐसा तो होता ही है.. लड़की है आख़िर! और क्या शादी की बात सुनकर नाचने लग जाएगी..! लड़कियाँ तो ऐसे करती ही हैं.. तुम उसकी चिंता मत करो.. वो तो इस शनिवार को ही देखने आने की बात कह रहे हैं...." पापा ने बात को आगे बढ़ाया...

"हाई राम! पर शनिवार में तो तीन ही दिन बचे हैं...." मम्मी सोच कर बोली...

"तो हमें क्या करना है.. उनकी देखी भाली तो है ही.. बस आ जाएँगे और 'अपनाकर' चले जाएँगे... तुम किसी बात की चिंता मत करो! मैं रखता हूँ अब.." कहकर पापा ने फोन काट दिया...

मम्मी जी फूली नही समा रही थी.....
------------------------------------

"एक्सक्यूस मी, मिस नीरू!"

नीरू कॉलेज के अंदर कदम रखने ही वाली थी कि अपना नाम सुनकर चौंक कर पलटी..

"मैं अमन हूँ.. रोहन का दोस्त!" अमन ने मुस्कुराते हुए कहा...

पहले से ही गुस्से में भरी हुई नीरू की थयोरियाँ चढ़ गयी,"तो?"

एक बारगी नीरू के तेवर को देख अमन भी सहम सा गया.. इस बात को जानते हुए कि नीरू ने उस रात रोहन और रवि को ऐसे ही निकल जाने दिया था, उस'से काफ़ी विनम्रता की उम्मीद थी.. कुच्छ देर रुक कर संभालते हुए बोला," तो.... मुझे आपसे कुच्छ बात करनी थी.. इसी बारे में.. आप चाहे तो अपनी सहेलियों को साथ ले सकती हैं...."

"नही... मुझे किसी से कोई बात नही करनी..." कहकर वो पलटी ही थी कि ऋतु और शिल्पा ने उसका हाथ पकड़ लिया," सुन तो लो शीनू! सुन'ने में क्या हर्ज़ है..?" ऋतु ने कहा....,"मुझे रोहन की बातें सच्ची लगती हैं...."

"अब तुम भी?" नीरू ने ऋतु को घूरा....

"मुझ पर विस्वास नही है क्या?" ऋतु ने उसका हाथ दबाकर कहा...

"यार.. इसमें विस्वास की क्या बात है? बस, मुझे कोई बात नही करनी..." नीरू अपने फ़ैसले पर अडिग थी...

"देख! मैं तुझे रोहन की बातों में सच्चाई के बहुत से सबूत दे सकती हूँ.. पर तू एक बार हमारे साथ चल.. बस!" ऋतु ने ज़ोर देकर कहा...

"साथ चलूं? ... पर कहाँ?" नीरू ने नरम पड़ते हुए कहा...

"चल आजा... " ऋतु ने कहा और लगभग ज़बरदस्ती सी करते हुए उसको अमन की गाड़ी में बैठा लिया.. साथ ही शिल्पा भी बैठ गयी......

अमन के घर पर सब लोग साथ साथ बैठे थे.. शिल्पा और शेखर एक दूसरे के साथ बैठे थे.. अमन और रोहन एक दूसरे के साथ.. उनके सामने ऋतु के साथ बैठी हुई नीरू खुद को अजीब सी स्थिति में पा रही थी... अगर ऋतु उसके साथ ना होती तो एक पल भी उसका वहाँ ठहरना नामुमकिन था... उसने ऋतु का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था..

अचानक दारू की बॉटले छिपाने गया रवि जैसे ही उनके सामने आया.. उसके सिर पर गोला बना देख ऋतु की हँसी छ्छूट गयी.. नीरू ने भी जैसे ही अपना चेहरा उपर उठाया, अपना मुँह दबाकर हँसने से खुद को रोक ना पाई...

"प्रणाम भाभी जी!" रवि ने पहली बार नीरू के चेहरे पर सितारों की चमक जैसी मुस्कुराहट देखी थी.. मौके का फायडा उठाते हुए उसने नीरू को भाभी कह ही दिया....

नीरू ने उसकी बात को अनसुना कर दिया और ऋतु से बोली," हां.. अब बताओ.. क्या बात करनी थी.. जल्दी बोलो.. मुझे जाना है...

रोहन ने बोलने के लिए जैसे ही मुँह खोला.. सब चुप होकर उसकी बात सुन'ने लगे.. अपने सपनो से शुरुआत करके आज तक की सारी कहानी रोहन ने विस्तार से बयान कर दी.. सिर्फ़ उसमें से श्रुति के साथ हुए उस दर्दनाक हादसे को वह खा गया.. इस दौरान श्रुति को याद करते हुए उसकी आँखें भर आई.. और एकाएक सब भावुक हो गये.. जिनको श्रुति के बारे में पता था.. वो श्रुति को याद करके.. और जिन्हे नही पता था.. वो ये समझ कर कि रोहन नीरू को कहानी सुनाते हुए बहक गया है....

"आई बात समझ में....?" ऋतु ने रोहन की बात ख़तम होते ही नीरू से पूचछा...

नीरू का दिमाग़ कहानी सुन'ते हुए सुन्न सा होकर अपना नाम बदले जाने वाली कहानी से तड़ातम्मया बिठा रहा था.. पर प्रत्यक्ष में उसने सिर्फ़ इतनी ही प्रतिक्रिया दी," चलें!"

"अब ये क्या बात हुई...? कुच्छ बोलो तो सही.. आख़िर सब तुम्हारे जवाब का इंतजार कर रहे हैं..." ऋतु ने गुस्से में भरकर कहा....

नीरू कुच्छ बोलने की सोच ही रही थी कि अगले ही पल मानो उसको बिजली का सा झटका लगा..

"उम्मीद करता हूँ कि मैने आप सब को डिस्टर्ब नही किया होगा..." बिना इजाज़त अंदर आने के बाद एक एक चेहरे को घूर्ने के बाद मानव की आँखें नीरू पर आकर टिक गयी....," ओह्हो! इतनी शराफ़त और नज़ाकत भरी शरारत... आइ'एम इंप्रेस्ड!" मानव के चेहरे पर कुटिल मुस्कान तेर गयी.....

"आइए ना इनस्पेक्टर साहब. बैठिए... हम उस दिन इन्ही 'नीरू' की बात कर रहे थे.." अमन इनस्पेक्टर के स्वागत में खड़ा हो गया....

नीरू कुच्छ बोल सकने की हालत में नही थी.. वह उठकर बाहर जाने ही लगी थी की मानव ने उसको टोक दिया,"अरे नही नही... ये तो बहुत ही अच्च्छा हुआ कि आप यहीं मिल गयी.. रोहन को हथकड़ी लगाने से पहले मुझे आपके बयानों की भी ज़रूरत पड़ेगी... हा हा हा!"

मानव की बात सुनकर सभी चौंक कर उसकी और देखने लगे..

"ये क्या कह रहे हैं आप..? रोहन को हथकड़ी?" अमन ने आसचर्यचकित होते हुए पूचछा....

"चिंता ना करें.. मैं सब कुच्छ सपस्ट करके ही इसको यहाँ से ले जाउन्गा..." मानव कुर्सी पर बैठ गया...

रोहन कभी मानव को और कभी नीरू को अजीब सी निगाहों से देखने लगा.....

"तो रोहन जी; आप रात को शीनू के घर में घुसपैठ करते हैं?" सबके चेहरों को अपनी और ताकता छ्चोड़ कर अपनी इनटेरगेशन शुरू कर दी....

सवाल सुनते ही रवि ने अपने सिर के गोले को हाथ से ढक लिया... मानो सबूत छिपाने की कोशिश कर रहा हो...

रोहन ने मायूस होकर शिकायती नज़रों से नीरू की और देखा.. उसको यही अंदाज़ा हुआ कि नीरू ने उसके घर में घुसने की रिपोर्ट करवा दी है... सिर झुका कर वह कबूल करने को बोलने ही वाला था कि चौंक कर उसने नीरू की और देखा...

"नही! ये हमारे घर में कभी नही आया...!" नीरू के जवाब ने सबको हैरत में डाल दिया...

मानव नीरू के बोलने से झल्ला उठा.. उसको नीरू की आवाज़ से ही पता चल गया था कि वो रोहन को बचाने के लिए ऐसा बोल रही है...

"आर यू शुवर मिस.. शीनू उर्फ नीरू जी!" चेहरा नीचे किए हुए ही नज़रें उपर उठा कर मानव ने नीरू की और घूरा....

"हां.. ये कभी हमारे घर नही आया...!" नीरू ने नज़रें झुकाए हुए ही जवाब दिया.. बात सुनकर रवि भी उच्छल पड़ा,"हां हां.. हम भला रात को क्या करने जाएँगे.. हैं ना रोहन!"

रोहन ने नज़रें उपर करके उसके 'गोले' को देखा और उसकी हँसी छ्छूट गयी.. अब रोहन काफ़ी रिलॅक्स महसूस कर रहा था.. जब मियाँ बीवी राज़ी, तो क्या करेगा काज़ी!

"वाह वाह! रोहन को बचाने की आपकी कोशिश काबिल-ए-तारीफ़ है नीरू जी! पर अफ़सोस! इसको हथकड़ी लगाने के लिए जो वजह मेरे पास है.. उसमें आप भी इसकी कोई मदद नही कर सकती.... इसके इस जुर्म के लिए तो मैं इसको समझा कर ही छ्चोड़ने वाला था.... आख़िर तुम्हे भी इसके साथ कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते... और मेरी तरह कोई भी इज़्ज़तदार मर्द ये नही चाहेगा कि उसकी होने वाली धरमपत्नी इस तरह की छ्होटी छ्होटी बातों के लिए कोर्ट के झमेले में पड़े.."

मानव ने अपनी आख़िरी बात को चबा चबा कर कहा और नीरू के घर मिला खत उसके सामने टेबल पर रख दिया...," अब ये मत कहना कि ये खत भी आपको नही मिला.. आंटी जी ने मुझे दिया है.."

नीरू ने अपनी नज़रें झुका ली.. कुच्छ देर मौन रहने के बाद बोली,"हां.."

मानव कुटिलता के साथ मुस्कुराया,"वेरी गुड!... पढ़ना ज़रा इसको!" कहकर मानव ने खत रोहन को पकड़ा दिया....

रोहन रवि शेखर और अमन आस्चर्य से खत को पढ़ने के बाद एक दूसरे की आँखों में देखने लगे.. किसी की समझ में नही आ रहा था कि ये 'लेटर' वाला क्या फंडा है.. सब एक दूसरे से इशारों ही इशारों में सवाल सा कर रहे थे....

"पढ़ लिया?" मानव ने आराम से पिछे सिर टिकते हुए पूचछा....

"जी हां.. पर इस'से हमारा कोई लेना देना नही...!" रोहन ने ज़ोर देकर कहा....

"मान लिया! चलो अब इसको पढ़ो ज़रा...." मानव ने एक और लेटर रोहन के सामने टेबल पर फैला दिया...

"ययए.. ये तो श्रुति का है...." रोहन ने हाथ में पकड़े श्रुति के स्यूयिसाइड नोट की पहली लाइन पढ़ते ही कहा....

मानव मुस्कुराया," ना! ये श्रुति ने नही लिखा... पहले में मान चुका था कि श्रुति ने आत्महत्या की है... और ये स्यूयिसाइड नोट अपने हाथों से लिखा है... पर अब नही मानूँगा... श्रुति की हत्या हुई है...!"


"क्क्या मतलब..." सभी उच्छल कर खड़े हो गये.. बेचारी नीरू को तो अब तक ये भी पता नही था कि श्रुति अब इस दुनिया में नही है.... सब हैरत से मानव की ओर देख रहे थे....

"दोनो लेटर्स एक साथ रख कर देखो... सॉफ पता चल रहा है कि दोनो एक ही आदमी ने लिखें हैं..." मानव के चेहरे पर सफलता की चमक उभर आई थी....

सबने अपने अपने हाथों में लेटर लेकर देखे.... मानव की बात शत प्रतिशत सच थी.... पर किसी की कुच्छ समझ में नही आ रहा था....

"इसका क्या मतलब है?" अमन ने हड़बड़ा कर पूचछा....

"इसका मतलब ये है कि स्यूयिसाइड नोट श्रुति ने नही लिखा... किसी और ने लिखा है.. और जिसने भी लिखा है.. उसी ने श्रुति का कत्ल किया है...!" मानव तीर छ्चोड़ कर चुप हो गया.... उसको कहीं से किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नही मिली तो मजबूरन उसको खुद ही सारी बात समझानी पड़ी....

"देखो! श्रुति मर चुकी है.. इसीलिए नीरू के घर मिला लेटर श्रुति के हाथ का लिखा नही हो सकता... अब क्यूंकी दोनो खातों में राइटिंग हूबहू एक जैसी है.. इसका मतलब ये हुया कि श्रुति का स्यूयिसाइड नोट भी उसी व्यक्ति ने लिखा है जिसने ये दूसरा खत लिखा...

सॉफ बात है कि उसी व्यक्ति ने ही श्रुति की हत्या भी की है... अब अगर उस दिन के घटनाक्रम पर नज़र डालें तो रोहन ने खुद कहा है कि लास्ट में वो कुण्डी लगाकर श्रुति को अंदर छ्चोड़ आया था.. उसके बाद नितिन ने स्वीकार किया है कि जब वो श्रुति के पास अंदर गया तो श्रुति लाश बन चुकी थी... अगर नितिन बाहर होता तो मैं एक पल को मान भी लेता कि हो सकता है हत्या नितिन ने की हो.. पर उसकी जमानत तो कल होगी.. फिर वो कैसे नीरू के घर लेटर भेज सकता है... नही ना?"

इसका मतलब कहानी शीशे की तरह बिल्कुल सॉफ हो गयी.... नितिन ने श्रुति को जबरन रोहन के पास भेजा और रोहन ने श्रुति की मजबूरी का फायडा उठाते हुए उसके साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश की.. पर जब वो नही मानी तो ज़बरदस्ती के चक्कर में ही इसने उसका गला घोंट दिया... और उसको पंखे से लटका कर बाहर से कुण्डी बंद करके आ गया... समझे! नितिन पर सिर्फ़ ब्लॅकमेलिंग का आरोप रहेगा.. बाकी सारा काम तो जनाब ने अपने हाथों से ही किया है...." मानव ने एक लंबी साँस छ्चोड़ कर अपनी कहानी को विराम दिया....

"आप बेवजह रोहन पर शक कर रहे हैं इनस्पेक्टर... ये सपने में भी ऐसा नही कर सकता....!" अमन ने ज़ोर देकर कहा....

"तो किस पर करूँ प्रोफ़्फेसर साहब!" मानव हंसा," क्या आप पर करूँ? या बाकी लोगों पर... उस रात कोई और मौजूद था ही नही.. अगर आप में से कोई क़ुबूल कर रहा है कि ये कत्ल और दोनो खत आप में से किसी ने किए हैं तो ठीक है.. मैं विचार कर लेता हूँ... वरना सारे सबूत तो रोहन की तरफ ही इशारा कर रहे हैं..." मानव ने कहा...

"हम जायें!" नीरू के चेहरे पर कड़वाहट सॉफ झलक रही थी......

"जी क्यूँ नही..? वैसे अब भी कोई मुग़ालता बचा हो तो आप भी सवाल कर सकती हैं..." मानव ने तीखी नज़रों से नीरू की और देखते हुए कहा...

नीरू, ऋतु और शिल्पा बिना कुच्छ कहे बाहर निकल गयी....

"हम भी चलते हैं लव गुरु.. तुमसे टिप्स लेने फिर कभी आउन्गा.." मानव ने सलाम ठोंकने के अंदाज में अपना हाथ अमन की और उठाया और रोहन का हाथ पकड़ कर खड़ा हो गया....," रोहन को मैं कल सुबह कोर्ट में पेश कर दूँगा.. पर मुझे नही लगता कि 4-5 महीने से पहले इसकी बैल अप्लिकेशन लगाने का कोई फायडा होगा..."
रात को करीब 12 बजे जाकर मानव को बिस्तेर नसीब हुआ.. सारे दिन की भगा दौड़ी से उसको थकान महसूस हो रही थी... रोहन से उसने श्रुति वाले केस से ज़्यादा नीरू के बारे में पूचछा था... ये जानकार उसको सुकून मिला था कि अभी तक रोहन उसके दिल में जगह बनाने में नाकामयाब रहा है... उसको खुद अहसास हो रहा था कि रोहन का नाम नीरू के साथ जुड़ा होने की वजह से वह केस में कुच्छ ज़्यादा ही इंटेरेस्ट ले रहा है.. दोपहर को नीरू के सामने ही सारा खुलासा करने के पिछे भी उसका यही मकसद था...

पर मानवीयता और शायद आत्मीयता सी दिखाते हुए उसने रोहन को अपने साथ ही खाना खिलाया और स्टाफ के ही आदमी के बिस्तेर पर सो जाने को कह दिया... ताकि वह अपने ही मंन के द्वारा धिक्करे जाने से बच सके... वह खुद भी थाने में बने अपने रिटाइरिंग रूम में ही लेट गया...

अचानक दरवाजे पर हुई दस्तक से उसकी नींद टूट गयी,"कौन है?"

पर उसके सवाल का किसी ने भी जवाब नही दिया और वह करवट बदल कर फिर सोने की कोशिश करने लगा...

थोड़ी ही देर बाद दरवाजा लगातार 2 बार जल्दी जल्दी खटखटाया गया.. वह झल्ला कर उठ बैठा और पॅंट पहन कर उठ खड़ा हुआ...

"क्या बात है?" दरवाजा खोल कर मानव ने पास ही खड़े संतरी से पूचछा...

"कुच्छ नही जनाब! क्या हो गया...?" संतरी भाग कर दरवाजे के पास आया...

"दरवाजा क्यूँ खटखटा रहे हो?" मानव ने हुल्के से गुस्से से कहा...

"नही तो जनाब! मैं तो आधे घंटे से यहीं खड़ा हूँ.. दरवाजा तो किसी ने नही खटखटाया...."

मानव ने अजीब सी नज़रों से उसको घूरा और बाहर गेट की तरफ टहलने चला गया.. वापस लौट'ते हुए वा रोहन के कमरे में घुस गया.. रोहन जाग ही रहा था...

"कोई दिक्कत तो नही है भाई?" मानव ने पूचछा...

"आपके रहते दिक्कत क्या हो सकती है?" रोहन ने व्यंग्य सा किया.. मानव ने कुच्छ बोलना उचित नही समझा और बाहर निकल कर अपने कमरे में जाकर लाइट ऑफ की और फिर लेट गया...

मुश्किल से उसको लेटे हुए 5 मिनिट भी नही हुए होंगे की अचानक कमरे की लाइट जल गयी...

हड़बड़ते हुए चौंक कर मानव एक दम उच्छल कर बैठ गया," कौन है?"

पर एक बार फिर किसी से कोई जवाब नही मिला...

मानव के दिल की धड़कने बढ़ने लगी.. वह बिस्तेर से उठा और धीरे धीरे चलते हुए अलमारियों के पिछे बने स्विच बोर्ड की और बढ़ा... वहाँ पर किसी चूहें तक का भी नामोनिशान ना पाकर उसका दिल उसकी बल्लियों पर आ जमा," क्या मुसीबत है?" वह बड़बड़ाया और लाइट बंद कर दी... फिर जाने क्या सोच कर वह पलटा और लाइट फिर से ऑन कर दी....

वापस बिस्तेर की तरफ आते ही मानो उसको बिजली का कोई तेज झटका लगा हो.. हैरत और भय के मारे उसकी आँखें बाहर को निकल आई... धीरे धीरे चलकर उसने बिस्तेर पर पड़े कागज के टुकड़े को उठाया.. लाल रंग से कागज पर सिर्फ़ इतना ही लिखा हुआ था, डेड नेवेर लाइ!

आसमन्झ्स में वहीं जमकर खड़े हो चुके मानव को सपस्ट अहसास हो रहा था कि कमरे में कोई है... पर कौन है; ये उसकी समझ से परे था.. इतना तो तय था ही कि जो कोई भी था.. तीनो राइटिंग एक ही आदमी की थी...

हैरानी से पागल हुए जा रहे मानव ने बिस्तेर के नीचे देखा, दोबारा अलमारियों के पिछे देखा.. पर कहीं आदमी होने का चिन्हा तक उसको नज़र नही आया...

"कौन है भाई? ये आँख मिचौली सी कैसी खेल रहे हो... सामने आकर बात करो ना.." मानव एक जगह खड़ा खड़ा ही चारों तरफ घूम घूम कर देख रहा था...

"अगर तुम रोहन या नितिन को बचाने के इरादे से आए हो तो सामने आ जाओ! मैं भी सच जान'ना चाहता हूँ... सामने आ जाओ यार!" मानव इस तरह बात कर रहा था जैसे किसी से फोन पर बात कर रहा हो.. बोलते हुए उसकी आँखें सामने दीवार पर ठहरी हुई थी.... उसकी बातों और चेहरे से लग रहा था की उसको 'भूतों' के कॉन्सेप्ट पर यकीन हो चला है...

अगले ही पल उसने बड़ी मुश्किल से खुद को बेहोश होने से रोका... उसकी टेबल पर रखा पेन पहले सरका और फिर हवा में उठ गया.. अगले ही पल पेन टेबल पर इस तरह जाकर खड़ा हो गया मानो किसी ने पेन हाथ में लेकर टेबल पर हाथ रख दिया हो....

आअस्चर्य में मानव पलकें झपकना तक भूल गया.. वह दो कदम पिछे हटा और अपने हाथ अलमारी से चिपका लिया... उसकी आँखें हैरत से फटी जा रही थी.. गला सूख चुका था.... पर बोलती बिल्कुल बंद थी.. अब तो उसके साँस भी गिने जा सकते थे... और दिल की धड़कने भी सुनी जा सकती थी....

कुच्छ पल पेन हवा में ही लहराता रहा.. फिर अचानक उसकी सी.डी. (केस डाइयरी) के पन्ने पलटने लगे... आख़िरकार जब पन्ने पलटने बंद हो गये तो पेन डाइयरी के पन्ने से सटकार खड़ा हो गया... और इस तरह लहराने लगा जैसे पन्ने पर कुच्छ लिखा जा रहा हो....

मानव साँस रोके डाइयरी पर पेन का नृत्या देखता रहा.. आज से पहले उसने कभी सोचा भी नही था कि ऐसा भी कभी देखने को मिल सकता है.. हालाँकि अभी तक उसको किसी तरह की हानि नही हुई थी.. पर फिर भी वह पछ्ता रहा था कि रिवॉल्वर उसने टेबल के ड्रॉयर में ही क्यूँ छ्चोड़ दी.. अगर पेन उठ सकता है तो रिवॉल्वेर भी तो..

अचानक डाइयरी पेन को अपने पन्नों में ही समेटे बंद हो गयी.. कुच्छ ही देर बाद चितकनी नीचे हुई और दरवाजा अपने आप खुल गया...

मानव अभी तक सम्मोहित सा दरवाजे की और देख रहा था कि संतरी भगा भगा आया,"जी जनाब! आपने बुलाया..!"

अब तो मानव संतरी को भी शक की निगाहों से ही घूर रहा था.. ,न..नही तो!"

"ज्जई.. वो आपने दरवाजा खोला, इसीलिए मुझे लगा..." संतरी सिर झुका कर बाहर निकलने लगा....

"अरे सुनो!" मानव ने आवाज़ लगाई...

संतरी झट से सेवा में पुन्ह: हाज़िर हो गया.....

"वो... रोहन को यहीं भेज दो.. मेरे पास!"




क्रमशः .........................














आपका दोस्त राज शर्मा
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj

































































































































































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दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक और नई कहानी लेकर हाजिर हूँ दोस्तो इस कहानी मैं रहस्य रोमांच सेक्स भय सब कुछ है मेरा दावा जब आप इस कहानी को पढ़ेंगे तो आप भी अपने आप को रोमांच से भरा हुआ महसूस करेंगे दोस्तो कल का कोई भरोसा नही.. जिंदगी कयि बार ऐसे अजीब मोड़ लेती है कि सच झूठ और झूठ सच लगने लगता है.. बड़े से बड़ा आस्तिक नास्तिक और बड़े से बड़ा नास्तिक आस्तिक होने को मजबूर हो जाता है.. सिर्फ़ यही क्यूँ, कुच्छ ऐसे हादसे भी जिंदगी में घट जाते है कि आख़िर तक हमें समझ नही आता कि वो सब कैसे हुआ, क्यूँ हुआ. सच कोई नही जान पाता.. कि आख़िर वो सब किसी प्रेतात्मा का किया धरा है, याभगवान का चमत्कार है या फिर किसी 'अपने' की साज़िश... हम सिर्फ़ कल्पना ही करते रहते हैं और आख़िर तक सोचते रहते हैं कि ऐसा हमारे साथ ही क्यूँ हुआ? किसी और के साथ क्यूँ नही.. हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब हम वो हादसे किसी के साथ बाँट भी नही पाते.. क्यूंकी लोग विस्वास नही करेंगे.. और हमें अकेला ही निकलना पड़ता है, अपनी अंजान मंज़िल की तरफ.. मन में उठ रहे उत्सुकता के अग्यात भंवर के पटाक्षेप की खातिर....

रात करीब 2 बजकर 17 मिनिट...... रोहन दरवाजे पर पैरों की आहट सुनकर चौंक गया.. उसकी उम्मीद को पूरी तरह पंख लगे भी ना थे की कमरे में रोशनी च्छा गयी.. हल्की सी नाराज़गी जताती हुई नीरू उसकी आँखों में आँखें डाले उसको घूर रही थी.. हौले हौले चलती हुई वो उसके पैरों के पास आकर उसके पलंग पर बैठ गयी..

"ये कौन है?" नीरू ने झुकते हुए धीरे से नितिन की और इशारा करते हुए पूचछा..

"मेरा दोस्त है.. मेरे भाई जैसा है.. क्यूँ?" रोहन ने भी उसी के अंदाज में जवाब दिया..

"इसको क्यूँ लेकर आए..? मैने अकेले आने को बोला था ना..?" नाराज़गी अब भी नीरू की नाक पर बैठी थी..

"कमाल करती हो? ऐसी ख़तरनाक जगह पर अकेले.. जान लेने का इरादा था क्या?" रोहन ने लेटे लेटे ही जवाब दिया...

"जान तो मैं तुम्हारी लूँगी ही.. एक बार समय आने दो" कहकर नीरू कातिल अदा से मुस्कुराने लगी.. उसकी इसी अदा का तो रोहन दीवाना था," चलो ठीक है.. तुम्हारी ये बात मान लेती हूँ.. इसको लेकर आ जाओ.. पर इसको दूर ही खड़ा कर देना.. मुझे तुमसे ज़रूरी बातें करनी हैं.. जाने कब से तुम्हारे लिए तड़प रही हूँ.. तुम्हे तो अहसास भी नही होगा, मेरी मोहब्बत का.."

"तुम्हारी यही बात मेरी समझ में नही आ रही.. कहती हो मुझसे प्यार करती हो.. पर आज तक कभी छूने की इजाज़त नही दी.. मैं भी तुम्हारे लिए पागल हो चला हूँ.. प्लीज़ एक बार.. एक बार मुझे तुम्हे छू कर महसूस कर लेने दो.. कितनी प्यारी हो तुम.. तुम्हारे लिए मैं यहाँ तक भी आ गया.. एक बार मेरे आगोश में आ जाओ ना.. प्लीज़!" रोहन उसके शरीर से उत्सर्जित हो रही यौवन बयार को अपने अंदर तक महसूस करने को तड़प उठा...

"मैं भी तो उतनी ही तड़प रही हूँ देव! तुम्हे क्या पता, मेरा एक एक पल कैसे बीत'ता है.. उस पल के लिए जब मैं और तुम 'हम' होंगे.. ये फ़ासले कितना तड़पते हैं, मुझसे ज़्यादा कौन समझेगा.. बस इंतज़ार करो... " नीरू की आँखों से उसके लिए बे-इंतहा ज़ज्बात झलक रहे थे...

"कितनी बार बताउ कि मैं रोहन हूँ.. अगर तुम किसी देव के धोखे में मेरे पिछे पड़ी हो तो माफी चाहता हूँ.. पर फिर भी यही कहूँगा कि अब मैं तुम्हारे बिना रह नही पाउन्गा.. तुम्हारे प्यार में जाने.... तुमने मुझे पागल सा कर दिया है.."

"दुनिया के लिए तुम चाहे कुच्छ भी हो.. पर मेरे लिए तो मेरे देव ही हो.. मुझे तुम्हारा यही नाम अच्च्छा लगता है.. मैं तो यही कहूँगी.." आँखों में गहरी प्यास और मादक अहसास लिए नीरू उसकी और टकटकी लगाकर देखती रही...
"तुम मुझे पूरी तरह पागल बना कर ही छ्चोड़ॉगी.. मुझ रोहन को तुम देव कहती हो और अपना नाम नीरू बता रही हो जबकि तुम्हारे पिताजी तुम्हे श्रुति कहते हैं.. मैं क्या समझू और क्या नही.." रोहन नाम के चक्कर से अभी तक भी निकल नही पाया था..

"वहाँ आओगे तो सब समझ आ जाएगा.. अब यहाँ मैं तुम्हे क्या बताउ?" नीरू ने बेबस नज़रों से उसको देखते हुए कहा..

"अजीब लड़की हो.. यहाँ मेरे सामने बैठी हो.. उस वक़्त नज़र उठा कर भी तुमने नही देखा.. और अब ये छ्होटी सी बात बताने के लिए मुझे वहाँ बुला रही हो.. इतनी ख़तरनाक और डरावनी जगह मैने आज तक नही देखी.. पता है.. ?" रोहन के चेहरे पर उस अजीबोगरीब जगह की डरावनी यादों की टीस छा गयी..

"क्या? तुम वहाँ गये थे? पर मैने तुम्हे 12 बजे के बाद आने को कहा था ना.. रुके क्यूँ नही वहाँ पर..." नीरू अधीर होते हुए बोली...

" कैसे रुकते..हम वहाँ गये तो हमें वहाँ एक बच्चा मिला.. इतना खौफनाक मंज़र था कि मेरी तो जान ही निकल गयी होती.. और तुम्हे पता भी है.. वहाँ भूत रहते हैं.. तुम्हारे पिताजी ने ही बताया था.." रोहन ने स्पष्ट किया...

"असमय गुजर चुके लोगों को भूत कहकर उनका मज़ाक ना बनाओ देव.. तुम्हे हम... उनकी पीडाओं का अहसास नही है.. हर पल किस वेदना और दर्द की भत्ति में तपते रहना पड़ता है.. ये तुम्हे क्या मालूम.. तुम तो आज़ाद हो.. कहीं भी आ जा सकते हो.. पर वो हर तरह से एक दायरे में बँधे हैं.. हरपल उसी दर्दनाक मंज़र को आँखों में लिए तड़प्ते रहते हैं.. जिस घड़ी जिंदगी ने बड़ी क्रूरता से उनके सिर से अपना हाथ हटा लिया.. वो हर पल इसी इंतज़ार में रहते हैं कि कब कोई रहनुमा आएगा और उनको वहाँ से, उस जहन्नुम से मुक्ति दिलाएगा.. आ जाओ ना देव.. सिर्फ़ एक बार आ जाओ.. मैं हर पल तुम्हारा इंतजार करती हूँ.. एक बार वहाँ आ जाओ मेरी जान.. मुझे जहन्नुम से निकल कर जन्नत में ले चलो.." नीरू बोलते बोलते भावुक होकर गिदगिडाने सी लगी..

"ऐसे क्यूँ कर रही हो.. मुझसे तुम्हारी ये बेचैनी देखी नही जाती.. पर ऐसा क्या है जो यहाँ नही बता सकती.. वहीं जाना क्यूँ ज़रूरी है नीरू..?"

"वहाँ जाना ज़रूरी नही है देव.. पर मुझे डर है.. मैने यहाँ बता दिया तो तुम वहाँ शायद कभी नही आओगे.." मायूस नीरू की आँखों से आँसू छलक उठे..

"इसका मतलब तुम्हे मेरे प्यार पर भरोसा नही है.. इसका मतलब कुच्छ ऐसा ज़रूर है जो तुम मुझसे छिपा रही हो.. जब तुम मुझ पर विश्वास नही करती तो मैं तुम पर क्यूँ करूँ..?" रोहन बात जान'ने को लालायित लग रहा था..

"तुम्हारे अंदर के देव पर मुझे पूरा विस्वास है.. पर बाहर के रोहन पर नही.. वक़्त जाने कितनी करवटें बदलता है.. इस दरमियाँ जाने तुम कितनी बार बदले होगे.. मैं इसीलिए डर रही हूँ.." नीरू अपना हाथ बढ़कर उसके चेहरे को छूने को हुई पर कुच्छ याद आते ही तुरंत वापस खीच लिया...

"देखो नीरू या श्रुति, तुम जो भी हो.. तुमने अपने प्यार में तो मुझे पागल कर ही दिया है.. अब असलियत में पागल होना नही चाहता.. पहेलियाँ मत बुझाओ.. पर इतना जान लो कि जब तक तुम मुझे सब कुच्छ सच सच नही बताती, मैं वहाँ वापस नही जाउन्गा.. हरगिज़ नही.." रोहन ने दो टुक जवाब दिया..

"ऐसा क्यूँ कह रहे हो देव.. क्या मैं यूँही तड़पति रहूंगी..? तुम मेरी बात समझते क्यूँ नही हो.. आ जाओ ना प्लीज़..." नीरू की हालत दयनीय हो चली थी..
"मैं तो सब समझ रहा हूँ.. अगर समझता नही तो यहाँ तक आता ही क्यूँ.. अच्च्छा चलो.. मैं वादा करता हूँ कि अगर तुम अभी सब कुच्छ बता दोगे तो तुम जहाँ कहोगी, वहाँ आने के लिए तैयार हूँ.."

कुच्छ देर सोचते रहने के बाद नीरू बोली," ये रोहन का वादा है या फिर देव का.."
रोहन झल्ला उठा..," क्या है यार.. देव.. रोहन.. दोनो का वादा रहा.. देव का भी.. और रोहन का भी.. अब तो बता दो..."

"सोच लो.. देव के वादे सूली पर जाकर भी नही टूट'ते.." नीरू को कुच्छ उम्मीद सी बँधी..

"हुम्म.. सोच लिया... वादा रहा.. देव का!" रोहन ने कहते हुए अपना हाथ बढ़ाया पर नीरू की तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना मिली....

नीरू ने लंबी साँस छ्चोड़ते हुए छत की और देखा.. और अचानक ही बोलना शुरू कर दिया..," वो बच्चा.. जिसकी तुम बात कर रहे हो.. मेरा छ्होटा भाई है..

"क्याआ?" रोहन नीरू की इस बात को पचा नही पाया और नींद में ही अंदर तक काँप गया.. हड़बड़ा कर लगभग चीखते हुए वह उठ बैठा.. चीख के साथ ही नितिन एक पल में ही उठ कर पलंग से खड़ा हो गया..," क्या हुआ?"

"ये.. ये लाइट क्यूँ बंद कर दी.. नीरू कहाँ गयी.." रोहन का सिर चकरा रहा था.. बंद आँखों में जहाँ उसको उजाला ही उजाला दिख रहा था.. आँखें खोलते ही.. अंधेरे के सिवा उसको कुच्छ नज़र ना आया.. वहाँ तो पहले से ही अंधेरा था.. उजाला तो सपने में नीरू साथ लेकर आई थी...

"नीरू, यहाँ? साले तू पागल हो गया है क्या? सपना देख रहा था या?" नितिन ने रोहन को कंधे से पकड़ कर हिला दिया...

रोहन ने जैसे तैसे खुद को संभाला," हां भाई.. सपना ही था.. सॉरी.. सो जा.."

"अब थोड़ी बहुत रात बची है.. उसमें तो चैन से सो लेने दे तू.. क्या हो गया है तुझे.. बता ना.. तू खुलकर क्यूँ नही बताता..?" नितिन ने उसके कंधे पर हाथ रख कर प्यार से पूचछा...

"कुच्छ नही यार, सो जा.. सुबह बात करेंगे..!" कहते हुए रोहन मुँह ढक कर लेट गया..

"देख.. कोई बात मन में नही रखनी चाहिए.. गाँठ बन जाती है.. और फिर मुझसे छिपा कर तुझे मिलेगा क्या? बाकी तेरी मर्ज़ी है.. सुबह का इंतजार करूँगा.." नितिन ने कहा और दूसरी और करवट लेकर सो गया...

रोहन की समझ में कुच्छ नही आ रहा था.. पिच्छले करीब 2 महीने से उसकी रातों की नींद और दिन का चैन हराम था.. कारण नीरू ही थी.. हर रात को वो उसके सपनो में आती और दिन भर वो उसके सपनो में खोया रहता.. जिंदगी अचानक कितनी बदल गयी थी उसकी.. हमेशा मस्त कलंदर की तरह जीने वाला रोहन शुरू शुरू में तो इन्न सपनो का आनंद लेता और रात को उसके पास आकर उसको पुकार रही इस हसीना के बारे में दिन भर सोच कर आनंदित होता रहता.. नितिन की बात सच ही थी.. नीरू के जितनी प्यारी लड़की उसने भी आज तक नही देखी थी.. पर जल्द ही ये आनंद बेचैनी में और फिर वो बेचैनी एक अंजाने से लगाव में बदल गयी.. आख़िर यही लड़की रोज उसके सपनो में क्यूँ आती है.. क्या रिश्ता है इस लड़की का उसके साथ.. लड़की का सिर्फ़ सपने में आना भर ही होता तो बात अलग थी.. पर वो तो उसको दोनो के प्यार की दुहाई देती थी.. अपने पास बुलाती थी.. सपने में उसकी आवाज़ यूँ लगती थी जैसे किसी गहरी खाई से बोल रही हो.. रुक रुक कर कही गयी उसकी बातें प्रतिध्वनित होकर बार बार उसके कानों में गूँजती रहती थी.. रात भर.. दिन भर...

अपने मस्त अंदाज का मलिक रोहन दोस्तों में उसके हँसी मज़ाक और लड़कियों को भाव ना देने के कारण हमेशा छाया रहता था.. पर अचानक ही वो गुम्सुम सा रहने लगा.. पूच्छने की कोशिश बहुतों ने की.. पर बताता भी तो क्या बताता रोहन.. अंत में जब उसकी बेचैनी और अपने आपको नीरू कहने वाली लड़की के प्रति उसका लगाव चरम को पार कर गया तो उसने एक बार उसके पास जाने की ठान ली.. पर नीरू की एक शर्त ने उसको नितिन का सहारा लेने पर मजबूर कर दिया.. एक तो सिर्फ़ रात को ही मिल पाने की बेबसी और दूसरा उसके पास आने के लिए बताए गये रास्ते की जियोग्रफी..

नितिन उसके सबसे नज़दीकी दोस्तों में से एक था.. वो अग्यात जगह पर जाने, घूमने फिरने और बीहड़ और दूर दराज के इलाक़ों में जाकर वहाँ के लोगों की दिन चर्या जान'ने का शौकीन था.. इनफॅक्ट, अड्वेंचर उसकी लाइफ का एक हिस्सा था...

रोहन ने नितिन को एक कहानी बनाकर सुनाई.. उसको यकीन था अगर सपने वाली बात उसको बताएगा तो साथ देना तो दूर.. उल्टा दोस्तों मैं उसकी किरकिरी करने में भी कसर नही छ्चोड़ेगा.. उसने नितिन को बताया कि बहुत पहले एक लड़की से वो मिला था और अब उसको पता चला है कि वो लड़की उस'से बे-इंतहा प्यार करती है.. और उसको मिलने के लिए बुला रही है.. पहले पहल तो नितिन ने उसको इन्न खाम-खाँ के चक्करों से दूर रहने की हिदायत देकर सॉफ मना कर दिया.. पर जब उसको काई दीनो तक लगातार रोहन का चेहरा उतरा हुआ दिखाई दिया तो एक दिन उसने खुद ही रोहन को टोक दिया," कहाँ है वो लड़की.. चल मिला लाता हूँ.."

"यार.. उनका घर गाँव से दूर है.. काफ़ी आगे चलकर.. " रोहन इस बात को खा गया कि लड़की ने उसको बताया था कि उसको काफ़ी दूर पैदल चलना पड़ेगा....

"अच्च्छा.. फट'ती है तेरी.. इसीलिए मुझको बोला.. है ना.. नही तो तू मुझे बताता भी नही कि तू मजनू बन गया है आजकल..." नितिन ने मज़ाक किया...

"कुच्छ भी समझ ले यार.. पर मुझे उस'से एक बार मिलकर आना है...!"

"हूंम्म.. चल फिर कल ही चलते हैं..!" नितिन तैयार हो गया उसके साथ जाने को...

और वो कल 'आज रात' ही थी...
---------------------------------------
पर जो कुच्छ भी आज रात को उन्होने देखा.. उसने उसकी व्याकुलता कम करने की बजाय और बढ़ा दी.. खास तौर से तब, जब उसने सपनो में रोज आने वाली लड़की को साक्षात अपनी नज़रों के सामने देखा.. श्रुति के रूप में.. उस वक़्त तक तो टीले से वापस आते हुए वह यही सोच रहा था कि ये सब महज उसके दिमाग़ के फीतूर के अलावा कुच्छ नही था.. पर अब; अब तो वो कतयि ऐसा नही सोच सकता था.. उसके सपनो की रानी यथार्थ बनकर उस'से रूबरू हो चुकी थी.. भले ही उसका अंदाज बेरूख़ा रहा हो.. भले ही उसका नाम श्रुति रहा हो.. कुच्छ ना कुच्छ तो बात ज़रूर है.. वरना इसी गाँव की लड़की उसके सपने में क्यूँ आती...

पर अब.. आज रात के सपने को वो कैसे ले.. कहीं 'नीरू' सच में कोई भूत तो नही.. उसने टीले पर मिलने वाले बच्चे को 'अपना भाई बताया.. चक्कर क्या है.. और फिर भूत तो डराते हैं.. प्यार थोड़े ही करते हैं.. फिर भूत भी माने तो कैसे माने.. लड़की तो उसके सामने थी ही.. रोहन को लग रहा था जैसे वो भी उस लड़की के प्यार में बुरी तरह जकड़ा जा चुका हो.. वो फिर से उसको अपने सपने में लाना चाहता था.. अपने अनगिनत सवालों के जवाब लेने के लिए.. उस'से उसका संबंध क्या है.. ये जान'ने के लिए... इसी उधेड़बुन में वो कब खो गया और कब खुद को नीरू बताने वाली श्रुति फिर उसके सपने में आ गयी उसको पता ही नही चला...

"क्या हो गया था.. तुम चले क्यूँ गये थे, बीच में ही.." नीरू वहीं बैठी थी.. उसके पैरों के पास..

"मैं कहाँ गया था.. चली तो तुम गयी थी.. मेरे सपने से.." रोहन नींद में बड़बड़ाया...

"हां.. मगर सपना तो तुम्हारा ही था ना.. तुमने वो तोड़ दिया.. मुझे जाना पड़ा..!"

"तुम सपने में ही क्यूँ आती हो..? उठकर आ जाओ ना.. बराबर वाले कमरे में ही तो हो..." रोहन ने जवाब दिया...

नीरू ने यहीं पर उसको सब कुच्छ बताने का इरादा कर लिया था.. उसके देव ने वादा जो किया था.. इस जनम में उसका साथ देने का... " समझने की कोशिश करो देव.. मैं वो नही हूँ.. जो तुम समझ रहे हो.. वो तो श्रुति ही है जिसे तुम अपने सामने बैठी देख रहे हो.... मैं देव की प्रियदर्शिनी हूँ.. और इस जनम की तुम्हारी नीरू.."

रोहन किसी तरह अपने आप पर काबू पाए रहा.. उसको सब कुच्छ जान लेना था.. आज ही,"मतलब हमारा पिच्छले जनम का कोई संबंध है?"

"पिच्छले जनम का नही.. पिच्छले कयि जन्मो का.. प्रियादरिशिनी के हर जनम में मैने तुम्हारा इंतजार किया.. पर मैं तुम्हे इसी जनम में ढूँढ सकी.." नीरू ने जवाब दिया..

"पर तुम मुझे पहले भी तो ढूँढ सकती थी.. मतलब पिच्छले जन्मों में.." रोहन ने तर्क दिया...

"हां.. और मैने बहुत ढूँढा भी.. पर मेरी एक सीमा है... हम एक दायरे से बाहर नही निकल सकते.. 2 महीने पहले तुम इस गाँव के पास से गुज़रे.. और मैने तुम्हे पहचान लिया.. तब से मैं इस बात का इंतजार कर रही हूँ कि तुम कब आओगे मेरे पास.. मतलब नीरू के पास.. कब हमारा मिलन होगा.. इसी वजह से मैने इस घर में रहने वाली लड़की का रूप चुराया.. ताकि तुम्हे इसके आकर्षण में बाँध कर अपने पास ला सकूँ... क्यूंकी इस'से सुंदर कोई और लड़की मुझे आसपास दिखाई नही दी.." नीरू लगातार बोल रही थी कि रोहन ने उसको टोक दिया..

"पर अगर तुम आत्मा हो तो हम कैसे मिल सकते हैं.. बताओ.."

"नही मैं आत्मा नही हूँ.. मैं भी जनम ले चुकी हूँ.. कयि बार.. इस बार भी.. नीरू के रूप में.. सिर्फ़ उसका दिल उस लॉकेट में अटक कर वहीं महल में ही रह गया था जो देव ने प्रियदर्शनि को दिया था.. यानी तुमने मुझे.. प्यार की पहली और आख़िरी निशानी के रूप में.."

"ये लॉकेट का क्या चक्कर है?" रोहन ने उसको फिर टोका..

"वो एक लंबी कहानी है.. हमारे प्यार की.. हमारे मिलने की और मिलन पूरा होने से पहले ही हमारी जुदाई की.. कभी फ़ुर्सत में बताउन्गि.." नीरू अब उसका जवाब सुन'ने को उतावली थी...

रोहन को कुच्छ कुच्छ पल्ले पड़ रहा था.. पर बहुत कुच्छ नही," और अब असली नीरू को कौन ढूंढेगा? कहाँ कहाँ भटकू मैं.. और क्यूँ भटकू?"

"तुम्हे भटकने की ज़रूरत नही है.. हर जनम में वो मेरे संपर्क में रही है.. आख़िर मैं भी उसका हिस्सा हूँ.. अमृतसर से 50 किलोमीटर दूर बतला कस्बे में रहती है वो.. गवरमेंट. कॉलेज के आसपास घर है उसका...मुझे इस बात पर गर्व है कि हर जनम में वो अंजाने में ही सही पर कुँवारी ही रही.. तुम्हारे अलावा मैने किसी के बारे में सोचा तक नही देव.. तुम्हारे अलावा मुझे कोई छू भी नही पाया.." नीरू का गला भर आया..

"ओह.. और मैं..?" रोहन को उसकी अजीब मगर मीठी सी कहानी में मज़ा आने लगा था...

"तुम्हारा मुझे नही पता.. और इस जनम की तो तुम खुद ही जान'ते होगे..." नीरू ने उसको प्यार से देखते हुए कहा...

"तो क्या वो मुझे देखते ही पहचान लेगी..?" रोहन के मन में सवालों की झड़ी लगी हुई थी....

"बस यही एक समस्या है.. उसके लिए तुम्हे उसको वहीं लाना होगा.. महल में.." नीरू के चेहरे पर उदासी छा गयी..

"अब ये महल का क्या चक्कर है?" सवालों में से ही इतने सवाल निकल रहे थे कि पुराने सवाल रोहन भूलता जा रहा था...

"जहाँ तुम गये थे.. वहाँ एक पीपल का पेड़ है.. उसके नीचे ही हमारा महल है.. तुम्हे नीरू को वहीं लेकर आना होगा.."

"एक मिनिट.. एक मिनिट.. जो लड़की मुझे जानती नही, पहचानती नही.. उसको मैं कैसे ला सकता हूँ.. और वो भी ऐसी जगह पर जहाँ के बच्चे भी इतने ख़तरनाक हैं.." रोहन का सिर चकरा गया..

"इसका जवाब मेरे पास नही है.. पर अगर तुम उसके दिल में प्यार जगाओगे तो वो आ सकती है.. तुम्हारे साथ.. तुम्हे उसका प्यार भी जीतना होगा और भरोसा भी... ये काम तुम्हे अपने तरीके से करना होगा...."

" मुझे नही पता कि लड़कियों का दिल कैसे जीत'ते हैं.. इस मामले में एकदम अनाड़ी हूँ... तुम ही कुच्छ बताओ!" रोहन की समझ में कुच्छ नही आ रहा था..

"तुम जब देव थे, तब भी ऐसे ही थे.. शर्मीले और झेंपू.. पर तुम्हे कुच्छ ना कुच्छ तो करना ही होगा..." नीरू अपने देव की यादों में खोकर मुस्कुराने लगी....
" सॉरी नीरू.. ये सब मैं नही कर सकता.. किसी अंजान लड़की से मैने आज तक बात भी नही की है.. और तुम उसको यहाँ लाने को कह रही हो.. ये नही हो सकता.. और फिर उसको भी रात को ही लाना होगा.. है ना?"

"हाँ देव.. ये मेरी मजबूरी है.."

"शिट.. नेवेर पासिबल.. ऐसा कभी नही हो सकता.. और फिर तुम ही बताओ.. मैं तुम्हारी बातों पर क्यूँ विस्वास करूँ.. और विस्वास कर भी लूँ तो मैं इतनी बड़ी टेन्षन मोल क्यूँ लूँ..? ये जान'ने के बाद की तुम कोई भटकती हुई आत्मा हो; मेरे दिल में तुम्हारे लिए सहानुभूति के अलावा कुच्छ नही है.. पर फिर भी मैं माफी चाहता हूँ.. मेरी जिंदगी से निकल जाओ.. तुमने मेरी हँसती खेलती जिंदगी बर्बाद कर दी है.. मैं पागल सा हो गया हून.. तुम्हारी बात को सच मान भी लूँ तो मुझे अब कुच्छ याद नही है.. फिर मैं तो किसी भी लड़की से प्यार कर सकता हूँ.. शादी कर सकता हूँ.. सच बोलूं तो मैं सुबह श्रुति के पापा से अपने रिश्ते के बारे में बात करना चाहता हूँ.. मैने अपनी जिंदगी में इसी लड़की के सपने देखे हैं, जिसका चोला पहने अभी तुम मेरे सामने बैठी हो.. मुझे इस'से प्यार हो गया है.. तो क्यूँ ना मैं नीरू के आगे पिछे बेवजह चक्कर लगाने की बजाय श्रुति पर ही डोरे डाल लूँ..? प्लीज़.. मेरा पिच्छा छ्चोड़ दो.. आज के बाद मेरी जिंदगी में मत आना.. मैं तंग आ गया हूँ तुम्हारी बातें सुनकर... मैं और कुच्छ जान'ना नही चाहता.." रोहन ने सीधे और निर्दयी शब्दों में अपनी बात कह दी...

नीरू का चेहरा सफेद पड़ गया.. रोहन को इस बार पाकर भी खो देने के भय और गुस्से के वो काँपने सी लगी," देव.. तुम्हारे वादे का क्या होगा..?" नीरू के मुँह से कहते ही सिसकी सी निकली...

"भाड़ में गया वादा.. आइ डोंट केर.. मुझे मरना नही है अभी.. जीना है.. अपने लिए.. घर वालों के लिए..!"

नीरू खड़ी हो गयी," ठीक है देव.. मैं जा रही हूँ.. आइन्दा कभी नही आउन्गि.. मैने तो ये सोचकर तुम्हे कभी खुद को हाथ भी नही लगाने दिया कि मेरे द्वारा धारण की गयी देह किसी और की है.. उसको हाथ लगवाकर मैं तुम्हे दूषित करके खुद को पाप का भागी नही बनाना चाहती थी.. अगर तुम्हे यही पसंद है तो लो, नोच डालो अभी इसको, कर लो अपनी हवस पूरी..." कहते हुए नीरू ने गुस्से से अपना गले से पकड़ कर अपना कमीज़ खींच कर तार तार कर डाला.. श्रुति बनी नीरू अर्धनग्न अवस्था में नज़रें झुकाए सिसकियाँ ले रही थी..

रोहन की आँखें शर्म से झुक गयी.. उसको यूँ नज़रें झुकाए देख नीरू ने खड़े खड़े ही बोलना शुरू कर दिया," काश तुम्हे अहसास करवा सकती कि तुम क्या थे, काश तुम्हे देव और प्रियदर्शिनी की मोहब्बत से रूबरू करवा पाती.. तुम्हे देव के वादे की कीमत का अहसास होता तो तुम कभी ऐसा ना कहते, जान पर खेल जाते अपनी नीरू को अपने गले से लगाकर उसको कम से कम इस जनम में पूर्ण नारी बनाने के लिए.. बेशक उसके पास प्रियदर्शिनी का दिल नही.. फिर भी उसने देव को किया वादा हर जनम में निभाया है.. बेशक वो तुम्हारा इंतजार नही करती.. पर किसी का भी इंतजार नही करती वो.. इस जनम में भी ऐसे ही जाएगी.. और मेरा क्या है? काश मुझे तुम्हारे दिए गये लॉकेट से भी उतनी ही मोहब्बत ना होती जितनी कि तुमसे है.. तो मेरी आत्मा मेरे दिल को भी साथ लेकर निकल जाती.. यूँ ना तड़प्ता रहना पड़ता मुझे.. जनम जनम तुम्हारे आने के इंतज़ार में... " नीरू ने भरभराते गले से कहा और चुपचाप सिसकियाँ लेती उसके सपने से गायब हो गयी.....
दोस्तो कहानी कैसी चल रही है बताना ना भूलें
कहानी अभी बाकी है फिर मिलेंगे अगले पार्ट के साथ

साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj





























































































































































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