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Tuesday, March 16, 2010

कामुक कहानिया सेक्सी हवेली का सच --२४ लास्ट

राज शर्मा की कामुक कहानिया


सेक्सी हवेली का सच --२४ लास्ट
हेलो दोस्तो ये कहानी का लास्ट पार्ट है मुझे खुशी इस बात की है आप लोगों ने इस कहानी को बहुत पसंद किया . दोस्तो मैने पार्ट -23 मैं आप लोगों से एक सवाल पूछा था की पुरुसोत्तम का कातिल कौन है मुझे बहुत सारे मेल मिले दोस्तो जिन दोस्तों के जवाब सही थे उन्हे जल्दी ही मेरी तरफ से 5 ब्रांड न्यू कहानी मैं पोस्ट करने वाला हूँ
ओक दोस्तो अब आप कहानी का मज़ा लीजिए
थोड़ी देर बाद ख़ान और रूपाली वापिस हवेली में दाखिल हुए. तेज के जाने के बाद रूपाली ने घर पर ताला लगा दिया था. देवधर वापिस शहेर चला गया था और ख़ान उसके साथ वापिस हवेली तक आया था.
रूपाली के दिमाग़ में लाखों बातें एक साथ चल रही थी. वो समझ नही पाई के कैसे उसको ये सब बातें पहले समझ नही आई. कामिनी का यूँ अपने ही घर में चुप चुप रहना. अगर उसके अपने भाई ही उसका फ़ायदा उठाएँ बेचारी अपने ही घर में भीगी बिल्ली की तरह तो रहेगी ही. वो हवेली में मिली लाश. रूपाली को उसी वक़्त समझ जाना चाहिए था के ये लाश किसकी है जब बिंदिया ने उसको भूषण की बीवी के बारे में बताया था. कुलदीप के कमरे में मिली ब्रा, बेसमेंट में रखे बॉक्स में वो कपड़े, सब उस बेचारी के ही थी जिसको मारकर यहाँ दफ़ना गया था. उसको हैरानी थी के उसको तभी शक क्यूँ नही हुआ जब ठाकुर ने ये कहा के उन्हें नही पता के वो लाश किसकी थी. ऐसा कैसे हो सकता है के घर के मलिक को ही ना पता हो के लाश कहाँ से आई. उस वक़्त हवेली के बाहर गार्ड्स होते थे, हवेली के कॉंपाउंड में रात को कुत्ते छ्चोड़ दिए जाते थे तो ये ना मुमकिन था के कोई बाहर का आकर ये काम कर जाता. वो खुद अपनी वासना में इतनी खोई हुई थी के उसको एहसास ही नही हुआ के कितनी आसानी से उसने पायल और बिंदिया को ठाकुर और तेज के बिस्तर पर पहुँचा दिया था.
हवेली के अंदर पहुँच कर उसने बिंदिया और पायल को आवाज़ लगाई पर दोनो कहीं दिखाई नही दे रही थी.
"ये दोनो कहाँ गयी" बैठते हुए रूपाली ने कहा. ख़ान उसके सामने रखी एक कुर्सी पर बैठ गया
"क्या लगता है कौन है आपके पति के खून के पिछे ? तेज?" ख़ान ने कहा तो रूपाली ने इनकार में सर हिलाया
"कामिनी." रूपाली ने कहा तो ख़ान ने हैरानी से उसको तरफ देखा
"कल आपके जाने के बाद इंदर से बात हुई थी मेरी. काफ़ी परेशन थी वो मेरे पति के मरने से पहले और गन उसने इंदर से ली थी" रूपाली ने कहा
"पर मुझे तो कहा गया था के ....." ख़ान ने कल की इंदर की बताई बात को याद करते हुए कहा
"झूठ बोल रहा था. गन उसने कामिनी को दी थी. बाद में बताया मुझे" रूपाली ने आँखें बंद करते हुए कहा
"सोचा नही था के ये सब ऐसे ख़तम होगा. मैं तो तेज पर शक कर रहा था और एक वक़्त पर तो मुझे आप पर भी शक हुआ था. पर कामिनी पर कभी नही" ख़ान ने कहा
"एक बात समझ नही आई" रूपाली ने आँखें खोलते हुए कहा "आपका मेरे पति से क्या रिश्ता था? किस एहसान की बात कर रहे थे?"
"बचपन में इसी गाओं में रहा करता था मैं. मेरे अब्बू यहीं के थे" ख़ान मुस्कुराते हुए बोला "ठाकुर साहब के खेतों में काम करते थे. एक बार ठाकुर साहब खेतों में शिकार कर रहे थे. वो जिस परिंदे पर निशाना लगा रहे थे मुझे उसपर तरस आ गया और मैने शोर मचाकर उसको उड़ा दिया. बस फिर क्या था. ठाकुर को गुस्सा आया और उन्होने बंदूक मेरी तरफ घुमा दी. उस वक़्त आपके पति वहाँ थे. उन्होने बचा लिया वरना उस दिन हो गया था मेरा काम"
रूपाली भी जवाब में मुस्कुराइ
"उसके बाद हम लोगों ने गाओं छ्चोड़ दिया. मैं शहेर में पाला बढ़ा, पोलीस जोइन की और उस बात को भूल गया. जब मेरा यहाँ ट्रान्स्फर हुआ तो मैने सोचा के आपके पति से मिलुगा पर यहाँ आके पता चला के उन्हें मरे तो 10 साल हो चुके हैं" ख़ान ने कहा
"नही शायद उन्हें मरे एक अरसा हो गया था. आज एक नया ही रूप देखा मैने ठाकुर पुरुषोत्तम सिंग का जो मेरे पति का तो बिल्कुल नही था. जो आदमी इस हद तक गिर जाए उसको अपना पति तो नही कह सकती मैं" रूपाली ने कहा "सच कहूँ तो आज इस हवेली के हर आदमी का एक नया चेहरा देखा. मेरी सास का भी"
"आपकी सास का? वो तो मर चुकी हैं ना?" ख़ान ने पुचछा
रूपाली ने अपने पर्स से वो तस्वीर निकली और ख़ान को थमा दी
"सुना है उनका भी कोई चाहने वाला था. यही जो इस तस्वीर में है. ये भी ठाकुर साहब के गुस्से की बलि चढ़ गया था." रूपाली ने फिर आँखें बंद कर ली
"पर चलिए आपको आपके सवालों के जवाब तो मिले" ख़ान अब भी तस्वीर को देख रहा था
"जवाब तो मिल गये पर अब समझ ये नही आ रहा के इन जवाबों के साथ आगे की ज़िंदगी कैसे गुज़रेगी" रूपाली ने फिर आँखें खोलकर ख़ान की तरफ देखा. वो अब भी तस्वीर को घूर रहा था.
"ऐसे क्या देख रहे हैं?" रूपाली ने पुचछा
"ये कामिनी नही है?" ख़ान ने कहा तो रूपाली हस्ने लगी
"मैने भी यही सोचा था पर ये मेरी सास की जवानी की तस्वीर है. कामिनी बिल्कुल उन्ही पर गयी थी" रूपाली बोली
"पता नही क्यूँ ऐसा लग रहा है के मैने इस आदमी कोई भी कहीं देखा है" ख़ान तस्वीर में खड़े आदमी की तरफ इशारा करता हुआ बोला
"इसको मरे तो एक अरसा हो चुका है" रूपाली बोली " और सच कहूँ तो कुच्छ सवाल अब भी ऐसे हैं जिनका जवाब मुझे समझ नही आ रहा"
"जैसे के?" ख़ान ने पुचछा
"जैसे के रात को हवेली में आने वाला आदमी कौन था, जैसे की कामिनी के साथ ट्यूबिवेल पर उस दिन दूसरा आदमी कौन था, जैसे की जो चाबियाँ मुझे हवेली में मिली उनकी असली किसके पास है और एक चाभी सरिता देवी के पास क्यूँ थी जबकि वो कभी खेतों की तरफ जाती ही नही थी" रूपाली ने कहा
ख़ान ने हैरत से उसकी तरफ देखा तो रूपाली को याद आया के वो इस बारे में कुच्छ नही जानता था.
"बताती हूँ" उसने कहना शुरू किया ही था के ख़ान ने उसको हाथ के इशारे से रोक दिया. उसने तस्वीर सामने टेबल पर रखी, जेब से पेन निकाला, तस्वीर में खड़े आदमी के चेहरे पर थोड़ी सी दाढ़ी बनाई, हल्के से नाक ने नीचे बॉल बनाए, सर के बॉल थोड़े लंबे किए और चेहरे पर झुर्रियाँ डाली और तस्वीर रूपाली की तरफ घुमाई.
"पहचानती हैं इसे?" ख़ान ने पुचछा
रूपाली ने तस्वीर की तरफ देखा तो उसके पैरों तले ज़मीन जैसे हिलने लगी. तस्वीर में सरिता देवी के साथ भूषण खड़ा था.
"अब जहाँ तक मेरा ख्याल है सिर्फ़ एक सवाल बाकी रह गया है. कामिनी कहाँ है?" ख़ान ने कहा
"मर चुकी है. हवेली के पिछे जहाँ मेरी बीवी की लाश मिली थी वहीं पास ही उसकी भी लाश दफ़न है" पीछे से आवाज़ आई तो ख़ान और रूपाली दोनो पलते. सामने भूषण खड़ा था.
पर ये भूषण वो नही था जिसे रूपाली ने हमेशा देखा था. सामने एक बुद्धा आदमी तो खड़ा था पर अब उसकी कमर झुकी हुई नही थी, अब वो शकल से बीमार नही लग रहा था और ना ही कमज़ोर. सामने जो भूषण खड़ा था वो सीधा खड़ा था और उसके हाथ में एक गन थी.
"आप यहाँ? ठाकुर साहब के साथ कौन है?" रूपाली ने पुचछा
"कोई नही क्यूंकी अब उसकी ज़रूरत नही. ठाकुर साहब नही रहे. गुज़र गये" भूषण ने कहा
उसके ये कहते ही ख़ान फ़ौरन हरकत में आया. उसका हाथ उसकी गन की तरफ गया ही था के भूषण के हाथ में थमी गन के मुँह ख़ान की तरफ मुड़ा, एक गोली चली और अगले पल रूपाली के कदमों के पास ख़ान की लाश पड़ी थी.
रूपाली चीखने लगी और भूषण खड़ा हुआ उसको देखने लगा. रूपाली को उस वक़्त जो भी नाम याद आया उसने चिल्ला दिया. बिंदिया, पायल, चंदर, तेज, इंदर पर कोई नही आया.
उसने घबराकर चारों तरफ देखा और जब कोई नही दिखा तो उसने फिर भूषण पर नज़र डाली.
"बिंदिया और पायल" भूषण ने बोला "वहाँ किचन में पड़ी हैं. तेज की लाश बाहर कॉंपाउंड में पड़ी है, मेरे कमरे के पास. इंदर खून से सने अपने बिस्तर पर पड़ा है. वो तो बेचारा सोता ही रह गया. सोते सोते दिमाग़ में एक गोली घुसी और नींद हमेशा की नींद में बदल गयी"
भूषण रूपाली की तरफ बढ़ा तो रूपाली पिछे होकर फिर चिल्ल्लाने लगी.
"चिल्लओ" भूषण ने आराम से कहा "ये हवेली इतनी मनहूस है के किसी ने सुन भी लिया तो इस तरफ आएगा नही"
थोड़ी देर चिल्लाने के बाद रूपाली चुप हो गयी
"क्यूँ?" उसने भूषण से पुचछा
"क्यूँ?" भूषण बोला "क्यूंकी तुम अपने आपको झाँसी की रानी समझने लग गयी थी अचानक. मैं ये सब ऐसे नही चाहता था. मैं तो ठाकुर के खानदान को एक एक करके, सड़ सड़के, रिस रिसके मरते हुए देखना चाहता था. बची हुई इज़्ज़त को ख़तम होने के बाद मारना चाहता था. पर तुमने सारा खेल बिगाड़ दिया. क्या ज़रूरत थी वो तस्वीर दुनिया को दिखाते हुए फिरने की?"
"पर क्यूँ?" रूपाली ने सवाल फिर दोहराया
"क्यूंकी बर्बाद किया था मुझे ठाकुर ने. सारी ज़िंदगी मैने एक नौकर बनके गुज़ार दी. प्यार करता था मैं सरिता से और वो मुझसे पर क्यूंकी मैं ग़रीब उनके घर के नौकर का बेटा था इसलिए उसकी शादी मुझसे हो नही सकती थी. हम दोनो भाग जाने के चक्कर में थे के जाने कहाँ से ये शौर्या सिंग बीच में आ गया. ना सरिता कुच्छ कर सकी और ना मैं" भूषण गुस्से से चिल्लाते हुए बोला
"तो वो कहानी जो हॉस्पिटल में सुनाई थी?" रूपाली ने कहा
"झूठ थी. शादी के बाद मैने हार नही मानी. मैं सरिता के बिना ज़िंदा नही रह सकता था इसलिए यहाँ चला आया. पड़ा रहा एक नौकर बनके क्यूंकी यहाँ मुझे वो रोज़ नज़र आ जाती थी" भूषण ने कहा
"तो फिर ये सब क्यूँ?" रूपाली बोली
"2 वजह थी. पहली तो ये के इन्होने मेरी बीवी को मार दिया. सरिता के कहने पर मैने उस बेचारी से शादी की थी ताकि किसी को शक ना हो पर यहाँ लाकर तो मैने जैसे उसे मौत के मुँह में धकेल दिया. इन सबने उसे अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर मारके पिछे ही दफ़ना दिया. जानती हो उसकी गर्दन पर तलवार से वार किसने किया था? तुम्हारे सबसे छ्होटे देवर कुलदीप ने जो उस वक़्त मुश्किल से 18-19 साल का था. और दूसरी वजह थी कामिनी. उसे पता चल गया था के वो मेरी बेटी है और सबको बता देना चाहती थी"
"आपकी बेटी?" रूपाली ने कहा
"हां मेरी बेटी थी वो. पर एक दिन उसने मुझे और सरिता को खेतों में नंगी हालत में देख लिया था और सरिता को उसको मजबूर होते हुए सब बताना पड़ा." भूषण की ये बात सुनते ही रूपाली को जैसे अपने बाकी सवालों के जवाब भी मिल गये.
टुबेवेल्ल पर बिंदिया के पति ने कामिनी और किसी आदमी को नही बल्कि सरिता देवी और भूषण को देखा था. क्यूंकी कामिनी की शकल सरिता देवी से मिलती थी इसलिए दूर से उसको लगा के कामिनी है क्यूंकी इस हालत में होने की उम्मीद एक जवान औरत से ही की जा सकती है, ना के एक जवान बेटी की माँ से. और इसलिए ट्यूबिवेल के कमरे की चाभी उसको सरिता देवी के पास से मिली थी. और यही वजह थी के कामिनी की शकल उसके भाइयों से नही मिलती थी. क्यूंकी वो ठाकुर की औलाद थी ही नही. जहाँ उसके चारों भाई बेहद खूबसूरत थे वहीं वो एक मामूली सी सूरत वाली थी क्यूंकी वो ठाकुर पर नही बल्कि अपनी माँ और घर के नौकर पर गयी थी.
"वो जो आदमी हवेली में रात को आता था" रूपाली ने पुचछा
"झूठ था. मैने तो तुम्हें पहले दिन ही कहा था के तुम्हारे पति की मौत का राज़ इसी हवेली में है. मैं था इस हवेली में पर तुम देख नही सकी. शुरू से मैं तुम्हें वो दिखाता रहा जो तुम देखना चाहती थी."
भूषण बोला

"और कुलदीप?" रूपाली बोली
"उस साले को तो मैने कामिनी से पहले ही मार दिया था. उसकी लाश भी वहीं आस पास है जहाँ मेरी बीवी की लाश मिली थी." भूषण बोला
"कामिनी को आपने मारा था?" रूपाली को यकीन नही हुआ "अपनी बेटी को"
"तो क्या करता. वो खुद अपनी माँ को मारना चाहती थी जिसके लिए वो गन तुम्हारे भाई से लाई थी. ये गन" भूषण गन रूपाली को दिखता हुआ बोला
रूपाली को धीरे धीरे बाकी बात भी समझ आने लगी. रूपाली अपनी माँ के बारे में बात कर रही थी ना की अपने बारे में जब उसने इंदर को ये कहा था के सबको बस जिस्म की भूख मिटानी है क्यूंकी उसने अपनी माँ को घर के नौकर के साथ नंगी हालत में देखा था. तब उसकी माँ ये भूल गयी थी के कौन अपने घर का उसका अपना पति है और कौन एक मामूली नौकर. इसलिए उसने इंदर को कहा था के वो उसके काबिल नही क्यूंकी इंदर एक ठाकुर था और वो एक नौकर की बेटी.
"ठाकुर साहब?" रूपाली ने पुचछा
"अभी अपने हाथों से गला दबाके मारकर आया हूँ. यहाँ इरादा तो तेज को ख़तम करने का था पर पहले कमरे में इंदर मिल गया. तो उसी को निपटा दिया. गोली की आवाज़ से बिंदिया और पायल आई तो उन दोनो को भी मारना पड़ा. अभी मैं तेज को ढूँढ ही रहा था के बाहर से उसकी कार आती हुई दिखाई दी. साले की मौत सही वक़्त पर ले आई थी उसको यहाँ. मैं वही घर का बुद्धा नौकर बनके उसके पास गया, कमर झुकाए हुए और जैसे ही वो करीब आया, एक गोली उसके जिस्म में. खेल ख़तम"
"कुलदीप और कामिनी के बारे में किसी को पता कैसे नही था?" रूपाली जैसे आखरी कुच्छ सवाल पुच्छ रही थी
"क्यूंकी उनको मैने रास्ते में मारा. क्या है के उन दोनो के साथ मैं उन्हें एरपोर्ट तक छ्चोड़ने गया था. गाड़ी का ड्राइवर बनके. मेरा काम था उनको छ्चोड़ना और गाड़ी वापिस लाना. दोनो को रास्ते में ख़तम किया और डिकी में लाश डालकर वापिस हवेली ले आया. रात को दफ़ना दिया" भूषण ने जवाब दिया. वो भी जैसे चाहता था के मारने से पहले रूपाली को सब बता दे.
"पर एक सवाल रहता है जिसने ये सारा बखेड़ा शुरू किया. मेरे पति को क्यूँ मारा?" रूपाली ने कहा
"उस दिन कामिनी सरिता को मारने के इरादे से निकली थी. वो सोच रही थी के जाकर सरिता को मंदिर में ही मारकर आ जाएगी तब जबकि पुरुषोत्तम उसको छ्चोड़के चला जाएगा. मुझे उसके इरादे नेक नही लग रहे थे इसलिए उसपर नज़र रखा हुआ था. वो हवेली से कुच्छ दूर ही गयी थी के मैने उसका पिच्छा करके उसको रास्ते में रोक लिया. उससे बात करते हुए मैने ये गन उसके हाथ से छीन ली और अभी हम बात कर ही रहे थे के पुरुषोत्तम जाने क्यूँ हवेली वापिस आ गया. कामिनी मुझपर चिल्ला रही थी और मेरे हाथ में रेवोल्वेर थी. जाने उसने क्या सोचा पर वो चिल्लाता हुआ मेरी तरफ बढ़ा. मैने गोली मार दी. ये मेरी किस्मत ही थी के उस वक़्त कोई भी नौकर वहाँ से नही गुज़रा वरना घर के सारे नौकर उसी रास्ते से उसी वक़्त घर वापिस जाते थे. पुरुषोत्तम को मारने के बाद मैने कामिनी को डराकर चुप तो कर दिया पर मुझे पता था के वो मुँह खोल देगी इसलिए उसको भी मारना पड़ा."
"अपनी ही बेटी को?" रूपाली ने कहा "प्यार नही था उससे?"
"मुझे सिर्फ़ सरिता से प्यार था" भूषण बोला
"क्या हो रहा है यहाँ?" दरवाज़े की तरफ से आवाज़ आई तो भूषण और रूपाली दोनो पलटे. दरवाज़े पर जय खड़ा था. इससे पहले के वो कुच्छ समझ पाता भूषण का हाथ फिर सीधा हुआ और ऱेवोल्वेर से गोली चली और जय के सीने पर लगी.
जय लड़खदाया और अगले ही पल भूषण की तरफ बढ़ा. भूषण ने फिर फाइयर करने की कोशिश की पर वो पूरी 6 गोलियाँ चला चुका था. गन से फाइयर नही हुआ और जय उस तक पहुँच गया. उसने भूषण को गले से पकड़ा और पिछे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया. पीछे रखे सोफे पर भूषण का पेर फँसा और दोनो नीचे टेबल पर गिरे और फिर ज़मीन पर.
रूपाली खड़ी दोनो की तरफ देख रही थी. भूषण नीचे गिरा हुआ था और जय उसके उपेर पड़ा था. भूषण के सर से खून नदी की तरह बह रहा था जो टेबल पर गिरने की वजह से लगी चोट से था. इसके बाद ना भूषण हिला और ना जय. रूपाली ने झुक कर जय को हिलाने की कोशिश की पर भूषण की चलाई गोली ने देर से सही मगर अपना असर ज़रूर दिखाया था. वो मर चुका था.
रूपाली उठकर खड़ी हो गयी. उसे आस पास 7 लाशें पड़ी थी और इनमें से एक लाश उस आदमी की भी थी जिसने उसके पति को मारा था. वो वहीं नीचे ज़मीन पर बैठ गयी. समझ नही आ रहा था के क्या करे. रात का अंधेरा धीरे धीरे फेलने लगा था.

वोसेक्सी हवेली आज भी वैसे ही सुनसान थी जैसे की वो पिच्छले 10 साल से थी दोस्तो ये सस्पेंस भरी कहानी आपको कैसी लगी
बताना मत भूलना मुझे आपके जबाब का इंतजार रहेगा दोस्तो फिर मिलेंगे एक और नई कहानी के साथ







साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़
`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &
(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !
`·.¸.·´ -- राज




sexi haveli ka such --24
hello dosto ye kahani ka last paart hai mujhe khushi is baat ki hai aap logon ne is kahaani ko bahut pasand kiya . dosto maine paart -23 main aap logon se ek sawaal poocha tha ki purusottam ka kaatil koun hai muje bahut saare mail mile dosto jin doston ke jawaab sahi the unhe jaldi hi meri taraf se 5 braand new kahaani main post karane wala hun
ok dosto ab aap kahaani ka majaa lijiye
Thodi der baad Khan aur Rupali vapis haweli mein daakhil hue. Tej ke jaane ke baad Rupali ne ghar par taala laga diya tha. Devdhar vapis sheher chala gaya tha aur Khan uske saath vapis haweli tak aaya tha.
Rupali ke dimag mein laakhon baaten ek saath chal rahi thi. Vo samajh nahi paayi ke kaise usko ye sab baaten pehle samajh nahi aayi. Payal ka yun apne hi ghar mein chup chup rehna. Agar uske apne bhai hi uska fayda uthayen bechari apne hi ghar mein bheegi billi ki tarah to rahegi hi. Vo haweli mein mili laash. Rupali ko usi waqt samajh jana chahiye tha ke ye laash kiski hai jab Bindiya ne usko Bhushan ki biwi ke baare mein bataya tha. Kuldeep ke kamre mein mili bra, basement mein rakhe box mein vo kapde, sab us bechari ke hi thi jisko markar yahan dafna gaya tha. Usko hairani thi ke usko tabhi shak kyun nahi hua jab thakur ne ye kaha ke unhen nahi pata ke vo laash kiski thi. Aisa kaise ho sakta hai ke ghar ke malik ko hi na pata ho ke laash kahan se aayi. Us waqt haweli ke bahar guards hote the, haweli ke compound mein raat ko kutte chhod diye jaate the to ye na mumkin tha ke koi bahar ka aakar ye kaam kar jata. Vo khud apni vasna mein itni khoyi hui thi ke usko ehsaas hi nahi hua ke kitni aasani se usne Payal aur Bindiya ko thakur aur Tej ke bistar par pahuncha diya tha.
Haweli ke andar pahunch kar usne Bindiya aur Payal ko aawaz lagayi par dono kahin dikhayi nahi de rahi thi.
"Ye dono kahan gayi" Bethte hue Rupali ne kaha. Khan uske saamne rakhi ek kursi par beth gaya
"Kya lagta hai kaun hai aapke pati ke khoon ke pichhe ? Tej?" Khan ne kaha to Rupali ne inkaar mein sar hilaya
"Kamini." Rupali ne kaha to Khan ne hairani se usko taraf dekha
"Kal aapke jaane ke baad Inder se baat hui thi meri. Kaafi pareshan thi vo mere pati ke marne se pehle aur Gun usne Inder se li thi" Rupali ne kaha
"Par mujhe to kaha gaya tha ke ....." Khan ne kal ki Inder ki batayi baat ko yaad karte hue kaha
"Jhooth bol raha tha. Gun usne Kamini ko di thi. Baad mein bataya mujhe" Rupali ne aankhen band karte hue kaha
"Socha nahi tha ke ye sab aise khatam hoga. Main to Tej par shak kar raha tha aur ek waqt par to mujhe aap par bhi shak hua tha. Par Kamini par kabhi nahi" Khan ne kaha
"Ek baat samajh nahi aayi" Rupali ne aankhen kholte hue kaha "Aapka mere pati se kya rishta tha? Kis ehsaan ki baat kar rahe the?"
"Bachpan mein isi gaon mein raha karta tha main. Mere abbu yahin ke the" Khan muskurate hue bola "Thakur sahab ke kheton mein kaam karte the. Ek baar thakur sahab kheton mein shikaar kar rahe the. Vo jis parinde par nishana laga rahe the mujhe uspar taras aa gaya aur maine shor machakar usko uda diya. Bas phir kya tha. Thakur ko gussa aaya aur unhone bandook meri taraf ghuma di. Us waqt aapke pati vahan the. Unhone bacha liya varna us din ho gaya tha mera kaam"
Rupali bhi jawab mein muskurayi
"Uske baad ham logon ne gaon chhod diya. Main sheher mein pala badha, police join ki aur us baat ko bhool gaya. Jab mera yahan transfer hua to maine socha ke aapke pati se miluga par yahan aake pata chala ke unhen mare to 10 saal ho chuke hain" Khan ne kaha
"Nahi shayad unhen mare ek arsa ho gaya tha. Aaj ek naya hi roop dekha main Thakur Purushottam Singh ka jo mere pati ka to bilkul nahi tha. Jo aadmi is hadh tak gir jaaye usko apna pati to nahi keh sakti main" Rupali ne kaha "Sach kahun to aaj is haweli ke har aadmi ka ek naya chehra dekha. Meri saas ka bhi"
"Aapki saas ka? Vo to mar chuki hain na?" Khan ne puchha
Rupali ne apne purse se vo tasveer nikali aur Khan ko thama di
"Suna hai unka bhi koi chahne wala tha. Yahi jo is tasveer mein hai. Ye bhi thakur sahab ke gusse ki bali chadh gaya tha." Rupali ne phir aankhen band kar li
"Par chaliye aapko aapke sawalon ke jawab to mile" Khan ab bhi tasveer ko dekh raha tha
"Jawab to mil gaye par ab samajh ye nahi aa raha ke in jawabon ke saath aage ki zindagi kaise guzregi" Rupali ne phir aankhen kholkar Khan ki taraf dekha. Vo ab bhi tasveer ko ghoor raha tha.
"Aise kya dekh rahe hain?" Rupali ne puchha
"Ye Kamini nahi hai?" Khan ne kaha to Rupali hasne lagi
"Maine bhi yahi socha tha par ye meri saas ki jawani ki tasveer hai. Kamini bilkul unhi par gayi thi" Rupali boli
"Pata nahi kyun aisa lag raha hai ke maine is aadmi koi bhi kahin dekha hai" Khan tasveer mein khade aadmi ki taraf ishara karta hua bola
"Isko mare to ek arsa ho chuka hai" Rupali boli " Aur sach kahun to kuchh sawal ab bhi aise hain jinka jawab mujhe samajh nahi aa raha"
"Jaise ke?" Khan ne puchha
"Jaise ke raat ko haweli mein aane wala aadmi kaun tha, jaise ki Kamini ke saath tubewell par us din doosra aadmi kaun tha, jaise ki jo chaabiyan mujhe haweli mein mili unki asli kiske paas hai aur ek chaabhi Sarita Devi ke paas kyun thi jabki vo kabhi kheton ki taraf jaati hi nahi thi" Rupali ne kaha
Khan ne hairat se uski taraf dekha to Rupali ko yaad aaya ke vo is baare mein kuchh nahi janta tha.
"Batati hoon" Usne kehna shuru kiya hi tha ke Khan ne usko haath ke ishare se rok diya. Usne tasveer saamne table par rakhi, jeb se pen nika, tasveer mein khade aadmi ke chehre par thodi si daadhi banayi, halke se naak ne neeche baal banaye, sar ke baal thode lambe kiye aur chehre par jhurriyan daali aur tasveer Rupapli ki taraf ghumayi.
"Pehchanti hain ise?" Khan ne puchha
Rupali ne tasveer ki taraf dekha to uske pairon tale zameen jaise hilne lagi. Tasveer mein Sarita Devi ke saath Bhushan khada tha.
"Ab jahan tak mera khyaal hai sirf ek sawal baaki reh gaya hai. Kamini kahan hai?" Khan ne kaha
"Mar chuki hai. Haweli ke pichhe jahan meri biwi ki laash mili thi vahin paas hi uski bhi laash dafan hai" Pichhe se aawaz aayi to Khan aur Rupali dono palte. Saamne Bhushan khada tha.
Par ye Bhushan vo nahi tha jise Rupali ne hamesha dekha tha. Saamne ek buddha aadmi to khada tha par ab uski kamar jhuki hui nahi thi, ab vo shakal se bimaar nahi lag raha tha aur na hi kamzor. Saamne jo Bhushan khada tha vo sidha khada tha aur uske haath mein ek gun thi.
"Aap yahan? Thakur sahab ke saath kaun hai?" Rupali ne puchha
"Koi nahi kyunki ab uski zaroorat nahi. Thakur Sahab nahi rahe. Guzar gaye" Bhushan ne kaha
Uske ye kehte hi Khan fauran harkat mein aaya. Uska haath uski gun ki taraf gaya hi tha ke Bhushan ke haath mein thami gun ke munh Khan ki taraf muda, ek goli chali aur agle pal Rupali ke kadmon ke paas Khan ki laash padi thi.
Rupali cheekhne lagi aur Bhushan khada hua usko dekhne laga. Rupali ko us waqt jo bhi naam yaad aaya usne chilla diya. Bindiya, Payal, Chander, Tej, Inder par koi nahi aaya.
Usne ghabrakar charon taraf dekha aur jab koi nahi dikha to usne phir Bhushan par nazar daali.
"Bindiya aur Payal" Bhushan ne bola "Vahan kitchen mein padi hain. Tej ki laash bahar compound mein padi hai, mere kamre ke paas. Inder khoon se saney apne bistar par pada hai. Vo to bechara sota hi reh gaya. Sote sote dimag mein ek goli ghusi aur neend hamesha ki neend mein badal gayi"
Bhushan Rupali ki taraf badha to Rupali pichhe hokar phir chilllane lagi.
"Chillao" Bhushan ne aaram se kaha "Ye haweli itni manhoos hai ke kisi ne sun bhi liya to is taraf aayega nahi"
Thodi der chillane ke baad Rupali chup ho gayi
"Kyun?" Usne Bhushan se puchha
"Kyun?" Bhushan bola "Kyunki tum apne aapko Jhansi ki rani samajhne lag gayi thi achanak. Main ye sab aise nahi chahta tha. Main to thakur ke khandaan ko ek ek karke, sad sadke, ris riske marte hue dekhna chahta tha. Bachi hui izzat ko khatam hone ke baad marna chahta tha. Par tumne saara khel bigad diya. Kya zaroorat thi vo tasveer duniya ko dikhate hue phirne ki?"
"Par kyun?" Rupali ne sawal phir dohraya
"Kyunki barbad kiya tha mujhe thakur ne. Saari zindagi maine ek naukar banke guzaar di. Pyaar karta tha main Sarita se aur vo mujhse par kyunki main gareeb unke ghar ke naukar ka beta tha isliye uski shaadi mujhse ho nahi sakti thi. Ham dono bhaag jaane ke chakkar mein the ke jaane kahan se ye Shaurya Singh beech mein aa gaya. Na Sarita kuchh kar saki aur na main" Bhushan gusse se chillate hue bola
"To vo kahani jo hosiptal mein sunayi thi?" Rupali ne kaha
"Jhooth thi. Shaadi ke baad maine haar nahi maani. Main Sarita ke bina zinda nahi reh sakta tha isliye yahan chala aaya. Pada raha ek naukar banke kyunki yahan mujhe vo roz nazar aa jati thi" Bhushan ne kaha
"To phir ye sab kyun?" Rupali boli
"2 vajah thi. Pehli to ye ke inhone meri biwi ko maar diya. Sarita ke kehne par maine us bechari se shaadi ki thi taaki kisi ko shak na ho par yahan lakar to maine jaise use maut ke munh mein dhakel diya. In sabne use apni hawas ka shikaar banaya aur phir maarke pichhe hi dafna diya. Janti ho uski gardan par talwar se vaar kisne kiya tha? Tumhare sabse chhote dewar Kuldeep ne jo us waqt mushkil se 18-19 saal ka tha. Aur doosri vajah thi Kamini. Use pata chal gaya tha ke vo meri beti hai aur sabko bata dena chahti thi"
"Aapki beti?" Rupali ne kaha
"Haan meri beti thi vo. Par ek din usne mujhe aur Sarita ko kheton mein nangi halat mein dekh liya tha aur Sarita ko usko majboor hote hue sab batana pada." Bhushan ki ye baat sunte hi Rupali ko jaise apne baaki sawalon ke jawab bhi mil gaye.
Tubewell par Bindiya ke pati ne Kamini aur kisi aadmi ko nahi balki Sarita Devi aur Bhushan ko dekha tha. Kyunki Kamini ki shakal Sarita Devi se milti thi isliye door se usko laga ke Kamini hai kyunki is halat mein hone ki ummeed ek jawan aurat se hi ki ja sakti hai, na ke ek jawan beti ki maan se. Aur isliye tubewell ke kamre ki chaabhi usko Sarita Devi ke paas se mili thi. Aur yahi vajah thi ke Kamini ki shakal usko bhaiyon se nahi milti thi. Kyunki vo thakur ki aulad thi hi nahi. Jahan uske charon bhai behad khoobsurat the vahin vo ek mamuli si soorat wali thi kyunki vo thakur par nahi balki apni maan aur ghar ke naukar par gayi thi.
"Vo jo aadmi haweli mein raat ko aata tha" Rupali ne puchha
"Jhooth tha. Maine to tumhein pehle din hi kaha tha ke tumhare pati ki maut ka raaz isi haweli mein hai. Main tha is haweli mein par tum dekh nahi saki. Shuru se main tumhein vo dikhata raha jo tum dekhna chahti thi."
Bhushan bola

"Aur Kuldeep?" Rupali boli
"Us saale ko to maine Kamini se pehle hi maar diya tha. Uski laash bhi vahin aas paas hai jahan meri biwi ki laash mili thi." Bhushan bola
"Kamini ko aapne maara tha?" Rupali ko yakeen nahi hua "Apni beti ko"
"To kya karta. Vo khud apni maan ko marna chahti thi jiske liye vo gun tumhare bhai se laayi thi. Ye gun" Bhushan gun Rupali ko dikhata hua bola
Rupali ko dheere dheere baaki baat bhi samajh aane lagi. Rupali apni maan ke baare mein baat kar rahi thi na ki apne baare mein jab usne Inder ko ye kaha tha ke sabko bas jism ki bhookh mitani hai kyunki usne apni maan ko ghar ke naukar ke saath nangi halat mein dekha tha. Tab uski maan ye bhool gayi thi ke kaun apne ghar ka uska apna pati hai aur kaun ek mamuli naukar. Isliye usne Inder ko kaha tha ke vo uske kaabil nahi kyunki Inder ek thakur tha aur vo ek naukar ki beti.
"Thakur Sahab?" Rupali ne puchha
"Abhi apne haathon se gala dabake maarkar aaya hoon. Yahan irada to Tej ko khatam karne ka tha par pehle kamre mein Inder mil gaya. To usi ko nipta diya. Goli ki aawaz se Bindiya aur Payal aayi to un dono ko bhi maarna pada. Abhi main Tej ko dhoondh hi raha tha ke bahar se uski car aati hui dikhai di. Saale ki maut sahi waqt par le aayi thi usko yahan. Main vahi ghar ka buddha naukar banke uske paas gaya, kamar jhukaye hue aur jaise hi vo kareeb aaya, ek goli uske jism mein. Khel khatam"
"Kuldeep aur Kamini ke baare mein kisi ko pata kaise nahi tha?" Rupali jaise aakhri kuchh sawal puchh rahi thi
"Kyunki unko maine raaste mein maara. Kya hai ke un dono ke saath main unhen airport tak chhodne gaya tha. Gaadi ka driver banke. Mera kaam tha unko chhodna aur gaadi vaapis lana. Dono ko raaste mein khatam kiya aur dicky mein laash daalkar vapis haweli le aaya. Raat ko dafna diya" Bhushan ne jawab diya. Vo bhi jaise chahta tha ke maarne se pehle Rupali ko sab bata de.
"Par ek sawal rehta hai jisne ye saara bakheda shuru kiya. Mere pati ko kyun maara?" Rupali ne kaha
"Us din Kamini Sarita ko marne ke iraade se nikli thi. Vo soch rahi thi ke jaakar Sarita ko mandir mein hi maarkar aa jayegi tab jabki Purushottam usko chhodke chala jayega. Mujhe uske iraade nek nahi lag rahe the isliye uspar nazar rakha hua tha. Vo haweli se kuchh door hi gayi thi ke maine uska pichha karke usko raaste mein rok liya. Usse baat karte hue maine ye gun uske haath se chhin li aur abhi ham baat kar hi rahe the ke Purushottam jaane kyun haweli vapis aa gaya. Kamini mujhpar chilla rahi thi aur mere haath mein revolver thi. Jaane usne kya socha par vo chillata hua meri taraf badha. Main goli maar di. Ye meri kismat hi thi ke us waqt koi bhi naukar vahan se nahi guzra varna ghar ke saare naukar usi raaste se usi waqt ghar vapis jaate the. Purushottam ko maarne ke baad maine Kamini ko darakar chup to kar diya par mujhe pata tha ke vo munh khol degi isliye usko bhi maarna pada."
"Apni hi beti ko?" Rupali ne kaha "Pyaar nahi tha usse?"
"Mujhe sirf Sarita se pyaar tha" Bhushan bola
"Kya ho raha hai yahan?" Darwaze ki taraf se aawaz aayi to Bhushan aur Rupali dono palte. Darwaze par Jai khada tha. Isse pehle ke vo kuchh samajh pata Bhushan ka haath phir sidha hua aur Revolver se goli chali aur Jai ke seene par lagi.
Jai ladkhadaya aur agle hi pal Bhushan ki taraf badha. Bhushan ne phir fire karne ki koshish ki par vo poori 6 goliyan chala chuka tha. Gun se fire nahi hua aur Jai us tak pahunch gaya. Usne Bhushan ko gale se pakda aur pichhe ki taraf dhakelna shuru kar diya. Pichhe rakhe sofe par Bhushan ka per phansa aur dono neeche table par gire aur phir zameen par.
Rupali khadi dono ki taraf dekh rahi thi. Bhushan neeche gira hua tha aur Jai uske uper pada tha. Bhushan ne sar se khoon nadi ki tarah beh raha tha jo table par girne ki vajah se lagi chot se tha. Iske baad na Bhushan hila aur na Jai. Rupali ne jhuk kar Jai ko hilane ki koshish ki par Bhushan ki chalayi goli ne der se sahi magar apna asar zaroor dikhaya tha. Vo mar chuka tha.
Rupali uthkar khadi ho gayi. Use aas paas 7 laashen padi thi aur inmen se ek laash uski aadmi ki bhi thi jisne uske pati ko maara tha. Vo vahin neeche zameen par beth gayi. Samajh nahi aa raha tha ke kya kare. Raat ka andhera dheere dheere phelne laga tha.


Vo haweli aaj bhi vaise hi sunsaan thi jaise ki vo pichhle 10 saal se thi.dosto ye saspence bhari kahani kaisi lagi batana mat bhulana mujhe aapke jabaab ka intjaar rahega
dosto fir milenge ek nai kahani ke saath







साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj

कामुक कहानिया सेक्सी हवेली का सच --23

राज शर्मा की कामुक कहानिया


सेक्सी हवेली का सच --23

अगले दिन इंदर कामिनी की बताई हुई जगह पर खड़ा इंतेज़ार कर रहा था. कामिनी ने 2 बजे आने को कहा था पर 3 दिन बज चुके थे और वो अब तक नही आई थी. कल रात से इंदर का सोच सोचकर दिमाग़ फटा जा रहा था. जान को ख़तरा? अपने अजनबी हो गये? कामिनी की कही कोई बात उसे समझ नही आ रही थी.
जब घड़ी में 3 बज गये तो वो समझ गया के कामिनी नही आएगी. उसने वापिस जाने का फ़ैसला किया और कार स्टार्ट ही की थी के रिव्यू कार में उसे कामिनी की गाड़ी आती हुई दिखाई दी. उसकी जान में जान आई. कामिनी ने उसकी कार के पिछे अपनी कार लाकर रोकी. इंदर अपनी गाड़ी से निकालने ही वाला था के कामिनी खुद अपनी कार से निकलकर जल्दी जल्दी इंदर की गाड़ी की तरफ आई और दरवाज़ा खोलकर अंदर आ गयी.
"गन लाए?" कामिनी ने गाड़ी में बैठते ही पुचछा
"हां लाया हूँ पर मेरी बात सुनो कामिनी" इंदर ने कुच्छ कहना चाहा ही था के कामिनी ने सामने रखी रेवोल्वेर देखी और जल्दी से उठा ली
"अभी कुच्छ कहने या सुनने का वक़्त नही है इंदर. मैं ये गन कुच्छ दिन बाद तुम्हें लौटा दूँगी और तब सब कुच्छ समझा दूँगी" कहकर कामिनी ने अपनी तरफ का दरवाज़ा खोला और इससे पहले के इंदर कुच्छ कह पता या कर पाता वो कार से बाहर निकल गयी. इंदर भी जल्दी से अपनी तरफ का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकला. कामिनी तेज़ कदमों से चलती अपनी कार की तरफ जा रही थी और जब तक के इंदर उस तक पहुँचता, वो कार स्टार्ट कर चुकी थी.
"रूको कामिनी" इंदर भागता हुआ कामिनी की तरफ आया और कार की विंडो पर हाथ रखकर झुका "तुम मेरे साथ ऐसा नही कर सकती. तुम्हें बताना होगा के आख़िर हो क्या रहा है"
कामिनी उसकी तरफ देखकर मुस्कुराइ और इंदर के चेहरे पर प्यार से हाथ फेरा.
"इंदर" उसने मुस्कुराते हुआ कहा "मेरा इंदर"
"मैं हमेशा तुम्हारा हूँ कामिनी पर .... "इंदर ने कुच्छ कहना चाहा ही था के कामिनी ने उसके होंठ पर अपनी अंगुली रख कर उसे चुप करा दिया
"तुम्हें याद है इंदर जब हम पहली बार मिले थे तब मैने तुम्हें एक शेर सुनाया था और मैने कहा था के खुदा ना करे मुझे कभी इसकी आखरी लाइन्स भी तुम्हें कहनी पड़ें?" कामिनी ने पुचछा तो इंदर ने हां में सर हिला दिया
कामिनी खिड़की के थोडा नज़दीक आई और इंदर के गले में हाथ डालकर उसे थोड़ा नज़दीक किया. अगले ही पल दोनो के होंठ मिल गये. कामिनी उसे धीरे धीरे प्यार से चूमने लगी और फिर अपने होंठ इंदर के होंठ से हटाकर उसके कान के पास लाई. अपनी उसी अंदाज़ में फिर वो ऐसे बोली जैसे कोई बहुत बड़े राज़ की बात बता रही हो.


"कुच्छ इस अदा से आप यूँ पहलू-नॅशिन रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे

ये दिन भी देखना फाज़ था तेरी आश्की में,
रोने की हसरत है मगर आँसू नहीं रहे,

जा और कोई सुकून की दुनिया तलाश कर,
मेरे महबूब हम तो तेरे क़ाबिल नहीं रहे"


और इससे पहले के इंदर कुच्छ समझ पाता, कामिनी के कार उसकी आँखो से तेज़ी के साथ दूर होती जा रही थी.
"बस" इंदर ने एक लंबी साँस ली "इतनी ही थी हमारी कहानी. आप पुच्छ रही थी ना के हम कितना करीब आए थे? इतना करीब आए थे हम दीदी"
और इंदर अपना सर अपने हाथों में पकड़कर रोने लगा
"तुमने ये बात किसी से कही क्यूँ नही?" रूपाली ने पुचछा
"मैं क्या कहता? इंदर बोला "जीजाजी का खून होने के बाद अगर मैं किसी से ये कहता के मैने गन कामिनी को दी थी तो सब लोग क्या समझते? और अगर ये कहता के मेरे से गुम हुई है तो सब मेरे बारे में क्या सोचते? बिल्कुल वही सोचते जो इस वक़्त वो इनस्पेक्टर सोच रहा है"
रूपाली थोड़ी देर तक इंदर के सामने चुप बैठी रही. उसे समझ नही आ रहा थे के क्या कहे और इंदर को कैसे संभाले. माहौल को हल्का करने के लिए उसने बात बदलने की सोची
"एक लड़की के इश्क़ में यूँ रो रहे हो और हरकतें कुच्छ और कर रहे हो?" उसने इंदर के सर पर हल्के से थप्पड़ मारा
"क्या मतलब" इंदर ने अपना सर उपेर उठाया
"मैने देखा था बेसमेंट में. तुम्हें और वो कल की छ्छोकरी पायल को
इंदर का मुँह हैरानी से खुला रह गया. वो रूपाली के मुस्कुराते चेहरे को थोड़ी देर तक देखता रहा और फिर खुद शरमाता हुआ हस पड़ा
"आप वहाँ कब आई?"
"जिस तरह से वो पायल टेबल पर लेटी शोर मचा रही थी उससे तो मुझे हैरानी है के पूरा गाओं क्यूँ नही आ गया" रूपाली ने जवाब दिया तो दोनो भाई बहेन हस पड़े
"मैं क्या करता दीदी" इंदर ने कहा "कामिनी जिस तरह से गयी उससे मैं बोखला उठा था. सोचा मैं क्यूँ एक लड़की के इश्क़ में मारा जा रहा हूँ. उसके बाद जो सामने आई मैं नही रुका. पता नही क्या साबित करना चाह रहा था या पता नही दिल ही दिल में शायद कामिनी को दिखाना चाह रहा था के मैं उसके बिना जी सकता हूँ. कमी नही है मेरे पास"
उसके बाद रूपाली और थोड़ी देर इंदर के कमरे में बैठी रही. उसके बाद वो उठकर अपने कमरे में आ गयी. अचानक उसे कामिनी के कमरे में मिली सिगेरेत्टेस की बात याद आई. उसने सोचा के इंदर से पुच्छे के क्या वो कामिनी को सिगेरेत्टेस लाकर देता था? ये सोचकर वो वापिस इंदर के कमरे पर पहुँची तो कमरा अंदर से बंद था. रूपाली ने खोलने की कोशिश की तो कमरे को अंदर से लॉक पाया. वो इंदर का नाम पुकारने ही वाली थी के अंदर से आती पायल की आवाज़ सुनकर उसका हाथ रुक गया. आवाज़ से सॉफ पता चल रहा था के अंदर पायल और इंदर क्या कर रहे हैं.
रूपाली का मुँह हैरत से खुला रह गया. उसे अभी इंदर के कमरे से गये मुश्किल से 15 मिनट ही हुए थे. जो लड़का अभी थोड़ी देर पहले बैठा कामिनी के इश्क़ में आँसू बहा रहा था वो 15 मिनट में ही पायल पर चढ़ा हुआ था. वो भी भरे दिन में. तब जबकि उसकी अपनी बड़ी बहेन और पायल की माँ उसी हवेली में मौजूद थी.
रूपाली वापिस अपने कमरे की और चल पड़ी. इंदर की हरकत से उसे शक़ होने लगा था के जो इंदर ने कामिनी के और अपने बारे में कहानी रूपाली को सुनाई थी, क्या वो सच थी. और अगर सच थी तो कितनी सच थी.

रात ढाल चुकी थी. पिच्छली कुच्छ रातों की तरह ये रात भी अलग नही थी. रूपाली अपने बिस्तर पर पड़ी थी. पूरी तरह नंगी. टांगे फेली हुई, एक हाथ उसकी छाती पर और दूसरा टाँगो के बीच उसकी चूत पर. उसे अपने उपेर हैरत थी के कहाँ कल की एक सीधी सादी घरेलू औरत और कहाँ एक ये औरत जिससे अपने जिस्म की गर्मी एक रात भी नही संभाली जाती थी. उसने अपनी 3 अंगुलिया अपनी चूत में घुसा रखी थी पर जिस्म था के खामोश होने का नाम ही नही ले रहा था. चिढ़कर रूपाली ने अपना हाथ टाँगो के बीच से हटाया और गुस्से में बिस्तर पर ज़ोर से मारा.
रात के तकरीबन 9 बजे तेज वापिस आ गया था. उसने रूपाली या किसी और से कोई बात नही की थी. चुप चाप बस अपने कमरे में चला गया था. काम ख़तम करके बिंदिया को भी रूपाली ने उसके ही कमरे में जाते देखा था. आज की रात रूपाली ऐसा भी नही कर सकती थी के पायल के साथ ही अपने जिस्म की आग भुझाने की कोशिश करे क्यूंकी पायल भी अपने कमरे में नही थी और रूपाली अच्छी तरह जानती थी के इस वक़्त वो इंदर के कमरे में चुद रही होगी.
इस ख्याल से उसका जिस्म और भड़कने लगा. परेशान होकर वो बिस्तर से उठी और नीचे बड़े कमरे में जाकर टीवी देखने का फ़ैसला किया क्यूंकी नींद आँखो से बहुत दूर थी.
सीढ़ियाँ उतरती रूपाली के कदम अचानक से रुक गये. बड़े कमरे में टीवी ऑन था. इस वक़्त कौन देख रहा हो सकता है? टीवी आखरी बार वो खुद ही देख रही थी और उसको अच्छी तरह से याद था के वो टीवी बंद करके गयी थी. सोचती हुई वो सीढ़ियाँ उतरी और जैसे ही बड़े कमरे में आई उसकी आँखें खुली रह गयी.
कमरे में टीवी ऑन था और उसपर कोई गाना चल रहा था. सामने चंदर बैठा हुआ था. गाने में हेरोयिन भीगी हुई सारी में हीरो को रिझाने की कोशिश कर रही थी जो उसके करीब नही आ रहा था. चंदर सामने ज़मीन पर टांगे मोड बैठा था. उसका पाजामा नीचे था और कुर्ता उसने उपेर करके अपने गले में फसाया हुआ था.आँखें टीवी पर गाड़ी हुई और उसका हाथ लंड को पकड़े उपेर नीचे हो रहा था.
रूपाली उसे एक पल वहीं खड़ी देखती रही. चंदर टीवी में इतना खोया हुआ था के उसे रूपाली के आने का आभास ही नही हुआ. रूपाली कभी टीवी की तरफ देखती तो कभी चंदर के हाथ जो उपेर नीचे हो रहा था. रूपाली की आँखों के आगे फिर वो नज़ारा आ गया जब चंदर ने उसको बस्मेंट में बिंदिया समझकर अंधेरे में चोद दिया था. रूपाली की पहले से गीली चूत से जैसे नदी सी बहने लगी. उसका दिल किया के आयेज बढ़कर चंदर का लंड पकड़ ले पर फिर वो खुद ही रुक गयी और उसका दिल खुद से ही सवाल जवाब करने लगा
सवाल : "एक नौकर के साथ?"
जवाब : तो क्या हुआ. भूषण भी तो नौकर ही था. पायल के साथ भी रूपाली सोई थी और पायल भी तो नौकरानी थी.
सवाल : पर वो एक ठकुराइन है
जवाब : तो क्या हुआ. जब उसका भाई घर की नौकरानी को चोद सकता है तो वो क्यूँ नही. और आज से पहले कौन सा उसने इस बारे में सोचा था.
सवाल : और ठाकुर साहब? उनसे तो वो प्यार करती थी.
जवाब : तो क्या हुआ? उस रात रूपाली के कहने पर जब ठाकुर ने पायल को चोदा था तब उन्होने तो ऐसा कुच्छ नही सोचा
सवाल : किसी को पता लगा तो
जवाब : चंदर उससे डरता है. उसकी मज़ाल नही के किसी से कुच्छ कहे. और फिर वो तो गूंगा है. चाहे भी तो कुच्छ कह नही सकता
रूपाली अपने सवाल जवाब में ही उलझी हुई थी के टीवी पर गाना ख़तम हो गया. चंदर का ध्यान टीवी से हटा तो उसको एहसास हो गया के पिछे कोई खड़ा है. पलटा तो रूपाली को देखकर वो डर से काँप उठा. फ़ौरन खड़ा हो गया. उसको इतना भी होश नही रहा के उसका पाजामा नीचे था. बस उसने जल्दी से अपने दोनो हाथ जोड़ दिए.
रूपाली के दिल ने जैसे फ़ैसला कर लिया. वो आगे बढ़ी. उसे करीब आता देख चंदर और भी डर से काँपने लगा. आँखो से आँसू तक गिर पड़े.
रूपाली चुपचाप उसके करीब आई और कुच्छ भी नही कहा. एक पल चंदे की आँखो में देखा और हाथ से उसका लंड पकड़ लिया.


रूपाली का हाथ लंड पर पड़ते ही चंदर उच्छल पड़ा और 2 कदम पिछे को हो गया. रूपाली भी उसके साथ साथी ही आगे को बढ़ी और फिर से चंदर का लंड पकड़ लिया. डर के मारे चंदर का लंड बिल्कुल बैठा हुआ था. रूपाली ने थोड़ी देर पाजामे के उपेर से लंड को सहलाया और फिर धीरे से हाथ चंदर के कुर्ते के अंदर डाल कर उसका लंड पकड़ लिया.
चंदर ने इस बार फिर से पिछे होने की कोशिश की पर रूपाली ने उसका लंड अपनी मुट्ठी में पकड़ रखा था इसलिए पिछे हो नही पाया. वो परेशान नज़र से रूपाली की तरफ देखने लगा. रूपाली ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर अपने दोनो तरफ नज़र घुमाई. उसने चंदर का लंड छ्चोड़ा और उसे अपना पाजामा उपेर करने को कहा. चंदर ने जल्दी से अपना पाजामा उपेर करके बाँध लिया और फिर से अपने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया.
रूपाली ने उसका एक हाथ पकड़ा और उसे लगभग खींचते हुए अपने कमरे में लाई. दरवाज़ा बंद करने के बाद रूपाली चंदर की तरफ बढ़ी ही थी के रुक कर मुस्कुराइ. उसे बिंदिया के कही वो बात याद आ गयी जब उसने ये बताया था के चंदर कह रहा था रात बेसमेंट में मज़ा नही आया. रूपाली चंदर की तरफ बढ़ी और उसको धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया.
चंदर बिस्तर पर गिरते ही दोबारा उठने लगा पर रूपाली ने उसको लेट रहने का इशारा किया. चंदर फिर बिस्तर पर लेट गया.
रूपाली अपनी अलमारी की तरफ बढ़ी और उसमें से अपने चार दुपट्टे निकाल लाई. चंदर अब भी उसको हैरान नज़र से देख रहा था. रूपाली उसके करीब आई और बिस्तर पर चढ़कर उसका कुर्ता उतारने लगी.चंदर ने मना करना चाहा तो उसने उसको घूरके देखा और चंदर ने अपने हाथ उपेर उठा दिया.
कुर्ता उतेर जाने के बाद रूपाली ने इशारे से चंदर को अपने दोनो हाथ उपेर करने को कहा जो उसने कर दिए. रूपाली ने मुस्कुराते हुए उसका एक हाथ पकड़ा और अपने दुपट्टे से उसका हाथ बिस्तर के कोने पर बाँध दिया. यही हाल उसने उसके दूसरे हाथ और फिर उसकी टाँगो का भी किया. अब चंदर बिस्तर पर पूरी तरह से बँधा हुआ पड़ा था.
जब रूपाली को यकीन हो गया के चंदर चाहकर भी नही हिल सकता तो वो उठकर सीधी खड़ी हुई. उसने महसूस किया के चंदर कमरे में नज़र घूमकर कुच्छ ढूँदने की कोशिश कर रहा है. जब रूपाली ने उसकी तरफ देखा तो चंदर ने अपने होंठ हिलाए. आवाज़ तो नही आई पर होंठ पढ़कर रूपाली समझ गयी के वो पुच्छ रहा है के बिंदिया कहाँ है. उसे याद आया के बिंदिया ने चंदर को ये कह रखा है के वो रात को रूपाली के साथ सोती है. रूपाली ने अपने कमरे के बीच के दरवाज़े की तरफ इशारा किया और कहा के बिंदिया उस तरफ दूसरे कमरे में है.
इशारा करके वो उठ खड़ी हुई. बिस्तर पर खड़े खड़े ही उसने अपनी नाइटी उपेर खींची और उतारकर फेंक दी. चंदर उसके नंगे जिस्म को घूरता ही रह गया. बड़ी बड़ी छातिया, भरा हुआ जिस्म, सॉफ की हुई चूत, चंदर की नज़र जैसे रूपाली के जिस्म का एक्स्रे कर रही थी. रूपाली एक पल के लिए यूँ ही बिस्तर पर खड़ी रही और चंदर को अपनी तरफ घूर्ने दिया.
थोड़ी देर बाद वो झुकी और अपनी दोनो चूचियाँ लाकर चंदर के मुँह पर दबा दी. चंदर का पूरा चेहरा उसकी चूचियों के बीच जैसे खो सा गया. रूपाली को इस सब में एक अजीब सा मज़ा आ रहा था. आज से पहले वो जितनी बार भी चुदी थी, वो चुद रही होती थी पर आज ऐसा लगा रहा था जैसे के वो खुद चुड़वा रही है. वो कंट्रोल में है. बिस्तर पर कोई और उसके जिस्म से नही खेल रहा बल्कि वो खुद एक मर्दाना जिस्म से खेल रही है.
चूचियो को थोड़ी देर चंदर के चेहरे पर रगड़ने के बाद वो थोड़ा सा उपेर हुई और अपने निपल्स उसके होंठों पर लगाने लगी. चंदर ने निपल अपने मुँह में लेने के लिए जैसे ही मुँह खोला रूपाली ने अपनी चूची पिछे कर ली. फिर वो बार बार ऐसा ही करती. चूची चंदर के मुँह के करीब लाती और जैसे ही वो निपल मुँह में लेने लगता वो पिछे को हो जाती. चंदर जैसे बोखला सा रहा था. वो चाहकर भी कुच्छ नही कर पा रहा था. उसके दोनो हाथ मज़बूती से बँधे हुए थे.
रूपाली थोडा नीचे खिसकी और अपनी चूचियाँ चंदर के सीने पर रगड़ने लगी. एक हाथ से उसने चंदर के पाजामे को खोलना शुरू किया और खींचकर नीचे कर दिया. चंदर का लंड फिर से खड़ा हो चुका था जिसे रूपाली अपने हाथ में पकड़कर उपेर नीचे करने लगी. रूपाली के हाथ के साथ साथ चंदर की कमर भी उपेर नीचे हो रही थी. रूपाली का दूसरा हाथ खुद उसकी चूत पर था.
जब उससे और बर्दाश्त नही हुआ तो वो उठ खड़ी हुई और चंदर के उपेर आ गयी. एक पल के लिए उसने नीचे होकर लंड चूत में लेने की सोची पर फिर इरादा बदलकर आगे को हुई और ठीक चंदर के चेहरे पर आकर खड़ी हो गयी. चंदर के चेहरा ठीक उसकी टाँगो के बीच था और नज़र रूपाली की चूत पर. रूपाली नीचे हुई और अपनी चूत लाकर चंदर के होंठो पर रख दी.
वो फ़ौरन पहचान गयी के चंदर ने आजसे पहले चूत पर मुँह नही लगाया था और शायद उसको पसंद भी नही था क्यूंकी वो अपना चेहरा इधर उधर करने की कोशिश कर रहा था पर रूपाली की भरी हुई गांद में जैसे उसका पूरा चेहरा दफ़न हो गया था. रूपाली को इसमें एक अलग ही मज़ा सा आ रहा था. उसे महसूस हो रहा था के वो आज जो चाहे कर सकती है, जैसे चाहे अपने जिस्म को ठंडा कर सकती है. उसने अपनी गांद आगे पिछे करनी शुरू की और चूत चंदर के मुँह पर रगड़ने लगी. उसकी साँस भारी हो चली थी और मुँह से आहह आहह की आवाज़ आनी शुरू हो गयी थी.
कुच्छ देर यही खेल खेलने के बाद वो फिर से खड़ी हुई और पिछे होकर फिर से नीचे बैठी पर इस बार उसकी चूत चंदर के मुँह के बजाय उसके लंड पर आई जो बहुत आसानी के साथ अंदर घुसता चला गया. लंड के अंदर जाते ही रूपाली के मुँह से एक लंबी आह निकल गयी. उसे लगा जैसे किसी प्यासे को पानी मिल गया हो. वो कुच्छ देर तक यूँ ही बैठी रही, लंड को चूत में महसूस करती रही, और फिर उपेर नीचे हिलना शुरू कर दिया. चंदर का लंड ठाकुर के लंड के मुक़ाबले कुच्छ भी नही था और रूपाली को इस बात की कमी खल रही थी पर इस वक़्त उसका वो हाल था के जो मिले वो अच्छा. वो किसी पागल की तरह चंदर के उपेर कूदने लगी. वो आगे को झुकती, अपने निपल्स चंदर के मुँह पर रगड़ती तो कभी उसकी चूची पर. लंड का चूत में अंदर बाहर होना बराबर जारी रहा.
थोड़ी देर बाद रूपाली के दिमाग़ में एक ख्याल आया. उसके पति और खुद ठाकुर ने कई बार उसकी गांद मारने की कोशिश की थी पर रूपाली ने करने नही दिया था. चंदर का लंड दोनो के मुक़ाबले छ्होटा था क्यूंकी वो खुद अभी बच्चा था. रूपाली ने कोशिश करने की सोची. वो थोड़ा सा उपेर हुई और लंड चूत से निकालकर हाथ में पकड़ लिया.
चंदर ने उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे पुच्छ रहा हो के हो गया क्या? रूपाली मुस्कुराइ, उसके लंड को अपनी गांद पर रखा और धीरे धीरे नीचे होने की कोशिश करने लगी.
वो नीचे को होती और लंड जैसे ही गांद में जाता उसके जिस्म में दर्द होना शुरू हो जाता और वो फिर उपेर हो जाती. कई जब कई बार कोशिश करने पर भी वो लंड ले नही सकी तो उसने गुस्से में एक लंबी साँस खींची, अपनी आँखें बंद की, लंड गांद पर रखा और नीचे बैठती चली गयी.
दर्द की एक ल़हेर उसके जिस्म में उपेर से नीचे तक दौड़ गयी पर वो रुकी नही. अगले ही पल उसकी गांद नीचे चंदर की जाँघ से मिल गयी और लंड पूरी तरह गांद में समा गया. रूपाली से दर्द बर्दाश्त नही हो रहा था और आँखो से आँसू बह रहे थे. वो अभी रुक कर साँस ही ले रही थी के नीचे से चंदर ने नीचे से कमर झटक कर गांद पर एक धक्का मारा. रूपाली की चीख निकल गयी.

अगले दिन रूपाली की आँख जल्दी खुल गयी. वो अब भी बिस्तर पर नंगी पड़ी थी और गांद में अब तक दर्द हो रहा था. कल रात उसने उस वक़्त तो गांद मारा ली थी क्यूंकी थोड़ी देर बाद मज़ा आने लगा था पर चंदर के जाने के बाद उसका सोना मुश्किल हो गया था. इतना दर्द तो उसे तब भी नही हुआ था जब वो शादी के बाद पहली बार चुदी थी.
वो बिस्तर से उठके नीचे आई और सबसे पहले देवधर को फोन करने की सोची जिसे उसने आज घर आने को कहा.
"मैं बस अभी निकल ही रहा था" देवधर ने कहा
"आप हवेली ना आएँ" रूपाली ने कहा
"जी?" देवधर की समझ ना आया
"आप सीधे जय के घर पहुँचे. मैं दोपहर 12 बजे आपसे वहीं मिलूंगी" रूपाली ने कहा और फोन रख दिया
तेज सुबह सुबह ही कहीं गायब हो गया था और इंदर अब तक सो रहा था. पायल और बिंदिया रूपाली को किचन में मिले.
बिंदया अब भी अपने पुराने कपड़े में ही खड़ी थी जबकि पायल ने रूपाली की दिए हुए कपड़े पहेन रखे थे.
बिंदिया को देखकर रूपाली के दिल में ख्याल आया के उसे भी कुच्छ कपड़े दे दे पर सवाल था के किसके. सोचा तो उसके दिमाग़ में अपनी सास का नाम आया. सरिता देवी के मरने के बाद से उनके कपड़े सब यूँ ही रखे थे.
रूपाली उस कमरे में पहुँची जिस में सरिता देवी ने अपने आखरी कुच्छ दिन गुज़ारे थे. बीमार होने के बाद उन्हें इस कमरे में शिफ्ट कर दिया गया था और उनका सारा समान भी यहीं था. रूपाली कमरे में आई और कपड़े उठा उठाकर देखने लगी
कुच्छ कपड़े पसंद करने के बाद वो कमरे से निकल ही रही थी के उसे वो डिब्बा नज़र आया जिसमें सरिता देवी अपनी दवाई रखा करती थी. कुच्छ गोलियाँ डिब्बे में अब भी थी. अब उनका कुच्छ काम नही था ये सोचकर रूपाली ने डिब्बा उठाया और खोला.
उसमें नीचे एक पेपर मॉड्कर रखा हुआ था और उसपर कुच्छ गोलियाँ रखी हुई थी. रूपाली ने डिब्बा उलटकर दवाइयाँ बिस्तर पर गिराई. गोलियों के साथ ही अंदर रखा वो काग़ज़ भी निकालकर बिस्तर पर गिर पड़ा और तब रूपाली का ध्यान पड़ा के वो असल में एक काग़ज़ नही बल्कि एक तस्वीर थी.
तस्वीर ब्लॅक आंड वाइट थी. उसमें कामिनी एक लड़के के साथ खड़ी हुई थी. लड़का कौन था ये रूपाली पहचान नही सकी पर सबसे ज़्यादा हैरत उसे कामिनी के कपड़ो पर हुई. कामिनी कभी इस तरह के कपड़े नही पेहेन्ति थी और तब रूपाली ने ध्यान से देखा तो उसको एहसास हुआ को वो लड़की कामिनी नही बल्कि खुद सरिता देवी थी. ये उनकी जवानी के दीनो की तस्वीर थी. कामिनी शकल सूरत से बिल्कुल अपनी माँ पर गयी थी इसलिए कोई भी इस तस्वीर को देखकर ये धोखा खा सकता था के तस्वीर में कामिनी खड़ी है.
रूपाली का ध्यान सरिता देवी के साथ खड़े लड़के पर गया. जहाँ तक उसको पता था सरिता देवी का कोई भाई नही था और फोटो में खड़ा लड़का ठाकुर साहब तो बिल्कुल नही थे. लड़का शकल सूरत से खूबसूरत था पर सरिता देवी से हाइट में छ्होटा था. रूपाली ने तस्वीर उठाकर अपने पास रख ली और कमरे से बाहर निकल आई.
बाहर आकर उसने इनस्पेक्टर ख़ान को फोन किया और उसको भी हवेली आने के बजाय जय के घर पर मिलने की हिदायत दी.
इंदर अब तक सो रहा था. रूपाली ने उसे जगाना चाहा पर फिर अपनी सोच बदलकर तैय्यार हुई और खुद ही अकेली कार लेकर निकल पड़ी.
थोड़ी देर बाद वो हॉस्पिटल पहुँची.
ठाकुर अब भी बेहोश थे. भूषण वहीं बेड के पास बैठा हुआ था. रूपाली को देखकर वो खड़ा हुआ.
रूपाली वो तस्वीर अपने साथ लाई थी जो उसे सरिता देवी के कमरे में मिली थी. वो जानती थी के अगर कोई उसको तस्वीर में खड़े लड़के के बारे में बता सकता था तो वो एक भूषण ही था.
रूपाली ने तस्वीर निकालकर भूषण को दिखाई.
"कौन है ये आदमी काका?" उसने भूषण से पुचछा
तस्वीर देखते ही भूषण की आँखें फेल गयी.
"आपको ये कहाँ मिली?" भूषण ने पुचछा
"माँ के कमरे से" रूपाली अपनी सास को माँ कहकर ही बुलाती थी "कौन है ये?"
"था एक बदनसीब" भूषण ने कहा "जिसकी मौत इस हवेली में लिखी थी और उसको यहाँ खींच लाई थी"
"मतलब?" रूपाली ने पुचछा
"ये ठकुराइन के बचपन का दोस्त था. ये लोग साथ में पले बढ़े थे. सरिता देवी इसको अपने भाई की तरह मनती थी पर इसके दिल में शायद कुच्छ और ही था. जब उनकी शादी ठाकुर साहब के साथ हुई तो इसने बड़ा बवाल किया था सुना है पर शादी रोक नही पाया क्यूंकी सरिता देवी खुद ऐसा नही चाहती थी."
"फिर?" रूपाली ने पुचछा
"फिर शादी हो गयी और सब इस बात को भूल गये. ठाकुर साहब को तो इस बात की खबर भी उस दिन लगी जब ये हवेली में आ पहुँचा"
"हवेली?"रूपाली बोली
"हां" भूषण ने कहा "शादी के कोई 1 महीने बाद की बात है. एक दिन ये हवेली के दरवाज़े पर आ खड़ा हुआ और इसकी बदक़िस्मती के सबसे पहले ठाकुर साहब से ही टकरा गया. उनसे गुहार करने लगा के वो ठकुराइन से प्यार करता है और उनके बिना जी नही सकता. और जैसे इसके दिल की मुराद पूरी हो गयी"
रूपाली खामोश खड़ी सुन रही थी
"ठाकुर साहब ने इसे इतना मारा के इसने वहीं दम तोड़ दिया. लोग प्यार में जान देते हैं मैने सुना था पर उस दिन देखा पहली बार था" भूषण ने कहा
रूपाली को अपने कानो पर यकीन नही हो रहा था. उसे समझ नही आ रहा था के क्या कहे और क्या सोचे. उसने अपनी घड़ी पर नज़र डाली. दोपहर होने को थी. उसने फ़ैसला किया के तस्वीर के बारे में बाद में सोचेगी और वहाँ से निकालकर जय के घर की तरफ बढ़ी.
12 बजने में थोड़ी ही देर थी जब रूपाली ने जय के घर के बाहर कार रोकी. देवधर और इनस्पेक्टर ख़ान बाहर ही खड़े उसका इंतेज़ार कर रहे थे.
"यहाँ क्यूँ बुलाया?" ख़ान ने रूपाली को देखते हुए पुचछा
"सोचा के जो मेरा है वो वापिस ले लिया जाए" रूपाली ने कहा तो देवधर और ख़ान दोनो उसकी तरफ हैरानी से देखने लगे
"आप ही ने कहा था ना के मेरे पति की मौत होते ही सब मेरे नाम हो गया था.पवर ऑफ अटर्नी बेकार थी तो मतलब के जय ने जिस हक से ये घर खरीदा वो भी ख़तम था. तो मतलब के ये घर मेरा हुआ?" रूपाली ने कहा तो ख़ान और देवधर दोनो मुस्कुरा दिए और उसके साथ जय के घर के गेट की तरफ बढ़े.
वॉचमन ने बताया के जय घर पर ही था और अंदर जाकर जय को उनके आने की खबर करके आया. कुच्छ देर बाद वो तीनो जय के सामने बैठे थे.
जाई तकरीबन पुरुषोत्तम की ही उमर का था. शकल पर वही ठाकुरों वाली अकड़. बैठा भी ऐसे जैसे कोई राजा अपने महेल में बैठा हो.
रूपाली को हैरत थी के वो कभी जाई से मिली नही थी. वो उसकी शादी से पहले ही अलग घर बनाकर रहने लगा था पर कभी किसी ने उसका ज़िक्र रूपाली के सामने नही किया था और ना ही रूपाली ने उसको अपनी शादी में देखा था जबकि वो उसके पति का सबसे करीबी था. पर इसका दोष उसने खुद को ही दिया. उन दीनो तो उसे अपनी पति तक की खबर नई होती थी, जाई की क्या होती.
"कहिए" उसने रूपाली को देखते हुए पुचछा
"गेट आउट" रूपाली ने उसे देखते हुए कहा
"क्या?" जाई ने ऐसे पुचछा जैसे अँग्रेज़ी समझ ही ना आती हो
"मेरे घर से अभी इसी वक़्त बाहर निकल जाओ" रूपाली ने कहा
"आपके घर से?" जाई ने हस्ते हुए पुचछा
रूपाली ने देवधर की तरफ देखा. देवधर आगे बढ़ा और वो सारी बातें जाई को बताने लगा जो उसने पहले रूपाली को बताया था. धीरे धीरे जाई की समझ आया के रूपाली किस हक से उसके घर को अपना कह रही थी और वो परेशान अपने सामने रखे पेपर्स को देखने लगा.
"और अगर मैं जाने से इनकार कर दूँ तो?" जाई ने पेपर्स एक तरफ करते हुए पुचछा
रूपाली ने खामोशी से इनस्पेक्टर ख़ान की तरफ देखा. वो जानती थी के जाई ऐसा बोल सकता है इसलिए ख़ान को साथ लाई थी
"मैं ये मामला अदालत में ले जाऊँगा. ऐसे कैसे घर आपका हो गया? मैं अपने वकील को बुलाता हूँ" जाई ने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया
"बाहर एक एसटीडी बूथ है. वहाँ से करना. फिलहाल घर से बाहर निकल" ख़ान बीचे में बोल पड़ा
"तमीज़ से बात करो" जाई ख़ान पर चिल्लाते हुए बोला
"ये देखा है?" ख़ान ने अपना हाथ आगे किए "एक कान के नीचे पड़ा ना तो तमीज़ और कमीज़ में फरक समझ नही आएगा तुझे. चल निकल"
जाई चुप हो गया. वो उठकर घर के अंदर की तरफ जाने लगा.
"वहाँ कहाँ जा रहा है?" ख़ान फिर बोला "दरवाज़ा उस तरफ है"
"अपना कुच्छ समान लेने जा रहा हूँ" जाई रुकते हुए बोला
"वो समान भी मेरे पैसो से आया था तो वो भी मेरा हुआ. अब इससे पहले के मैं ये कपड़े जो तुमने पहेन रखे हैं ये भी उतरवा लूँ, निकल जाओ" रूपाली खड़ी होते हुए बोली
"फिलहाल तो जा रहा हूँ पर इतना आसान नही होगा आपके लिए मुझे हराना" जाई ने कहा तो रूपाली मुस्कुराने लगी
"आपको क्या लगता है के ये सब उस नीच ठाकुर का है जो अपने ही भाई को दौलत के लिए मार डाले? जो साले अपने घर की नौकरानी को भी नही छ्चोड़ते?" जाई ने रूपाली के करीब आते हुए कहा.
उसकी इस हरकत पर ख़ान उसकी तरफ बढ़ा पर रूपाली ने उसको हाथ के इशारे से रोक दिया
"क्या मतलब?" उसने जाई से पुचछा "क्या बकवास कर रहे हो?"
"सच कह रहा हूँ" जाई ने कहा "आपको शायद नही पता पर मैने देखा है. वो भूषण की बीवी, उसे ठाकुर के खानदान ने अपनी रखैल बना रखा था. ज़बरदस्ती सुबह शाम रगड़ते थे उसे. ठाकुर, तेज, कुलदीप और खुद आपके पति पुरुषोत्तम सिंग जी"
"भूषण की बीवी?" रूपाली हैरान हुई
"जी हां" तेज बोला "जब उस बेचारी ने जाकर सब कुच्छ भूषण या आपकी सास को बता देने की धमकी दी तो गायब हो गयी और बात ये फेला दी गयी के अपने किसी आशिक़ के साथ भाग गयी"
रूपाली के दिमाग़ की बत्तियाँ जैसे एक एक करके जलने लगी. हवेली में मिली लाश जो कामिनी की नही थी, कुलदीप के कमरे में मिला वो ब्रा. खुद ख़ान भी चुप खड़ा सुन रहा था.
"तुम्हें ये कैसे पता?" रूपाली ने पुचछा
"हवेली में बचपन गुज़ारा है मैने. देखा है सब अपनी आँखो से. जैसे ही वो हवेली में काम करने आई तो सबसे पहले ठाकुर की नज़र उस पर पड़ी तो पहले उन्होने काम किया. फिर उनकी देखा देखी उनके सबसे बड़े बेटे पुरुषोत्तम सिंग जिन्हें दुनिया भगवान राम का अवतार समझती थी उन्होने अपना सिक्का चला दिया बेचारी पर. जब बड़े भाई ने मुँह मार लिया तो बाकी के दोनो कहाँ पिछे रहने वाले थे. मौका मिलते ही तेज और कुलदीप ने फ़ायदा उठा लिया"
रूपाली की आँखों के आगे अंधेरा सा च्चाने लगा.
"बकवास कर रहे हो तुम" उसने जाई से कहा
"सच बोल रहा हूँ मैं. अपनी हवस संभाली नही जाती इन लोगों से, फिर चाहे वो औरत की हो या दौलत की और इसी के चलते पुरुषोत्तम भी मरा. आपसी लड़ाई थी वो इन लोगों की दौलत के पिछे. एक भाई ने दूसरे को मारा है" जाई ने कहा
पर रूपाली का दिमाग़ उस वक़्त दूसरी ही तरफ चल रहा था. उसे इंदर की कही बातें याद आ रही थी जो कामिनी ने उसको कही थी.
"बस जिस्म की आग बुझनी चाहिए. फिर नज़र नही आता के कौन अपने घर का है और कौन ........."
उसे अपने पति का वो रूप याद आया जो वो रोज़ रात को बिस्तर पर देखा करती थी. किस तरह से वो उसको नंगी करते ही इंसान से कुच्छ और ही बन जाता था. उसे याद आया के किस आसानी से बिंदिया तेज के बिस्तर पर पहुँच गयी थी और तेज ने मौका मिलते ही उसको चोद लिया था. उसको याद आया के किस आसानी से उस रात ठाकुर ने उसके सामने ही पायल को चोद लिया था. ज़रा भी नही सोचा था दोनो ने के वो एक मामूली नौकरानी है और वो वहाँ के ठाकुर. पर क्या कोई इतना गिर सकता था के अपनी ही बहेन के साथ? सोचकर रूपाली का दिमाग़ फटने लगा. तो ये वजह थी पायल के गायब होने की. अपने भाई को गोली मारकर छुपति फिर रही थी.
दोस्तो कैसा लगा ये पार्ट अपनी राय देना मत भूलना वैसे भी ये कहानी अब अपने अंत के पास आ चुकी है
दोस्तो दिमाग़ पर ज़ोर दीजिए ओर बताइए पुरूसोत्तम का कातिल कौन है




साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़
`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &
(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !
`·.¸.·´ -- राज





sexi haveli ka such --23

Agle din Inder Kamini ki batayi hui jagah par khada intezaar kar raha tha. Kamini ne 2 baje aane ko kaha tha par 3 din baj chuke the aur vo ab tak nahi aayi thi. Kal raat se Inder ka soch sochkar Dimag phata ja raha tha. Jaan ko khatra? Apne ajnabhi ho gaye? Kamini ki kahi koi baat use samajh nahi aa rahi thi.
Jab ghadi mein 3 baj gaye to vo samajh gaya ke Kamini nahi aayegi. Usne vapis jaane ka faisla kiya aur car start hi ki thi ke review car mein use Kamini ki gaadi aati hui dikhai di. Uski jaan mein jaan aayi. Kamini ne uski car ke pichhe apni car lakar roki. Inder apni gaadi se nikalne hi wala tha ke Kamini khud apni car se nikalkar jaldi jaldi Inder ki gaadi ki taraf aayi aur darwaza kholkar andar aa gayi.
"Gun laaye?" Kamini ne gaadi mein bethte hi puchha
"Haan laaya hoon par meri baat suno Kamini" Inder ne kuchh kehna chaha hi tha ke Kamini ne saamne rakhi revolver dekhi aur jaldi se utha li
"Abhi kuchh kehne ya sunne ka waqt nahi hai Inder. Main ye gun kuchh din baad tumhen lauta doongi aur tab sab kuchh samjha doongi" Kehkar Kamini ne apni taraf ka darwaza khola aur isse pehle ke Inder kuchh keh pata ya kar pata vo car se bahar nikal gayi. Inder bhi jaldi se apni taraf ka darwaza kholkar bahar nikla. Kamini tez kadmon se chalti apni car ki taraf ja rahi thi aur jab tak ke Inder us tak pahunchta, vo car start kar chuki thi.
"Ruko Kamini" Inder bhagta hua Kamini ki taraf aaya aur car ki window par haath rakhkar jhuka "Tum mere saath aisa nahi kar sakti. Tumhen batana hoga ke aakhir ho kya raha hai"
Kamini uski taraf dekhkar muskurayi aur Inder ke chehre par pyaar se haath phera.
"Inder" Usne muskurate hua kaha "Mera Inder"
"Main hamesha tumhara hoon Kamini par .... "Inder ne kuchh kehna chaha hi tha ke Kamini ne uske honth par apni anguli rakh kar use chup kara diya
"Tumhen yaad hai Inder jab ham pehli baar mile the tab maine tumhen ek sher sunaya tha aur maine kaha tha ke khuda na kare mujhe kabhi iski aakhri lines bhi tumhen kehni paden?" Kamini ne puchha to Inder ne haan mein sar hila diya
Kamini khidki ke thoda nazdeek aayi aur Inder ke gale mein haath daalkar use thoda nazdeek kiya. Agle hi pal dono ke honth mil gaye. Kamini use dheere dheere pyaar se choomne lagi aur phir apne honth Inder ke honth se hatakar uske kaan ke paas laayi. Apni usi andaaz mein phir vo aise boli jaise koi bahut bade raaz ki baat bata rahi ho.


"Kuchh is ada se aap yun pehlu-nashin rahe
Jab tak hamare paas rahe ham nahin rahe

Ye din bhi dekhna faz tha teri aashqi mein,
Rone ki hasrat hai magar aansoo nahin rahe,

Ja aur koi sukoon ki duniya talash kar,
Mere mehboob ham to tere qabil nahin rahe"


Aur isse pehle ke Inder kuchh samajh pata, Kamini ke car uski aankho se tezi ke saath door hoti ja rahi thi.
"Bas" Inder ne ek lambi saans li "Itni hi thi hamari kahani. Aap puchh rahi thi na ke ham kitna kareeb aaye the? Itna kareeb aaye the ham Didi"
Aur Inder apna sar apne haathon mein pakadkar rone laga
"Tumne ye baat kisi se kahi kyun nahi?" Rupali ne puchha
"Main kya kehta? Inder bola "Jijaji ka khoon hone ke baad agar main kisi se ye kehta ke maine gun Kamini ko di thi to sab log kya samajhte? Aur agar ye kehta ke mere se gum hui hai to sab mere baare mein kya sochte? Bilkul vahi sochte jo is waqt vo Inspector soch raha hai"
Rupali thodi der tak Inder ke saamne chup bethi rahi. Use samajh nahi aa raha the ke kya kahe aur Inder ko kaise sambhale. Mahaul ko halka karne ke liye usne baat badalne ki sochi
"Ek ladki ke ishq mein yun ro rahe ho aur harkaten kuchh aur kar rahe ho?" Usne Inder ke sar par halke se thappad maara
"Kya matlab" Inder ne apna sar uper uthaya
"Maine dekha tha basement mein. Tumhen aur vo kal ki chhokri Payal ko
Inder ka munh hairani se khula reh gaya. Vo Rupali ke muskurate chehre ko thodi der tak dekhta raha aur phir khud sharmata hua has pada
"Aap vahan kab aayi?"
"Jis tarah se vo Payal table par leti shor macha rahi thi usse to mujhe hairani hai ke poora gaon kyun nahi aa gaya" Rupali ne jawab diya to dono bhai behen has pade
"Main kya karta Didi" Inder ne kaha "Kamini jis tarah se gayi usse main bokhla utha tha. Socha main kyun ek ladki ke ishq mein mara ja raha hoon. Uske baad jo saamne aayi main nahi ruka. Pata nahi kya saabit karna chah raha tha ya pata nahi dil hi dil mein shayad Kamini ko dikhana chah raha tha ke main uske bina jee sakta hoon. Kami nahi hai mere paas"
Uske baad Rupali aur thodi der Inder ke kamre mein bethi rahi. Uske baad vo uthkar apne kamre mein aa gayi. Achanak use Kamini ke kamre mein mili cigerettes ki baat yaad aayi. Usne socha ke Inder se puchhe ke kya vo Kamini ko cigerettes laakar deta tha? Ye sochkar vo vapis Inder ke kamre par pahunchi to kamra ander se band tha. Rupali ne kholne ki koshish ki to kamre ko ander se lock paaya. Vo Inder ka naam pukarne hi wali thi ke andar se aati Payal ki aawaz sunkar uska haath ruk gaya. Aawaz se saaf pata chal raha tha ke andar Payal aur Inder kya kar rahe hain.
Rupali ka munh hairat se khula reh gaya. Use abhi Inder ke kamre se gaye mushkil se 15 mins hi hue the. Jo ladka abhi thodi der pehle betha Kamini ke ishq mein aansu baha raha tha vo 15 mins mein hi Payal par chadha hua tha. Vo bhi bhare din mein. Tab jabki uski apni badi behen aur Payal ki maan usi haweli mein maujood thi.
Rupali vapis apne kamre ki aur chal padi. Inder ki harkat se use shaq hone laga tha ke jo Inder ne Kamini ke aur apne baari mein kahani Rupali ko sunayi thi, kya vo sach thi. Aur agar sach thi to kitni sach thi.

Raat dhal chuki thi. Pichhli kuchh raaton ki tarah ye raat bhi alag nahi thi. Kamini apne bistar par padi thi. Poori tarah nangi. Taange pheli hui, ek haath uski chhatiyon par aur doosra taango ke beech uski choot par. Use apne uper hairat thi ke kahan kal ki ek sidhi saadi gharelu aurat aur kahan ek ye aurat jisse apne jism ki garmi ek raat bhi nahi sambhali jaati thi. Usne apni 3 anguliyan apni choot mein ghusa rakhi thi par jism tha ke khamosh hone ka naam hi nahi le raha tha. Chidhkar Rupali ne apna haath taango ke beech se hataya aur gusse mein bistar par zor se maara.
Raat ke takreeban 9 baje Tej vapis aa gaya tha. Usn Rupali ya kisi aur se koi baat nahi ki thi. Chup chap bas apne kamre mein chala gaya tha. Kaam khatam karke Bindiya ko bhi Rupali ne uske hi kamre mein jaate dekha tha. Aaj ki raat Rupali aisa bhi nahi kar sakti thi ke Payal ke saath hi apne jism ki aag bhujhane ki koshish kare kyunki Payal bhi apne kamre mein nahi thi aur Rupali achhi tarah janti thi ke is waqt vo Inder ke kamre mein chud rahi hogi.
Is khyaal se uska jism aur bhadakne laga. Pareshan hokar vo bistar se uthi aur neeche bade kamre mein jaakar TV dekhne ka faisla kiya kyunki neend aankho se bahut door thi.
Sidhiyan utarti Rupali ke kadam achanak se ruk gaye. Bade kamre mein TV on tha. Is waqt kaun dekh raha ho sakta hai? TV aakhri baar vo khud hi dekh rahi thi aur usko achhi tarah se yaad tha ke vo TV band karke gayi thi. Sochti hui vo sidhiyan utari aur jaise hi bade kamre mein aayi uski aankhen khuli reh gayi.
Kamre mein TV on tha aur uspar koi gaana chal raha tha. Saamne Chander betha hua tha. Gaane mein heroine bheegi hui saree mein hero ko rijhane ki koshish kar rahi thi jo uske kareeb nahi aa raha tha. Chander saamne zameen par taange mode betha tha. Uska pajama neeche tha aur kurta usne uper karke apne gale mein phasaya hua tha.Aankhen TV par gadi hui aur uska haath lund ko pakde uper neeche ho raha tha.
Rupali use ek pal vahin khadi dekhti rahi. Chander TV mein itna khoya hua tha ke use Rupali ke aane ka aabhas hi nahi hua. Rupali kabhi TV ki taraf dekhti to kabhi Chander ke haath jo uper neeche ho raha tha. Rupali ki aankhon ke aage phir vo nazara aa gaya jab Chander ne usko basment mein Bindiya samajhkar andhere mein chod diya tha. Rupali ki pehle se geeli choot se jaise nadi si behne lagi. Uska dil kiya ke aage badhkar Chander ka lund pakad le par phir vo khud hi ruk gayi aur uska dil khud se hi sawal jawab karne laga
Sawal : "Ek naukar ke saaath?"
Jawab : To kya hua. Bhushan bhi to naukar hi tha. Payal ke saath bhi Rupali soyi thi aur Payal bhi to naukrani thi.
Sawal : Par vo ek thakurain hai
Jawab : To kya hua. Jab uska bhai ghar ki naukrani ko chod sakta hai to vo kyun nahi. aur aaj se pehle kaun sa usne is baare mein socha tha.
Sawal : Aur thakur sahab? Unse to vo pyaar karti thi.
Jawab : To kya hua? Us raat Rupali ke kehne par jab thakur ne Payal ko choda tha tab unhone to aisa kuchh nahi socha
Sawal : Kisi ko pata laga to
Jawab : Chander usse darta hai. Uski majal nahi ke kisi se kuchh kahe. Aur phir vo to goonga hai. Chahe bhi to kuchh keh nahi sakta
Rupali apne sawal jawab mein hi uljhi hui thi ke TV par gaana khatam ho gaya. Chander ka dhyaan TV se hata to usko ehsaas ho gaya ke pichhe koi khada hai. Palta to Rupali ko dekhkar vo darr se kaanp utha. Fauran khada ho gaya. Usko itna bhi hosh nahi raha ke uska pajama neeche tha. Bas usne jaldi se apne dono haath jod diye.
Rupali ke dil ne jaise faisla kar liya. Vo aage badhi. Use kareeb aata dekh Chander aur bhi darr se kaanpne laga. Aankho se aansu tak gir pade.
Rupali chupchap uske kareeb aayi aur kuchh bhi nahi kaha. Ek pal Chande ki aankho mein dekha aur haath se uska lund pakad liya.


Rupali ka haath lund par padte hi Chander uchhal pada aur 2 kadam pichhe ko ho gaya. Rupali bhi uske saath saathi hi aage ko badhi aur phir se Chander ka lund pakad liya. Darr ke maare Chander ka lund bilkul betha hua tha. Rupali ne thodi der pajame ke uper se lund ko sehlaya aur phir dheere se haath Chander ke kurte ke andar daal kar uska lund pakad liya.
Chander ne is baar phir se pichhe hone ki koshish ki par Rupali ne uska lund apni mutthi mein pakad rakha tha isliye pichhe ho nahi paya. Vo pareshan nazar se Rupali ki taraf dekhne laga. Rupali ne ek baar uski taraf dekha aur phir apne dono taraf nazar ghumayi. Usne Chander ka lund chhoda aur use apna Pajama uper karne ko kaha. Chander ne jaldi se apna pajama uper karke bandh liya aur phir se apne haath jodkar khada ho gaya.
Rupali ne uska ek haath pakda aur use lagbhagh khinchte hue apne kamre mein laayi. Darwaza band karne ke baad Rupali Chander ki taraf badhi hi thi ke ruk kar muskurayi. Use Bindiya ke kahi vo baat yaad aa gayi jab usne ye bataya tha ke Chander keh raha tha raat basement mein maza nahi aaya. Rupali Chander ki taraf badhi aur usko dhakka dekar bistar par gira diya.
Chander bistar par girte hi dobara uthne laga par Rupali ne usko lete rehne ka ishara kiya. Chander phir bistar par let gaya.
Rupali apni almari ki taraf badhi aur usmen se apne char dupatte nikal laayi. Chander ab bhi usko hairan nazar se dekh raha tha. Rupali uske kareeb aayi aur bistar par chadhkar uska kurta utarne lagi.Chander ne mana karna chaha to usne usko ghoorke dekha aur Chander ne apne haath uper utha diya.
Kurta uter jaane ke baad Rupali ne ishare se Chander ko apne dono haath uper karne ko kaha jo usne kar diye. Rupali ne muskurate hue uska ek haath pakda aur apne dupatte se uska haat bistar ke kone par baandh diya. Yahi haal usne uske doosre haath aur phir uski taango ka bhi kiya. Ab Chander bistar par poori tarah se bandha hua pada tha.
Jab Rupali ko yakeen ho gaya ke Chander chahkar bhi nahi hil sakta to vo uthkar sidhi khadi hui. Usne mehsoos kiya ke Chander kamre mein nazar ghumakar kuchh dhoondne ki koshish kar raha hai. Jab Rupali ne uski taraf dekha to Chander ne apne honth hilaye. Aawaz to nahi aayi par honth padhkar Rupali samajh gayi ke vo puchh raha hai ke Bindiya kahan hai. Use yaad aaya ke Bindiya ne Chander ko ye keh rakha hai ke vo raat ko Rupali ke saath soti hai. Rupali ne apne kamre ke beech ke darwaze ki taraf ishara kiya aur kaha ke Bindiya us taraf doosre kamre mein hai.
Ishara karke vo uth khadi hui. Bistar par khade khade hi usne apni nighty uper khinchi aur utarkar phenk di. Chander uske nange jism ko ghoorta hi reh gaya. Badi badi chhatiyan, bhara hua jism, saaf ki hui choot, Chander ki nazar jaise Rupali ke jism ka xray kar rahi thi. Rupali ek pal ke liye yun hi bistar par khadi rahi aur Tej ko apni taraf ghoorne diya.
Thodi der baad vo jhuki aur apni dono chhatiyan laaka Chande ke munh par daba di. Chander ka poora chehra uski chhatiyon ke beech jaise kho sa gaya. Rupali ko is sab mein ek ajeeb sa maza aa raha tha. Aaj se pehle vo jitni baar bhi chudi thi, vo chud rahi hoti thi par aaj aisa laga raha tha jaise ke vo khud chudwa rahi hai. Vo control mein hai. Bistar par koi aur uske jism se nahi khel raja balki vo khud ek mardana jism se khel rahi hai.
Chhatiyon ko thodi der Chander ke chehre par ragadne ke baad vo thoda sa uper hui aur apne nipples uske honthon par lagane lagi. Chander ne nipple apne munh mein lene ke liye jaise hi munh khola Rupali ne apni chhati pichhe kar li. Phir vo baar baar aisa hi karti. Chhati Chander ke munh ke kareeb laati aur jaise hi vo nipple munh mein lene lagta vo pichhe ko ho jaati. Chander jaise bokhla sa raha tha. Vo chahkar bhi kuchh nahi kar pa raha tha. Uske dono haath mazbooti se bandhe hue the.
Rupali thoda neeche khiski aur apni chhatiyan Chander ke seene par ragadne lagi. Ek haat se usne Chander ke pajame ko kholna shuru kiya aur khinchkar neeche kar diya. Chander ka lund phir se khada ho chuka tha jise Rupali apne haath mein pakadkar uper neeche karne lagi. Rupali ke haath ke saath saath Chander ki kamar bhi uper neeche ho rahi thi. Rupali ka doosra haath khud uski choot par tha.
Jab usse aur bardasht nahi hua to vo uth khadi hui aur Chander ke uper aa gayi. Ek pal ke liye usne neeche hokar lund choot mein lene ki sochi par phir irada badalkar aage ko hui aur theek Chander ke chehre par aakar khadi ho gayi. Chander ke chehra theek uski taango ke beech tha aur nazar Rupali ki choot par. Rupali neeche hui aur apni choot lakar Chander ke hontho par rakh di.
Vo fauran pehchaan gayi ke Chander ne aajse pehle choot par munh nahi lagaya tha aur shayad usko pasand bhi nahi tha kyunki vo apna chehra idhar udhar karne ki koshish kar raha tha par Rupali ki bhari hui gaand mein jaise uska poora chehra dafan ho gaya tha. Rupali ko ismein ek alag hi maza sa aa raha tha. Use mehsoos ho raha tha ke vo aaj jo chahe kar sakti hai, jaise chahe apne jism ko thanda kar sakti hai. Usne apni gaand aage pichhe karni shuru ki aur choot Chander ke munh par ragadne lagi. Uski saans bhaari ho chali thi aur munh se aahh aahh ki aawaz aani shuru ho gayi thi.
Kuchh der yahi khel khelne ke baad vo phir se khadi hui aur pichhe hokar phir se neeche bethi par is baar uski choot Chander ke munh ke bajay uske lund par aayi jo bahut aasani ke saath andar ghusta chala gaya. Lund ke andar jaate hi Rupali ke munh se ek lambhi aah nikal gayi. Use laga jaise kisi pyaase ko paani mil gaya ho. Vo kuchh der tak yun hi bethi rahi, lund ko choot mein mehsoos karti rahi, aur phir uper neeche hilna shuru kar diya. Chander ka lund Thakur ke lund ke muqable kuchh bhi nahi tha aur Rupali ko is baat ki kami khal rahi thi par is waqt uska vo haal tha ke jo mile vo achha. Vo kisi pagal ki tarah Chander ke uper koodne lagi. Vo aage ko jhukti, apne nipples Chander ke munh par ragadti to kabhi uski chhati par. Lund ka choot mein andar bahar hona barabar jaari raha.
Thodi der baad Rupali ke dimag mein ek khyaal aaya. Uske pati aur khud thakur ne kai baar uski gaand maarne ki koshish ki thi par Rupali ne karne nahi diya tha. Chander ka lund dono ke muqable chhota tha kyunki vo khud abhi bachcha tha. Rupali ne koshish karne ki sochi. Vo thoda sa uper hui aur lund choot se nikalkar haath mein pakad liya.
Chander ne uski taraf aise dekha jaise puchh raha ho ke ho gaya kya? Rupali muskurayi, uske lund ko apni gaand par rakha aur dheere dheere neeche hone ki koshish karne lagi.
Vo neeche ko hoti aur lund jaise hi gaand mein jaata uske jism mein dard hona shuru ho jaata aur vo phir uper ho jaati. Kai Jab kai baar koshish karne par bhi vo lund le nahi saki to usne gusse mein ek lambi saans khinchi, apni aankhen band ki, lund gaand par rakha aur neeche bethti chali gayi.
Dard ki ek leher uske jism mein uper se neeche tak daud gayi par vo ruki nahi. Agle hi pal uski gaand neeche Chander ki jaangh se mil gayi aur lund poori tarah gaand mein sama gaya. Rupali se dard bardasht nahi ho raha tha aur aankho se aansu beh rahe the. Vo abhi ruk kar saans hi le rahi thi ke neeche se Chander ne neeche se kamar jhatak kar gaand par ek dhakka maara. Rupali ki cheekh nikal gayi.

Agle din Rupali ki aankh jaldi khul gayi. Vo ab bhi bistar par nangi padi thi aur gaand mein ab tak dard ho raha tha. Kal raat usne us waqt to gaand mara li thi kyunki thodi der baad maza aane laga tha par Chander ke jaane ke baad uska sona mushkil ho gaya tha. Itna dard to use tab bhi nahi hua tha jab vo shaadi ke baad pehli baar chudi thi.
Vo bistar se uthke neeche aayi aur sabse pehle Devdhar ko phone karne ki sochi jise usne aaj ghar aane ko kaha.
"Main bas abhi nikal hi raha tha" Devdhar ne kaha
"Aap haweli na aayen" Rupali ne kaha
"Ji?" Devdhar ki samajh na aaya
"Aap sidhe Jai ke ghar pahunche. Main dopahar 12 baje aapse vahin milungi" Rupali ne kaha aur phone rakh diya
Tej subah subah hi kahin gayab ho gaya tha aur Inder ab tak so raha tha. Payal aur Bindiya Rupali ko kitchen mein mile.
Bindya ab bhi apne purane kapde mein hi khadi thi jabki Payal ne Rupali ki diye hue kapde pehen rakhe the.
Bindiya ko dekhkar Rupali ke dil mein khyaal aaya ke use bhi kuchh kapde de de par sawal tha ke kiske. Socha to uske dimag mein apni saas ka naam aaya. Sarita Devi ke marne ke baad se unke kapde sab yun hi rakhe the.
Rupali us kamre mein pahunchi jis mein Sarita Devi ne apne aakhri kuchh din guzare the. Bimar hone ke baad unhen is kamre mein shift kar diya gaya tha aur unka saara saman bhi yahin tha. Rupali kamre mein aayi aur kapde utha uthakar dekhne lagi
Kuchh kapde pasand karne ke baad vo kamre se nikal hi rahi thi ke use vo dibba nazar aaya jismein Sarita Devi apni dawai rakha karti thi. Kuchh goliyan dibbe mein ab bhi thi. Ab unka kuchh kaam nahi tha ye sochkar Rupali ne dibbar uthaya aur khola.
Usmen neeche ek paper modkar rakha hua tha aur uspar kuchh goliyaan rakhi hui thi. Rupali ne dibba ulatkar dawaiyan bistar par girayi. Goliyon ke saath hi andar rakha vo kagaz bhi nikalkar bistar par gir pada aur tab Rupali ka dhyaan pada ke vo asal mein ek kagaz nahi balki ek tasveer thi.
Tasveer black and white thi. Usmen Kamini ek ladke ke saath khadi hui thi. Ladka kaun tha ye Rupali pehchaan nahi saki par sabse zyada hairat use Kamini ke kapdo par hui. Kamini kabhi is tarah ke kapde nahi pehenti thi aur tab Rupali ne dhyaan se dekha to usko ehsaas hua ko vo ladki Kamini nahi balki khud Sarita Devi thi. Ye unki jawani ke dino ki tasveer thi. Kamini shakal soorat se bilkul apni maan par gayi thi isliye koi bhi is tasveer ko dekhkar ye dhokha kha sakta tha ke tasveer mein Kamini khadi hai.
Rupali ka dhyaan Sarita Devi ke saath khade ladke par gaya. Jahan tak usko pata tha Sarita Devi ka koi bhai nahi tha aur photo mein khada ladka Thakur Sahab to bilkul nahi the. Ladka shakal soorat se khoobsurat tha par Sarita Devi se height mein chhota tha. Rupali ne tasveer uthakar apne paas rakh li aur kamre se bahar nikal aayi.
Bahar aakar usne Inspector Khan ko phone kiya aur usko bhi Haweli aane ke bajay Jai ke ghar par milne ki hidayat di.
Inder ab tak so raha tha. Rupali ne use jagana chaha par phir apni soch badalkar taiyyar hui aur khud hi akeli car lekar nikal padi.
Thodi der baad vo hospital pahunchi.
Thakur ab bhi behosh the. Bhushan vahin bed ke paas betha hua tha. Rupali ko dekhkar vo khada hua.
Rupali vo tasveer apne saath laayi thi jo use Sarita Devi ke kamre mein mili thi. Vo janti thi ke agar koi usko tasveer mein khade ladke ke baare mein bata sakta tha to vo ek Bhushan hi tha.
Rupali ne tasveer nikalkar Bhushan ko dikhayi.
"Kaun hai ye aadmi Kaka?" Usne Bhushan se puchha
Tasveer dekhte hi Bhushan ki aankhen phel gayi.
"Aapko ye kahan mili?" Bhushan ne puchha
"Maan ke kamre se" Rupali apni saas ko maan kehkar hi bulati thi "Kaun hai ye?"
"Tha ek badnaseeb" Bhushan ne kaha "Jiski maut is haweli mein likhi thi aur usko yahan khinch laayi thi"
"Matlab?" Rupali ne puchha
"Ye thakurain ke bachpan ka dost tha. Ye log saath mein pale badhe the. Sarita Devi isko apne bhai ki tarah manti thi par iske dil mein shayad kuchh aur hi tha. Jab unki shaadi Thakur Sahab ke saath hui to isne bada bawal kiya tha suna hai par shaadi rok nahi paya kyunki Sarita Devi khud aisa nahi chahti thi."
"Phir?" Rupali ne puchha
"Phir shaadi ho gayi aur sab is baat ko bhool gaye. Thakur sahab ko to is baat ki khabar bhi us din lagi jab ye haweli mein aa pahuncha"
"Haweli?"Rupali boli
"Haan" Bhushan ne kaha "Shaadi ke koi 1 mahine baad ki baat hai. Ek din ye haweli ke darwaze par aa khada hua aur iski badkismati ke sabse pehle thakur sahab se hi takra gaya. Unse guhaar karne laga ke vo thakurain se pyaar karta hai aur unke bina jee nahi sakta. Aur jaise iske dil ki muraad poori ho gayi"
Rupali khamosh khadi sun rahi thi
"Thakur sahab ne ise itna mara ke isne vahin dam tod diya. Log pyaar mein jaan dete hain maine suna tha par us din dekha pehli baar tha" Bhushan ne kaha
Rupali ko apne kaano par yakeen nahi ho raha tha. Use samajh nahi aa raha tha ke kya kahe aur kya soche. Usne apni ghadi par nazar daali. Dopahar hone ko thi. Usne faisla kiya ke tasveer ke baare mein baad mein sochegi aur vahan se nikalkar Jai ke ghar ki taraf badhi.
12 bajne mein thodi hi der thi jab Rupali ne Jai ke ghar ke bahar car roki. Devdhar aur Inspector Khan bahar hi khade uska intezaar kar rahe the.
"Yahan kyun bulaya?" Khan ne Rupali ko dekhte hue puchha
"Socha ke jo mera hai vo vapis le liya jaaye" Rupali ne kaha to Devdhar aur Khan dono uski taraf hairani se dekhne lage
"Aap hi ne kaha tha na ke mere pati ki maut hote hi sab mere naam ho gaya tha.Power of Attorney bekaar thi to matlab ke Jai ne jis hak se ye ghar kharida vo bhi khatam tha. To matlab ke ye ghar mera hua?" Rupali ne kaha to Khan aur Devdhar dono muskura diye aur uske saath Jai ke ghar ke gate ki taraf badhe.
Watchman ne bataya ke Jai ghar par hi tha aur andar jakar Jai ko unke aane ki khabar karke aaya. Kuchh der baad vo teeno Jai ke saamne bethe the.
Jai takreeban Purushottam ki hi umar ka tha. Shakal par vahi thakuron wali akad. Betha bhi aise jaise koi raja apne mehel mein betha ho.
Rupali ko hairat thi ke vo kabhi Jai se mili nahi thi. Vo uski shaadi se pehle hi alag ghar banakar rehne laga tha par kabhi kisi ne uska zikr Rupali ke saamne nahi kiya tha aur na hi Rupali ne usko apni shaadi mein dekha tha jabki vo uske pati ka sabse kareebi tha. Par iska dosh usne khud ko hi diya. Un dino to use apni pati tak ki khabar nai hoti thi, Jai ki kya hoti.
"Kahiye" Usne Rupali ko dekhte hue puchha
"Get Out" Rupali ne use dekhte hue kaha
"Kya?" Jai ne aise puchha jaise angrezi samajh hi na aati ho
"Mere ghar se abhi isi waqt bahar nikal jao" Rupali ne kaha
"Aapke ghar se?" Jai ne haste hue puchha
Rupali ne Devdhar ki taraf dekha. Devdhar aage badha aur vo saari baaten Jai ko batane laga jo usne pehle Rupali ko bataya tha. Dheere dheere Jai ki samajh aaya ke Rupali kis hak se uske ghar ko apna keh rahi thi aur vo pareshan apne saamne rakhe papers ko dekhne laga.
"Aur agar main jaane se inkaar kar doon to?" Jai ne papers ek taraf karte hue puchha
Rupali ne khamoshi se Inspector Khan ki taraf dekha. Vo janti thi ke Jai aisa bol sakta hai isliye Khan ko saath laayi thi
"Main ye mamla adalat mein le jaoonga. Aise kaise ghar aapka ho gaya? Main apne vakeel ko bulata hoon" Jai ne phone ki taraf haath badhaya
"Bahar ek STD booth hai. Vahan se karna. Filhal ghar se bahar nikal" Khan beeche mein bol pada
"Tameez se baat karo" Jai khan par chillate hue bola
"Ye dekha hai?" Khan ne apna haath aage kiye "Ek kaan ke niche pada na to tameez aur kameez mein farak samajh nahi aayega tujhe. Chal nikal"
Jai chup ho gaya. Vo uthkar ghar ke andar ki taraf jaane laga.
"Vahan kahan ja raha hai?" Khan phir bola "Darwaza us taraf hai"
"Apna kuchh samaan lene ja raha hoon" Jai rukte hue bola
"Vo samaan bhi mere paiso se aaya tha to vo bhi mera hua. Ab isse pehle ke main ye kapde jo tumne pehen rakhe hain ye bhi utarva loon, nikal jao" Rupali khadi hote hue boli
"Filhal to ja raha hoon par itna aasan nahi hoga aapke liye mujhe harana" Jai ne kaha to Rupali muskurane lagi
"Apko kya lagta hai ke ye sab us neech thakur ka hai jo apne hi bhai ko daulat ke liye maar daale? Jo saale apne ghar ki naukrani ko bhi nahi chhodte?" Jai ne Rupali ke kareeb aate hue kaha.
Uski is harkat par Khan uski taraf badha par Rupali ne usko haath ke ishare se rok diya
"Kya matlab?" Usne Jai se puchha "Kya bakwaas kar rahe ho?"
"Sach keh raha hoon" Jai ne kaha "Aapko shayad nahi pata par maine dekha hai. Vo Bhushan ki biwi, use thakur ke khandaan ne apni rakhail bana rakha tha. Zabardasti subah shaam ragadte the use. Thakur, Tej, Kuldeep aur khud aapke pati Purushottam Singh ji"
"Bhushan ki biwi?" Rupali hairan hui
"Ji haan" Tej bola "Jab us bechari ne jaakar sab kuchh Bhushan ya aapki saas ko bata dene ki dhamki di to gayab ho gayi aur baat ye phela di gayi ke apne kisi aashiq ke saath bhaag gayi"
Rupali ke dimag ki battiyan jaise ek ek karke jalne lagi. Haweli mein mili laash jo Kamini ki nahi thi, Kuldeep ke kamre mein mila vo bra. Khud Khan bhi chup khada sun raha tha.
"Tumhein ye kaise pata?" Rupali ne puchha
"Haweli mein bachpan guzara hai maine. Dekha hai sab apni aankho se. Jaise hi vo haweli mein kaam karne aayi to sabse pehle thakur ki nazar us par padi to pehle unhone kaam kiya. Phir unki dekha dekhi unke sabse bade bete Purushottam Singh jinhen duniya bhagwan Ram ka avtaar samajhti thi unhone apna sikka chala diya bechari par. Jab bade bhai ne munh maar liya to baaki ke dono kahan pichhe rehne wale the. Mauka milte hi Tej aur Kuldeep ne fayda utha liya"
Rupali ki aankhon ke aage andhera sa chhane laga.
"Bakwaas kar rahe ho tum" Usne Jai se kaha
"Sach bol raha hoon main. Apni hawas sambhali nahi jaati in logon se, phir chahe vo aurat ki ho ya daulat ki aur isi ke chalte Purushottam bhi mara. Aapsi ladayi thi vo in logon ki daulat ke pichhe. Ek bhai ne doosre ko maara hai" Jai ne kaha
Par Rupali ka dimag us waqt doosri hi taraf chal raha tha. Use Inder ki kahi baaten yaad aa rahi thi jo Kamini ne usko kahi thi.
"Bas jism ki aag bujhni chahiye. Phir nazar nahi aata ke kaun apne ghar ka hai aur kaun ........."
Use apne pati ka vo roop yaad aaya jo vo roz raat ko bistar par dekha karti thi. Kis tarah se vo usko nangi karte hi insaan se kuchh aur hi ban jata tha. Use yaad aaya ke kis aasani se Bindiya Tej ke bistar par pahunch gayi thi aur Tej ne mauka milte hi usko chod liya tha. Usko yaad aaya ke kis aasani se us raat Thakur ne uske saamne hi Payal ko chod liya tha. Zara bhi nahi socha tha dono ne ke vo ek mamuli naukrani hai aur vo vahan ke thakur. Par kya koi itna gir sakta tha ke apni hi behen ke saath? Sochkar Rupali ka dimag phatne laga. To ye vajah thi Payal ke gayab hone ki. Apne bhai ko goli maarkar chhupti phir rahi thi.




साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj

कामुक कहानिया सेक्सी हवेली का सच --22

राज शर्मा की कामुक कहानिया

सेक्सी हवेली का सच --22

थोड़ी देर बाद रूपाली दरवाज़ा खोलकर इंदर के कमरे में दाखिल हुई. इंदर बिस्तर पर सर पकड़े ऐसे बैठा था जैसे लुट गया हो.
"सच क्या है इंदर? मैं जानती हूँ तू कुच्छ च्छूपा रहा है मुझसे" वो इंदर के करीब जाते हुए बोली
इंदर ने कोई जवाब नही दिया. बस सर पकड़े बैठा रहा.
"तुझे बताया नही मैने पर अब सोचती हूँ के बता ही दूँ." रूपाली इंदर के ठीक सामने जा खड़ी हुई "कामिनी का पासपोर्ट मुझे यहीं हवेली में मिला. हर वो चीज़ जो वो जाने से पहले पॅक करके ले गयी थी वो यहीं हवेली में बंद एक कमरे में मिली. वो विदेश कभी गयी ही नही इंदर और कोई नही जानता के पिच्छले 10 साल से कहाँ है"
रूपाली की बात सुनकर इंदर ने उसकी तरफ नज़र उठाई. वो आँखें फेलाए रूपाली की तरफ देख रहा था. आँखों में एक खामोश सवाल था जैसे के वो रूपाली से पुच्छ रहा हो के क्या वो सच बोल रही है. रूपाली ने भी उसी खामोशी से हां में सर हिलाया
"मुझे खुद अभी 3-4 दिन पहले ही पता चला" रूपाली ने कहा
"और किसी ने उसके बारे में पता करने की कोशिश नही की?" इंदर को जैसे अब भी यकीन नही हो रहा था
"पता नही. जिससे पूछती हूँ वो यही कहता है के कामिनी विदेश में है. ठाकुर साहब हॉस्पिटल में हैं और उनके आक्सिडेंट होने से पहले मुझे ये बात पता नही थी इसलिए उनसे बात करना अभी बाकी है" रूपाली ने कहा
"मैं जानता था के कुच्छ गड़बड़ हुई है वरना ऐसा हो ही नही सकता था के वो एक बार भी मुझे फोन ना करे. आपने पोलीस में बताया?" इंदर की आवाज़ से सॉफ पता चल रहा था के उसे अब भी इस बात पर यकीन नही हो रहा था
"ख़ान ये बात पहले से ही जानता है. असल में उसने ही मुझसे ये बात सबसे पहले बताई थी" रूपाली ने कहा
"आपने कुलदीप को फोन नही किया? उसके पास ही तो गयी थी कामिनी" इंदर सोचता हुआ बोला
"उसके जितने नंबर मुझे मिल सके मैने सब ट्राइ किए. एक भी काम नही कर रहा" रूपाली ने कहा तो इंदर फिर अपना सर पकड़ कर बैठ गया
"मुझे लगता है के अब वक़्त आ गया है के तुम मुझे सब सच बताओ. शुरू से आख़िर तक." रूपाली ने पुचछा तो इंदर इनकार में सर हिलाने लगा
रूपाली ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और उपेर उठाकर इंदर की आँखों में देखा
"एक वक़्त था जब तेरी हर बात मुझे पता होती थी इंदर. मैं तेरी बहेन से ज़्यादा तेरी दोस्त थी. हर छ्होटी बड़ी शरारत तू मुझे बताया करता था और मैं तुझे बचाया करती थी. अब क्या हुआ मेरे भाई? कब इतना बदल गया तू के अपनी बहेन से बातें च्छुपाने लगा?"
रूपाली की बात सुनकर इंदर की आँखों से पानी बहने लगा
"कल रात जब मैं कामिनी के कमरे में कुच्छ तलाश कर रह था और आप आ गयी थी तब मैने आपको कहा था के मैं वो पेपर्स ढूँढ रहा था जिसपर मैने शायरी लिखी हुई थी. ये बात कुच्छ अजीब नही लगी आपको? आख़िर कुच्छ काग़ज़ ही तो थे. ऐसी कोई बड़ी मुसीबत तो नही थी के मैं आधी रात को कामिनी के कमरे में जाता" इंदर ने कहा
"आजीब तो लगी थी पर तेरी हर बात पर यकीन करने की आदत सी पड़ गयी है मुझे इसलिए कुच्छ नही बोली" रूपाली ने इंदर का चेहरा छ्चोड़कर उसके साथ बिस्तर पर जा बैठी
"मैं वो रेवोल्वेर ढूँढ रहा था दीदी. मेरी रेवोल्वेर जंगल में नही खोई थी. वो मैने कामिनी को दी थी. आख़िरी कुच्छ दीनो में वो बहुत परेशान सी रहती थी. कहती थी के उसे हवेली में डर लगता है. अपने ही घरवाले उसे अजनबी लगते हैं क्यूंकी हर किसी ने अपने चेहरे पर एक नकली चेहरा लगा रखा था. एक दिन वो मुझसे मिलने आई तो रो रही थी. मैने पुचछा तो कुच्छ बोली नही बस मुझसे मेरी गन माँगी. मुझे अजीब लगा. मैं रेवोल्वेर उसे देना नही चाहता था पर उसके आँसू देख भी नही सकता था. दिल के हाथों मजबूर होकर मैने वो रेवोल्वेर कामिनी को दे दी."
उसने वापिस नही दी?" रूपाली हैरान सी इंदर को देख रही थी
"नौबत ही नही आई" इंदर ने सर झटकते हुए कहा "उसके 2 दिन बाद ही जीजाजी का खून हो गया और फिर मैं कामिनी से मिल नही सका. पिच्छले 10 साल से सोचता रहा के आकर उसका कमरा देखूं के शायद वो रेवोल्वेर यहीं कहीं रखा छ्चोड़ गयी हो पर हिम्मत नही पड़ी. एक दो बार आपसे मिलने के बहाने आया भी तो कामिनी के कमरे में जाने का मौका नही मिला"
"तेरे पास कामिनी के कमरे की चाभी कहाँ से आई?" रूपाली को अचानक याद आया के इंदर बड़ी आसानी से कमरा खोलकर अंदर चला गया था
"वो जब आखरी बार मिलने आई तो बहुर घबराई हुई थी. उसी घबराहट में चाभी मेरी गाड़ी में छ्चोड़ गयी थी" इंदर ने जवाब दिया
"शुरू से बता इंदर. सब कुच्छ" रूपाली ने कहा
"मैने कामिनी को अपने एक दोस्त की शादी में देखा था" इंदर ने बताना शुरू किया

पार्टी पूरे जोश पर थी. इंदर शराब नही पीता था पर आज उसके एक बहुत करीबी दोस्त की शादी थी इसलिए दोस्तों के कहने पर मजबूरन पीनी पड़ी. थोड़ी ही देर बाद उसे एहसास हो गया के नशा अब उसके सर पर चढ़ने लगा है. वो हमेशा से अपनी ज़ुबान पर काबू रखने वाला आदमी था. सिर्फ़ उतना ही बोलता था जितना ज़रूरी हो. कभी भी कहीं पर उसकी ज़ुबान से ऐसी बात नही निकलती थी जो वो ना कहना चाहता हो. पर इंसान नशे में हो तो ना खुद पर काबू रहता है और ना अपनी ज़ुबान पर और ये बात इंदर अच्छी तरह जानता था. पार्टी में मौजूद हर लड़की बस जैसे उसी की तरफ देख रही थी और उससे बात करने या उसके करीब आने की कोशिश कर रही थी. नशे की हालत में कहीं वो किसी के साथ कोई बदतमीज़ी ना कर दे ये सोचकर इंदर ने सबसे अलग कहीं अकेले जाकर बैठने का फ़ैसला किया. अभी वो नशे में था पर नशा इतना नही था के वो होश खो दे पर अगर दोस्तों के बीच रहता तो वो उसे और पीला देते और फिर बात काबू से बाहर हो जाती.
अकेला इंदर अपने दोस्त की ससुराल के घर की सीढ़ियाँ चढ़ता छत की और चला. छत पर पहुँचते ही ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे पर लगा और उसे कुच्छ रहट सी महसूस हुई. नीचे सिगेरेत्टे के धुएँ में उसका दम सा घुटने लगा था.
छ्हत पर कोई नही था. इंदर ने कोने में रखी एक चेर देखी और जाकर उसपर बैठ गया.
"हे भगवान " उसने ज़ोर से कहा "इंसान शराब क्यूँ पीता है"
तभी उसे छत के कोने पर कुच्छ आहट महसूस हुई. नज़र घूमकर देखा तो वहाँ एक लड़की खड़ी थी जो उसके ज़ोर से बोलने पर मुड़कर उसकी तरफ देख रही थी.
"माफ़ कीजिएगा" इंदर फ़ौरन चेर से उठ खड़ा हुआ "मैने आपको देखा नही. शायद ये चेर आप लाई हैं उपेर. आपकी है"
उस लड़की ने एक नज़र इंदर पर डाली और फिर आसमान की तरफ देखने लगी. इंदर को ये थोड़ा अजीब लगा. नीचे खड़ी हर लड़की बस उसी की तरफ देखे जा रही थी और इस लड़की ने उसपर एक नज़र डाली थी. आख़िर आसमान में ऐसा क्या है जिसके लिए उसे भी नज़र अंदाज़ कर दिया गया. ये सोचते हुए इंदर ने आसमान की तरफ नज़र उठाई.


"शिकन लिए मुस्कुराते लबों पे,बात आती है कभी कभी,
क़ुरबतों में पली वो ज़िंदगी, साथ आती है कभी कभी
आसमान से चाँद चुराकर कहीं ले जा तू आज सितम्गर,
जी लेने दे अंधेरे को, के अमावस की रात आती है कभी कभी"


आसमान की तरफ देखते हुए उस लड़की ने कहा
"जी?" इंदर ने उसकी तरफ देखा "अपने मुझसे कुच्छ कहा?"
वो लड़की फिर से इंदर की तरफ देखने लगी
"आप यहाँ उपेर अकेले में क्या कर रहे हैं? आइए नीचे चलें" लड़की ने कहा तो इस बार इंदर को और ज़्यादा हैरानी हुई. कहाँ तो हर लड़की अकेले में उससे बात करना चाह रही थी और कहाँ ये लड़की उसे वापिस नीचे जाने को कह रही थी.
इंदर ने एक नज़र उसपर डाली. वो एक मामूली सूरत की आम सी दिखने वाली लड़की थी. हल्का सावला रंग, गोल चेहरा, काली आँखें और काले बॉल.
"मैं अगर नीचे गया तो मुसीबत आ जाएगी. मेरे दोस्त फिर से मेरे हाथ में शराब थमा देंगे" उसने मुस्कुराते हुए उस लड़की से कहा
"तो क्या हुआ? यहाँ तो हर कोई पी रहा है" उस लड़की ने कहा
"जी हां पर अगर मैं पी लूँ तो मैं पागल हो जाता हूँ. अपने होश में नही रहता. अगर एक बार मुझे नशा चढ़ जाए तो मैं बीच बाज़ार में नाचना शुरू कर दूं" इंदर ने हल्का शरमाते हुए जवाब दिया
उसकी बात सुनकर वो लड़की हस पड़ी. उसके हासणे की आवाज़ ऐसी थी के इंदर बस उसे देखता रह गया. लड़की ने हाथ के इशारे से उसे फिर नीचे चलने को कहा तो इंदर ने फ़ौरन इनकार में सर हिला दिया
"जी बिल्कुल नही. ना तो मेरा आज पागल होने का इरादा है और ना कहीं नशे में नाचने का, ना बाज़ार में और ना ही यहाँ पार्टी में"
उसकी बात सुनकर वो लड़की उसके थोडा करीब आई और हल्की सी आवाज़ में ऐसे बोली जैसे कोई राज़ की बात बता रही हो


"आज बाज़ार में पबाजोला चलो
दस्त अफ्शान चलो,मस्त-ओ-रकसान चलो
खाक बरसर चलो,खून बदमा चलो
राह तकता है सब,शहेर-ए-जाना चलो
हाकिम-ए-शहेर भी, मजमा-ए-आम भी
तीर-ए-इल्ज़ाम भी, संग-ए-दुश्नाम भी
सुबह-ए-नाशाद भी, रोज़-ए-नाकाम भी
इनका दम्साज अपने सिवा कौन है
शहेर-ए-जाना में अब बसिफ़ा कौन है
दस्त-ए-क़ातिल के शायन रहा कौन है
रखत-ए-दिल बाँध लो, दिलफ़िगारो चलो
फिर हम ही क़त्ल हो आएँ यारो चलो"


"जी?" एक शब्द भी इंदर के पल्ले नही पड़ा "ये कौन सी भाषा थी"
उसकी बात सुनकर वो लड़की फिर खिलखिलाकर हस्ने लगी और सीढ़ियाँ उतरकर नीचे चली गयी.
नीचे आकर इंदर ने पता किया तो लड़की का नाम कामिनी था और वो ठाकुर शौर्या सिंग की बेटी थी. कामिनी में ऐसा कुच्छ भी नही था जिसपर आकर किसी की नज़र थम जाए पर जाने क्यूँ इंदर की नज़र बार बार उसी पर आकर रुकती. जिस तरह से वो उपेर खड़ी आसमान को देख रही थी, जिस तरह से उसने हाथ से इशारा करके इंदर को नीचे चलने को कहा था, और जिस तरह से वो कुच्छ धीरे से कहती थी जो इंदर को समझ नही आया था, इन सब बातों में इंदर उलझ कर रह गया थे. पूरी रात पार्टी में वो बस कामिनी को ही देखता रहा और उसने महसूस किया के वो भी पलटकर उसी की तरफ देख रही थी. कई बार दोनो की नज़र आपस में टकराती और दोनो ने मुस्कुरा कर नज़र फेर लेते.
सुबह के 4 बाज रहे थे. इंदर लड़केवालों की तरफ से बारात के साथ आया था जबकि कामिनी लड़की वालो की तरफ से थी. विदाई की वक़्त हो गया था और हर कोई दूल्हा और दुल्हन के आस पास भटक रहा था. इंदर जानता था के थोड़ी देर बाद उसको जाना होगा पर वो कामिनी से एक बार बात करना चाहता था. जाने क्या था के उसकी नज़र पागलों की तरह भीड़ में कामिनी को तलाश रही थी पर वो कहीं नज़र नही आई. अचानक इंदर को छत का ख्याल आया और वो भागता हुआ फिर छत पर पहुँचा. जैसा की उसने सोचा था, कामिनी वहीं खड़ी फिर से आसमान की तरफ देख रही थी. इंदर भागता हुआ छत पर आया था इसलिए उसकी साँस फूल रही थी. उसके हाफने की आवाज़ सुनकर कामिनी उसकी तरफ पलटी और खामोशी से उसे देखने लगी. कुच्छ देर तक इंदर भी कुच्छ नही बोला और छत की दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया.
"शुक्रिया" थोड़ी देर बाद कामिनी बोली
इंदर ने सवालिया नज़र से उसकी तरफ देखा
"किस बात के लिए?" उसने कामिनी से पुचछा
"आज रात के लिए. आज रात आप हमारे साथ रहे उसके लिए" कामिनी ने एक नज़र इंदर की तरफ देखा और फिर आसमान की तरफ देखने लगी
"मैं आपके साथ कहाँ था. आपको तो अपनी दोस्तों से वक़्त ही नही मिला" इंदर ने कामिनी की तरफ देखा. वो अब भी उपेर ही देख रही थी
"क्या देख रही हैं आप? क्या है आसमान में" आख़िर इंदर ने पुच्छ ही लिया
उसकी बात सुनकर कामिनी ने उसकी तरफ देखा और उसके सवाल को नज़र अंदाज़ कर दिया
"भले आप खुद हमारे साथ नही थे पर आपकी नज़र ने हमें एक पल के लिए भी अकेला कहाँ होने दिया. पूरी रात आपकी नज़र हमारे साथ रही" कामिनी ने कहा तो इंदर ने मुस्कुराते हुए नज़र नीची कर ली
"तो आप जानती थी?" उसने कामिनी से पुचछा
जवाब में कामिनी कुच्छ नही बोली. बस खामोशी से उसके करीब आई और फिर उसी हल्की सी आवाज़ में बोली, जैसे कोई बहुत बड़े राज़ की बात बता रही हो



"कुच्छ इस अदा से आप यूँ पहलू-नसहीन रहे
जब तक हमारे पास रहे, हम नहीं रहे
या रब किसी के राज़-ए-मोहब्बत की खैर हो
दस्त-ए-जुनून रहे ना रहे आस्तीन रहे"



इंदर को एक बार फिर पूरी तरह से कामिनी की बात समझ नही आई पर वो किस मोहब्बत के राज़ की बात कर रही थी ये वो अच्छी तरह समझ गया था. उसने कामिनी की तरफ देखा.
"दुआ करती हूँ के मैने जो अभी कहा है, इसके बाद की लाइन्स कहने की नौबत कभी ना आए" कामिनी ने धीरे से पिछे होते हुए कहा
"जी?" इंदर ने कामिनी की और देखते हुए पुचछा
कामिनी फिर से हस्ने लगी और इंदर फिर उसको एकटूक देखने लगा
"कभी इस जी के सिवा कुच्छ और भी कहिए ठाकुर इंद्रासेन राणा" कामिनी ने कहा और सीढ़ियाँ उतरकर नीचे चली गयी
इंदर समझ गया था के जिस तरह वो अपने दोस्तों से कामिनी के बारे में मालूम करने की कोशिश कर रहा था वैसे ही कामिनी ने भी उसका नाम कहीं से मालूम किया था. थोड़ी ही देर बाद बारात विदा हो गयी. जाते हुए इंदर को कामिनी कहीं नज़र नही आई पर वो जानता था के वो उसे फिर ज़रूर मिलेगा.

शादी के 2 दिन बाद इंदर अपने कमरे में सोया हुआ था. सुबह के 9 बाज रहे थे पर उसे देर से सोने और देर तक सोते रहने की आदत थी. उसके पास रखा फोन बजने लगा तो चिड़कर इंदर ने तकिया अपने मुँह पर रख लिया. फोन लगातार बजता रहा तो उसने गुस्से में फोन उठाया.
"हेलो" आधी नींद में इंदर बोला.
दूसरी तरफ से वही ठहरी हुई धीमी आवाज़ आई जिसने 2 दिन पहले इंदर को पागल सा कर दिया था.


लज़्ज़त-ए-घाम बढ़ा दीजिए,
आप यूँ मुस्कुरा दीजिए,

क़यामत-ए-दिल बता दीजिए,
खाक लेकर उड़ा दीजिए,

मेरा दामन बहुत साफ है
कोई इल्ज़ाम लगा दीजिए



"कामिनी" इंदर बिस्तर पर फ़ौरन उठ बैठा.
"हमें तो लगा के आप हमें भूल गये" दूसरी तरफ से कामिनी की आवाज़ आई
"कैसे भूल सकता हूँ पर आप अपने नंबर देकर ही नही गयीं" इंदर अपनी सफाई में बोला
"नंबर तो आपने भी नही दिया पर हमें तो मिल गया" कामिनी ने कहा तो इंदर के पास अब कोई जवाब नही था.
कुच्छ देर तक वो इधर उधर की बातें करते रहे. कामिनी ने उसे अपने बारे में बताया और इंदर ने कामिनी को अपने बारे में. खबर ही नही हुई के दोनो को बात करते करते कब 2 घंटे से ज़्यादा वक़्त हो गया. आख़िर में इंदर ने फिर से मिलने की बात की तो कामिनी खामोश हो गयी.
"क्या हुआ?" इंदर ने पुचछा "आप मिलना नही चाहती?"
"अगर इंसान के चाहने से सब कुच्छ हो जाया करता तो फिर दुनिया में इतनी मुसीबत ना हुआ करती" दूसरी तरफ से कामिनी की आवाज़ आई "हम फिर फोन करेंगे"
कहकर कामिनी ने फोन रख दिया. इंदर परेशान सा फोन की तरफ देखने लगा. इस बार भी कामिनी ने उसे अपना फोन नंबर नही दिया था.

"फिर क्या हुआ?" रूपाली खामोशी से बैठी इंदर की बात सुन रही थी
"उसने उस दिन फोन ऐसे ही रख दिया पर मैं समझ चुका था के वो भी मुझे चाहती है. मैने अपने उस दोस्त को फोन किया जिसकी शादी में मुझे कामिनी मिली थी और उसकी बीवी के ज़रिए मैने कामिनी का फोन नंबर निकाल लिया. यानी यहाँ हवेली का नंबर" इंदर ने कहा
":ह्म्‍म्म्मम "रूपाली ने हामी भारी
"पर मुसीबत ये थी के अगर मैं फोन करूँ तो पता नही कामिनी उठती या कोई और. फिर भी मैने कोशिश की. 3 दिन तक मैं लगातार कोशिश करता रहा पर हर बार कोई और ही फोन उठता और मुझे फोन काटना पड़ता. इस बीच कामिनी ने भी मुझे फोन नही किया. 3 दिन बाद एक दिन मैने फोन किया तो फोन कामिनी ने उठाया. पहले तो वो मेरे फोन करने पर ज़रा परेशान हुई के मुझे यूँ फोन नही करना चाहिए था और अगर घर में किसी को पता चला तो मुसीबत आ जाएगी. पर फिर खुद ही हस्कर कहने लगी के वो देखना चाहती थी के मैं फोन करूँगा या नही इसलिए खुद भी मुझे 3 दिन से फोन नही कर रही थी. ये थी मेरी और उसकी पहली मुलाक़ात. इसके बाद हम दोनो के बीच फोन शुरू हो गये और हम घंटो एक दूसरे से बातें करते रहते. मुझे खबर ही नही हुई के मैं कब कामिनी को इतना चाहने लगा था पर वो थी के मुझसे मिलने को तैय्यार ही नही होती थी. फिर तकरीबन 6 महीने बाद वो मुझसे मिलने को तैय्यार हुई." इंदर अब बिना रुके अपनी पूरी कहानी बता रहा था
"शहेर में मिलते थे तुम दोनो?" रूपाली ने पुचछा
"हां" इंदर ने हां में सर हिलाया "कामिनी गाड़ी अकेली ही लाती थी. ना ड्राइवर ना बॉडीगार्ड. उन दीनो वो काफ़ी खुश रहती थी. हम साथ रहते, बातें करते और कुच्छ वक़्त साथ गुज़रने के बाद वो वापिस चली आती. उन दीनो में ऐसा कुच्छ नही हुआ जो कुच्छ अजीब हो. बस एक लड़का लड़की मिलते और एक दूसरे का हाथ थामे घंटो बातें करते रहते. कुच्छ दिन बाद जाने कैसे पर आपकी शादी कामिनी के घर ही पक्की हो गयी. हम दोनो इस बात को लेकर बहुत खुश थे और इसे अपनी खुशमति मान रहे थे. मैं इसलिए खुश था के मैं आपकी शादी के बाद बिना किसी परेशानी के हवेली में आ जा सकता था और वो इसलिए खुश थी के उसे मेरे साथ शादी की बात चलाने का एक बहाना मिल गया था, यानी के आप. पर वो चाहकर भी कभी आपसे बात नही कर सकी और ना ही मैं और इसकी वजेह थी के आप मंदिर से कभी बाहर ही नही निकलती थी. हम दोनो ये सोचकर चुप रह जाते के जाने आप कैसे रिक्ट करेंगी. इसी उलझन में कब वक़्त गुज़रता चला गया हमें पता ही नही चला. कभी कभी मैं आपसे मिलने के बहाने हवेली आ जाया करता था पर अब भी हम ज़्यादातर बाहर ही मिला करते थे"
"कामिनी में बदलाव कब देखा तुमने" रूपाली ने पुचछा
"आखरी कुच्छ दीनो में. जीजाजी के मरने से कोई 2 महीने पहले से. एक दिन वो मुझसे मिलने शहेर आई" इंदर ने बताना शुरू किया
इंदर अपनी गाड़ी रोके कोई एक घंटे से कामिनी का इंतेज़ार कर रहा था. कभी ऐसा नही होता था के कामिनी देर से पहुँचे, बल्कि वो इंदर से पहले ही पहुँच जाती थी पर आज इंदर को इंतेज़ार करना पड़ रहा था. वो शहेर के बाहर एक सुनसान इलाक़े में गाड़ी रोके खड़ा था. कामिनी और वो अक्सर यहीं मिला करते थे.
थोड़ी देर बाद उसे कामिनी की गाड़ी आती हुई नज़र आई. वो अपनी कार से बाहर निकला. कामिनी ने उसकी कार के पिछे लाकर अपनी कार रोकी और उसकी तरफ चलती हुई आई.
"सॉरी" कामिनी ने करीब आते हुए कहा "आज देर हो गयी"
"कोई बात नही" इंदर ने मुस्कुराते हुए कहा "इतने वक़्त से तुम मेरा इंतेज़ार करती थी. आज मैने कर लिया तो कौन सी बड़ी बात है"
इंदर ने अपनी कार का दरवाज़ा खोला और वो दोनो उसकी कार की बॅक्सीट पर बैठ गये. दोपहर का वक़्त था और गर्मी सर चढ़कर बोल रही थी. इंदर ने कार का एसी ऑन कर दिया
कामिनी आज इंदर से पूरे 2 महीने बाद मिल रही थी. वो 2 महीने से कोशिश कर रहा था पर कामिनी मना कर देती थी. उसने हवेली जाने की सोची पर वहाँ वो अकेले में वक़्त नही बिता पाते थे.
"क्या हुआ?" इंदर ने रूपाली के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा "परेशान सी लग रही हो"
"कुच्छ नही" कामिनी ने ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा "तक गयी हूँ"
"इंदर कार की बॅक्सीट पर एक कोने में हो गया और कामिनी को इशारा किया के वो लेट जाए. कामिनी ने पहले तो मना किया पर इंदर के ज़ोर डालने पर वो लेट गयी और अपना सर इंदर की जाँघ पर रख लिया
"क्या हुआ आज हमेशा की तरह कोई शायरी नही?" इंदर ने पुचछा
"जब ज़िंदगी खुद अपनी शायरी सुनाना शुरू कर दे तो इंसान कहाँ शायरी कर पता है" कामिनी ने उदास सी आवाज़ में जवाब दिया
"क्या हुआ?" इंदर ने दोबारा पुचछा
"कुच्छ नही. बस इंसान का चेहरा देखकर कभी कभी समझ नही आता के असली कौन सा है और नकली कौन सा" कामिनी ने कहा और अपनी आँखें बंद कर ली
इंदर ने उसके उदास चेहरे की तरफ देखा और आगे कुच्छ ना पुछा. वो प्यार से कामिनी के सर पर हाथ फेरता रहा
कामिनी ने सलवार कमीज़ पहेन रखी थी. इंदर की गोद में लेटे होने की वजह से उसका दुपट्टा सरक कर कार में नीचे गिर पड़ा था. वो इस तरीके से लेटी हुई थी के दोनो टांगे भी उपेर सीट पर थी और उसका पूरा जिस्म मुड़ा हुआ था जिसकी वजह से नीचे दे दबाव पड़ने के कारण उसकी चूचियाँ कमीज़ के उपेर से बाहर को निकल रही थी.
इंदर की नज़र कामिनी की चूचियों पर पड़ी तो पहले तो उसने नज़र फेर ली पर फिर दोबारा उसी तरफ देखने लगा. कामिनी और उसके बीच अब तक कोई जिस्मानी रिश्ता नही बना था. कभी कभी वो दोनो एक दूसरे को चूम लेते थे और बस. ना तो कभी इससे आगे बात गयी और ना ही इंदर ने कोशिश की के इससे आगे कुच्छ और करे. पर आज कामिनी को यूँ इस हालत में देखकर उसके दिल की धड़कन तेज़ होने लगी.
उसका हाथ कामिनी के सर पर रुक गया था. कुच्छ देर तक आँखें बंद रखने के बाद कामिनी ने आँखें खोली और इंदर की तरफ देखा. इंदर की नज़र अब भी उसकी चूचियों पर थी. कामिनी ने शर्मा कर अपने दोनो हाथ अपने सीने पर रख लिए.
उसकी इस हरकत से इंदर ने उसकी आँखों में देखा. वो धीरे से नीचे झुका और अपने होंठ कामिनी के होंठ पर रख दिए. कामिनी के मुँह से आह निकल गयी और उसका हाथ इंदर का सर सहलाने लगा. दोनो के होंठ आपस में एक दूसरे से चिपक गये और ज़ुबान एक दूसरे की ज़ुबान से टकराने लगी. अपने होंठ कामिनी के होंठों से चिपकाए हुए ही इंदर ने अपने एक हाथ से कामिनी के हाथों को उसके सीने से हटाया. कामिनी ने इनकार करना चाहा पर इंदर की ज़िद के आगे हार मानकर अपने हाथ हटा दिए. इंदर का हाथ उसके गले से होते हुआ उसके सीने पर आया और कमीज़ के उपेर से ही कामिनी की चूचियाँ दबाने लगा. अब तक कामिनी की साँसें भी भारी हो चली थी. ये पहली बार था के वो और इंदर इतने करीब आए थे और इंदर ने उसके जिस्म को च्छुआ था. उसने भी पलटकर पूरे ज़ोर से इंदर को चूमना शुरू कर दिया.
थोड़ी देर कमीज़ के उपेर से ही चूचिया सहलाने के बाद इंदर का हाथ फिर कामिनी के गले पर आया और इस बार उसके कमीज़ के गले से होते हुए अंदर गया और फिर ब्रा के अंदर घुसता हुआ सीधा कामिनी की नंगी चूची पर आ गया. कामिनी का पूरा जिस्म ऐसा हिला जैसे उसे कोई ज़बरदस्त झटका लगा हो. उसने अपने होंठ इंदर के होंठ से हटाया, उसका हाथ पकड़कर बाहर खींचा और उठकर बैठ गयी. बैठकर वो ज़ोर ज़ोर से साँस लेने लगी और अपने बाल ठीक करने लगी. नीचे पड़ा दुपट्टा उठाकर उसने अपने गले में डाल लिया
"क्या हुआ?" इनडर ने पुचछा.
कामिनी ने जवाब नही दिया तो उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा
"क्या हुआ कामिनी? बुरा लगा क्या?" इंदर ने उसके करीब होने की कोशिश की पर कामिनी दूर होती हुई कार का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गयी
"ओक आइ आम सॉरी" इंदर भी अपनी तरफ का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकला "तुम जानती हो मैं तुमसे प्यार करना चाहता हूँ और शादी करना चाहता हूँ इसलिए शायद थोड़ा आगे बढ़ गया. कुच्छ ग़लत किया मैने?"
"नही. कुच्छ ग़लत नही किया"कामिनी पलटकर चिल्लाई "ये तो हमारे रिश्ते के लिए बहुत ज़रूरी था ना"
"कामिनी !!!!! " इंदर ने पहली बार कामिनी को यूँ चिल्लाते देखा था इसलिए हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा
"इस जिस्म में ऐसा क्या है इंदर जो हर कोई पागल हुआ रहता है इसके पिछे. के अपनी आग लोगों से संभाली नही जाती" कामिनी अब भी गुस्से में थी
"क्या मतलब?" इंदर को समझ नही आ रहा था के कामिनी यूँ ओवर रिक्ट क्यूँ कर रही थी
"हर किसी को यही चाहिए, है ना? हर किसी को बस इसी एक चीज़ की ख्वाहिश लगी रहती है. फिर ना तो रिश्ते मतलब रखते हैं और ना कोई और चीज़. फिर चाहे जितना गिरना पड़े पर जिस्म की आग बुझनी चाहिए, चाहे किसी के साथ भी हो. फिर ये नज़र नही आता के कौन अपने घर का है और कौन ........." कामिनी ने बात अधूरी छ्चोड़ दी. इंदर अब भी उसको चुप खड़ा देख रहा था
"बस यही एक चीज़ चाहिए सबको" कामिनी ने दोनो हाथ हवा में फेलते हुए फिर अपनी बात दोहराई
"सबको मतलब" इंदर बस इतना ही कह सका. कामिनी उसकी बात का जवाब दिए बिना अपनी कार में बैठी और वहाँ से निकल गयी.

"उसके बाद?" रूपाली इंदर से पुचछा
"वो आखरी बार था जब कामिनी मेरे इतने करीब आई थी. उसके बाद अगले 2 महीने तक मैं फोन ट्राइ करता रहा पर उससे बात नही हो पाई. मैं कई बार हवेली आपसे मिलने आया पर वो मुझे देखकर अपने कमरे में चली जाती थी और तब तक बाहर नही आती थी जब तक के मैं वापिस ना चला जाऊं" इंदर बोला
"उसने कुच्छ नही बताया के वो किस बात को लेकर इतना परेशान थी?" रूपाली को समझ नही आ रहा था के क्या सोचे
"इस बात का मौका ही नही मिला दीदी के मैं उससे आराम से बैठकर बात कर पाता या कुच्छ पुच्छ पाता. उस दिन जब वो मिली तो मुझसे लड़कर चली गयी थी. पता नही किसका गुस्सा उसने मुझपर निकाला था और उसके बाद कभी हमें मौका ही नही मिला के आराम से बैठकर बात कर पाते" इंदर ने कहा
"तो अपनी रेवोल्वेर कब दी तुमने उसको?" रूपाली ने पुचछा
"जीजाजी के खून से 3 दिन पहले उसका मेरे पास फोन आया" इंदर ने आगे बताना शुरू किया
इंदर अपने कमरे में बैठा एक किताब पढ़ रहा था. फोन की घंटी बजी तो उसने आगे बढ़कर फोन उठाया. फोन के दूसरी तरफ से कामिनी के रोने की आवाज़ आई.
"कामिनी" इंदर जैसे चिल्ला उठा "ओह थॅंक गॉड कामिनी. मुझे तो लगा था के तुम मुझसे अब कभी बात ही नही करोगी. मेरी ग़लती की इतनी बड़ी सज़ा दे रही थी मुझे?"
दूसरी तरफ से कामिनी ने कुच्छ नही कहा. बस रोती रही. उसके रोने की आवाज़ ऐसी थी जैसे वो बहुत तकलीफ़ में हो. इंदर से बर्दाश्त नही हुआ. उसकी अपनी आँखो में पानी आ गया
"मुझे माफ़ कर दो कामिनी. मैं मानता हूँ के ग़लती मेरी है. मुझे शादी से पहले ऐसी हरकत नही करनी चाहिए थी. पर तुम जानती हो मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ. मैं आज ही तुमसे शादी करने को तैय्यार हूँ अगर तुम कहो तो. हम अपने घर में बात कर लेंगे. नही माने तो कोर्ट मॅरेज कर लेंगे. मेरा यकीन करो कामिनी" इंदर पागलों की तरह कहता जा रहा था.
कुच्छ देर दोनो खामोश रहे. थोड़ी देर बाद रूपाली ने रोते रोते कहा
"मुझे नही पता के अब मैं किसका यकीन करूँ और किसका नही इंदर. अब तो हर कोई अजनबी सा लगने लगा है. हर किसी की शकल देखकर ऐसा लगता है जैसे उसने अपनी शकल पर एक परदा सा डाल रखा हो. अंदर से कुच्छ और और बाहर से कुच्छ और. किस्मत का खेल तो देखो इंदर के जो अपने थे वो पराए हो गये और जो पराया था वो अपना गया."
"मैं कभी पराया नही था कामिनी. मैं तो हमेशा से तुम्हारा अपना था. तुम ऐसी बातें क्यूँ कर रही हो?" इंदर तदपकर बोला
फोन पर फिर थोड़ी देर तक खामोशी बनी रही
"मेरी जान को ख़तरा है इंदर" रूपाली ने रोना बंद करते हुए कहा
इंदर को ऐसा लगा जैसे उसको 1000 वॉट का झटका लगा हो
"किससे?" उसने पुचछा
"ये सब बातें बाद में. मैं अभी ज़्यादा देर बात नही कर सकती. तुम मेरी बात सुनो. तुम मुझे कोई हथ्यार दे सकते हो? हिफ़ाज़त के लिए? तुम्हारी कोई पिस्टल या रेवोल्वेर?" कामिनी अब बहुत धीरे धीरे बोल रही थी
"पिस्टल? ऱेवोल्वेर? तुम क्या कह रही हो मेरी कुच्छ समझ नही आ रहा" ईन्देर के सचमुच कुच्छ भी पल्ले नही पड़ रहा था
"अभी समझने का वक़्त नही है. तुम एक काम करो. कल दोपहर 2 बजे उसी जगह पर मेरा इंतेज़ार करना जहाँ हम आखरी बार मिले थे. और अपनी रेवोल्वेर लेकर आना" कामिनी ने कहा
"कामिनी मेरी बात सुनो" इंदर बोला "कल 2 बजे तो मैं आ जाऊँगा पर ......."
वो अभी कह ही रहा था के पिछे से सरिता देवी की आवाज़ आई"
"कामिनी बेटा"
और कामिनी ने फोन काट दिया.


साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) ऑल्वेज़
`·.¸(¨`·.·´¨) कीप लविंग &
(¨`·.·´¨)¸.·´ कीप स्माइलिंग !
`·.¸.·´ -- राज






sexi haveli ka such --22

Thodi der baad Rupali darwaza kholkar Inder ke kamre mein dakhil hui. Inder bistar par sar pakde aise betha tha jaise lut gaya ho.
"Sach kya hai Inder? Main janti hoon tu kuchh chhupa raha hai mujhse" Vo Inder ke kareeb jaate hue boli
Inder ne koi jawab nahi diya. Bas sar pakde betha raha.
"Tujhe bataya nahi maine par ab sochti hoon ke bata hi doon." Rupali Inder ke theek saamne ja khadi hui "Kamini ka passport mujhe yahin haweli mein mila. Har vo cheez jo vo jaane se pehle pack karke le gayi thi vo yahin haweli mein band ek kamre mein mili. Vo videsh kabhi gayi hi nahi Inder aur koi nahi janta ke pichhle 10 saal se kahan hai"
Rupali ki baat sunkar Inder ne uski taraf nazar uthayi. Vo aankhen phelaye Rupali ki taraf dekh raha tha. Aankhon mein ek khamosh sawal tha jaise ke vo Rupali se puchh raha ho ke kya vo sach bol rahi hai. Rupali ne bhi usi khamoshi se haan mein sar hilaya
"Mujhe khud abhi 3-4 din pehle hi pata chala" Rupali ne kaha
"Aur kisi ne uske baare mein pata karne ki koshish nahi ki?" Inder ko jaise ab bhi yakeen nahi ho raha tha
"Pata nahi. Jisse puchhti hoon vo yahi kehta hai ke Kamini videsh mein hai. Thakur Sahab hospital mein hain aur unke accident hone se pehle mujhe ye baat pata nahi thi isliye unse baat karna abhi baaki hai" Rupali ne kaha
"Main janta tha ke kuchh gadbad hui hai varna aisa ho hi nahi sakta tha ke vo ek baar bhi mujhe phone na kare. Aapne police mein bataya?" Inder ki aawaz se saaf pata chal raha tha ke use ab bhi is baat par yakeen nahi ho raha tha
"Khan ye baat pehle se hi janta hai. Asal mein usne hi mujhse ye baat sabse pehle batayi thi" Rupali ne Kaha
"Aapne Kuldeep ko phone nahi kiya? Uske paas hi to gayi thi Kamini" Inder sochta hua bola
"Uske jitne number mujhe mil sake maine sab try kiye. Ek bhi kaam nahi kar raha" Rupali ne kaha to Inder phir apna sar pakad kar beth gaya
"Mujhe lagta hai ke ab waqt aa gaya hai ke tum mujhe sab sach batao. Shuru se aakhir tak." Rupali ne puchha to Inder inkaar mein sar hilane laga
Rupali ne uska chehra apne hathon mein liya aur uper uthakar Inder ki aankhon mein dekha
"Ek waqt tha jab teri har baat mujhe pata hoti thi Inder. Main teri behen se zyada teri dost thi. Har chhoti badi shararat tu mujhe bataya karta tha aur main tujhe bachaya karti thi. Ab kya hua mere bhai? Kab itna badal gaya tu ke apni behen se baaten chhupane laga?"
Rupali ki baat sunkar Inder ki aankhon se pani behne laga
"Kal raat jab main Kamini ke kamre mein kuchh talash kar rah tha aur aap aa gayi thi tab maine aapko kaha tha ke main vo papers dhoondh raha tha jispar maine shayri likhi hui thi. Ye baat kuchh ajeeb nahi lagi aapko? Aakhir kuchh kagaz hi to the. Aisi koi badi museebat to nahi thi ke main aadhi raat ko Kamini ke kamre mein jata" Inder ne kaha
"Aajeeb to lagi thi par teri har baat par yakeen karne ki aadat si pad gayi hai mujhe isliye kuchh nahi boli" Rupali ne Inder ka chehra chhodkar uske saath bistar par ja bethi
"Main vo revolver dhoondh raha tha Didi. Meri revolver jungle mein nahi khoyi thi. Vo maine Kamini ko di thi. Aakhiri kuchh dino mein vo bahut pareshan si rehti thi. Kehti thi ke use haweli mein darr lagta hai. Apne hi gharwale use ajnabhi lagte hain kyunki har kisi ne apne chehre par ek nakli chehra laga rakha tha. Ek din vo mujhse milne aayi to ro rahi thi. Maine puchha to kuchh boli nahi bas mujhse meri gun maangi. Mujhe ajeeb laga. Main revolver use dena nahi chahta tha par uske aansoo dekh bhi nahi sakta tha. Dil ke hathon majboor hokar maine vo revolver Kamini ko de di."
Usne vapis nahi di?" Rupali hairan si Inder ko dekh rahi thi
"Naubat hi nahi aayi" Inder ne sar jhatakte hue kaha "Uske 2 din baad hi Jijaji ka khoon ho gaya aur phir main Kamini se mil nahi saka. Pichhle 10 saal se sochta raha ke aakar uska kamra dekhun ke shayad vo revolver yahin kahin rakha chhod gayi ho par himmat nahi padi. Ek do baar aapse milne ke bahane aaya bhi to Kamini ke kamre mein jaane ka mauka nahi mila"
"Tere paas Kamini ke kamre ki chaabhi kahan se aayi?" Rupali ko achanak yaad aaya ke Inder badi aasani se kamra kholkar andar chala gaya tha
"Vo jab aakhri baar milne aayi to bahur ghabrayi hui thi. Usi ghabrahat mein chabhi meri gaadi mein chhod gayi thi" Inder ne jawab diya
"Shuru se bata Inder. Sab kuchh" Rupali ne kaha
"Maine Kamini ko apne ek dost ki shaadi mein dekha tha" Inder ne batana shuru kiya

Party poore josh par thi. Inder sharab nahi peeta tha par aaj uske ek bahut kareebi dost ki shaadi thi isliye doston ke kehne par majbooran peeni padi. Thodi hi der baad use ehsaas ho gaya ke nasha ab uske sar par chadhne laga hai. Vo hamesha se apni zubaan par kaabu rakhne wala aadmi tha. Sirf utna hi bolta tha jitna zaroori ho. Kabhi bhi kahin par uski zubaan se aisi baat nahi nikalti thi jo vo na kehna chahta ho. Par insaan nashe mein ho to na khud par kaabu rehta hai aur na apni zubaan par aur ye baat Inder achhi tarah janta tha. Party mein maujood har ladki bas jaise usi ki taraf dekh rahi thi aur usse baat karne ya uske kareeb aane ki koshish kar rahi thi. Nashe ki halat mein kahin vo kisi ke saath koi badtameezi na kar de ye sochkar Inder ne sabse alag kahin akele jaakar bethne ka faisla kiya. Abhi vo nashe mein tha par nasha itna nahi tha ke vo hosh kho de par agar doston ke beech rehta to vo use aur pila dete aur phir baat kaabu se bahar ho jaati.
Akela Inder apne dost ki sasural ke ghar ki sidhiyan chadhta chhat ki aur chala. Chhat par pahunchte hi thandi hawa ka jhonka uske chehre par laga aur use kuchh rahat si mehsoos hui. Neeche cigerette ke dhuen mein uska dam sa ghutne laga tha.
Chhat par koi nahi tha. Inder ne kone mein rakhi ek chair dekhi aur jakar uspar beth gaya.
"Hey bhagwan " Usne zor se kaha "Insaan sharab kyun peeta hai"
Tabhi use chhat ke kone par kuchh aahat mehsoos hui. Nazar ghumakar dekha to vahan ek ladki khadi thi jo uske zor se bolne par mudkar uski taraf dekh rahi thi.
"Maaf kijiyega" Inder fauran chair se uth khada hua "Maine aapko dekha nahi. Shayad ye chair aap laayi hain uper. Aapki hai"
Us ladki ne ek nazar Inder par daali aur phir aasman ki taraf dekhne lagi. Inder ko ye thoda ajeeb laga. Neeche khadi har ladki bas usi ki taraf dekhe ja rahi thi aur is ladki ne uspar ek nazar daali thi. Aakhir aasman mein aisa kya hai jiske liye use bhi nazar andaz kar diya gaya. Ye sochte hue Inder ne aasman ki taraf nazar uthayi.


"Shikan liye muskurate labon pe,Baat aati hai kabhi kabhi,
Qurbaton mein pali vo zindagi, saath aati hai kabhi kabhi
Aasman se Chand churakar kahin le ja tu aaj sitamgar,
Jee lene de andhere ko, ke amavas ki raat aati hai kabhi kabhi"


Aasman ki taraf dekhte hue us ladki ne kaha
"Ji?" Inder ne uski taraf dekha "Apne mujhse kuchh kaha?"
Vo ladki phir se Inder ki taraf dekhne lagi
"Aap yahan uper akele mein kya kar rahe hain? Aaiye neeche chalen" Ladki ne kaha to is baar Inder ko aur zyada hairani hui. Kahan to har ladki akele mein usse baat karna chah rahi thi aur kahan ye ladki use vapis neeche jaane ko keh rahi thi.
Inder ne ek nazar uspar daali. Vo ek mamuli soorat ki aam si dikhne wali ladki thi. Halka saawla rang, gol chehra, kaali aankhen aur kaale baal.
"Main agar neeche gaya to museebat aa jayegi. Mere dost phir se mere haath mein sharab thama denge" Usne muskurate hue us ladki se kaha
"To kya hua? Yahan to har koi pee raha hai" Us ladki ne kaha
"Ji haan par agar main pee loon to main pagal ho jata hoon. Apne hosh mein nahi rehta. Agar ek baar mujhe nasha chadh jaaye to main beech bazar mein nachna shuru kar doon" Inder ne halka sharmate hue jawab diya
Uski baat sunkar vo ladki has padi. Uske hasne ki aawaz aisi thi ke Inder bas use dekhta reh gaya. Ladki ne haath ke ishare se use phir neeche chalne ko kaha to Inder ne fauran inkaar mein sar hila diya
"Ji bilkul nahi. Na to mera aaj pagal hone ka irada hai aur na kahin nashe mein nachne ka, na bazar mein aur na hi yahan party mein"
Uski baat sunkar vo ladki uske thoda kareeb aayi aur halki si aawaz mein aise boli jaise koi raaz ki baat bata rahi ho


"Aaj bazaar mein pabajola chalo
Dast afshaan chalo,Mast-o-raksaan chalo
khaak barsar chalo,khoon badama chalo
raah takta hai sab,Sheher-e-jaana chalo
Haakim-e-sheher bhi, Majma-e-aam bhi
Teer-e-ilzaam bhi, sang-e-dushnaam bhi
Subah-e-nashad bhi, Roz-e-nakam bhi
Inka damsaaz apne siwa kaun hai
Sheher-e-jaana mein ab basifa kaun hai
Dast-e-qatil ke shaayan raha kaun hai
Rakht-e-dil baandh lo, dilfigaro chalo
Phir ham hi qatl ho aayen yaaro chalo"


"Ji?" Ek shabd bhi Inder ke palle nahi pada "Ye kaun si bhasha thi"
Uski baat sunkar vo ladki phir khilkhilakar hasne lagi aur sidhiyan utarkar neeche chali gayi.
Neeche aakar Inder ne pata kiya to Ladki ka naam Kamini tha aur vo Thakur Shaurya Singh ki beti thi. Kamini mein aisa kuchh bhi nahi tha jispar aakar kisi ki nazar tham jaaye par jaane kyun Inder ki nazar baar baar usi par aakar rukti. Jis tarah se vo uper khadi aasman ko dekh rahi thi, jis tarah se usne haath se ishara karke Inder ko neeche chalne ko kaha tha, aur jis tarah se vo kuchh dheere se kehti thi jo Inder ko samajh nahi aaya tha, in sab baaton mein Inder ulajh kar reh gaya the. Poori raat party mein vo bas Kamini ko hi dekhta raha aur usne mehsoos kiya ke vo bhi palatkar usi ki taraf dekh rahi thi. Kai baar dono ki nazar aapas mein takrati aur dono ne muskura kar nazar pher lete.
Subah ke 4 baj rahe the. Inder ladkewalon ki taraf se baraat ke saath aaya tha jabki Kamini ladki walo ki taraf se thi. Vidayi ki waqt ho gaya tha aur har koi dulha aur dulhan ke aas paas bhatak raha tha. Inder janta tha ke thodi der baad usko jaana hoga par vo Kamini se ek baar baat karna chahta tha. Jaane kya tha ke uski nazar pagalon ki tarah bheed mein Kamini ko talash rahi thi par vo kahin nazar nahi aayi. Achanak Inder ko chhat ka khyaal aaya aur vo bhagta hua phir chhat par pahuncha. Jaisa ki usne socha tha, Kamini vahin khadi phir se aasman ki taraf dekh rahi thi. Inder bhagta hua chhat par aaya tha isliye uski saans phool rahi thi. Uske haafne ki aawaz sunkar Kamini uski taraf palti aur khamoshi se use dekhne lagi. Kuchh der tak Inder bhi kuchh nahi bola aur chhat ki deewar ka sahara lekar khada ho gaya.
"Shukriya" Thodi der baad Kamini boli
Inder ne sawaliya nazar se uski taraf dekha
"Kis baat ke liye?" Usne Kamini se puchha
"Aaj raat ke liye. Aaj raat aap hamare saath rahe uske liye" Kamini ne ek nazar Inder ki taraf dekha aur phir aasman ki taraf dekhne lagi
"Main aapke saath kahan tha. Aapko to apni doston se waqt hi nahi mila" Inder ne Kamini ki taraf dekha. Vo ab bhi uper hi dekh rahi thi
"Kya dekh rahi hain aap? Kya hai aasman mein" Aakhir Inder ne puchh hi liya
Uski baat sunkar Kamini ne uski taraf dekha aur uske sawal ko nazar andaaz kar diya
"Bhale aap khud hamare saath nahi the par aapki nazar ne hamen ek pal ke liye bhi akela kahan hone diya. Poori raat aapki nazar hamare saath rahi" Kamini ne kaha to Inder ne muskurate hue nazar neechi kar li
"To aap janti thi?" Usne Kamini se puchha
Jawab mein Kamini kuchh nahi boli. Bas khamoshi se uske kareeb aayi aur phir usi halki si aawaz mein boli, jaise koi bahut bade raaz ki baat bata rahi ho



"Kuchh is ada se aap yun pehlu-nashin rahe
Jab tak hamare paas rahe, ham nahin rahe
Ya rab kisi ke raaz-e-mohabbat ki khair ho
Dast-e-junoon rahe na rahe aasteen rahe"



Inder ko ek baar phir poori tarah se Kamini ki baat samajh nahi aayi par vo kis mohabbat ke raaz ki baat kar rahi thi ye vo achhi tarah samajh gaya tha. Usne Kamini ki taraf dekha.
"Dua karti hoon ke maine jo abhi kaha hai, iske baad ki lines kehne ki naubat kabhi na aaye" Kamini ne dheere se pichhe hote hue kaha
"Ji?" Inder ne Kamini ki aur dekhte hue puchha
Kamini phir se hasne lagi aur Inder phir usko ektuk dekhne laga
"Kabhi is Ji ke siwa kuchh aur bhi kahiye Thakur Indrasen Rana" Kamini ne kaha aur sidhiyan utarkar neeche chali gayi
Inder samajh gaya tha ke jis tarah vo apne doston se Kamini ke baare mein malum karne ki koshish kar raha tha vaise hi Kamini ne bhi uska naam kahin se malum kiya tha. Thodi hi der baad baraat vida ho gayi. Jaate hue Inder ko Kamini kahin nazar nahi aayi par vo janta tha ke vo use phir zaroor milega.

Shaadi ke 2 din baad Inder apne kamre mein soya hua tha. Subah ke 9 baj rahe the par use der se sone aur der tak sote rehne ki aadat thi. Uske paas rakha phone bajne laga to chidkar Inder ne takiya apne munh par rakh liya. Phone lagatar bajta raha to usne gusse mein phone uthaya.
"Hello" Aadhin neend mein Inder bola.
Doosri taraf se vahi thehri hui dheemi aawaz aayi jisne 2 din pehle Inder ko pagal sa kar diya tha.


Lazzat-e-gham badha dijiye,
Aap yun muskura dijiye,

Qeeamt-e-dil bata dijiye,
Khaak lekar uda dijiye,

Mera daman bahut saaf hai
Koi ilzaam laga dijiye



"Kamini" Inder bistar par fauran uth betha.
"Hamen to laga ke aap hamen bhool gaye" Doosri taraf se Kamini ki aawaz aayi
"Kaise bhool sakta hoon par aap apne number dekar hi nahi gayin" Inder apni safai mein bola
"Number to aapne bhi nahi diya par hamen to mil gaya" Kamini ne kaha to Inder ke paas ab koi jawab nahi tha.
Kuchh der tak vo idhar udhar ki baaten karte rahe. Kamini ne use apne baare mein bataya aur Inder ne Kamini ko apne baare mein. Khabar hi nahi hui ke dono ko baat karte karte kab 2 ghante se zyada waqt ho gaya. Aakhir mein Inder ne phir se milne ki baat ki to Kamini khamosh ho gayi.
"Kya hua?" Inder ne puchha "Aap milna nahi chahti?"
"Agar insaan ke chahne se sab kuchh ho jaaya karta to phir duniya mein itni museebat na hua karti" Doosri taraf se Kamini ki aawaz aayi "Ham phir phone karenge"
Kehkar Kamini ne phone rakh diya. Inder pareshan sa phone ki taraf dekhne laga. Is baar bhi Kamini ne use apna phone number nahi diya tha.

"Phir kya hua?" Rupali khamoshi se bethi Inder ki baat sun rahi thi
"Usne us din phone aise hi rakh diya par main samajh chuka tha ke vo bhi mujhe chahti hai. Maine apne us dost ko phone kiya jiski shaadi mein mujhe Kamini mili thi aur uski biwi ke zariye maine Kamini ka phone number nikal liya. Yaani yahan haweli ka number" Inder ne kaha
":Hmmmmm "Rupali ne haami bhari
"Par museebat ye thi ke agar main phone karun to pata nahi Kamini uthati ya koi aur. Phir bhi maine koshish ki. 3 din tak main lagatar koshish karta raha par har baar koi aur hi phone uthata aur mujhe phone kaatna padta. Is beech Kamini ne bhi mujhe phone nahi kiya. 3 din baad ek din maine phone kiya to phone Kamini ne uthaya. Pehle to vo mere phone karne par zara pareshan hui ke mujhe yun phone nahi karna chahiye tha aur agar ghar mein kisi ko pata chala to museebat aa jayegi. Par phir khud hi haskar kehne lagi ke vo dekhna chahti thi ke main phone karunga ya nahi isliye khud bhi mujhe 3 din se phone nahi kar rahi thi. Ye thi meri aur uski pehli mulaqat. Iske baad ham dono ke beech phone shuru ho gaye aur ham ghanto ek doosre se baaten karte rehte. Mujhe khabar hi nahi hui ke main kab Kamini ko itna chahne laga tha par vo thi ke mujhse milne ko taiyyar hi nahi hoti thi. Phir takreeban 6 mahine baad vo mujhse milne ko taiyyar hui." Inder ab bina ruke apni poori kahani bata raha tha
"Sheher mein milte the tum dono?" Rupali ne puchha
"Haan" Inder ne haan mein sar hilaya "Kamini gaadi akeli hi laati thi. Na driver na bodyguard. Un dino vo kaafi khush rehti thi. Ham saath rehte, baaten karte aur kuchh waqt saath guzarne ke baad vo vapis chali aati. Un dino mein aisa kuchh nahi hua jo kuchh ajeeb ho. Bas ek ladka ladki milte aur ek doosre ka haath thaame ghanto baaten karte rehte. Kuchh din baad jaane kaise par aapki shaadi Kamini ke ghar hi pakki ho gayi. Ham dono is baat ko lekar bahut khush the aur ise apni khushmati maan rahe the. Main isliye khush tha ke main aapki shaadi ke baad bina kisi pareshani ke haweli mein aa ja sakta tha aur vo isliye khush thi ke use mere saath shaadi ki baat chalane ka ek bahana mil gaya tha, yaani ke aap. Par vo chahkar bhi kabhi aapse baat nahi kar saki aur na hi main aur iski vajeh thi ke aap mandir se kabhi bahar hi nahi nikalti thi. Ham dono ye sochkar chup reh jaate ke jaane aap kaise react karengi. Isi uljhan mein kab waqt guzarta chala gaya hamen pata hi nahi chala. Kabhi kabhi main aapse milne ke bahane haweli aa jaya karta tha par ab bhi ham zyadatar bahar hi mila karte the"
"Kamini mein badlav kab dekha tumne" Rupali ne puchha
"Aakhri kuchh dino mein. Jijaji ke marne se koi 2 mahine pehle se. Ek din vo mujhse milne sheher aayi" Inder ne batana shuru kiya
Inder apni gaadi roke koi ek ghante se Kamini ka intezaar kar raha tha. Kabhi aisa nahi hota tha ke Kamini der se pahunche, balki vo Inder se pehle hi pahunch jaati thi par aaj Inder ko intezaar karna pad raha tha. Vo sheher ke bahar ek sunsaan ilaake mein gaadi roke khada tha. Kamini aur vo aksar yahin mila karte the.
Thodi der baad use Kamini ki gaadi aati hui nazar aayi. Vo apni car se bahar nikla. Kamini ne uski car ke pichhe lakar apni car roki aur uski taraf chalti hui aayi.
"Sorry" Kamini ne kareeb aate hue kaha "Aaj der ho gayi"
"Koi baat nahi" Inder ne muskurate hue kaha "Itne waqt se tum mera intezaar karti thi. Aaj maine kar liya to kaun si badi baat hai"
Inder ne apni car ka darwaza khola aur vo dono uski car ki backseat par beth gaye. Dopahar ka waqt tha aur garmi sar chadhkar bol rahi thi. Inder ne car ka AC on kar diya
Kamini aaj Inder se poore 2 mahine baad mil rahi thi. Vo 2 mahine se koshish kar raha tha par Kamini mana kar deti thi. Usne haweli jaane ki sochi par vahan vo akele mein waqt nahi bita paate the.
"Kya hua?" Inder ne Rupali ke maathe par haath pherte hue kaha "Pareshan si lag rahi ho"
"Kuchh nahi" Kamini ne zabardasti muskurate hue kaha "Thak gayi hoon"
"Inder car ki backseat par ek kone mein ho gaya aur Kamini ko ishara kiya ke vo let jaaye. Kamini ne pehle to mana kiya par Inder ke zor daalne par vo let gayi aur apna sar Inder ki jaangh par rakh liya
"Kya hua aaj hamesha ki tarah koi shayri nahi?" Inder ne puchha
"Jab zindagi khud apni shayri sunana shuru kar de to insaan kahan shayri kar pata hai" Kamini ne udaas si aawaz mein jawab diya
"Kya hua?" Inder ne dobara puchha
"Kuchh nahi. Bas insaan ka chehra dekhkar kabhi kabhi samajh nahi aata ke asli kaun sa hai aur nakli kaun sa" Kamini ne kaha aur apni aankhen band kar li
Inder ne uske udaas chehre ki taraf dekha aur aage kuchh na puchha. Vo pyaar se Kamini ke sar par haath pherta raha
Kamini ne salwar kameez pehen rakhi thi. Inder ki god mein lete hone ki vajah se uska dupatta sarak kar car mein neeche gir pada tha. Vo is tareeke se leti hui thi ke dono taange bhi uper seat par thi aur uska poora jism muda hua tha jiski vajah se neeche de dabav padne ke karan uski chhatiyan kameez ke uper se bahar ko nikal rahi thi.
Inder ki nazar Kamini ki chhatiyon par padi to pehle to usne nazar pher li par phir dobara usi taraf dekhne laga. Kamini aur uske beech ab tak koi jismani rishta nahi bana tha. Kabhi kabhi vo dono ek doosre ko choom lete the aur bas. Na to kabhi isse aage baat gayi aur na hi Inder ne koshish ki ke isse aage kuchh aur kare. Par aaj Kamini ko yun is halat mein dekhkar uske dil ki dhadkan tez hone lagi.
Uska haath Kamini ke sar par ruk gaya tha. Kuchh der tak aankhen band rakhne ke baad Kamini ne aankhen kholi aur Inder ki taraf dekha. Inder ki nazar ab bhi uski chhatiyon par thi. Kamini ne sharma kar apne dono haath apne seene par rakh liye.
Uski is harkat se Inder ne uski aankhon mein dekha. Vo dheere se neeche jhuka aur apne honth Kamini ke honth par rakh diye. Kamini ke munh se aah nikal gayi aur uska haath Inder ka sar sehlane laga. Dono ke honth aapas mein ek doosre se chipak gaye aur zubaan ek doosre ki zubaan se takrane lagi. Apne honth Kamini ke honthon se chipkaye hue hi Inder ne apne ek haath se Kamini ke haathon ko uske seene se hataya. Kamini ne inkaar karna chaha par Inder ki zid ke aage haar mankar apne haath hata diye. Inder ka haath uske gale se hote hua uske seene par aaya aur kameez ke uper se hi Kamini ki chhatiyan dabane laga. Ab tak Kamini ki saansen bhi bhaari ho chali thi. Ye pehli baar tha ke vo aur Inder itne kareeb aaye the aur Inder ne uske jism ko chhua tha. Usne bhi palatkar poore zor se Inder ko choomna shuru kar diya.
Thodi der kameez ke uper se hi chhatiyan sehlane ke baad Inder ka haath phir Kamini ke gale par aaya aur is baar uske kameez ke galey se hote hue andar gaya aur phir bra ke andar ghusta hua sidha Kamini ki nangi chhati par aa gaya. Kamini ka poora jism aisa hila jaise usey koi zabardast jhatka laga ho. Usne apne honth Inder ke honth se hataya, uska haath pakadkar bahar khincha aur uthkar beth gayi. Bethkar vo zor zor se saans lene lagi aur apne baal theek karne lagi. Neeche pada dupatta uthakar usne apne gale mein daal liya
"Kya hua?" Inder ne puchha.
Kamini ne jawab diya to usne apna haath uske haath par rakha
"Kya hua Kamini? Bura laga kya?" Inder ne uske kareeb hone ki koshish ki par Kamini door hoti hui car ka darwaza kholkar bahar nikal gayi
"Ok i am sorry" Inder bhi apni taraf ka darwaza kholkar bahar nikla "Tum janti ho main tumse pyaar karna chahta hoon aur shaadi karna chahta hoon isliye shayad thoda aage badh gaya. Kuchh galat kiya maine?"
"Nahi. Kuchh galat nahi kiyá"Kamini palatkar chillayi "Ye to hamare rishte ke liye bahut zaroori tha na"
"Kamini !!!!! " Inder ne pehli baar Kamini ko yun chillate dekha tha isliye hairani se uski taraf dekhne laga
"Is jism mein aisa kya hai Inder jo har koi pagal hua rehta hai iske pichhe. Ke apni aag logon se sambhali nahi jaati" Kamini ab bhi gusse mein thi
"Kya matlab?" Inder ko samajh nahi aa raha tha ke Kamini yun over react kyun kar rahi thi
"Har kisi ko yahi chahiye, hai na? Har kisi ko bas isi ek cheez ki khwahish lagi rehti hai. Phir na to rishte matlab rakhte hain aur na koi aur cheez. Phir chahe jitna girna pade par jism ki aag bujhni chahiye, chahe kisi ke saath bhi ho. Phir ye nazar nahi aata ke kaun apne ghar ka hai aur kaun ........." Kamini ne baat adhuri chhod di. Inder ab bhi usko chup khada dekh raha tha
"Bas yahi ek cheez chahiye sabko" Kamini ne dono haath hawa mein phelate hue phir apni baat dohrayi
"Sabko matlab" Inder bas itna hi keh saka. Kamini uski baat ka jawab diye bina apni car mein bethi aur vahan se nikal gayi.

"Uske baad?" Rupali Inder se puchha
"Vo aakhri baar tha jab Kamini mere itne kareeb aayi thi. Uske baad agle 2 mahine tak main phone try karta raha par usse baat nahi ho paayi. Main kai baar haweli aapse milne aaya par vo mujhe dekhkar apne kamre mein chali jaati thi aur tab tak bahar nahi aati thi jab tak ke main vapis na chala jaoon" Inder bola
"Usne kuchh nahi bataya ke vo kis baat ko lekar itna pareshaan thi?" Rupali ko samajh nahi aa raha tha ke kya soche
"Is baat ka mauka hi nahi mila Didi ke main usse aaram se bethkar baat kar pata ya kuchh puchh pata. Us din jab vo mili to mujhse ladkar chali gayi thi. Pata nahi kiska gussa usne mujhpar nikala tha Aur uske baad kabhi hamen mauka hi nahi mila ke aaram se bethkar baat kar paate" Inder ne kaha
"To apni revolver kab di tumne usko?" Rupali ne puchha
"Jijaji ke khoon se 3 din pehle uska mere paas phone aaya" Inder ne aage bata shuru kiya
Inder apne kamre mein betha ek kitaab padh raha tha. Phone ki ghanti baji to usne aage badhkar phone uthaya. Phone ke doosri taraf se Kamini ke rone ki aawaz aayi.
"KAMINI" Inder jaise chilla utha "Oh thank god Kamini. Mujhe to laga tha ke tum mujhse ab kabhi baat hi nahi karogi. Meri galti ki itni badi saza de rahi thi mujhe?"
Doosri taraf se Kamini ne kuchh nahi kaha. Bas roti rahi. Uske rone ki aawaz aisi thi jaise vo bahut takleef mein ho. Inder se bardasht nahi hua. Uski apni aankho mein pani aa gaya
"Mujhe maaf kar do Kamini. Main manta hoon ke galti meri hai. Mujhe shaadi se pehle aisi harkat nahi karni chahiye thi. Par tum janti ho main tumse kitna pyaar karta hoon. Main aaj hi tumse shaadi karne ko taiyyar hoon agar tum kaho to. Ham apne ghar mein baat kar lenge. Nahi maane to court marriage kar lenge. Mera yakeen karo Kamini" Inder pagalon ki tarah kehta ja raha tha.
Kuchh der dono khamosh rahe. Thodi der baad Rupali ne rote rote kaha
"Mujhe nahi pata ke ab main kiska yakeen karun aur kiska nahi Inder. Ab to har koi ajnabi sa lagne laga hai. Har kisi ki shakal dekhkar aisa lagta hai jaise usne apni shakal par ek parda sa daal rakha ho. Andar se kuchh aur aur bahar se kuchh aur. Kismat ka khel to dekho Inder ke jo apne the vo paraye ho gaye aur jo paraya tha vo apna gaya."
"Main kabhi paraya nahi tha Kamini. Main to hamesha se tumhara apna tha. Tum aisi baaten kyun kar rahi ho?" Inder tadapkar bola
Phone par phir thodi der tak khamoshi bani rahi
"Meri jaan ko khatra hai Inder" Rupali ne rona band karte hue kaha
Inder ko aisa laga jaise usko 1000 watt ka jhatka laga ho
"Kisse?" Usne puchha
"Ye sab baaten baad mein. Main abhi zyada der baat nahi kar sakti. Tum meri baat suno. Tum mujhe koi hathyaar de sakte ho? Hifazat ke liye? Tumhari koi pistol ya revolver?" Kamini ab bahut dheere dheere bol rahi thi
"Pistol? Revolver? Tum kya keh rahi ho meri kuchh samajh nahi aa raha" Inder ke sachmuch kuchh bhi palle nahi pad raha tha
"Abhi samjhane ka waqt nahi hai. Tum ek kaam karo. Kal dopahar 2 baje usi jagah par mera intezaar karna jahan ham aakhri baar mile the. Aur apni revolver lekar aana" Kamini ne kaha
"Kamini meri baat suno" Inder bola "Kal 2 baje to main aa jaoonga par ......."
Vo abhi keh hi raha tha ke pichhe se Sarita Devi ki aawaz aayi"
"Kamini beta"
Aur Kamini ne phone kaat diya.


साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj



sexi haveli ka such --22

Thodi der baad Rupali darwaza kholkar Inder ke kamre mein dakhil hui. Inder bistar par sar pakde aise betha tha jaise lut gaya ho.
"Sach kya hai Inder? Main janti hoon tu kuchh chhupa raha hai mujhse" Vo Inder ke kareeb jaate hue boli
Inder ne koi jawab nahi diya. Bas sar pakde betha raha.
"Tujhe bataya nahi maine par ab sochti hoon ke bata hi doon." Rupali Inder ke theek saamne ja khadi hui "Kamini ka passport mujhe yahin haweli mein mila. Har vo cheez jo vo jaane se pehle pack karke le gayi thi vo yahin haweli mein band ek kamre mein mili. Vo videsh kabhi gayi hi nahi Inder aur koi nahi janta ke pichhle 10 saal se kahan hai"
Rupali ki baat sunkar Inder ne uski taraf nazar uthayi. Vo aankhen phelaye Rupali ki taraf dekh raha tha. Aankhon mein ek khamosh sawal tha jaise ke vo Rupali se puchh raha ho ke kya vo sach bol rahi hai. Rupali ne bhi usi khamoshi se haan mein sar hilaya
"Mujhe khud abhi 3-4 din pehle hi pata chala" Rupali ne kaha
"Aur kisi ne uske baare mein pata karne ki koshish nahi ki?" Inder ko jaise ab bhi yakeen nahi ho raha tha
"Pata nahi. Jisse puchhti hoon vo yahi kehta hai ke Kamini videsh mein hai. Thakur Sahab hospital mein hain aur unke accident hone se pehle mujhe ye baat pata nahi thi isliye unse baat karna abhi baaki hai" Rupali ne kaha
"Main janta tha ke kuchh gadbad hui hai varna aisa ho hi nahi sakta tha ke vo ek baar bhi mujhe phone na kare. Aapne police mein bataya?" Inder ki aawaz se saaf pata chal raha tha ke use ab bhi is baat par yakeen nahi ho raha tha
"Khan ye baat pehle se hi janta hai. Asal mein usne hi mujhse ye baat sabse pehle batayi thi" Rupali ne Kaha
"Aapne Kuldeep ko phone nahi kiya? Uske paas hi to gayi thi Kamini" Inder sochta hua bola
"Uske jitne number mujhe mil sake maine sab try kiye. Ek bhi kaam nahi kar raha" Rupali ne kaha to Inder phir apna sar pakad kar beth gaya
"Mujhe lagta hai ke ab waqt aa gaya hai ke tum mujhe sab sach batao. Shuru se aakhir tak." Rupali ne puchha to Inder inkaar mein sar hilane laga
Rupali ne uska chehra apne hathon mein liya aur uper uthakar Inder ki aankhon mein dekha
"Ek waqt tha jab teri har baat mujhe pata hoti thi Inder. Main teri behen se zyada teri dost thi. Har chhoti badi shararat tu mujhe bataya karta tha aur main tujhe bachaya karti thi. Ab kya hua mere bhai? Kab itna badal gaya tu ke apni behen se baaten chhupane laga?"
Rupali ki baat sunkar Inder ki aankhon se pani behne laga
"Kal raat jab main Kamini ke kamre mein kuchh talash kar rah tha aur aap aa gayi thi tab maine aapko kaha tha ke main vo papers dhoondh raha tha jispar maine shayri likhi hui thi. Ye baat kuchh ajeeb nahi lagi aapko? Aakhir kuchh kagaz hi to the. Aisi koi badi museebat to nahi thi ke main aadhi raat ko Kamini ke kamre mein jata" Inder ne kaha
"Aajeeb to lagi thi par teri har baat par yakeen karne ki aadat si pad gayi hai mujhe isliye kuchh nahi boli" Rupali ne Inder ka chehra chhodkar uske saath bistar par ja bethi
"Main vo revolver dhoondh raha tha Didi. Meri revolver jungle mein nahi khoyi thi. Vo maine Kamini ko di thi. Aakhiri kuchh dino mein vo bahut pareshan si rehti thi. Kehti thi ke use haweli mein darr lagta hai. Apne hi gharwale use ajnabhi lagte hain kyunki har kisi ne apne chehre par ek nakli chehra laga rakha tha. Ek din vo mujhse milne aayi to ro rahi thi. Maine puchha to kuchh boli nahi bas mujhse meri gun maangi. Mujhe ajeeb laga. Main revolver use dena nahi chahta tha par uske aansoo dekh bhi nahi sakta tha. Dil ke hathon majboor hokar maine vo revolver Kamini ko de di."
Usne vapis nahi di?" Rupali hairan si Inder ko dekh rahi thi
"Naubat hi nahi aayi" Inder ne sar jhatakte hue kaha "Uske 2 din baad hi Jijaji ka khoon ho gaya aur phir main Kamini se mil nahi saka. Pichhle 10 saal se sochta raha ke aakar uska kamra dekhun ke shayad vo revolver yahin kahin rakha chhod gayi ho par himmat nahi padi. Ek do baar aapse milne ke bahane aaya bhi to Kamini ke kamre mein jaane ka mauka nahi mila"
"Tere paas Kamini ke kamre ki chaabhi kahan se aayi?" Rupali ko achanak yaad aaya ke Inder badi aasani se kamra kholkar andar chala gaya tha
"Vo jab aakhri baar milne aayi to bahur ghabrayi hui thi. Usi ghabrahat mein chabhi meri gaadi mein chhod gayi thi" Inder ne jawab diya
"Shuru se bata Inder. Sab kuchh" Rupali ne kaha
"Maine Kamini ko apne ek dost ki shaadi mein dekha tha" Inder ne batana shuru kiya

Party poore josh par thi. Inder sharab nahi peeta tha par aaj uske ek bahut kareebi dost ki shaadi thi isliye doston ke kehne par majbooran peeni padi. Thodi hi der baad use ehsaas ho gaya ke nasha ab uske sar par chadhne laga hai. Vo hamesha se apni zubaan par kaabu rakhne wala aadmi tha. Sirf utna hi bolta tha jitna zaroori ho. Kabhi bhi kahin par uski zubaan se aisi baat nahi nikalti thi jo vo na kehna chahta ho. Par insaan nashe mein ho to na khud par kaabu rehta hai aur na apni zubaan par aur ye baat Inder achhi tarah janta tha. Party mein maujood har ladki bas jaise usi ki taraf dekh rahi thi aur usse baat karne ya uske kareeb aane ki koshish kar rahi thi. Nashe ki halat mein kahin vo kisi ke saath koi badtameezi na kar de ye sochkar Inder ne sabse alag kahin akele jaakar bethne ka faisla kiya. Abhi vo nashe mein tha par nasha itna nahi tha ke vo hosh kho de par agar doston ke beech rehta to vo use aur pila dete aur phir baat kaabu se bahar ho jaati.
Akela Inder apne dost ki sasural ke ghar ki sidhiyan chadhta chhat ki aur chala. Chhat par pahunchte hi thandi hawa ka jhonka uske chehre par laga aur use kuchh rahat si mehsoos hui. Neeche cigerette ke dhuen mein uska dam sa ghutne laga tha.
Chhat par koi nahi tha. Inder ne kone mein rakhi ek chair dekhi aur jakar uspar beth gaya.
"Hey bhagwan " Usne zor se kaha "Insaan sharab kyun peeta hai"
Tabhi use chhat ke kone par kuchh aahat mehsoos hui. Nazar ghumakar dekha to vahan ek ladki khadi thi jo uske zor se bolne par mudkar uski taraf dekh rahi thi.
"Maaf kijiyega" Inder fauran chair se uth khada hua "Maine aapko dekha nahi. Shayad ye chair aap laayi hain uper. Aapki hai"
Us ladki ne ek nazar Inder par daali aur phir aasman ki taraf dekhne lagi. Inder ko ye thoda ajeeb laga. Neeche khadi har ladki bas usi ki taraf dekhe ja rahi thi aur is ladki ne uspar ek nazar daali thi. Aakhir aasman mein aisa kya hai jiske liye use bhi nazar andaz kar diya gaya. Ye sochte hue Inder ne aasman ki taraf nazar uthayi.


"Shikan liye muskurate labon pe,Baat aati hai kabhi kabhi,
Qurbaton mein pali vo zindagi, saath aati hai kabhi kabhi
Aasman se Chand churakar kahin le ja tu aaj sitamgar,
Jee lene de andhere ko, ke amavas ki raat aati hai kabhi kabhi"


Aasman ki taraf dekhte hue us ladki ne kaha
"Ji?" Inder ne uski taraf dekha "Apne mujhse kuchh kaha?"
Vo ladki phir se Inder ki taraf dekhne lagi
"Aap yahan uper akele mein kya kar rahe hain? Aaiye neeche chalen" Ladki ne kaha to is baar Inder ko aur zyada hairani hui. Kahan to har ladki akele mein usse baat karna chah rahi thi aur kahan ye ladki use vapis neeche jaane ko keh rahi thi.
Inder ne ek nazar uspar daali. Vo ek mamuli soorat ki aam si dikhne wali ladki thi. Halka saawla rang, gol chehra, kaali aankhen aur kaale baal.
"Main agar neeche gaya to museebat aa jayegi. Mere dost phir se mere haath mein sharab thama denge" Usne muskurate hue us ladki se kaha
"To kya hua? Yahan to har koi pee raha hai" Us ladki ne kaha
"Ji haan par agar main pee loon to main pagal ho jata hoon. Apne hosh mein nahi rehta. Agar ek baar mujhe nasha chadh jaaye to main beech bazar mein nachna shuru kar doon" Inder ne halka sharmate hue jawab diya
Uski baat sunkar vo ladki has padi. Uske hasne ki aawaz aisi thi ke Inder bas use dekhta reh gaya. Ladki ne haath ke ishare se use phir neeche chalne ko kaha to Inder ne fauran inkaar mein sar hila diya
"Ji bilkul nahi. Na to mera aaj pagal hone ka irada hai aur na kahin nashe mein nachne ka, na bazar mein aur na hi yahan party mein"
Uski baat sunkar vo ladki uske thoda kareeb aayi aur halki si aawaz mein aise boli jaise koi raaz ki baat bata rahi ho


"Aaj bazaar mein pabajola chalo
Dast afshaan chalo,Mast-o-raksaan chalo
khaak barsar chalo,khoon badama chalo
raah takta hai sab,Sheher-e-jaana chalo
Haakim-e-sheher bhi, Majma-e-aam bhi
Teer-e-ilzaam bhi, sang-e-dushnaam bhi
Subah-e-nashad bhi, Roz-e-nakam bhi
Inka damsaaz apne siwa kaun hai
Sheher-e-jaana mein ab basifa kaun hai
Dast-e-qatil ke shaayan raha kaun hai
Rakht-e-dil baandh lo, dilfigaro chalo
Phir ham hi qatl ho aayen yaaro chalo"


"Ji?" Ek shabd bhi Inder ke palle nahi pada "Ye kaun si bhasha thi"
Uski baat sunkar vo ladki phir khilkhilakar hasne lagi aur sidhiyan utarkar neeche chali gayi.
Neeche aakar Inder ne pata kiya to Ladki ka naam Kamini tha aur vo Thakur Shaurya Singh ki beti thi. Kamini mein aisa kuchh bhi nahi tha jispar aakar kisi ki nazar tham jaaye par jaane kyun Inder ki nazar baar baar usi par aakar rukti. Jis tarah se vo uper khadi aasman ko dekh rahi thi, jis tarah se usne haath se ishara karke Inder ko neeche chalne ko kaha tha, aur jis tarah se vo kuchh dheere se kehti thi jo Inder ko samajh nahi aaya tha, in sab baaton mein Inder ulajh kar reh gaya the. Poori raat party mein vo bas Kamini ko hi dekhta raha aur usne mehsoos kiya ke vo bhi palatkar usi ki taraf dekh rahi thi. Kai baar dono ki nazar aapas mein takrati aur dono ne muskura kar nazar pher lete.
Subah ke 4 baj rahe the. Inder ladkewalon ki taraf se baraat ke saath aaya tha jabki Kamini ladki walo ki taraf se thi. Vidayi ki waqt ho gaya tha aur har koi dulha aur dulhan ke aas paas bhatak raha tha. Inder janta tha ke thodi der baad usko jaana hoga par vo Kamini se ek baar baat karna chahta tha. Jaane kya tha ke uski nazar pagalon ki tarah bheed mein Kamini ko talash rahi thi par vo kahin nazar nahi aayi. Achanak Inder ko chhat ka khyaal aaya aur vo bhagta hua phir chhat par pahuncha. Jaisa ki usne socha tha, Kamini vahin khadi phir se aasman ki taraf dekh rahi thi. Inder bhagta hua chhat par aaya tha isliye uski saans phool rahi thi. Uske haafne ki aawaz sunkar Kamini uski taraf palti aur khamoshi se use dekhne lagi. Kuchh der tak Inder bhi kuchh nahi bola aur chhat ki deewar ka sahara lekar khada ho gaya.
"Shukriya" Thodi der baad Kamini boli
Inder ne sawaliya nazar se uski taraf dekha
"Kis baat ke liye?" Usne Kamini se puchha
"Aaj raat ke liye. Aaj raat aap hamare saath rahe uske liye" Kamini ne ek nazar Inder ki taraf dekha aur phir aasman ki taraf dekhne lagi
"Main aapke saath kahan tha. Aapko to apni doston se waqt hi nahi mila" Inder ne Kamini ki taraf dekha. Vo ab bhi uper hi dekh rahi thi
"Kya dekh rahi hain aap? Kya hai aasman mein" Aakhir Inder ne puchh hi liya
Uski baat sunkar Kamini ne uski taraf dekha aur uske sawal ko nazar andaaz kar diya
"Bhale aap khud hamare saath nahi the par aapki nazar ne hamen ek pal ke liye bhi akela kahan hone diya. Poori raat aapki nazar hamare saath rahi" Kamini ne kaha to Inder ne muskurate hue nazar neechi kar li
"To aap janti thi?" Usne Kamini se puchha
Jawab mein Kamini kuchh nahi boli. Bas khamoshi se uske kareeb aayi aur phir usi halki si aawaz mein boli, jaise koi bahut bade raaz ki baat bata rahi ho



"Kuchh is ada se aap yun pehlu-nashin rahe
Jab tak hamare paas rahe, ham nahin rahe
Ya rab kisi ke raaz-e-mohabbat ki khair ho
Dast-e-junoon rahe na rahe aasteen rahe"



Inder ko ek baar phir poori tarah se Kamini ki baat samajh nahi aayi par vo kis mohabbat ke raaz ki baat kar rahi thi ye vo achhi tarah samajh gaya tha. Usne Kamini ki taraf dekha.
"Dua karti hoon ke maine jo abhi kaha hai, iske baad ki lines kehne ki naubat kabhi na aaye" Kamini ne dheere se pichhe hote hue kaha
"Ji?" Inder ne Kamini ki aur dekhte hue puchha
Kamini phir se hasne lagi aur Inder phir usko ektuk dekhne laga
"Kabhi is Ji ke siwa kuchh aur bhi kahiye Thakur Indrasen Rana" Kamini ne kaha aur sidhiyan utarkar neeche chali gayi
Inder samajh gaya tha ke jis tarah vo apne doston se Kamini ke baare mein malum karne ki koshish kar raha tha vaise hi Kamini ne bhi uska naam kahin se malum kiya tha. Thodi hi der baad baraat vida ho gayi. Jaate hue Inder ko Kamini kahin nazar nahi aayi par vo janta tha ke vo use phir zaroor milega.

Shaadi ke 2 din baad Inder apne kamre mein soya hua tha. Subah ke 9 baj rahe the par use der se sone aur der tak sote rehne ki aadat thi. Uske paas rakha phone bajne laga to chidkar Inder ne takiya apne munh par rakh liya. Phone lagatar bajta raha to usne gusse mein phone uthaya.
"Hello" Aadhin neend mein Inder bola.
Doosri taraf se vahi thehri hui dheemi aawaz aayi jisne 2 din pehle Inder ko pagal sa kar diya tha.


Lazzat-e-gham badha dijiye,
Aap yun muskura dijiye,

Qeeamt-e-dil bata dijiye,
Khaak lekar uda dijiye,

Mera daman bahut saaf hai
Koi ilzaam laga dijiye



"Kamini" Inder bistar par fauran uth betha.
"Hamen to laga ke aap hamen bhool gaye" Doosri taraf se Kamini ki aawaz aayi
"Kaise bhool sakta hoon par aap apne number dekar hi nahi gayin" Inder apni safai mein bola
"Number to aapne bhi nahi diya par hamen to mil gaya" Kamini ne kaha to Inder ke paas ab koi jawab nahi tha.
Kuchh der tak vo idhar udhar ki baaten karte rahe. Kamini ne use apne baare mein bataya aur Inder ne Kamini ko apne baare mein. Khabar hi nahi hui ke dono ko baat karte karte kab 2 ghante se zyada waqt ho gaya. Aakhir mein Inder ne phir se milne ki baat ki to Kamini khamosh ho gayi.
"Kya hua?" Inder ne puchha "Aap milna nahi chahti?"
"Agar insaan ke chahne se sab kuchh ho jaaya karta to phir duniya mein itni museebat na hua karti" Doosri taraf se Kamini ki aawaz aayi "Ham phir phone karenge"
Kehkar Kamini ne phone rakh diya. Inder pareshan sa phone ki taraf dekhne laga. Is baar bhi Kamini ne use apna phone number nahi diya tha.

"Phir kya hua?" Rupali khamoshi se bethi Inder ki baat sun rahi thi
"Usne us din phone aise hi rakh diya par main samajh chuka tha ke vo bhi mujhe chahti hai. Maine apne us dost ko phone kiya jiski shaadi mein mujhe Kamini mili thi aur uski biwi ke zariye maine Kamini ka phone number nikal liya. Yaani yahan haweli ka number" Inder ne kaha
":Hmmmmm "Rupali ne haami bhari
"Par museebat ye thi ke agar main phone karun to pata nahi Kamini uthati ya koi aur. Phir bhi maine koshish ki. 3 din tak main lagatar koshish karta raha par har baar koi aur hi phone uthata aur mujhe phone kaatna padta. Is beech Kamini ne bhi mujhe phone nahi kiya. 3 din baad ek din maine phone kiya to phone Kamini ne uthaya. Pehle to vo mere phone karne par zara pareshan hui ke mujhe yun phone nahi karna chahiye tha aur agar ghar mein kisi ko pata chala to museebat aa jayegi. Par phir khud hi haskar kehne lagi ke vo dekhna chahti thi ke main phone karunga ya nahi isliye khud bhi mujhe 3 din se phone nahi kar rahi thi. Ye thi meri aur uski pehli mulaqat. Iske baad ham dono ke beech phone shuru ho gaye aur ham ghanto ek doosre se baaten karte rehte. Mujhe khabar hi nahi hui ke main kab Kamini ko itna chahne laga tha par vo thi ke mujhse milne ko taiyyar hi nahi hoti thi. Phir takreeban 6 mahine baad vo mujhse milne ko taiyyar hui." Inder ab bina ruke apni poori kahani bata raha tha
"Sheher mein milte the tum dono?" Rupali ne puchha
"Haan" Inder ne haan mein sar hilaya "Kamini gaadi akeli hi laati thi. Na driver na bodyguard. Un dino vo kaafi khush rehti thi. Ham saath rehte, baaten karte aur kuchh waqt saath guzarne ke baad vo vapis chali aati. Un dino mein aisa kuchh nahi hua jo kuchh ajeeb ho. Bas ek ladka ladki milte aur ek doosre ka haath thaame ghanto baaten karte rehte. Kuchh din baad jaane kaise par aapki shaadi Kamini ke ghar hi pakki ho gayi. Ham dono is baat ko lekar bahut khush the aur ise apni khushmati maan rahe the. Main isliye khush tha ke main aapki shaadi ke baad bina kisi pareshani ke haweli mein aa ja sakta tha aur vo isliye khush thi ke use mere saath shaadi ki baat chalane ka ek bahana mil gaya tha, yaani ke aap. Par vo chahkar bhi kabhi aapse baat nahi kar saki aur na hi main aur iski vajeh thi ke aap mandir se kabhi bahar hi nahi nikalti thi. Ham dono ye sochkar chup reh jaate ke jaane aap kaise react karengi. Isi uljhan mein kab waqt guzarta chala gaya hamen pata hi nahi chala. Kabhi kabhi main aapse milne ke bahane haweli aa jaya karta tha par ab bhi ham zyadatar bahar hi mila karte the"
"Kamini mein badlav kab dekha tumne" Rupali ne puchha
"Aakhri kuchh dino mein. Jijaji ke marne se koi 2 mahine pehle se. Ek din vo mujhse milne sheher aayi" Inder ne batana shuru kiya
Inder apni gaadi roke koi ek ghante se Kamini ka intezaar kar raha tha. Kabhi aisa nahi hota tha ke Kamini der se pahunche, balki vo Inder se pehle hi pahunch jaati thi par aaj Inder ko intezaar karna pad raha tha. Vo sheher ke bahar ek sunsaan ilaake mein gaadi roke khada tha. Kamini aur vo aksar yahin mila karte the.
Thodi der baad use Kamini ki gaadi aati hui nazar aayi. Vo apni car se bahar nikla. Kamini ne uski car ke pichhe lakar apni car roki aur uski taraf chalti hui aayi.
"Sorry" Kamini ne kareeb aate hue kaha "Aaj der ho gayi"
"Koi baat nahi" Inder ne muskurate hue kaha "Itne waqt se tum mera intezaar karti thi. Aaj maine kar liya to kaun si badi baat hai"
Inder ne apni car ka darwaza khola aur vo dono uski car ki backseat par beth gaye. Dopahar ka waqt tha aur garmi sar chadhkar bol rahi thi. Inder ne car ka AC on kar diya
Kamini aaj Inder se poore 2 mahine baad mil rahi thi. Vo 2 mahine se koshish kar raha tha par Kamini mana kar deti thi. Usne haweli jaane ki sochi par vahan vo akele mein waqt nahi bita paate the.
"Kya hua?" Inder ne Rupali ke maathe par haath pherte hue kaha "Pareshan si lag rahi ho"
"Kuchh nahi" Kamini ne zabardasti muskurate hue kaha "Thak gayi hoon"
"Inder car ki backseat par ek kone mein ho gaya aur Kamini ko ishara kiya ke vo let jaaye. Kamini ne pehle to mana kiya par Inder ke zor daalne par vo let gayi aur apna sar Inder ki jaangh par rakh liya
"Kya hua aaj hamesha ki tarah koi shayri nahi?" Inder ne puchha
"Jab zindagi khud apni shayri sunana shuru kar de to insaan kahan shayri kar pata hai" Kamini ne udaas si aawaz mein jawab diya
"Kya hua?" Inder ne dobara puchha
"Kuchh nahi. Bas insaan ka chehra dekhkar kabhi kabhi samajh nahi aata ke asli kaun sa hai aur nakli kaun sa" Kamini ne kaha aur apni aankhen band kar li
Inder ne uske udaas chehre ki taraf dekha aur aage kuchh na puchha. Vo pyaar se Kamini ke sar par haath pherta raha
Kamini ne salwar kameez pehen rakhi thi. Inder ki god mein lete hone ki vajah se uska dupatta sarak kar car mein neeche gir pada tha. Vo is tareeke se leti hui thi ke dono taange bhi uper seat par thi aur uska poora jism muda hua tha jiski vajah se neeche de dabav padne ke karan uski chhatiyan kameez ke uper se bahar ko nikal rahi thi.
Inder ki nazar Kamini ki chhatiyon par padi to pehle to usne nazar pher li par phir dobara usi taraf dekhne laga. Kamini aur uske beech ab tak koi jismani rishta nahi bana tha. Kabhi kabhi vo dono ek doosre ko choom lete the aur bas. Na to kabhi isse aage baat gayi aur na hi Inder ne koshish ki ke isse aage kuchh aur kare. Par aaj Kamini ko yun is halat mein dekhkar uske dil ki dhadkan tez hone lagi.
Uska haath Kamini ke sar par ruk gaya tha. Kuchh der tak aankhen band rakhne ke baad Kamini ne aankhen kholi aur Inder ki taraf dekha. Inder ki nazar ab bhi uski chhatiyon par thi. Kamini ne sharma kar apne dono haath apne seene par rakh liye.
Uski is harkat se Inder ne uski aankhon mein dekha. Vo dheere se neeche jhuka aur apne honth Kamini ke honth par rakh diye. Kamini ke munh se aah nikal gayi aur uska haath Inder ka sar sehlane laga. Dono ke honth aapas mein ek doosre se chipak gaye aur zubaan ek doosre ki zubaan se takrane lagi. Apne honth Kamini ke honthon se chipkaye hue hi Inder ne apne ek haath se Kamini ke haathon ko uske seene se hataya. Kamini ne inkaar karna chaha par Inder ki zid ke aage haar mankar apne haath hata diye. Inder ka haath uske gale se hote hua uske seene par aaya aur kameez ke uper se hi Kamini ki chhatiyan dabane laga. Ab tak Kamini ki saansen bhi bhaari ho chali thi. Ye pehli baar tha ke vo aur Inder itne kareeb aaye the aur Inder ne uske jism ko chhua tha. Usne bhi palatkar poore zor se Inder ko choomna shuru kar diya.
Thodi der kameez ke uper se hi chhatiyan sehlane ke baad Inder ka haath phir Kamini ke gale par aaya aur is baar uske kameez ke galey se hote hue andar gaya aur phir bra ke andar ghusta hua sidha Kamini ki nangi chhati par aa gaya. Kamini ka poora jism aisa hila jaise usey koi zabardast jhatka laga ho. Usne apne honth Inder ke honth se hataya, uska haath pakadkar bahar khincha aur uthkar beth gayi. Bethkar vo zor zor se saans lene lagi aur apne baal theek karne lagi. Neeche pada dupatta uthakar usne apne gale mein daal liya
"Kya hua?" Inder ne puchha.
Kamini ne jawab diya to usne apna haath uske haath par rakha
"Kya hua Kamini? Bura laga kya?" Inder ne uske kareeb hone ki koshish ki par Kamini door hoti hui car ka darwaza kholkar bahar nikal gayi
"Ok i am sorry" Inder bhi apni taraf ka darwaza kholkar bahar nikla "Tum janti ho main tumse pyaar karna chahta hoon aur shaadi karna chahta hoon isliye shayad thoda aage badh gaya. Kuchh galat kiya maine?"
"Nahi. Kuchh galat nahi kiyá"Kamini palatkar chillayi "Ye to hamare rishte ke liye bahut zaroori tha na"
"Kamini !!!!! " Inder ne pehli baar Kamini ko yun chillate dekha tha isliye hairani se uski taraf dekhne laga
"Is jism mein aisa kya hai Inder jo har koi pagal hua rehta hai iske pichhe. Ke apni aag logon se sambhali nahi jaati" Kamini ab bhi gusse mein thi
"Kya matlab?" Inder ko samajh nahi aa raha tha ke Kamini yun over react kyun kar rahi thi
"Har kisi ko yahi chahiye, hai na? Har kisi ko bas isi ek cheez ki khwahish lagi rehti hai. Phir na to rishte matlab rakhte hain aur na koi aur cheez. Phir chahe jitna girna pade par jism ki aag bujhni chahiye, chahe kisi ke saath bhi ho. Phir ye nazar nahi aata ke kaun apne ghar ka hai aur kaun ........." Kamini ne baat adhuri chhod di. Inder ab bhi usko chup khada dekh raha tha
"Bas yahi ek cheez chahiye sabko" Kamini ne dono haath hawa mein phelate hue phir apni baat dohrayi
"Sabko matlab" Inder bas itna hi keh saka. Kamini uski baat ka jawab diye bina apni car mein bethi aur vahan se nikal gayi.

"Uske baad?" Rupali Inder se puchha
"Vo aakhri baar tha jab Kamini mere itne kareeb aayi thi. Uske baad agle 2 mahine tak main phone try karta raha par usse baat nahi ho paayi. Main kai baar haweli aapse milne aaya par vo mujhe dekhkar apne kamre mein chali jaati thi aur tab tak bahar nahi aati thi jab tak ke main vapis na chala jaoon" Inder bola
"Usne kuchh nahi bataya ke vo kis baat ko lekar itna pareshaan thi?" Rupali ko samajh nahi aa raha tha ke kya soche
"Is baat ka mauka hi nahi mila Didi ke main usse aaram se bethkar baat kar pata ya kuchh puchh pata. Us din jab vo mili to mujhse ladkar chali gayi thi. Pata nahi kiska gussa usne mujhpar nikala tha Aur uske baad kabhi hamen mauka hi nahi mila ke aaram se bethkar baat kar paate" Inder ne kaha
"To apni revolver kab di tumne usko?" Rupali ne puchha
"Jijaji ke khoon se 3 din pehle uska mere paas phone aaya" Inder ne aage bata shuru kiya
Inder apne kamre mein betha ek kitaab padh raha tha. Phone ki ghanti baji to usne aage badhkar phone uthaya. Phone ke doosri taraf se Kamini ke rone ki aawaz aayi.
"KAMINI" Inder jaise chilla utha "Oh thank god Kamini. Mujhe to laga tha ke tum mujhse ab kabhi baat hi nahi karogi. Meri galti ki itni badi saza de rahi thi mujhe?"
Doosri taraf se Kamini ne kuchh nahi kaha. Bas roti rahi. Uske rone ki aawaz aisi thi jaise vo bahut takleef mein ho. Inder se bardasht nahi hua. Uski apni aankho mein pani aa gaya
"Mujhe maaf kar do Kamini. Main manta hoon ke galti meri hai. Mujhe shaadi se pehle aisi harkat nahi karni chahiye thi. Par tum janti ho main tumse kitna pyaar karta hoon. Main aaj hi tumse shaadi karne ko taiyyar hoon agar tum kaho to. Ham apne ghar mein baat kar lenge. Nahi maane to court marriage kar lenge. Mera yakeen karo Kamini" Inder pagalon ki tarah kehta ja raha tha.
Kuchh der dono khamosh rahe. Thodi der baad Rupali ne rote rote kaha
"Mujhe nahi pata ke ab main kiska yakeen karun aur kiska nahi Inder. Ab to har koi ajnabi sa lagne laga hai. Har kisi ki shakal dekhkar aisa lagta hai jaise usne apni shakal par ek parda sa daal rakha ho. Andar se kuchh aur aur bahar se kuchh aur. Kismat ka khel to dekho Inder ke jo apne the vo paraye ho gaye aur jo paraya tha vo apna gaya."
"Main kabhi paraya nahi tha Kamini. Main to hamesha se tumhara apna tha. Tum aisi baaten kyun kar rahi ho?" Inder tadapkar bola
Phone par phir thodi der tak khamoshi bani rahi
"Meri jaan ko khatra hai Inder" Rupali ne rona band karte hue kaha
Inder ko aisa laga jaise usko 1000 watt ka jhatka laga ho
"Kisse?" Usne puchha
"Ye sab baaten baad mein. Main abhi zyada der baat nahi kar sakti. Tum meri baat suno. Tum mujhe koi hathyaar de sakte ho? Hifazat ke liye? Tumhari koi pistol ya revolver?" Kamini ab bahut dheere dheere bol rahi thi
"Pistol? Revolver? Tum kya keh rahi ho meri kuchh samajh nahi aa raha" Inder ke sachmuch kuchh bhi palle nahi pad raha tha
"Abhi samjhane ka waqt nahi hai. Tum ek kaam karo. Kal dopahar 2 baje usi jagah par mera intezaar karna jahan ham aakhri baar mile the. Aur apni revolver lekar aana" Kamini ne kaha
"Kamini meri baat suno" Inder bola "Kal 2 baje to main aa jaoonga par ......."
Vo abhi keh hi raha tha ke pichhe se Sarita Devi ki aawaz aayi"
"Kamini beta"
Aur Kamini ne phone kaat diya.


साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj

Raj-Sharma-Stories.com

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