Saturday, February 8, 2014

बदनाम रिश्ते खानदानी चुदाई का सिलसिला--31

FUN-MAZA-MASTI


बदनाम रिश्ते
खानदानी चुदाई का सिलसिला--31


गतान्क से आगे..............
 दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी का इकत्तीसवां पार्ट लेकर हाजिर हूँ


बाबूजी हफ्ते - 10 दिन में एक बार मालिश किया करते थे. अक्सर कम्मो उनकी पीठ की मालिश करती थी क्योंकि ये काम वो बहुओं से नही करवाते थे. पीठ की मालिश कर के वो चली जाती थी. आज अलग तरीके की मालिश का दिन आ गया था. कम्मो को चोदे हुए बाबूजी को करीब महीना हो चला था. उस दिन घर पे कोई नही था और मुन्नी भी दोपहर को गई थी. बाबूजी और कम्मो ने जम के चोदन किया था. पर आज बाबूजी को एहसास हुआ कि उनका महीने - 20 दिन में चुदाई करना काफ़ी नही है.

बाबूजी टाय्लेट सीट पे बैठे कुच्छ सोच रहे थे कि दरवाजे पे दस्तक हुई. अंदर से ही उन्होने अंदर आने का आदेश दिया और फिर फ्रेश होके कच्छा पहेन के बाहर निकले. उनको पता था कि अब 20 - 25 मिनट तक उनके कमरे में कोई नही आएगा. कम्मो की घबराहट अभी पूरी तरह से गई नही थी. गरम तेल की का बर्तन ज़मीन पे रख के उसने चटाई बिच्छा दी. बाबूजी बिना कुच्छ बोले चटाई पे पेट के बल लेट गए और कम्मो ने उनकी मालिश शुरू कर दी. दोनो के बीच ये रूल था कि घर के सदस्यों के होते उनके बीच सेक्स नही होगा...पर आज बाबूजी ये रूल तोड़ने वाले थे.

''हाआँ अच्छे से कर .....ह्म कमर पे भी करना .......हान्णन्न्......बढ़िया.....बहुत अच्छे ...आज तू पहले से अच्छे से कर रही है.'' बाबूजी कम्मो को रिलॅक्स करवाना चाहते थे. कम्मो उनकी बात से खुश हो गई और अच्छे से उनकी मालिश करने लगी. राखी से बात करके डर के मारे चूत का गीलापन जो ख़तम हुआ था वो अब फिर वापिस आने लगा था. बाबूजी की नंगी पीठ पे हाथ फेरते हुए कम्मो को गर्मी चढ़ने लगी थी. उसने एक गहरे कट की चोली बिना ब्रा के और घाघरा पहना हुआ था. आज उसने कछि भी अपने हाथ की सिली हुई पहनी थी जो की मर्द के कछे जैसी थी. उसकी चुन्नी जल्दी जल्दी में किचन में रह गई थी.

बाबूजी कुच्छ देर आराम से पीठ और टाँगों की मालिश करवाते रहे. कम्मो साइड पे बैठी बैठी उनको मालिश कर रही थी. बाबूजी नॉर्मली उससे पीठ की मालिश करवा के उसे भेज देते थे और बाकी की मालिश खुद करते थे. पर आज उन्होने थोड़ा चेंज किया. पीठ की मालिश करवाने के बाद उन्होने पोज़िशन चेंज कर ली. अब वो पीठ के बल लेटे हुए थे और कम्मो ये देख के चौंक गई.

''मालिक आज क्या आगे की भी मालिश करनी है ?'' कम्मो ने थोडा मुस्कुराते हुए पुछा.

''हां कम्मो आज मेरे हाथ में दर्द है सो आगे की मालिश भी तुम्ही करो.'' बाबूजी दरअसल उसको भड़काना चाहते थे. उसकी चूत पनियाने से उनका आगे का प्लान सफल होने वाला था.

कम्मो ने उनकी छाती पे तेल गिरा के मालिश शुरू की. धीरे धीरे बाबूजी की छाती के सारे बाल तेल से सन के चिपक गए और उनके निपल खड़े हो गए. कम्मो अक्सर उनके खड़े निपल उंगलिओ के बीच दबाती थी. पर ये सब चुदाई के दौरान ही होता था. पर आज बाबूजी सब कुच्छ अलग कर रहे थे तो फिर ये क्यों नही. ये सोच के उसने हल्के हल्के अपनी हथेलिओं को निपल्स पे चलाना शुरू किया और बाबूजी के चेहरे को देखा. बाबूजी आँखें बंद किए रिलॅक्स थे. फिर कुच्छ सेकेंड बाद कम्मो ने तेल में उंगलियाँ डुबोई और उनके खड़े निपल्स की मालिश करने लगी. बाबूजी के चेहरे पे स्माइल आ गई और फिर उन्होने अपने होंठ हल्के से खोल दिए. कम्मो समझ गई की अब कोई दिक्कत नही है और उसने अब अपने सेक्सी अंदाज़ में उनकी निपल्स को मरोड़ना शुरू कर दिया. बाबूजी ने पहले तो कुच्छ नही किया फिर अपना राइट हॅंड बढ़ा के कम्मो की मांसल जांघों को घाघरे के नीचे मसल्ने लगे.

अब कम्मो की चूत पनियाने लगी. लूज कछि में से चूत की महक कमरे में फैलने लगी. बाबूजी उसे सता रहे थे और उसकी गांद की दरार से दूर उसकी जाँघ सहला रहे थे. कम्मो को लगा कि बात और आगे बढ़ानी परेगी तभी कुच्छ होगा. उसने थोड़ा तेल और लिया और बाबूजी की नाभि और पेट के हिस्से पे लगाना शुरू कर दिया. वो धीरे धीरे बाबूजी के कछे के एलास्टिक की तरफ बढ़ने लगी. ऐसा करने से उसके चूतर थोड़े हवा में हो रहे थे. इतने में बाबूजी ने उसकी गांद की दरार में एक बार अपनी जुड़ी हुई उंगली फेर दी. कम्मो के बदन में बीजी दौड़ गई. सूखे पत्ते की तरह वो कांम्प उठी और हल्की सी सिसकारी निकल गई. उसके हाथ बाबूजी के कछे के एलास्टिक के पास रुक गए.

''कम्मो कच्छा खोल दे ......और मालिश कर....''बाबूजी ने उसे आदेश दिया.

बाबूजी की बात सुनते ही कम्मो की तो जैसे बाच्चें खुल गई और उसने मादक अंदाज़ में बाबूजी का कच्छा धीरे धीरे उतार दिया. बाबूजी अब अपने 7 इंच का मूसल लए पूरे नंगे लेटे हुए थे. कम्मो की आँखों में लोडा देखते ही वहशिपन उतर आया और वो एक हाथ से लंड को पकड़ के और दूसरे से अपनी चूत को दबाए हुए कुतिया पोज़ में आ गई. रात से पहले ही उसकी चूत लोडा खा लेगी ऐसा उसने सोचा भी नही था. पर बाबूजी के दिमाग़ में कुच्छ और ही था.

''देख रही है क्या हाल हुआ पड़ा है इसका......1 महीना हो गया तुझे इसे च्छुए हुए...पूजे हुए......कितनी शरम की बात है ...कि इतना बढ़िया हथियार सिर्फ़ मेरे हाथ में रहता है....इसको तो किसी और जगह पे रहना चाहिए.'' बाबूजी ने उसको उकसाते हुए कहा.

''मालिक मैं तो आपकी हूँ...जब आप कहोगे ये हथियार से मुझे चीर देना......हाए दैया....आज कितना सुर्ख लाल लग रहा है....मेरे तो मूह में पानी आ गया.........उउम्म्म्मम मालिक मुझे थोड़ा सा चूसने दो इसे.......आपसे बिनति करती हूँ.......ऊऊऊररररह मालिक ऐसे ना करो........मैं छूट जाउन्गि......'' कम्मो उनके लंड से अपने गरम गाल लगाए हुए लंड के टोपे को कभी गालों पे तो कभी गर्दन पे और कभी माथे और आँखों पे रगड़ रही थी. बाबूजी की जुड़ी हुई उंगलियाँ उसकी लूज कछि की साइड से उसकी चूत की दरार को कुरेद रही थी. बाबूजी को एहसास हुआ कि कम्मो पूरी तरह झरने को तैयार है. पर उसको अभी झारवाना नही है.

''कम्मो डाल इसे मूह में.......चूस ले.......आज इसकी भी मालिश कर दे अपने थूक से......उउम्म्म्म.......हंंणणन्.....'' बाबूजी ने कहा और दूसरे हाथ से उसका सिर लंड की तरफ दबाया.

कम्मो ने बिना देर किए लंड को मूह में भर लिया.  चूस्ते हुए उसने थूक निकाल निकाल के सब गीला कर दिया. जब वो अपने काम में बिज़ी थी तो बाबूजी ने जान भूज के अपनी उंगली चूत से निकाल ली और उसकी पीठ को मसल्ने लगे. फिर उन्होने उसके पेट को मसला और हाथ बढ़ा के चोली के उपर से उसके निपल्स को रगड़ने लगे. दूसरे हाथ से वो अभी भी उसका सिर दबाए जा रहे थे. धीरे धीरे कम्मो पूरा 7 इंच मूह में ले रही थी और दूसरे हाथ से चूत उपर से खुजा रही थी. बाबूजी ने देखा कि कम्मो अपने आप को झारवाना चाहती है सो उन्होने उसका हाथ पकड़ के अपने मूह में डाल लिया और उसकी उंगलिओ को चूमने और चाटने लगे.

कम्मो अब लंड को मूह में रखे करहाने लगी. उसकी चूत करीब करीब छूटने को रेडी थी पर बाबूजी जो भी कर रहे थे या करवा रहे थे वो उसके लिए मना भी नही कर सकती थी.

''ओह कम्मो मज़ा आ रहा है.....थोड़ी देर और कर.......उउंम्म आज तुझे मक्खन खिलाउँगा......काफ़ी दिन हो गए ......उउम्म्म्म.....काश ऐसे ही रोज तुझे मक्खन खिला पाता.........हान्न्न....एससस्स.....करती रह....बढ़िया.....'' बाबूजी ने नेक्स्ट चाल चली.

''हां मालिक मुझे मक्खन खिलाओ....रोज खिलाओ......ऐसे नही ....खिलाओ भी और मुझे माखन से स्नान भी कर्वाओ......कितने दिन हो गए मैने ठीक से माँग भी नही भरी......'' लंड के चूपों के बीच कम्मो बोली.

''काश के मैं रोज तुझे बिना किसी की शरम और लिहाज के अपना मजबूत लोडा दे पाता......ऊओह........ऐसा लोडा तो तुझे कभी कभी नसीब होता है...काश के ऐसा लंड तुझे रोज नसीब हो जाए......'' बाबूजी अब कम्मो को भड़काने की पूरी कोशिश कर रहे थे.

''हां बाबू......दिलवा दो ना अपना रोज.....मैं तो मरी जाती हूँ इसके लिए.....वैसे भी जब से माँग भरी है किसी और को देखा भी नही...... अब तो पति भी माँगता रहता है ...कभी कभी उसे भी मना कर देती हूँ.......हाए जालिम क्या लंड है आपका .....पुच्छ पुकच्छ..पुच्छ मुझे रोज चाहिए...हमेशा....कभी मूह में तो कभी गांद में...कभी चूत में तो कभी मम्मो की दरार में.....उउम्म्म्म....बाबूजी कुच्छ तरकीब करो ना कि रोज मेरी निगोडी चूत को कुकछ मिल जाए.....'' कम्मो अब पूरी तरह से उत्तेजित थी और बाबूजी के जाल में फँसती चली जा रही थी.

''झूठ मत बोल.....कम्मो.....तू कितनी चुदास है मुझे पता है.......मेरे से तो महीने में कभी एक आध बार मज़े लेती है....तेरी जैसी जवानी बिना लंड के थोड़े रहेगी.....पति तेरा निकम्मा है ....ये तो मैं अच्छे से जानता हूँ. पर तू बिना लंड के रहे ये पासिबल नही है.........चल बता किसका लेती है इस निगोडी चूत में.....'' बाबूजी ने नया पैंतरा चला.

''किसी का नही लेती मेरे राजा.....सिर्फ़ तुम्हारा.....और किसी का भाता ही नही मुझे.....आप जब से मिले हो तब से सबको भूल गई हूँ.....कसम से.....मेरी मुनिया को कुच्छ कर दो बाबूजी...मुझे चढ़ने दो.......इस्पे.....'' बाबूजी से मिन्नत करते हुए कम्मो उनके लंड को मुठिया रही थी.

''हां चढ़ वाउन्गा तुझे पर अभी नही...अभी तू मेरी उंगली ले......'' कहते हुए बाबूजी ने जुड़ी हुई उंगलियाँ चूत में घुसेड दी. जान भूज के उन्होने प्रेशर के साथ पूरी उंगलियाँ डाली और कम्मो कसमसा उठी और उसका असर उसके लंड चूपने पे हुआ. हल्के दर्द की वजह से उसने मूह में भरे लंड को हल्के से काट खाया.

''ऑश ये क्या कर रही है छिनाल.......काट लेगी तो आगे से क्या खाएगी और तेरी इस निगोडी चूत में क्या घुसेगा....साअली आराम से कर......'' बाबूजी ने जान भूज के दर्द का नाटक किया.

'' ओओह्ह मालिक माफ़ कर दो.......दर्द हुआ क्या...ग़लती से हो गया...मेरे प्यारे राजा को मैं कैसे काट सकती हूँ..ये तो मेरी जान है...मेरा है......ऊओ बाबूजी कुच्छ जतन करो...किसी तरह से भी मुझे ये रोज दो.......अब सहा नही जाता....आपसे कैसे रहा जाता है मेरे बगैर.......कैसे सब्र करते हो.....?? ऊओ बाबा........मज़ा आ गया ...आपकी उंगलियाँ भी कुच्छ कम नही....ऊओउइमाआ.......थोरी देर और करोगे तो आपकी उंगलिओ को नहला दूँगी.........म्‍म्म्ममम...स्लूउर्र्ररर्प...स्ल्लुउर्र्ररप्प्प्प......उफफफ्फ़....'' कम्मो की हालत बहुत नाज़ुक थी और वो ऑलमोस्ट रेडी थी. अब बाबूजी को अपना लास्ट वार करना था. बाबूजी ने जान भूज के अपने बदन को तोड़ा सा उठाया और दीवार पे लगी घड़ी की और देखा. 11 बज रहे थे. उन्होने जान भूज के कुच्छ सेकेंड के लिए अपना ये पोज़ बनाए रखा और कम्मो मूह में लंड का टोपा लाइ उनको थोडा मूड के देखने लगी. बाबूजी की उंगलियाँ उसकी चूत में धँसी हुई रुक गई थी.

''ओह्ह्ह्ह नू....ये क्या हुआ....मुझे तो 11 बजे किसी से मिलने जाना था और 11 तो यहीं बज गए......'' कहते हुए बाबूजी थोड़ा गुस्से का नाटक करने लगे. इसी वजह से उनका लोडा थोड़ा मुरझा गया और कम्मो को महसूस हो गया कि अब आगे कुच्छ नही होगा. इससे पहले कि वो कुच्छ कहती या करती, बाबूजी झट से उठ गए और बिना कुच्छ बोले ही बाथरूम में घुस गए. कम्मो डर के मारे कुच्छ बोल भी नही पाई और अपने मूह में बाबूजी के लंड का स्वाद और नाक में उनकी भीनी भीनी खुश्बू लिए कमरे को सॉफ करके बाहर चली गई. उसे बहुत गुस्सा आ रहा था. कितने दिन के बाद कितना हसीन मौका बना था और बुड्ढे ने सब काम खराब कर दिया. पर साथ ही साथ वो डर भी रही थी कि कहीं उसकी वजह से बाबूजी की मीटिंग खराब हुई तो बहुत भारी पड़ेगा. उसकी पिघली हुई चूत अब पत्थर जैसे हो गई और सारी की सारी नमी जैसे हवा में उड़ गई. चुप चाप वो किचन में काम करने लगी.

कुच्छ समय बाद बाबूजी घर से चले गए. दोपहर को सब औरतों ने खाना खाया और सुस्ताने चली गई. कम्मो भी अपने घर जाने को तैयार हो रही थी. उसने बच्चों को खाना खिलाना था. जैसे ही वो घर से बाहर आई तो सामने से बाबूजी आ रहे थे. उनके चेहरे को देखते ही वो समझ गई कि जो भी काम था वो पूरा हो गया. बाबूजी काफ़ी रिलॅक्स्ड मूड में थे.

''कम्मो मैं नहाने जा रहा हूँ....15 मिनट में मुझे चाइ नाश्ता दे देना....'' बाबूजी ने घर के बाहर जूते उतारते हुए उसे कहा.

''जी मालिक....मालिक मैं थोड़ी देर घर हो आउ...बच्चे आ गए होंगे उन्हे खाना दे के आ जाउन्गि....'' कम्मो ने बाबूजी से पर्मिशन माँगी.

''हां ठीक है ...पर जल्दी आ जाना ...पेट में चूहे कूद रहे हैं....'' बाबूजी कहते हुए अपने कमरे की तरफ चले गए.

बाबूजी नहाते हुए अपने प्लान के बारे में सोचते रहे. उन्होने सोचा था कि कम्मो के मूह से कुच्छ ऐसा निकलवा लेंगे कि वो गैर मर्दों से अपने संबंधों के बारे में बता दे. पर उसने ऐसा नही किया. अब बाबूजी को अपनी सोच बदल के कुच्छ और करना था.

नहा के बाबूजी ने धोती पहनी और बाहर आ गए. करीब 5 मिनट बाद घर का मैन गेट खुला और कम्मो किचन में आ गई.

कम्मो ने बाबूजी को कमरे में चाइ नाश्ता दिया और वापिस किचन में चली गई. उसका मन बहुत ही उखड़ा हुआ था. रमेश अचानक से अपनी बीवी के साथ उसके मैके चला गया था और पता नही कितने दिन के बाद वापिस आना था. कम्मो की थर्कि चूत जो सुबह से पानी छोड़ रही थी ये खबर सुन के एक दम ठंडी पड़ गई थी. उपर से सुबह बाबूजी ने भी उसे गरम करके छोड़ दिया था. किचन में बेमंन से काम करते हुए वो सोचने लगी कि किसी तरह से बाबूजी का लंड से चुद ले तो आज का काम तो बन जाएगा. यही सोचते हुए वो बाबूजी के कमरे के नज़दीक पहुँची और दरवाज़ा नॉक करने ही लगी थी कि अचानक से उसे बाबूजी की आवाज़ सुनाई दी. बाबूजी शायद किसी से फोन पे बात कर रहे थे.

''अर्रे हां यार......आजकल काम ठीक चल रहा है. बच्चों ने बढ़िया से संभाल रखा है सब......और तू सुना ........  - दूसरी तरफ से कुच्छ बात कही जा रही थी)

अच्छा तो मतलब तू भी मेरी तरह से अब रिटाइर हो गया है....हे हे हे ....यार एक बात है कि सिर्फ़ 46 साल की उमर में रिटाइर हो जाना कोई अच्छी बात नही है....साला बड़ा अजीब सा लगता है.....

तू ठीक कह रहा है.... वाकई में ऐश के दिन तो अब शुरू हुए हैं......पर तेरा हिसाब ठीक है......भाभी के साथ मस्ती करता है घूमता है और ........हे हे ...समझ गया ना....

मैं ...मैं क्या यार घर में 3 - 3 बहुएँ हैं....एक समधन है ..नौकर चाकर हैं....पोते पोतियाँ हैं .....बस दिन भर उन के काम और मदद और थोड़ा बहुत बाहर घूम लेता हूँ.......3नो बेटे शाम को हिसाब किताब कर लेते हैं.....

अर्रे नही यार शादी और इस उमर में .......नही भाई मुझे लाइफ कॉंप्लिकेट नही करनी है........समझा कर भाई..........

देख सिर्फ़ उस चीज़ के लए शादी करूँ तो उसकी ज़रूरत नही है........हे हे हे ...वो तो वैसे भी मिल जाती है........हां आजकल थोड़ी दिक्कत सी हुई पड़ी है...... आजकल थोड़ी प्राइवसी कम है..........पर कोशिश कर रहा हूँ....... समझा कर यार......

अर्रे भाई पुछ मत मस्त माल है .....और फिर घर की मुर्गी है.....कभी भी कर सकता हूँ.... इनफॅक्ट आज ही कुच्छ किया भी.........पर यार तू तो जानता है कि घर में रहते हुए थोड़ा रिस्क होता है........

(इतने में बाबूजी की नज़र दरवाज़े की तरफ पड़ी और उनको किसी की परच्छाई नज़र आई.....बाबूजी जिस तरह बैठे थे उसी तरह से थोड़े से खुले दरवाज़े से उन्हे देख पाना नामुमकिन था.........उन्होने नीचे झुकते हुए अपना गाल कार्पेट पे लगाया तो 2 नंगे पैर और पिंड्लीया (कॅव्स) उन्हे नज़र आए.............बाबूजी समझ गए कि ये कम्मो ही है जो की घाघरा चोली पहने हुए है.........)

आररीए यार क्या बताऊ........अच्छा बच्चू मेरी बातें सुन के लंड हिला रहा है....साअले तू नही सुधरेगा....खैर बात ये है कि जिसकी बात मैं कर रहा हूँ उसको तो मेरा मीठा पानी बहुत पसंद है......और मुझे भी उसकी बजाने में बहुत मज़ा आता है....साली खुल के मस्त होके लेती है.......पर परेशानी है एक और घर कि मुर्गी की.........

अरी नही नही ...बहुओं की चिंता नही है ...वो तो सब मुझे बात मानती हैं और अगर मैने कह दिया कि मुझे डिस्टर्ब ना करो तो कोई नही आता.........पर जो दूसरी है उसपे कोई कंट्रोल नही है..........अबे समझा कर रिश्ता ऐसा है ना.....अबे समधन है मेरी.........उसको कैसे कंट्रोल करूँ...बराबर का रिश्ता जो है.......

अच्छा .....चल आइडिया तो बढ़िया है....मैं कुच्छ सोचता हूँ........और तू कब आएगा कितने साल हो गए तुझे मिले हुए........भाभी को भी ले आना .........यार वाकई में मुझे तेरे से जलन होती है........एक बेटी की शादी करके तू तो गृहस्ती से निपट गया और अब मज़े ले रहा है....काश मैं भी कुच्छ ऐसा कर पाता...........

चल ठीक है.....अब टच में रहना और भाभी को नमस्ते कह देना.....और सुन अगर आने का प्रोग्राम बनाना है तो करीब 3 हफ्ते बाद का रखना ....बच्चों के नामकरण हैं.....मैं इन्विटेशन भेज दूँगा.............

हां हां चल नाअ...साले तू हरामी था ...है और रहेगा........दिमाग़ तो लंड के टोपे में है तेरे.....साले चल अब मुझे भी कुच्छ करना है......समझा कर याआर.....साले इतनी बाते की हैं तो गर्मी तो आएगी ना.....अब ज़रा हाथ की एक्सर्साइज़ ही कर लूँ........हे हे..........ओके बाइ आंड टेक केर....'' कह के बाबूजी ने फोन रख दिया. कुच्छ सेकेंड के लिए वो मंद मंद मुस्कुराते रहे और अपने लंड को दबाते रहे. फिर अचानक उन्हे ध्यान आया कि कम्मो तो बाहर ही खड़ी थी. और उन्होने कुच्छ बाते जो अपने दोस्त से की थी वो जान भूज के कम्मो को सुनाने के लिए की थी.
क्रमशः...........................................






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