Sunday, February 9, 2014

FUN-MAZA-MASTI एक ही सुर-ताल

FUN-MAZA-MASTI


एक ही सुर-ताल

 
बात अभी कुछ ही दिनों पहले की है, मैंने एक वयस्कों की वेबसाइट पर अपना रजिस्ट्रेशन किया था और वहाँ सभी के साथ अपनी कहानियों एंड वीडियो को शेयर किया।
कुछ ही दिनों में मुझसे कई लोगों ने बात की। ज्यादातर उसमें मुझसे मेरी दोस्तों का नम्बर या ईमेल माँगते थे। माफ़ करना दोस्तो, आप सब भी यह समझ सकते है कि यह मुमकिन नहीं है।
हम सभी को एक दूसरे की इज़्ज़त का ख्याल रखना होता है। अगर उसने मेरे साथ शारीरिक संबंध बनाए तो यह ज़रूरी नहीं होता कि वो एक रंडी है। उम्मीद है आप सभी भी मेरी बात से सहमत होंगे।
खैर वापिस कहानी पर आते हैं। कुछ ही दिनों में मुझे 2-3 शादीशुदा भाभी और कुछ लड़की ने भी जोड़ा। उसमें से एक लखनऊ से थी, उमर होगी कोई 38 साल की।
उनसे बात करने के बात पता चला कि वो एक बड़े ही अच्छे घराने से ताल्लुक रखती हैं और मुझ से बात करने के बारे में उनके पति को भी मालूम था।
उन्होंने मुझे बताया कि कैसे उन्होंने अपनी जवानी का लंबा हिस्सा एक शरीफ लड़की की तरह बिताया था और शादी के बाद पूरे घर की सेवा में। लेकिन अब इस उमर में उनके पति थोड़े ढीले हो गये हैं और उन दोनों का सोचना है कि अब जिंदगी में थोड़ी मस्ती करनी चाहिए।
पूरी जिंदगी एक सीधा-साधा जीवन बिताने के बाद जब उन्होंने आज की दुनिया के वीडियो देखे और कहानियाँ पढ़ीं, तो उन दोनों के मन में भी कुछ नया करने की इच्छा हुई, लेकिन इन सबमें उन्हें अपनी इज़्ज़त का ख्याल रखने की भी बड़ी चिंता थी।
उन दोनों का नाम था उर्मिला और सत्येन्द्र। मेरी उनसे रोज बातें होने लगीं।
थोड़ी ही बातें करने के बाद मैंने उनसे उनका कैम देखने के लिए कहा लेकिन उन दोनों ने मना कर दिया।
जब मैंने उन्हें समझाया कि बहुत से लोग नकली आईडी बनाकर परेशान करते हैं। मैं बस यह यकीन करना चाहता हूँ कि आप दोनों सच में एक युगल हो। उन्होंने मेरी बात को समझा और अगली रात में उन्होंने मुझे अपना कैम दिखाया, और तस्वीरें भी।
मैंने पहली बार उर्मिला को देखा। लाल साड़ी में किसी शादी समारोह की फ़ोटो थी। करीब 5'4" की लंबाई और बहुत सुंदर लग रही थी, उस साड़ी में वो एकदम सीधी-साधी दिख रही थी।
पूरे शरीर को साड़ी से अच्छी तरह ढक रखा था। देख कर लग ही नहीं रहा था कि ये उर्मिला कभी कुछ ग़लत काम के बारे में सोच भी सकती है।
उस दिन के बाद मेरी उर्मिला से काफ़ी बातें हुई। उसने मुझे बताया कि सत्येन्द्र को इन सबमें अब कोई रुचि नहीं बची, और उन्होंने मुझे पूरी आज़ादी दे दी है।
कुछ ही दिनों में हम दोनों ने वीडियो चैट्स करनी शुरू कर दी। वो देर रात ही ऑनलाइन आती थी, क्योंकि उन्हें घर के सभी लोगों के सोने के बाद ही वक्त मिलता था।
मैं उनके व्यक्तित्व का कायल सा हो गया। कुछ ही दिनों में हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए। हमारे बीच सेक्स के बारे में कभी बात नहीं होती थी।
हम दोनों देवर-भाभी की तरह मज़ाक मस्ती करने लगे। मैं उनको दोहरे मतलब वाले मज़ाक से छेड़ता था और वो भी उतनी ही मस्ती से मुझे छेड़ती थी।
कुछ दिन यूँ ही बीत गए। अब मेरे दिल में भी उनसे मिलने की इच्छा हो रही थी, लेकिन मैं पुणे में वो लखनऊ में, फासला बहुत था।
एक दिन मैंने उनसे मिलने की इच्छा जताई तो वो भी बोलीं- मिलना तो मैं भी चाहती हूँ लेकिन मुझे बहुत डर लगता है। एक अजीब सा डर लगता है। इन सब के बारे में कहीं ग़लती से भी किसी को पता चल गया तो मेरा क्या होगा? मैं तो जीते जी मर जाऊँगी।
मैंने भी उनकी बात समझी और बोला- जब आपको लगे कि आप मिलना चाहती हो। आप बता देना, हम ज़रूर कुछ सोचेंगे। और यकीन कीजिए मैं एक समझदार आदमी हूँ और आपकी दिक्कतें समझता हूँ।
कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन उन्होंने मुझ से मेरा मोबाइल नंबर माँगा। कुछ ही देर में मुझे एक कॉल आया। उठाया, तो उधर से कोई आदमी को आवाज़ आई।
ये सत्येन्द्र जी थे। मेरी उनसे काफ़ी देर तक बात हुई। बड़े ही गंभीर किस्म के आदमी थे। बातों से यूँ लग रहा था, मानो मुझे परख रहे थे कि यह आदमी भरोसे के काबिल है या नहीं।
बात ख़त्म हुई और 1-2 दिन बाद ही मुझे फिर से उनका कॉल आया। उन्होंने मुझसे मिलने की इच्छा जताई।
मैंने भी हाँ कर दी। लेकिन अब दिक्कत यह थी कि मैं पुणे में रहता हूँ और वो दोनों लखनऊ में।
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सत्येन्द्र जी ने मुझसे कहा- तुम लखनऊ आ जाओ, यहाँ किसी अच्छे होटल में रुक जाओ। हम वहीं आकर तुमसे मिल लेंगे।
यह सुनकर तो मेरी हालत खराब हो गई। शायद सत्येन्द्र जी काफ़ी पैसे थे। लेकिन मेरे लिए फ्लाइट से लखनऊ जाकर एक अच्छे होटल में रुकने का मतलब था 15-18 हज़ार रुपये का नुकसान, और ये सब मेरे बस का नहीं था।
मैंने उनसे सोचने का वक़्त माँग कर फोन काट दिया। अगले दिन उर्मिला को यह बात चैट के दौरान बता दी।
वो हँसने लगी और बोली- अरे तुम्हें किसने कहा कि तुम्हें खर्च करना है। अरे जब हम तुम्हें अपने पास बुला रहे हैं तो खर्चा हम ही करेंगे ना ! तुम्हें बस यह देखना है कि तुम्हारे लिए कौन सा दिन अनुकूल होगा।
यह सुनकर तो मैं बहुत खुश हो गया। उसके बाद हमने 2 हफ्ते बाद आने वाले शनिवार और रविवार का दिन चुना।
2-3 बाद मुझे मेरी मेल आईडी पर टिकट भेज दी गई, जो कि ट्रेन की थी। मैंने भी सोचा कोई बात नहीं, एक होटल में मेरी बुकिंग करा दी।
अब मैं दिल में एक अजब सी उत्तेजना लिए लखनऊ जा पहुँचा।
हमारी मुलाकात हुई। सत्येन्द्र जी बड़े ही बुजुर्ग किस्म के इंसान रहे थे। देखने से लगा मानो 50 साल के हो। दुबले-पतले से, थोड़े कमजोर से लग रहे थे। लेकिन बहुत गंभीर किस्म के इंसान लगे।
तभी मेरी नज़र उनके बगल में खड़ी उर्मिला पर पड़ी। सच मानो दोस्तों उनको देख कर मुझे एक सीधी-साधी घरेलू औरत दिखी। एक सिल्क की साड़ी पहने हुए खड़ी थी। बहुत ही प्यारी लग रही थी।
थोड़ी से भरे बदन की थी। लेकिन वो उनको खूबरती को चार चाँद लगा रहा था। चेहरे पर लालिमा और होंठों पर लाल लिपस्टिक, और मांग में सिंदूर।
कसम से दोस्तो, उस वक़्त मुझे यकीन हो गया कि एक औरत सबसे सुंदर साड़ी में ही लगती है। जब वो शर्माती है तो उसकी हया सामने वाले आदमी के दिल को चीर कर रख देती है।
तभी सत्येन्द्र जी बोल पड़े, और मेरा ध्यान उनकी तरफ गया। हमारी बातें होने लगी। बीच-बीच में देखा कि कैसे उर्मिला जी मुझे चोर निगाहों से देख रही थीं।
जैसे ही हमारी नज़रें मिलतीं वो शर्मा कर अपना मुँह घुमा लेतीं और हल्की से मुस्कान आ जाती। बस उनकी ये अदाएँ मेरी जान ले रही थीं।
उनसे बात करने के लिए मैं बहुत बेचैन हो रहा था। तभी सत्येन्द्र जी मुझे उनके प्लान के बारे में बताया।
सत्येन्द्र जी बोले- देखिए, हमने आपका रूम यहाँ अपने घर से दूर बुक किया था। अब आज पूरे दिन और कल पूरे दिन ये आपके साथ रहेंगी।
मैं बोला- ठीक है सर।
फिर हम सब ने साथ में लंच किया और अब उर्मिला जी भी अब कुछ नॉर्मल होने लगीं।
कुछ देर बाद सत्येन्द्र जी वहाँ से चले गये यह कहकर कि उर्मिला को लेने के लिए रात में वो कार भेज देंगे।
अब जाकर मैं, उर्मिला जी के साथ अकेला हुआ। हम दोनों अंदर आकर बेड पर बैठ गये। कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। आख़िर वो भी बहुत असहज महसूस कर रही थी, पराए मर्द के साथ एक कमरे में बैठना।
मैंने टीवी चला कर माहौल को कुछ नरम करने की कोशिश की और हमने बातें करने शुरू कीं। कुछ ही देर में वो मेरे साथ काफ़ी खुल गई।
उन्होंने कहा- देखो रोहित, मुझे ये सब बहुत अजीब लग रहा है। मैं तुम्हारे साथ कुछ कर नहीं पाऊँगी। तुम बहुत अच्छे हो लेकिन मुझे पता नहीं क्यों खुद पर बहुत घिन आ रही है।
मैं समझ गया कि उर्मिला जी सच में बहुत ही नेक दिल और शरीफ किस्म की औरत हैं। और ये शायद जिंदगी में पहली बार किसी पराए मर्द से मिल रही थी।
मुझे थोड़ी निराशा तो हुई लेकिन मैंने भी सोचा कि अच्छे इंसानों का कभी दिल नहीं तोड़ना चाहिए।
मैंने भी हामी भरते हुए कहा- उर्मिला जी आप जैसा चाहती हैं, वैसा ही होगा। लेकिन अगर मैं इतने दूर से मिलने आया हूँ तो मेरे साथ कुछ समय तो बिताएँ, देवर ही समझ लो अपना।
इस पर वो हँस पड़ी और बोली- हा हा... मेरा कोई देवर नहीं है लेकिन तुम बातें बहुत प्यारी करते हो। हर वक़्त मज़ाक मस्ती के मूड में ही रहते हो।
मैंने भी अब किसी तरह की शारीरिक संबंध की उम्मीद छोड़ कर, अब बस अपने 2 दिनों को जी भर कर मज़े करना चाहता था।
मैंने उनसे कहा- ठीक है भाभी। अब यहीं बैठना है या मुझे अपना शहर भी दिखाएँगी?
उन्होंने बोला- ठीक है, चलो कहीं घूमने चलते हैं।
और हम बाहर निकलने लगे। तभी उन्होंने अपना पास रखे एक पैकेट में से एक काले रंग का बुरका निकाला और उसे पहनने लगीं।
मुझे समझते देर ना लगी और मन ही मन मैं उन दोनों के दिमाग़ की तारीफ करने लगा।
हम दोनों वहाँ से एक ऑटो में बैठ कर एक मॉल की तरफ जाने लगे। रास्ते में कई बार मेरा शरीर उनसे छू जाता और वो सिहर उठती।
वहाँ मैंने जानबूझ कर रोमांटिक मूवी की टिकट लीं, वो भी आख़िरी लाइन में, मैं अभी भी हार मानने को तैयार नहीं था। लेकिन भाभी को मनाना भी मुश्किल दिख रहा था।
मूवी शुरु होने में अभी वक़्त था, तो मैंने भाभी को छेड़ना शुरू किया। क्योंकि हम चैट्स पर काफ़ी हद तक दोहरे मतलब वाली बातें कर लेते थे, तो मैंने वहीं से ही शुरू किया।
मैं- क्या भाभी, इस देवर का आपको ज़रा भी ख्याल नहीं।
भाभी थोड़ा हैरान होते हुए- क्यों क्या हुआ? कुछ ग़लती हुई क्या मुझसे?
मैं- और क्या? इतनी दूर से देवर आया है, एक बार गले भी नहीं लगी आप? इतना भी प्यार नहीं करती क्या आप?
भाभी- अरे बस इतनी सी बात ! अभी लो।
वो उठ कर मेरे सामने आ गईं। जैसे ही मुझे गले लगाया, मैंने ज़रा सा नीचे झुक कर उनके चूतड़ के नीचे जाँघों से पकड़ कर उन्हें अपनी बाहों में उठा लिया।
मेरे ऐसा करते ही, भाभी थोड़ा चौंक गईं लेकिन कुछ बोली नहीं।
इस वक़्त मेरा हाथ भाभी के चूतड़ों बस ज़रा से नीचे थे। उनके शरीर की गर्मी, मेरे शरीर को गदगद कर रही थी।
मैं बोला- भाभी मैं कब से आपको ऐसे ही बाँहों में लेना चाह रहा था, लव यू भाभी।
भाभी बोली- अच्छा, अच्छा, हो गया सब। अब मुझे नीचे भी उतारो, सब लोग देख रहे हैं। लोग क्या सोचेंगे?
मैंने कहा- क्या सोचोंगे? यही कि एक शौहर अपनी बीवी से इश्क फ़रमा रहा है, हा हा हा।
भाभी भी हँसने लगी।
अब मैंने भाभी की बहुत ही धीरे-धीरे अपनी बाँहों से नीचे उतारना शुरू किया।
मैं इस आने वाले पल को जीना चाहता था। मेरे हाथ अब भाभी की जाँघों से ऊपर आकर उनके चूतड़ों पर जा रहे थे। बहुत ही नर्म और मुलायम पिछवाड़ा था। ऐसा लग रहा था मानो गुब्बारा है, जो मेरे हाथ लगने से दब रहा है।
उधर ऊपर से भाभी की चूचियाँ भी मेरे मुँह के पास से लगती जा रही थीं।
भाभी के पैर अब ज़मीन पर आ चुके थे। मेरे दोनों हाथ की गाँठ भी अब खुल चुकी थी। लेकिन मेरे दोनों हाथ अभी भी भाभी के मस्त चूतड़ों पर ही थे, हिल नहीं रहे थे, बस रखे हुए थे। मैं भाभी की आँखों में देख रहा था।
मैं बोला- भाभी आपकी इन अदाओं ने मुझे आपका दीवाना कर दिया है।
भाभी अब थोड़ा असहज महसूस करने लगी थीं। इसीलिए वो पीछे हटने लगीं। मैंने भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।
लेकिन अलग होने से एक पल पहले मैंने भाभी के चूतड़ों पर हाथ फेर कर हल्का सा जायज़ा लिया और मजाकिया लहजे में बोला- वाह भाभी। लगता है भाईसाहब ने बहुत मेहनत की है इन पर। और हँसने लगा।
भाभी मेरे इस मज़ाक पर हँसने लगीं और बोलीं- बदतमीज़ हो तुम, शर्म नहीं आती।
तब तक हमारी फिल्म का वक़्त हो चला था।
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अब मैं यह समझ चुका था कि भाभी सब कुछ चाहती हैं, लेकिन शर्म के मारे मुँह से बोल नहीं सकती।
अब मैंने खुद से आगे बढ़ने का फ़ैसला किया। फिल्म के दौरान भाभी के हाथ को अपने हाथ में लेकर प्यार से सहलाने लगा।
भाभी ने एक बार मेरी तरफ सवालिया निशान से देखा फिर हल्के से मुस्कुरा कर मूवी की तरफ मुँह कर लिया।
अब मैं धीरे-धीरे भाभी की ओर खिसक कर एकदम उनसे चिपकने के कोशिश कर रहा था।
मैंने हिम्मत करके अपना एक हाथ उठा कर भाभी के दूसरे कन्धे पर रख दिया, और भाभी ने खुद अपना सिर मेरे कन्धे पर रख दिया।
अब हम दोनों एक दूसरे के बाँहों में थे। मैं धीरे-धीरे भाभी की कंधे को सहला रहा था। और दूसरे हाथ में भाभी का हाथ था। अब भाभी भी मेरे हाथ को बड़े प्यार से सहला रही थी।
कुछ देर तक ऐसे ही चलता रहा। हम दोनों की जानते थे कि आग दोनों तरफ लग रही थी लेकिन शुरूआत कौन करेगा।
मैंने अपना हाथ जो भाभी के कंधे पर था। धीरे-धीरे नीचे ले जाना शुरू किया। उनकी मुलायम पीठ पर से नीचे जाते हुए उनकी ब्रा की स्ट्रेप्स को महसूस करते हुए उनकी सुराही जैसे आकार की कमर पर आ गया था।
मेरे हर हरकत से भाभी का शरीर थोड़ा सा मचल जाता था। अब मैं महसूस कर रहा था कि भाभी की साँसें कुछ तेज होने लगी थी।
मैंने बड़े प्यार से भाभी के चेहरे को अपने हाथ में लिया और अपनी तरफ घुमाया।
भाभी बहुत ज़्यादा शरमा रही थी इसलिए उन्होंने अपनी आँखें बंद कर ली थीं। एक पल को मैं भाभी के मासूम चेहरे को देखता रहा, उन पर बहुत प्यार आ रहा था मुझे।
उनके वो गुलाबी होंठ काँप रहे थे। मानो डर और आने वाले पल की खुशी में मचल रहे थे।
मैं आगे बढ़ा और और भाभी के होंठों के बिल्कुल करीब आ गया। अब हम एक दूसरे की साँसें भी महसूस कर पा रहे थे। भाभी मुझे इतना करीब महसूस कर के थोड़ी बेचैन हो गई। उनसे अब सब्र नहीं हो पा रहा था। उनके होंठ अपने आप खुल कर मुझे चूमने का न्यौता दे रहे थे।
अब मुझसे और ना रहा गया। मैंने अपने होंठ भाभी के नरम, फड़फड़ाते हुए होंठों पर रख दिए।
भाभी बिल्कुल नहीं हिल रही थी लेकिन मैं बड़े ही प्यार से भाभी के होंठों को चूम रहा था। कभी नीचे के होंठों को अपने मुँह में भर से उनका रसपान कर रहा था, कभी ऊपर के !
भाभी की सारी लिपस्टिक का स्वाद मेरे मुँह में आ गया था।
कुछ ही पलों में उर्मिला बहुत गर्म होने लगी, अब वो मुझे चूमने लगी थी। मेरे सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ मुझे बेहताशा चूमने लगी। ऐसा लग रहा था, मानो कब की भूखी है।
मैं भी काफ़ी गर्म हो चुका था। अब मेरे हाथ उर्मिला के शरीर पर भी घूमने लगे थे और धीरे धीरे उर्मिला के दूध पर आ गए।
उफ्फ, कितने नरम थे ! मानो रूई दबा दी हो। और उधर हाथ लगते ही उर्मिला की भी दबी हुई 'आह' निकल गई।
हम दूसरे को किसी जंगली जानवर की तरह खाने की कोशिश कर रहे थे। तभी मेरी नज़र आसपास वाले लोगों पर गई। कुछ तो पीछे मुड़-मुड़ कर हमारी हवस का नंगा नाच देख रहे थे।
अभी फिल्म आधी भी ख़त्म नहीं हुई थी। मैंने वहाँ से निकलना ही सही समझा। मैंने उर्मिला की तरफ देखा, उनकी आँखों में वासना उबल रही थी।
मैं उनसे पूछा- होटल चलें वापिस?
वो कुछ नहीं बोली, सीधा खड़ी हुई और बाहर की तरफ निकल पड़ी।
पूरे रास्ते हमारे बीच कोई बात नहीं हुई। शायद हम दोनों ही एक दूसरे से उजाले में नज़र नहीं मिला पा रहे थे लेकिन अब मेरे लिए सब्र कर पाना बहुत ही मुश्किल था। हम होटल पहुँचे, उर्मिला आगे थी मैं उनके पीछे और जैसे ही हम कमरे के अंदर घुसे, मैंने पीछे से ही उन्हें पकड़ लिया और सीधा उनके दूध को दबाने लगा।
उर्मिला के गले पर अपनी जीभ फिरने लगा। जीभ लगते ही उर्मिला मचल उठी और घूम कर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
अब हम दोनों एक दूसरे को चूमे जा रहे थे। मैंने अपनी जीभ उर्मिला के जीभ से लड़ानी शुरू कर दी।
उन्होंने मेरी जीभ अपने होंठों से पकड़ कर चूसना शुरू कर दिया।
मैंने उर्मिला के बुरके को खोल कर अलग कर दिया। अब उर्मिला मेरे सामने साड़ी में थी। हम फिर से एक दूसरे को किस करने लगे।
धीरे-धीरे मैं उर्मिला के जिस्म से खेलने लगा, उनकी चूचियों को ब्लाउज के ऊपर से मसलने लगा।
हमारी चूमा-चाटी नहीं रुकी। दबी आवाज़ में उनकी 'आह' ज़रूर निकल रही थी।
मैंने अब धीरे से अपना हाथ उर्मिला की पिछाड़ी पर ले गया और उसे बड़े प्यार से सहलाया।
कसम से दोस्तों ज़िंदगी में बहुत चूतड़ देखे थे, मगर उर्मिला भाभी जैसे चूतड़ बहुत कम औरतों के पास थे।
पतली कमर के नीचे सुराही का आकार बनाते हुए चौड़े चूतड़ एकदम गोल।
क्या मुलायम पिछाड़ी थी। मैं तो सहलाने से ही फटने को हो रहा था।
अब धीरे-धीरे मैंने उर्मिला के कपड़े उतारने शुरू किए और पूरी साड़ी उतार दी।
अब मेरे सामने उर्मिला बस ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी थी। मुझे औरत में सबसे ज़्यादा उनके उठे हुए चूतड़ और चिकनी जाँघ के हिस्से ही पसंद आते हैं।
हम दोनों फिर से एक-दूसरे में खो गए। मैंने उर्मिला को ऊपर से पूरा नंगा कर दिया था।
जैसे ही मैंने उर्मिला की नंगी चूचियों पर अपना मुँह रखा, उर्मिला की कराह निकल गई 'हय !'
मानो जैसे इस दिन के लिए कितने सालों से इंतजार कर रही थी।
मैंने भी अपने सारे कपड़े उतार दिए और फिर से दूसरे से खेलने लगे।
तभी मैंने उर्मिला की उल्टा किया और बेड पर झुका दिया। इस वक़्त उर्मिला की पिछाड़ी मेरे तरफ थी और बाकी ऊपर का बदन आगे बेड पर झुका हुआ था।
अगले ही पल मैंने उर्मिला के पेटीकोट को उठा दिया और ज़न्नत को देखने लगा। भाभी ने पैन्टी नहीं पहनी थी।
इतनी गोरी गोल पिछाड़ी। मेरी हाथ से मसले जाने की भी निशान पड़ गए थे उन पर।
उनकी चूत भी हल्के बालों से ढकी हुई थी। जिसमें से शायद बहुत सारा रस बह चुका था। क्योंकि वो हिस्सा बहुत चमक रहा था, यहाँ तक कि उर्मिला की जाँघों के हिस्से पर भी गीलेपन की चमक थी।
मुझे और ना रुका गया और मैंने वहीं नीचे बैठ कर भाभी की चूत पर अपने होंठ लगा दिए।
उर्मिला अचानक हुए इस हमले से चिहुँक उठी और आगे की तरफ भागना चाहती थी।
मैंने उन्हें छोड़ा नहीं, और मेरी जीभ की लपर-लपर ने उर्मिला की चीख निकलवा दी।
'आइ माआ..आह..!'
अचानक से वो आगे के तरफ और झुक गई और उनकी पिछाड़ी बाहर की तरफ निकल आई। मानो मुझे वो अपनी चूत को और चाटने की लिए प्रेरित कर रही थी।
इस वक़्त भाभी एक गरम कुतिया की तरह अपनी चूत चटाई मज़ा ले रही थी। उनके मुँह से संतुष्टि से भरी आवाजें निकल रही थीं।
मैं भी उनके चूत के रस के स्वाद में खो कर चाटे जा रहा था। करीब 10 मिनट तक चाटने के दौरान उर्मिला 2 बार झड़ चुकी थी। और इतनी देर के खेल के बाद मेरा पानी भी कभी भी निकल सकता था।
अब हम बेड पर आ गए, बिल्कुल नंगे, मैंने भाभी की आँखों में देखा, उन्होंने फिर से आँखे नीचे कर लीं।
मैं उन्हें अपनी तरफ खींच कर अपनी गोद में बिठाया। उनकी गरम मुलायम पिछाड़ी ने जैसे ही मेरे लंड को छुआ। यह अनुभव करके ही मेरा तो पानी निकालने को हो गया।
मैंने उर्मिला को बड़े प्यार से बोला- भाभी आई लव यू ! आप बहुत सुंदर हो।
यह सुनते ही उर्मिला ने मेरी तरफ देखा और मुझे बहुत ज़ोर से गले लगा लिया।
उसके बाद हम दोनों फिर एक बार र्वासना के मैदान में उतर गए और मैंने भाभी को अपना लंड चूसने को बोला जिस पर उन्होंने मना कर दिया।
मैंने भी ज़िद नहीं की और अब उनकी टाँगें खोल कर उनके बीच आया। अब वो पल आ गया था जिसके लिए मुझे पुणे से लखनऊ बुलाया गया था।
उर्मिला भाभी अपनी टाँगें खोले मुझे अपने अंदर समाने का न्यौता दे रही थीं। उनकी छोटी सी चूत अपना काम-रस छोड़ कर मुझे अंदर घुसने के लिए बुला रही थी।
मैं फिर उनके नीचे गया और उर्मिला की चूत के होंठों से अपने होंठों की मिला कर चूसने लगा।
लेकिन उर्मिला ने मुझे तुरंत ऊपर खींच लिया और आँखों ही आँखों में चुदाई कार्यक्रम शुरू करने के लिए कहा।
मैंने अपना लंड उर्मिला की चूत पर रखा और ज़रा सा उनकी क्लिट को रगड़ा, उर्मिला फिर से एक बार तड़प उठी।
अब मैंने लंड को निशाने पर लगाया और और ऊपर भाभी के होंठों पर अपने होंठ लगा कर चूसने लगा।
उर्मिला ने शुरू में अपने ही चूत के स्वाद के वजह से मुझसे किस करने बचना चाहा लेकिन मैं नहीं माना।
मैंने धीरे से धक्का देकर लंड को चूत की गिरफ़्त में देना शुरू किया। चूत में भरे हुए काम-रस की वजह से मुझे कोई ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई।
लेकिन भाभी की योनि किसी भट्टी की तरह गर्म थी। कुछ ही झटकों में मैंने भाभी की चूत में समा गया और बड़े ही प्यार से हमारी चुदाई शुरू हुई।
नीचे से दोनों की कमर एक ही सुर-ताल पर लचक रही थी और लंड और चूत एक दूसरे में समाने की कोशिश कर रहे थे।
वहीं ऊपर मैं और भाभी किस करे जा रहे थे, एक-दूसरे के होंठ चूसे जा रहे थे।
कुछ ही देर में भाभी झड़ने के काफ़ी करीब आ गईं तो उन्होंने मुझे ज़ोर से काट लिया जिससे मेरे हाथ में से खून भी आ गया।
लेकिन फिर बड़े प्यार से उसे भी चूसती रहीं।
हम दोनों एक दूसरे में पूरी तरह खो चुके थे। बातें बहुत कम हुई लेकिन प्यार तो मानो इतना लग रहा था कि हम दोनों पति-पत्नी हैं।
कब दिनके 2 बजे से शाम के 5 बज गए पता ही नहीं चला। शाम को को हम दोनों एक दूसरे की बाँहों में नंगे लेटे हुए थे, तभी सत्येन्द्र जी का कॉल आया।
उन्होंने मुझसे पूछा- उर्मिला घर कब आ रही है।
मैंने उर्मिला जी की तरफ देखा, उनकी आँखों में उदासी थी।
मैंने सत्येन्द्र जी को कहा- आज वो यहीं रुक रही हैं, अगर आपको कोई आपत्ति नहीं हो तो !
कुछ सोच कर सत्येन्द्र जी बोले- ठीक है, आज ही नहीं कल भी वही रुक जाएँगी वो। लेकिन उनका ध्यान रखना और अपना भी।
यह बात सुनकर हम दोनों एक नये उत्साह से साथ फिर से एक-दूसरे में खो गए।
यह कहानी बिल्कुल सच है दोस्तो ! आज भी उर्मिला जी से मेरी बात होती है लेकिन बहुत कम।
आप सभी को मेरी कहानी कैसी लगी बताना ज़रूर।
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