FUN-MAZA-MASTI
घरेलू महिलायें--1
मेरा दो कमरे का छोटा सा ऑफिस है जहाँ से मैं अपना काम संचालित करता हूँ, अन्दर के कमरे को रेस्टरूम कम स्टोररूम बना रखा है, सड़क से लगे बाहर के कमरे में रिसेप्शन बनाया हुआ है जहाँ एक कोने में मेरी कुर्सी टेबल काउंटरनुमा, दूसरे कोने पर एक कुर्सी टेबल काउंटर नुमा मेरे असिस्टेंट के लिए है जिसका काम है मेरी अनुपस्थिति में आने वाले कस्टमर को जानकारी देना-लेना, उनका नाम पता फोन नंबर रजिस्टर पर लिखना, फिर आवश्यक जानकारी मुझे देना एवं कस्टमर से मेरी फोन पर बात कराना, ऑफिस का रखरखाव देखना !
असिस्टेंट महिला या पुरुष जो भी योग्य मिलते, लगा लेता था, टाइम 11 से 6 बजे तक, पगार 2500 से ज्यादा नहीं देता मैं, इसलिए अक्सर असिस्टेंट ज्यादा समय तक नहीं टिकते !
हाँ छोटू जरूर चार साल से मेरे यहाँ टिका है, उसके माँ बाप मजदूरी करते हैं, वो पढ़ना चाहता है इसलिए सुबह झाड़ू पोंछा करके पीने का पानी की व्यवस्था करके 11 बजे स्कूल चला जाता है, वर्तमान में दसवीं कक्षा का छात्र है, एक चाबी उसको दे रखी है जिसके बदले में उसकी पढ़ाई का सारा खर्च शुरू से अंत तक मैं ही उठाता हूँ, छुट्टी के दिन जरूर ऑफिस में बैठता है, कभी कभी जेब खर्च मांग लेता है !
यहीं ऑफिस में फुर्सत के क्षणों में कहानी लिखता हूँ, मेरी कहानी पढ़ने वालों के मेल पढ़ता हूँ। मेल अधिकांश मध्य प्रदेश के सभी शहरों के महिला पुरुष के होते हैं, बिहार, यूपी, दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान, महारास्ट्र, गुजरात और अन्य राज्यों से भी बहुत से मेल आते हैं, कुछ मेल हिंदुस्तान से बाहर के भी आते हैं, मैं सभी का शुक्रगुजार हूँ !
अब मुद्दे पर आते हैं। कुछ महीनों पहले की घटना है यह !
मेरे पास कोई असिस्टेंट ऑफिस के लिए नहीं था जिसके कारण मैं अपनी साइट से ऑफिस समय पर नहीं पहुँच पाता था, ऐसे में ऑफिस बंद रहने लगा, मुझे अपने काम चिंता होने लगी तो मैंने छोटू से कहा- कोई लड़का या लड़की जो काम का इच्छुक हो और यहीं आसपास रहता हो, जो बारिश में भी ऑफिस आ सके, का इंतजाम करो ऑफिस के लिए, नहीं तो बहुत नुकसान हो रहा है !
दूसरे दिन सुबह छोटू ने बताया कि लीना आंटी ऑफिस में बैठने को तैयार हैं, बारहवीं तक पढ़ी लिखी हैं, ऑफिस के पास ही रहती हैं। अंकल नौकरी करते हैं तो वो दिन में फ्री रहती हैं।
मैंने आंटी सुनकर तुरन्त ही कह दिया- दोपहर बारह बजे भेज देना !
सोचा छोटू ने आंटी बोला है तो पैंतीस चालीस साल की तो होगी, फिर ऑफिस में फुर्सत का टाइम पास भी हो जायेगा, पहले भी कई महिलायें काम कर चुकी हैं और अपना काम करवा भी चुकी हैं। मस्त बिंदास निश्चिंत होकर बिना किसी व्यवधान के मेरे रेस्ट रूम में से मैंने उनके मजे लिए है और उन्हें संतुष्ट करके मजे दिए हैं ! समय की कमी नहीं होती, 3 से 6 बजे मैं ऑफिस में ही रहता हूँ, कुछ महिलायें तो बड़ी जल्दी सेट हो जाती हैं, कई को सेट करने की जुगत लगाना पड़ती है, कुछ महिलायें इन कामों से दूर ही रहती है तो रोनी भी उनसे दूर ही रहता है, उन पर अपना समय व्यर्थ नहीं करता !
कुछ मकान बनवाने वाली नौकरीपेशा या घरेलू महिलायें भी बड़े आसानी से इन सबके लिए तैयार हो जाती हैं क्योंकि उनसे मेरा मिलना बार बार होता है। वैसे भी ज्यादातर मकान महिलाओं की पसंद से बनता है और वो जिस उम्र में ज्यादा सेक्स पसंद करती है, उसी समय उनके पतियों को रुपया पैसा कमाने से फुर्सत नहीं मिलती तो मकान की देखरेख उसका निर्माण देखना भुगतान का लेनदेन तक वही देखतीं हैं। ऐसे में कई बार मेरे साथ वो साइट पर भी जाती हैं कभी मेरी बाइक पर या कभी मेरी क्लासिक जीप में, तो बहुत मौका मिलता है बात करने का ! फिर हंसी मजाक में उनके मुखारविंद पर आई भाव भंगिमायें उनके दिल के राज खोलकर रख देती हैं, उस पर यह कि कामदेव के तीर मुझे कुछ ज्यादा ही भेदते हैं, कामवासना से परिपूर्ण होने के कारण मैं इन तीरों से जल्द घायल हो जाता हूँ जब नर और नारी राजी तो क्या करेगा काजी, फिर जो हो सके कर गुजरो !
मैं कुछ हसीनाओं के साथ गुजारे हसीन पलों को मैं इसी कहानी में एक के बाद एक जरूर लिखूँगा जिसको पढ़ते हुए आप सभी अपने यौनांगों को सहलाते हुए मजे लोगे ! कहानी थोड़ी लम्बी होगी, उम्मीद है आपका भरपूर मनोरंजन होगा !
लीना आंटी का ध्यान आते ही मैं सोचने लगा कि इस उमर में अंकल लोग ज्यादा टाइम नहीं देते तो आंटी प्यासी भी होती हैं, आंटी अनुभवी भी होती हैं, मजा भी बहुत देती हैं, चुसाई में तो इन्हें महारथ हासिल होती है, बड़े बड़े मोम्मे, गुदाज नितम्ब, एकदम गदराया बदन !
कल्पनाओं में खोया अच्छे से तैयार होकर 11 बजे ऑफिस आ गया !
थोड़ी देर बाद एक जोड़ा ऑफिस में आया, आते ही पुरुष ने हाथ मिलाया, बोले- मैं नारायण ओर यह मेरी पत्नी माधुरी है, मुझे रोनी सलूजा से मिलना है !
मैंने कहा- स्वागत है, बैठिये क्या सेवा कर सकता हूँ मैं आपकी? मैं ही रोनी हूँ !
नारायण बोले- हम अपने प्लाट पर मकान बनवाना चाहते हैं, उसका अनुमानित खर्च पूछना है, और आपको बनाने का कोंट्रेक्ट देंगे, उसका खर्च मेरे को बताइए !
मैंने उनके प्लाट और मकान में होने वाले निर्माण को समझा कि उसमें क्या क्या बनना है, वो अपने साथ लाये कागज पर अपने प्लान को समझा रहे थे, मैं प्लान के साथ साथ मुस्कुराती माधुरी के माधुर्य का भी रसपान करता जा रहा था, क्या कसा हुआ जिस्म था उसका, लेकिन मुझे तो आंटी की लगन लगी थी तो माधुरी की मिठास भी फीकी सी लग रही थी !
तभी एक और हसीन महिला मेरे ऑफिस में आई वो तो माधुरी से भी ज्यादा दिलकश लग रही थी बोली- रोनी जी हैं क्या?
मैंने कहा- आप बैठिये, मैं ही रोनी हूँ !
वो एक कुर्सी पर बैठ गई ! मैंने अपने काम करने का तरीका उसमें होने वाले एक अनुमानित खर्च नारायण जी को बता दिया। इन सब बातों को आगंतुक महिला बड़े गौर से देख सुन रही थी !
फिर नारायण जी बोले- मैं आपको ही अपना मकान बनवाने का काम दूँगा, मेरा फाइनेंस होते ही काम शुरू करूँगा !
फिर वो प्रस्थान कर गए !
फिर आगंतुक महिला की ओर मुखातिब हुआ !
आंटी का इंतजार न होता तो इस हसीना को जरूर बिठाये रखने का विचार मन में था !
"मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा मैंने !"
तो वो बोली- जी मैं यहाँ जॉब के लिए बात करने आई हूँ !
मैं एकदम से उछल पड़ा, लीना आंटी भी आने ही वाली थी, मैंने सोचा कि इसे कल के लिए बोलकर आज पहले लीना से तो मिल लूँ क्योंकि इससे ज्यादा भरोसा मेरे को आंटी पर था, पर देखना जरूरी था कहीं लीना देखने में ही अच्छी न हुई तो?
मैंने कहा- देखिये मैडम, आप कल इसी समय आ जाइये ! हाँ, आपका फोन नंबर और नाम मैं लिख लेता हूँ !
तो उसने अपना नंबर बोला मैंने लिख लिया, फिर पूछा- आपका नाम?
तो उसने कहा- लीना !
उसके मुँह से लीना सुनते ही मेरे हाथ वहीं रुक गया मैं जड़वत सा हो गया !
वो बोले जा रही थी- लेकिन छोटू ने तो आज 12 बजे आपसे मिलने को बोला था !
उसके इस वाक्य से मेरी तन्द्रा भंग हुई, मुझे लगा कि मेरे से कितना बड़ा अनर्थ होने वाला था, मैंने बात को संभाला- आपके काम के लिए छोटू ने बात की थी? ये छोटू भी न कुछ ठीक से नहीं बताता, आप बैठिये, आप अपना परिचय दीजिये !
"मेरा नाम लीना है, 24 वर्ष की हूँ, बारहवीं कामर्स से पास हूँ, यह मेरी मार्कशीट है, आपके ऑफिस के पीछे गली नंबर तीन में रहती हूँ, मेरे पति संतोष कुमार एक दवाई कम्पनी में ऍम आर हैं, वो सुबह से अपने काम पर चले जाते हैं तो सात आठ बजे तक लौटते हैं, दोपहर को मैं अपने काम से फ्री हो जाती हूँ तो घर पर बोर होने से अच्छा है आपके ऑफिस में ही काम करूँ !"
मैंने कहा- आपके पति संतोष को आपके काम करने में कोई आपत्ति तो नहीं है? आपकी शादी कब हुई? आपके कितने बच्चे हैं?
तो वो बोली- मेरी शादी को दो साल होने वाले हैं, अभी कोई बच्चा नहीं है, मेरे पति से मैंने आज्ञा ले ली है !
मैंने सोचा 'अंधे के हाथ बटेर लगना !' यह कहावत भी सच हो जाती है। मेरे से तो जैसे बोलते ही नहीं बन रहा था, फिर भी सारी बातें जैसे पगार, समय, क्या क्या काम करना है, सब तय करके मैंने कह दिया- ठीक है, तुम काम कर सकती हो यहाँ !
तो बोली- में कल से आ जाऊँगी !
मैंने कहा- कल से क्यों? 'काल करे सो आज कर !' वाली कहावत सुनी आपने ! आज से ही आप काम पर हो !
बोली- ठीक है !
उसने साड़ी के साथ जो ब्लाउज़ पहना था, वो बिना आस्तीन वाला गहरे गले वाला था जिससे उसके उन्नत उभार बाहर निकलने को बेताब हो रहे थे और रोनी उनको देखने के लिए बेताब हो रहा था !
उसका फिगर 32-28-34 के लगभग होगा कटीले नैन नक्श, रंग गोरा, मंझोला कद, बालों को जूड़े के रूप में बांधा हुआ था, बड़ी ही मस्त लग रही थी, जैसी रोनी को पसंद है बिल्कुल वैसी ही थी वो !
मैं उसे सारा काम समझाने लगा, उसको उसकी कुर्सी बता दी, उसके काउंटर जैसे टेबल में बहुत से रजिस्टर, मकान के डिजाइन वाले ब्रोसर, पम्पलेट और भी बहुत सा सामान था ! मैं ठीक उसके सामने खड़े हो गया फिर मैं उससे एक एक सामान उठाने को कह रहा था जब वो झुककर उठाती तो उसकी बड़ी बड़ी गोल मटोल छातियों को गहराई तक देख देख कर मेरी छाती पर सांप लोट रहे थे।
जब कोई सामान वो उठाती तो उसके बारे में समझा कर फिर दूसरा सामान उठाने को कहता ! पूरे बीस मिनट तक उसे सभी कुछ समझाता रहा, जब उसे लगा कि मेरी नजर उसके गोलों पर केन्द्रित है तो उसने साड़ी का पल्लू का आवरण उन पर डाल लिया !
मैंने सोचा कि आज के लिए इतना काफी है, मैंने कहा- अभी मुझे कुछ काम है, कोई कस्टमर आये तो फोन करके मुझे बुला लेना !
मैं बाइक लेकर चला गया, लीना के फोन का इंतजार करता रहा कि उसकी खनकती आवाज सुनने को मिल जाये पर नहीं मिली सुनने को !
फिर 3 बजे ऑफिस वापस आ गया, अपने कम्पयूटर पर कुछ नक़्शे बनाने थे ! लीना ने सारी काउंटर टेबल में जमी हुई महीने भर की धूल को झाड़कर अच्छे से साफ कर दिया फिर एक अख़बार निकाल उसे पढ़ने लगी। जाने कितना पुराना होगा वो अख़बार !
शाम छह बजे लीना बोली- मैं जा सकती हूँ?
तो मैंने कहा- हाँ ठीक है, कल 11 बजे आ जाना !
दूसरे दिन मैंने ऑफिस खोला ही था कि लीना आ पहुँची। वो सलवार सूट पहनकर आई थे, हरे रंग का सूट, उस पर लाल पीले फूल बने हुए थे, बिल्कुल सिम्पल सादे लिबास में उसकी असली खूबसूरती और भी निखरी हुई लग रही थी।
मैंने उसे सारे काम एक बार फिर से समझा कर अपनी साइट पर चल रहे ज्योति मैडम के मकान का काम देखने चला गया !
इस मकान का काम लगभग पूरा हो चुका था, कारीगर अभी टायल्स लगा रहे थे जिन्हें ज्योति मैडम ने चार दिन तक मेरे साथ घूम घूमकर मुश्किल से पसंद किये थे, इस समय वो वहीं मौजूद थी, मेरे को देखते ही चहक उठी- रोनी जी, टायल्स अच्छे लग रहे हैं न? मेरी पसंद सही है या नहीं?
दूसरे दिन मैंने ऑफिस खोला ही था कि लीना आ पहुँची। वो सलवार सूट पहनकर आई थे, हरे रंग का सूट, उस पर लाल पीले फूल बने हुए थे, बिल्कुल सिम्पल सादे लिबास में उसकी असली खूबसूरती और भी निखरी हुई लग रही थी।
मैंने उसे सारे काम एक बार फिर से समझा कर अपनी साइट पर चल रहे ज्योति मैडम के मकान का काम देखने चला गया !
इस मकान का काम लगभग पूरा हो चुका था, कारीगर अभी टायल्स लगा रहे थे जिन्हें ज्योति मैडम ने चार दिन तक मेरे साथ घूम घूमकर मुश्किल से पसंद किये थे, इस समय वो वहीं मौजूद थी, मेरे को देखते ही चहक उठी- रोनी जी, टायल्स अच्छे लग रहे हैं न? मेरी पसंद सही है या नहीं?
मैंने कहा- मैडम, आपकी पसंद तो लाजवाब है।
बोली- ऊपर वाले बाथरूम के लिए कुछ विशेष टायल्स के लिए लेनी हैं, आइये, हम बताते हैं।
मैं उनके पीछे हो लिया, ऊपरी मंजिल का काम पूरा हो चुका था, वहाँ कोई था भी नहीं, फिर उसने चारों ओर एक बार देखा एक कमरे में मेरे को ले जाकर मुझसे लिपट कर मुझे चूमने लगी।
बोली- आजकल तो जनाब को मेरे लिए बिल्कुल भी समय नहीं है।
मैंने कहा- ऐसा नहीं ज्योति जी, काम पहले जरुरी होता है।
बोली- मेरे मकान का काम समाप्ति पर है। रंग-रोगन के बाद तो आपका आना भी बंद हो जायेगा। तुम मेरे घर कब आ रहे हो?
मैंने लोहा गर्म देख कर चोट कर दी।
फ़ौरन कहा- मैडम मेरे कारीगरों को उनकी मजदूरी चुकाना है, जितना सामान इस काम के लिए भाड़े पर लिया था उन सबका किराया भुगतान करना है। आप मेरा पेमेंट जब करोगी, मैं उस दिन आ जाऊँगा।
तुरंत बोली- कल ही 12 बजे आकर ले लो। आपका पेमेंट साहब ने चार दिन पहले ही मेरे पास भिजवा दिया था।
मैं समझ गया कि ‘गर्म लोहे पर तो चोट ज्योति मैडम ने किया है रोनी तू तो गया...!’
दूसरे दिन मैं 11 बजे ऑफिस पहुँच गया। मुझे ज्योति के घर पेमेंट लेने जाना था। मुझे मालूम था कि आज ज्योति मुझ को छोड़ने वाली नहीं है।
उसके मकान के निर्माण में 6 माह का समय लग गया था। इन छह माह में तीन बार उसकी जवानी का रस जी भरकर पिया था।
थोड़ी ही देर बाद लीना भी आ गई। क्रीम रंग की प्रिंट वाली साड़ी में उसके रूप-लावण्य को देख कर ठगा सा रह गया। उसके ब्लाउज में से उसके बड़े-बड़े उरोज को कवर किये हुए उसकी सफ़ेद ब्रा दिख रही थी।
ज्योति के ख्यालों में खोया था तो शराफत का चोला पहनते हुए मैंने कहा- लीना, जरा रजिस्टर उठाकर देखो कि ज्योति मैडम का कितना अमाउंट बाकी लेना बनता है? और उनके दिए सारे भुगतानों का डिटेल डेट बाई डेट एक पेपर पर लिखकर दो। मुझे आज उसने पेमेंट घर आकर लेने के लिए बुलाया है।
डिटेल के कागज लेकर मैं ज्योति के घर पहुँचा, सोचा इस समय तो उसके बच्चे स्कूल में होंगे।
जैसे ही ज्योति ने दरवाजा खोला उसे देख मेरे आँखे खुली की खुली रह गईं, उसने काले रंग का गाउन पहन रखा था। चेहरे को चमकाकर सुर्ख लिपस्टिक लगाई हुई थी, बाल खुले हुए गाउन के नीचे काली ब्रा जो बड़े-बड़े चुच्चे की गोलाई आधे से ज्यादा ढकने में नाकाम थी। नीचे काली पैन्टी पहनी हुई थी, जिसके नीचे दूधिया जाँघे चिकनी-चिकनी दिखाई दे रही थीं।
मेरे लंड ने सलामी देना शुरू कर दिया। दरवाजा बंद करके ज्योति ने परदे भी लगा दिए और एक झटके में गाउन को निकाल फेंका।
उसका 34-30-36 के फिगर वाला बदन मेरी आँखों के सामने था। सारा बदन संगमरमर की तरह चिकना और गोरा था। एक भी दाग उसके जिस्म पर दिखाई नहीं दिया मुझे। मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर अपने पास खींचकर उसे अपने आलिंगन में ले लिया।
“अह्ह्ह... रोनी...आआअ ....आ ..जाओ न ..”
ऐसा नहीं था कि पहली बार उसके साथ ये सब कर रहा था, परन्तु आज वो कुछ ज्यादा ही उन्मुक्त हो कर वासना से भरी हुई थी। उसने मेरे सारे कपड़े निकाल दिए। मुझे पलंग पर गिराकर मेरे ऊपर सवार हो गई। मेरे सारे बदन को चूमने-चाटने लगी। उसकी सांसें प्रतिपल तेज और तेज होती जा रही थीं।
“ओह्ह्ह .......”
अंत में मेरे लंड का पकड़कर चूमते हुए सहलाने लगी मैंने भी उसकी ब्रा-पैन्टी को निकालकर उसकी चिकनी गुलाबी बुर पर प्यार से हाथ फिराते हुए, बुर में अंगुली को डाल दिया। अंगूठे से उसके शिश्निका को सहलाते हुए अंगुल-चोदन शुरू कर दिया।
वो सिस्कारियों के साथ मेरे लौड़े पर जीभ फेरते हुए चूमने लगी, कभी चूस भी लेती थी।
जन्नत का मजा दोनों को आ रहा था फिर वो मेरी कमर पर आ गई। लौड़े को अपनी गीली बुर पर टिकाकर अपनी गांड का दबाब बनाते हुए लौड़े को अपनी बुर में घुसा लिया।
“ओह्ह... रोनी... कितना मजा आ रहा है आह्ह्ह... स्स्स्स !” करते हुए वो लंड को अपनी बुर में सटासट अन्दर बाहर करते हुए मेरे ऊपर झुक गई।
मैं उसके रसीले संतरे जैसे बूब्स को अपने हाथों से मसलते हुए निप्पल को चूसते हुए, दांतों से मसल भी देता।
वो शिखर पर पहुँच कर झड़ने लगी मुझ से कस कर लिपट गई। मैंने उसके मांसल नितम्बों को सहलाते हुए उसके होंठों को चूस लिया।
उसे चित्त लेटाकर उसके टाँगों को अपने कंधे पर रखकर ठाप लगाना शुरू किया फिर स्पीड बढ़ाते हुए चुदाई की मंजिल पर पहुँचकर उसकी चूत को अपने वीर्य से लबालब कर दिया।
दोनों ही हांफते हुए अपनी धड़कनों पर काबू करने का प्रयास कर रहे थे। फिर ज्योति ने मुझे चूमा और अपने कपड़े उठाकर नहानी में चली गई। मैंने भी अपने को साफ करके कपड़े पहन लिए।
फिर ज्योति को अपने साथ लाये कागज पर लिखा हिसाब बताया मेरे बताये अनुसार उसने मेरा पूरा भुगतान कर दिया।
अगले दस दिन बाद उनके पति आ गए। इसी दौरान उनके मकान का पूरा काम होने के बाद उन्हें मकान की चाभी सौंप दी, फिर आज तक कभी भी ज्योति से मुलाकात नहीं हुई। हाँ कभी-कभी वो फोन लगाती थी, अब फोन भी नहीं आते उसके। मैं भी फोन लगाकर डिस्टर्ब करना नहीं चाहता उसे।
आप सोच रहे होंगे ये ज्योति कौन है? मेरे से कैसे मिली तो आपको उसकी कहानी का फ़्लैश-बैक भी बता देता हूँ।
मुझसे उसके पति की मुलाकात 6 माह पहले हुई। वो अपने शहर से बाहर पूना में किसी कम्पनी में जॉब करता है। उसका वहाँ एक साल का जॉब का कांट्रेक्ट है।
वो अपने पुराने मकान को तोड़कर नया मकान बनवाना चाहता है, फिर एक साल बाद वो यहीं शिफ्ट हो जायेगा। उसने यह ठेका मुझे दे दिया।
बोले- मैं 20-25 दिन में यहाँ आ पाता हूँ, इसलिए इस काम को मेरी पत्नी ज्योति देखती रहेगी। आपके सारे पेमेंट आपको समय समय पर मिलते रहेंगे। फिर वो अपना पूरे मकान का प्लान वाला नक्शा देकर पूना चले गए।
मैंने काम शुरू कर दिया। अक्सर ज्योति साईट पर काम देखने आती थी। मुझ से बात करते हुए मुस्कुराती रहती थी, जैसे मुझ पर फ़िदा हो रही हो पर पड़ी लिखी महिला होने के नाते मैं इसे गंभीरता से नहीं लेता था।
फिर जब मैं अपने ऑफिस के लिए वहाँ से वापस आता तो मुझसे लिफ्ट ले लेती थी। मैं उसके बदन की महक करीब से महसूस करता तो मेरा तो लिंग मचलने लगता था। पर अपने लंड को ये समझाकर कि ज्योति ऐसी-वैसी नहीं है, शांत कर देता था।
तीन माह बाद एक बार साईट पर काम बंद था ज्योति ने किचन के बारे में समझाने के लिए उसके नव-निर्मित मकान यानि मेरी साईट पर बुलाया।
किचन के बारे में अपना प्लान बताने लगी, अचानक ज्योति का पैर फिसला और पानी के टैंक में गिर गई।
मैंने सहारा देकर उसे पानी बाहर निकाला। वो पूरी भीग गई थी। वो मुझे कसकर पकड़े थी, घबरा भी गई थी। उसका भीगा जिस्म कपड़ों में से नुमाया हो रहा था।
सबसे ज्यादा उसके स्तन और नितम्ब तो मुझ को पागल बना रहे थे। टैंक से निकालते हुए मैंने थोड़ा बहुत उनका स्पर्श करते हुए मजा ले लिया था।
वो बोली- अब क्या करें? मैं घर कैसे जाऊँगी?
मैंने कहा- एक उपाय है। अक्सर साईट पर मेरे कपड़े सीमेंट, मिटटी, पानी से गंदे हो जाते हैं, इसलिए मेरे बेग में एक टी-शर्ट और लोअर रखा रहता है। आप चाहो तो वो पहन लो।
मरता क्या न करता उसने कपड़े लेकर एकांत कोने में जाकर वो पहन कर अपने गीले कपड़े रख लिए। मैं उसे कपड़े बदलता देखना तो चाहता था, पर सोचा अगर वो देख लेगी तो क्या होगा?
मैं अपनी बाइक के पास आकर खड़ा हो गया। फिर झुंझलाती हुई ज्योति आ गई। अभी भी उसके गीले बालों से पानी की बूँदें टपक रही थीं। उसके लोवर टी-शर्ट को देख स्पष्ट लग रहा था कि उसने ब्रा पैन्टी भी उतार कर कपड़ों में रख लिए है।
मैंने कहा- चलिए आपको घर छोड़ दूँ।
तो वो दोनों तरफ पैर डाल कर पीछे बैठ गई। मैं उसे उसके घर छोड़ कर अपने ऑफिस आ गया और अपने कामों में लग गया।
मैं ज्योति के ख्यालों में खोया सोच रहा था कि ‘आज पहली बार ज्योति बाइक पर दोनों तरफ पैर डालकर बैठ कर मुझसे इतना चिपककर क्यों बैठी थी कि उसकी चूचियों की नोक मेरी पीठ पर चुभ रही थी। शायद ये भी हो सकता है कि इन कपड़ों में अपने आप को असहज महसूस कर रही हो। लोगों की नजरों से बचने के लिए भी ऐसा हो सकता है।’
उसी शाम को ज्योति का फोन आया बोली- ऑफिस बंद करके आप मेरे यहाँ आ सकते हो? आप अपने कपड़े ले जाना और आज मैंने गुलाब-जामुन बनाए हैं, उनको खा कर बताना कैसे बने हैं?
मैं पूरी बात समझ गया कि दाल में काला जरुर है। शाम वहाँ पहुँचा तो समझ गया कि यहाँ तो पूरी दाल ही काली है। जैसे ही ज्योति ने दरवाजा खोला, रोनी की छटी इंद्री जाग उठी।
ज्योति अभी भी उसी लोवर टी-शर्ट को पहने थी यानि रोनी को कपड़ों का धोखा देकर बुलाया गया है। धोखा किस तरह का हो सकता है, इसको जाँचने के लिए मैंने पूछा- दोनों बच्चे दिखाई नहीं दे रहे कहाँ है वे?
ज्योति- बच्चों के मामा आए थे, जिद करके उनके साथ चले गए। उनकी दो दिन की छुट्टी थी, तो मैंने भी मना नहीं किया।
फिर यहाँ वहाँ की बहुत सी बातें होती रहीं। यहाँ तक कि उसने अपने पति को ये इल्जाम भी दे दिया कि इन्हें तो मेरी तो कोई चिंता ही नहीं।
बिल्कुल स्पष्ट हो गया कि कामदेव के तीर चल चुके हैं। यह मुझसे चुदना चाहती है, तभी तो अकेले में बुलाया।
अब सवाल यह था कि शुरुआत कैसे हो?
ज्योति चाय बनाने का कहकर किचन में चली गई। मैं उसके मटकते नितम्ब देखता रह गया। अब मैं सोचने लगा इसके भरोसे तो शायद सुबह ही हो जाएगी। मुझे ही शुरुआत करना पड़ेगी। कहावत है, जब बात निकलेगी तो दूर तक तो जरूर जाएगी।
ज्योति चाय के साथ नमकीन और गुलाब-जामुन का नाश्ता भी लेकर आ गई।
दोनों ने आमने सामने बैठ कर नाश्ता किया, चाय पीते समय देखा कि टी-शर्ट के ऊपर के बटन खुले जरूर थे, पर हल्का सा उभार के अलावा दिखाई कुछ नहीं दे रहा था।
ज्योति तो ज्यादा से ज्यादा झुक कर दिखाने की कोशिश में थी, पर नाकाम रही।
मैंने उसे छेड़ने के लिए कहा- मैडम आपने कहा था कपड़े ले जाना पर आपने तो इन्हें चेंज ही नहीं किया। अब उतार भी दो तभी तो ले जा सकूँगा।
ज्योति- यहाँ आपके सामने? आप भी न बड़े शरारती हो।
मैं- तो क्या हुआ? ये कपड़े पहने भी तो मेरी आँखों के सामने थे। अब मुझ से क्या पर्दा?
ज्योति हक्की बक्की रह गई वो भागकर अन्दर वाले कमरे में चली गई।
मैं पीछे उसके पास गया तो बोली- आपने सच्ची में मुझ को वहाँ पर कपड़े बदलते समय बेपर्दा देख लिया था?
अगर ज्योति के मन में कोई गलत बात नहीं होती तो वो मेरी इन बातों को सुनकर अब तक मुझ को घर से बाहर निकलने को बोल दिया होता। मगर वो तो शर्म से मुँह छुपा रही थी यानि निःसंदेह लाइन साफ है।
मैं- ज्योति आप बहुत खूबसूरत हो। सच में आपके बड़े-बड़े कसे हुए स्तन मेरे पीठ को बहुत गुदगुदा रहे थे। मैं तो बहुत उत्तेजित हो गया था, कहते हुए अपने कांपते हाथ उसके कंधे पर रख दिए।
जब कोई विरोध नहीं किया उसने, तो लपक कर उसे चूमने लगा और उसके स्तन मसल डाले पीठ और नितम्ब तक सहला दिए।
वो मुझसे लिपट गई, बगैर मेहनत के पेड़ का टूटा फल मेरी गोद में आ गिरा। यह कहावत भी चरितार्थ हो गई थी।
फिर उस दिन रात 11 बजे तक रूककर ज्योति को रगड़कर मसलते हुए दो बार चुदाई की थी।
आते वक्त ज्योति ने एक रहस्य उजागर किया कि मैं खुद जान बूझकर पानी के टैंक में गिर गई थी। अपने गीले कपड़े बदलते हुए बेपर्दा भी हुई थी, पर आपने कोई प्रतिकिया न करके मुझ को अपने घर छोड़ दिया। मैं पति से दूर रहकर ये सब कर गुजरी। मुझे दुःख है कोशिश करुँगी कि अब मैं ऐसा न करुँ।
दूसरी बार उसने मुझ को फिर बुलाया और रोते हुए बताया कि मेरे पति बीस दिनों बाद आज आने वाले थे। मैं बहुत उत्साहित और उत्तेजित थी। बच्चों को मामा के यहाँ भिजवा दिया है फिर अभी उनका फोन आया कि कोई अर्जेंट प्रोजेक्ट के कारण अभी पच्चीस दिन और नहीं आ पाएंगे। प्लीज मेरी मजबूरी को समझो रोनी, कहते हुए मुझसे लिपट कर उसने जो अपने जिस्म के जलवे दिखाए तो रोनी का दिल बाग़ बाग़ हो गया।
जिसके लिए खुद रोनी मौका तलाशता रहता है, वो खुद उसे मिल गया था। उस दिन उसने दिल खोलकर मेरे साथ चुदाई की। वो तो बस रमणिका बन गई थी।
तीसरी बार जब मार्केट से टायल्स खरीदकर लाये फिर उन्हें रखवाने के लिए साईट पर गए। तब वहाँ काम नहीं लगा था। ताला खोलकर टायल्स रखवा दिए।
टेम्पो वाला भाड़ा लेकर चला गया तो मोहतरमा ज्योति जी वासना से भरी सांसें लेती हुई बोली- रोनी, अब तो आपका मेरे मकान का काम समाप्त हो रहा है। ये भी आने वाले हैं, शायद अब मौका नहीं मिल पायेगा। आज आखिरी बार मेरी प्यास बुझा दो।
ऐसी वीरानियों को देख मैं तो खुद उससे यही बात कहने वाला था, पर उसने तो मुझसे पहले ही कहकर मुझे मौका ही नहीं दिया। फिर क्या था, दरवाजे लगाए फिर वही तूफान का प्रचंड वेग आ गया। फिर भूकंप के साथ धमाका हुआ, फिर ज्वालामुखी के लावा बह निकले। तब कहीं जाकर सांसों का तूफान थमा।
इसके बाद की आखिरी मुलाकात आप पहले ही पढ़ चुके हैं।
मेरी असिस्टेंट लीना की चुदाई करने के लिए मैं तड़फ रहा था, पर कोई मौका ही नहीं मिल रहा था।
अब मेरा ध्यान लीना पर केन्द्रित था। उसकी जवानी तो कपड़ों के ऊपर से ही महसूस करके मेरे तन-बदन में आग सी लग जाती थी।
अब तक उसको नौकरी करते एक माह भी होने वाला था। अब उससे बहुत मजाक कर लेता था। वो भी मुझे अपने दोस्त की तरह एक जवाबदार इन्सान समझते हुए अपनी पर्सनल बातें मुझसे साझा करने लगी थी।
मेरी असिस्टेंट लीना की चुदाई करने के लिए मैं तड़फ रहा था, पर कोई मौका ही नहीं मिल रहा था। अब मेरा ध्यान लीना पर केन्द्रित था, उसकी जवानी तो कपड़ों के ऊपर से ही महसूस करके मेरे तन-बदन में आग सी लग जाती थी। अब तक उसको नौकरी करते एक माह भी होने वाला था। अब उससे बहुत मजाक कर लेता था।
वो भी मुझे अपने दोस्त की तरह एक जबाबदार इन्सान समझते हुए, अपनी व्यक्तिगत बातें मुझसे साझा करने लगी थी। जैसे माहवारी के बारे में होने वाली तकलीफ बता देती थी, गर्भवती होने के लिए गर्भाधान का उचित समय क्या है? अधोवस्त्र का चुनाव कैसा होना चाहिए, यहाँ तक की चूत की शेविंग के लिए क्या इस्तेमाल करना चाहिए?
ये सभी बातें डिस्कस कर लेती थी, मैं भी पीछे नहीं रहता था, उसके निजी पल जो पति के साथ बिताती थी, शारीरिक सम्बन्धों से सम्भोग तक सब कुछ पूछकर मजा लेता था। वो लजाते शरमाते बहुत कुछ बता देती थी।
उसको कंप्यूटर चलाना भी सिखा दिया था, जिससे वो मकानों के प्लान उनके नक्शा और डिजाइन सब खोल सके। फुर्सत में लीना अक्सर गाने सुनती और गेम खेलती रहती है। मेरे जाते ही कंप्यूटर से चिपक जाती है।
अब उसकी चुदाई के लिए कोई संशय था तो वो यह कि यह चुदने तैयार होगी या नहीं। चुदाई के लिए पहल कैसे की जाए कि वो मेरे को गलत भी न समझ ले और बिना गुस्सा हुए मेरे प्रणय निवेदन को स्वीकार कर भी ले।
इन्हीं ख्यालों में खोया आज ऑफिस में बैठा उसके आने का इंतजार कर रहा था। ठीक सवा ग्यारह बजे लीना आ गई। साईड कट वाली पीली कुर्ती और टाँगों पर चिपकी काली लैगी उस पर काला दुपट्टा।
माशा अल्लाह ! मेरी तो आँखें उसकी जाँघों के कटाव और गांड के उभारों में जैसे उलझ सी गईं। ऊपर निगाह उठाई तो उसके स्तनों ने भी मेरे दिल पर नश्तर से चला दिए।
हल्की सी मुस्कान देते हुए बोली- सर, कल मेरा महीना होने वाला है।
वो आगे कुछ बोलती उसके पहले ही मैंने चुटकी लेते हुए कहा- लेकिन तुम्हारा महीना तो पिछले हफ्ते ही हो चुका, फिर इतने जल्दी?
वो जोरों से हंसीं और बोली- सर आप भी न..! मेरा मतलब मेरी नौकरी को एक महीना होने वाला है और आपसे एक निवेदन है कि मेरी पगार आज ही दे दो। क्योंकि कल मेरी शादी की दूसरी सालगिरह है और मैं अपने पति को अपनी पहली पगार से एक सुन्दर सी टाई और एक कैप गिफ्ट करना चाहती हूँ।
मैंने भी साफ झूट बोलते हुए मौका देख चौका लगा दिया- अजब इत्तफाक है, कल मेरी बीवी का जन्मदिन भी है। अच्छा बाकी बातें बाद में, मेरे को साईट पर जाना है, दोपहर तक आ जाऊँगा।”
तो वो सिर्फ मुस्कुरा दी। मैं अपनी बाइक लेकर साईट पर चला गया, लेकिन मन ही मन कोई तरकीब सोचता रहा, फिर तीन बजे ऑफिस पहुँचा।
मौका देखकर बाहरी कांच वाला दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया। एक गिफ्ट पैक जिसमें दो जोड़ी ब्रा-पैन्टी के सैट 32 साइज के थे, लीना के सामने रख दिए।
लीना बोली- ये क्या है?
मैंने कहा- गिफ्ट है इसमें, देखो कैसा है?
वो उत्सुकता से गिफ्ट पैकिंग को खोलने लगी। मैं उसके चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश कर रहा था।
पैकिंग खुलते ही उसमें रखे ब्रा-पैन्टी के पैकेट देख उसका चेहरा सुर्ख हो गया, बोलने लगी- सर, मैं ये नहीं ले सकती।
मैंने कहा- खोलकर तो देखो, कैसी हैं ये?
तो बोली- जब लेना ही नहीं तो खोलकर क्या देखना?
मैं समझ गया कि ये नहीं लेगी तो मैंने बात को पलट दिया।
मैंने कहा- मत लेना, पर देख तो लो मेरी खातिर ! ये तो मैं अपनी बीवी के लिए लाया हूँ यार। उसके जन्मदिन का उपहार के लिए, इसमें से एक जोड़ी पसंद कर दो मेरी बीवी के लिए। दूसरी जो पसंद नहीं होगी, उसे दुकान पर वापस कर दूंगा। तुम्हारे लिए थोड़े ही लाया हूँ जो इतना शरमा रही हो।
उसने काँपते हाथों से उन पैकेट को खोला तो उन ब्रा पैन्टी को देखकर बोली- सर ये तो बहुत ही सुन्दर और बिलकुल नए फैशन की बहुत अच्छी हैं। ये तो मंहगी भी बहुत होंगी।
मैंने कहा- गिफ्ट में मंहगा सस्ता नहीं देखा जाता, देने वाले की भावनाओं को देखा जाता है। आपको अच्छी नहीं लगी क्या?जल्दी से एक पसंद करके बताओ न !
बोली- सर दोनों इतनी अच्छी हैं कि मैं इनमें से सिलेक्ट नहीं कर पा रही हूँ।
उसकी बात को अनसुना करते हुए मैंने कहा- ये रही आपकी पगार।
उसको रूपये देते हुए कहा- एक काम करते हैं, कल ऑफिस की छुट्टी कर लेते हैं। मुझे अपनी बीवी के पास और आपको अपने पति संतोषकुमार के साथ बिताने का समय मिल जाएगा, आप इस ब्रा-पैन्टी का चुनाव तो करो !
लीना बोली- मैं तो असमंजस में पड़ गई हूँ।
“अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ? अगर आप असमंजस में हों और दोनों सैट अच्छे लगे हों तो एक सैट ब्रा-पैन्टी का आप ही रख लो।"
लीना बोली- न बाबा न मेरे पति संतोष इसे देखकर कहेंगे कि इतना मंहगा सैट कैसे ले लिया तुमने?
मेरे को लगा चिड़िया फँस गई जाल में ! फ़ौरन मैंने कहा- तुम उसे टाई और कैप तो ले ही रही हो, बोल देना मेरी पगार मिली तो ख़ुशी में खरीद ली। फिर सालगिरह का मौका है, वो ज्यादा ध्यान नहीं देंगे।
एक पैकेट मैंने उसके बैग में डाल दिया वो किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गई। लेकिन मेरा आगे का रास्ता खुल गया था। इच्छा तो हो रही थी कि उससे कहूँ कि मुझे एक बार पहन कर दिखा दो। पर अभी यह बात कहने के लिए समय उपयुक्त नहीं था।
फिर शाम तक वो अपने काम में व्यस्त रही। शाम पाँच बजे मैंने ही कहा- अब तुम घर चली जाओ, तुम्हें बाजार भी जाना है।
वो अपना बैग उठाकर जाने लगी तो मैंने अपना हाथ उसके और बढ़ाते हुए कहा- सालगिरह की बधाई तो लेती जाओ।
तो उसने अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया, बोली- धन्यवाद।
उसके कोमल मक्खन सी हथेली को छोड़ने का दिल नहीं कर रहा था पर मजबूर था।
मैंने कहा- यह तुम्हारी शादी की दूसरी सालगिरह है, पर लगता है जैसे कल ही तुम्हारी शादी हुई हो। बिल्कुल नई-नवेली लगती हो।
वो शरमाते हुए बोली- सर, आप भी न मजाक करने में जरा भी नहीं चूकते।
वो ऑफिस से बाहर निकल गई। मैं उसकी कुर्ती के कट से उभरे हुए नितम्ब देखता रह गया।
दूसरे दिन ऑफिस की छुट्टी के कारण लीना को तो आना नहीं था, मैं सीधा साईट पर चला गया। फिर फुर्सत के समय में आकर ऑफिस खोल लिया।
सोचा एक अधूरी कहानी को पूरी कर के भेज दूँ। तब मैं कली से फूल कहानी लिख रहा था। उसे तैयार करके प्रकाशन हेतु पोस्ट कर दिया।
फिर लीना की चुदाई के लिए कोई युक्ति सोचने लगा। मुझे अब विश्वास हो गया की मेरा युक्ति कामयाब रही तो कल जरूर कुछ कर गुजरूँगा।
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घरेलू महिलायें--1
मेरा दो कमरे का छोटा सा ऑफिस है जहाँ से मैं अपना काम संचालित करता हूँ, अन्दर के कमरे को रेस्टरूम कम स्टोररूम बना रखा है, सड़क से लगे बाहर के कमरे में रिसेप्शन बनाया हुआ है जहाँ एक कोने में मेरी कुर्सी टेबल काउंटरनुमा, दूसरे कोने पर एक कुर्सी टेबल काउंटर नुमा मेरे असिस्टेंट के लिए है जिसका काम है मेरी अनुपस्थिति में आने वाले कस्टमर को जानकारी देना-लेना, उनका नाम पता फोन नंबर रजिस्टर पर लिखना, फिर आवश्यक जानकारी मुझे देना एवं कस्टमर से मेरी फोन पर बात कराना, ऑफिस का रखरखाव देखना !
असिस्टेंट महिला या पुरुष जो भी योग्य मिलते, लगा लेता था, टाइम 11 से 6 बजे तक, पगार 2500 से ज्यादा नहीं देता मैं, इसलिए अक्सर असिस्टेंट ज्यादा समय तक नहीं टिकते !
हाँ छोटू जरूर चार साल से मेरे यहाँ टिका है, उसके माँ बाप मजदूरी करते हैं, वो पढ़ना चाहता है इसलिए सुबह झाड़ू पोंछा करके पीने का पानी की व्यवस्था करके 11 बजे स्कूल चला जाता है, वर्तमान में दसवीं कक्षा का छात्र है, एक चाबी उसको दे रखी है जिसके बदले में उसकी पढ़ाई का सारा खर्च शुरू से अंत तक मैं ही उठाता हूँ, छुट्टी के दिन जरूर ऑफिस में बैठता है, कभी कभी जेब खर्च मांग लेता है !
यहीं ऑफिस में फुर्सत के क्षणों में कहानी लिखता हूँ, मेरी कहानी पढ़ने वालों के मेल पढ़ता हूँ। मेल अधिकांश मध्य प्रदेश के सभी शहरों के महिला पुरुष के होते हैं, बिहार, यूपी, दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान, महारास्ट्र, गुजरात और अन्य राज्यों से भी बहुत से मेल आते हैं, कुछ मेल हिंदुस्तान से बाहर के भी आते हैं, मैं सभी का शुक्रगुजार हूँ !
अब मुद्दे पर आते हैं। कुछ महीनों पहले की घटना है यह !
मेरे पास कोई असिस्टेंट ऑफिस के लिए नहीं था जिसके कारण मैं अपनी साइट से ऑफिस समय पर नहीं पहुँच पाता था, ऐसे में ऑफिस बंद रहने लगा, मुझे अपने काम चिंता होने लगी तो मैंने छोटू से कहा- कोई लड़का या लड़की जो काम का इच्छुक हो और यहीं आसपास रहता हो, जो बारिश में भी ऑफिस आ सके, का इंतजाम करो ऑफिस के लिए, नहीं तो बहुत नुकसान हो रहा है !
दूसरे दिन सुबह छोटू ने बताया कि लीना आंटी ऑफिस में बैठने को तैयार हैं, बारहवीं तक पढ़ी लिखी हैं, ऑफिस के पास ही रहती हैं। अंकल नौकरी करते हैं तो वो दिन में फ्री रहती हैं।
मैंने आंटी सुनकर तुरन्त ही कह दिया- दोपहर बारह बजे भेज देना !
सोचा छोटू ने आंटी बोला है तो पैंतीस चालीस साल की तो होगी, फिर ऑफिस में फुर्सत का टाइम पास भी हो जायेगा, पहले भी कई महिलायें काम कर चुकी हैं और अपना काम करवा भी चुकी हैं। मस्त बिंदास निश्चिंत होकर बिना किसी व्यवधान के मेरे रेस्ट रूम में से मैंने उनके मजे लिए है और उन्हें संतुष्ट करके मजे दिए हैं ! समय की कमी नहीं होती, 3 से 6 बजे मैं ऑफिस में ही रहता हूँ, कुछ महिलायें तो बड़ी जल्दी सेट हो जाती हैं, कई को सेट करने की जुगत लगाना पड़ती है, कुछ महिलायें इन कामों से दूर ही रहती है तो रोनी भी उनसे दूर ही रहता है, उन पर अपना समय व्यर्थ नहीं करता !
कुछ मकान बनवाने वाली नौकरीपेशा या घरेलू महिलायें भी बड़े आसानी से इन सबके लिए तैयार हो जाती हैं क्योंकि उनसे मेरा मिलना बार बार होता है। वैसे भी ज्यादातर मकान महिलाओं की पसंद से बनता है और वो जिस उम्र में ज्यादा सेक्स पसंद करती है, उसी समय उनके पतियों को रुपया पैसा कमाने से फुर्सत नहीं मिलती तो मकान की देखरेख उसका निर्माण देखना भुगतान का लेनदेन तक वही देखतीं हैं। ऐसे में कई बार मेरे साथ वो साइट पर भी जाती हैं कभी मेरी बाइक पर या कभी मेरी क्लासिक जीप में, तो बहुत मौका मिलता है बात करने का ! फिर हंसी मजाक में उनके मुखारविंद पर आई भाव भंगिमायें उनके दिल के राज खोलकर रख देती हैं, उस पर यह कि कामदेव के तीर मुझे कुछ ज्यादा ही भेदते हैं, कामवासना से परिपूर्ण होने के कारण मैं इन तीरों से जल्द घायल हो जाता हूँ जब नर और नारी राजी तो क्या करेगा काजी, फिर जो हो सके कर गुजरो !
मैं कुछ हसीनाओं के साथ गुजारे हसीन पलों को मैं इसी कहानी में एक के बाद एक जरूर लिखूँगा जिसको पढ़ते हुए आप सभी अपने यौनांगों को सहलाते हुए मजे लोगे ! कहानी थोड़ी लम्बी होगी, उम्मीद है आपका भरपूर मनोरंजन होगा !
लीना आंटी का ध्यान आते ही मैं सोचने लगा कि इस उमर में अंकल लोग ज्यादा टाइम नहीं देते तो आंटी प्यासी भी होती हैं, आंटी अनुभवी भी होती हैं, मजा भी बहुत देती हैं, चुसाई में तो इन्हें महारथ हासिल होती है, बड़े बड़े मोम्मे, गुदाज नितम्ब, एकदम गदराया बदन !
कल्पनाओं में खोया अच्छे से तैयार होकर 11 बजे ऑफिस आ गया !
थोड़ी देर बाद एक जोड़ा ऑफिस में आया, आते ही पुरुष ने हाथ मिलाया, बोले- मैं नारायण ओर यह मेरी पत्नी माधुरी है, मुझे रोनी सलूजा से मिलना है !
मैंने कहा- स्वागत है, बैठिये क्या सेवा कर सकता हूँ मैं आपकी? मैं ही रोनी हूँ !
नारायण बोले- हम अपने प्लाट पर मकान बनवाना चाहते हैं, उसका अनुमानित खर्च पूछना है, और आपको बनाने का कोंट्रेक्ट देंगे, उसका खर्च मेरे को बताइए !
मैंने उनके प्लाट और मकान में होने वाले निर्माण को समझा कि उसमें क्या क्या बनना है, वो अपने साथ लाये कागज पर अपने प्लान को समझा रहे थे, मैं प्लान के साथ साथ मुस्कुराती माधुरी के माधुर्य का भी रसपान करता जा रहा था, क्या कसा हुआ जिस्म था उसका, लेकिन मुझे तो आंटी की लगन लगी थी तो माधुरी की मिठास भी फीकी सी लग रही थी !
तभी एक और हसीन महिला मेरे ऑफिस में आई वो तो माधुरी से भी ज्यादा दिलकश लग रही थी बोली- रोनी जी हैं क्या?
मैंने कहा- आप बैठिये, मैं ही रोनी हूँ !
वो एक कुर्सी पर बैठ गई ! मैंने अपने काम करने का तरीका उसमें होने वाले एक अनुमानित खर्च नारायण जी को बता दिया। इन सब बातों को आगंतुक महिला बड़े गौर से देख सुन रही थी !
फिर नारायण जी बोले- मैं आपको ही अपना मकान बनवाने का काम दूँगा, मेरा फाइनेंस होते ही काम शुरू करूँगा !
फिर वो प्रस्थान कर गए !
फिर आगंतुक महिला की ओर मुखातिब हुआ !
आंटी का इंतजार न होता तो इस हसीना को जरूर बिठाये रखने का विचार मन में था !
"मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा मैंने !"
तो वो बोली- जी मैं यहाँ जॉब के लिए बात करने आई हूँ !
मैं एकदम से उछल पड़ा, लीना आंटी भी आने ही वाली थी, मैंने सोचा कि इसे कल के लिए बोलकर आज पहले लीना से तो मिल लूँ क्योंकि इससे ज्यादा भरोसा मेरे को आंटी पर था, पर देखना जरूरी था कहीं लीना देखने में ही अच्छी न हुई तो?
मैंने कहा- देखिये मैडम, आप कल इसी समय आ जाइये ! हाँ, आपका फोन नंबर और नाम मैं लिख लेता हूँ !
तो उसने अपना नंबर बोला मैंने लिख लिया, फिर पूछा- आपका नाम?
तो उसने कहा- लीना !
उसके मुँह से लीना सुनते ही मेरे हाथ वहीं रुक गया मैं जड़वत सा हो गया !
वो बोले जा रही थी- लेकिन छोटू ने तो आज 12 बजे आपसे मिलने को बोला था !
उसके इस वाक्य से मेरी तन्द्रा भंग हुई, मुझे लगा कि मेरे से कितना बड़ा अनर्थ होने वाला था, मैंने बात को संभाला- आपके काम के लिए छोटू ने बात की थी? ये छोटू भी न कुछ ठीक से नहीं बताता, आप बैठिये, आप अपना परिचय दीजिये !
"मेरा नाम लीना है, 24 वर्ष की हूँ, बारहवीं कामर्स से पास हूँ, यह मेरी मार्कशीट है, आपके ऑफिस के पीछे गली नंबर तीन में रहती हूँ, मेरे पति संतोष कुमार एक दवाई कम्पनी में ऍम आर हैं, वो सुबह से अपने काम पर चले जाते हैं तो सात आठ बजे तक लौटते हैं, दोपहर को मैं अपने काम से फ्री हो जाती हूँ तो घर पर बोर होने से अच्छा है आपके ऑफिस में ही काम करूँ !"
मैंने कहा- आपके पति संतोष को आपके काम करने में कोई आपत्ति तो नहीं है? आपकी शादी कब हुई? आपके कितने बच्चे हैं?
तो वो बोली- मेरी शादी को दो साल होने वाले हैं, अभी कोई बच्चा नहीं है, मेरे पति से मैंने आज्ञा ले ली है !
मैंने सोचा 'अंधे के हाथ बटेर लगना !' यह कहावत भी सच हो जाती है। मेरे से तो जैसे बोलते ही नहीं बन रहा था, फिर भी सारी बातें जैसे पगार, समय, क्या क्या काम करना है, सब तय करके मैंने कह दिया- ठीक है, तुम काम कर सकती हो यहाँ !
तो बोली- में कल से आ जाऊँगी !
मैंने कहा- कल से क्यों? 'काल करे सो आज कर !' वाली कहावत सुनी आपने ! आज से ही आप काम पर हो !
बोली- ठीक है !
उसने साड़ी के साथ जो ब्लाउज़ पहना था, वो बिना आस्तीन वाला गहरे गले वाला था जिससे उसके उन्नत उभार बाहर निकलने को बेताब हो रहे थे और रोनी उनको देखने के लिए बेताब हो रहा था !
उसका फिगर 32-28-34 के लगभग होगा कटीले नैन नक्श, रंग गोरा, मंझोला कद, बालों को जूड़े के रूप में बांधा हुआ था, बड़ी ही मस्त लग रही थी, जैसी रोनी को पसंद है बिल्कुल वैसी ही थी वो !
मैं उसे सारा काम समझाने लगा, उसको उसकी कुर्सी बता दी, उसके काउंटर जैसे टेबल में बहुत से रजिस्टर, मकान के डिजाइन वाले ब्रोसर, पम्पलेट और भी बहुत सा सामान था ! मैं ठीक उसके सामने खड़े हो गया फिर मैं उससे एक एक सामान उठाने को कह रहा था जब वो झुककर उठाती तो उसकी बड़ी बड़ी गोल मटोल छातियों को गहराई तक देख देख कर मेरी छाती पर सांप लोट रहे थे।
जब कोई सामान वो उठाती तो उसके बारे में समझा कर फिर दूसरा सामान उठाने को कहता ! पूरे बीस मिनट तक उसे सभी कुछ समझाता रहा, जब उसे लगा कि मेरी नजर उसके गोलों पर केन्द्रित है तो उसने साड़ी का पल्लू का आवरण उन पर डाल लिया !
मैंने सोचा कि आज के लिए इतना काफी है, मैंने कहा- अभी मुझे कुछ काम है, कोई कस्टमर आये तो फोन करके मुझे बुला लेना !
मैं बाइक लेकर चला गया, लीना के फोन का इंतजार करता रहा कि उसकी खनकती आवाज सुनने को मिल जाये पर नहीं मिली सुनने को !
फिर 3 बजे ऑफिस वापस आ गया, अपने कम्पयूटर पर कुछ नक़्शे बनाने थे ! लीना ने सारी काउंटर टेबल में जमी हुई महीने भर की धूल को झाड़कर अच्छे से साफ कर दिया फिर एक अख़बार निकाल उसे पढ़ने लगी। जाने कितना पुराना होगा वो अख़बार !
शाम छह बजे लीना बोली- मैं जा सकती हूँ?
तो मैंने कहा- हाँ ठीक है, कल 11 बजे आ जाना !
दूसरे दिन मैंने ऑफिस खोला ही था कि लीना आ पहुँची। वो सलवार सूट पहनकर आई थे, हरे रंग का सूट, उस पर लाल पीले फूल बने हुए थे, बिल्कुल सिम्पल सादे लिबास में उसकी असली खूबसूरती और भी निखरी हुई लग रही थी।
मैंने उसे सारे काम एक बार फिर से समझा कर अपनी साइट पर चल रहे ज्योति मैडम के मकान का काम देखने चला गया !
इस मकान का काम लगभग पूरा हो चुका था, कारीगर अभी टायल्स लगा रहे थे जिन्हें ज्योति मैडम ने चार दिन तक मेरे साथ घूम घूमकर मुश्किल से पसंद किये थे, इस समय वो वहीं मौजूद थी, मेरे को देखते ही चहक उठी- रोनी जी, टायल्स अच्छे लग रहे हैं न? मेरी पसंद सही है या नहीं?
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दूसरे दिन मैंने ऑफिस खोला ही था कि लीना आ पहुँची। वो सलवार सूट पहनकर आई थे, हरे रंग का सूट, उस पर लाल पीले फूल बने हुए थे, बिल्कुल सिम्पल सादे लिबास में उसकी असली खूबसूरती और भी निखरी हुई लग रही थी।
मैंने उसे सारे काम एक बार फिर से समझा कर अपनी साइट पर चल रहे ज्योति मैडम के मकान का काम देखने चला गया !
इस मकान का काम लगभग पूरा हो चुका था, कारीगर अभी टायल्स लगा रहे थे जिन्हें ज्योति मैडम ने चार दिन तक मेरे साथ घूम घूमकर मुश्किल से पसंद किये थे, इस समय वो वहीं मौजूद थी, मेरे को देखते ही चहक उठी- रोनी जी, टायल्स अच्छे लग रहे हैं न? मेरी पसंद सही है या नहीं?
मैंने कहा- मैडम, आपकी पसंद तो लाजवाब है।
बोली- ऊपर वाले बाथरूम के लिए कुछ विशेष टायल्स के लिए लेनी हैं, आइये, हम बताते हैं।
मैं उनके पीछे हो लिया, ऊपरी मंजिल का काम पूरा हो चुका था, वहाँ कोई था भी नहीं, फिर उसने चारों ओर एक बार देखा एक कमरे में मेरे को ले जाकर मुझसे लिपट कर मुझे चूमने लगी।
बोली- आजकल तो जनाब को मेरे लिए बिल्कुल भी समय नहीं है।
मैंने कहा- ऐसा नहीं ज्योति जी, काम पहले जरुरी होता है।
बोली- मेरे मकान का काम समाप्ति पर है। रंग-रोगन के बाद तो आपका आना भी बंद हो जायेगा। तुम मेरे घर कब आ रहे हो?
मैंने लोहा गर्म देख कर चोट कर दी।
फ़ौरन कहा- मैडम मेरे कारीगरों को उनकी मजदूरी चुकाना है, जितना सामान इस काम के लिए भाड़े पर लिया था उन सबका किराया भुगतान करना है। आप मेरा पेमेंट जब करोगी, मैं उस दिन आ जाऊँगा।
तुरंत बोली- कल ही 12 बजे आकर ले लो। आपका पेमेंट साहब ने चार दिन पहले ही मेरे पास भिजवा दिया था।
मैं समझ गया कि ‘गर्म लोहे पर तो चोट ज्योति मैडम ने किया है रोनी तू तो गया...!’
दूसरे दिन मैं 11 बजे ऑफिस पहुँच गया। मुझे ज्योति के घर पेमेंट लेने जाना था। मुझे मालूम था कि आज ज्योति मुझ को छोड़ने वाली नहीं है।
उसके मकान के निर्माण में 6 माह का समय लग गया था। इन छह माह में तीन बार उसकी जवानी का रस जी भरकर पिया था।
थोड़ी ही देर बाद लीना भी आ गई। क्रीम रंग की प्रिंट वाली साड़ी में उसके रूप-लावण्य को देख कर ठगा सा रह गया। उसके ब्लाउज में से उसके बड़े-बड़े उरोज को कवर किये हुए उसकी सफ़ेद ब्रा दिख रही थी।
ज्योति के ख्यालों में खोया था तो शराफत का चोला पहनते हुए मैंने कहा- लीना, जरा रजिस्टर उठाकर देखो कि ज्योति मैडम का कितना अमाउंट बाकी लेना बनता है? और उनके दिए सारे भुगतानों का डिटेल डेट बाई डेट एक पेपर पर लिखकर दो। मुझे आज उसने पेमेंट घर आकर लेने के लिए बुलाया है।
डिटेल के कागज लेकर मैं ज्योति के घर पहुँचा, सोचा इस समय तो उसके बच्चे स्कूल में होंगे।
जैसे ही ज्योति ने दरवाजा खोला उसे देख मेरे आँखे खुली की खुली रह गईं, उसने काले रंग का गाउन पहन रखा था। चेहरे को चमकाकर सुर्ख लिपस्टिक लगाई हुई थी, बाल खुले हुए गाउन के नीचे काली ब्रा जो बड़े-बड़े चुच्चे की गोलाई आधे से ज्यादा ढकने में नाकाम थी। नीचे काली पैन्टी पहनी हुई थी, जिसके नीचे दूधिया जाँघे चिकनी-चिकनी दिखाई दे रही थीं।
मेरे लंड ने सलामी देना शुरू कर दिया। दरवाजा बंद करके ज्योति ने परदे भी लगा दिए और एक झटके में गाउन को निकाल फेंका।
उसका 34-30-36 के फिगर वाला बदन मेरी आँखों के सामने था। सारा बदन संगमरमर की तरह चिकना और गोरा था। एक भी दाग उसके जिस्म पर दिखाई नहीं दिया मुझे। मैंने उसकी कमर में हाथ डालकर अपने पास खींचकर उसे अपने आलिंगन में ले लिया।
“अह्ह्ह... रोनी...आआअ ....आ ..जाओ न ..”
ऐसा नहीं था कि पहली बार उसके साथ ये सब कर रहा था, परन्तु आज वो कुछ ज्यादा ही उन्मुक्त हो कर वासना से भरी हुई थी। उसने मेरे सारे कपड़े निकाल दिए। मुझे पलंग पर गिराकर मेरे ऊपर सवार हो गई। मेरे सारे बदन को चूमने-चाटने लगी। उसकी सांसें प्रतिपल तेज और तेज होती जा रही थीं।
“ओह्ह्ह .......”
अंत में मेरे लंड का पकड़कर चूमते हुए सहलाने लगी मैंने भी उसकी ब्रा-पैन्टी को निकालकर उसकी चिकनी गुलाबी बुर पर प्यार से हाथ फिराते हुए, बुर में अंगुली को डाल दिया। अंगूठे से उसके शिश्निका को सहलाते हुए अंगुल-चोदन शुरू कर दिया।
वो सिस्कारियों के साथ मेरे लौड़े पर जीभ फेरते हुए चूमने लगी, कभी चूस भी लेती थी।
जन्नत का मजा दोनों को आ रहा था फिर वो मेरी कमर पर आ गई। लौड़े को अपनी गीली बुर पर टिकाकर अपनी गांड का दबाब बनाते हुए लौड़े को अपनी बुर में घुसा लिया।
“ओह्ह... रोनी... कितना मजा आ रहा है आह्ह्ह... स्स्स्स !” करते हुए वो लंड को अपनी बुर में सटासट अन्दर बाहर करते हुए मेरे ऊपर झुक गई।
मैं उसके रसीले संतरे जैसे बूब्स को अपने हाथों से मसलते हुए निप्पल को चूसते हुए, दांतों से मसल भी देता।
वो शिखर पर पहुँच कर झड़ने लगी मुझ से कस कर लिपट गई। मैंने उसके मांसल नितम्बों को सहलाते हुए उसके होंठों को चूस लिया।
उसे चित्त लेटाकर उसके टाँगों को अपने कंधे पर रखकर ठाप लगाना शुरू किया फिर स्पीड बढ़ाते हुए चुदाई की मंजिल पर पहुँचकर उसकी चूत को अपने वीर्य से लबालब कर दिया।
दोनों ही हांफते हुए अपनी धड़कनों पर काबू करने का प्रयास कर रहे थे। फिर ज्योति ने मुझे चूमा और अपने कपड़े उठाकर नहानी में चली गई। मैंने भी अपने को साफ करके कपड़े पहन लिए।
फिर ज्योति को अपने साथ लाये कागज पर लिखा हिसाब बताया मेरे बताये अनुसार उसने मेरा पूरा भुगतान कर दिया।
अगले दस दिन बाद उनके पति आ गए। इसी दौरान उनके मकान का पूरा काम होने के बाद उन्हें मकान की चाभी सौंप दी, फिर आज तक कभी भी ज्योति से मुलाकात नहीं हुई। हाँ कभी-कभी वो फोन लगाती थी, अब फोन भी नहीं आते उसके। मैं भी फोन लगाकर डिस्टर्ब करना नहीं चाहता उसे।
आप सोच रहे होंगे ये ज्योति कौन है? मेरे से कैसे मिली तो आपको उसकी कहानी का फ़्लैश-बैक भी बता देता हूँ।
मुझसे उसके पति की मुलाकात 6 माह पहले हुई। वो अपने शहर से बाहर पूना में किसी कम्पनी में जॉब करता है। उसका वहाँ एक साल का जॉब का कांट्रेक्ट है।
वो अपने पुराने मकान को तोड़कर नया मकान बनवाना चाहता है, फिर एक साल बाद वो यहीं शिफ्ट हो जायेगा। उसने यह ठेका मुझे दे दिया।
बोले- मैं 20-25 दिन में यहाँ आ पाता हूँ, इसलिए इस काम को मेरी पत्नी ज्योति देखती रहेगी। आपके सारे पेमेंट आपको समय समय पर मिलते रहेंगे। फिर वो अपना पूरे मकान का प्लान वाला नक्शा देकर पूना चले गए।
मैंने काम शुरू कर दिया। अक्सर ज्योति साईट पर काम देखने आती थी। मुझ से बात करते हुए मुस्कुराती रहती थी, जैसे मुझ पर फ़िदा हो रही हो पर पड़ी लिखी महिला होने के नाते मैं इसे गंभीरता से नहीं लेता था।
फिर जब मैं अपने ऑफिस के लिए वहाँ से वापस आता तो मुझसे लिफ्ट ले लेती थी। मैं उसके बदन की महक करीब से महसूस करता तो मेरा तो लिंग मचलने लगता था। पर अपने लंड को ये समझाकर कि ज्योति ऐसी-वैसी नहीं है, शांत कर देता था।
तीन माह बाद एक बार साईट पर काम बंद था ज्योति ने किचन के बारे में समझाने के लिए उसके नव-निर्मित मकान यानि मेरी साईट पर बुलाया।
किचन के बारे में अपना प्लान बताने लगी, अचानक ज्योति का पैर फिसला और पानी के टैंक में गिर गई।
मैंने सहारा देकर उसे पानी बाहर निकाला। वो पूरी भीग गई थी। वो मुझे कसकर पकड़े थी, घबरा भी गई थी। उसका भीगा जिस्म कपड़ों में से नुमाया हो रहा था।
सबसे ज्यादा उसके स्तन और नितम्ब तो मुझ को पागल बना रहे थे। टैंक से निकालते हुए मैंने थोड़ा बहुत उनका स्पर्श करते हुए मजा ले लिया था।
वो बोली- अब क्या करें? मैं घर कैसे जाऊँगी?
मैंने कहा- एक उपाय है। अक्सर साईट पर मेरे कपड़े सीमेंट, मिटटी, पानी से गंदे हो जाते हैं, इसलिए मेरे बेग में एक टी-शर्ट और लोअर रखा रहता है। आप चाहो तो वो पहन लो।
मरता क्या न करता उसने कपड़े लेकर एकांत कोने में जाकर वो पहन कर अपने गीले कपड़े रख लिए। मैं उसे कपड़े बदलता देखना तो चाहता था, पर सोचा अगर वो देख लेगी तो क्या होगा?
मैं अपनी बाइक के पास आकर खड़ा हो गया। फिर झुंझलाती हुई ज्योति आ गई। अभी भी उसके गीले बालों से पानी की बूँदें टपक रही थीं। उसके लोवर टी-शर्ट को देख स्पष्ट लग रहा था कि उसने ब्रा पैन्टी भी उतार कर कपड़ों में रख लिए है।
मैंने कहा- चलिए आपको घर छोड़ दूँ।
तो वो दोनों तरफ पैर डाल कर पीछे बैठ गई। मैं उसे उसके घर छोड़ कर अपने ऑफिस आ गया और अपने कामों में लग गया।
मैं ज्योति के ख्यालों में खोया सोच रहा था कि ‘आज पहली बार ज्योति बाइक पर दोनों तरफ पैर डालकर बैठ कर मुझसे इतना चिपककर क्यों बैठी थी कि उसकी चूचियों की नोक मेरी पीठ पर चुभ रही थी। शायद ये भी हो सकता है कि इन कपड़ों में अपने आप को असहज महसूस कर रही हो। लोगों की नजरों से बचने के लिए भी ऐसा हो सकता है।’
उसी शाम को ज्योति का फोन आया बोली- ऑफिस बंद करके आप मेरे यहाँ आ सकते हो? आप अपने कपड़े ले जाना और आज मैंने गुलाब-जामुन बनाए हैं, उनको खा कर बताना कैसे बने हैं?
मैं पूरी बात समझ गया कि दाल में काला जरुर है। शाम वहाँ पहुँचा तो समझ गया कि यहाँ तो पूरी दाल ही काली है। जैसे ही ज्योति ने दरवाजा खोला, रोनी की छटी इंद्री जाग उठी।
ज्योति अभी भी उसी लोवर टी-शर्ट को पहने थी यानि रोनी को कपड़ों का धोखा देकर बुलाया गया है। धोखा किस तरह का हो सकता है, इसको जाँचने के लिए मैंने पूछा- दोनों बच्चे दिखाई नहीं दे रहे कहाँ है वे?
ज्योति- बच्चों के मामा आए थे, जिद करके उनके साथ चले गए। उनकी दो दिन की छुट्टी थी, तो मैंने भी मना नहीं किया।
फिर यहाँ वहाँ की बहुत सी बातें होती रहीं। यहाँ तक कि उसने अपने पति को ये इल्जाम भी दे दिया कि इन्हें तो मेरी तो कोई चिंता ही नहीं।
बिल्कुल स्पष्ट हो गया कि कामदेव के तीर चल चुके हैं। यह मुझसे चुदना चाहती है, तभी तो अकेले में बुलाया।
अब सवाल यह था कि शुरुआत कैसे हो?
ज्योति चाय बनाने का कहकर किचन में चली गई। मैं उसके मटकते नितम्ब देखता रह गया। अब मैं सोचने लगा इसके भरोसे तो शायद सुबह ही हो जाएगी। मुझे ही शुरुआत करना पड़ेगी। कहावत है, जब बात निकलेगी तो दूर तक तो जरूर जाएगी।
ज्योति चाय के साथ नमकीन और गुलाब-जामुन का नाश्ता भी लेकर आ गई।
दोनों ने आमने सामने बैठ कर नाश्ता किया, चाय पीते समय देखा कि टी-शर्ट के ऊपर के बटन खुले जरूर थे, पर हल्का सा उभार के अलावा दिखाई कुछ नहीं दे रहा था।
ज्योति तो ज्यादा से ज्यादा झुक कर दिखाने की कोशिश में थी, पर नाकाम रही।
मैंने उसे छेड़ने के लिए कहा- मैडम आपने कहा था कपड़े ले जाना पर आपने तो इन्हें चेंज ही नहीं किया। अब उतार भी दो तभी तो ले जा सकूँगा।
ज्योति- यहाँ आपके सामने? आप भी न बड़े शरारती हो।
मैं- तो क्या हुआ? ये कपड़े पहने भी तो मेरी आँखों के सामने थे। अब मुझ से क्या पर्दा?
ज्योति हक्की बक्की रह गई वो भागकर अन्दर वाले कमरे में चली गई।
मैं पीछे उसके पास गया तो बोली- आपने सच्ची में मुझ को वहाँ पर कपड़े बदलते समय बेपर्दा देख लिया था?
अगर ज्योति के मन में कोई गलत बात नहीं होती तो वो मेरी इन बातों को सुनकर अब तक मुझ को घर से बाहर निकलने को बोल दिया होता। मगर वो तो शर्म से मुँह छुपा रही थी यानि निःसंदेह लाइन साफ है।
मैं- ज्योति आप बहुत खूबसूरत हो। सच में आपके बड़े-बड़े कसे हुए स्तन मेरे पीठ को बहुत गुदगुदा रहे थे। मैं तो बहुत उत्तेजित हो गया था, कहते हुए अपने कांपते हाथ उसके कंधे पर रख दिए।
जब कोई विरोध नहीं किया उसने, तो लपक कर उसे चूमने लगा और उसके स्तन मसल डाले पीठ और नितम्ब तक सहला दिए।
वो मुझसे लिपट गई, बगैर मेहनत के पेड़ का टूटा फल मेरी गोद में आ गिरा। यह कहावत भी चरितार्थ हो गई थी।
फिर उस दिन रात 11 बजे तक रूककर ज्योति को रगड़कर मसलते हुए दो बार चुदाई की थी।
आते वक्त ज्योति ने एक रहस्य उजागर किया कि मैं खुद जान बूझकर पानी के टैंक में गिर गई थी। अपने गीले कपड़े बदलते हुए बेपर्दा भी हुई थी, पर आपने कोई प्रतिकिया न करके मुझ को अपने घर छोड़ दिया। मैं पति से दूर रहकर ये सब कर गुजरी। मुझे दुःख है कोशिश करुँगी कि अब मैं ऐसा न करुँ।
दूसरी बार उसने मुझ को फिर बुलाया और रोते हुए बताया कि मेरे पति बीस दिनों बाद आज आने वाले थे। मैं बहुत उत्साहित और उत्तेजित थी। बच्चों को मामा के यहाँ भिजवा दिया है फिर अभी उनका फोन आया कि कोई अर्जेंट प्रोजेक्ट के कारण अभी पच्चीस दिन और नहीं आ पाएंगे। प्लीज मेरी मजबूरी को समझो रोनी, कहते हुए मुझसे लिपट कर उसने जो अपने जिस्म के जलवे दिखाए तो रोनी का दिल बाग़ बाग़ हो गया।
जिसके लिए खुद रोनी मौका तलाशता रहता है, वो खुद उसे मिल गया था। उस दिन उसने दिल खोलकर मेरे साथ चुदाई की। वो तो बस रमणिका बन गई थी।
तीसरी बार जब मार्केट से टायल्स खरीदकर लाये फिर उन्हें रखवाने के लिए साईट पर गए। तब वहाँ काम नहीं लगा था। ताला खोलकर टायल्स रखवा दिए।
टेम्पो वाला भाड़ा लेकर चला गया तो मोहतरमा ज्योति जी वासना से भरी सांसें लेती हुई बोली- रोनी, अब तो आपका मेरे मकान का काम समाप्त हो रहा है। ये भी आने वाले हैं, शायद अब मौका नहीं मिल पायेगा। आज आखिरी बार मेरी प्यास बुझा दो।
ऐसी वीरानियों को देख मैं तो खुद उससे यही बात कहने वाला था, पर उसने तो मुझसे पहले ही कहकर मुझे मौका ही नहीं दिया। फिर क्या था, दरवाजे लगाए फिर वही तूफान का प्रचंड वेग आ गया। फिर भूकंप के साथ धमाका हुआ, फिर ज्वालामुखी के लावा बह निकले। तब कहीं जाकर सांसों का तूफान थमा।
इसके बाद की आखिरी मुलाकात आप पहले ही पढ़ चुके हैं।
मेरी असिस्टेंट लीना की चुदाई करने के लिए मैं तड़फ रहा था, पर कोई मौका ही नहीं मिल रहा था।
अब मेरा ध्यान लीना पर केन्द्रित था। उसकी जवानी तो कपड़ों के ऊपर से ही महसूस करके मेरे तन-बदन में आग सी लग जाती थी।
अब तक उसको नौकरी करते एक माह भी होने वाला था। अब उससे बहुत मजाक कर लेता था। वो भी मुझे अपने दोस्त की तरह एक जवाबदार इन्सान समझते हुए अपनी पर्सनल बातें मुझसे साझा करने लगी थी।
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मेरी असिस्टेंट लीना की चुदाई करने के लिए मैं तड़फ रहा था, पर कोई मौका ही नहीं मिल रहा था। अब मेरा ध्यान लीना पर केन्द्रित था, उसकी जवानी तो कपड़ों के ऊपर से ही महसूस करके मेरे तन-बदन में आग सी लग जाती थी। अब तक उसको नौकरी करते एक माह भी होने वाला था। अब उससे बहुत मजाक कर लेता था।
वो भी मुझे अपने दोस्त की तरह एक जबाबदार इन्सान समझते हुए, अपनी व्यक्तिगत बातें मुझसे साझा करने लगी थी। जैसे माहवारी के बारे में होने वाली तकलीफ बता देती थी, गर्भवती होने के लिए गर्भाधान का उचित समय क्या है? अधोवस्त्र का चुनाव कैसा होना चाहिए, यहाँ तक की चूत की शेविंग के लिए क्या इस्तेमाल करना चाहिए?
ये सभी बातें डिस्कस कर लेती थी, मैं भी पीछे नहीं रहता था, उसके निजी पल जो पति के साथ बिताती थी, शारीरिक सम्बन्धों से सम्भोग तक सब कुछ पूछकर मजा लेता था। वो लजाते शरमाते बहुत कुछ बता देती थी।
उसको कंप्यूटर चलाना भी सिखा दिया था, जिससे वो मकानों के प्लान उनके नक्शा और डिजाइन सब खोल सके। फुर्सत में लीना अक्सर गाने सुनती और गेम खेलती रहती है। मेरे जाते ही कंप्यूटर से चिपक जाती है।
अब उसकी चुदाई के लिए कोई संशय था तो वो यह कि यह चुदने तैयार होगी या नहीं। चुदाई के लिए पहल कैसे की जाए कि वो मेरे को गलत भी न समझ ले और बिना गुस्सा हुए मेरे प्रणय निवेदन को स्वीकार कर भी ले।
इन्हीं ख्यालों में खोया आज ऑफिस में बैठा उसके आने का इंतजार कर रहा था। ठीक सवा ग्यारह बजे लीना आ गई। साईड कट वाली पीली कुर्ती और टाँगों पर चिपकी काली लैगी उस पर काला दुपट्टा।
माशा अल्लाह ! मेरी तो आँखें उसकी जाँघों के कटाव और गांड के उभारों में जैसे उलझ सी गईं। ऊपर निगाह उठाई तो उसके स्तनों ने भी मेरे दिल पर नश्तर से चला दिए।
हल्की सी मुस्कान देते हुए बोली- सर, कल मेरा महीना होने वाला है।
वो आगे कुछ बोलती उसके पहले ही मैंने चुटकी लेते हुए कहा- लेकिन तुम्हारा महीना तो पिछले हफ्ते ही हो चुका, फिर इतने जल्दी?
वो जोरों से हंसीं और बोली- सर आप भी न..! मेरा मतलब मेरी नौकरी को एक महीना होने वाला है और आपसे एक निवेदन है कि मेरी पगार आज ही दे दो। क्योंकि कल मेरी शादी की दूसरी सालगिरह है और मैं अपने पति को अपनी पहली पगार से एक सुन्दर सी टाई और एक कैप गिफ्ट करना चाहती हूँ।
मैंने भी साफ झूट बोलते हुए मौका देख चौका लगा दिया- अजब इत्तफाक है, कल मेरी बीवी का जन्मदिन भी है। अच्छा बाकी बातें बाद में, मेरे को साईट पर जाना है, दोपहर तक आ जाऊँगा।”
तो वो सिर्फ मुस्कुरा दी। मैं अपनी बाइक लेकर साईट पर चला गया, लेकिन मन ही मन कोई तरकीब सोचता रहा, फिर तीन बजे ऑफिस पहुँचा।
मौका देखकर बाहरी कांच वाला दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया। एक गिफ्ट पैक जिसमें दो जोड़ी ब्रा-पैन्टी के सैट 32 साइज के थे, लीना के सामने रख दिए।
लीना बोली- ये क्या है?
मैंने कहा- गिफ्ट है इसमें, देखो कैसा है?
वो उत्सुकता से गिफ्ट पैकिंग को खोलने लगी। मैं उसके चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश कर रहा था।
पैकिंग खुलते ही उसमें रखे ब्रा-पैन्टी के पैकेट देख उसका चेहरा सुर्ख हो गया, बोलने लगी- सर, मैं ये नहीं ले सकती।
मैंने कहा- खोलकर तो देखो, कैसी हैं ये?
तो बोली- जब लेना ही नहीं तो खोलकर क्या देखना?
मैं समझ गया कि ये नहीं लेगी तो मैंने बात को पलट दिया।
मैंने कहा- मत लेना, पर देख तो लो मेरी खातिर ! ये तो मैं अपनी बीवी के लिए लाया हूँ यार। उसके जन्मदिन का उपहार के लिए, इसमें से एक जोड़ी पसंद कर दो मेरी बीवी के लिए। दूसरी जो पसंद नहीं होगी, उसे दुकान पर वापस कर दूंगा। तुम्हारे लिए थोड़े ही लाया हूँ जो इतना शरमा रही हो।
उसने काँपते हाथों से उन पैकेट को खोला तो उन ब्रा पैन्टी को देखकर बोली- सर ये तो बहुत ही सुन्दर और बिलकुल नए फैशन की बहुत अच्छी हैं। ये तो मंहगी भी बहुत होंगी।
मैंने कहा- गिफ्ट में मंहगा सस्ता नहीं देखा जाता, देने वाले की भावनाओं को देखा जाता है। आपको अच्छी नहीं लगी क्या?जल्दी से एक पसंद करके बताओ न !
बोली- सर दोनों इतनी अच्छी हैं कि मैं इनमें से सिलेक्ट नहीं कर पा रही हूँ।
उसकी बात को अनसुना करते हुए मैंने कहा- ये रही आपकी पगार।
उसको रूपये देते हुए कहा- एक काम करते हैं, कल ऑफिस की छुट्टी कर लेते हैं। मुझे अपनी बीवी के पास और आपको अपने पति संतोषकुमार के साथ बिताने का समय मिल जाएगा, आप इस ब्रा-पैन्टी का चुनाव तो करो !
लीना बोली- मैं तो असमंजस में पड़ गई हूँ।
“अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहूँ? अगर आप असमंजस में हों और दोनों सैट अच्छे लगे हों तो एक सैट ब्रा-पैन्टी का आप ही रख लो।"
लीना बोली- न बाबा न मेरे पति संतोष इसे देखकर कहेंगे कि इतना मंहगा सैट कैसे ले लिया तुमने?
मेरे को लगा चिड़िया फँस गई जाल में ! फ़ौरन मैंने कहा- तुम उसे टाई और कैप तो ले ही रही हो, बोल देना मेरी पगार मिली तो ख़ुशी में खरीद ली। फिर सालगिरह का मौका है, वो ज्यादा ध्यान नहीं देंगे।
एक पैकेट मैंने उसके बैग में डाल दिया वो किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गई। लेकिन मेरा आगे का रास्ता खुल गया था। इच्छा तो हो रही थी कि उससे कहूँ कि मुझे एक बार पहन कर दिखा दो। पर अभी यह बात कहने के लिए समय उपयुक्त नहीं था।
फिर शाम तक वो अपने काम में व्यस्त रही। शाम पाँच बजे मैंने ही कहा- अब तुम घर चली जाओ, तुम्हें बाजार भी जाना है।
वो अपना बैग उठाकर जाने लगी तो मैंने अपना हाथ उसके और बढ़ाते हुए कहा- सालगिरह की बधाई तो लेती जाओ।
तो उसने अपना हाथ मेरे हाथ में दे दिया, बोली- धन्यवाद।
उसके कोमल मक्खन सी हथेली को छोड़ने का दिल नहीं कर रहा था पर मजबूर था।
मैंने कहा- यह तुम्हारी शादी की दूसरी सालगिरह है, पर लगता है जैसे कल ही तुम्हारी शादी हुई हो। बिल्कुल नई-नवेली लगती हो।
वो शरमाते हुए बोली- सर, आप भी न मजाक करने में जरा भी नहीं चूकते।
वो ऑफिस से बाहर निकल गई। मैं उसकी कुर्ती के कट से उभरे हुए नितम्ब देखता रह गया।
दूसरे दिन ऑफिस की छुट्टी के कारण लीना को तो आना नहीं था, मैं सीधा साईट पर चला गया। फिर फुर्सत के समय में आकर ऑफिस खोल लिया।
सोचा एक अधूरी कहानी को पूरी कर के भेज दूँ। तब मैं कली से फूल कहानी लिख रहा था। उसे तैयार करके प्रकाशन हेतु पोस्ट कर दिया।
फिर लीना की चुदाई के लिए कोई युक्ति सोचने लगा। मुझे अब विश्वास हो गया की मेरा युक्ति कामयाब रही तो कल जरूर कुछ कर गुजरूँगा।
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