Friday, June 6, 2014

FUN-MAZA-MASTI शुभारम्भ-31

FUN-MAZA-MASTI

शुभारम्भ-31

 तभी बाहर से कुछ आवाज़ आयी.

चाची ने मुझे धक्का देकर दूर किया और तुरंत धोने के कपड़ों में से एक गाउन उठाया
और बाथरूम से बाहर भागी.

"हाय राम तेरे चाचा आ गए लगता है.....तू अंदर से बंद कर ले........"

हम मेरे कमरे के बाथरूम में थे....मेरी तो गांड फटी की चाचा ने चाची से कुछ पूछ ताछ करली तो ??

गांड की फटफटी में गेयर लगने लगे.......

बाहर से कुछ आवाज़ नहीं आ रही थी....मैंने कुछ देर तो सब्र किया फिर फटफटी के मरे धीरे से दरवाजा खोला और सुनने की कोशिशि करने लगा....कुछ बात करने की आवाज़ तो आ रही थी मगर समझ नहीं आ रहा था. मैंने टॉवल लपेटा और पंजो के बल बगैर आवाज़ किये रूम के डोर की आड़ में से सुनने की कोशिश करने लगा.

ये तो पड़ोस वाली कोमल भाभी थी......वो बोल रही थी....

"क्या सच्ची चाची........??"

चाची की आवाज़ आयी, "हाँ रे......सच्ची कोमल...,,,"

कोमल भाभी आश्चर्य से बोली, "अरे,.....बाथरूम में इतनी जगह कहाँ होती है........की वो सब....कर सके.....मतलब.....की....."

चाची की आवाज़ में खनक थी, " हाय राम....कोमल.....उसने तो मुझे गोदी में उठा कर.........खड़े खड़े ही.."

मैं देख तो नहीं पा रहा था मगर कोमल भाभी की आवाज़ एकदम से कामुक और गहरी हो गयी

" खड़े खड़े.....?.......गोदी में......लेकर.......ही......कर.......दिया.........हाय ऐसा तो सिर्फ फिल्मो में......
मेरा मतलब.......हाय राम चाची......."

और ये बोल कर कोमल भाभी बेशर्मी वाली हंसी में हंसने लगी. चाची भी उनकी हंसी में उनका साथ देने लगी.

कोमल भाभी बोली, " उस दिन छत पार मुझे लगा की चाची और चाचा का मौसम बना हुआ है........सच्ची बोलू तो आपको देखकर मुझे भी इनकी इतनी याद आयी की काश वो भी यहाँ होते तो हम भी.....मस्ती कर लेते.....मगर आप तो लल्ला जी के साथ......हाय राम चाची आप तो बहुत ख़राब हो सच्ची.........'

चाची हँसते हुए बोली, "हाँ...हाँ....मैं ख़राब हूँ और तू तो दूध की धुली है......? जब घर में पति है तो फिर प्लास्टिक का खिलौना क्या लाई.......हैं ?? ""

कोमल भाभी की कोई आवाज़ नहीं आयी....

भेनचोद......प्लास्टिक का खिलौना... ????


 तभी कोमल भाभी कि लरजती हुयी आवाज़ आयी, " अरे चची प्लास्टिक नहीं,,,,रबर का खिलौना.....और उसे खिलौना नहीं डिल्डो कहते है......आप को तो कोई बात बतानी ही नहीं चाहिए सच्ची.........."

चाची बोली, " वाह बेटा....तो उसका नाम भी रख दिया......डिडो....."

"डिडो नहीं चाची.....डिल्डो......उसका नाम ही डिल्डो है......"

चाची बोली, "हाय राम...कोमल.....बिलकुल मर्द के उसके जैसा है.....नसे तक बनी हुयी है....सच बता मज़ा आ जाता होगा....... ..हैं.?

कोमल भाभी ठंडी सांस लेकर बोली, "अरे चाची.....नकली कितना भी अच्छा हो....होता तो नकली है है ना ?
उनके टूर पे जाने के बाद अकेले रातें नहीं कटती......और कभी जब वो मेरा साथ नहीं दे पाते तो नकली से काम चला लेते है...."

चाची आश्चर्य से बोली, " हाय.....रिषभ जी को पता है इस डिडो ...के बारे में.....????"

"हाँ तो......उन्होंने ही तो लाके दिया है....."

चाची बोली, "वाह रे कलयुग.....पति अपनी बीवियों के लिए नकली लौड़े भी लाने लगे."

और फिर अपने मुंह से लौड़ा शब्द निकल जाने पर बेशर्मों कि तरह हंसने लगी.

कोमल भाभी बोली, "तो क्या.....अरे चाची आजकल तो सब चलता है......हम तो साथ में वो फिल्मे भी देखते है....सची मूड बन जाता है........उन फिल्मों में तो काले हब्शी होते हैं ना उनके......वो तो बहुत भी बड़े और मोटे होते हैं........बेचारी वो कमसिन लड़किया कैसे लेती है......भगवान जाने.....मैं तो यह डिल्डो डालती हूँ तो भी ऐसा लगता है कि मेरी अब फटी....अब फटी..."

दो चुदासी औरतों कि बातें सुन सुन कर मेरी तो हालत उस कुत्ते जैसे हो गयी जो सुखी हड्डी ढूंढ रहा हो और उसे मलाई मिल जाये....

बाबूराव लपेटे हुए टॉवल में तम्बू बना रहा था....मैंने निचे देखा और सोचा कि पैसा और चूत कितनी भी मिल जाये साली कम ही लगती है.....अभी अभी गेम खेल और महाराज फिर से तैयार....

कीड़ा कुलबुलाने लगा.......

तभी मेरे मोबाइल कि घंटी बजी....मैं डर के मारे उछल गया....चाची बहार से चिल्लाई,

"अरे....लल्ला.....??......नहा लिया क्या.....??"

मैंने बिस्तर पर पड़ी अपनी जींस कि जेब में से मोबाइल निकला...

पिया का फ़ोन था.......

लल्ला की फटफटी चल पड़ी...

मैं अंदर से गांड फटी में चिल्लाया, " न...न...नहीं.....म..म..म...मेरा मतलब हैं हाँ चाची....नहा लिया..."

मैंने रूम का दरवाजा बंद किया और फोन उठाया..

".....हेलो......."

"तुम अपने आप को समझते क्या हो........अरे जब मैंने कहा था कि कैंटीन के
बाहर मिलना तो आये क्यों नहीं.,....पता है मैं २ घंटे बेवकूफ की तरह वहीँ पर खड़ी रही.......अरे कुछ बोलो तो सही.....हेलो.....ऐ क्या हुआ तुमको.......??"

भेनचोद.....लंड बोलू.....मादरचोद राजधानी एक्सप्रेस की तरह चले जा रही है......रुके तो मुझे बोलने का मोका मिले...

मैंने मुंह खोला, " अरे पिया......वो....मैं......हाँ.....अरे मैं बस से गिर गया था......इसीलिए घर आ गया."

"क्या.?....गिर गए थे..?.....बस से....?......तुम्हारा ध्यान कहाँ रहता हैं यार....??"

बंगाली मैडम की गदराई गांड में......

"अरे नहीं....मेरा बैलेंस बिगड़ गया था....यार....."

"पर .....तुम्हे कहीं लगी तो नहीं......? ओ गॉड शील.....तुम ध्यान रखो प्लीज"

पहले तो पिया की पकर पकर से मेरा सर दुःख गया था मगर उसकी मीठी डांट से मन खुश हो गया.

मैंने कहा, "चलो कोई नी...... अब तो ठीक हूँ...कुछ खास नहीं लगी......तुम बताओ कहाँ हो....?"

पिया इतरा कर बोली, " मैं कहाँ हूँ.....इससे तुमको क्या मिस्टर......? तुम आराम करो.

उधर उसका इतराना और इधर मेरा कीड़ा कुलबुलाया....

"ऐसी कोनसी जगह हो.....जो बता नहीं सकती......", मैंने पूछा.

"है एक जगह.......बता तो नहीं सकती मगर काश तुम यहाँ मेरे साथ होते.......हम्म्म्म", और उसने एक ठंडी सांस ली.

उसने तो ठंडी सांस ली मगर मेरी नसे गरम होने लगी.....

मैंने पूछा, "ऐसी कोनसी जगह हो यार................ब.....ब.....ब.....बता दो......."

"हाय.....क्या बताऊ तुम्हे......", पिया से फिर से ठंडी सांस भरी.

भेनचोद अभी चाची कि चिड़िया मारे एक घंटा भी नहीं हुआ था और मेरा घंटा फिर से टन टन बजने लगा.

मैंने बात खिंची "अच्छा.... त...त......तुम कर क्या रही हो......?"

पिया ने इठलाते हुए कहा, " तुम बताओ मैं क्या कर रही हूँ....."

मैं सोचने लगा.......तभी......पिया की चोंकने की आवाज़ आयी,,,

"आउ.....गॉड.......यह तो बहुत गरम और थिक (मोटा) है........"

मेरे भेजे में गियर लगने लगे की ये भेन की लोड़ी है कहाँ..........और इसे क्या गरम और थिक (मोटा) लगा........

तभी मेरा दिमाग का लट्टू जला......ये साली बाथरूम में बैठी है और डिल्डो से अपनी पारो की खुजाल मिटा रही है......यह सोचते ही मेरे दिमाग में बाथरूम में बैठी पिया की नंगी तस्वीर आ गयी और वो कमोड पर टांगे चौड़ी कर के अपनी गुलाबी अनछुई मुनिया में डिल्डो डालती दिखने लगी.

मेरे कानों में हथोड़े से पड़ने लगी और एक दम से मुझे नशा सा छा गया.

मैंने थरथराती आवाज़ में कहा, "हाँ ....हाँ.....म....म....मुझे पता है तुम कहा हो और क्या क़र रही हो.."

पिया ने इठलाते हुए पूछा, "अच्छा जी.....तो बताओ......"

मैंने मस्ती में आकर कह ही दिया, "तुम ब...ब.....ब....बाथरूम में बैठी हो और ड...ड....ड...डिल्डो से खेल रही हो...."

मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा की बॉस.....आज तो छोरी को रंगे हाथों पकड़ लिया है और इसके बाद क्या होगा यह सोच सोच कर मेरे पुरे बदन में सुरसुरी होने लगी.....

"व्हाट..........क्या कहा तुमने.........हाउ....डेयर........यु...........ओ....गॉड......यु बास्टर्ड......मैं पार्लर में हूँ और वेक्सिंग करा रही हूँ......यु.... .चीप .......शिट........और वो वेक्सिंग क्रीम थी जो गरम और थिक थी न की.........ड.......छोड़ो यार......डोंट.....एवर.....कॉल.....मी......अगेन.......यु बास्टर्ड", पिया ने चीखते हुए फोन काट दिया.

भेन चुद गयी फटफटी की....
मुझे अपने आप पर इतना गुस्सा आ रहा था की बता नही सकता.....

इसकी मा की आँख.....साला लोंडो को लोंड़िया मिलती नही और अपने को मिली तो अपनी डेढ़ अकल के चक्कर मे काम लग गये. भेन्चोद इंसान कभी कभी चुप रह ले तो जाने कितने बिगड़े कम यूँही बन जाए.

मेरा मुँह और बाबूराव दोनो लटक गये. मैं बिस्तर पर पड़ा पड़ा सोचने लगा की अबकी बार तो पिया को मनाना मुश्किल है. जाने कब मुझे नींद लग गयी.

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मेरे हाथ पिया के कंधों पर थे और धीरे धीरे मैं उनको नीचे सरकता हुया उसके जोबन के उभारों के पास लाता जा रहा था.....उसकी आँखें मारे ठरक के बंद हुई जा रही थी......मेरे हाथ उसके यौवन के उभारों को संभालने लगे उसके मुँह से एक मदमाती कराह निकली.....मेरे हाथ उसके नरम नरम मम्मो को पूरी तरह से अपने आगोश मे ले चुके थे. मैने उसके कबूतरों को मसकाना शुरू कर दिया

तभी पिया चीखी, "छोड़ हरामी क्या कर रहा है......."

मुझे समझ नही आया की ये क्या हुआ ? पिया चाची की आवाज़ मैं क्यो बोल रही है ?

पिया फिर से चिल्ला पड़ी, "हाय राम हरामी छोड़ कोई देख लेगा......"

आवाज़ चाची की चेहरा पिया का ......भेन्चोद यह हो क्या रहा है ?

किसी ने मुझे ज़ोर से हिलाया.....हड़बड़ा कर मेरी आँख खुली तो देखा की मैं तो बिस्तर पर लेता हूँ और चाची मेरे उपर झुकी हुई है और मेरे हाथ उनके स्तनो के उपर है साला मैं जिन्हे पिया के बोबे समझ के मसले जा रहा था वो तो चाची के पप्लू थे.

चाची ने मेरे हाथों को झटका और चिल्ला पड़ी, "हाय राम बेशरम दिन भर इसके सिवा कुछ सूझता भी है की नही.....और यह पिया कौन है रे लल्ला......??"

मेरी गान्ड के सारे टाँके एक झटके मे खुल गये......पहले तो मेरी आवाज़ ही नही निकली फिर जैसे तेसे मैं बड़बड़ाया,
"क..क...क...कोई भी तो नही....च...च..चाची......."

चाची ने आँखें सिकोड कर मुझे देखा और बोली, "वाह बेटा चाची को नापते हुए तो बड़े प्यार से नाम लिए जा रहा था"

"न...न....नही चाची.....ऐसा कुछ भी नही......"

"देख लल्ला....दिन भर फालतू बातों मे दिमाग़ लगाएगा तो अपने चाचा जैसा दुकान पर ही बैठा रह जाएगा......"

चाची इसके बाद भी जाने क्या लेक्चर दिए जा रही थी मगर मेरी नज़र तो उनके छोटे से ब्लाउस मे कसमसा रहे मम्मो पर ही थी......

चाची ने मेरी नज़रे देखी और नीचे अपने गिरे हुए पल्लू को देखा. अदा से पल्लू संभालते हुए बोली, "हाय राम.....इस छोरे को तो समझना ही मुश्किल है"

अब इसमे क्या मुश्किल है ......लल्ला के बाबूराव को मुनिया चाहिए और क्या ?

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मुझे चाची का पल पल रूप बदलना समझ नही आता था. कभी बात बात मे ज्ञान देना और कभी बाबूराव को चूस चूस के चुस्की बना देना.......

पिया के नाराज़ होने के बाद मेरा मन नही लग रहा था....मैं छत पर चला गया.....शाम होने लगी थी....ठंडी ठंडी हवा चल रही थी और मैं सोच रहा था की कोमल भाभी जैसी कड़क जवानी को प्लास्टिक के लॅंड की ज़रूरत क्यो पढ़ती होगी भला....उनके पति ऋषभ भैया तो अच्छे हट्टे कट्टे दीखते थे. तभी मेरी नज़र कोमल भाभी कि छत पर गयी...
उनकी छत हमारी छत ने एक मंज़िल निचे थी. इसलिए उनकी छत का पूरा नज़ारा दीखता था.

वो छत पर सुख रहे कपडे उठाने आयी थी. धीरे धीरे वो कपडे रस्सी से उतारने लगी.....
मैं उनको देखते देखते दूसरी सोच में पड़ गया तभी उन्होंने इधर उधर देखा और मेरे दिमाग का कीड़ा कुलबुलाया....मैं ध्यान से देखने लगा कि वो क्या कर रही है......उन्होंने एक काली साड़ी सूखने के लिए रस्सी पर डाली थी....कोमल भाभी ने धीरे से उस साड़ी को खिंचा और उसके निचे से एक पिंक रंग कि पारदर्शी नाईटी निकल आयी......उस नाईटी के साथ वेसे ही पारदर्शी कपडे के ब्रा और पेंटी भी थे.....जो कि इतने छोटे छोटे थे कि उनसे क्या ढकता और क्या उभरता ?

भाभी ने नाईटी को उतारा और उसके ऊपर हाथ फेर कर उस नरम कपडे से स्पर्श का आनंद लेने लगी. ....तभी उन्होंने झटके से ऊपर देखा और मुझे निचे झांकता देख वो एक दम से सकपका गयी

"ओ...गॉड.....क्या शील भैया डरा ही दिया अपने.......क्या कर रहे हो.....इस वक़्त छत पर.....?"

मैं क्या बोलता.....मेरी आवाज़ गले में ही रह गयी.

तभी कोमल भाभी मुस्कुराते हुए बोली, "चाची के साथ हो क्या.....?"

मेरे तो कान तो गरम हो गए....भेनचोद साली मज़े ले रही थी.

मैंने कहा, " न ...न....न...नहीं मैं तो अकेला ही खड़ा हूँ......"

फिर मैंने थोड़ी हिम्मत कि और कहा, " अ....अ....अकेला ही हूँ भाभी.......चाहो तो आप आ जाओ......"

मैंने आज तक कोमल भाभी से कभी डबल मीनिंग तो क्या......सीधा साधा मज़ाक भी नहीं किया था......मेरी गांड तो फट रही थी मगर खड़े बाबूराव का दिमाग अलग ही चलता है....

भाभी ने मेरी बात पर चोंक कर मुझे देखा और फिर शरारत भरी आवाज़ में बोली, " ओ...हो.....तो लल्ला जी बड़े हो गए है......हुम्म्म......क्या इरादे है......भाभी को छत पर बुला रहे हो......सुबह से कोई मिली नहीं क्या "

मैंने मन ही मन कहा, "हाँ भाभी मिली तो सही मगर उसकी ली नहीं...."

"न....न.....नहीं भाभी......वो....वो...म..म...मैं तो मज़ाक कर रहा था."

भाभी ने मुझे एक नज़र देखा तो कपडे समेटते हुए बोली, "क्यों आपको बिजली का काम आता है क्या "

"हाँ.....भाभी.....क्या हुआ.....कुछ बिजली का काम हे क्या ?"

"हाँ भैया.....वो प्रेस का प्लग जल गया है......बदलना था......आप कर दोगे क्या.....?"

लंड अपने को यह तक पता नहीं कि WATT और वोल्ट में क्या फर्क है मगर खड़े लंड का सवाल था. काला तार, हरा तार, पीला तार...सब एक जेसे दीखते थे...मगर भाभी को मना केसे करता.

"आप सामने वाली दुकान से प्लग ले आओ और लगा दो न प्लीज"

मैंने सोचा, "आ रहा हूँ आपकी लगाने ......मेरा मतलब है प्लग लगाने"

नीचे आया और मैंने सामने वाली दुकान से प्लग लिया और तुरंत भाभी के दरवाजे पर.....

भाभी ने दरवाजा खोला और पल्लू से चेहरा पोंछते हुए बोली, "आ गए.....आओ...."

मेरी नज़ारे तो पल्लू के निचे छुपे मम्मो पर पड़ी जा रही थी. भाभी घूमी और मेरे आगे चलने लगी.

कसम उड़न छल्ले की.........इन गुजरातनो की बात ही कुछ और होती है.......भाभी के सुडोल बदन की सुडौलता उनके फुटबाल नितम्बो पर आ कर फ़िदा हो गयी थी.......सच्ची में ऐसा लग रहा था की उनकी साड़ी के नीच नितम्ब नहीं दो फुटबाल है. हर कदम पर एक ऊपर एक निचे.

अचानक कोमल भाभी रुक गयी और अपन तो झोंक में थे.....मैं ऐसा का ऐसा उनसे जा टकराया.......भाभी इतनी जोर चिहुंकी की मैं भी डर गया.

"क्या भैया आप भी......ध्यान कहा है आपका....?"

आपकी गांड में ......

"अरे सो...सो.....सॉरी भाभी..."

"यह रही प्रेस........और ये रहा पेंचकस....."

मैं चूतिये जेसे अपने हाथ में प्लग लेकर खड़ा था......घंटा नही पता था की करना क्या है मगर ......

भाभी मुझे देखते हुए बोली, "तो......"

मैंने देखा की प्रेस का प्लग जल कर काला हो चूका था.......मैंने पूछा, " भाभी ये जला कैसे.....?"

भाभी ने ऑंखें नचाई और कहा, "अरे होना क्या था.......यह प्लग मुआ ढीला है......यह बिजली का खांचा है न.....इसमें टाइट नहीं जाता.....इतना पतला प्लग है और बिजली का खांचा इतना बड़ा.....दोनों में से एक तो जलना ही था.......आखिर प्लग ही जलेगा खांचा तो हाई पॉवर है......"

इसकी माँ की आँख .....

क्या आप भी वोही समझ रहे जो मैं समझ रहा हूँ..... ???



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