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Tuesday, March 3, 2015

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--160

 FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--160



और मैं दुनी तेजी से उसकी गांड मारने लगता।

१० -१२ मिनट बाद एक बार फिर उसकी देह कांपने लगी , वो एक बार फिर झड़ने के कगार पर थी।

और इस बार न मेरी ऊँगली उसकी चूत पर थी न चूंची पर ,

सिर्फ मेरा मोटा मूसल हचक हचक के उसकी गांड मार रहा था।


और अब उसके झड़ने के साथ उसकी गांड जोर जोर से मेरे लंड को भींच रही थी , निचोड़ रही थी।

जैसे कोई अपनी सुकुमार मुट्ठी में लेकर उसे मुठियाए।


उसका झड़ना खत्म होने के पहले मैंने झड़ना शुरू कर दिया।

लेकिन एक बार मैं झड़ कर रुकता तो दुबारा उसकी कोमल मस्त गांड मेरे लंड को निचोड़ना शुरू कर देती

और मैं दुबारा , तिबारा ,… ।


मैं अपना होश खो चुका चुका था।

मेरा शरीर शिथिल पड़ चुका था।


उसी तरह , उस के अंदर धंसे आधे घंटे से ज्यादा निश्चेतन हम दोनों लता की तरह लिपटे पड़े रहे।
जब होश आया तो घड़ी में देखा साढ़े तीन बज रहे थे।

रंजी की आँख खुली तो मुझे देख के वो जोर से मुस्कराई।


लंड अभी भी गांड में धंसा था।

और जब मैंने लंड बाहर खींचा तो , गांड से मलाई की बूंदे उसके चूतड़ पर ,जांघो पर बहती ,चूत से निकली वीर्य के थक्कों दागों से मिल रही थीं।





रंजी



चुप्पी गुड्डी ने तोड़ी।

और गुड्डी ने बात भी बदल दी।

एक कबर्ड , जिसपर लिखा था ' बच्चियों के लिए नहीं " और एक खतरे का निशान बना था।
उसकी ओर उसने रंजी को लुहकाया और बोली , " हे ज़रा खोल के देख "


रंजी बड़ी मुश्किल से सहारा ले के उठी और किसी तरह धीरे धीरे टाँगे छितराये , वहां तक पहुंची।

गुड्डी ने धीमे से मुझसे पूछा , " क्यों मजा आया अपनी बहना की गांड मारने में , चल यार घबड़ा मत अभी तो शुरुआत है। मेरी ससुराल में एक से एक माल हैं , सब दिलवाऊँगी और सिर्फ चूत ही नहीं याद है न मम्मी को जो वादा किया था , रसीला भोसड़ा भी "

गुड्डी मुझे और रगड़ती तब तक रंजी ने कबर्ड खोल दिया था।

वास्तव में बच्चियों के लिए नहीं था।

व्हिस्की , रम और सब में एल्कोहल कॉन्टेंट बहुत ज्यादा था। दो पेग और कोई भी टुन्न हो जाता।

ये तो अभी किशोरियां थी , स्कूल की छोरियां।


लेकिन मना करने से यहाँ कौन मानने वाला था।

रंजी व्हिस्की की एक बोतल निकाल के लायी जिसमें अल्कोहल का कॉन्टेंट 70 % था।

" खोल न"खोल न खाली अपनी बहनो की चूत और गांड खोलने में तेज हो तुम " गुड्डी ने चिढ़ाया।

" घबड़ाना मत तेरी बहनो की भी चूत गांड खोल के रख दूंगा , जलती क्यों हो " मैंने भी जवाब दिया। लेकिन पूछा ,

" हे खोल दूंगा मैं लेकिन पिएंगे किसमें , ग्लास व्लास तो है नहीं फिर आइस भी चाहिए। "

गुड्डीने अब रंजी को फिर दौड़ाया ," मेरी अच्छी ननद रानी , तुझे अपने सारे भाइयों का दिलवाऊंगीं ,प्लीज जरा नीचे जा के ग्लास और आइस ले आ ना "

" जाती हूँ मेरी नानी लेकिन पहले मेरे भाई को अपनी सारी बहनों का दिलवाने का बोल न " रंजी अपना बेबी डॉल लपेटते नीचे गयी , और गुड्डी मुझसे लिपट के पूछने लगी ,

" बोल मजा आया गांड मारने में अपनी बहना छिनार का "
" बहोत , लेकिन तेरी बहनों का भी मैं नहीं छोड़ने वाला " गुड्डी का गाल कचकचा के काटते मैं बोला।

" सिर्फ बहनों का , मेरी भाभियाँ और , … " आँख नचा के बनावटी गुस्से में वो बोली।

" सबका जानू , तेरी कोई मायकेवाली नहीं बचने वाली , तू ही तो बार भोंसड़े के रस की तारीफ करती है ,मुझे उकसाती है " हंस के जोर उसकी चूंची दबाते बोला।

वो जोर खिलखिलाई और बोली , " अच्छा जी तो अपनी सास पर भी नजर है तुम्हारी। लेकिन वो तुम जानो ,मम्मी जाने हाँ कुछ घूस वूस दोगे तो मम्मी से सिफारिश , शायद जाएँ। "

फिर कुछ कर थोड़ा सीरीयस होकर बोली , " भाई तेरी सास का तो मुझे पता नहीं , लेकिन मेरी सास तो अब नहीं बचने वाली इसके कहर से "

जोर जोर से जंगबहादुर को वो मुठियाते बोली।

" हे ये क्या , बोल न साफ साफ मजाक नहीं , तू जानती है मुझे मजाक नहीं अच्छा लगता ऐसे मामलों में " मुंह बना के मैं बोला।

झुक कर खुले सुपाड़े पे उसने पहले एक चुम्मी ली और बोली ,

" यार इस के मामले में मजाक मुझे भी नहीं अच्छा लगता। इसलिए सीरियस ही बोल रही हूँ , अब तुम या मेरी सास लाख नुकुर करे , फट के ही रहेगी बिचारी की इस से। अरे यार तुम ने मम्मी से कित्ती बार तो वायदा किया था , वो भी मेरे सामने की उनकी समधन का तुम ,… तो तो बस मुझे लगा मम्मी को मैं जानती हूँ। कुछ जुगत कर चढ़ा ही देंगी अपनी समधन के ऊपर , लेकिन आखिर वादा तो तुमने किया था इसलिए मेरी भी कुछ जिम्मेदारी होती है ,न अपने वादे को तुम पूरा करो , इसलिए मैंने भी कुछ कर दिया। बस। "

गुड्डी मुस्करा रही थी और खुले सुपाड़े पे अपना अंगूठा रगड़ रही थी।

मेरी कुछ भी समझ में नहीं आया , और उधर गुड्डी की मुट्ठी की हरकत से लंड पूरा मोटा बांस बन गया था।

" हे बोल न प्लीज ,क्या किया तूने , साफ साफ। "

गुड्डी ने कुछ नहीं बोला हाँ अब फुल स्पीड से मुठियाने लगी।

और नीचे झुक कर एक बार फिर मेरा मस्ताया मोटा सुपाड़ा मुंह में ले लिया और चुभलाने लगी , जीभ से सुपाड़े के छेद को सुरसुराने लगी।

गुड्डी की बातें और उसकी जीभ दोनों ने मुझे पागल कर दिया था।

" बोल न यार , क्या किया तूने "

गुड्डी ने अपना मुंह तो लंड पर से हटा लिया पर हाथ अब जोर जोर मुठियाने लगा।

उसकी आँखे शरारत से मुस्करा रही थी , बोली।

" बहुत बेताब हो रहे मम्मी की समधन पे चढ़ने के लिए। चढ़वा दूंगी यार , सिम्पल। मैंने कुछ ख़ास नहीं किया। बस तुम तो मेरी छुटकी ननदिया की गांड फाड़ने में लगे थे और मन्त्र का काम मेरे जिम्मे था , बस अपनी चुदवासी छिनार ननदिया के साथ मैंने तुम्हारी बाकी मायकेवालियों का नाम भी जोड़ दिया। "

अब मुझे याद आया की उस समय , मुझे कुछ गड़बड़ लगा था ,
मम्म म ही ओम हु गुदा वेधनम , निज भगिनी , कौमार्य , ही पृष्ठ भाग , निज भगिनी गुदा ,…

मुझे लग रहा था की गुड्डी शायद कुछ और भी बोल रही है , लेकिन मन्त्र का असर था या रंजी की कच्ची गांड का , सब कुछ भूल कर मैं रंजी की गांड मारने में लगा था।

"याद आया , गुड्डी खिलखिलाते बोली , बस मैंने निज भगिनी के साथ साथ तुम्हारी बाकी मायकेवालियों का नाम , रिश्ता सब जोड़ दिया। हाँ और मम्मी की समधन के लिए तो तुमने खुद मम्मी से वायदा किया था , तो बस ,और अपनी सास का , पांच बार , जब तुम्हारा औजार गांड के पूरी तरह अंदर घुसा उस समय भी। इस लिए सबसे ज्यादा असर अब मेरी सासु पे पडेगा। "

मुझे से कुछ कहते नहीं बन पड़ रहा था।

गुड्डी ने मुझे चूम लिया और फिर मेरे निप्लस पे जोर से बाइट ली।

" यार एक बात तो तुझे माननी पड़ेगी , मम्मी की समधन हैं जबरदस्त एम आई एल फ। मन तो तेरा भी करता होगा , वो ब्लाउज फाडू ३८ डी डी भरी भरी टीट फक के लिए बनी , लेकिन अब तुझे कुछ सोचना नहीं पडेगा , अब तो ये सोचेगा। " ये कहकर गुड्डी ने तन्नाये लंड को जोर से दबाया।

' असर ये होगा की , बस सामने आने के बाद तुझे कुछ और नहीं दिखेगा सिवाय , यु नो , सारी झिझक लिहाज खत्म , और उसका असर मेरी सास पे भी पड़ेगा , बस मम्मी से किया वायदा पूरा। उनकी समधन की बुलबुल में ,… हाँ होगा मम्मी के सामने ही तो तुम्हे कुछ चिंता करने की जरूररत नहीं। आखिर रंजी की गांड मारते समय जब तुम या मैं वो बोल रहे थे तो तुम्हे कुछ याद पड़ रहा था ,… " गुड्डी बोली


बात उसकी एकदम सही थी। 
' असर ये होगा की , बस सामने आने के बाद तुझे कुछ और नहीं दिखेगा सिवाय , यु नो , सारी झिझक लिहाज खत्म , और उसका असर मेरी सास पे भी पड़ेगा , बस मम्मी से किया वायदा पूरा। उनकी समधन की बुलबुल में ,… हाँ होगा मम्मी के सामने ही तो तुम्हे कुछ चिंता करने की जरूररत नहीं। आखिर रंजी की गांड मारते समय जब तुम या मैं वो बोल रहे थे तो तुम्हे कुछ याद पड़ रहा था ,… " गुड्डी बोली


बात उसकी एकदम सही थी।

रंजी कितना रो रही थी , चीख रही थी गांड पटक रही थी लेकिन मेरे ऊपर कोई असर नहीं था। बस मैं किसी तरह उसके कसे गांड के छल्ले में रगड़ रगड़ कर सुपाड़ा अंदर बाहर कर रहा था। गांड में लंड पूरा घुसने के बाद ही कुछ अहसास हुआ वो भी थोड़ा थोड़ा।

" बस , लेकिन उस समय असर थोड़ा टेम्पोरेरी था और अब वो पक्का होगया है जिसका भी नाम मन्त्र में आया है उसके साथ। सोच कित्ता मजा आएगा टीट फक में और फिर चूतड़ भी तो उनके कैसे , ...." गुड्डी फिर चालू हो गयी।

मेरी आँखों के सामने सुबह मंजू का टीट फक और सपने में मम्मी जो मुझे बनारस में छेड़ रही थीं वो बार बार याद आ रहा था।

"अभी से सोचने लग गए मुन्ने , अरे अभी टाइम है २५ मई के बाद " गुड्डी खिलखिलाते बोली।

" देख मैंने अभी तुझे बहनचोद बनाया न , तुम कित्ता ना नुकुर कररहे थे ,शर्मा रहे थे लेकिन मजा आया न चोदने में भी गांड मारने में भी। बस मैंने बनाया तुझे बहनचोद और मम्मी बनाएगी मादर…

गुड्डी की बात पूरी होने के पहले ही रंजी ने एंट्री ली और गुड्डी चुप हो गयी।

रंजी के एक हाथ में ग्लास और दूसरे में आइस ट्रे थी।


….

और कुछ देर में रंजी डाल रही थी और मैं डलवा रहा था।

ग्लास में आइस के ऊपर आलमोस्ट २/३ व्हिस्की भरी थी और रंजी के बेबी डॉल्स से झांकते बूब्स से टकरा कर मैंने चियर्स किया ,

" तेरे मस्त जोबन के नाम "

दूसरा पैग शुरू होते होते ही रंजी और गुड्डी को चढ़ने लगी।

आँखों में लाल डोरे थे और दोनों हलकी हलकी बहक रही थीं।

लेकिन मैं भी इतनी आसानी से छोड़ने वाला नहीं था और हम तीनो ने मिलकर आधी बोतल खाली करदी जिसमे ज्यादा रंजी और गुड्डी के पेट में गयीं।

" हे कुछ खाने को नहीं है साथ में " रंजी मुंह बना के बोली।

" अरे इत्ता मस्त बड़ा सा हाट डॉग है तो। " गुड्डी ने झट से फिर मेरा बॉक्सर शार्ट नीचे खींचते हुए कहा।

और तन्नाया हुआ ९ इंच का मोटा खूटा हवा में खड़ा था।

" हे लेकिन खाते हुए ये उछले कूदे तो " रंजी ने फिर सवाल दागा।

" अरे यार भूल गयी थोड़ी देर पहले क्या किया था इसके साथ , बस वही फार्मूला ४४ फिर। " खिलखिलाती गुड्डी बोली।


कुछ देर तक रंजी इधर उधर देखती रही , फिर फुसफुसा के गुड्डी से बोली , " कुछ दिख नहीं रहा है यार , किस चीज से "

" इससे ,… " हँसते हुए गुड्डी ने बेबी डॉल ड्रेस खींच कर उसके हाथ में दे दिया और साथ ही धक्का मार के मुझे पलंग पर लिटा दिया।

इस ननद भौजाई की जोड़ी में एक से निपटना मुश्किल था और अगर दोनों एक साथ मिल जायँ तो हार मानने में ही भलाई थी।

बिना चूं चपड़ किये मैं डबल बेड पे लेट गया और गुड्डी मेरी ऊपर चढ़ी थी , हिलना मुश्किल था।

रंजी ने पहले तो अपने बेबी डॉल से मेरे दोनों हाथ बाँध दिए और फिर गुड्डी का भी रैप खींचती हुयी बोली , " यार इससे और मजबूत गाँठ बंधेगी "

और अब हम तीनो "अपने रूप" में थे।


मैं लेटा और वो दोनों लालीपाप के बगल में बैठी नदीदी लड़कियों की तरह देख रही थीं , लार टपका रही थीं।

लॉलीपॉप था भी तो जबरदंग। मोटा कड़क.

मस्त चूसने लायक।

लेकिन ये लड़कियां भी न ,

पहले आप , पहले आप करने लगीं।

मेरे मन में तो आया भी कह दूँ की यार कमीनियों तुमदोनो कोई लखनऊ की तो हो नहीं।

एक बनारस की रस रसीली

तो दूसरी आजमगढ़ की खेली।  
लेकिन गुड्डी थी न , बस उसने मामला सेट कर दिया ,एक झटके में। बोली ,

" साल्ली , छिनार , तू बार बार कहती थी न मेरे भैया , मेरे भैया , चूत में गटक लिया , गाँड में ठूंस लिया तो मुंह में लेने में , … "
" अरे लेती हूँ मेरी नानी , हल्ला मत कर " झुँझला कर रंजी बोली , मेरी ओर देख कर मुस्कराई और अपनी लम्बी सी जीभ निकाल के गुड्डी को चिढ़ाया और काम में जुट गयी।


और उसने एक खूब लम्बा लिक लिया ,' लॉलीपॉप ' से शुरू कर , सीधे 'लकड़ी ' के नीचे तक और झट्ट से एक बाल मुंह में भर ली और चूसने लगी।

मेरी बस जान नहीं निकली।

और साथ में उसकी बड़ी बड़ी कारी कजरारी रतनारी आँखे , मुझे देख देख के जिस तरह मुस्करा रही थीं , मुझे उकसा ललचा रही थीं।

थोड़ी देर तंग करने के बाद वो लॉलीपॉप की ओर मुड़ी ,लेकिन उसके पहले उसने वही किया जो मैंने उसकी गांड मारने के पहले किया था। .


मेरे चूतड़ के नीचे उसने खूब मोटे मोटे दो कुशन लगा दिए और साथ में उसकी शरारती उँगलियों ने मेरे पिछवाड़े के छेद में उंगली कर दी।

वो भी हचक के ,

मेरी सिसकी निकल गयी।

वो नाजनीन शोख मुस्कराई और एक झटके में पूरा सुपाड़ा गप्प , उसके रसीले गुलाबी होंठों के बीच।

वो चूसती रही चुभलाती रही और थोड़ी देर में उसकी जीभ नीचे से लण्ड को चाटने , लिक करने लगी।

साथ में उसकी लम्बी उंगलियां , रेड पेंटेड ,खूनी नाख़ून मेरे लंड के बेस को खरोंच रहे थे।

कुछ ही देर में मस्ती में चूतड़ उचका रहा था।

जोश में लंड मोटा लोहे का राड हो गया था।

पांच मिनट घडी देख के वो सुपाड़ा चूसती रही , फिर उसकी शैतान आँखों में चमक आई।

और एक पल के लिए उसने होंठ मुझसे दूर कर लिए।

लेकिन ये डबल अटैक था और अब गुड्डी का नंबर था।

वो आके मेरे सर के पास बैठ गयी थी और अपनी 'खतरनाक ' बातें अपनी 'ससुराल वालियों ' के बारे में मेरे कान में बोल रही थी।

बेबी डॉल और रैप में बंधे मेरे हाथ हिल डुल नहीं सकते थे।

और अचानक गुड्डी झुकी और उसके उरोज मेरे चेहरे के ठीक ऊपर थे , निपल्स मेरे होंठों से बस आधे इंच दूर , और मैं बार बार चेहरा उचकाता और बार वो पल भर के लिए अपने मटर के दाने के बराबर निपल मेरे होंठों पर रगड़ देती और फिर दूर कर लेती। मैं तड़प कर रह जाता।

और मैं देख भी नहीं सकता था रंजी क्या कर रही है।


रंजी ने अपने बर्फीले होंठों से मेरे सुपाड़े को जकड लिया था और उसके मुंह में हीरे की कनी की तरह छोटे छोटे बर्फ के टुकड़े , मेरे सुपाड़े पे धंस रहे थे ,चुभ रहे थे। और साथ में उसकी सर्द बर्फीली जुबान हंटर की तरह बार बार ,सटासट मेरे सुपाड़े पे मार रही थी।


चुभ भी रहां था मस्ती भी लग रही थी। एक ऐसी मस्ती जो आज तक मैंने लंड चुसवाते समय नहीं महसूस की थी।

और रंजी के हाथ भी मैदान में आ गए।

एक हाथ में दो बर्फ के छोटे छोटे क्यूब ले कर उसने मेरे बाल्स के नीचे अचानक लगा दिया और फिर उसकी हथेली में दबे दबे , लंड के बेस से वो सरकते सरकते आलमोस्ट सुपाड़े के पास रुक गए।


गुड्डी भी मेरे साथ रंजी की ये हरकतें देख रही थी।
और गुड्डी की मेरे मायके वालियों को गालियाँ अब फुसफुसाहटों से बदलकर खुल के जोर जोर से रंजी को सुनाने लगी

" छिनार साल्ली , खानदानी , पैदायशी चुदक्कड़ , और तू भी न बहनचोद , मादरचोद , भोंसड़ी का , तेरे सारे खानदान की फुद्दी मारूं "

और रंजी की शरारतें , अदाएं ये गालियां सुन के और बढ़ रही थीं।

उसके बर्फीले होंठ , जोर जोर से मेरा लंड चूस रहे थे और मुंह में भरे बर्फ के टुकड़े मेरे सुपाड़े को जोर जोर से रगड़ रहे थे।

" रंडी के जने , छिनार के पूत , जिस भोंसड़े से निकले उसी भोंसड़े में , … " अब गुड्डी की गालियां एकदम मम्मी की समधन , उसकी सास पे सेंटर्ड हो गयी थीं।

"बोल है न बहनचोद , बोल सारे बनारस वालों के साले बोल , "

और मैं भी गुड्डी के रंग में बह गया था ,

" बहनचोद " मेरे मुंह से निकल गया.

गुड्डी यही तो कहलवाना चाहती थी , उसने लेवल आगे बढ़ाया
बोल बोल , मादरचोद , बोल


लेकिन मैं चुप रहा

उसकी और रंजी की जुगल बंदी जबरदस्त थी , उसने आँख से इशारा किया और रंजी ने पहले तो एक पल के लिए चूसना रोक दिया फिर लंड मुंह से बाहर निकाल दिया।

गुड्डी मेरे कान में बुदबुदाई " बोल साल्ले वरना कुछ नहीं मिलेगा। "

और सच में रंजी मुझे देख के टुकुर टुकुर आँखे नचा रही थी और मुस्करा रही थी।

" कुछ बोल रहे थे क्या , बोल न " रंजी ने पुछा।

" बहनचोद " मैं मुस्करा के बोला।

और , और बोलो न , कुछ और भी बोल रहे थे , रंजी ने फिर उकसाया ,

और साथ में गुड्डी भी , मेरे मुंह से निकल ही गया ,

मादरचोद ,

मैंने सूना नहीं रंजी मुंह बना के बोली , ज़रा जोर से बोलो न।


" मादरचोद " अबकी जोर से बोला मैं।

और गुड्डी मैदान में आगयी।

" ये इनका प्यार का नाम है ,बहनचोद , मादरचोद , मम्मी तोइन्हे बस इसी नाम से बुलाती हैं और इन्हे अच्छा भी बहुत लगता है " गुड्डी रंजी सेबोली

" अरे ये तो बहुत अच्छा है मैं भी अब इन्हे इसी नाम से बुलाऊंगी , आखिर प्यार का नाम है ,बहनचोद मादरचोद। " रंजी मुस्करा के बोली।

मेरी हालत खराब हो रही थी , मैंने रंजी से बोला हे चूस न।

" एकदम बहनचोद अभी , " और रंजी अपने काम में लग गयी ,
दोनों का मिला जुला असर ये हुआ की मैं चूतड़ उठा के चुसवा रहा था ,खूब मजे में।


" हे हचक के चोद साली का मुंह मादरचोद पूरा लंड डाल के " गुड्डी बोली।

मन तो मेरा भी यही कर रहा था।

मेरी निगाह घड़ी पे गयी सवा चार बज गए थे। शशांक अपनी रात की पारी खत्म कर के जल्दी जल्दी विभावरी से मिलने को कदम बढ़ा रहे थे।
 




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