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Tuesday, June 17, 2014

FUN-MAZA-MASTI शर्मीली नीलान्जना--3

FUN-MAZA-MASTI


शर्मीली नीलान्जना--3

 "अच्छा ?" - मैने कहा और् अपनी हथेलियों से नीला की दोनों छातियों को जकडकर काबू में किया. बदन का पूरा भार् कलाइयों से नीला क्की दूधिया छाती पर उतारते मुहाने पर तैयार् खडे लौड़े को और् ऊपर खींच् चूत पर् ऐसी जोर् की ठोकर मरी कि नीला की कमर् चरमरा उठी.
" हाऽऽ..य्य. जरा धीरे ना. मैने ऐसा तो नहीं कहा था." - नीला बोली.
अब् मेरा लौड़ा रुकने वाला नहीं था. नीला की चूत में ऊपर और् नीचे, दायें और् बांये, हर कोने पर निशाना साधता वह् बिन रुके भकाभकऽऽ-फचाफच्ऽऽ चोदे जा रहा था. नीला की पलकों में स्वप्नलोक तैर् रहा था. आहें भरती वह मीठी-मीठी सिसकरियां ले रही थी. बीच्-बीच् में विराम देता मैं नीला के माथे को , होठों को, गालों और् कान की लवों को बेतहाशा चूम जाता था. उसके गले से मेरे गले का समागम होता और् उसकी चूचियों को मसलता, सुराहीदार गर्दन को चाटता मै उसे मदहोश् कर देता था. सिर् से पांव तक् अंगों के प्यार भरे मेल-मिलाप के साथ नीला की गुलाबी से भुक्क लाल् हो चली लार टपकाती चूत और् मेरे बेसब्र ठन्नाए लौड़े का खेल जारी रहा. नीला की चूत और् मेरा लौड़ा चुदवाते और् चोदते भी और्ऽ..और्ऽ...और्ऽ.. की तमन्ना में लोटपोट हो रहे थे. नीला की चूत "दो.ऽऽ".."दो.ऽऽ"..."दो.ऽऽ.." चीख्ती हांफ रही थी और् मेरा लौड़ा उसके चिथडे उडाता "लो.ऽऽ"..."लो.ऽऽ"..."लो.ऽऽ" कहता हर् वार् पर् चोट को और् तेज करता चूत पर टूट रहा था. आनंद के स्वर्ग की ओर चलते-चलते हमारी नसें अब् हवा में तैरने लगी थीं. नीला और् मैं कहां खो गए थे यह नहीं मालूम. केवल मदहोशी की मौज थी जो हमें सारे जहान् से दूर उस जहान में ले जा रही थी जो केवल हम दोनों का था - केवल् नीला का और् केवल् मेरा.
चरम ऊंचाई पर चढती नीलांजना से अपने को न संभाला गया. उसपर ऐसा जोश सवार हुआ कि चूत से लंड को ठेलती और् मेरी जांघें मोडती वह लौड़े पर यूं सवार हो गयी जैसे कोई महारानी किसी राजा का किला जीतने जा रही हो. मेरे हाथ के पन्जों में पन्जे फंसाए, उंगलियों से उंगलियों को गूंथती नीला अपने पुत्ठों को भरपूर ऊंचाई तक उठा-उठाकर् " धप्प.ऽऽ..धप्प.ऽऽ..धप्प.ऽऽ " वार किये जा रही थी. मुझे डर लगा कि रति और् काम के भिडंत का वह् शोर बाहर कोई न सुन ले. नीलांजना से मैने कहा - " मेरी जोशीली जी, ज़रा ध्यान रखो कि हमारे प्यार के चुतीला संगीत का यह शानदार संगीत बाहर न सुनाई पडे."
मदमस्त नीला मौज में थी. हंसती हुई वह् बोली - " सुनने दो ना. कोई क्या बिगाड लेगा. यूं क्यों नहीं कहते कि चिथडे उडते देख् तुम्हारा यह यार दर्द से चीख रहा है. जो होना है वह अब हो ही जाए."
मेरी संधि पर सवार मुझ पर प्रहार करती नीला दर-असल बगल् के आदमकद आईनों में इस नज़ारे को निहारती मुग्ध हो रही थी. खास तौर पर वह यह देख् कर् खुश् हो रही थी कि उसकी चूत मेरे लौड़े पर रेलगाडी के पिस्टन की तरह् कैसे मजेदार ढ्ंग से कसी हुई चिकनाहट में सटासट उठती-गिरती, घुसती-निकलती साफ् नज़र आ रही है.
घिस-घिसकर भुक्क लाल हो चली नीला की गुलाबी चूत मेरे प्रेम के स्वर्गिक रस से तर-बतर होकर टपकी जा रही थी.
" मैं थक गई. अब तुम आओ " कहती नीला निढाल चित्त होकर पसर गई थी.

उसकी जांघों को फाडता रस से तरबतर चुचुआती चूत पर अपने को टिका मैने एकबारगी इतनी जोर का धक्का लगाया कि नीला मेरे कठोर प्रहार से ’उई.ऽऽऽऽऽऽ.आ..ऽऽह’ कहती उचक पडी थी. वह बुदबुदा रही थी.
" थोडा धीरे ना. चुदाई करना है कि मेरी जान निकालनी है ?"
मेरा बौराया दिमाग अब पूरे मूड में था. मेरा लंड नीलारानी की दर्ख्वास्त को दरकिनार कर दनादन उसकी चूत को ठोके जा रहा था.
बिस्तर के दोनो बाजू दीवार पर जडे आदमकद आइनों में सारा नज़ारा दिखाई पड रहा था. खेल को अन्जाम तक पहुंचाने का मेरा मूड बन चला था. चोदने और् चुदवाने के चरम पलों का अपना अलग मजा होता है. नीला की छोटी रानी के पठार का पूरा कछार गीला हो चला था. जैसे जैसे चोट भारी पडती गई, ज्यूं-ज्यूं लौड़े राजा के साथ मेरे पुत्ठों का उठान बढता गया त्यों-त्यों नीलांजना की कराहती सिसकारियों के साथ् मेरी आवाज में " लोऽ".. "और् लोऽ"...ये संभालोऽऽ".." लो भरपूर मजा लो"...अपनी चूत के चिथडे-चिथडे उड जाने दो"..."आह कैसा मजा आ रहा है" की बुदबुदाहट संगीत की लहरियों की तरह मिल-मिल कर हम दोनों को जन्नत की सैर करा रही थी. संगीत की इन लहरियों के साथ् "धपाक्कऽऽ-धपाक्कऽऽ की गूंज" और् "चाप्प ऽऽ...चाप्प..ऽऽ" की छपक तबले की तरह संगत कर रही थी. जन्नत की आखिरी मंजिल पर पहुंचते-पहुंचते चूत पर लंद रजा की चुदाई की चोट ऐसी जबरदस्त होने लगी जैसे भारी सब्बल गुस्साकर सींग मारता पाताल-लोक को छेद डालने के लिये पिल पडा हो. उन बेकाबू और् भयानक प्रहारों से चीखती नीला उठ-उठ कर मेरे उस लौड़े को थामने, रोकने उतारू हो चली जो इस वक्त रोके भी न रुकने वाला था. उधर "आह मैं मर गईऽऽऽ"..."रुकोऽऽऽ"...."बस नाऽऽऽ..आ" की आवाज नीला के मुंह से निकल रही थी और् इधर् नीला की चूत की शिराओं को कंपित करता, सनसनाता हुआ रुक-रुक कर फुहारें बरसा रहा था. रस के बोझ से मेरा लंब जब-जब नीलारानी की चूत के अन्दर सनसनाता, फूलता, मुटाता हुआ रस की फुहार छोडता, तब-तब उसकी चूतरानी उस अलौकिक रस का स्वागत करती हुई लपक-लपक कर अपनी तिजोरी में बन्द कर रखने के लियी सिकुड-सिकुड जाती थी.
नीलांजना रानी हांफ रही थी. खुशी उससे संभाली नहीं जा रही थी.
" बस...बस... बस..मेरे प्यारे. तुम्हारे लौड़े ने तो आज सचमुच् मेरी चूत को चिथडों मे बिखेरते घायल कर डाला है. इस चुदाई को मै जनम् भर नहीं भूल पाऊंगी. अब जब् तक दुबारा मौका नहीं मिलता है मेरी चूत् ऐसी जोरदार चुदाई की तमन्ना में मरती रहेगी." नीला खुशी में मदमस्त हो गई थी.
" हाय..मेरे प्यारे..आओ. आओ तुमको गले लगा लूं" कहती हुई नीला ने अपने बदन को ऊपर उठा कर मेरे बदन से बांध् लिया. अंदर बहती बिजली की सनसनाती कडक् का आनंद इस नीलारानी से मेरे बदन के नख से शिख तक एक हो जाने में ही सर्वाधिक था. खूबसूरत नीलांजना की कमर के निचले भाग को अपनी बाहों से कसे मेरा अस्तित्त्व उसके बदन में समा चला था. इस् तरह समूचे अस्तित्त्व के साथ् उन पलों में एक्-दूजे मे समाये हम दोनों ही उस दिव्य कंपन का आनंद ले रहे थे जो एक..दो..तीन्..जैसी अनेक सरसराहटों के साथ् चूत की खोल में जमकर थम चला मेरा पौरुष् उतार रहा था. तूफान आखिर थमते-थमते थमा. बदन में समाई मौज को कसकर चिपटाए नीला और् मै समाधि की निद्रा में कब जा पहुंचे इसका पता ही न चला.
नीला को भरपूर आराम देने के लिहाज से अपने सिर को उसके पायताने की तरफ् किये मैने भी आंखें मूंद लीं.

०००००००००००००

गहराती रात में अचानक एक सपने की गुदगुदी से मेरी आंख् खुल गई. मैं अपने को देख् रहा था और् अदेखी परियों के पंख् मेरे पौरुष् को हौले-हौले स्पर्श् करते जगाते चले जा रहे थे. आंख् खुलने पर मैने पाया कि मेरा लंब फूल रहा है. परी-वरी सपने के साथ् गायब हो गयी थी. हकीकत यह थी कि वह तो मेरी नीला परी ही थी जो घुटने मोडकर अपनी जगह सए नीचे सरक आई थी. मेरा लंब अपने मुंह में डाले वह नीला ही पलकें बन्द किये चुइन्गम की तरह चूस रही थी. मेरेआ होश् जागते ही वह फूलकर मुटाता लंब और कडककर टन्नाने लगा. मैने कोई हरकत नहीं की. सोचा कि इस वक्त अनजान बने रहने के खेल में ही अधिक मजा है. कुछ् देर वैसे ही मजा लेने के बाद मैने धीरे से अपने को व्यवस्थित किया और् फिर् नीला की जंघाओं के बीच् समाई चूत पर जुबान फेरता उसकी गुलाबी कली को टटकाना शुरू कर दिया.
अब नीला समझ् चुकी थी कि मैं जाग चला हूं. उसने मेरी बाहों को रजाई के पल्ले की तरह थामा और् अपने बदन पर मुझे ओढ लिया. नीलांजना की आंखें मुंदी ही हुई थीं. सारा कुछ उनींदे अनजाने में अपने आप हो रहा था. उसी आलम में नीला के घुटनों को खिसकाया और चूत की फांक को टोहता अपना लौड़ा उसमें घुसा दिया. नीला की कमर को कसकर मैने अपनी बाहों के घेरे में ले लिया था. उस स्वप्निल माहौल में ही चूत को लंड से ठांस बहुत देर तक मै नीला को चोदता चला गया. अन्जान और नि:शब्द सन्नाटे की चुदाई में अपना अलग मजा था. सिकुडन, सिहरन और् थिरकन भरी फुहार का हम यूं मजा ले रहे थे जैसे वह सरा-कुछ हमारे बीच सपनों में हो रहा हो. चूतरानी जब भरपूर बारिश से भीग चली तो नीलांजना ने मेरी पीठ पर शाबाशी की प्यार भरी थपकियां दीं. मुझे छातियों में छिपाती नीला अपने कपोल मेरे गालों से सटा फिर से तसल्ली की नींद में डूब गई. वैसी भरपूर तसल्ली के बाद मुझको भी नींद आनी ही थी.

००००००००००००००००

सुबह नींद खुली तो आठ बजने को आ रहे थे. नीलांजना को दस बजे तक लौटना था. नौ बजे तक हम तरोताजा होकर होटल से निकलने तैयार हो चले थे. नीलांजना ने इस वक्त छींटदार सलवार का सूत पहना हुआ था. कल हमने भरपूर प्यार किया था. चौबीस घंटे पहले की नीलांजना कल दिन और रात की चुदाई के बाद कुम्हला चली थी. लेकिन् गुलाबी चेहरे पर छाया यह धुंधलका भी उसमें कजरारा रंग भर रहा था.नीला की गहरी काली पुतलियों को घेरती आंखों की सफ़ेदी बोझिल थकान और् उनींदेपन के लाल डोरों से अलग् रंग् में थी. मैं उसे देख रहा था और् वह मुझे देख् रही थी. मेरी आंखों में झांकती अचानक उसके होठों पर बारीक सी मुस्कान उतर आई. थकान के बोझ् के बावजूद न जाने क्यों उसकी आंखों में एक चमक तैर् गई थी. नीला की वैसी अदा ने अचानक मुझे भी बदल दिया. उसके सुन्दर् मुखडे को निहारते उसकी छिपी मुस्कान और् आंखों की चमक् का रहस्य मेरे दिल् पर खुल् रहा था. जरूर इस पल मुझे निहारती नीला के अन्दर मेरी वह छटा चलचित्रों की श्रिंखला मै तैर आई थी जो कल दिन और् रात के खूबसूरत खेल में देखी थी. नीला की उस मुद्रा ने मुझे भी मेरे साथ खेलती रही आई अपनी प्रिया की बिस्तरबंद छटाओं में डुबा दिया था. स्म्रितियों से गुजरता यह वह पल था जब इधर-उधर छूट गया सामान चेक करने के बाद पलंग के पायताने सूट्केस और् बैग के साथ नीला और मैं रवानगी के लिये तैयार खडे थे.
" चलें अब" - नीलिमा ने पूछा.
" तुम्हारे अन्दर जो चल रहा था वह मेरी आंखों में भी समा आया है. आह ! तुम्हें छोडने जी अब भी नहीं चाह रहा." नीला को बाहों में भरते मैने कहा.
" मैने कब कहा कि मेरा जी तुम्हें छोडने को कर रहा है? मजबूरी है. अब जाना होगा. इस वक्त वह मूड फिर मत जगाओ प्लीज़" नीला बोली.
"फिर कब् किस वक्त ?" - मैं पूछ् रहा था.
" कैसे बताऊं ?"
सवाल दोनों के सामने थे. जवाब न उसके पास था , न मेरे पास. सवालों के पशोपेश में उदास आंखें आपस में उलझकर डूब गई थीं.
" चलें ?"- नीला का सर मेरी छाती में छिपा हुआ था. होठों से उदास् बुद्बुदाहट वहीं से निकली थी. पूछने की अदा यूं थी जैसे नीला के "चलें " का मतलब यह हो कि " चलने की इच्छा नहीं हो रही है.
मुझे जवाब मिल गया था. नीला के पलकों को लगातार चूमता मैं उसके अधरों पर जा टिका. बेसबरी से हम दोनों के होठ् भिडकर उलझ् गए थे. अलग होने न उसके होठ् तैयार थे , न मेरे. अलग होने की जगह होड उनमे चबाने और् लील जाने की चल पडी थी. बदन सनसनी की तरंगों से मचलते बेकाबू हुए पड रहे थे. नीला की सलवार का नाडा मैने सर्र से खींच् दिया. इसका जवाब देती मेरी पैन्ट के जिप खोलती और् मेरे लौड़े को मुत्ठी में कसकर बाहर खींचती उसने दिया. इस वक्त समय ज्यादा न था. पलंग के कोर पर नीला के पुत्ठे टिकाते मैने नीला की टांगें अपनी जांघों के बीच् खींच् लीं. नीला को उस तरह पलंग के सिरे पर ही अधचित्ता करके खडे खडे ही झुकते हुए मैने नीला की चूत में अपना फूलता और् तन्नाता लौड़ा सरका दिया.
" नईं ना...आ...आ . हाय क्या कर रहे हो..!" कहती हुई भी नीला की जांघें खुद ब खुद् मेरे लौड़े को निगलने जगह बना रही थीं. जैसे प्रवेश् से पहले पूजा का प्रणाम करते हैं उस तरह अपनी तीन उंगलियों से चूत के कपाटों को नरमी से सहलाकर उन उंगलियों को चूमा. इसके बाद बिना देरी किये मैने अपना पूरा का पूरा लौड़ा नीला की चूत में जमकर पेल दिया.
" हाय रे..,..मैं तो मर जाऊंगी" नीला ने कमर को लहराते हुए उसे ठ्ंसवाने की राह आसान करते खुशी का संगीत उन स्वरों में मुझ तक भेजा. नीला की उस ’नईं ना’ का मतलब था कि " चोद-चोदकर् फाड ही डालो मेरे रजा. इस मरने का भी अलग मजा है."
नीलांजना की छातियों पर हथेलियों से पूरी गोलाइयों को मसकते और् उसके प्यारे चेहरे को निहारते मैने दनादन उसकी लपकती चूत मे ठन्नाए लौड़े को पेलना शुरू कर दिया. पूरी लंबाई में वह् बाहर आता जाता बार्-बार् एक लय के साथ् नीलिमारानी की चूत को ठेल रहा था. चुदवाने और् चोदने के इस आखिरी दौर् का अपना अलग मजा था. चूंकि कल् एक-दूसरे से टकराते , एक दूसरे के चिथडे उडाते चूतरानी और् उसका लंडराजा दोनों थके थे पेलने और् धंसने की शुरुआत मैने बडे कोमल तरीके से की.मेरा लौड़ा यूं कोमलता के अह्सास के साथ् लयात्मक ढंग से नीलांजना की चूत में धंस और निकल रहा था कि बारीक से बारीक गुदगुदी का अहसास नीला और मेरे दिल तक पहुंचता हर् चोट पर खूब गुदगुदाता रहे. दस मिनट तक हौले-हौले उस गुदगुदी में नहाने के बाद मूड बदला चला. मैने झुककर पंजों से नीला की छातियों को कसकर निचोडा दाल और् उसके होठों को बेरहम दीवानगी से चूमते चबा दाला.
वह उत्तेजना में उछलती और् लहराती " सी"..."सी"..."मर् जाऊंगी नैं ना" कहती मुझे परे ढकेल रही थी और् मैं उसके कानों मे मन्त्र की तरह बुदबुदा रहा था - " अब जरा दिल थामो. तुम्हारा प्यारा सेवक तुम्हें स्वर्ग की सैर् कराएगा."
नीला की कमर् को हाथों से खूब कसकर मैने चिपतया और् घुटनों को अपनी भुजाओं के बल टांगता मैने नीला की चूत पर मेल ट्रैन की भरपूर स्पीड से भारी ठुकाई शुरू कर दी. हिमालय की चोटी पर चढे जोश् से लौड़ा चूत की इतनी तेज् ठुकाई कर रहा था कि बार-बार् चिपककर फिट होते और् निकल आते कार्क की हरकत से बोतल का मुंह ’पुक्क...पुक्क.. पुक्क...पुक्क’ का सुर निकाले जा रहा था. उसके साथ् खूब उठ-उठ कर ठोकते मेरे पुत्ठे नीला की चूत के पठार से तकराते ’चत्ट..चत्ट..चत्ट..चत्ट’की ताल दे रहे थे.
नीलांजना रानी " हाय...नईं ना..,..हाय धीरे ना..बस् करो ना..हाय.. दर्द कर रहा है.." कहती बुदबुदा रही थी लेकिन् गरम तवे को ठोक-ठोक कर ठंडा करने के लिये मैं उतारू था. रस की कीचड बरी बारिश के बीच् मेरा लौड़ा और नीलारानी की चूत फूल-फूलकर भुक्क लाल हो रहे थे. सनसनी का चरम क्षण जब आया तो झुकता-झुकता मेरा बदन आखिर नीला के बदन् से चिपटता उसमें समा गया था. ऐसी चाहत भरी थी कि इस अंतिम संभोग के आनंद में पोर-पोर को डुबाए हम दोनों के चिपके बदन दो से मिटकर एक हो जाएं.
चूत और् लौड़े की सनसनाहट से भीगे अपने-अपने दिलों को एक दूसरे को सौंपते नीला और् मै बहुत देर तक वैसे ही निढाल लिपटे रहे. यह वक्त मजबूरी का था इसलिये अगली भिडंत के लिये मूड बनाते इन्तिज़ार मे सोया रहना संभव न था. पंद्रह मिनट के बाद हमने होटल से रुखसत ली. नीला को लाउन्ज में बिठा मै बाहर टैक्सी की तलब में खडा था.तभी एक टैक्सी आकर रुकी . इससे पहले कि मैं ड्राइवर से मुखातिब होता कोई एक बीस साला सर्वांग सुंदरता की परी बाला उससे बाहर आई. पोर-पोर में ऐसी चिकनाई भरी कसावट थी और् गोरे बदन पर् छाई जवानी का ऐसा ताजा सिन्दूरी दूधियापन कि ठीक अपने सामने उसे खडा पाकर् मैं होश् खोए खडा रह गया.
" नीलांजना कहां है ? तैयार हो गयी ? " मिलाने के लिये हाथ् बढाए उसने अपना परिचय दिया - "मैं शीना, नीला की इन्तिमेट रूम मेट"
अब भी अचरज में डूबे मैने शीना का आगे बढा हाथ थाम लिय. मुझे इसका भी होश् नहीं रहा कि मिलाकर हाथ् छोड दूं.
" हाथ छोडिये ना अब. सब देखने लगेंगे. इतना पसंद आया हो तो बाद में कभी कसर निकाल लीजियेगा." शीना ने फुसफुसाकर आगाह किया.
अब मुझे होश आया.
" नीला तो ठीक, लेकिन् मुझे आप ने कैसे जाना ?" - मैने पूछ लिया.
" माइ डियर हैन्डसम. अब भोले न बनिये. बाथरूम में जोडे में घुसने से पहले उसका और् कमरे का दरवाजा बंद करना अब मत भूला कीजिये."
" मतलब ? शीना तुम क्या कह रही हो ?"
" जी , कल यहां से गुजरते मैने आप लोगों को होटल् में जाते देख् लिया था. पास ही घर है. मै कुछ् देर बाद् ये खयाल करके कि आप् लोगों के साथ् सुबह-सुबह गप्प मार आऊं, रूम नंबर पूछ्ती घुस आई थी. बस और क्या.?" - शीना बोली.
" बस इतना ही ना ! मैं सनझ् गया. फिर आप नीला को न देख लौट आई होंगी." - मैने कहा.
" हां जी, दिल् बहलाने के लिये ये खयाल फिलहाल अच्छा है. यूं हकीकत ये है कि कल बाथरूम में नीला को आप के साथ् जोरदार भिडा देखकर मुझे साली नीला पर बहुत गुस्सा आई थी. इन्टिमेट फ्रेन्ड होकर भी साली ने मुझे असल प्रोग्राम क्यों छिपाया ? जी तो यूं किया कि आप दोनों के बीच मैं भी घुस जाऊं और् या तो मजा किरकिरा कर दूं या नीला के हिस्से क मजा मैं लूट जाऊं." - थोडा शर्माती हुई शीना बोली.
मैं घबरा गया. अपने होठों पर उंगली रखते इशारे से चुप कराते मैने कहा - " शीना तुम बहुत सुंदर हो और् मुझे उतनी ही अच्छी भी लगती हो. नीला से कुछ न कहना प्लीज़. उसके बदले मुझे जो भी सजा दोगी. मुझे मन्जूर है."
" प्रामिस" - उसने पूछा.
" पक्का." मैने जवाब दिया.
मेरा मोबाइल नंबर लेकर और् अपना देते हुए शीना हल्की आवाज में बोली " बाद में बात करेंगे. भूलियेगा नही."
मेरी सलाह पर मुझसे अनजान की तरह वह लाउन्ज पर गई और् नीला को साथ ले आई. जैसे दो अनजानों के बीच परिचय करया जाता है वैसे नीला ने शीना का मुझसे परिचय कराया. उस रुकी टैक्सी पर् ही सवार हो हम तीनों निकल पडे. नीला और् शीना को उनकी जगह छोड मै करीब के उस शहर की ओर निकल चला जहां कोई चार पांच् दिन मुझे अपने कामों से ठहरना था.
समाप्त 



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FUN-MAZA-MASTI शर्मीली नीलान्जना--2

FUN-MAZA-MASTI


शर्मीली नीलान्जना--2

 टकराहट् की हर् थाप् के साथ् नीला और् मेरे दिल् का जोश् बढ़ता चला जाता था.मगन् होकर् लंड् और् चूत के बीच् भकाभक् का खेल् देखते हर् टक्कर् मे हम् दोनों अपने-अपने खिलाड़ी का हौसला बढ़ाते कह पड़ते थे - "शाब्बास्,जोर् से".."और जोर से."... "पीछे मत् हटना"..."मारो कस्स के"...."ठांस डालो"..."लपक जाऽऽ रानी"..."लील ले"..."चोद डाल" .."उड़ाओ चिथड़े"...."शाब्बास्.."
फिर् धीरे-धीरे हम् दोनों उन हालातों में बढ़ आये जहां देह् की शिराओं में घने बादल घुमड़ने लगे थे, तूफ़ान आ रहा था और् बिजलियां चमकने लगी थीं. माहौल् बरसने-बरसने का हो रहा था और् कभी भी बारिश् हो सकती थी.

मैने नीला को खींचकर पटक दिया और् पूरी ताकत से खुद में चिपका लिया. नीचे ’भकाभक्-भकाभक’ की आवाज के साथ् जोरदार टक्ककर जारी थी और् ऊपर मसली जाती छातियों के साथ् एक दूसरे को मदहोशी में निहारती आंखें थीं.नीलान्जना और् मेरी भुजाएं एक-दूसरे को पूरी ताकत से कसकर थामे हुई थीं. नीला और् मेरे देह की एक-एक रग आज मिट् जाने तक का पूरा जोर लगाकर् स्वर्ग की उस दिव्य क्रीड़ा का सारा रस निचोड़कर् रख लेने को बेताब थी. ऐसा लग रहा था जैसे नीला और् मेरा बदन बादलों में तैर रहा है और् सारी कायनात फूलों की बारिश् करती हम दोनों के साथ खुशी की लहरों पर तैर रही है. उस खेल में आखिरकर ठोकरें यूं तेज हो चलीं कि मनो मेरा लौड़ा और् नीलारानी की ’चप्प-चप्प’ करती चूत सारी ताकत् लगाकर एक-दूसरे के चिथड़े उड़ाने को पिल पड़े हैं. मेरे लौड़े की नसें अब थिरकने लगी थीं और् उधर नीला की चूत कीचड़ में सनी चिड़िया की मानिन्द ’फुर-फुर’ उड़ रही थी. बिजली अब गिरने ही वाली थी. तब उस पल अचानक मैने पाया कि एक-दो-तीन -चार्-पांच्...की थिरक और चमक के साथ लगातार् बिजलियां चमकीं और् मेरा चरम पर पहुंचा लौड़ा अपनी नीला प्यारी की चूत में मादकता के रस के साथ मूसलाधार बरस पड़ा. उधर नीला की चूत उस थिरकन को समेटती लगतार अपने को सिकोड़ती और् कसती जा रही थी. स्वर्गिक सुख् मे नहला देने वाली इस बारिश की हर बून्द को नीलारानी जैसे अपने अंदर समेत कर् चूत की तिजोरी मे भर लेना चाहती थी.उस वक्त नीला और् मैं उत्तेजना के शिखर पर सवार होकर एक दूसरे की बांहों में कसकर गुंथे हुए एक दूसरे के होठों पर चुम्बनों की झड़ी लगाते खुशी से चीख् रहे थे -"आह् कितना मजा आ रह है. मेरे राजा...मेरी रानी आओ मुझमें समा जाओ....तुम् कितनी अच्छी हो..तुम् कितने प्यारे हो...आह्, का..स्स्..श्..हम जनम भर इस्सी हालत् में रहे आएं..आह्,..ये पल कभी न भूलेगा मेरे प्यारे...मेरी प्यारी, तुम्हारी चूत का ये मजा मेरे लंड् में हमेशा समाया रहेगा,...आह् मेरी रानी"...वगैरह.
हम दोनों पर एक अजीब किस्म की मादक बेहोशी तारी होती चली जा रही थी. हम दोनों एक दूसरे को झिंझोड़ते हुए सारे बदन पर् चुंबनोंकी झड़ी लगए जा रहे थे.
"आह् मेरे प्यारे, मेरे राजा प्रियहरि,आज् मैं बहुत खुश हूं"-नीलांजना बुदबुदा रही थी.
""मेरी प्यारी नीला, मेरी रानी, आज तुम्हारी चूत ने जो सुख दिया है उसे मै कभी नहीं भुला सकता. चोदने का ऐसा मजा फिर न जाने कब मिलेगा?"

मेरी और नीलांजना की मुंडियां एक-दूजे की जांघों की संधि को लील रही थीं. नीला के होठों के बीच् मेरा नन्हा जिगर खेल रहा था. मेरे होठ बड़ी बेताबी से नीला की गुलाबी चूत को "चप्प-चप्प" की पुरजोर आवाज करते चूमे जा रहे थे.
बाथ् के टब् से साबुन का झाग् बहाकर् नीलांजना और् मै वैसी ही अवस्था में शावर के तले बैठे हुए थे. शावर की तेज धार् ठीक नीला की चूत और् मेरे लंड पर गिर रही थी. यह भी एक अनोखा शमा था. मै और् नीला दोनों तेज धार् की मार से सनसनाती चूत और् थिरकते हुए लौड़े का नज़ारा मुग्ध होकर देख रहे थे. खुशी न समाई पड़ती तो बीच्-बीच् में हम्-दोनो लिपट पड़ते थे. नीला अपनी गुलाबी चूत के दोनों होटों पर् प्यार से उंगलियां फिरा रही थी कि अचानक मेरा लंड उसके हाथ् में आ गया. नीला ने देखा कि यह क्या? मेरा लंड उसकी छुअन भर से अपने बम्म लाल मुंड के साथ् फिर् उठ खड़ा हुआ है.
"हाय, मैं मर् गयी. ये तो फिर् खड़ा हो गया !" नीला ने उसे घूरकर देखा. अपनी दो उंगलियों से उसपर प्यार् की चपत जड़ते हुए नीलांजना यह कहती तुरंत भागी कि "बस् करो बाबा, अभी नहीं."
मेरे मन में चाहत जागी कि नीला को दबोच् लूं और् फिर् चढ़ जाऊं, लेकिन् मैं बस् उसे भागती देखता रहा. मैने सोचा कि अभी तो सारा दिन और् सारी रात बाकी है. नीला से अगली मुठभेड़ की नई तरकीब पर दिमाग दौड़ाता मै यानी प्रियम नहाने का मजा लेता रहा.



सुबह का प्रोग्राम् निबटाकर नीला और् मैं शानदार कपडों में सज-धजकर होटल से सज्जनों की तरह बाहर निकले. तब कोई अन्दाजा भी न लगा सकता था कि इन सज्जन और् सज्जनी की चूत् और् लंड ने खूब भिडकर सुबह-सुबह ही एक् दूसरे के चिथडे उडा डाले हैं. नीलारानी और् मेरे बीच् से समय गायब होता हुआ हम दोनों को स्वर्ग की सैर् करा चुका था.
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दोपहर का खाना नीला और् मैने बाहर ही खाया. चारमीनार और् सालारजंग म्यूजियम की सैर् करते-करते शाम ढलने लगी थी. सामने बाग में हम लोग थककर आराम से बैठे हुए थे. नीलांजना का खूबसूरत गुलाबी चेहरा पीछे मेरी पीठ से सटा कन्धे पर टिका हुआ था. वह अधनींदी सी थी. सुबह की चुदाई अब् भी नीला के दिमाग में सुरसुरा रही थी.
वह बोली - माइ डियर प्रिय, मुझको ख्वाब में भी इतना अंदाजा नहीं था कि तुम मुझको इतना प्यार दोगे.
नीलांजना के सिर पर प्यार से हाथ् फेरते हुए उसके बालों की लट से खेलते मैने कहा -" मेरी प्यारी नीला, वह तो मैने सुबह-सुबह् तुम्हारे बर्थ् डे की शुभ-कामना दी थी. वह इस बात की सजा भी थी कि तुमने नहीं बताया था कि आज तुम्हारा जन्म-दिन् भी है."
" चालाक. पर तुमने कैसे जाना कि आज मेरा जन्मदिन है ?-"नीला बोली.
" बस जान लिया. जिसे पाने मेरा दिल बरसों से बेकरार था उस प्रिया का जन्मदिन मुझे भला क्यों न याद रहेगा ?
" प्रिय, आप बडे वैसे हैं. ठीक है कि तुम्हारी सुबह की सजा भी प्यारी थी. लेकिन् आप मेरा उपहार अब् कब् दोगे ?" - नीला ने मुस्कुरा कर कहा.
’ हां, वह तो अभी बाकी है.चलो शापिंग करें. मेरी रानी जो चाहेगी वह आज मैं दूंगा."
" नहीं, मुझे कुछ भी नहीं चाहिये. तुम ही तो हो जो मेरी कद्र करते हो. सुबह सुबह तुमने जो गिफ़्ट दी है उससे ज्यादा कीमती गिफ्ट बहला मरे लिये और् क्या होगी ?" नीलांजना ने मेरी नाक की नोक को चिमटते हुए हौले से खींचा. नीला का चेहरा सुबह की याद से लजाता लाल हो रहा था और् होठों पर् दबी मुस्कान तैर् रही थी.
बाज़ार में हमने कुछ्-कुछ् सामान खरीदा. डिपार्टमेन्टल स्टोर में शापिंग करते वक्त मैं और् नीला अपनी पसन्द का सामान ढूंढते कुछ समय के लिये अलग् हुए थे. सच् तो यह है कि मै नीला के लिये चुपचाप उपहार खरीद कर रात में उसे चौंकाना चाहता था. लौटते लौटते मैने रंग बिरंगे फूलों से भरी एक पूरी बास्केट खरीद नीला की नज़रों से परे छिपा रखी थी. हमें लौटते हुए रात हो चली थी. तरोताजा होते बातें करते कुछ् समय बिताने के बाद हमने खाना मंगाया और् खाना खाकर गर्म काफी का एक्-एक् प्याला लिया.
मैं और् नीला साथ्- साथ् सोफे पर् बैठे थे. हमारी आंखें आपस में उलझ रही थीं. नींद की खुमारी आंखों में थी, लेकिन् नींद नहीं थी. नीला के कपोलों को अपनी हथेलियों में थामकर् उसके कानों पर् अपने होठ् टिका मैने उसे जन्म-रात की बधाई दी. नीला मेरी बाहों में झुक आई थी. नीला की चिबुक को थाम मैने उसका मुखडा ऊपर किया और् प्यार से निहारते हुए नीला के गुलाबी होठों पर् अपने होठ् भिडा दिये. एक दूसरे के होठों को चबाने, निगलने, और् लील जाने की होड् ने हम दोनों को बेहाल और् बेकाबू कर रखा था.
नीला ने मुझे देखा और् कहा कि सुबह ही आप ने मेरे पैरों की सारी नसें झिंझोड डाली हैं. अब तो परेशान नहीं करना है ना.ऽऽ ? उसने कहा - " चलो अब सो जाते हैं.सुबह तैयार होकर मुझे लौटना भी है ना."
" तुम भी यार नीलारानी, अभी रात पडी है और् तुम्हें सुबह की चिन्ता सताने लगी."
" तो ? तुम्हीं बताओ ?" नीलांजना बोली.
मैने अपनी प्रिया के जन्मदिन पर खरीदी रेशमी साडी, ब्लाउज़, ब्रा और् पेटीकोट का पैकेट उसकी ओर बढाते हुए कहा - " आज देखूं तो मेरी पसन्द के कपडों में मेरी प्यारी-प्यारी नीलान्जना रानी कैसी लगती है ?"
ओ के. बाबा ओ के. तुम्हारी खुशी के लिये सज लेती हूं.
नीलान्जना को सजने में आधा घन्टे का समय गुजर चला था. फिर उसकी आवाज की घन्टी खनकी.
" प्रियम, ज़रा आइये ना प्लीज़."

नीलांजना की खूबसूरती उन कपडों में गजब ढा रही थी. कमरे की दोनों तरफ की दीवारों में टंगे आईनों में नीला की सुन्दरता साक्षात वीनस की पेन्टिंग की तरह जडी थी.
" ज़रा इस ब्रा का हुक तो लगाना प्लीज़. मुझसे लग नहीं रहा है."
नीला की पीठ के पीछे खडा सामने आइने में उसे निहारते मैने जवाब दिया -" भला इस ब्रा बेचारी को क्या मालूम कि उसकी मालकिन् का कीमती सामान उसमें समायेगा भी कि नहीं ?"
ब्रा के हुकों को हाथ् में थामे ही मेरी हथेलियां नीला की जबरदस्त गोलाइयों पर् जम गई थीं. मेरी अंगुलियों उनकी संगमरमरी चिकनाई पर फिसलने लगी थीं.
नीला नाराज हो रही थी या उसका दिखावा कर रही थी, यह मुझे नहीं मालूम.
" ओफ् ओह , आह. नो प्लीज़. नईं ना. जो काम कहा वह करो ना..."
मैने अपनी प्रिया की उन प्यारी-प्यारी गोलाइयों को उसकी चाहत के अनुसार कस दिया था. नीला अब मेरी ओर पलटी और् कहा -
" अब बताइये मैं कैसी लग रही हूं ?"
नीला को देखने मैं कुछ परे हटा. आसमानी साडी में दमकता नीला का चेहरा पूनम के चांद की तरह खिल उठा था. बारीक तराशे होटों पर गुलाब का रंग लिपस्टिक की शक्ल में ताजगी भर रहा था. बहुरंगी किनारियों में सजा साडी का नीला रंग् मानो झाडियों में अटका बादल था. नीला की सहज खूबसूरत भौहों पर आई-ब्रो पेन्सिल के धार नीला की आंखों को इन्द्रधनुषी छ्टा दे रही थी. हरिणी सी खूबसूरत आंखों की चमक इस सज्जा से और् बढ् गई थी. मेरी नीलांजना की सुंदरता अपने नाम को सार्थक् करती इस वक्त मेरे सामने खडी थी. नीला के रूप से चुंधियाती सनसनी मेरी नजरों से बिजली की तरह कडकडाती मेरी टांगों के बीच गिरी पड रही थी . वह सनसनी खलबली मचाती और अंगडाई लेती हुई अपनी नीला रानी के स्वागत में खडी हो रही थी..
" आह क्या बात है ? गजब ढा रही हो. मेरी प्यारी नीला इस वक्त सुहागरात के लिये तैयार बैठी नई नवेली दुलन की तरह तैयार नज़र आ रही है." - मैने शरारत से कहा.
" धत्त. आप बडे बेशरम हैं. मुझे लाज आ रही है. वह रस्म तो आप ने बेताब होकर सुबह ही पूरी कर ली है."- वह बोली. नीलारानी की सुस्ती अब प्यार की अंगडाई में तब्दील हो चली थी. उसकी लाडली भी अब फुरक-फुरक कर नाचने लगी थी.
नीला की चिबुक को अपनी हथेली में थाम मैने उस प्यारी मूरत का प्यारा चेहरा ऊपर उठाया.नीलांजना की आंखों में आंखें डाल उसके कानों में मेरे होठों ने हौले से कहा -" मेरी प्यारी, वह् तो सुहाग-दिन का तोहफा था. सुहाग की रात तो अब लेकर यह मेरी आसमानी परी उतरी है."
नीलांजना का मुखडा मेरी छाती में समा गया. उसने कहा - " अब् मेरी शामत आई. तुम्हारे इरादे खतरनाक हैं."
नीला की उंगलियां मेरे पैन्ट में समाई अपनी चाहत के लौड़े पर फिर रही थीं. बार-बार उन्हें होठों पर लाती नीलारानी सिहर्-सिहर् कर् चूम रही थी.
" हाय रे क्या करूं ?" - लौड़े को मुटठी में तौलती नीला बोली
" चाहती हूं फौरन इस प्यारे को लपक कर खा जाऊं फिर् भले क्यों न यह मेरी चूत को फाड-फाडकर मिटा डाले. तुम्हारी नीला तुमसे कभी अलग नहीं हो सकती. लेकिन मेरे पांव ! हाय इनका मैं क्या करूं ? सुबह तुमने निचोडकर इन्हे थका डाला है. बहुत दुख् रहे हैं ? इनका कुछ् इलाज करो प्लीज़"
वह भी हो जाएगा. इलाज है मेरी रानी. बस् तुम् इंतजार करो. मुझे भी तैयार हो जाने दो." मैने नीला की चुम्मी लेते हुए प्यार से कहा.

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मुझे अपने और् कमरे को तैयार करने में थोडा समय लग गया. नीला मुझे पुकार् रही थी.
" जल्दी आओ प्लीज़. और् कितनी देर लगेगी.मैं यहां बोर हो रही हूं."
रात के झक्क झीने सफेद् कपडों में मैं बाहर निकला. नीला ने दिलचस्पी से देखा. बोली -
" वाव् यू आर् लुकिंग् क्यूट . वेरी हैन्डसम. जी करता है तुम्हें...." वह् चुप हो गई.
"क्या ? बोलो भी ना " - मैने कहा.
"कुछ् नहीं. अब् और् रहा नहीं जाता. मुझे बिस्तर पर ले चलो. मेरे पांवों का इलाज कब करोगे."
नीला को अपनी बांहों में उठा मैने कमरे में सजा;ए बैड पर् लाकर पटक दिया. बिस्तर् मेरे सजाये गुलाब, चमेली, रातरानी, सेवंती, और् नरगिस के फूलों से सजा महक रहा था. फूलों से सजी लडियां मसहरी की डंडियों पर झालर बनाती झूल रही थीं. कमरे के एक कोने में सजे लैम्प की आसमानी छटा वली झीनी-झीनी दूधिया रौशनी अपनी मादक
छटा बिखेर रही थी. बाकी बत्तियां मैने गुल कर् दी थीं.
" यह होटल का कमरा है या चमन् का बाग? ओह् मेरे राजा यू आर ग्रेट्. अब समझ आया कि तुम्हें इतनी देर क्यों लग रही थी?" - नीला बोली.
महकते सेज पर नीलांजना घुटने मोडे लेटी थी. मैं उसके पायताने बैठा था. नीला की हथेलियों को खोल पन्जे से पन्जे भिडाता उसके खूबसूरत बदन पर मैं झुक चला था. चेहरे पर् लहराते चेहरों में आंखें एक-दूसरे में डूब गई थीं.
" अब ?"- नीला ने बेहोश आवाज में सवाल किया.
नीलांजना की आंखों की दोनो पलकों से गुजरते मेरे होंठ् उसके अधरों पर् जाकर थम् गये और् फिर् उठते-गिरते जोर-जोर की आवाज के सथ् नीला के होटों पर चुम्बनों की ऐसी बेताब् झडी लगी कि उसकी समूची काया लहरों की मानिन्द हिलोरें लेने लगी.
" मेरी प्यारी रानी, अब् तुम् ही नहीं मैं भी तुम्हारा बीमार हो चला हूं. चलो अब् हम एक-दूसरे का इलाज शुरू करें. सब् से पहले मुझे अपनी प्यारी नीला के पैरों की थकावट् भगानी है."
पलंग के पायताने नीचे रखी शीशी से भरपूर तेल् हथेलियों पर उलेडते मैने मालिश् शुरू की. सब से पहले तलवे, फिर उंगलियों की पोरें, पिंडलियां, जंघाएं और् आगे? मेरी तेल्-भीगी अंगुलियां वहां पहुंची जहां नीला की चिकनी कोमल् जंघाओं की संधि-रेखा थी. हां घाघरा पलटता चला गया था और् अब् मेरे सामने भूरे-भूरे घुंघराले केशों के बीच् की वही गहरी रेखा थी. पहले प्यार भरी हल्की-हल्की थपकियों से मैने उसे पुचकारते हुए दिलासा दिया. अपनी उंगलियों को तेल् में फिर् से भिगा तब मैने अंदर सोई रानी को जगाने उसकी उभरी पलकों और् बीच की दरार को चिकनाना शुरू किया. बीच-बीच में अगल और बगल की जंघाओं पर मै यूं थपकी देता जा रहा था जैसे रंगमहल के पट् खोलने के लिये दस्तक दी जा रही हो. असर होने लगा था. झांटों की लंबी भूरी रेखा की चिलमन से गुलाबी कली की तरह अंदर छिपी रानी ने चुपके-चुपके झांकना शुरू कर दिया था. उसकी गुलाबी शिरायें लपलपा रही थीं. वह अब् पिघल रही थी. ऊपर से कूकर के भाप की मानिन्द सीटी सिसक रही थी और् नीचे नीला की छोटी रानी बार-बार जीभ् की फुनगी दिखाती और् छिपाती लार टपकाने लगी थी.
झुरमुटों के बीच दरारों से झांकती नीला की वह बेताब् जीभ इशारे कर रही थी -" आओ ना, यही तो मुकम्मल वक्त है राजा. अब जीभ से जीभ टकराने भी दो यार. मैं खुद पुकार रही हूं तो तुम् क्यों शरमा रहे हो."
अब् मेरी जीभ की फुनगी नीला की छोटीरानी की जीभ् को ठोकर देती और् लेती मजे ले-लेकर खेल रही थी. अपनी रानी का मूड भांपकर उसकी पहरेदार बनी जांघें अपनी अकड और् जकड छोडकर फैलती और् ढीली होकर दूर-दूर पसरती जा रही थीं. नीला के मुंह् से "आह-आह" के साथ मीठी-मीठी सिसकारी की धुन् लगातार् बज रही थी. उसका समूचा बदन बेकाबू होकर लहरें लेता इस और् उस करवट हिचकोले खाने लगा था. हम दोनों के कपडे बंधन तोडकर बिखर चले थे. नीला की छोटी रानी से मिलने को बेताब मेरा राजा तन-तनकर उछ्ल-कूद रहा था. वह चीख रहा था कि रानी ने जब पट खोल दिये हैं तो मेरी जीभ् क्यों दरवाजा रोके अडी हुई है. मैं उसे समझाता चला आ रहा था कि मेरे प्यारे लौड़े राजा, तुम्हारे लिये ही तो इतनी तैयारी मैं कर रहा हूं. बस दो मिनट धीरज धरो फिर् तो बेताब रानी खुद तुमसे यूं भकाभक चुदने वाली है कि खुशी से चीखती उछ्ल-उछ्लकर हवा में उडती वह् छत से टकराने लगेगी.
मैने अपने लौड़े की बात समझने में भले देर कर दी थी लेकिन् नीला के कानों ने जरूर उसकी पुकार सुन् ली होगी. नीला अचानक चील की तरह झपटी. अपनी हथेलियों से मेरी हथेलियों के पंजे फ्ंसाकर जोर के झटके से वह मुझपर आ झुकी. बावली होती नीला ने अपने होंठ् मेरे होठों पर जमाकर समूचा का समूचा लील डाला और् खूब बेरहमी से उन्हें चबाती चली गई. मेरे हाथों को थामकर नीला ने वहां टिका दिया जहां उसकी दूधिया गुलाबी छातियों के पहाड पर चोंच् उठाई चूचियां पकी हुई खूबसूरत चेरियों की तरह चमक रही थीं. नीलारानी का बदन प्यार की शराब के नशे में मचल रहा था. वह् और् नीचे झुकी और् लप्प से लपकती मेरे लौड़े को अपने गले तक ठूंस गई. हत्टे-कत्टे लौड़े राजा को चुप् करती नीला ने उसकी बोलती बंद् कर दी थी. उधर चप्पऽ-चप्पऽ करती वह् रूठे लौड़े को चूमती और् होठों में निगलती-उगलती, दुलार करती मना रही थी और इधर मैं नीलारानी की उन छातियों से खेल रहा था जो फूल-फूल कर तनी हुईं मेरी हथेलियों के इन्तिज़ार में मचल रही थीं. उनकी शिकायत दूर करने मेरी तेल-सनी हथेलियां किसी मंजे खिलाडी की तरह उनपर फिसल रही थीं. कहना मुश्किल है कि वह वह् अपनी चूतरानी के प्यारे भुजंग लौड़े को देख्-देख् कर् पागल हुए जा रहे नीला के अंदर की दीवानगी थी या फिर रतिरानी के पहाड् पर् चिकनाई में फिसलती और् भूरी बेरियों को चिमटती गुदगुदाती मेरी हथेलियों का कमाल था जिसका असर मेरी गोरी नीला के मुंह् से आहों और् सिसकारियों में निकला पड रहा था.
न तो अब मुझसे रहा जा रहा था और् न मेरी प्यारी नीला से. दोनो ही अब् अपने अंदर् के कामदेव और रति की उस आखिरी भिडंत के लिये अधीर थे. नीला की चूत तैयार होकर अब् इस मूड में आ चली थी कि लौड़े की मार से खूब चुदवा-चुदवा कर्, छकछक कर, बिना उफ् किये अपने चिथडे उडवाती हुई जनम् भर के लिये प्यास बुझाकर् अपने को मिटा डाले. इधर मेरा लौड़ा भी नीला की उछाल मारती चूत को चोद-चोदकर बेहाल् कर देने के लिये बेताब हो रहा था. वह् नीला की चूत पर टूटकर बैल् की तरह सींग मारता आज इस तरह भिड जाने बेकरार था कि चूत के साथ उस भिडंत में अपनी प्यारी नीला चूत को छितरा-छितरा कर् यूं लहूलुहान कर डाले कि नीला उसे जनम भर न भूल पाये. वह ऐसी यादगार भिडंत चाहता था जिसमें फटकर् छितरा चली नीलारानी की लहू-लुहान् चूत और् चूत की टक्कर से छिल-छिलकर घायल पडा उसका यह भयानक लंड् एक-दूसरे पर् फिदा होते गले मिलकर आखिर में "आह् क्या बात थी मेरे यार में" और् "वाह्-वाह् क्या मजा आया" कहते फिर् मिलने के लिये जुदा हों.
आखिर वह घडी आई. नीलांजना का हाथ बेताब होकर् मेरे उस कठोर अस्तित्व को अपनी मुत्ठी में थामकर खींचने लगा था जो उसकी जांघों के बीच् में छिपी कोमलता को भेदकर अंदर समाये रस के झरने को खोलकर बहा दे. दूसरे हाथ् से मेरे सिर को दबाती वह इस तरह झुकाये जा रही थी कि वह् नीला की चूचियों से टकराता - चूसता उसके होठों पर जा टिका था. नीला और् मेरे बदन की जमीन भूचाल से लहरा रही थी. तैय्यारी का यह मुकम्मल मुकाम था. नीलान्जना अब् अपने को संभाल नहीं पा रही थी. मैने जायजा लिया तो पाया कि नीला की जांघों का पठार उस्की सुरंग के झरने से गीला हो रहा था.
" देर मत करो प्लीज़. आओ. मै मरी जा रही हूं." - उसने कहा.

तूफान से पहले पलभर के लिये मैं शान्त होना चाहता था. जल्दबाजी से काम बिगडता हैयह मुझे मालूम था. पलंग के नीचे ही मैने गुलाबजल में घुला शहद फूलों का जूस, और् शैम्पेन् की बोतल् छिपा रखी थी. अपने और् नीला को शैम्पेन से नहलाते और् पीते-पिलाते मैने उसके कान् की लवों को अपने होठों मे चुइंगम की तरह चबाते उसके जन्मदिन की मुबारकबाद दी. यह कामना की कि प्यारी नीलारानी और् मेरे बीच की यह शानदार रात हमारी जिन्दगी की अविस्मरणीय रात बनकर रह जाये.
नीलांजना के बदन पर फूलों का रस और् शहद सींचने के बाद मैने सर से पांव तक उसे वैसी बदहवासी से चाटना शुरू किया कि जैसे भूखा जानवर पत्तल का हरएक कोना चाट कर साफ कर दिया करता है.नीला से चिपका मेरा बदन भी शैम्पेन , फूलों की सुगंध् और् इत्र की महक् से महमहा रहा था. खुशी से पागल हुई जा रही नीलांजना का हर अंग मचलता हुआ मछली की तरह उछ्ला पड रहा था. ऐसी खुशी न उसने कभी पाई थी और न कभी आगे पा सकने की उम्मीद उसे थी. उसके लिये रुकना मुश्किल हो रहा था. मेरी हथेलियों में अपने पन्जे नीला ने खूब कसकर् फंसा लिये और् इससे पहले कि उसके इरादे मैं भांप पाता एक झटके के वार से उसने मुझे चित्त किया और मौज में आई शेरनी की तरह मुझ पर चढ् बैठी. उसके इरादे जबरदस्त थे.मेरे समूचे बदन को उसकी जीभ् लपक्-लपक कर चाटती रही. जांघों के बीच् पहुंचकर मेरे उस अंग पर लपा-लप्प जीभ फिराती गप्प से लील गई जो खुद नीला को लीलने की चाहत में नब्बे से एक सौ बीस अंश् का कोण बनाता ठन्ना रहा था. मेरे लंब की सुपारी को नीला अपने होठों से निचोडती बार-बार निगल और् खींच रही थी. मेरा लौड़ा नीला के होठों के बीच मगन् हो खेल रहा था. नीला उसे उस सुख् में पहुंचा रही थी जो जिन्दगी में दुर्लभ था. गुदगुदी की मौज में आहें भरता मेरा दिल पागल होता चीख रहा था -" हाय मेरी रानी, हाय-हाय नीला प्यारी तुम आज क्या गजब ढाने जा रही हो. इससे पहले कि मैं तुम्हें खलास करूं कहीं तुम ही न मुझे खलास कर दो."
नीला की ओर ढलता मेरा बदन बेकाबू हुआ जा रहा था. नीला को झटककर् उसी की शैली में ही मैने उसके बदन को उलताकर चित्त किया और् नीला के पन्जों मे पन्जे फंसाये उसकी जांघों के बीच सवार हो गया. नीला भी जोश में आ गई थी. खेल्-खेल् में अब होड इस बात की मच गई कि हम दोनो के बीच कौन जीतने जा रहा है ? उसकी चूत हमलावर होकर् मेरे लौड़े पर् पहले सवार होगी या मेरा लौड़ा नीला की चूत पर् कब्जा करके पहले वार करेगा ? हम दोनों झूला झूलने और् झुलाने का खेल खेल रहे थे. कभी नीलारानी मुझे उलटती मुझपर सवार होती झिंझोड जाती और कभी मैं उसे उलटकर चूत को रगड जाता.यह वह प्यारा काम-युद्ध था जहां ताकत से हारने की नहीं नजाकत की अदा से एक-दूसरे को जीतने की होड लगी थी. प्रतिरोध का सवाल ही नहीं था. हारता चाहे कोई भी जीत दोनों की होनी थी. खेल इस् कदर बढा कि हमने उन बेशकीमती कपडों के चीथडे बना दिये जो शुरुआत में बदन को सजा रहे थे. रंग बिरंगी चिन्दियों से फूलों का बिस्तर
और् ज्यादा सज रहा था.
नीला बदहवाश् हो हांफने लगी थी. इस बार जो मैने झटके से उसे उलटा तो उछलकर उसका लहंगा भी कमर पर् जा टिका. नीला की पिन्डलियों पर् मेरी जकड मजबूत थी.
" आप जीत गये. मैं हार गई." मदमाती आंखों से मुस्कुराती नीला ने लम्बी सांस भरते हुए कहा.
मैने प्यार से नीलारानी के होठों की चुम्मी ली. उसकी जान्घों पर् प्यार की थपकियां दीं. मुंह नीचे झुका और् फिर् मेरे होठों से लपकती जीभ् कोमलता से चूसती, चबाती, ठेलती हुई नीला की गुलाबी चूत से खेल रही थी. उसकी जंघाओं को पसारते हुए मैने धीमी आवाज़ में कहा - " घुसेड दूं ?"
कुछ् कहने की बजाय नीला के हाथ् आगे बढे, ठन्नाए लौड़े को कसकर मुत्ठी में समेटा और् खींचकर अपनी चूतरानी के मुहाने पर ला टिकाया.
" क्या चोदने के बाद पूछोगे कि घुसेड दूं ? मेरे प्यारे राजा, आओ. मैं तैयार हूं. आधी जंग तो तुम् जीत चुके. अब देखूं कि आगे कौन् किसको जीतता है." - नीलांजना ने मदमाती आंखों से मुझे निगलते हुए कहा और् झटककर मुझे अपने ऊपर खींच् लिया.







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FUN-MAZA-MASTI शर्मीली नीलान्जना--1

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शर्मीली नीलान्जना--1


 मेरी सहयोगियों में नीलान्जना मुझे सब से प्यारी लगती थी.नीलान्जना शर्मीली और गम्भीर किस्म की थी, इसलिये हर-एक से घुलना-मिलना उसके स्वभाव मे नहीं था. एक मै ही था जिससे उसके सहज और आत्मीय संबंध थे. जब भी हम आमने-सामने होते हमारी आंखें बरबस टकरातीं और एक-दूसरे में समा जाती थीं. दिल की बातें सामने करने में हम दोनो मे संकोच था लेकिन जब भी मौका मिलता मैं उसे फोन कर लेता था. खासकर छुत्टी के दिनों में जब ला‌इन साफ मिलती और वह अकेली होती थी तो बातें यूं होतीं कि फोन पर ही हम दोनों एक-दूसरे से लिपट पड़ते थे. नीलांजना साफ गोरे रंग की थी. बदन छरहरा था और हर रंग उसका जैसे खूबसूरती के सांचे में ढला हु‌आ था. उसका खूबसूरत चौकोर चेहरा यूं नक्काशीदार था, जैसे अमेरिका में लिबर्टी की प्रतिमा दिखा‌ई पड़ती है. उसके चेहरे को मै देखता तो देखता ही रह जाता था. नीलान्जना की हिरणी सी कंटीली आंखों में भरपूर आकर्षण था. आंखों की गहरी काली पुतलियां ऐसीं कि हजारों में एक थीं.
उन पुतलियों में मेरी आंखें यूं डूब जातीं कि दिल वहीं खोकर रह जाता था. केश इतने लंबे, घने और काले कि दिल को बांधकर गुलाम बना लेते थे. सारी खूबसूरती और जादु‌ई आकर्षण के बावजूद चंचलता और छिछोरापन उसे छू तक नहीं गया था. घमंड और नखरा उसमें कत‌ई कभी किसी ने नहीं देखा. दो-चार बार मौका मिला भी तो हाथों या पांवों के जाने-बूझे, लेकिन अनजाने सी छु‌अन से शुरू करके कोने-कानों में लिपट पड़ने और एक-दूसरे के होठों में गुंथकर हमें बेचैन कर जाने वाले चुम्बनों से आगे बात नहीं पहुंच सकी. ऐसे मौकों पर मेरा सारा प्यार मेरे रबर के खिलौने में समाकर उसे यूं तन्ना देता कि वह फौरन प्यारी नीलान्जना के बदन को पेलता उसकी गुलाबी सुराख में घुस पड़ने को बैचैन हो जाता था. नीलान्जना उस प्यारे दबाव को महसूस करती मदहोशी के आलम में पहुंच जाती थी. माहौल यूं बनता कि लिपटकर एक-दूसरे के साथ प्यार की पटका-पटकी करते हु‌ए फौरन सारी प्यास बुझा डालने के लिये जी मचलने लगता था. ऐसे वक्त मेरा एक हाथ नीलान्जना की कमर को घेरे हु‌ए नितंब पर हथेलियों की जकड़ के साथ उसे अपनी ओर खींचता था और दूसरा हाथ उसके सर पर बालों को प्यार से सहलाता अपनी प्यारी के सुरंग को सुलगाता था. तब हम दोनों की छातियां चिपकी पड़तीं और होठ आपस में गुंथ जाते थे. ऐसे में सब के बीच किसी के द्वारा पकड़ लिये जाने का डर नीलांजना में यूं समाता कि-" छोड़िये, जाने दीजिये प्लीज़...को‌ई आ जा‌एगा.." कहती मजबूरी में वह भाग निकलती. बाद में उत्तेजना से एक-दूसरे के तप चले चेहरों को आहें भरते हम देख-देख पछताते कि काश, वह हो पाता जो हम चहते थे.
एक दूजे के लिये तरसते दिलों को प्यास बुझाने का मौका तब मिला, जब नीलांजना को ट्रेनिंग के लिये हैदराबाद जाना पड़ा. मैने उससे उससे कहा था कि छुत्टियां मिलते ही मैं वहां आकर उससे मिलूंगा. उसके जाने के बाद फोन पर तो उससे बातें होती थीं लेकिन दो ह्फ्ते यूं ही परेशानियों मे गुजर गये. तीसरे सप्ताह मुझसे रहा न गया और आखिर मैं प्यारी नीलांजना के पास पहुंच ही गया. मैने ठान लिया था कि अब की बार मौका नहीं चूकना है.यह सोच लिया था कि नीलांजना की देह के हर कोने से गुजरता मैं उसे यूं सुख पहुंचा‌उंगा कि उसका हर पल नवविवाहिता की सुहागरात बन जाये.
***
फ़रवरी महीने का वह रविवार था. किसी रिश्तेदार के यहां जाने के बहाने वह लड़कियों के अपने हास्टल से अनुमति लेकर सुबह-सुबह ही निकल आ‌ई थी. उसे स्टेशन में ही मैने अपनी प्रतीक्षा करता पाया. उसका चेहरा खिल उठा था.उस भोर में भी नीलांजना बगैर साजो-सज्जा के ही आपनी सादगी मे प्यारी लग रही थी. हम दोनों एक शानदार होटल मे जाकर ठहरे जो शहर की भीड़भाड़ से दूर एक मनोरम स्थान पर था.
बैठक के अलग हिस्से के साथ हमारा कमरा काफी बडा था.कमरे में एक साफ-सुथरा डबल-बैड सजा हु‌आ था, जिसके सिरहाने और पायताने में आ‌ईना लगा था. उसके एक कोने पर नक्काशीदार आ‌इने वाला ड्रेसिंग-टेबिल था.बैठक के एक हिस्से की तस्वीर उसमें दिखा‌ई पड़ रही थी.बैठक चिकने हत्थोंवाले आरामदायक सोफ़ों से सजा था. बैठक और कमरे के बीच कोरीडोर में अन्दर की ओर खूबसूरत बाथ-टब के साथ विशाल स्नानघर था.नीलांजना की तबीयत कमरे को देखते ही खुश हो ग‌ई थी. मुझसे लिपटकर चूमते हु‌ए उसने अपनी खुशी का इजहार किया था -"वाह, सचमुच तुम्हारी पसंद काबिले-तारीफ़ है."
अपना सामान रख हमने राहत की सांस ली. एक-दूसरे का हालचाल पूछते -जानते शिकवे-शिकायतों के बीच आधा घंटा गुजर चला था. चाय और हल्के स्नैक्स लेने के बाद अब आराम का मूड था. नहा सकने का मौका सुबह-सुबह न नीलांजना को मिल सका था और न मुझे. तय यह हु‌आ कि पहले नहा-धोकर फ़्रैश हो लिया जाये और उसके बाद दिन भर इस अजनबी शहर में बेखौफ़ बाहों मे बाहें डाले सैर-सपाटा करते हम मौज मना‌एंगे. नीलांजना को यह छूट थी कि वह चाहे तो एक-आध घन्टा आराम कर ले, लेकिन उसने मना कर दिया. नीलांजना कमरे में अपनी तैयारियां करती रही और मैं खुद को तैयार करने बैठक में निकल आया. दर-असल नहाने से पहले मैने बदन पर मालिश करने की आदत बना रखी थी. मैं उस वक्त निश्चिन्त सारे कपडे उतार देह की मालिश कर रहा था.

********
सारे बदन पर तेल मालिश कर चुकने के बाद एक कोना पकड़ मैं अपने प्यारे कोमलांग को भी तेल में भिगा‌ए मालिश कर रहा था. जड़ से गांठ तक मेरा वह कोमल पौरुष चिकना‌ई में डूबा हु‌आ था. आराम से लेटी अवस्था में भी वह नन्हा खासा फूला हु‌आ और साढ़े पांच इन्च की लंबा‌ई मे पसरा हु‌आ था. उसकी कोमलता में ही उसे तेल सनी मुत्ठियों से खींच-खींच कर पूरी लंबा‌ई को मालिश से पुष्ट कर रहा था. और तब अचानक दरवाजे पर नीलन्जना प्रकट होती थम ग‌ई थी. उसकी निगाह मुझ पर पड़ी थी. ठीक वहां, जहां मालिश से चमकता मेरा पौरुष लंबा‌ई मे भरा-पूरा खिंच-खिंचकर और बढ़ा जा रहा था. देखते हु‌ए भी जैसे मासूमियत के अभ्यासवश उसके मुंह से निकल पड़ा था -
" क्या कर रहे हैं? "
मेरा ध्यान तब नीलांजना की तरफ नहीं था. ध्यान तब गया जब नीलांजना के खूबसूरत चेहरे पर अचरज में फटी पड़ रही उसकी हरिणी की सी आंखों से मेरी आंखें जा टकरा‌ईं. नीलांजना ने लम्बी "आऽऽ...ह" के साथ " हायऽऽ रे..साऽरी" कहा और बाथरूम की ओर मुड़ ग‌ई. मालिश का पल मेरे लिये सामान्य दिनचर्या की शुरुवात थी इसलिये नीलांजना से मेरा चित्त उस वक्त हट चला था. वह तो उसकी "आ..ह" और "हाय रे..सारी" की मुद्रा थी, जिसने मेरे दिल के रास्ते मेरे कोमल पौरुष को अचानक अटेन्शन की मुद्रा में यूं खड़ा कर दिया जैसे किसी मिहमान का स्वागत करने को‌ई खड़ा हो जाता है. वह तुरन्त फूलकर और् ज्यादा लंबायमान होता ऐंठ चला था, मानो उसे तुरन्त लड़ा‌ई के मैदान में उतरना हो. तेल को सुखाने के लिहाज से उसे पुचकारता, खींचता, लंबायमान करता मैं तसल्ली दे रहा था -" मेरे प्यारे लंबजी, घबरा‌ओ मत. तुम्हारी प्यारी के लिये ही तो मैं तुम्हें तैयार कर रह हूं. तुम ही नहीं, वह भी तुमसे मिलने के लिये बेताब होगी.
उधर नीलांजना थी, जिसकी निगाहों में मेरा तेल से नहाया और फैलता कोमलांग यूं अटक चला था कि उसका मन उसे देखते और उससे खेलने की बेताबी से धड़ऽ-धड़ऽ धड़क रहा था. अचानक मुझे बाथरूम के दरवाजे की हल्की सी खटक सुन पड़ी. मेरी प्यारी लिबर्टी की मूरत नीलांजना की कंपती हु‌ई आवाज दरवाजे के बीच खनकी - " प्रियहरि, ज़रा सुनि‌ए ना प्लीज़."
अपनी अंडरवियर में छिपाता और खुद को व्यवस्थित करता मैं बाथरूम के दरवाजे पहुंचा.
" अपना टावेल लाना मैं भूल ग‌ई.कमरे से ला दो ना प्लीज़"- नीलांजना बोली. उसके केश भीगे हु‌ए थे और अपने पेटीकोट से उसने अपने स्तन छिपा रखे थे. नीलांजना के घुंघराले बालों पर पानी के छींटे मोतियों के समान चमक रहे थे. उसकी आंखों से मेरी आंखें टकरा‌ईं तो मैं पल भर उसे देखता ही रहा.
" जा‌ओ नाऽऽ..., क्या देखते हो"- वह बोली.
पलक झपकते ही मैं टावेल लेकर लौटा. इस बार फिर हम दोनों की आंखें मिलीं. न उसकी नज़रें मुझसे हट रही थीं और न मेरी उस पर से.
" क्या देख रहे हैं ?"
नीलन्जना के हाथों में टावेल सौंपते उसकी उंगलियों से मेरी उंगलियां उलझ चुकी थीं. उलझी उंगलियों को और उलझाते और प्यार से दबाते लेकिन नीलांजना के चेहरे से बग़ैर अपनी आंखें हटा‌ए मैने कहा -
"तुम्हें, जिसे देखने आंखें तरस ग‌ई थीं."
" यू फ़्लर्ट...चलिये हटि‌ए. आप भी ना...." कहती वह पलटने को हु‌ई. बाथरूम का दरवाजा वह बन्द करना चाहती थी, लेकिन उसकी उंगलियों में मेरी उंगलियां अब भी फंसी थीं".
" ए‌इ नीलांजना..,मुझे भी आने दो ना प्लीज़. क्या अच्छा हो गर हम साथ नहा‌एं."
" नहीं ना मुझे शरम आती है."- ठिठकी हु‌ई नीलांजना बोली. उसकी आवाज़ कांप रही थी.
"नीलांजना प्लीज़" कहते मेरे हाथों ने उसकी कमर को घेरते अपनी ओर झटका दिया और बांहों मे भरकर चिपटा लिया.
इस बार नीलांजना कुछ न कह सकी. वैसी ही अवस्था में हम दोनों बाथरूम में घुस चले थे. बाथरूम काफ़ी बड़ा और आधुनिक था. दीवारों में दायें और बायें, आगे और पीछे शीशे जड़े हु‌ए थे. ऊपर शावर टंगा था और नीचे भी एक हैन्ड शावर बाथटब के साथ अलग रखा था. मौज से नहाने की तैयारी में नीलांजना ने पूरा टब खुशबूदार लिक्विड सोप की झाग से भर रखा था.

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नीलांजना पलटी और् खड़े-खड़े ही मैने उसकी कमर् को अपनी बाहों में लिपटाकर् उसे अपनी छाती से चिपका लिया. नीलांजना का सिर् मेरी छाती में ध्ंसा था और् वह् भी मुझसे चिपकती मुझमें समाई पड़ रही थी. उसकी कमर से अपना एक् हाथ् हटाकर् मैने नीलान्जना के बालों को पीछे से पकडा. बालों को झटका देते मैने अपनी छाती से चिपका उसका चेहरा अलग करते हुए उठाया और् उसके होठों से अपने होठ भिड़ा दिये. एक्-दो-तीन्-चार्-पांच्-छ्:-सा
त्---.बार् बार् मेरे होठ् अलग् होते और् भिड़ते पूरी आवाज् के साथ् नीलांजना के होठों पर् टूटते रहे थे. चुंबनों की झड़ी से वह् बदहवास् हो चली थी. उसने भी मेरे सिर् का पिछ्ला भाग् थाम् लिया . बार् बार् अपनी ओर् खींचती मेरे होठों को अपने होठों मे निगलती नीलांजना मुझे दीवाना बना रही थी. कमर् के नीचे तनकर् लहराता हुआ मेरा रबर् का गुड्डा बड़ी बेताबी से अपनी प्यारी नीलांजना की बंद गुफा में पिल् पड़ने के लिये उसके दरवाजे पर् ठोकर् मार् रहा था.
नीलांजना ने अपनी बांहों से मेरी पीठ पर् दबाव दाते हुए कसकर् मुझे अपनी बाहों में समेट् लिया . मेरे कंधों पर् सिर् टिकाये वह् धीरे से बोली - मैं बताऊं......?"
मैने कहा- क्या?"
उसने शरमाते हुए कहा-" मैने आप् को पहले ही वहां देख् लिया था."
"कहां"- मैने पूछा?"
"धत्त, वहीं जब् आप् का वो तेल से भीग् रहा था. जी किया कि दौड़कर् थाम् लूं."

नीलांजना के गालों का चुम्मा लेते मैने कह-"आह् मेरी प्यारी तुम् आ क्यों नहीं गईं. बड़ा मजा आ जाता."
" धत्त. गई तो थी मैं. आप् ने समझा ही नहीं. मुझे शरम आ रही थी तो मैं अपने मुंह से कैसे कहती?"
" अच्छा तो अब् चलो. अपनी गुड्डी से कहो कि वह् नाराज़ न हो. उससे कह् दो कि तब् की नासमझी का जुर्माना ब्याज् सहित् जी भर कर् मुझसे वसूल् लेगी."
अपनी प्यारी उस नीलांजना रानी को हौले-हौले संभालते मैने बाथरूम के झाग् से भरे हुए टब में लिटा दिया. नीलांजना की पसरी हुई खूबसूरत् काया पर् मैं चिपककर् चढ़ बैठा था. नीलांजना को लपेटते हुए एक् हाथ् से झटके से अपनी ओर् मै खींच् रहा था. दूसरे हाथ् की उंगलियां साबुन् के झाग् की भरपूर् चिकनाई से नहाए हुए नीलांजना के गोरे-गोरे पुष्ट् स्तनों पर् फिसल्-फिसल् कर् गोलाई की तली से ऊपर् की ओर् बढ़तीं जोर्-जोर् से उन्हें मसले जा रही थीं. दूसरी तरफ् नीलांजना का एक् हाथ् मेरी पीठ् पर् मुलामियत् से फिसलता हुआ "और्-और्" चिपका लेने का संदेशा भेज् रहा था और् दूसरा हाथ् मेरे झाग् से सने हुए दंड को लीलने के लिये बड़ी बेताबी से थामकर् अपनी ओर् बार्-बार् खींच् रहा था.
मेरे होठों ने लपक कर् नीला के दायें कान् की लौ को दबोचा. बड़ी नजाकत् से उनसे खेलता और् उन्हें चूसता हुआ मैं नीलांजना की आन्खों को निहार् रहा था. हम् दोनों की निगाहें एक-दूसरे में डूबी हुई एक-दूजे को अब समूचा का समूचा लील् जाने की तबीयत् से मचल् रही थीं. नीलांजना उस वक्त मुझे संसार् की सब् से खूबसूरत् औरत् दिखाई पड़ रही थी.
नीलांजना की तराशी हुई कमर् को झटके से मैने उठाया और् खुद् भी उसकी खूबसूरत टांगों में अपनी टांगों को उलझाए इस् तरह उसे उठाया कि हम् दोनों एक्-दूसरे से चिपके हुए उठ बैठे थे. कमर् के नीचे का हिस्सा टब की झाग् में डूबा चिपका जा रहा था और् ऊपर् नीलांजना की दूधिया छातियां पूरे जोर् से दबातीं मुझपर् फिसल् रही थीं. आंखें और् होंठ् हम् दोनों के आपस् में जोरदार् टक्कर् मारते निगलकर् खा जाने के लिये टूटे पड़ रहे थे.
मेरे होंठ् नीला के कानों में बेहोशी मे बुदबुदा रहे थे-" प्यारी नीला, आज् कह् डालो जो कहना है. पहली बार् ये आजादी मिली है. कुछ कहो...कह डालो प्लीज़ऽऽ...कहो, ...कुछ कहो न मेरी प्यारी नीला." मैने गप्प से नीला के होठों को जकड़कर् पूरा का पूरा अपने होठों में दबोच् लिया और् इतनी जोर् से अपनी छाती में जकड़ कर् भींचा कि नीला की छातियां चिपटकर् रह गईं और् हड्डियां कड़कड़ा कर् चीख् उठीं"
फिर् भी अलग् होने की बजाय् वह् मुझसे और् कसकर् चिपक् गई.
"हाय मेरे राजा मेरी प्यास् बुझाने से पहले ही मार् डालोगे क्या?" - वह् बोली.
अपने गालों को मेरे गालों से रगड़ती नीलांजना ने मेरे बालों को पकड़ कर् सिर् को झटका और् मेरे होठों लपक कर् कस् लिया. उखड़ती सांसों बीच् बदहवासी में भर्राई आवाज़् में वह् बुदबुदाई -
’आह् मेरे राजा, मेरे प्यारे ’, मुझपर् कौन् सा जादू तुमने कर् दिया है यार्. मुझसे सहा नहीं जा रहा है मेरे प्यारे... आ जाओ...अब और् मत् सताओ प्लीज़ऽऽ..."
रुकती और् हांफती वह् कहे जा रही थी - " मेरे यार्, मेरे राजा, न जाने कितनी बार् तुम्हें ख्वाबों में लिपटाये हुए मेरी लाड़ली नन्ही पानी-पानी होती रही. ये मैं तुमको कैसे समझाऊं? तुमको पाने की तमन्ना में ये कितना मरती रही मेरे राजा तुम् क्या जानो? अब मिलकर् भी मुझे मत् तरसाओ. आओ मेरे प्यारे, मेरी नन्हीं को ले लो...ले लो..मैं बेकरार् हूं प्लीज़्.."
वह् हांफ् रही थी और् मेरे होंठ चप्प-चप्प उसकी आंखों को, गालों को, कानों की लवों को चूमे जा रहे थे. शिराओं में दौड़ते खून के साथ फूलती और् लाल होती थिरक रही उसकी भूरी चूचियों को मैने अपने होठों में समेट लिया था. मेरे होंठ् नीलारानी की खूबसूरत चूचियों को छेड़ते, निगलते और् दबाते हुए खेल रहे थे. मेरी हथेलियां उत्तेजना की भरपूर अकड़् के साथ लगातार फूलकर बम्म होती जा रहीं उसकी दूधिया छातियों को मसल-मसल कर काबू में कर रही थीं.
होशोहवाश खोता हुआ मेरा बदन सनसना रहा था. आम हलात में सिकुड़कर छिपा हुआ मेरा कोमल दंड् इस वक्त खून की उफान के साथ तन्ना-तन्ना कर् खड़ा हो चला था.मेरा तैयार लंड अकड़कर लंबा होता हुआ इस इरादे से बढ़ा जा रहा था कि मौका मिलते ही वह् अपनी प्यारी छोटी नीलांजना को ठेलता हुआ उसकी फांक में समा जाये. वह यूं बेताब था कि नीला के निचले होठों को ठेलता, उसकी नाभि पर चोट मारता, दूधिया छातियों को भेदता गले में फिसलता वह उसके लाल्-लाल् होठों पर जाकर अटक जाये. मेरी निगाहें नीला की हरिणी के समान् खूबसूरत् आंखों में उलझी हुई थीं. मेरी नाक उसकी तराशी हुई सुन्दर नाक से टुनक-टुनक कर् खेल रही थी.
बेकाबू हुई जाती धड़कनों में हांफती मेरी जुबान प्यारी नीला से कह रही थी - "बोलो प्यारी नीलांजना, बोलो प्लीज़. आज मौका मिला है. सारा प्यार आज् होठों से बरसा डालो प्लीज़."
उधर बेहोशी में डूबी भारी आंखों से नीलांजना का जवाब आ रहा था. अपनी फिसलती छातियों में जकड़ती वह कहे जा रही थी -" आओ. आ जाओ मेरे प्यारे, मुझमे समा जाओ. मुझे इतना प्यार दो कि आज मैं खुशी से मर जाऊं. आऽऽह्, मैं मरी जा रही हूं. मैं प्यासी हूं. और् मत तरसाओ. अब डाल दो उस् प्यारे को जिसकी हसरत में तुम्हारी ही यह लाड़ली बेताब् होती मचल् रही है.
कमर के नीचे जांघों की संधि पर् गुस्साये बैल् की तरह सींग मारते मेरे लंड को नीलंजना अपनी मुत्ठी में थामकर ’हाय-हाय’ कर रही थी. सुपारी की गांठ को अपनी लार टपकाती चूत के दरवाजे पर टिकाती नीलांजना बोली - "आओ प्लीज़ अब कयामत हो ही जाने दो.."
नीला की गोरी-गोरी जांघों की चिकनी-चिकनी रानों पर हाथ् फेरकर प्यार से पुचकारा. फिर् हथेलियों से ’चत्ट-चत्ट की आवाज् से मैने उन पर यूं चोट की, जैसे उनसे पूछा जा रहा हो कि चलो तैयार् हो ना ? अब् भिड़न्त की बारी आ गई है.
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"आओ"-मैने थोड़ा उठकर भारी पर् भरपूर आवाज में नीलांजना से कहा.
बाथ् के टब के सिरे पर कुहनियों के जोर से नीला के बदन को उठाकर् मैने यूं टिका दिया कि वह अध-बैठी हालत में थी. उसकी गहरी काली आंखों की कशिश् मुझे डुबाए जा रही थी. उत्तेजना की मदहोशी में और् ज्यादा खूबसूरत दिखाई पड़ रही नीला के चेहरे को चूमकर मैने आगे कहा -" आओ, प्यारी रानी आ जाओ. अब रुकना मुश्किल् है"
नीलान्जना की जांघों के बीच् जगह बनाता मैने अपने सर की चोट से उस इलाके में तीन्-चार् बार् यूं कसकर ठोकर दी जैसे कोई बिगड़ा हुआ बैल् सींगे मार रहा हो. सर् की चोट देते मैने उस जगह को यूं कुरेदना शुरू किया जैसे गुस्साया हुआ बैल् अपनी सींगों से जमीन को छीलता गद्ढे खोदने पर् आमादा हो. नीला की झाड़ियों में छिपे निचले होठों को अपने होठों के बीच मैने कसकर मसलना शुरू किया. नीला की चूतरानी मेरे हमले के लिये बेसब्र होती लार टपका रही थी और् मेरे होठों को उसके स्वाद् का मजा दे रही थी. जान्घों की लंबी रेखा में लहरदार मखमली झांटों के बीच् शर्माकर बैठी नीला प्यारी की फांक अब खुलकर तैयार हो रही थी.उसकी जीभ् लपलपा रही थी. फांकों को ठेलकर् अब् मेरी जीभ् भी अन्दर घुसकर् उसकी लपलपाती जीभ से टक्कर ले रही थी.नीला की केसरिया चूत के हर् कोने को थपथपाती और् टटोलती मेरी जीभ उसकी दीवारों से बहते झरनों से अपनी प्यास् को बुझा रही थी. उधर झरनों से भीगती चूत् की प्यास और् बढ़ती जा रही थी.
नीलांजना मदहोश् हुई जा रही थी. उसका सारा बदन मछली की तरह उछल-उछल कर् मचल रहा था. मेरे लौड़े का ध्यान कर्-करके उसकी पलकें मुंदी जा रही थीं. मंद-मंद ध्वनियों में नीला की जुबान अब् केवल् "आह्-आह्" का मंत्र जा रही थी. वह बदहवाशी के आलम में बुदबुदाए जा रही थी -
"आऽह..आऽह..आऽह. अब् और् मत् तड़पाओ प्लीज़्. अब और् इन्तजार बर्दाश्त नहीं कर सकती यह नीला. आ जाओ नाऽ. मैं मरी जा रही हूं."
जवाब में मेरी हथेलियों ने तसल्ली देने नीला की चूत को चार-पांच थपकियां लगाईं. पूरी तैयारी का जायजा लेकर अब मैने अपने सनसनाते हुए बेताब लंड को प्यार से सहलाया और् फिर् उसे नीलान्जना की चूत के मुहाने पर तैनात कर दिया.
नीलान्जना की चूत के उस सब् से ज्यादा नरम हिस्से में जहां प्यार की गुदगुदी भरी होती है, मेरा लंड् उठता और धंसता हुआ खेलता रहा. इसके बाद् स्पीड लेते हुए उसने और् आगे जकर मध्यम गहराई को तराश्-तराश् कर् चिकना किया. इस तरह भीतर के रास्ते का जायजा लेने के बाद लंड राजा ने अपने को पीछे लौटाते हुए, एक् बार फिर् लपलपाती चूत के मुहाने को चूमा. तन्नाए लंड राजा ने इसके बाद् बे-मुरौवत होकर् नीलारानी की चूत पर जोरदार् झटके से अपने को पेल दिया और् ’घप्प’ की आवाज के साथ चूत की आखिरी हद् को ऐसी चोट मारी कि कमर से सर तक नील का पूरा बदन उस भूचाल् से उछल पड़ा. नीला की चूत में मेरा लौड़ा ऐसा कसा था जैसे बोतल के मुह को पेलकर कार्क ने उसकी छेद को पूरी कड़ाई से ठांस डाला हो.
नीलांजना के गले में फंसी सांसों के बीच् से उस वक्त "आह्-आह्, मार् डाला" की चीख् यूं निकली जैसे मेरा लंड् उसकी चूत् की सुरंग् से उसके गले में जा अटका हो. उसकी आंखें मुंद् चली थीं.
मैने टब के पास् रखी तेल की शीशी नीलांजना पर् यूं उड़ेल दी कि तेल् की धार् उसकी समूची छाती, कमर् और् पेट् तक उतर चली थी. फिर् वहीं पर् रखी सेन्ट् की फुहार् से नीला के बदन् को मैने भर् दिया. पूरा बाथरूम मादक खुशबू से महक् उठा था. मादक् बेहोशी में डूबी हुई नीला ने हौले से अपनी मुन्दी पलकें खोलीं. मेरी आंखों में डूबी वह् मुस्कुरा रही थी.
" आह् मेरे प्यारे प्रियम, तुम् मुझे किस् दुनिया में ले आये हो.मै खुशी से पागल् हुई जा रही हूं."
नीला के तेल् से भीगे बदन् पर् मेरे हाथ् फिसल् रहे थे. खास् तौर् पर् उसकी जोरदार फूली हुई गुलाबी छातियों और् फिर् चूचियों की मालिश् मे बड़ा मजा आ रहा था. सर् से पांव तक् मेरे हाथ् नीला की हर् रग् को टटोल रहे थे. नीला का बदन् चिकनाई में फिसलते हाथों की गुदगुदी से लहरा-लहराकर् उछल् पड़ रहा था. नीला बेताब होकर् मुझसे चिपक्-चिपक् जा रही थी.कमर् के नीचे मेरा लौड़ा और् नीला की चूत् एक्-दूसरे में ठसकर् चक्की पीस् रहे थे. मेरी हथेलियां नीलांजना की पोर्-पोर् पर् थिरक् रही थीं. वह् मुझे बाहों में घेरे हुए अपनी चिकनाई से पिघला रही थी. अचानक् मैने झपत्टा मारकर् नीला के बूब्स् को कसकर् भींचा और् उसकी चूचियों के अंगूरी रस् को निचोड़ने के लिये अपनी चुटकियों में थामकर् मसल् डाला. नीलांजना की कमर लहराने लगी और् वह् चित्त होती लेट् चली. उसकी खुशी से डोलती कमर् जांघों को आगे-पीछे ढकेलती हुई मेरे लंड् से खेल् रही थी.
इस खेल में अब् नीला और् मैं एक दूसरे को भिगाते हुए बाहर् और् अन्दर् भीगे जा रहे थे. अपने हाथों में नीला के खूबसूरत् चेहरे को थामकर् तड़ातड़ चुंबनों की बौछार् मैने कर् डाली. नीला ने लपककर् मेरे होठों पर् अपने होठ् जमा दिये और् वह् उन्हें बेरहमी से चबा-चबा कर् मुझे लूटे जा रही थी. हम् दोनो की छातियां और् कमर् खूब् भिड़कर् एक-दूसरे को हिला-हिलाकर् पीस डालने की होड़ में लगी हुई थीं. नीला अपने आधे खुले घुटनों के बीच् पूरी ताकत से मुझसे टकरा रही थी. इधर् मेरा भन्नाया लंड चूत की सुरंग से बार्-बार् अपने को बाहर् खींचता खूब् ऊंचे उठाता और् चूत् पर् हमला करता इतनी तेजी से टूटता कि नीला की कमर् चरमरा जाती. कमर् के टूटने की आवाज् हर् चोट् के साथ् -" हाय् रे, मार् डाल्ला. जरा धीरे प्लीज़" के रूप् में सुनाई पड़ती थी. उस खेल् में नीला और् मेरा सपना हकीकत् में बदल् रहा था. नीलारानी की पानी-पानी होती चूत् और् उसके रस मे नहा-नहा कर् खेलता मेरा लंड मौज् में उछल-उछलकर् ठोकर् मारते पूरी टक्कर् ले रहे थे.टक्कर से पैदा होती बिजली की सनसनी नीला के और् मेरे बदन से गुजरती हमें जन्नत् के बाग् की सैर् करा रही थी.
मेरे दिल् ने कहा कि जल्द बाजी मत् करो. अभी अपनी नीला प्यारी के साथ् सैर् को थोड़ा लंबा खिंचने दो. तब् अपना ऊपरी बदन् मैने नीला की छाती से ऊपर् उठाया. एक हाथ् से नीला की कमर् और् दूसरे हाथ् से मैने नीला की पीठ् को घेरकर् कस् लिया. फिर् लंड् की चोट् से चूत को धक्का मर्-मरकर् मैने इस तरह् ठेल दिया कि धीरे से नीला और् मै चूतरानी और् लंड् राजा को डिस्टर्ब किये बगैर् बैठने की पुजीसन मे टांगें फैलाये नजर् आए.
मैने कहा कि नीला प्यारी आओ. अब बाग् में इस एंगल से टहलेंगे कि सारा नज़ारा साफ् दिखाई पड़ेगा. तुम् देखना कि इसमें और् ज्यादा मजा है. नीला ने प्यार् से मेरी आंखों में झांका और् लपककर् मेरे होठों को यह् कहते हुए चूम डाला कि मै तुम्हारी हूं. जहां ले जाओगे वहां मैं जाऊंगी.
"आओ"- मैने एक-दूसरे को सही पुजीसन् में लाते हुए फिर् शंटिन्ग् चालू की. इंजन फिर् पटरी पर् ’फचाफच्-फचाफच्’, ’छ्पाक्-छ्पाक्’, ’चटाचट्-चटाचट्’ करता रफ़्तार् से दौड़ने लगा.
लंड् और् चूत के टकराव का जोरदार् नज़ारा अब् नीला और् मैं इतनए मगन होकर देख् रहे थे कि सारे होश् के साथ् हम् खुद् जैसे उन्हीं में तब्दील हो गये थे.









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