Showing posts with label मेरी बीती जिंदगी की कहानी. Show all posts
Showing posts with label मेरी बीती जिंदगी की कहानी. Show all posts

Tuesday, April 21, 2015

FUN-MAZA-MASTI मेरी बीती जिंदगी की कहानी --9

  FUN-MAZA-MASTI
 मेरी बीती जिंदगी की कहानी --9


 मैं – मुझे समझ नहीं आया...
सीमा – ओफ्फ ओ...अब कैसे बताऊँ....सुनिए मैं परसों से बहुत ज्यदा गरम रहूंगी...
मैं – मौसम ही गरम है.मैं भी तो गरम हूँ. मैं तो आज ही गरम हूँ तुम तो परसों गरम होगी. दिन भर धुप लगी है.
सीमा – मैं उस वाले गरम की बात नहीं कर रही.
मैं – तो फिर?
सीमा – मैं चिपकने के लिए कहूँगी आपको....जैसा मर्द और औरत चिपकते हैं न ..वैसे चिपकने के लिए....और बहुत तेज आग जलेगी मेरे अन्दर ऐसा कने की..इसलिए आप से कह रही हूँ की मेरी बात मन सुनियेगा और मुझसे दूर रहिएगा...अभी आपको तीन महीने और इन्तेजार करना है..उसके बाद चिपकने का समय आएगा...लेकिन अभी नहीं. अभी किसी भी हाल में नहीं...आप समझ रहे हैं न.....
मैं – हाँ.

मैंने हाँ तो कह दिया था लेकिन मेरी समझ में कुछ नहीं आया था.......खैर...मैं अपने काम पर चला आया...आज भी खाना मैंने ही बना दिया था....वो दिन भी निकल गया.....मेरा काम लगातार ठीक चल रहा था..मुंशी जो रोज मुझे देखते और मेरा काम देख के बहुत खुश होते...बाकी के लोग भी अब धीरे धीरे मेरे बारे में जान गए थे....वहां काफी लोग काम करते थे..कुछ मिस्त्री भी थे...कुछ सिर्फ मजदूर थे...सब धीरे धीरे मुझे पहचान गए थे और मैं भी उनके नाम जान गया था...कभी कभी किसी के साथ बैठ के थोड़ी बहुत बात भी हो जाती थी.....इन लोगों से बात कर के मेरा मन थोड हलका होता था वरना तो दिन भर ही मेरे मन में सीमा की तबियत का ख्याल ही रहता था..कई बार मन हुआ की किसी से इस बारे में पूछ लूं...अगर ये सब औरतों को होता है तो शायद इन लोगों को इस बारे में कुछ मालूम होगा...लेकिन ऐसा करने में बहुत झिझक महसूस हुई...फिर ये भी लगा की पता नहीं किसकी नीयत कैसी हो और कौन क्या जवाब देगा.....मैं अपने मन की शंका मन में ही लिए रहा....एक दिन और बीता.....अगली सुबह....मुझसे पहले सीमा उठ गयी थी...वो आज एकदम ठीक दिख रही थी..उसने तीन दिन के बाद अपने कपडे बदले थे..मुझे उठाने के पहले ही उठ गयी थी..नाहा ली थी...और खिचड़ी भी रख दी थी बन्ने के लिए.....मुझे उठा के उसने फुर्सत होने के लिए भेज दिया....मैं फुर्सत हो के आया तो उसे देख के बहुत खुश हुआ..आज वो फिर से पुराणी वाली सीमा दिख रही थी...चेहरा एकदम शैतानी से भरा हुआ.......आज सब काम खुद ही कर रही थी..मुझे देख के मुस्कुरा भी रही थी....

सीमा – खिचड़ी खा के आपको काम पे जाना होगा न.
मैं – हाँ. क्यों?
सीमा – नहीं. ऐसे ही पूछा....सुनो......आज अगर मैं कुछ भी करूँ या कहूँ तो मुझे करने मत देना...
मैं – क्यों?
सीमा - बताया था न. बस मत करने देना...एक दो दिन की बात है. उसके बाद मैं एकदम ठीक हो जाउंगी.
मैं – हाँ हाँ चिपकने वाली बात.
सीमा – हां चिपकने वाली बात....सुनो सिर्फ उतना ही नहीं...बल्कि मुझे कुछ भी मत करने देना....
मैं – और क्या क्या नहीं करने देना है?
सीमा – जैसे मैं आपको कहूँ की आओ मेरी सीटी सुन लो...तो मत आना..मैं आपसे कहूँ की मुझे सटा के सो जाओ तो मत सोना...मैं कहूँ की मुझे गर्मी लग रही है मैं नंगी सोयुंगी तो मुझे नंगी मत होने देना..मैं किसी भी बात पर सी सी करने लगूं तो वो बात बंद कर देना....
मैं – हाँ. ठीक है. चलो अब मैं जाता हूँ काम पे...

मैं उठ के चलने को हुआ....सीमा मुझे ही देख रही थी.......मुझे शरारत सूझी...मैंने अपना कुरता ऊपर किया और पैजामे में हाथ डालते हुए बोला “सुनो आज बड़ी खुजली हो रही है यहाँ....” मैं अपने हाथ से अपने लंड को मसल रहा था और सीमा मुझे देख रही थी...अभी उसने मुझे ये सब नहीं करने को कहा था और मैं ठीक यही कर रहा था...जरुर उसके अन्दर की आग और तेज भड़की होगी...उसके चेहरे का रंग ही बदल गया...मुझे उसके चेहरे का वो भाव कभी नहीं भूलता....उसकी आँखों में इस कदर वासना तैर रही थी की उसका बस चलता तो उसी समय कूद कर मेरे ऊपर चढ़ जाती और कभी उतरती ही नहीं....मैं हँसता हुआ वहां से बाहर आ गया......जब उसकी तबियत ख़राब थी तब भी मेरा दिल नहीं लग रहा था काम करने में और आज जब की उसकी तबियत कुछ अलग ही रंग की है तब भी मेरा ध्यान बार बार उसकी बातों पर जा रहा था...मैं दोपहर के खाने कि छुट्टी का इंतजार कर रहा था.....दोपहर में जब वापस आया तो अपना कुरता उतार दिया और जान बुझकर सिर्फ पैजामा पहने हुए पैर फैला के बैठ गया...लंड तो खड़ा था ही....सीमा भी एकदम गरम थी....उसने भी अपनी साड़ी घुटनों तक ऊपर कर राखी थी....और वो भी पैर पुरे फैला के बैठी हुई थी....एक दिन हम इतने खुश थे की कोई बात नहीं की और आज हम इतने गरम थे की कोई बात नहीं की...बस एक दुसरे की आँखों में देखते और फिर एक दुसरे के फैले हुए पैरों के बीच से शरीर का अंदाजा करते...और फिर अपना खाना खाने लगते......मैं वापस काम पर आ गया....आज मुंशी जी से बात हुई तो उन्होंने मुझसे कहा की यहाँ के चौकीदार का काम ठीक नहीं है. अगर मैं चहुँ तो वो बड़े साहब से कह के मुझे चौकीदारी का काम भी दिलवा देंगे. मुझे चौकीदार का कमरा मिल जायेगा लेकिन अलग से पैसा नहीं मिलेगा. पैसा सिर्फ मजदूरी का ही मिलेगा....मैंने उनसे कहा की मैं अपनी पत्नी से पूछ के बताऊंगा...मुंशी जी ने मुझे थोडा चौंक के देखा पर कुछ बोले नहीं.....रात में घर आकर यही बात मैंने सीमा को बताई...



 सीमा – आपने उनसे ये क्यों कहा की मैं अपनी पत्नी से पूछ के बताऊंगा?
मैं – क्यों? तुमसे पूछना तो था ही. इसलिए कह दिया.
सीमा – देखिये आज सब काम मुझसे पूछ के करते हैं लेकिन ये बात कभी किसी से कहियेगा नहीं....
मैं – क्यों?
सीमा – क्योंकि सब लोग आपको जोरू का घुलाम समझेंगे....मर्द अगर औरत की बात मान के चले तो उसे कमजोर समझा जाता है. सब आपका मजाक उड़ायेंगे.
मैं – लेकिन मैं तो तुमसे पुछु के ही करूँगा न सब काम. किसी को जो सोचना है वो सोचे. मुझे क्या.
सीमा – हाँ करेंगे तो आप मुझसे पपूछ के ही. लेकिन किसी और को नहीं बताएँगे की आप ऐसा करते हैं....बस जो कह रही हूँ वो सुन लीजिये.
मैं – ठीक है. सुन लिया. अब सोने दोगी या अभी और ज्ञान देना है.
सीमा – ज्ञान तो नहीं देना. हाँ कुछ है देने को. लेकिन अभी आप लेने लायक नहीं हुए...
(मैं समझ गया की उसका ध्यान फिर से उसकी गरमी की तरफ खिंच गया है...हम लोग खिचड़ी खा चुके थे और अब बस सोना ही बाकी था )
मैं – क्या देने लायक है तुम्हारे पास?
सीमा – कुछ नहीं. अब सो जाईये. सुनिए आप इतनी दूर क्यों सोते हैं?
मैं – क्यों? दूर न सोया करूँ? तुमसे चिपक के सोया करूँ???
सीमा – नहीं. नहीं. आप दूर ही सोयिये.
मैं – हा हा हा हा सीमा तुम्हें हुआ क्या है....
सीमा – मेरा मन कर रहा है की आप मुझे जोर से दबा लीजिये अपने नीचे.....मेरा बहुत ज्यादा मन कर रहा है.
मैं – और क्या मन कर रहा है बताओ...ठीक से बताओ.....
सीमा – मेरा मन कर रहा है की आप आज मुझे अपनी बीवी बना लीजिये...मैं ही मना करती हूँ हमेशा की अभी नहीं अभी नहीं. लेकिन आज मैं ही कह रही हूँ..बना लीजिये मुझे अपना. मुझे अपने नीचे ले लीजिये.मेरी आग बुझा दीजिये. मेरे साथ सुहागरात मना लीजिये.
मैं – और क्या मन कर रहा है?
सीमा – और मेरा मन कर रहा है की मैं आपको अपने ऊपर चिपका लूं...आपका पूरा वजन मेरे शरीर पर पड़े..मेरे शरीर में जो अकडन सी हो रही है वो ख़त्म हो जाए....आप बहुत जोर जोर से मुझे अपना बना लीजिये.....रात भर अपना बनाते रहिये....मैंने रोने लग जाऊं तब भी मत रुकिए..बना लीजिये न अपना.........
मैं – और क्या मन कर रहा है?
सीमा – आप तो बस बात ही करते हैं..क्या क्या बताऊँ आपको.....इस समय तो मैं कुछ भी करने को तैयार हूँ...
मैं – अभी तो कर लोगी लेकिन बाद में तुम्हें ही लगेगा की नहीं करना चाहिए था. है न? लगेगा न?
सीमा – हाँ...लेकिन अभी तो एकदम पागल हुयी जा रही हूँ...क्या करूँ इस मुनिया का....आप कुछ कर दीजिये न मेरी मुनिया का...मेरी मुनिया...मेरी मुनिया..क्यों मुझे ऐसे पागल कर रही है रे...तुझे तेरा साथी मिलेगा.....कुछ दिन सबर कर ले.....सुनिए न...मुझसे नहीं रहा जा रहा...कुछ कीजिये न मेरे साथ.....

सीमा आज एकदम अलग लग रही थी....बिलकुल ही अलग..अभी तक किसी भी दिन कभी भी उसके इस रूप की झलक नहीं देखि थी....आज उसे इस हाल में देख के एक बार तो खुद मैं भी पागल होने लगा था......मैं बाहर आया और ठीक से देखा की कोई है तो नहीं.....फिर अन्दर आया...और अपने कपडे उतारने लगा......मुझे देख के सीमा ने भी अपनी चोली खोलनी शुरू की लेकिन मैंने उसे मना कर दिया...मैंने अपने पुरे कपडे उतारे..मैं एकदम नंगा था...लेकिन सीमा अपने पुरे कपड़ों में थी...सीमा बार बार मेरे लंड को देख रही थी और उसके मुंह से लार टपक रही थी....सीमा इस समय किसी जानवर की तरह हो गयी थी...मैं अपना नंगा बदन ले के उसके ठीक सामने जा के बैठ गया........वो मुझे देखती फिर मेरे लंड को देखती....न उसे समझ आ रहा था की अब क्या करें और ना ही मुझे...कुछ देर ऐसे ही बैठे रहे..मेरा लंड बार बार ठुनकी मार रहा था..सीमा की साँसे लगातार तेज चल रही थी...फिर सीमा ने मुझे अपने ऊपर खीच लिया और लेट गयी...उसने एक ही झटके में ये काम किया...वो पूरी लेटी हुई थी और मैं उसके ऊपर था.....उसने अपनी टाँगे थोड़ी फैला ली थी...इससे मेरी टाँगे उसकी टांगों के बीच घुस गयी थी......

फिर काफी देर तक हम ऐसे ही लेते रहे...दिमाग ने तो काम करना ही बंद कर दिया था.....लेकिन हमारे शरीर अलग नहीं होना चाह रहे थे....हम एक दुसरे को देख रहे थे....लेकिन हमें ये नहीं पता था उस समय की चुम्बन भी एक चीज होती है..शरीर को दबाना उसे चाटना भी एक चीज होती है....हम सिर्फ इतना जानते थे की अन्दर घुसा देना ही सब कुछ होता है...और अभी हम वही नहीं करना चाहते थे...उसके बदले एक दुसरे से खेलना और एक दुसरे को चूमना हमें पता नहीं था.....अब अजीब हालत हो गयी थी...जो करना जानते थे वो कर नहीं सकते थे.....मेरा लंड भी अकड़ा हुआ था बहुत देर से..उसकी बुर तो खैर सुबह से ही जल रही थी...ऐसे ही हम एक दुसरे के ऊपर लेते रहे...फिर जब कुछ समझ में नहीं आया तो मैं अलग हट गया...........मैंने सीमा से कहा तुम भी नंगी हो जाओ....सीमा तो जैसे इस बात का इन्तजार ही कर रही थी...उसे नंगी होने में एक पल भी नहीं लगा....


 मैं – अब इसके आगे क्या करते हैं?
सीमा – मैंने जिनको चिपके हुए देखा है वो तो बस अन्दर डाल के हिलते हैं.
मैं – हम तो अभी अन्दर नहीं डाल सकते. हम क्या करें?
सीमा – वो लोग एक दुसरे को चुम्मा चाटी करते हैं...
मैं – कहाँ चुमते हैं?
सीमा – दूध के ऊपर.
मैं – तुम्हारे तो अभी दूध ही नहीं निकले हैं. छोटे छोटे तो हैं. इन्हें कैसे चुम्मा चाटी करूँ?
सीमा – हाँ. अभी तो बहुत छोटे हैं.
मैं – और क्या करते हैं?
सीमा – बस मुझे इतना ही पता है....पहले दूध को चाट लेते हैं फिर अन्दर डाल देते हैं. फिर आगे पीछे हिलते हैं.
मैं – मैं कब तुम्हारे अन्दर डालने लायक होऊंगा?
सीमा – आप तो हो गए हो. मैं नहीं हूँ अभी अन्दर लेने लायक.....
मैं – अभी और कितना समय लगेगा?
सीमा – बस दो तीन महीने और....उसके बाद मैं बी हो जाउंगी...
मैं – लेकिन ये समय कैसे बीतेगा...
सीमा – नहीं पता..मेरा तो आज इतना ज्यादा मन हो रहा है..अभी आप जब ऊपर लेटे हुए थे तो पुरे शरीर को राहत मिल रही थी...कुछ दिनों से शरीर एकदम अकड़ रहा था मेरा....आपको अपने ऊपर ले के बहुत अच्छा लग रहा थ...
मैं – मुझे भी तुम्हारे ऊपर लेट के बहुत अच्चा लगा...ऐसे लेटने पर मेरा ये दब जाता है..इस पर जोर पड़ता है तो बहुत अच्छा लगता है...तुम्हारे दूध कब बड़े होंगे?
सीमा – दो तीन साल में बड़े हो जायेंगे. अभी तो शुरू हुए हैं न...
मैं – अपने आप बड़े हो जायेंगे.?
सीमा – हाँ अपने आप ही हो जाते हैं..पता नहीं मुझे...आप जब मेरे अन्दर डालोगे तो ये अपने आप बड़े होने लगेंगे.
मैं – खूब बड़े बड़े हो जायेंगे?
सीमा – आपको खूब बड़े बड़े अच्छे लगते हैं?
मैं – हाँ....जैसे भाभी के हैं न.
सीमा – हाँ भाभी के तो बहुत बड़े बड़े हैं.....आपने उनके दूध देखे हैं?
मैं – नहीं. ऐसे ही कभी कभी पल्लू नीच होता है तो दिख जाते हैं.
सीमा – हाँ उनके तो बहुत बड़े बड़े हैं.जरुर भैया रोज उनके अन्दर डालते होन्ग...तभी तो इतने बड़े हो गए.
मैं – मैं भी रोज तुम्हारे अन्दर डाला करूँगा फिर तुम्हारे भी इतने बड़े हो जायेंगे...
सीमा – हाँ...लेकिन अभी क्या करें...अभी के लिए कुछ सोचो न.....
मैं – मैं क्या सोचूं? सब कुछ तो तुम जानती हो. जब तुम्हें ही कुछ नहीं सूझ रहा तो मुझे क्या पता होगा...तुम बताओ न कुछ...कभी किसी को कुछ और करते देखा होगा...
सीमा – बस ऐसे एक दुसरे से चिपक के हिलाते देखा है. और कुछ नहीं. सच में.....

हम दोनों कुछ देर ऐसे ही बैठे रहे.....ये अपने आप में बड़ी उदासी वाला समय था..हम दोनों एकदम गरम थे लेकिन हमें ये समझ नहीं आ रहा था की करें क्या.......और ऊपर से अभी और इंतजार करना बाकी है ये ख्याल भी जान खाए जा रहा था....ऐसे ही सो जाने के सिवा हमारे पास कोई चारा नहीं बचा था.......हम सोने लगे तो सीमा ने कहा की मैं फिर से कुछ देर के लिए उसके ऊपर आ जाऊ......लेकिन हम दोनों तो नंगे थे इसलिए सीमा ने अपनी साड़ी उठाई और अपनी मुनिया के ऊपर रख ली...मैं फिर से उसके ऊपर लेट गया....लेकिन इसके सिवा कुछ और नहीं किया..क्योंकि इसके बाद क्या करना है ये न उसे समझ आ रहा था न मुझे...बस एक दुसरे के बदन को इतने करीब से छू कर जितना सुकून मिल सकता था हमें उसी में गुजारा करना था......



अगले दिन मैंने मुंशी जी को बता दिया की मुझे चौकीदारी भी दे दी जाए.....हम लोग उस कोने से उठ कर चौकीदार को दिए जाने वाले कमरे में आ गए....ये सिर्फ एक कमरा था..कोई खिड़की नहीं....ज्यादा बड़ी जगह नहीं थी....हाँ इतना जरुर था की चार दीवारे थी और सर पर छत थी....पहले के जैसे हमें खुले में नहीं रहना था.....सीमा ने इसे ही अपने ढंग से सजा लिया था..कमरे के एक कोने में उसने अपना चूल्हा बना लिया था..हाँ इस कमरे की सबसे बड़ी बात ये थी की इसमें एक बाथरूम था....उसमे दरवाजा भी लगा हुआ था.....बाथरूम कमरे के अन्दर से ही था तो कहीं बहार से जाने की जरुरत नहीं थी.....मुझे पैसा सिर्फ मेरी मजदूरी के हिसाब से ही मिलने वाला था...लेकिन इतना हमारे लिए बहुत था....हम हफ्ते में एक बार बाहर जाते और अपने लिए चावल और नमक ले आते.....अभी तक हम सिर्फ खिचड़ी ही खा रहे थे क्योंकि वही सबसे सस्ती पड़ती थी....ऐसा ही कई हफ़्तों तक चलता रहा...उस जगह पर मेरे काम से सभी प्रभावित थे..मुंशी जी तो हम दोनों से इतने खुश थे की काम ख़त्म होने के बाद वो अपना हिसाब किताब हमारे यहाँ बैठ के ही करते थे..कभी कभी हमें वो अपने घर से कुछ खाना भी ला के दे देते थे........कई हफ़्तों तक लगातार सब कुछ ठीक रहा...कोई दिक्कत नहीं हुई किसी भी काम में.......पैसा लगातार मिल ही रहा था और सीमा उसमे से बहुत कुछ बचा भी लेती थी........हाँ हमारे बीच ज्यादा कुछ हो नहीं पा रहा था..हम दोनों ही एक दुसरे से एकदम खुल गए थे..हमारे बीच कोई शर्म या झिझक नहीं थी..लेकिन हमें पता ही नहीं था की अन्दर डालने के अलावा और क्या क्या किया जा सकता है....सीटी तो हमारे बीच एक नियम जैसा था...अब तो बाथरूम भी था हमारे पास....रोज सुबह उसकी सीटी देख के शुरू होती और रोज रत को सोने से पहले उसी सीटी के दर्शन होते थे....लेकिन सीटी से आगे कैसे बढ़ें ये समझ में नहीं आ रहा था....हम दोनों ही दिनों के बीतने की उलटी गिनती गिन रहे थे.......

एक दिन जब काम के बाद घर लौटा तो सीमा ने मुझे कुछ पैसे दिए और मुझे कहा की बस अड्डे जाईये..और वहां से कुछ किताबें ले आईये.....मैंने उससे किताबों का नाम पूछा तो उसने बताया की कोक शास्त्र और सचित्र सुहागरात के नाम से जो किताबें होंगी वो लेते आईयेगा...




 




FUN-MAZA-MASTI मेरी बीती जिंदगी की कहानी --8

 FUN-MAZA-MASTI

 मेरी बीती जिंदगी की कहानी --8


कुछ देर बाद वहां लोगों का आना शुरू हुआ...लेकिन वो सब लोग भी मजदूर ही थे...सब अपने साथ कुछ न कुछ सामान लिए हुए थे....और आके सब एक जगह पर जमा हो रहे थे...सीमा ने मुझसे कहा की अभी रुको जब यहाँ के साहब आ जाएँ तो उनसे जा के मिलना....काफी देर तक हम लोग बैठे रहे और वहां का काम देखते रहे....देखते ही देखते वहां मजदूरों की एक फ़ौज जैसी जमा हो गयी थी..इतना बड़ा काम चल रहा था तो उसमे इतने ज्यादा लोग तो लगने ही थे...जल्दी ही काम पूरी गति से शुरू हो गया.....लेकिन अभी भी वहां किसी साहब जैसे आदमी का कोई नाम निशाँ नहीं था.....कुछ देर में एक कार आई और उसी के साथ साथ एक आदमी मोटरबाइक से आया.......सीमा ने सोचा की यही लोग यहाँ के साहब होंगे..उसने मुझे उनसे मिलने को कहा...मैं तुरंत भाग के उनके पास गया...साहब अभी अपनी कार से उतर के खड़े ही हुए थे की मैं उनके पास पहुच कर उन्हें अपने बारे में बताने लगा....उस साहब ने मुझे बड़े अजीब ढंग से देखा.....मैं कोई देखने लायक चीज तो था नहीं लेकिन फिर भी इस नजर से किसी ने नहीं देखा था अब तक जैसे इन साहब ने देखा..मैं खुद ही थोडा झेंप गया....उनके पीछे जो आदमी मोटरबाइक से आया था उसने मुझे चुप रहने और पीछे चलने का इशारा किया..मैं उनके साथ चल दिया....वो साहब जहाँ जहाँ जाते मैं उनके पीछे पीछे चलता..कुछ देर में वहां चल रहे काम का जायजा लेने के बाद वो साहब एक जगह आ के बैठ गए....फिर उन्होंने मेरी तरफ देखा....मैंने फिर से उन्हें अपना परिचय दिया और उन दारू वाले साहब के बारे में भी बताया....इन साहब को तुरंत बात याद आ गयी और उन्होंने इस दुसरे आदमी को मुझे काम देने के लिए कह दिया......ये दूसरा आदमी जो मोटरबाइक से आया था ये वहां का मुंशी था...वहां का सब काम यही देखता था सारा हिसाब किताब इसी के हाथ में रहता था.....मुंशी ने मुझे कुछ देर बाद उससे मिलने को कहा..मैं वहां से लौट के वापस उसी दरवाजे के पास बैठी सीमा के पास आ गया और उसे पूरी बात बताई....

सीमा – वहां क्या क्या काम चल रहा है?
मैं – पता नहीं. बहुत सारा काम चल रहा है.
सीमा – आपको कौन सा काम देंगे?
मैं – नहीं बताया.
सीमा – कितना पैसा देंगे?
मैं – नहीं बताया.
सीमा – कब से काम देंगे? रहने की जगह देंगे क्या?
मैं – अरे तुम पागल हो क्या? मैं उनसे वहां गप्प मार रहा था क्या? उन्होंने कहा की कुछ देर बाद आ के मिलना तो मैं वापस चला आया. मेरी इतनी बात नहीं हुई उनसे.
सीमा – तो क्या बिना बात किये काम करने लग जायेंगे?
मैं – काम मिल रहा है ये क्या कम है?
सीमा – काम दे रहे हैं तो कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. पैसा देंगे तो आपकी मेहनत का पैसा देंगे. कोई हराम का पैसा नहीं देंगे. इसलिए आपका हक है की आप सब कुछ ठीक से पूछ देख लीजिये.
मैं – अच्छा? और अगर कम पैसा दे रहे होंगे तो क्या हम काम छोड़ देंगे?? हमारे पास तो कितने सारे काम हैं करने के लिए. है न? कोई और काम मिल जायेगा? क्यों??
सीमा – नहीं मिलेगा काम तो न सही. लेकिन अपनी मेहनत का पैसा पूरा लेंगे. वहां बस अड्डे जैसा काम मत करना यहाँ की दिन भर कमर तोड़ो और हाथ में आये दो रुँप्या.
मैं – सब धीरे धीरे होता है सीमा. तुम पैसे की इतनी चिंता न किया करो. बड़े लोग हैं. काम दे रहे हैं यही बहुत बड़ी बात है.
सीमा – कोई बड़ी बात नहीं है यही तो मैं आपको समझा रही हूँ.पैसे की बात ठीक से करना....बड़े साहब से न सही मुंशी से तो कर ही लेना. 


 मुझे पता था की सीमा अपनी बात पर अडिग है..और कुछ हद तक उसकी बात सही भी थी....कुछ देर बाद जब मुझे वो साहब और मुंशी दोनों खली दिखे तो मैंने उनके पास फिर से गया...उनसे काम के बारे में पूछने के लिए...बड़े साहब ने तो फिर से ऐसे देखा जैसे उनके सामने कोई अजूबा आ के खड़ा हो गया हो....मुंशी समझ गया की उसके साहब का अब दिमाग ख़राब होने वाला है....उसने मुझे एक कोने में खीचा....और बोला की”.... कैसे आदमी हो यार तुम....साहब से ऐसे बात कर रहे हो जैसे उन्होंने तुमसे कर्जा लिया हुआ है. एक बार कह दिया न की काम मिल जायेगा तो बस मिल जायेगा. अब क्या वो तुमको जवाब देते बैठे रहेंगे. तुम्हें बुलाया नहीं तुम फिर भी आ गए. आ के उनके बगल में खड़े हो गए. उनके बगल में तो मैं भी खड़ा नहीं होता. भैया तुम मजदूर हो मजदूर जैसे रहो.साहब के रिश्तेदार न बनो. समझ गए की नहीं? और आगे से जो भी बात हो वो मुझसे पूछना. साहब से न पूछना कुछ भी. वो तुम लोगों से बात नहीं करते. “ मैंने तो कुछ कहा ही नहीं था...मैं तो बस जा के खड़ा हुआ था की ये मुंशी अपने आप ही चालू हो गया...फिर मुझे सीमा के सारे सवाल याद आ गए और मैंने एक सांस में ही वो सारी बातें मुंशी से पूछ ली...अब तो मुंशी भी उतना ही हैरान हो के मुझे देख रहा था....उसने बोला “ भैया तुम्हें काम मिल रहा है ये कम है क्या? की तुम्हें अब हम घर भी देन...खाना भी देन....तुम्हें एक दो नौकर भी चाहिए होंगे? क्यों? काम पे आने जाने के लिए गाडी की जरुरत तो नहीं है?? अगर हो तो वो भी बता दो. मैं साहब से कह देता हूँ वो अपनी गाडी तुम्हें दे देंगे. तुम्हें तो ये सब चाहिए है......” .....अब मेरा भी दिमाग ख़राब हो गया......मैं बिना कुछ कहे वापस चला आया.....

आ के सीमा को पूरी बात बताई...तो सीमा ने भी कहा की गलती मेरी है..मुझे तो समझ नहीं आ रहा था..मैंने क्या गलती की? सीमा ने कहा की जा के ये सब पुच के आना तो मैं गया था. मैं खुद से नहीं गया था. अब सीमा ही कह रही है की मैंने गलती की.....मैंने कुछ नहीं कहा चुपचाप बैठा रहा...दोपहर हो गयी थी..हमने थोड़ी थोड़ी भूख भी लगने लगी थी.....पैसे बस एक बार का खाना खाने के लिए बचे थे...तो वो रात में काम आते...अभी तो सब लोगों को देखते रहे बैठे रहे बस.....कुछ देर में बड़े साहब वापस चले गए अपनी कार में बैठ के...फिर उस मुन्सी ने मुझे अपने पास बुलाया...सीमा ने कह दिया था की जा के कुछ कहना मत बस सुन लेना उनकी पूरी बात....तो मैं जा के उनकी बात सुनने लगा....मुझे काम दिया गया था सामान ढ़ोने का....ईंट रेत ये सब उठाने रखने का काम था...मैंने हाँ कह दी..फिर मुंशी ने ही कहा की रोज के 120 रुपये मिलेंगे...ये सुन के तो मैं हवा में उड गया...रोज का 120 रुपये मतलब मैं तो अमीर हो गया.....फिर उसने कहा की रहने की जगह नहीं है.....घर या कमरा नहीं दिया जायेगा....चाहो तो यहाँ कहीं भी सो सकते हो...मेरे लिए ये भी ठीक था.....ये तो सब अच्छी अच्छी खबर ही थी..मैं हंसी ख़ुशी वापस सीमा के पास आ गया...आज का दिन तो आधा निकल चूका था....तो मेरा काम कल से शुरू होना था....सीमा को मैंने पूरी बात बताई...वो भी सुन के बहुत खुश हुई....उसने कहा भी की उसे मुझे उकसा के वो सब बात करने के लिए नहीं भेजना चाहिए था. उसके कारन मुझे मुंशी की इतनी सारी बात सुन्नी पड़ी...लेकिन अभी तो इतनी बढ़िया खबर मिल गयी थी की बाकि बातें मैं खुद ही भूल गया था.....सीमा और मैं कुछ देर बाद वहां आसपास घूमते रहे और ऐसे ही चलते चलते हमें एक जगह दिख गयी...वहां कुछ लोहे का सामान पड़ा हुआ था...एक कोना था वो.....तीन तरफ से घिरा हुआ था......हमें लगा की यहाँ हम आराम से सो सकते हैं और रात के रहने के लिए यही जगह ठीक रहेगी..मैंने मुंशी से जा के पुच भी लिया..उसने भी हाँ कह दिया.....

पिछले दिन भैया और भाभी के घर में जो भी बुरा हुआ था हम उससे बाहर आना चाहते थे....कल के दिन से मुझे काम मिलने वाला था..सीमा ने तो पहले से ही सोच लिया था की 120 रुपये रोज के मिलेंगे तो उससे वो क्या क्या करेगी....रात में पास के होटल से जा के मैं खाना ले आया...हम लोग खाना खा के अपने उसी कोने में बैठे हुए थे.......आज कुछ भी चल नहीं रहा था मन में...एक अजीब तरह की शांति थी...न कोई ख्याल न कोई डर न कोई चिंता.....पेट भर के खाना खा लिया था.कल से काम मिलने वाला था....अब रोज काम मिला करेगा..रोज पैसा मिला करेगा....ऐसा लग रहा था की हमारे बुरे दिन ख़त्म हो गए है.......दोनों को बहुत जल्दी नींद आ गयी....अगली सुबह मुझे सीमा ने ही उठाया....सुबह का सवाल फिर से सामने आ खड़ा हुआ था...अब कहाँ जाएँ..यहाँ न तो सुलभ शौचालय है और ना ही किसी के घर की छत.....मैं तो अभी आँख मींज रहा था लेकिन सीमा बहुत देर की उठी हुई लगती थी..उसने बहुत कुछ सोचा हुआ था शायद..मुझे उठा के मुझे एक किनारे ले गयी...वहां उसने जमीन पर एक गड्ढा खोदा हुआ था और उसके दोनों तरफ एक एक ईंट रख दी थी......एक तरह से उसने एक काम चलाऊ लेट्रिन सीट बना दी थी.......हमारे बीच ये तय हुआ की अब हमें काम मिलने लगा है तो रोज रोज हम सीटी बजाने और एक दुसरे को नंगा देखने के चक्कर में नहीं पड़ेंगे बल्कि ठीक से काम पर ध्यान देंगे.......उस समय हमें काम की सच में इतनी ज्यदा जरुरत थी की सीमा की इस बात को स्वीकार करने में एक पल की भी देरी नहीं की.......जल्दी जल्दी सब काम ख़त्म कर के मैं काम के लिए तैयार हो गया.....मैं तो वहीँ रहता था इसलिए जल्दी तैयार हो गया..लेकिन बाकी लोग तो सब कुछ देर से आये....मुंशी भी देर से आया...तब तक मैं बैठा सब का इन्तेजार कह रहा था...उनके आते ही मुझे मेरा काम बता दिया गया..मैं अपने काम में लग गया...और बाकि लोग भी अपने काम में लग अगये..दोपहर में सभी लोग खाना खाने के लिए रुके...मेरे पास खाना तो था नहीं..मैं उतनी देर के लिए अपने कोने में आ गया..वही कोना जो हमारा घर बन गया था...सीमा वहीँ बैठी थी.....उसे पता था की मुझे छुट्टी क्यों मिली है..लेकिन वो भी कुछ नहीं कर सकती थी..न तो हमारे पास खाने को कुछ था न ही हम किसी से मांग सकते थे.....कुछ देर बाद काम फिर से शुरू हो गया....मैं वापस लौट गया...अबकी सीधे शाम को छुट्टी हुई..जब काम ख़त्म हो गया था....सब मजदूर एक लाइन में खड़े हो गए...और मुंशी एक टेबल कुर्सी पर बैठ गया.....बरी बरी से सब का नाम लिखता और रोज के पैसे देता ...फिर मेरा भी नाम आया..मेरी भी बारी आई....मुझे भी पैसे दिए.......मैं पैसा ले के सीधा सीमा के पास गया....आज के काम की तो छुट्टी हो ही गयी थी.........सीमा ने पैसे लिए और अपनी चोली में डाल लिए...फिर उसने सब सामान बाँधा और झोले में डाल लिया...मैं देख रहा था की ये क्या कर रही है......सीमा मुझे अपने साथ चलने को बोली तो मैं पूछ बैठा की कहाँ जा रहे हैं हम....उसने बताया की रस्ते में उसने एक मंदिर देखा था.....हम मंदिर जा रहे थे....सीमा को ले के मैं चल दिया....अभी हम बाहर नहीं निकले थे की मुंशी जी मिल गए...



मुंशी – क्यों कहा जा रहे हो? काम नहीं करना क्या?
मैं – करना है मुंशी जी. लेकिन आज काम का पहला दिन था तो मेरी बीवी ने कहा की पहली कमाई मंदिर में देंगे.
मुंशी – ये तुम्हारी बीवी है???
मैं – जी.
मुंशी – अबे क्यों झूठ बोल रहा है तू? खुद तो मूंगफली जितना है तेरी कहाँ से बीवी हो गयी अभी से?
मैं – नहीं मुंशी जी. झूठ नहीं. ये सच में मेरी बीवी है. गाँव में शादी जल्दी होती है न.
मुंशी – क्यों री लड़की ? ये ठीक कह रहा है? तू सच में इसकी बीवी है या ये जबरदस्ती रखे हुए है तुझे?
सीमा – नहीं साहब. मैं सच में इनसे शादी कर के आई हूँ. हमारे गाँव में शादी जल्दी हो जाती है.
मुंशी – अबे जल्दी तो हमारे गाँव में भी होती है लेकिन वहां लड़के लड़की को पहले जमीन से उठने दिया जाता है. तुम तो साले एक एक बित्ते के हो शादी कर के बैठ गए. अबे कुछ जानते भी शादी के बारे में की ना? की बस ऐसे ही शादी शादी खेलने लगे? क्यों बे मोहन परेशां तो नहीं करता इसे?
मैं – नहीं मुंशी जी.
सीमा – नहीं मुंशी जी. हमारी शादी हमारे घर वालों ने की थी. फिर उनका देहांत हो गया तो हम लोग काम खोजने शहर आ गए.
मुंशी – ठीक है. सुन लड़की....मैं रोज यहाँ आता हूँ. तुझे कभी इस मोहन के बच्चे से कोई परेशानी हो तो मुझे जरुर बता देना. और तू भी सुन ले मोहन अपने साथ इस तरह लड़की ले के घूम रहा है ये ठीक बात नहीं. तू मन लगा के काम कर मैं बड़े साहब से कह के कुछ अच्चा काम दिलवा दूंगा तुझे......पता नहीं कैसे बेवकूफ माँ बाप थे तुम लोगों के. जब मरना ही था तो तुम लोगों की शादी करवा के तुम्हें फंसाने का क्या फायदा......दाढ़ी मूछ तक निकली नहीं है और पति बन के बैठे हैं ये लाट साहब...

मुंशी की उम्र कुछ 45-50 साल की रही होगी.....देखने में ही लगता था की बहुत समय से ये काम कर रहा है..वो ऐसे ही बोलते हुए अपनी गाड़ी से चले गए.....उनकी बातें हमें बुरी नहीं लगी....बल्कि सच कहूँ तो कुछ अच्चा ही लगा था उनकी बात सुन के...बहुत लम्बे दिनों बाद किसी ने हमसे हमारे बारे में बात की थी.....भले ही बहुत मीठी बात न हो लेकिन हमें उस बात में बहुत अपनापन दिख रहा था...हम लोग उसी ख़ुशी में मंदिर गए......वहां भगवन को प्रसाद चढ्या....लौटते में सीमा ने एक बड़ा सा पतीला ले लिया....एक किलो चावल ले लिया और एक कॉपी और पेन ले लिया.....उसने मेरे कमाए पैसे से ये चीजें खरीदी थी.....बिछाने के लिए अभी भी हमारे पास चादर एक ही था. हमने दूसरा नहीं लिया...पहनने के लिए कपडे उतने ही थे. सीमा ने वो भी नहीं लिए....आज की कमाई आधी तो इतना सामान लेने में खर्च हो गयी और बाकी सीमा ने बचा के अपने पास रख ली.......जब उसने एक पेन और कॉपी ली तब मुझे अपने स्कूल की याद आ गयी...बहुत ही गन्दा समय था मेरा स्कूल में.....मैंने सीमा से इस बारे में कुछ नहीं कहा...हम लोगों ने होटल में खाना नहीं खाया....अपने कोने में वापस लौट के आये.....सीमा ने कुछ और ईंटों को जोड़ के एक कच्चे चूल्हे जैसा कुछ बना लिया.....काम की जगह पर जो बेकार लकड़ियाँ पड़ी हुई थी वो लेती आई...और बहुत मेहनत से उसने आग जला ली.....वहां पानी था ही....चावल हम ले ही आये थे...और कुछ देर में खिचड़ी पकनि शुरू हो गयी......अब तक की हमारी जिंदगी में ये पहला मौका था जब हम अपना बनाया खाना खाने वाले थे......

दोस्तों जिंदगी में कुछ मौके ऐसे आते हैं जब आवाज साथ नहीं देती...लफ्ज़ साथ नहीं देते.....उनकी जरुरत ही नहीं पड़ती..दिल में इतनी सारी खुशियाँ या इतना सारा दुःख एकसाथ समा जाता है की फिर न कुछ बोलने को बाकी बचता है और ना ही बोलने सुनने लायक हालत बचती है....आज का हमारा दिन ऐसी ही ख़ुशी वाला दिन था....उस कोने में जिसे हमने अपना घर बना लिया था...आज हमारा पहला खाना पक रहा था....पहली बार मैं अपनी बीवी के हाथ का बनाया खाना खाने वाला था..पहली बार मेरी बीवी अपने पति को अपने हाथ से बना के खिलने वाली थी.....हम दोनों बार बार एक दुसरे को देखते और मुस्कुराते....कभी उसकी आँखें नाम हो जाती कभी मेरी....और फिर जब खिचड़ी बन गयी तो हमने उसी बर्तन में ही उसे खाने का फैसला किया....हमारे पास इतने पैसे नहीं आ गए थे की एक ही दिन में सारा गृहस्थी आ जाये...फिर भी जो आ गया था हम उसमे ही खुश थे....कुछ देर में जब पतीला ठंडा हो गया तो हमने उसी में खाना शुरू किया और पहला कौर खाते ही हम दोनों ने हंस हंस के पेट पकड़ लिया.....कहाँ एक पल पहले तक हम इतने भावुक थे और वहीँ अब हम जोर जोर से हंस रहे थे....हम बाजार से नमक नहीं ले के आये था...और बिना नमक के ये खिचड़ी कुछ अलग ही स्वाद दे रही थी.....कुछ देर अपनी बेकूफी पर हंसने के बाद हमने पूरी खिचड़ी खा ली...और फिर सोने का समय आ गया..........नया नया काम और नयी नयी तरह की जिंदगी में हमें एकदम से घेर सा लिया था...सुबह मुझे जल्दी उठा दिया जाता..मैं लोगों के आने के पहले ही काम पर लग जाता था....सीमा मुझे उठाने के पहले ही खुद निपट लेती थी और फिर खिचड़ी बनाने में लग जाती थी...मैं तैयार हो के खिचड़ी खता और काम पर चला जाता...बाकि लोगों के आने के पहले ही मैं अकेला ही काफी काम कर लेता था..फिर दोपहर में भी लौट के आता तो वही खिचड़ी मिलिती.....और फिर रात में भी वही खाना...रात होते होते तक तो थक के एकदम चूर हो चूका होता था..मेरी मेहनत बेकार नहीं जा रही थी...मुंशी जी को पता चल रहा था की मैं कितना काम कर् रहा हूँ और हर काम मन लगा के करता हूँ.........फिर एक दिन मैं सुबह जब सो के उठा...



 मैंने देखा की सीमा बगल में ही सिकुड़ी हुई लेटी है....उसकी आँखें बंद हैं लेकिन उसका शरीर हिल रहा है..पता चल रहा है की वो जाग रही है...मुझे समझ नहीं आया..मैंने उससे कहा भी की आज उठाना नहीं है क्या...वो कुछ नहीं बोली...मैं उस जगह आ गया जहाँ हमने सुबह फुर्सत होने की व्यवस्था की हुई थी...मुझे कुछ अजीब लगा तो मैंने ध्यान से देखा तो पाया की वहां कुछ लाल रंग का पड़ा हुआ है..मैंने नीचे झुक के देखा तो समझ आया की ये लाल रंग नहीं बल्कि खून है....ये खून किसका हो सकता है? यहाँ तो हमारे सिवा कोई आता नहीं..मैं वापस अन्दर गया तो इस बार मैंने सीमा को सामने से देखा..उसने अपने पैर मोड़े हुए थे और उसकी कमर के ठीक नीचे का हिस्सा मुझे हलके लाल रंग का दिख रहा था..मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन ये शंका हो गयी की शायद सीमा को कोई चोट लग गयी है....ये खून उसी का है....एकदम से मेरी जां जैसी निकल गयी..मैं तुरंत उसके पास गया उसे उठाया और उससे एक सांस में ही कई सारे सवाल पुच लिए...क्या बात है क्या कोई चोट लग गयी है...तुम्हें खून क्यों निकल रहा है..तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है...तुम्हें दर्द हो रहा है...तुमने मुझे क्यों नहीं बताया.....” मैं उससे एक के बाद एक सवाल कर रहा था लेकिन वो कुछ नहीं कह रही थी.....शायद सीमा को उम्मीद थी की मुझे पता होगा की ये क्या है और क्यों है.....इसलिए उसने मुझसे सिर्फ इतना पुचा की “ क्या आप नहीं जानते? “....मैंने कहा क्या नहीं जनता? क्या बात है मुझे ठीक से बताओ?.....जब सीमा को इस बात का एहसास हुआ की मुझे सच में नहीं पता है तो उसके चेहरे पर एक मायूसी सी दिखाई दी मुझे....उसने बहुत ही हलकी आवाज में मुझसे कहा की थोड़ी देर मुझे लेटे रहने दीजिये मुझे आराम करने की जरुरत है आज आप बिना कुछ खाए ही काम पर चले जाईये मैं दोपहर तक कुछ खाने को बना दूँगी....” सीमा की आवाज इतनी कमजोर थी इतनी हलकी थी की मुझसे रहा नहीं गया..मेरे सरे सवाल एक किनारे हो गए..मैंने उसे वापस लेता दिया.....झोले से अपना एक कुरता निकाल के उसे गोल गोल मोड़ के तकिया जैसा बना के उसके सर के नीचे रख दिया.....सीमा ने मुझे बहार जाने को कह दिया..मैं बाहर आ गया....

मैं रोज के अपने काम में लग तो गया लेकिन मेरा ध्यान बार बार सीमा की तरफ ही जा रहा था....मुझे कभी चोट लगे और खून बहे तो मैं तो एकदम पागल हो जाता था....उसे इतना खून चल रहा है उसे कितना ज्यादा दर्द हो रहा होगा...वो मुझे ये भी नहीं बता रही है की उसे क्या चोट लग गयी....बार बार मन में यही सब बातें दौड़ रही थी......आज उसे इतना कमजोर देख कर मेरा दिल एकदम बैठा सा जा रहा था...किसी तरह से दोपहर हुई...खाने की छुट्टी हुई तो मैं दौड़ अपने कोने में आया और सीमा के पास बैठ गया...वो अभी भी वैसे ही आँखें मूंदे लेटी हुई थी.....मेरी आहट सुन के उसने आँखें खोली..उसे समय का अंदाजा हुआ होगा..उसे ध्यान आया की उसने खाने के लिए कुछ भी नहीं बनाया है..वो उठने की कोशिश करने लगी तो मैंने उसे लेटे रहने को कहा.....मैं फिर से उससे वही सब सवाल करने लगा और इस बार भी उसने जवाब में सिर्फ नजरें झुका ली....मैं भी सोच रहा था की ये वही सीमा है जो मुझे हर बात एकदम साफ़ साफ़ समझाया करती है तो फिर आज इसे क्या हुआ है जो इतना बड़ी बात मुझसे छुपा रही है....सीमा ने फिर से अपनी हलकी आवाज में कहा की अभी मैं उससे कुछ न पूछूं......मैंने फिर से उसकी बात मान ली....उसकी ये हालत मुझसे देखि नहीं जा रही थी और मैं बिलकुल भी नहीं चाहता था की उससे किसी बात को लेकर कोई बहस करूँ....मैंने बहुत जिद की तब जा के वो तैयार हुई की आज खिचड़ी मैं ही बना लूँगा......मैंने वैसे तो बहुत काम किये लेकिन खाना बनाने का कोई काम कभी नहीं किया था.....सीमा लेटे लेटे ही मुझे सब बता रही थी और मैं उसी हिसाब से सब कर रहा था...इस दौरान मेरी हरकतें देख देख के कभी कभी वो जरा सा मुस्कुरा भी देती थी....लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर बिखरा हुआ दर्द साफ़ दिखाई देता था.......उसने मुझसे फिर से कहा की मैं अपने काम पर ध्यान दूं..उसे किसी प्रकार का कोई जोखिम नहीं है. कोई चोट नहीं लगी है.उसे क्या हुआ है वो बाद में बताएगी. कोई परेशानी की बात नहीं है......उसने मुझसे ये सब कह के मुझे वापस काम पर भेज दिया..

रात को भी वही हुआ.....खिचड़ी मैंने ही बनायीं...वो बस लेटी हुई थी..कभी कभी करवट बदल लेती लेकिन बहुत कराहती ऐसा करते हुए...मैं देख रहा था की उसकी साडी अब धीरे धीरे एकदम गाढ़ी लाल होती जा रही थी.....लेकिन उससे कुछ कह नहीं सक्कता था..उसी ने मना किया था......रात में हम लोग जल्दी सो गए.....सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने पाया की मेरे सर पर कुछ रेंग रहा है..मैं झटके से उठ बैठा...सीमा मेरे बगल में लेटी हुई थी....रोज तो एकदम साथ में लेटा करती थी लेकिन आज कुछ दूर हो के लेटी थी...


 सीमा – क्या हुआ? ऐसे क्यों उठ गए?
मैं – मुझे लगा की मेरे सर पर कुछ रेंग रहा है..
सीमा – अच्चा वो? नहीं कुछ रेंग नहीं रहा था मैं लेटे लेटे आपके बालों में उँगलियाँ फेर रही थी,
मैं – अच्छा...मुझे लगा की मेरे सर पर कुछ है....आज तुम्हारी तबियत कैसी है?
सीमा – कल से ठीक हूँ.
मैं – आज भी कल वाली तकलीफ है?
सीमा – हाँ.
मैं – कब तक रहेगी?
सीमा – कल तक.
मैं – उसके बाद?
सीमा – उसके बाद मैं ठीक हो जाउंगी.
मैं – पहले जैसी हो जोगी?
सीमा – हाँ. पहले जैसी हो जाउंगी.
मैं – फिर कभी ये दिक्कत नहीं होगी?
सीमा – होगी. ऐसी दिक्कत हर महीने होती है.
मैं – क्या कहा? हर महीने होती है? तुम्हें इसके पहले भी ये दिक्कत हो चुकी है? तुम इसका कुछ इलाज क्यों नहीं करवा लेती? अब तो हमें पैसे भी मिलने लगे हैं...तुम ठीक हो जाओ फिर मैं तुम्हें दवाखाने ले चलूँगा. ऐसे हर महीने थोड़ी न तुम्हारी तबियत ख़राब होने दूंगा...
सीमा – मुझे तकलीफ हुई तो आपको अच्छा नहीं लगा?
मैं – मुझे अच्छा लग सकता है क्या? कल दिन भर मैं ठीक से काम नहीं कर पाया. मुझे जरा सा कहीं चोट लग जाये एक बूँद खून भी गिर जाये तो मैं तो एकदम हल्ला मछाने लगता हूँ...फिर तुमको तो इतना खून गिर रहा था...
सीमा – सुनिए कुछ बातें हैं जो औरतों के बीच ही होती हैं. आप मर्दों के समझने की बातें नहीं हैं वो.
मैं – न तो मैं मर्द हूँ और न ही तुम औरत.....मैं लड़का और तुम लड़की. अब मुझे ठीक से बताओ ये सअब क्या हो रहा है?
सीमा – ऐसा हर लड़की को होता है. हर औरत को होता है. हमें हर महीने के दो तीन दिन ये दिक्कत होती है.इसमें कोई बड़ी बात नहीं है.
मैं – बड़ी बात कैसे नहीं है? इतना सारा खून बहना कोई आम बात है क्या? बिलकुल बड़ी बात है.तुम मुझे ये बताओ की इसका इलाज करने में कितने पैसे लगते हैं?
सीमा – इसका कोई इलाज नहीं होता. ये जरुरी चीज होती है. ये हर एक को होती है.मैं कह रही हूँ न. धीरे धीरे आप सब समझ जायेंगे.
मैं – नहीं. बिलकुल नहीं. इसका कोई तो इलाज होगा.मैंने तो नहीं देखा किसी लड़की को या किसी औरत को इस हालत में.
सीमा – आप भी न एकदम पागल हैं..इस हालत में हम लोग अन्दर रहते हैं.बाहर नहीं जाते. और ये किसी को दिखाने की चीज नहीं है. लेकिन मेरा यकीन कीजिये ये हर लड़की को होता है. हर औरत को होता है.
मैं – इसमें दर्द भी होता है?
सीमा – हाँ दर्द भी होता है. लेकिन वो ऐसा दर्द नहीं होता जैसा चोट लगने पर होता है. दर्द भी अपने आप ठीक हो जाता है.
मैं – तुम सब सच कह रही हो न? तुम्हें कोई चोट तो नहीं लगी है न?
सीमा – हाँ मैं सच कह रही हूँ. कोई चोट नहीं लगी है.......अब आप इस बारे में चिंता न कीजिये...इसके बारे में बाकी बातें मैं आपको बाद में बतौंगी...अभी मुझे भी थोड़ी शर्म आ रही है...
मैं – इसमें शर्म वाली क्या बात है.?
सीमा – सुनिए..मेरी एक बात बहुत ध्यान से सुनिए.....कल से मैं ठीक हो जाउंगी...लेकिन परसों से मेरे अन्दर बहुत तेज इच्छाएं पैदा होंगी...मैं बहुत ज्यादा वो हो जाउंगी...और ऐसे में आपको ध्यान रखना होगा...आपको सब सम्हलना होगा.
मैं – बहुत ज्यादा क्या हो जोगी??
सीमा – कुछ हो जाउंगी बस. ज्यादा नाम न पुचा कीजिये हर चीज का. आप बस इतना ध्यान रखिये की अगले दो तीन दिन तक मैं कितनी भी कोशिश करूँ लेकिन आप मेरे पास नहीं आयेंगे. मुझे कुछ करेंगे नहीं और ना ही मुझे करने देंगे.

Thursday, April 16, 2015

FUN-MAZA-MASTI मेरी बीती जिंदगी की कहानी --7

FUN-MAZA-MASTI


 मेरी बीती जिंदगी की कहानी --7


 सीमा - हाँ सच में करती थी....कई बार किया है..लेकिन किसी को छूने नहीं दिया कभी....बस दूर दूर से दर्शन करवाया है....और आप मुनिया को नहीं जानते??
मैं – नहीं.बताओ न कौन है मुनिया? तुम्हारी सहेली है कोई?
सीमा – सहेली नहीं. मेरी दुश्मन है. इस मुनिया के कारन इतनी मुश्किल होती है की जीना मुश्किल है..कभी कभी तो लगता है की मुनिया होती ही नहीं तो कितना अच्चा होता...आराम से रहती..ये न तो खुद जीती है न मुझे जीने देती है....है तो इतनी सी लेकिन इसके अरमान बहुत बड़े बड़े हैं..जब देखो तब इसे अपनी ही चिंता लगी रहती है...
मैं – उससे बहुत गहरी दोस्ती है तुम्हारी??? गाँव में रहती है??? 
सीमा – नहीं. गाँव में कैसे रहेगी. जहाँ मैं रहूंगी वही रहेगी न मेरी मुनिया..मेरे साथ साथ रहती है.
मैं – तुम्हारे साथ तो मैं रहता हूँ. मुझे तो कभी नहीं दिखी कौन है ये मुनिया? सच बताओ न ठीक से बताओ. 
सीमा – कितनी बार तो देखा है आपने...दूर से भी और पास से भी....
मैं – मुझे नहीं समझ आ रहा....
सीमा – क्यों?? सीटी नहीं सुनी?? जो सीटी सीटी करते रहते हो दिन भर वो सीटी कौन बजाता है? मुझसे तो बजती नहीं. वो सीटी मेरी मुनिया ही तो बजाती है. वही तो है मुनिया. उसी का नाम है मुनिया. 
मैं – हा हा हा हा हा उसे तुम मुनिया कहती हो...
सीमा – मैं नहीं सब कोई उसे मुनिया ही कहते हैं. 
मैं – जी नहीं. सब कोई नहीं कहते...उसे तो भोसड़ा कहते हैं. मुनिया तो तुम कह रही हो बस. 
सीमा – अरे बाप रे...मैं तो आपको बड़ा भोला समझती थी लेकिन आप तो बड़े तेज निकले....बोले भी तो क्या...सीधे भोसड़ा बोले....वाह..कहाँ से सीखा ?
मैं – अरे ये तो सब जानते हैं की उसको भोसड़ा कहते हैं.
सीमा – सैंयाँ जी.....आप रहने दो ये सब. आप मत सीखो ये सारी चीजें. आपके बस की बात नहीं है. 
मैं – क्यों? मैंने कुछ गलत कहा क्या? उसे भोसड़ा नहीं कहते क्या?
सीमा – छी कितना गन्दा शब्द है....आज के बाद कभी मत कहना ये शब्द.
मैं – अच्चा मैं कहूँ तो गन्दा. और तुम जो इतनी देर से मुनिया ये मुनिया वो कह रही हो वो सब गन्दा नहीं है...
सीमा – बिलकुल नहीं है. वो तो सुनने में कितना सुन्दर लगता है...अच्छा छोटा सा शब्द...लेकिन आपका शब्द तो एकदम गन्दा है.और ये भी जां लो की जो मैं कह रही हूँ वो सबको होता है लेकिन जो आप कह रहे हैं वो सबके पास नहीं होता.
मैं – अब देखो बातों को घुमाव मत....ठीक ठीक बताओ..एकदम साफ़ साफ़ शब्दों में...
सीमा – पहले बताओ आप कड़क होने लगे न?
मैं – नहीं तो. 
सीमा – झूठे मैं अभी पजामा खोल के देख लूंगी तो कड़क दिखेगा सब कुछ...बोलो हो रहे हो न कड़क..
मैं – हाँ....अपने आप ही हो गया....वो तुम जाने दो..पहले मुझे ठीक से बताओ की ये मुनिया और भोसड़ा का क्या खेल है....
सीमा – ये सब उम्र का खेल है....देखो..मेरी है मुनिया...फिर जब चिपक लूंगी हो तो हो जाएगी चूत...और फिर उसके बाद दूसरी चीज...
मैं – चूत??? हाँ ये शब्द भी सुना है बहुत बार....मुझे लगा की चूत पीछे वाले को कहते हैं...
सीमा – आपको पता है आज मैं आप से बहुत खुश हूँ इसीलिए फायदा उठा रहे हो न...
मैं – हाँ. बता दो न सबका नाम...तुम्हारे मुंह से सुन के कितना अच्चा लग रहा है...बता दो न...
सीमा – जानती हूँ बहुत अच्छा लग रहा होगा आपको..आप तो हो ही ऐसे.......जब लड़की चिपक ले और घुसवा ले अपने अन्दर तो उसकी मुनिया खुल जाती है..फिर उसे चूत कहते हैं....
मैं – वो तो समझ गया...भोसड़ा किसे कहते हैं...
सीमा – कितने उतावले हुए जा रहे हो...हा हा हा हा हा 
मैं – बता दो न...बता दो न..

सीमा – जब बहुत बार चिपक ले और बहुत लोगों से चिपक ले और बहुत ज्यादा चिपके तो फिर चूत बहुत ज्यादा खुल जाती है...उसे भोसड़ा कहते हैं..इसलिए हर किसी को भोसड़ा नहीं होता. भोसड़ा उसी को होता है जो कई कई साल तो खूब चिपके. इतना चिपके की उसकी खुल जाए....तब बनती है भोसड़ा.
मैं – तुम्हें चूत चाहिए की भोसड़ा?
सीमा – हट....कुछ भी बोलते हो. अब बस. बहुत हो गया. अब चुप हो के सो जाओ. मुझे नहीं बात करनी. 
मैं – बताओ न....तुम्हे भी तो कितना मजा आता है ये सब बात करने में....तुम्हारी सांस कैसे तेज हो गयी है...मुझे कहती हो और अपने को तो देखो..खुद भी तो कितना सी सी कर के बताती हो ये सब...बताओ न...
सीमा – क्यों? मुझे मजा नहीं आना चाहिए क्या??? मैं तो बहुत मजा लूंगी. पहले से बताये देती हो.....मुझे खूब मजा चाहिए..जी भर भर के......और सुनो...भोसड़ा हर औरत को नहीं होता.क्योंकि औरत तो सिर्फ एक से ही चिपकती है. तो एक से चिपक के कभी चूत भोसड़ा नहीं बनती. भोसड़ा तो तब बनती है जब उससे बहुत लोग चिपकें...जब बहुत सरे लोग चिपकते हैं तब कहीं भोसड़ा बनती है.....समझे ?
मैं – हाँ. 
सीमा – अगर अभी भी न समझ में आये तो ये जां लो की भोसड़ा औरत को नहीं होता..भोसड़ा रंडी को होता है....अब समझ में आया?
मैं – हाँ. आ गया. 
सीमा – अब बताओ..मुझे क्या दोगे? चूत या भोसड़ा?
मैं – चूत. 
सीमा – हा हा हा हा क्यों भोसड़ा क्यों नहीं ??
मैं – क्योंकि तुमसे सिर्फ मैं चिपकुंगा.
सीमा – हाँ तो आप खुद ही इतने ताकतवर हो की अकेले अपने दम पर ही मेरी मुनिया का भोसड़ा बना देना...
मैं – हाँ...

अब मेरे मुंह से हाँ हाँ के सिवा कुछ और निकल नहीं रहा था.....आज दिन भर की उथल पुथल के बाद रात में ऐसा रंग बरसेगा ये तो मैंने सोचा नहीं था...वैसे सीमा का ये तरीका हमेशा ही काम करता था...वो अचानक ही ऐसी गरम गरम बातें शुरू कर देती थी और मैं कब उसके चक्कर में गरम हो जाता था मुझे पता भी नहीं चलता था...फिर से वही हुआ जो हर बार होता था.मेरा पूरा खून मेरे अण्डों में भर गया...लेकिन इस बार सीमा ने कुछ ऐसा किया जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी...उसे भी अंदाजा हो गया था की मेरा लंड फट जाने की हद तक कड़क हो चूका है.....उसने मुझसे पूछा भी और मैं हाँ कह दिया...उसने खुद ही मेरा कुरता और पैजामा उतर दिया....फिर मेरी चड्डी भी निकाल दी....मैं बस खड़ा था और उसे ये सब करता देख रहा था....सीमा मुझे ले के छत के उस हिस्से पर आ गयी जहाँ भैया के घर के पानी की टंकी राखी हुई थी.....उसने मुझे इशारा किया की मैं इसके ऊपर आ जाऊं.....मुझे कुछ समझ में नहीं आया लेकिन मैंने कुछ सोचा नहीं और उस टंकी के उपर चढ़ गया....टंकी ज्यादा ऊँची नहीं थी.मेरी कमर तक की ऊँचाई की थी इसलिए आसानी से चढ़ गया.....सीमा ने टंकी का ढक्कन हटाया..और मुझसे इशारे में कहा की इसके अन्दर करो.......मुझे तब समझ आया की उसने मुझे उपर चढ़ने को क्यों कहा था.....मुझे एक पल के लिए भी ये नहीं लगा की इसमें कुछ गलत है...आज इतना कुछ पहले ही हो चूका था और अपने भैया और भाभी का हमने वो रूप देख लिया था की अब ये सब करना मुझे जायज ही लग रहा था.....सो मैंने बिना किसी देरी के अपने लंड को निशाने पर लगाया और उस पानी की टंकी में अपना योगदान देने लगा.......मेरी टंकी तो खाली हो गयी..भले ही उस टंकी में उफान न आया हो...मैं नीचे उतर आया...इस काम से मैं बड़ा रोमांचित था.....लेकिन सीमा के होते रोमांच इतनी जल्दी ख़त्म कैसे हो सकता है......मैं अभी नीचे उतर के खड़ा ही हुआ था की सीमा ने अपनी साड़ी खोलनी शुरू कर दी.....मुझे समझ में आ गया की वो क्या करने वाली है...

वो टंकी मेरे लिए तो ठीक थी लेकिन उस पर चढ़ना अकेले सीमा के बस की बात नहीं थी...मैं अभी इस झटके से ही नहीं उबार पाया था की आज सीमा पहली बार मेरे सामने एकदम नंगी थी...एकदम नंगी...उसकी कमर में बंधे उस काले रेशमी धागे के सिवा उसके शरीर पर एक भी कपडा नहीं था..और उसने मुझसे कुछ छुपाने की कोशिश भी नहीं की थी.....उसने मुझे कहा की मैं उसे ऊपर चढाओं.....मैं तो राजी था ही...वो टंकी के ऊपर झुकी हुई थी..चढ़ने की कोशिश में उसने एक पैर ऊपर रखा और अपने हाथों से खुद को ऊपर खीचना चाह रही थी.....मैं उसे एकटक देखता रह गया..एक टांग ऊपर औए एक टांग नीचे....मैं उसके पीछे था और इस तरह से खड़े होने के कारण उसके पोंद एकदम खिंच गए थे....उसकी पूरी जवानी छलक के बाहर आ रही थी..उसे भी पता था की मैं किस काम में खोया हुआ हूँ...उसने मुझसे कहा भी की मुझे बाद में देख लेना.आज तो पूरी नंगी हुई हूँ आपके लिए. लेकिन अभी मुझे ऊपर करो..........मैं भी होश में आया और उसके दोनों पोंद अपने हाथ में ले लिए...उसने अपने आप को ऊपर खीचने की कोशिश की और इधर मैंने उसके पोंद पकड़ के उसे ऊपर को धकेला......वो इस बार आसानी से टंकी के ऊपर चढ़ गयी......टंकी के मुंह के दोनों तरफ एक एक टांग रखने के बाद जब वो झुकी तो मैं उसके और पास आ गया.......इस जगह से मैं उसकी धार को एक नए कोण से देख सकता था....मुझे पास में देख के उसने मेरे माथे पर हलके से धकेल के कहा “ मेरे पोंद पकड़ना जरुरी था? पीठ पकड़ के भी तो धकेल सकते थे न. बहुत बदमाश हो..” उसकी आवाज में शिकायत थी लेकिन नाराजगी नहीं थी..मैं हलके से हंसा और फिर मेरी नज़र टिक गयी उसकी मुनिया पर......और फिर वही मधुर सीटी की आवाज.....और इस बार तो नीचे टंकी में भरे पानी में उसका पानी गिरने से और भी तेज छल छल की आवाज हो रही थी...फिर उसे भी मैंने नीचे उतार लिया....


अब इस समय छत पर हम दोनों नंगे थे..न उसने कुछ पहना न मैंने...न उसने कुछ कहा न मैंने.....न उसकी साँसें धीमी हो रही थी न मेरी..न उसकी धड़कन शांत हो रही थी न मेरी...चरों तरफ सन्नाटा...हलकी हलकी रौशनी से ज्यादा कुछ नहीं था...हम एक दुसरे को देख रहे थे...मैं बुरी तरह से बेचैन था उसे जकड लेने के लिए और जनता था की वो भी चिपक जाने के लिए एकदम तैयार थी...लेकिन न उसने पहल की और ना ही मैंने...हम ऐसे ही एक दुसरे के सामने बहुत देर तक बैठे रहे.....शायद ये भी हमारे काबू करने का कोई इम्तिहान ही था....हमें कोई जल्दीबाजी नहीं थी....आज मैं इस बात से ही खुश था की सीमा आज पहली बार मेरे सामने अपनी इच्छा से एकदम नंगी हुई है..और उसने अभी भी खुद को ढंका नहीं था......मैं इस बात से भी खुश था की आज उसके शरीर के एक हिस्से को मैंने छुआ भी थ...न सिर्फ छुआ था बल्कि ऊपर चढाने के बहाने बढ़िया ढंग से दबा भी लिया था.........मुझे ये भी समझ में आया की आज सीमा ने इतना ज्यादा पानी क्यों पिया था और मुझे भी पिलाया था.....रात भर हम यही करते रहे..उनकी टंकी को हमने अच्छी तरह से भर दिया....जब जब सीमा को ऊपर चढ़ना होता मैं उसे पीछे से धक्का देता और वो बिना किसी हिचक के मुझे अपने पोंद दबाने का पूरा मौका देती.......जब सुबह की पहली किरण फूटने लगी तो हमने उस टंकी का एक बार और प्रयोग किया..इस बार अपना पेट भी साफ़ किया और फिर कपडे पहन के तैयार हो गए....भैया और भाभी के जागने के पहले ही हम वहां से निकल जाना चाहते थे..और हमने वही किया.....

कर्फ्यू हट गया था और जैसे जैसे सूरज की रौशनी बढ़ रही थी सड़क पर लोगों की चहल पहल बढ़ रही थी.....मेरा मन कुछ शांत था..और मन के शांत होते ही पीठ के दर्द ने अपनी दस्तक दे दी थी.........ये भी एक आश्चर्य की बात थी की दिन भर और रात भर लगातार इतना कुछ हो रहा था की पीठ के दर्द की तरफ ध्यान ही नहीं गया...और अब जैसे ही मन कुछ शांत हुआ तो दर्द एकदम से जाग गया....सीमा मेरे बगल में चल रही थी.......हम लोग इस बार बस अड्डे नहीं गए.....बल्कि राह पूछते पूछते उस जगह पहुचे जहाँ उन साहब ने अपने ठेकेदार दोस्त के काम के बारे में बताया था...अभी उस जगह पर कोई भी नहीं था....वहां के काम करने वाले शायद अभी पहुचे नहीं थे.....हमने देखा की ये कोई कॉलोनी बन रही थी....बहुत सरे घर एक साथ बन रहे थे..हालांकि अभी काम पूरा नहीं हुआ था.....लेकिन अपने सामने फैली उस लम्बी घरों की श्रंखला को देख के हम दोनों के ही मन में ये ख्याल आया की किसी न किसी दिन इन्ही में से एक घर हमारे नाम का भी होगा........अपना झोला लिए हम उस कॉलोनी के दरवाजे के किनारे बैठ के और लोगों के आने का इन्तेजार करते रहे....

 






FUN-MAZA-MASTI मेरी बीती जिंदगी की कहानी --6

FUN-MAZA-MASTI


 मेरी बीती जिंदगी की कहानी --6

अभी सुबह ठीक से नहीं हुई थी जब सीमा ने मुझे उठाया....पिचली रात उसकी कामुक बातों ने ऐसा जोरदार असर किया था की सुबह जब नींद खुली तब भी अपने आप को कड़क ही पाया....सीमा को भी कल रात की याद तो होगी ही...लेकिन वो शर्मा नहीं रही थी..बल्कि धीरे धीरे मुझे देख के मुस्कुरा रही थी..जैसे कह रही हो की अभी आपने देखा ही क्या है......खैर...सुबह सुबह हमें सुबह के काम भी करने थे....भैया और भाभी के बर्ताव ने हमारे अन्दर उनके प्रति काफी आक्रोश भर दिया था...लेकिन उसे किसी और तरीके से निकाला नहीं जा सकता था....उनसे जा के तो हम कुछ कह नहीं सकते थे..जो भी हो हम रह तो उन्ही की छत पर रहे थे....हमने अपना आक्रोश तो नहीं निकाला लेकिन पेट में जो कुछ था वो सब निकाल दिया..उन्ही के छत के उपर.....छत इतनी छोटी भी नहीं थी की हमारे रहने के लिए और काम करने के लिए जगह कम पड़ जाए....सुबह सुबह के उस काम में हमें मजा बहुत आया..हालांकि सीमा ने साफ कह दिया था की नीचे वाले लोग उठ गए लगते हैं इसलिए चुपचाप काम करो...कोई शैतानी करने की जरुरत नहीं है...कल रात में उसका रंग देख के तो मैं भी एकदम निश्चिंत हो गया था की मुझे सिर्फ कुछ ही महीनो का इन्तेजार करना है बस..उसके बाद तो सीमा खुद ही इतनी तेज है की मुझे कुछ करने की जरुरत नहीं पड़ेगी..वो खुद ही मुझसे सब कुछ करवा लेगी.....

सुबह तो हो गयी...अब दिन का क्या होता..कैसे गुजरता? ये भी एक सवाल था....यही फैसला किया की उन्ही दोनों साहब लोगों के यहाँ जा के देखता हूँ.....जिनके यहाँ पहले काम मिला था..उन्होंने आज भी काम दे दिया..वही सारा काम निपटाया उनका..लेकिन आज उनके पास मुझे देने के लिए रात का खाना नहीं था....उन्होंने पैसे देने को कहा तो मैंने मना कर दिया...ये विनती कर ली उनसे की अगर दिन में कुछ बच जाए तो मुझे रात में दे दीजियेगा...साहब ने हाँ कह दी...कुछ और घरों में घुमा लेकिन कुछ काम मिला नहीं.......फिर उन्ही पियक्कड़ साहब के यहाँ जाने की सोची....उनके यहाँ गया...साहब जाग रहे थे...मुझसे अच्छे से मिले...मैंने उन्हें बताया की कैसे कैसे मुश्किल से उनकी दारु मिली है कल..सुनकर वो बहुत प्रभावित हुए से लगे...मेरा पीठ का जख्म भी देखा....मेरी पीठ रह रह के सुलग उठती थी..कुछ देर ठीक रहती लेकिन फिर अचानक ही उसमे दर्द की एक लहर सी उठती और लगता की पूरी चमड़ी सिकुड़ के एक जगह पर जमा हुई जा रही है....साहब को अपना दर्द दुखड़ा सुना तो सकता नहीं था..उनसे आज के लिए कुछ काम माँगा तो वो पूछ बैठे की काम करने लायक हो...? इतना दर्द हो रहा है आराम क्यों नहीं कर लेते?......इन्हें कौन समझाता की पीठ से ज्यादा पेट में दर्द होता है जब रोटी नहीं मिलाती समय से.....मैंने उनसे काम माँगा तो बोले की आज तो कोई काम नहीं है.......मैं उनके यहाँ से भी मायूस हो के जाने लगा तो उन्होंने मुझे आवाज लगायी और कहा की उनका एक मित्र ठेकेदार है...उसके यहाँ मुझे मजदूर की नौकरी मिल सकती है..फिर रोज रोज काम खोजने नहीं जाना पड़ेगा.......उन्होंने मुझसे कहा की जब ये कर्फ्यू ख़त्म हो जाए तो मैं आ के उनसे मिलूं.....मुझे लगा की पुलिस का डंडा एक काम तो आ ही गया......कल मुझे उन साहब ने जो सौ रुपये दिए थे वो मेरे पास रखे हुए थे..मैंने सोचा की जा के देख लेता हूँ शायद कोई दुकान खुली हो....सड़क पर आ के कुछ दूर चला तो एक कोने में एक टपरे जैसी दूकान दिखी....वहां गया तो उस आदमी ने अन्दर बुला लिया....उसके पास सिर्फ भजिया और चाय थी....उसके यहाँ से पुरे दस रुँपये का भजिया लिया मैंने...उस समय दस रुपये में इतने भजिये मिल जाते थे की दो आदमी का पेट भर जाये.....भले ही कुछ देर के लिए लेकिन पेट भर तो जायेगा ही......

अभी तक का दिन ठीक ही बीत रहा था.....भजिया ले के मैंन वापस लौट आया....चढ़ना तो उसी पेड़ के सहारे ही था......पेड़ पर आधा चढ़ा ही था की इतने में भाभी आँगन में आ गयी...मुझे देख के बोली....
भाभी – कहाँ से आ रहे हो लाट साहब 
मैं – बस भाभी जी ऐसे ही बाहर गया था.
भाभी – और ये हाथ में क्या लिए हो?
मैं – भजिया है भाभी जी. आप खायेंगी? 
भाभी – रहने दो. और मेरी ज्यादा चापलूसी करने की जरुरत नहीं है. 
मैं – मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था भाभी जी. आपने गलत समझ लिया. 
भाभी – हाँ हम तो गलत ही समझेंगे. सही समझने की अकल तो तुम में और तुम्हारी बीवी में है....हम लोग तो मूर्ख ठहरे.
मैं – आप ऐसा क्यों कह रही हैं भाभी? ऐसा न कहें. 
भाभी – अब तू मुझे बताएगा की मैं क्या कहूँ क्या न कहूँ.....अपने खुद के सर पर छत का ठिकाना नहीं है और तू मुझे बताएगा....तेरी औकात है इतनी? तेरी इतनी हिम्मत कैसे हो गयी रे?

 मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा था की ये बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ पहुच गयी....ये क्या हो रहा है? भाभी का ये बर्ताव तो एकदम ही अजीब था.....मैं अभी भी आधा पेड़ पर चढ़ा हुआ था....मुझे लगा की ऐसे झूलते हुए कब तक बात होगी.इसलिए मैं पेड़ से कूद गया नीचे..और आँगन में आ गया...उपर छत से सीमा ये सब कुछ देख और सुन रही थी...मैं तो बात करने के लिए ही आँगन में कूदा था लेकिन उसका क्या परिणाम होगा ये मैंने सोचा नहीं था...मैं जैसे ही आँगन में कूदा वैसे ही भाभी ने जोर जोर से शोर मचाना शुरू कर दिया........”अजी सुनते हो देख लो अपने भाई की करतूत ....बहार निकालो जल्दी यहाँ आओ नहीं तो ये मेरी इज्जत ले लेगा....इसे ही घर में रखने को कह रहे थे न अब देख लो ये तुम्हारी घर की इज्जत को मिटटी में मिला देना चाहता है...कहाँ हो जल्दी से बाहर आओ...”...........मैं जहाँ कूदा था वही जम सा गया......भाभी की आवाज कान में गूंज रही थी और ये समझ में आ रहा था की अब बहुत गलत होने वाला है लेकिन उससे कैसे बचूं क्या करूँ ये नहीं जनता था......इतने में भैया भी बाहर आ ही गए....उन्हें भी अपनी बीवी की ही बात सुन्नी थी......इतनी देर में भाभी ने अपनी साड़ी का पल्लू नीचे गिरा लिया था और अपने बाल थोड़े बिखेर लिए थे....भैया ने आते ही उनसे पुचा की क्या हुआ.....भाभी ने ये बताया की वो जैसे ही नहाने के लिए बाहर आयीं मैं ऊपर पेड़ पर था...उन्होंने अपने कपडे खोलने शुरू ही किये थे की मैं एकदम से आँगन में कूद आया और उनका हाथ पकड़ कर उनके साथ जबरदस्ती करने लगा..........जाहिर सी बात है की भैया को अपनी बीवी की बात ही सही लगी होगी...फिर उन्होंने देखा भी की भाभी का पल्लू नीचे गिरा हुआ था और उनके बाल बिखरे हुए थे...लेकिन उन्हें ये नहीं दिखा की मैंने एक हाथ में पानी की बोतल ली हुई है और दुसरे हाथ में एक थैली है...तो मैं उनके साथ ये सब कैसे कर सकता हूँ....सबसे बड़ी बात ये की वो मेरे भैया हैं...और उन्होंने तो मुझे जनम से देखा है...उन्हें तो मेरी नीयत और मेरी फितरत के बारे में पता होगा...उन्हें तो मालूम होगा की मैं ऐसी हरकत कभी सपने में भी नहीं कर सकता.........लेकिन उन्हें अपनी बीवी के सिवा किसी और की बात कैसे सही लग सकती थी.......

भैया ने भी भाभी के साथ मिल कर मुझे उल्टा बकना शुरू कर दिया और मेरी तरफ आगे बढे...उन्हें अपनी तरफ आता देख मैं पीछे नहीं हटा बल्कि अपनी ही जगह पर खड़ा रहा....मुझे भी देखना था की आज ये लोग किस हद तक गिरेंगे.....भैया आगे आये और उन्होंने मेरे गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया...फिर मेरा हाथ पकड़ के मुझे कुछ देर हिलाते रहे और एक दो थप्पड़ और लगा दिए...इस सब में मेरे हाथ से वो भजिया की थैली गिर गयी और सब फ़ैल गया.......दोनों मियां बीवी मुझे एक साथ कोस रहे थे और दुनिया भर की गालियाँ जो उन्हें आती होगी वो मुझे दे रहे थे.....मैं चुपचाप सब सुन रहा था...और फिर अंत में भैया की आवाज सुनाई दी की कर्फ्यू खुले या न खुले मैं अभी अपना सब सामान ले के उनके यहाँ से चला जाऊं और फिर कभी उनके सामने न आऊंगा...........मैंने जमीन पर से वो सब बिखरे हुए भजिये उठाये.....और चुपचाप बिना कुछ कहे पेड़ से चदकर ऊपर आ गया.........गुस्सा मुझे भी खूब आता था...लेकिन उस दिन जैसा गुस्सा मैंने खुद अपने अन्दर कभी नहीं देखा था..जब भैया मुझे मार रहे थे तब मैं अपने मन ही मन एक ही बात याद कर रहा था की सीमा ने कहा है की गुस्सा नहीं करना है...गुस्सा अगर आये भी तो उसे बाहर नहीं आने देना है..मैं अपने ऊपर संयम किये खड़ा रहा...कुछ किया नहीं..लेकिन इसका ये मतलब नहीं की मुझे गुस्सा आया ही नहीं......मारे गुस्से के मेरी आँखें लाल हो गयी थी..मैं जब ऊपर आया तो सीमा ने दोनों ही चीजें मेरे हाथ से ले ली..हम लोग वही छत पर बैठ गए....न उसने कुछ कहा न मैंने......हम कह भी क्या सकते थे एक दुसरे से.......सीमा ने थैली खोली और मेरी तरफ की....मेरा मन नहीं था कुछ खाने का.......

सीमा – खाने से क्या दुश्मनी है? खाना खा लो. 
मैं – मन नहीं है. तुम कुछ देर कुछ न बोलो..
सीमा – नहीं.मैं चुप नहीं रहूंगी. मैं तो बोलूंगी. मैं चुप रही तो आप का गुस्सा शांत हो जायेगा. 
मैं – तो क्या चाहती हो? मेरा गुस्सा शांत न हो? तुम्हारी बातों ने मुझे रोक दिया वरना आज मैं इन दोनों को इनकी औकात याद करवा ही देता. 
सीमा – जानती हूँ...बल्कि मुझे तो ये डर था की कहीं आप का हाथ उठ गया तो भैया तो एक हाथ में ही ढेर हो जायेंगे..फिर क्या होगा....अच्चा हुआ की आपने काबू रखा खुद पर...
मैं – तुम्हें मजाक लग रहा है? भाभी ने क्या आरोप लगाया मेरे उपर वो सुना नहीं तुमने?
सीमा – सुना. सब कुछ सुना. इसीलिए तो कह रही हूँ की मैं सच में बहुत खुश हूँ की आपने अपने गुस्से पर काबू रखा.......वरना आज कुछ भी हो सकता था...
मैं – हम यहाँ एक पल भी नहीं रहेंगे सीमा..अभी सब सामान उठाओ और चलो यहाँ से.
सीमा – नहीं. हम कहीं नहीं जायेंगे..हम आज की रात यही रहेंगे..हाँ कल सुबह जरुर चले जायेंगे....

मैं – मैं यहाँ एक पल भी नहीं ठहर सकता सीमा..मुझे अभी ही यहाँ से जाना है...इस घर में रहना मेरे लिए मुश्किल है.
सीमा – आसान तो मेरे लिए भी नहीं है. लेकिन हम यहीं रहेंगे...आज की रात हम यहीं रहेंगे...आपको मेरी बात अभी सही नहीं लगेगी. इसलिए मैं आपसे कह रही हूँ की अभी इस बारे में कुछ न कहिये..बस मेरी बात मान लीजिये...आपने मेरी इतनी बातें मानी है...एक बात और सही....
मैं – मेरी भी अपनी एक हद है सीमा..मैं कहाँ तक सहन करूँ? मैं कभी भाभी के बारे में ऐसा सोच सकता हूँ जैसा उन्होंने मेरे ऊपर आरोप लगा दिया? और वो तो मेरा बड़ा भाई है....उसे तो समझ में आना चाहिए न की क्या सही है और क्या गलत है...लेकिन उसे भी अपनी बीवी के सिवा कुछ नहीं दिखता..कुछ समझ नहीं आया उसे..मुझ पर हाथ उठा दिया मुझे इस बात का दुःख नहीं है. लेकिन इस तरह का आरोप मेरे ऊपर लगाया....
सीमा – हाँ...उन्होंने सही नहीं किया.
मैं – मैं अब उस आदमी की इज्जत नहीं कर सकता सीमा. मैंने अभी तक उसे अपना बड़ा भाई माना लेकिन अब वो मेरे लिए मर चूका है.....मेरा न कोई भाई है और ना ही कोई भाभी......तुम तो सब सुन रही थी न...सब देखा न तुमने..मैं तो सीधे ऊपर आ रहा था..भाभी ने ही मुझे रोका..उसी ने मुझसे बात की....मैं तो बात करने के लिए नीचे उतरा था न...फिर क्यों उसने ये सब कहा मेरे बारे में? मेरा ऐसा तो कोई इरादा था ही नहीं न ही कभी हो सकता है...फिर क्यों उसने ऐसा किया मेरे साथ....
सीमा – ये आप समझ नहीं सकते. ये औरत का ही एक रूप है......मैं समझ सकती हूँ की उसने ऐसा क्यों किया....लेकिन अभी आप मेरी बात मानिये..और इस सबमे न पदिये..जहाँ इतना सब सह लिया है वहां थोडा सा और सही.....हम कहीं नहीं जायेंगे..हम आज रात यही रहेंगे....हाँ कल सुबह जरुर हम यहाँ से निकल जायेंगे...

मैं काफी देर तक चुप बैठा रहा....सीमा ने भी इस बीच कुछ नहीं कहा...इस छत पर कल हमें इस समय बहुत तेज धुप लग रही थी..और आज इसी छत पर हमें धुप का ख्याल भी नहीं था...आज मन के अन्दर ही इतनी तेज आग जल रही थी की उसके सामने ये बाहर की धुप कोई असर नहीं कर रही थी.....दिन भर मैं वहीँ बैठा रहा..कहीं काम खोजने नहीं गया..हम जैसे तैसे वो भजिये खाए....न भूख लग रही थी न प्यास...सब कुछ पहले ही हराम हो चूका था.....जब शाम होने को आई तो सीमा ने फिर से बात करना शुरू किया.....मुझे ध्यान आया की मैंने उसे दिन वाली बात नहीं बताई थी जो उस बड़े साहब ने कही थी..मैंने उसे बताया की उन साहब ने मिलने को कहा है..ठेकेदारी के काम हैं उनके....उनके यहाँ रोज का काम मिल जायेगा....सीमा सुन के बड़ी खुश हुई....फिर हम लोग बहुत देर तक चुप बैठे रहे....अब धीरे धीरे अँधेरा होने लगा था....अभी तक भैया या भाभी ने और कोई बात नहीं कही थी......सीमा ने मुझसे कहा की मैं जा के उनसे कहूँ की हमें आज रात को यहाँ रुकने देन..हम लोग कल सुबह चले जायेंगे......मुझसे ये बात बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं हुई...एक तो उन लोगों ने मेरे साथ ऐसी हरकत की ऊपर से अब मैं ही उनके पास विनती करता हुआ जाऊंगा....मैं नहीं मान रहा था..लेकिन सीमा ने मुझे जबरदस्ती वहां भेज ही दिया....उसकी बात मानने के सिवा कोई और चारा मेरे पास था नहीं.....मैं फिर से अपने भैया और भाभी के सामने खड़ा था..दोनों मुझे देख नहीं बल्कि घूर आहे थे....मैंने बहुत धीमे से उनसे कहा की मुझे आज रात को रुक लेने दीजिये मैं सुबह होते ही निकल जाऊंगा.......दोनों ने न तो हाँ कहा न ना कहा..मुझे लगा की इससे ज्यादा बात नहीं करनी चाहिए...मैं वापस मुड के चलने लगा तो पीछे से भाभी की आवाज आई...”दूसरों के घर जा जा के काम करता है अगर यहाँ रहना है तो हमारे घर का काम करने में क्या शर्म आती है? बाहर आँगन में जा के सब कपडे धो देना और सब बर्तन धो देना. सुन लिया की नहीं? “.....सुन तो मैंने लिया था....मैं बाहर आँगन में आ गया..

सीमा छत के कोने पर बैठी नीचे ही देख रही थी.....मैं नीचे बैठ के काम में लग गया....कभी बीच बीच में ऊपर देखता तो उसे देखता हुआ ही पाता..उसकी नज़र लगातार मुझ पर ही टिकी हुई थी..मैं शांति से सब काम कर रहा था..मन में गुस्सा तो बहुत था लेकिन सीमा की बात काटने का मन नहीं था.....भाभी ने शायद मुझे ऊपर देखते हुए देख लिया होगा...उसे तो एक और मौका मिल गया..वो कैसे चूक सकती थी...तुरंत बाहर आई और एकदम से उसने ऊपर देखा...सीमा को पता नहीं था....भाभी ने सीमा को मुझे देखते हुए देख लिया....और फिर उसकी आकाशवाणी शुरू हो गयी.....” ये देखो मेरे ही घर में इनका नैन मटक्का चल रहा है...खाने के पैसे नहीं हैं लेकिन इनकी मस्ती ख़त्म नहीं होती..क्यों रे मोहन तू कैसे शांत करता है इसको? काबू में रहती है तेरे? तू जो ये पैसा ले के आता है कहाँ से मिलता है तुझे/ बता/ कहाँ से लाया था ये भजिया? अपनी बीवी को दूसरों के पास भेजना शुरू कर दिया है क्या?? अच्छा है....कच्ची कलियों के दाम बहुत मिलते होंगे..और इस कलमुही को देखो....ऊपर बैठे बैठे नज़र कैसी तीखी चला रही है...बहुत गर्मी चढ़ी हुई है इसे...ये तुझसे न सम्हालती हो तो इसे धंधे पर लगा देना..इसकी गर्मी भी शांत हो जाएगी और तुझे पैसे भी मिल जायेंगे...वैसे भी तू तो पांचवी फेल है तुझे कौन नौकरी देगा अपने यहाँ...तू इसका भडवा बन जाना...वही तेरे लिए सबसे सही नौकरी है..तू तो है ही भडवे जैसा..तेरी शकल में ही लिखा है....”......भाभी बिना किसी विराम के बोले जा रही थी...ऊपर सीमा भी ये सब सुन रही थी और नीचे मैं भी.....लेकिन न उसने कुछ कहा न मैंने.....आज भाभी को मुफ्त का नौकर मिला हुआ था..अपने घर के सब काम करवा लिए मुझसे......अपने यहाँ का गुसलखाना भी मुझी से साफ़ करवाया....मैं सब काम कर रहा था..मुझे भी देखना था की ये कहाँ तक जा सकते हैं..किस हद तक इनके अन्दर मेरे लिए नफ़रत भरी हुई है.....शायद सीमा ने मुझे यही जानने के लिए भेजा था...ताकि मुझे समझ में आ जाये की अपने सगों की नज़र में मेरी क्या अहमियत है........जब सब काम ख़त्म हुए तो मैं ऊपर आने लगा....अब तक भाभी अन्दर जा चुकी थी....सीमा ने उपर से ही पानी का बोतल नीचे फेंका और कुछ खाने को ले आने को कहा....मुझे पता था की अभी कुछ देर सीमा मुझे घर से बाहर रखना चाहती है ताकि और कोई नया बखेड़ा न खड़ा हो..मैं पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गया......उसी भजिये वाले के यहाँ गया सीधा...उसके पास जो भी था वो सब ले के वापस आ गया....आते समय एक बोतल पानी और ले आया था.......वापस आ के मैं सीमा के पास बैठ गया...अब थोड़ी थोड़ी रात हो गयी थी...सीमा ने मुझसे पानी की बोतल ली और पूरी बोतल एक सांस में पी गयी.....बोतल खली हो गयी तो उसने मुझे और पानी लाने को कहा......


मैं भी परेशां था सुबह से ऊपर से उसकी हरकतें मुझे समझ नहीं आ रही थी....मैं कोई बहस नहीं की....मैं जब नीचे जाने लगा तो बोली की भले ही मुझे प्यास हो चाहे न हो मैं आने के पहले एक बोतल पानी खुद पियूँगा और एक बोतल ले के आऊंगा......मैं सुबह से इतना ज्यादा थक चूका था मानसिक रूप से की न तो मुझमे शक्ति थी बहस करने की और ना ही कुछ सोचने की..मैं उसकी बात मान के चला गया..और कुछ देर में पानी ले के वापस आया......हम लोग कुछ देर ऐसे ही बैठे रहे........अभी रात इतनी ज्यादा भी नहीं थी की हमें दूर से एक रिक्शे पर बैठा हुआ कोई आता दिखाई दिया.....ये घोसना करने वाले लोग थे..और वो ये बता रहे थे की कल सुबह से कर्फ्यू खुल जायेगा..लेकिन कल सुबह तक कोई बाहर न निकले वरना उसे फ़ौरन गिरफ्तार कर लिया जायेगा.......जैसे जैसे वो रिक्सा पास आ रहा था उसकी आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी और जब हमने ये घोसना सुनी तो हमें ऐसा लगा जैसे कितना बड़ा खजाना मिल गया हो हमें.....कर्फ्यू का खुलना अच्छी खबर थी.....इस जगह से ज्यादा हमें वो बस अड्डा अपना लगता था.......दिन भर की बुरी बातें एक ही पल में दूर हो गयीं....ऐसा लग रहा था जैसे किसी जेल से रिहा होने वाले हैं हम लोग....जो मेरे मन में चल रहा था वही सीमा भी सोच रही थी...उसे भी इस बात से बहुत ख़ुशी हुई थी.......हम लोग कुछ देर बैठे रहे और फिर हमने रात के खाने के नाम पर जो कुछ भी हमारे पास था वो खा लिया....अब रात गहरी हो चुकी थी...पास के घरों की बत्तियां भी बंद हो गयी थीं....भैया और भाभी ने इस बीच हमें न तो कुछ कहा ना ही हमसे कुछ पूछा...सोचने पर अजीब सा भी लगता था की क्या उनके मन में इतना भी भाव नहीं आया होगा की एक बार हमसे खाने को कुछ पूछ ही लेते......जब अँधेरा बढ़ गया तो सीमा ने कहा....

सीमा – लगता है सब घरों की बत्तियां बंद हो गयी हैं.
मैं – हाँ. काफी रात हो गयी होगी अब तो...सब सो गए होंगे..
सीमा – आज मैं आपसे बहुत खुश हूँ.
मैं – क्यों? मैंने क्या किया आज?
सीमा – आज आपने मेरे कहने पर अपने अहं की परवाह नहीं की और मेरी बात को पुरे मन से माना.
मैं – तो ये तो मैं रोज ही करता हूँ..
सीमा – हाँ लेकिन रोज आप का इतना अपमान नहीं होता और रोज आपको इतना गुस्सा नहीं आता. अपने अपमान को और अपने गुस्से को आपने नीचे रख कर मेरी कही गयी बात को ऊपर रखा इस बात से मैं बहुत खुश हूँ.
मैं – मुझे भी अपने गुस्से पर काबू कर के अच्छा लगा. लेकिन सीमा ऐसा करने से मेरा गुस्सा ख़त्म नहीं हुआ...
सीमा – मैं चाहती भी नहीं की आपका गुस्सा ख़त्म हो....अगर हमने कोई गलती की होती तो हम उसकी सजा जरुर भुगतते...लेकिन जब हमने इन दोनों का कुछ बिगाड़ा नहीं तो फिर इन्हें कोई हक नहीं है हमें इस तरह से रखने का और हमारे साथ ये सब करने का...लेकिन अभी वक़्त उनके साथ है. हमारे पास तो वैसे भी इतनी सारी दिक्कतें हैं..हम पहले अपने पैरों पर ठीक से खड़े हो जाएँ उसके बाद इनका हिसाब करेंगे...लेकिन तब तक आपका गुस्सा न तो ठंडा होना चाहिए और ना ही ख़त्म होना चाहिए..गुस्से की आग जब मन में जलती है तो वो आदमी को बहुत आगे ले जाती है..उसे सही तरह से इस्तेमाल किया जाए तो वही गुस्सा अपने आप में बहुत बड़ी प्रेरणा और शक्ति बन जाता है.....बदले की भावना को हम भले ही बुरा समझते हों लेकिन अपने ऊपर किये गए अत्याचार को भूल जाना भी उतनी ही बुरी बात है..
मैं – जब तुम इस तरह की बात करने लगती हो तो मुझे डर लगने लगता है...लगता है तुम्हारे अन्दर बहुत कुछ ऐसा भरा हुआ है जो तुम बाहर नहीं निकलना चाहती....न जाने कैसे कैसे दिन देखे होंगे तुमने बचपन में जो तुम्हारे मन में इतनी जल्दी इतनी कठोर बाते आ गयी हैं...
सीमा – आपने अपने गाँव में भी देखा होगा...बच्चियां ज्यादा कपडे कहाँ पहनती हैं..कुछ भी हलका सा पहन लेती हैं बस...वैसे भी दिन में इतने काम होते हैं...तो पुरे कपडे पहन के तो काम किये नहीं जा सकते.....देखा होगा न?
मैं – हाँ. क्यों?
सीमा – मेरी सौतेली माँ मुझे पहनने के लिए कपडे नहीं देती थी....मुझे सिर्क एक कमीज दे दी जाती थी..न उसके साथ सलवार मिलती थी न दुपट्टा...सिर्फ एक कमीज..उसे पहन के ही मुझे सारे काम करने होते थे..उसे पहन के ही मुझे खेतों में जा के फसल भी काटनी होती थी..उसे पहन के मुझे पानी भी भर के लाना होता था..कमीज तो देखि होगी आपने..उसमे कमर से दो पल्ले हो जाते हैं कमीज के....वो टांगों तक तो आती है लेकिन उसके दोनों पल्ले हवा में उड़ाते रहते हैं.....जरा सोचिये मैं कैसे सब कुछ करती थी....मुझे नीचे पहनने के लिए चड्डी भी नहीं देती थी वो....इसी एक कमीज को पहन के सब काम करना और फिर नहाने के लिए नदी जाना...वहां भी इसी कमीज को धोना और फिर उसके सूखने तक किसी पत्थर के पीछे नंगे छुप के बैठे रहना..इस डर से की कहीं कोई देख न ले...कोई आ न जाए...पानी ले के चलती थी तो एक मटकी सर पर होती थी और दूसरी कमर पर....राह में चलते मेरी कमीज उड उड के कहाँ जा रही है मुझे कुछ पता नहीं होता था..मैं चाहकर भी अपने आप को ढांक नहीं सकती थी.....गाँव के लोग वैसे अपने गाँव की बच्चियों को बहुत प्यार से रखते हैं लेकिन हैं तो आखिर वो सब भी इंसान ही न...किसी की नज़र अपने आप ख़राब नहीं होती..लेकिन अपने आप कुछ नज़र आ जाये तो फिर उसे देखने से बाज भी नहीं आते........इतने सालों तक मैंने गाँव में अपनी इज्जत कैसे बचायी है वो सिर्फ मैं ही जानती हूँ....


मैं – तुम्हारे बाप ने कभी कुछ कहा नहीं?
सीमा – आपको बताया था न की आदमी अपनी औरत से चिपकने के लिए दुनिया का कोई भी काम करने को तैयार हो सकता है..उसे हर कीमत पर बस चिपकने का मौका चाहिए......जब जब मेरे पिताजी मेरी कुछ मदद करते या मेरे लिए अपनी बीवी से कुछ कहते तब तब उन्हें बाहर सोने को कह दिया जाता..कुछ दिनों के बाद पिताजी को न मैं याद आती न मेरी भलाई न मेरी जिंदगी..उन्हें सिर्फ अपनी बीवी का शरीर याद आता था..और वो बार बार उससे मिन्नतें करते थे.....और वो इतनी घटिया औरत था की ये सब कुछ घर के बीचों बीच आँगन में करती और करवाती थी..ताकि मैं जहाँ कहीं भी हूँ उसकी सब बात सुन लूं और अपनी औकात पहचान लूं...मुझे भी बहुत गुस्सा आता था.....जो आज आपने अपने ऊपर सहा वो मैं हर रोज सहती थी.......मेरा अपना काबू है मेरे गुस्से पर जो मुझे आज तक जिन्दा रखे हुए हैं..इस उम्मीद में की एक न एक दिन मेरी जिंदगी भी बदलेगी और मैं भी कुछ अच्चा करुँगी..और फिर मेरा समय आएगा तो मैं इन सबसे एक एक कर के बदला लूंगी...और मैं सच में बदला लेना चाहती हूँ...मुझमे इन लोगों के प्रति कोई दया का भाव नहीं है..ना है और न ही कभी होगा......
मैं – मैं भी कभी इन लोगों को माफ़ नहीं करूँगा..
सीमा – आप कभी करना भी चाहेंगे तो भी नहीं करने दूँगी....इसीलिए आपको आज शाम को फिर से उन लोगों के पास भेजा था मैंने..ताकि आप भी देख लेन की ये लोग किस हद तक गिर सकते हैं और आपके मन में इनके प्रति कोई शंका न रहे..आप इन्हें अपना सगा न समझे..कभी ये न समझें की ये आपको सहारा देंगे.....सुन रहे थे न जब वो आपको मेरा भडवा बन्ने के लिए कह रही थी....जानते हो न की भडवा क्या होता है???? 
मैं – हाँ.
सीमा – भाभी तो माँ सामान होती है न...लेकिन आपकी भाभी मुझे रंडी बनाना चाहती है....वो चाहती है की मेरे जिस्म की कमाई खाएं आप....ये लोग हमें घर बसाते नहीं बल्कि बाजार में बिकते हुए देखना चाहते हैं...अप कहते हैं न की आपको समझ नहीं आता की इनकी आपसे क्या दुश्मनी है...दुश्मनी आपसे नहीं बल्कि आपके होने से है..आप के होते ये लोग उस संपत्ति के अकेले हक़दार नहीं बन सकते थे..इसीलिए उन्होंने पिताजी को बहला फुसला कर सबा कुछ बेच दिया...और उनसे कह दिया की वो आपका ख्याल रखेंगे...वैसे तो आपका भी हक है न उस पैसे पर..लेकिन आपको देंगे नहीं..
मैं – तो मैंने उनसे पैसा माँगा ही कब है?
सीमा – नहीं माँगा लेकिन उनके मन में तो चोर है न..वो तो हमको भी अपने जैसा ही समझते हैं..और जरुर भाभी को ये डर लगता होगा की कहीं किसी दिन आप या मैं उस पैसे का हिसाब न मांगने लग जाएँ..इसलिए हमें वो अपनी जिंदगी से एकदम दूर कर दने चाहते हैं.....
मैं – मुझे ये सब दुनियादारी में पड़ना ही नहीं है. मैं ये सब नहीं जनता न ही जानना चाहता हूँ.
सीमा – आप मत जानिए. लेकिन मुझे जानना है..मुझे हर उस एक आदमी से बदला लेना है जिसने हमारी जिंदगी पर एक भी बुरा असर डाला है...
मैं – हाँ तुम्हारे बारे में सोच कर तो मुझे भी बहुत दुःख हुआ..तुम बिना कपड़ों के कैसी रहती होगी वहां....
सीमा – बिना कपड़ों के नहीं. कम कपड़ों में..बिना कपड़ों के तो नंगी हो जाउंगी न...फिर तो मुझे कोई भी बचा नहीं सकता...सब लोग मेरा स्वाद चख लेते...
मैं – तुम कितनी आसानी से अपना मन बदल लेती हो न....अभी तो कितने गुस्से में थी और अब एकदम से फिर वही शरारत करें लगी...
सीमा – मैंने क्या शरारत की? बस इतना ही कहा की मैं नंगी नहीं थी. नंगी होती तो सब लोग मेरा भोग लगा लेते. ये तो सच बात है. इसमें शरारत क्या है? 
मैं – तुम बार बार वो शब्द बोल रही हो न जानबूझ के. 
सीमा – कौन सा शब्द? नंगी ?? ये शब्द आपको अच्चा नहीं लगता क्या? इसमें ऐसा क्या खास है? सीधा सा तो शब्द है..नंगी. क्यों आप नंगे नहीं होते कभी? जब देखो तब तो नंगे हो जाते हो...मौका मिला नहीं की हो गए नंगे...होने में शर्म नहीं आती लेकिन सुनने में शर्म आती है...वाह जी.,
मैं – तुम बहुत ज्यादा शैतान होती जा रही हो...
सीमा – होती जा रही नहीं बल्कि हूँ...शुरू से हूँ..आप ये न समझें की मैंने अपने उन कपड़ों का फायदा नहीं उठाया.....जब कभी कुछ खाने का मन होता तो मेरे लिए बहुत आसान होता थ दुकान में जा के कुछ भी ले लेना...बस ये देखना होता था की दूकान में बनिए के सिवा कोई और न हो...बस गयी...थोडा सा झुकी....अगर कमीज हट गयी तो ठीक नहीं तो किसी बहाने से अपने हाथ से हटा दी....जैसे ही बनिए ने दर्शन किये वैसे ही अपनी मन की चीज ली और पूछ लिया की ये ले लूं क्या...और उस समय तो वो लोग मुनिया के दर्शन में इतने खोये रहते थे की न पैसा मांगते न हिसाब में लिखते...
मैं – सच में ऐसा करती थी तुम??? और ये मुनिया कौन है? 
 



Raj-Sharma-Stories.com

Raj-Sharma-Stories.com

erotic_art_and_fentency Headline Animator