Showing posts with label गुमराह पिता की हमराह बेटी. Show all posts
Showing posts with label गुमराह पिता की हमराह बेटी. Show all posts

Thursday, April 2, 2015

FUN-MAZA-MASTI गुमराह पिता की हमराह बेटी--12

FUN-MAZA-MASTI

 गुमराह पिता की हमराह बेटी--12




'घर जाने के बाद तो मैं और पापा यह सब नहीं कर पाएंगे...सिर्फ एक-दो दिन और हैं हम यहाँ फिर तो जाना ही पड़ेगा...तब देखती हूँ कितना डार्लिंग-डार्लिंग करके बुलाते हैं मुझे...पर वो तो वे प्यार से कहते होंगे...मैं भी गलत-सलत सोच रही हूँ बेफालतू...' मनिका ने अपने ख्यालों को विराम देने की कोशिश की पर विफल रही 'और आज तो गुड-नाईट किस्स...मुझे तो एक बार लगा कि पापा इज गोइंग टू किस्स माय लिप्स (होंठ)...जैसा उस मूवी में था...उनकी पकड़ कितनी मजबूत है, चेहरा घुमा तक नहीं सकी थी मैं...उस दिन भी तो उनकी बाहों में...सबके सामने मुझे अपनी बाहों में भर लिया था...उह्ह.'
इसी तरह के विचारों में उलझी मनिका की आँख लग गई थी पर जयसिंह सोए न थे.
जयसिंह जानते थे कि आज मनिका इतनी जल्दी नहीं सो पाएगी सो वे देर तक आँखें मूँदे पड़े रहे थे. 'आहा आज तो मजा आ गया. साली का दीमाग पलटने में अगर कामयाबी मिल जाती है तो उसके बाद तो कुतिया के बचने का सवाल ही पैदा नहीं होता...जल्दी से सो जाए तो थोड़ा मजा कर लूँ काफी दिन हो गए...उम्म्म...अब तो वापसी का वक़्त भी करीब आ गया है.' करीब दो घंटे तक जयसिंह ने कोई हरकत नहीं की थी. जब उन्हें लगा कि अब तो मनिका गहरी नींद सो ही चुकी होगी तो उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और अपनी बेटी की तरफ देखा.
मनिका की करवट उनकी तरफ थी. कमरे में हमेशां की तरह नाईट-लैंप की रौशनी फैली हुई थी. मनिका बेफिक्र नींद के आँचल में समाई हुई थी. एक पल के लिए उसके मासूम-खूबसूरत चेहरे को देख जयसिंह को अपने इरादों पर शर्मिंदगी का एहसास हो आया था पर फिर हवस का राक्षस उन पर दोगुनी गति से सवार हो गया 'रांड चिनाल कुतिया...छोटी-छोटी कच्छियाँ पहनती है मेरे पैसों से! ऐश करती है मेरे पैसों से...और मजे लेगा कोई और? हँह!'
'मनिका!' जयसिंह ने उसे पुकारा. उन्होंने अपनी आवाज़ भी नीची नहीं की थी. मनिका सोती रही.
जयसिंह की हिमाकत अब इस हद तक बढ़ चुकी थी कि वे अब बेख़ौफ़ खिसक कर मनिका के करीब हो लेट गए और अपने हाथ से उसके गाल को एक दो पल सहलाने के बाद अपने हाथ का अँगूठा मनिका के गुलाबी होंठों पर रख कर उन्हें मसलने लगे. मनिका के रसीले होंठों को मसलते-मसलते उन्होंने अपना अँगूठा उसके मुंह में डाल दिया, मनिका के होंठों पर लगे लिप-ग्लॉस की खुशबू उसकी साँसों के बाहर आने पर जयसिंह तक पहुँच रही थी. उनकी उत्तेजना बढ़ने लगी, परन्तु जयसिंह का इरादा सिर्फ मजे लेने का नहीं था.
मनिका जयसिंह की तरफ करवट लिए इस तरह लेटी थी कि उसका एक हाथ उसने मोड़ कर अपने सिर के नीचे रखा हुआ था और दूसरा उसकी छाती के आगे से मोड़ कर बेड पर रखा हुआ था. अब जयसिंह ने मनिका के बेड पर रखे हाथ को पकड़ कर धीरे-धीरे सहलाया, फिर जब वे थोड़ा आश्वस्त हो गए तो उन्होंने उसका हाथ धीरे से उठाया और खिसक कर उसके बिलकुल करीब हो गए व उसका हाथ अपनी कमर पर रख लिया. जयसिंह और मनिका के बीच अब सिर्फ कुछ ही इंच की दूरी थी. एक बार फिर जयसिंह ने कुछ पल का विराम लिया.
थोड़ा वक्त गुजरने के बाद जयसिंह ने अब अपना हाथ भी मनिका की कमर पर रख लिया था और धीरे से अपना दूसरा हाथ नीचे से मनिका की कमर और बेड के बीच घुसाने लगे. कुछ पल की कोशिश के बाद उन्हें सफलता मिल गई, वे फिर थोड़ा रुक गए. अब उन्होंने मनिका की कमर पे रखे अपने हाथ को उसकी पीठ पर ले जा कर हौले से दबाया और उसके नीचे दबे अपने हाथ से उसकी कमर को थाम लिया. जब मनिका की तरफ से उनकी इन हरकतों की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो वे खिसक कर उसके साथ चिपक गए और फिर एकदम से बेड पर पीछे हो करवट बदल कर सीधे लेट गए.
जयसिंह ने मनिका को कस कर थामे रखा था और उनके सीधे होते ही वह भी उनके साथ ही खिंच कर बेड पर उनकी साइड पर आ गई थी. मनिका के थोड़ा ऊपर होते ही उन्होंने उसके नीचे दबा अपना हाथ ऊपर ले जा कर उसकी बगल में डाल लिया था. अब मनिका आधी उनकी बगल में और आधी उनकी छाती पर लगी हुई सो रही थी. जयसिंह के इस कारनामे ने मनिका की नींद को थोड़ा कच्चा कर दिया था और वह थोड़ा हिलने-डुलने लगी. जयसिंह ने जड़वत हो आँखें मींच ली थी ताकि उसके उठ जाने की स्थिति में बचा जा सके लेकिन मनिका ने थोड़ा सा हिलने के बाद अपना सिर उनकी छाती पर एडजस्ट किया और अपनी एक टांग उठा कर उनकी जांघ पर रख कर सोने लगी. जयसिंह को अपनी जांघ की साइड पर सटी अपनी बेटी की उभरी हुई योनि का आभास मिलने लगा था और वे दहक उठे थे.







FUN-MAZA-MASTI गुमराह पिता की हमराह बेटी--11

FUN-MAZA-MASTI

 गुमराह पिता की हमराह बेटी--11

'क्या हुआ मनिका?' मनिका के चुप हो जाने पर जयसिंह ने पूछा था.
'कुछ नहीं पापा...' मनिका ने धीमी आवाज़ में कहा.
'बुरा मान गई क्या?' जयसिंह बोले 'मैंने तो पहले ही कहा था रहने दो...'
'उह...हाँ पापा. मुझे क्या पता था कि...आप उस बात का कह रहे हो.' मनिका ने संकोच के साथ कहा. इतने दिन बीत जाने के बाद उस घटना के जिक्र ने उसे फिर से शर्मिंदा कर दिया था.
'हाहा अरे तुम न कहती थीं के कपड़े ही तो हैं..?' जयसिंह ने मनिका की झेंप कम करने के उद्देश्य से हंस कर कहा.
'हेहे...हाँ पापा.' मनिका बोली 'बट पापा उस बात का हमारे डिस्कशन से क्या लेना-देना?' मनिका ने सवाल उठाया.
'लेना-देना क्यूँ नहीं है? तुमने उस दिन जब मुझसे माफ़ी मांगी थी तब तुम्हारे मन में यही बात तो थी ना कि तुमने ओवर-रियेक्ट कर दिया था और तुम्हारा वो बर्ताव इसीलिए तो रहा था कि तुमने सिर्फ हमारे सामाजिक रिश्ते के बारे में सोचा और आग-बबूला हो उठी थी.' जयसिंह ने उसे याद दिलाते हुए कहा 'अगर वही मेरी जगह तुम्हारा कोई मेल-फ्रेंड (लड़का) होता तो शायद तुम्हारी प्रतिक्रिया वह नहीं होती जो मेरे साथ तुमने की थी...और जब तुमने सॉरी बोला था तो मुझे लगा तुम्हें इस बात का एहसास हो गया है...अब तुमने क्या सोच कर माफ़ी मांगी थी यह तो तुम ही बता सकती हो...' जयसिंह ने बात-बात में सवाल पूछ लिया था.
मनिका एक और दफा कुछ पल के लिए खामोश हो गई थी.
'वो पापा...आपसे बात नहीं हो रही थी और आप रूम में भी नहीं रुकते थे तब मैंने टी.वी पर एक इंग्लिश-मूवी देखी थी जिसमें...एक फैमिली को दिखाया था और उसमे जो लड़की थी वो बीच (समुद्र-किनारे) पर अपने घरवालों के सामने बिकिनी पहने हुए थी...सो आई थॉट कि उसके पेरेंट्स उसे एन्जॉय करने से नहीं रोक रहे तो आपने भी तो डेल्ही में मुझे इतना फन (मजा) करने दिया...एंड मैंने आपसे थोड़ी सी बात पर इतना झगडा कर लिया...' मनिका ने धीरे-धीरे कर अपने पिता को बताया.
'ह्म्म्म...मैंने कहा वो सच है ना फिर?' जयसिंह ने मुस्का कर मनिका से पूछा, उनके दिल में ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी.
'हाँ पापा...' मनिका ने सहमति जताई.
'लेकिन एक बात और जो मैं पहले भी कह चुका हूँ, और जैसा की तुमने अभी कहा कि न ही सोसाइटी और न हम हमेशा सही होते हैं, उसका भी ध्यान तुम्हें रखना होगा.' जयसिंह ने कहा. अभी तक तो जयसिंह समाज और आदमी-औरत के उदाहरण देकर मनिका से बात कर रहे थे लेकिन इस बार जयसिंह ने सीधा मनिका को संबोधित करते हुए यह बात कही थी.
'वो क्या पापा..?' मनिका ने पूछा.
'वो यही कि हर वह बात जो हमारे लिए सही नहीं है और समाज के लिए सही है या समाज के लिए सही नहीं है पर हमारे लिए सही है उसे जग-जाहिर ना करना ही अच्छा रहता है. जैसे तुम अपनी मम्मी से झूठ बोलने लगी हो...उस बात का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है.' जयसिंह ने कहा.
'हाहाहा...हाँ पापा डोन्ट वरी (चिंता) इसका ध्यान तो मैं आपसे भी ज्यादा रखने लगी हूँ...' मनिका ने हंस कर कहा.
'वैरी-गुड गर्ल..!' जयसिंह ने मनिका का गाल थपथपाते हुए कहा. मनिका भी इठला कर मुस्कुरा दी थी. 'चलो अब सोयें रात काफी हो गई है. कल काफी काम बाकी पड़ा है तुम्हारे एडमिशन का..' कहते हुए जयसिंह ने अपना दूसरा हाथ, जो अभी तक मनिका की कमर पर था, और नीचे ले जा कर उसके नितम्बों पर दो हल्की-हल्की चपत लगा कर उसे उठने का इशारा किया था.
'बट पापा! नींद नहीं आ रही आज...कुछ देर और बैठते हैं ना?' मनिका बोली.
'ह्म्म्म...ठीक है, वैसे भी एक-दो दिन की ही बात और है फिर तो हम अलग-अलग हो जाएंगे.' जयसिंह ने कुछ सोच कर कहा.
'ओह पापा ऐसे तो मत कहा करो. हमने प्रॉमिस किया था ना कि नथिंग विल चेंज बिटवीन अस..?' मनिका ने उदासी से कहा.
'अरे हाँ भई मुझे याद है पर फिर भी घर जाने के बाद कहाँ हम इस तरह साथ रह पाएंगे? और फिर कुछ दिन बाद तुम्हें वापिस भी तो आना है यहाँ...' जयसिंह मनिका को भावुक करने में लग गए थे.
'हाँ पापा...वो भी है.' मनिका बोली 'कुछ और बात करते हैं ना पापा...ऐसी सैड बातें मत करो.'
'ह्म्म्म. मैं तो कबसे बातें कर रहा हूँ...अब बोलने की बारी तुम्हारी है.' जयसिंह ने पासा पलटते हुए कहा.
'मैं क्या बोलूँ..?' मनिका ने उलझते हुए कहा.
'कुछ भी...जो तुम्हारा मन हो...' जयसिंह बोले. तभी मनिका को एक और बात याद आ गई जो उसके पिता ने कही थी और जिसका सच उसने बाद में महसूस किया था.
'पापा! एक बात बोलूँ?' मनिका ने कहा 'आप सही थे आज...' उसने उनके जवाब का इन्तजार किए बिना ही आगे कहा.
'किस बात के लिए?' जयसिंह ने कौतुहल से पूछा.
'वही जो आप कह रहे थे ना कि लड़कों से ज्यादा...वो मेन (आदमी)...मर्द या जो कुछ भी अपनी गर्लफ्रेंडस का ज्यादा ख्याल रख सकते हैं.' मनिका ने बताया.
'हाहाहा. हाँ पर ये तुमने कैसे जाना?' जयसिंह ने मजाक में पूछा था पर अपने दिल की हालत तो वे ही समझ सकते थे.
'फिर वही टी.वी. से पापा...हाहाहा!' मनिका ने हँसते हुए बताया 'आप सो गए थे तब टी.वी में देखा मैंने कि ज्यादातर हीरो-हिरोइन्स में ऐज डिफरेंस बहुत होता है फिर भी वे एक-दूसरे को डेट करते हैं. आई मीन कुछ तो लिटरली (ज्यों के त्यों) आपकी और मेरी ऐज के होते हैं. सो आई रियलाईज्ड कि मे-बी आप सही थे...'
'हाहाहा...धन्य है ये टी.वी. अगर इसके चरण होते तो अभी छू लेता...' जयसिंह ने मजाक किया.
'हहहहाहा...हेहेहे...' मनिका एक बार फिर से उनकी बात पर लोटपोट होते हुए हँस दी थी 'क्या पापा कितना ड्रामा करते हो आप हर वक्त..हाहाहा!'
'अरे भई मेरी कही हर बात टी.वी. पर दिखाते हैं तो मैं क्या करूँ..?' जयसिंह बोले.
'हाहाहा...तो आप भी किसी सेलेब्रिटी से कम थोड़े ही हो.' मनिका ने हँसते हुए कहा.
'हाहा...और मेरी गर्लफ्रेंड भी है किसी सेलेब्रिटी जैसी ही...' जयसिंह ने मौका न चूकते हुए कहा.
'हेहेहे...पापा आप फिर शुरू हो गए.' मनिका बोली.
'लो इसमें शुरू होने वाली क्या बात है?' जयसिंह बोले 'खूबसूरती की तारीफ़ भी ना करूँ..?'
'हाहा...पापा! इतनी भी कोई हूर नहीं हूँ मैं...' मनिका ने कहा. लेकिन मन ही मन उसे जयसिंह की तारीफ़ ने आनंदित कर दिया था और वह मंद-मंद मुस्का रही थी.
'अब तुम्हें क्या पता इस बात का के हूर हो की नहीं?' जयसिंह भी मुस्काते हुए बोले 'हीरे की कीमत का अंदाज़ा तो जौहरी को ही होता है...'
'हहहहाहा...क्या पापा..? क्या बोलते जा रहे हो...बड़े आए जौहरी...हीही!' मनिका ने मचल कर कहा 'क्या बात है आपने बड़े हीरे देख रखें हैं..हूँ?' और जयसिंह को छेड़ते हुए बोली.
'भई अपने टाइम में तो देखें ही हैं...' जयसिंह शरारत भरी आवाज़ में बोले.
'हा..!' मनिका ने झूठा अचरज जता कर कहा 'मतलब आपकी भी गर्लफ्रेंडस होती थी?'
'हाहाहा अरे ये गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड का चलन तो अब आया है. हमारे जमाने में तो कहाँ इतनी आजादी मिलती थी सब कुछ लुका-छिपा और ढंका-ढंका होता था.' जयसिंह ने बताया.
'हेहेहे! हाँ बेचारे आप...' मनिका ने मजाक करते हुए कहा 'तभी अब कसर पूरी कर रहे थे उस दिन टी.वी. में हीरोइनों को देख-देख कर...है ना?' उसने जयसिंह को याद कराया.
'हाहाहा..!' जयसिंह बस हंस कर रह गए.
'देखा उस दिन भी जब चोरी पकड़ी गई थी तो जवाब नहीं निकल रहा था मुहं से...बोलो-बोलो?' मनिका ने छेड़ की.
'अरे भई क्या बोलूँ अब...मैं भी इन्सान ही हूँ.' जयसिंह ने बनावटी लाचारी से कहा.
'हाहाहा!' मनिका हंस-हंस कर लोटपोट होती जा रही थी.
उधर उसकी करीबी ने जयसिंह के लिंग को तान रखा था. जयसिंह को भी इस बात का एहसास नहीं हुआ था कि उनका लंड खड़ा है क्यूंकि दिल्ली आने के बाद से उनके लिए यह एक रोजमर्रा की बात हो गई थी. बरमूडे के आगे के हिस्से को उनके लंड ने पूरा ऊपर उठा दिया था.
'तो मतलब आप मेरी झूठी तारीफ़ कर रहे थे ना? आपको तो वो कटरीना-करीना ही पसंद आती है...जिनका सब कुछ ढंका-ढंका नहीं होता है!' मनिका ने आगे कहा. वह उत्साह के मारे कुछ ज्यादा ही खुल कर बोल गई थी.
जयसिंह ने मन ही मन विचार किया 'आज तो किस्मत कुछ ज्यादा ही तेज़ चल रही है...क्या करूँ? बोल दूँ के नहीं?' फिर उन्हें अपना निश्चय याद आया कि दीमाग से ज्यादा वे अपनी काम-इच्छा का पक्ष लेंगे और वे बोले,
'हाहाहा. कुछ भी कह लो मनिका पर तुम भी कोई कटरीना-करीना से कम तो नहीं हो..! फैशन में तो तुम भी काफी आगे हो...'
'हीहीही...क्या बोल रहे हो पापा? आपको क्या पता?' मनिका ने थोड़ा आश्चर्य से पूछा.
'पता तो मुझे दिल्ली आते ही लग गया था...' जयसिंह ने मनिका की आँखों में झांकते हुए कहा. उनकी आवाज़ में एक बात छिपी थी.
'हैं? वो कैसे पापा?' मनिका ने पहले की भाँती ही मुस्कुराते हुए पूछा. उसे अभी भी जयसिंह की बातें मजाक लग रहीं थी.
'याद करो वो नाईट-ड्रेस जो तुमने पहली रात को पहनी हुई थी...' जयसिंह ने मुस्कुरा कर कहा.
मनिका ने अभी भी उनसे नज़र मिला रखी थी. उनकी बात सुनते ही उसके चेहरे पर एक पल के लिए खौफ भरा भाव आ गया था और फिर उसकी नज़र नीची हो गई और चेहरे पर एक बार फिर से लाली आ गई.
'क्या हुआ?' जयसिंह ने मनिका का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.
'कुछ नहीं...' मनिका ने हौले से कहा. एक ही पल में पासा पलट गया था और उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी. 'पापा ने सब नोटिस किया था मतलब..! ओह गॉड!' उसके मन में उथल-पुथल मच चुकी थी. आज यह दूसरी बार था जब जयसिंह ने मनिका को धर्म-संकट में डाल फिर से वही सवाल दोहराया था.


मनिका और जयसिंह के बीच चुप्पी छा गई थी.
कुछ पल बीतने के बाद मनिका रुक ना सकी और भर्राई आवाज में बोली,
'पापा? आई एम् सॉरी..!'
'अरे किस बात के लिए?' जयसिंह ने झूठी हैरानी व्यक्त की.
'वो...वो पापा उस रात है ना मुझे ध्यान नहीं रहा...वो मैं अपने घर वाले कपड़े ले कर बाथरूम में घुस गई थी और फिर...फिर पहले वाली ड्रेस शावर में भीग गई सो...आई हैड टू वियर दोज़ क्लॉथस एंड कम आउट...' उसने उन्हें बताया 'मैंने सोचा भी था की आप क्या सोचोगे मेरे बारे में कि कैसी बिगड़ैल हूँ मैं...बट आपने जैसे रियेक्ट किया उससे मुझे लगा कि आप भी एम्बैरेस हो तभी मुझे डांटा नहीं...आई एम् सो सॉरी...' मनिका ने एक्सप्लेनेशन दिया.
'अरे! पागल हो तुम...ऐसा क्यूँ सोच रही हो? मैं तो यहाँ तुम्हारी तारीफ़ कर रहा था और तुम कुछ भी सोचती चली जा रही हो..!' जयसिंह ने मनिका की ठुड्डी पकड़ उसका चेहरा ऊपर उठाते हुए कहा.
'पापा?' मनिका की नज़र में अचरज था. 'क्या कह रहे हैं पापा?' उसने सोचा. जयसिंह ने उसके चेहरे से उसके मन की बात पढ़ ली थी.
'और नहीं तो क्या...मैं तुम्हें डांटूंगा ऐसा क्यूँ लगा तुम्हें?' जयसिंह धीमे-धीमे बोलने लगे थे ताकि मनिका को पता रहे कि वे मजाक नहीं कर रहे थे और उनकी आवाज़ में एक अंतरंगता भी आ गई थी.
'वो मैं...' मनिका को कुछ नहीं सूझा था और वह फिर से चुप हो गई थी.
'तुम्हें लगा कि मैं तुम्हें इतना खूबसूरत लगने के लिए डांटने वाला हूँ?' मनिका की चुप्पी का फायदा उठा कर जयसिंह बोलते जा रहे थे 'भई मुझे तो इस बात का पता ही नहीं लगता कि तुम इतनी बड़ी हो गई हो अगर उस रात तुम कुछ और पहन कर आ जाती तो के जिसे मैं छोटी बच्ची समझता था वह इतनी बड़ी हो गई है. इन-फैक्ट (दरअसल) तुम्हें तो शुक्रगुजार होना चाहिए कि तुमने वो ड्रेस पहनी हुई थी...'
'क..क्या मतलब पापा?' मनिका के कानों में जयसिंह की आवाज़ गूँज सी रही थी.
'अरे भई तभी से तो मैंने तुम्हें एक एडल्ट-समझदार लड़की की तरह ट्रीट करना शुरू किया बिकॉज़ आई क्न्यु कि इंटरव्यू कैंसिल होने के बाद तुम इतना जल्दी वापस नहीं जाना चाहोगी और हम यहाँ रुके रहे.' जयसिंह ने शब्द-जाल बुनना शुरू कर दिया था.
'ओह...' मनिका ने हौले से कहा.
'क्या हुआ मनिका तुम कुछ बोल नहीं रही हो?' जयसिंह ने मनिका को कुरेदते हुए कहा.
'कुछ नहीं ना पापा. वो मैं थोडा एम्बैरेसड फील कर रही हूँ...आपके सामने ऐसे...आई मीन वो ड्रेस इनडिसेंट (अभद्र) सा था ना थोड़ा?' मनिका ने अंत में आते-आते अपने जवाब को सवाल बना दिया था और एक पल जयसिंह से नज़र मिलाई थी.
'ओहो...अभी दो घंटे के डिस्कशन के बाद हम फिर वहीँ आ खड़े हुए जहाँ से चले थे!' जयसिंह उत्साहविहीन आवाज़ में बोले 'मनिका डोन्ट फील एम्बैरेसड ओके? अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ...लुक एट मी...' उन्होंने मनिका के एक बार फिर नज़र झुका लेने पर कहा.
'जी...' मनिका ने उन्हें देखते हुए कहा.
'देखो मनिका अभी हम क्या बातें कर रहे थे..? यही ना कि सोसाइटी के नॉर्म्स (नियम) एक हद तक ही फॉलो करने चाहिएं...अब देखो वही बात तो यहाँ अप्लाई हो रही है.' वे उसे समझाते हुए बोले 'तुम सिर्फ इसलिए एम्बैरेस हो रही हो कि मैं तुम्हारे साथ था. पर मैंने तो तुम्हें सपोर्ट ही किया था, डिड आई मेक यू फील अनकम्फ़र्टेबल?'
'नो पापा...बट...' मनिका एक-दो शब्दों में ही जवाब दिए जा रही थी.
'बट क्या मनिका?' जयसिंह बोले 'तुम इतनी खूबसूरत लग रही थी अब इज़ दैट ए क्राइम? नहीं ना...एंड आई एडमायरड (प्रशंशा) यू फॉर इट...एंड वो भी कोई जुर्म तो है नहीं. पर तुम ये सोच रही हो कि मैंने तुम्हें बिगड़ा हुआ समझ लिया और जाने क्या-क्या?'
'हूँ...आपने नहीं सोचा ऐसा?' मनिका ने हौले से उनसे पूछा.
'बिलकुल नहीं...क्या मैं तुम्हें जानता नहीं हूँ? यू आर इनसल्टिंग (अपमान) मी बाय सेयिंग दैट..?' वे बोले.
'सॉरी पापा आई डिड नॉट मीन टू हर्ट यू..!' मनिका बोली.
'आई क्नॉ आई क्नॉ...अरे भई मुझे तो बहुत अच्छा लगा कि मेरी मनिका इतनी ब्यूटीफुल हो गई है...हम्म?' जयसिंह ने मनिका का गाल सहलाते हुए कहा.
जयसिंह ने देखा की मनिका के झेंप भरे चेहरे पर एक पल के लिए छोटी सी मुस्कान आई और चली गई थी.
'इतनी खूबसूरत तो संचिता भी कभी नहीं थी...वो फ़िल्मी हिरोइन्स भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं लगती सच कहूँ तो.' जयसिंह ने मख्खन लगाते हुए कहा.
'इश्श पापा...बस करो इतना भी हवा में मत उड़ाओ मुझे...' मनिका ने काफी देर बाद एक वाक्य पूरा किया था.
'सच कह रहा हूँ...हाहा.' जयसिंह ने टेंशन थोड़ी कम करने के उद्देश्य से हंस कर कहा.
'हीही पापा...' मनिका की झेंप कुछ मिटी थी.
अब जयसिंह ने मनिका को थोड़ा और करीब खींचा जिससे वह उनकी जाँघ पर खिसक कर उनसे सट गई, ऐसा करते ही उसकी एक जाँघ जयसिंह के खड़े लिंग से जा टकराई. मनिका को कुछ पल तो पता नहीं चला था, पर फिर उसे अपनी जाँघ के साथ लगे जयसिंह के ठोस लंड का आभास होने लगा और उसने नज़र नीचे घुमा जयसिंह की गोद में देखा था व मनिका एक बार फिर से होश खोने के कागार पर आ खड़ी हुई थी.
जयसिंह के बरमूडे के अन्दर से तन कर उनका लंड उनकी गोद में किसी डंडे सी आकृति बना रहा था और उसकी जाँघ से सटा हुआ था. यह देखते ही मनिका चिहुँक कर थोड़ा पीछे हट गई. उधर जयसिंह को भी मनिका की जाँघ के अपने लंड से हुए स्पर्श का पता चल चुका था और वे उसके चेहरे पर ही नज़र गड़ाए हुए थे जब उसने उनकी गोद में झाँक कर अनायास ही अपने-आप को पीछे हटाया था.
मनिका ने भी झट नज़र उठा कर जयसिंह की तरफ देखा था कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है पर उन्हें बिल्कुल सामान्य पाया, उन्होंने उसका गाल फिर से थपथपाया और पूछा,
'नींद नहीं आ रही आज?'
'हाँ...हाँ पापा...स्स...सोते हैं चलो.' मनिका ने थर्राते हुए कहा.

जयसिंह के लंड का आभास होने के बाद से मनिका की इन्द्रियां जैसे पहली बार जाग उठी थी, उसे अब अपने पिता के बदन के हर स्पर्श का एहसास साफ़-साफ़ हो रहा था. उसके गाल पर रखा हाथ उन्होंने नीचे कर के उसकी गर्दन पर रखा हुआ था वहीं उनके दूसरे हाथ की पोजीशन ने उसकी हया को और ज्यादा बढ़ा दिया था, उसने पाया कि जब से जयसिंह ने उसकी बम्स (कूल्हे) पर थपकी दे कर उसे उठने को बोला था तब से उनका हाथ उन्होंने वहाँ से हटाया नहीं था. जयसिंह ने हाथ पूरी तरह से तो उसके अधो-भाग पर नहीं रखा हुआ था बल्कि उसे एक हल्के से टच (स्पर्श) की अनुभूति हो रही थी. अपने नीचे दबी जयसिंह की माँसल जाँघ की कसावट भी वह महसूस कर रही थी. उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके और उनके बीच हर पॉइंट ऑफ़ कांटेक्ट (मिलन-बिंदु) से एक गर्माहट सी प्रज्ज्वलित हो रही हो. वह सोने का बोल कर उनकी गोद से उठने लगी.
'पट्ट' की आवाज आई. जयसिंह ने हल्के से उसके कूल्हे पर एक और चपत लगा दी थी लेकिन इस बार मनिका को उनका ऐसा करना पहली-दूसरी बार से ज्यादा इंटेंसिटी (प्रवेग) से महसूस हुआ था व उसकी आवाज़ भी उसके कानों में आन पड़ी थी.
'चलो फिर सोते हैं...' वे भी मुस्काते हुए उठ गए थे.
बिस्तर की तरफ बढती हुई मनिका के क़दमों में एक तेज़ी थी. जयसिंह भी पीछे-पीछे ही आ रहे थे. बेड पर चढ़ कर मनिका ने दूसरी तरफ से बिस्तर पर चढ़ते हुए अपने पिता की तरफ देखा, उसको जैसे ताव आ गया था, पहली रात जब जयसिंह ने बरमूडा-शॉर्ट्स पहनी थी तो उनमें से उनके लिंग के उठाव का पता मनिका को इसलिए चला था कि वह पहले से ही उनकी नग्नता के दर्शन कर चुकी थी और उसकी नज़र सीधा वहीं गई थी. लेकिन आज तो जयसिंह का लंड पूरी तरह से तना हुआ था और शॉर्ट्स के आगे के भाग को पूरा ऊपर उठाए इस तरह खड़ा हुआ था की मनिका की नज़र ना चाहते हुए भी उस पर चली गई थी. जयसिंह मुस्कुराते हुए बिस्तर में घुस कर उसकी ओर करवट लिए लेट गए.
उन दोनों की नज़रें मिली. जयसिंह उसकी निगाहों को ताड़ चुके थे और मुस्काए, मनिका भी क्या करती सो वह भी मुस्का दी. जयसिंह को जैसे कोई छिपा हुआ इशारा मिल गया था, वे खिसक कर मनिका के बिलकुल करीब आ गए. इस तरह उनके अचानक पास आ जाने से मनिका असहज सी हो गई पर उसका शरीर उस एक पल के लिए जड़ हो गया था. जयसिंह ने उसके करीब आ कर अपना हाथ उसकी कमर में डाल लिया और अपना चेहरा उसके चेहरे के बिलकुल पास ले आए, उधर मनिका से हिलते-डुलते भी नहीं बन रहा था.
'गुड-नाईट डार्लिंग!' जयसिंह ने धीरे से कहा.
'ओह...गुड-नाईट पापा...' मनिका उनकी इस हरकत का आशय समझ थोड़ी सहज होने लगी.
जयसिंह ने मुस्का कर उसकी कमर पर रखा हाथ उठा कर एक बार फिर उसकी ठुड्डी पकड़ी और अगले ही पल अपना मुहँ उसके चेहरे की तरफ बढ़ा दिया; 'पुच्च' मनिका कुछ समझ पाती उस से पहले ही उन्होंने उसके गाल पर एक छोटा सा किस्स कर दिया था और पीछे हो कर लेट गए.
मनिका की नज़रें उठाए नहीं उठ रहीं थी. जयसिंह के यकायक किए इस बर्ताव ने उसे स्तब्ध कर दिया था. किसी तरह उसने एक पल को उनकी तरफ देखा था और झट-पट नज़र झुका ली, जयसिंह को इतना इशारा काफी था,
'वैसे तुमसे एक शिकायत भी है मुझे अब...' वे बोले.
'क्या पापा?' मनिका ने हैरानी से पूछा, उसकी नज़र फिर से उठ गई थी.
'यही कि मैंने तुमसे ये एक्स्पेक्ट नहीं किया था कि तुम मुझे इतना पराया और गलत समझोगी...' जयसिंह के चेहरे से मुस्कुराहट हट चुकी थी.
'पापा! मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती...कभी नहीं...आप ऐसा क्यूँ बोल रहे हो?' मनिका ने भावुक हो कर कहा और उठ बैठी.
'वैसे ही कह रहा हूँ, हो सकता है मैं गलत होऊं पर जब से तुमने बताया है तब से सोच रहा हूँ अगर तुम्हें मुझ पर भरोसा होता तो पहली रात के बाद तुम नाईट-ड्रेस चेंज करके रोज यह अभी वाले कपड़े न पहन कर सोती.' जयसिंह ने चेहरे पर ऐसा भाव प्रकट किया जैसे वे बहुत दुखी व विचलित हों.
'नहीं ना पापा ऐसा मत कहो...ऐसा बिल्कुल नहीं है!' मनिका ने अपने तर्क की सच्चाई जताने के लिए थोड़ा सा उनकी तरफ झुकते हुए कहा 'वो तो...मुझे शर्म...शर्म आती है इसलिए नहीं पहनती...प्लीज़ ना पापा आप मुझे मिसअंडरस्टैंड मत करो...'
'हम्म...' जयसिंह ने सोचते हुए प्रतिक्रिया की.
'पापा! प्लीज..?' मनिका ने हाथ बढ़ा कर उनका हाथ थाम कर मिन्नत की.
'ओके ओके...मान ली तुम्हारी बात भई.' जयसिंह ने मुस्का कर उसकी तरफ देखा.
'ओह पापा.' मनिका ने राहत की साँस ली 'ऐसा मत सोचा करो आप...'
'ठीक है...' जयसिंह बोले 'चलो अब यहाँ आओ और मुझे मेरी गुड-नाईट किस्स दो...'
मनिका एक पल के लिए ठिठकी और उसकी नज़र फिर से जयसिंह के लिंग पर चली गई फिर उसने धीरे से आगे झुक कर जयसिंह के गाल पर पप्पी दे दी 'पुच्च'.
अब मनिका पीछे हट कर फिर से अपनी जगह पर लेट गई. जयसिंह ने लाइट बुझा कर नाईट-लैंप जला दिया और वे दोनों एक-दूसरे की तरफ करवट लिए सोने लगे. पर कुछ-कुछ पल में ही कभी मनिका तो कभी जयसिंह आँख खोल कर देख रहे थे और जब कभी दोनों की आँखें साथ में खुल जाती थी तो दोनों झट से आँखें मींच लेते थे.
यूँ तो जब से वे दोनों दिल्ली आए थे मनिका और जयसिंह दुनिया-जहान की बातें कर चुके थे और कभी-कभी जयसिंह की चालाकी से उनके बीच की बातचीत ने कुछ रोचक मोड़ भी ले लिए थे परन्तु अभी तक उन्होंने अपने रिश्ते के दायरों का उलंघन नहीं किया था. लेकिन आज जिस तरह से जयसिंह ने बात घुमाते-घुमाते मनिका के सामने हर रिश्ते की परिभाषा को एक मर्द और औरत के बीच समाज की खड़ी की दीवारों के रूप में पेश किया था उसने मनिका के मन को अशांत और आतंकित कर दिया था. मनिका लेटी हुई सोच रही थी,
'ओह पापा भी कैसी अजीब बातें सोचते हैं...सबसे डिफरेंट...मर्द-औरत...लड़की...सोसाइटी के बनाए हर रूल से उलट..! वैसे वे भी कुछ गलत तो नहीं कह रहे थे...आई मीन (मेरा मतलब) अगर हम अपनी लाइफ अपने हिसाब से जीना चाहते हैं तो उससे सोसाइटी और लोगों को क्यूँ दिक्कत होती है? एंड उन फूहड़ लोगों का भी अपना लाइफ स्टाइल है वो चाहें मूवी में हूटिंग करें या कुछ और...बात तो तब गलत होगी जब वे किसी और को जान-बूझ कर परेशान करें या छेड़ें.' मनिका ने अब आँख खोल-खोल कर जयसिंह की ओर देखना बंद कर दिया था 'एंड पापा ने कहा कि मैं भी तो मम्मी से बातें छुपाने लगी हूँ...हाँ क्यूंकि वे हमेशा मुझसे चिढती रहती हैं...पापा ने भी तो कहा कि सब बातें हर किसी को बताने की नहीं होती...पहले भी तो मैंने यह सोचा था कि अगर मम्मी को पता चले कि हम यहाँ दिल्ली में ऐश कर रहे थे तो कितना बखेड़ा खड़ा हो जाएगा...हमें तो ज़िन्दगी भर ताने सुनने पड़ें शायद...और अगर...ओह गॉड! अगर किसी तरह मम्मी को हमारे बीच होने वाली इंटरेक्शन (मेल-जोल, बातें) का पता चल गया तो फिर तो गए समझो...कैसे हम दोनों एक ही रूम में इतने दिनों से रह रहे हैं और...वो अंडरर्गार्मेंट्स वाली बात पर हुई लड़ाई...पापा ने कहा कि अगर उनकी जगह कोई और होता तो मैं शायद इतना रियेक्ट नहीं करती...क्या सच में? कभी किसी ने ऐसी बात तो कही नहीं है मुझसे...पर हाँ शायद इतना बड़ा इशू (बतंगड़) नहीं बनता...आखिर मूवीज में ये सब कॉमन है. पर पापा थे इसलिए...सुबह उनसे फिर से सॉरी कहूँगी...पापा कितने मैच्योर (समझदार) हैं और कितने कूल भी...उन्होंने कहा कि वे सच में मुझे एक एडल्ट की तरह ट्रीट करते हैं...हाँ वो तो है!' सोचते हुए मनिका ने करवट बदल ली.
उधर जयसिंह लेटे हुए उसे देख रहे थे, उसके करवट बदलने पर उन्होंने अच्छे से आँखें खोल कर उसकी तरफ देखा था, 'आज तो पता नहीं क्या-क्या बोल गया मैं...पर कुतिया ने ज्यादा विरोध नहीं किया...साली के मन में पता नहीं क्या चल रहा होगा. कैसी मचकी थी चिनाल जब पैर पे लंड महसूस हुआ था...पर फिर भी सब लग तो सही ही रहा है वरना चुम्मा ना देती इतने आराम से...देखो कल कितना काम आता है ये ज्ञान...' जयसिंह ने सोचते हुए मनिका की तरफ एक नज़र और डाली; वे जानते थे कि आज उनके बीच जिस तरह की बातें हुई थी वे आज से पंद्रह दिन पहले तक नामुमकिन थी और ये उनके रचे चक्रव्यूह का ही कमाल था कि मनिका अब उनके चंगुल में फंसती चली जा रही थी. उन्होंने पूरे समय मनिका के साथ एक कदम आगे बढ़ने के बाद दो कदम पीछे खींचे थे और उनकी यह स्ट्रेटेजी कामयाब रही थी. एक पल तो वे मनिका को शर्मिंदगी के कागार पर पहुंचा देते और फिर अगले ही पल खुद ही उसे आश्वस्त कर देते कि उनके बीच होनेवाली बातों में कुछ भी गलत नहीं था और मनिका उनकी और ज्यादा कायल हो जाती थी. वैसे भी २२ साल की मनिका जयसिंह जैसे मंझे हुए व्यापारी के साथ क्या होड़ कर सकती थी? उन्होंने देखा कि मनिका ने अपना हाथ उठा कर अपने नितम्ब पर रखा हुआ था और एक बार उसे हल्के से सहलाया था. उनके चेहरे पर एक लम्बी मुस्कान तैर गई और ख़ुशी से उन्होंने एक पल को आँखें बंद कर ली थी.
'और मम्मी ने मुझे आज तक इस तरह अच्छे से ट्रीट नहीं किया है...छोड़ो मम्मी की किसे जरूरत है?' मनिका के विचार भी अभी बराबर चल रहे थे 'अगर उन्हें पता चले कि पापा ने मेरी ब्रा-पैंटी देख ली थी तो...हाहाहा हाय! पापा ने कैसा सताया था...और मैंने जो उनका डिक...देख लिया था? पापा बार-बार कहते हैं कि हमें घर पर सावधान रहना होगा...और ये बात तो किसी से शेयर भी नहीं कर सकती...कितना बड़ा है पापा का! हाय...कैसे खिसिया जाते हैं जब उनको सताती हूँ उन मूवी वाली हिरोइन्स के नाम पर...क्या उनके छोटे-छोटे कपड़े देख कर पापा टर्न-ऑन (उत्तेजित) हो जाते हैं..? और उनका डिक इरेक्ट (खड़ा)...हाय... बोल रहे थे कि उन्होंने उस रात मुझे नोटिस किया था...शॉर्ट्स में...पर कुछ कहा नहीं था ताकि मुझे बुरा ना लग जाए...कितने केयरिंग है पापा...बट कितना अडौर (तारीफ) कर रहे थे आज मुझे...कि आई वास् लुकिंग वैरी ब्यूटीफुल...सब कुछ देख लिया था उन्होंने सुबह-सुबह मतलब...शॉर्ट्स तो पूरी ऊपर हुई पड़ी थी...ही सॉ माय नेकेड बम्स (नंगी गांड)...ओह गॉड और बोले की मैं मम्मी से भी ज्यादा खूबसूरत हूँ...तो क्या उनको इरेक्शन हुआ होगा मुझे देखने के...नहीं-नहीं वो तो पापा हैं मेरे ऐसा थोड़े ही सोचेंगे...पर पापा तो कहते हैं कि सब रिश्ते समाज ने बनाए हैं! मैंने भी तो उन्हें बताया था कि सब मुझे उनकी गर्लफ्रेंड समझते हैं...कैसे मजाक बनाते हैं उस बात का भी वे...यहाँ आने से पहले तो कभी मैं उनकी गोद में नहीं बैठी...आई मीन बड़ी होने के बाद से...पर अब तो मुझे अपने लैप में ही बिठाए रखते हैं...और दो-तीन बार तो मुझे डार्लिंग भी कह चुके हैं...मनिका डार्लिंग...ये तो मैंने सोचा ही नहीं था...और जो मेरे बम्स पर उन्होंने हाथ से...पहले किसी ने नहीं टच किया मुझे वहाँ पर...पापा ने...कैसी आवाज़ आई थी उनके स्लैप (थपकी) की...हे भगवान मैं क्या सोचती जा रही हूँ आज ये..?' मनिका याद कर-कर के सम्मोहित होती जा रही थी, उसे अचानक अपनी गांड में एक स्पंदन का एहसास होने लगा था और उसने हाथ से वहाँ पर सहलाया था जहाँ उसके पिता ने उसे छुआ था. यही देख जयसिंह की बाँछें खिल उठी थीं. उधर मनिका के मन में लगी आग ने ज्वाला का रूप धारण कर लिया था,

Saturday, March 14, 2015

FUN-MAZA-MASTI गुमराह पिता की हमराह बेटी--10

FUN-MAZA-MASTI

 गुमराह पिता की हमराह बेटी--10

जयसिंह उसे देख कर मुस्कुराए और उठ खड़े हुए. मनिका बाथरूम से बाहर आ चुकी थी और उसने एक तरफ हट कर अपने पिता को बाथरूम में जाने के रास्ता दिया था. जयसिंह ने बाथरूम में घुस दरवाज़ा बंद कर लिया. उधर मनिका भी जा कर बेड पर बैठ गई थी.
बाथरूम से बाहर आने से पहले मनिका ने एकबारगी सोचा था कि अगर आज भी उसके पिता पिछली रात की भाँती सामने नंगे बैठे हुए तो वह क्या करेगी? पर फिर उसने यह सोचकर अपने मन से वह बात निकाल दी थी कि वो सिर्फ एक बार अनजाने में हुई घटना थी. लेकिन बाथरूम से बाहर निकलते ही जयसिंह से रूबरू हो जाने पर मनिका की नज़र सीधा उनकी टांगों के बीच गई थी. आज भी जयसिंह ने टांगें इस तरह खोल रखीं थी के उनके गुप्तांग प्रदर्शित हो रहे हों लेकिन आज जयसिंह ने एक सफ़ेद अंडरवियर पहन रखा था. मनिका की धड़कन बढ़ गई थी. अंडरवियर पहने होने के बावजूद जयसिंह के लंड का उठाव साफ़ नज़र आ रहा था. अंडरवियर में खड़े उनके लिंग ने उसके कपड़े को पूरा खींच कर ऊपर उठा दिया था, मनिका ने झट से अपनी नज़र ऊपर उठा कर अपने पिता की आँखों में देखा था, वे मुस्कुराते हुए उठे थे और बाथरूम में जाने लगे थे. उनके करीब आने पर मनिका की साँस जैसे रुक सी गई थी, बिना शर्ट के जयसिंह के बदन का ऊपरी भाग पूरी तरह से उघड़ा हुआ था, उन्होंने बनियान भी नहीं पहन रखी थी. जयसिंह का चौड़ा सीना और बलिष्ठ बाँहे देख हया से मनिका की नज़र नीचे हो गई थी और उसने एक तरफ हो उन्हें बाथरूम में जाने दिया व आ कर बेड पर बैठी थी,
'ओह्ह...थैंक गॉड आज पापा अंडरवियर पहने हुए थे...बट फिर से मैंने उनके प्राइवेट पार्ट्स को एक्सपोस होते देख लिया...मतलब अंडरवियर में से भी उनका बड़ा सा डिक...हे राम मैं फिर से ऐसा-वैसा सोचने लगी...' ब्लू-फिल्म में देखने से मनिका को यह तो पता था कि मर्द जब उत्तेजित होते हैं तो उनका लिंग सख्त हो जाता है पर उसने कभी बैठे हुए लिंग का दीदार तो किया नहीं था सो उसे उनके बीच के अंतर का पता नहीं था. एक बार फिर उसका बदन तमतमा गया था और वह सोचने लगी थी 'पता नहीं पापा कैसे इतना बड़ा...पैंट में डाल के रखते हैं? नहीं-नहीं...ऐसा मत सोच...अनकम्फर्टेबल फील नहीं होता क्या उन्हें..? हाय...ये मैं क्या-क्या सोच रही हूँ...पापा को पता चला तो क्या सोचेंगे?'
जब जयसिंह नहा कर बाहर आए तो मनिका को टी.वी देखते हुए पाया. मनिका ने ध्यान बंटाने के लिए टेलीविज़न चला रखा था. जयसिंह भी आकर उसके पास बैठ गए. मनिका ने कनखियों से उनकी तरफ देखा था वे आज भी बरमूडा और टी-शर्ट पहने हुए थे.
जयसिंह ने मनिका की बाँह पकड़ कर उसे अपनी तरफ खींचा, वह उनका इशारा समझ गई थी और उनकी तरफ देखा, जिस पर जयसिंह ने उसे उठ कर गोद में आने का इशारा किया. मनिका थोडा सकुचा गई थी पर फिर भी उठ कर उनकी गोद में आ बैठी. आज वह उनकी जाँघ पर बैठी थी.
'क्या कुछ चल रहा है टी.वी में..?' जयसिंह ने पूछा.
'कुछ नहीं पापा...वैसे ही चैनल चेंज कर रही थी बैठी हुई. आज दिन में सो लिए थे तो नींद भी कम आ रही है.' मनिका ने बताया.
'हम्म...' जयसिंह ने टी.वी की स्क्रीन पर देखते हुए कहा.
कुछ देर वे दोनों वैसे ही बैठे टेलीविज़न देखते रहे, मनिका थोड़ी-थोड़ी देर में चैनल बदल दे रही थी. कुछ पल बाद जब मनिका ने एक बार फिर चैनल चेंज किया तो 'ईटीसी' चल पड़ा और उस पर 'जन्नत' फिल्म का ही ट्रेलर आ रहा था. जयसिंह को बात छेड़ने का मौका मिल चुका था.
आज जयसिंह ने जानबूझकर अंडरवियर पहने रखा था ताकि मनिका को शक न हो जाए कि वे उसे अपना नंगापन इरादतन दिखा रहे थे. लेकिन फिर कुछ सोच कर उन्होंने अपन शर्ट और बनियान निकाल दिए थे, आखिर मनिका को सामान्य हो जाने का मौका देना भी तो खतरे से खाली नहीं था. बाथरूम से निकलते ही मनिका की प्रतिक्रिया को वे एक क्षण में ही ताड़ गए थे और मुस्कुराते हुए नहाने घुस गए थे. लेकिन नहाने के बाद उन्होंने अपना अंडरवियर धो कर सुखा दिया था और अब बरमूडे के अन्दर कुछ नहीं पहने हुए थे. उन्होंने बात शुरू की,
'अरे मनिका! बताया नहीं तुमने कि मूवी कैसी लगी तुम्हें? पिछली बार तो फिल्म की बातों का रट्टा लगा कर हॉल से बाहर निकली थी तुम...'
'हेहे...ठीक थी पापा...' मनिका ने फिल्म के दौरान हुई घटनाओं को याद किया तो और झेंप गई थी.
'हम्म..मतलब जंची नहीं फिल्म आज..?' जयसिंह ने मनिका से नजर मिलाई.
'हेह..नहीं पापा ऐसा नहीं है...बस वैसे ही, मूवी की कास्ट (हीरो-हीरोइन) कुछ खास नहीं थी...और क्राउड भी गंवार था एकदम...सो...आपको कैसी लगी?' मनिका ने धीरे-धीरे अपने मन की बात कही और पूछा.
'मुझे तो बिलकुल पसंद नहीं आई.' जयसिंह ने कहा.
'हैं? क्या सच में..?' मनिका ने आश्चर्य से पूछा.
'और क्या जो चीज़ तुम्हें नहीं पसंद वो मुझे भी नहीं पसंद...' जयसिंह ने डायलॉग मारा.
'हाहाहा पापा...कितने नौटंकी हो आप भी...बताओ ना सच-सच..?' मनिका हंस पड़ी.
'हाह...मुझे तो ठीक लगी...' जयसिंह ने कहा, 'और क्राउड तो अब हमारे देश का जैसा है वैसा है.'
'हुह...फिर भी बदतमीजी की कोई हद होती है. पब्लिक प्लेस का कुछ तो ख्याल होना चाहिए लोगों को...' मनिका ने नाखुशी जाहिर करते हुए कहा.
'हाहाहा...अरे भई तुम क्यूँ खून जला रही हो अपना?' जयसिंह ने मनिका की पीठ थपथपाते हुए कहा.
'और क्या तो पापा...गुस्सा नहीं आएगा क्या आप ही बताओ?' मनिका का आशय थिएटर में हुए अश्लील कमेंट्स से था.
'अरे अब क्या बताऊँ...हाहाहा.' जयसिंह बोले 'माना कि कुछ लोग ज्यादा ही एक्साइटेड हो जाते हैं...'
'एक्साइटेड? बेशर्म हो जाते हैं पापा...और सब के सब आदमी ही थे...आपने देखा किसी लड़की या लेडी को एक्साइटेड होते हुए?' मनिका ने जयसिंह के ढुल-मुल जवाब को काटते हुए कहा.
'हाहाहा भई तुम तो मेरे ही पीछे पड़ गई...मैं कहाँ कह रहा हूँ के लडकियाँ एक्साइटेड हो रहीं थी.' जयसिंह को एक सुनहरा मौका दिखाई देने लगा था और उन्होंने अब मनिका को उकसाना शुरू किया 'अब हो जाते हैं बेचारे मर्द थोड़ा उत्साहित क्या करें...'
'हाँ तो पापा और भी लोग होते है वहाँ जिनको बुरा लगता है...और ये वही मर्द हैं आपके जिनका आप कह रहे थे कि बड़ा ख्याल रखते हैं गर्ल्स का...' मनिका ने मर्द जात को लताड़ते हुए कहा.
'अच्छा भई...ठीक है सॉरी सब मर्दों की तरफ से...अब तो गुस्सा छोड़ दो.' जयसिंह ने मामला सीरियस होते देख मजाक किया.
'हेहे...पापा आप क्यूँ सॉरी बोल रहे हो...आप उनकी तरह नहीं हो.' मनिका ने भी अपने आवेश को नियंत्रित करते हुए मुस्का कर कहा.
इस पर जयसिंह कुछ पल के लिए चुप हो गए. मनिका ने उनकी तरफ से कोई जवाब ना मिलने पर धीरे से कहा,
'पापा?'
'देखो मनिका ये बात तुम्हारे या मेरे सही-गलत होने की नहीं है. हमारे समाज में बहुत सी ऐसी पाबंदियां हैं जिनकी वजह से हम अपनी लाइफ के बहुत से आस्पेक्ट्स (पहलु) अपने हिसाब से ना जी कर सोसाइटी के नियम-कानूनों से बंध कर फॉलो करते हैं और यह भी उसी का एक एक्साम्प्ल (उदहारण) है.' जयसिंह ने कुछ गंभीरता अख्तियार कर समझाने के अंदाज़ में मनिका से कहा. चुप हो जाने की बारी अब मनिका की थी.
'पर पापा...ये आप कैसे कह सकते हो? दोज़ पीपल वर एब्यूजिंग सो बैडली...' मनिका ने कुछ पल जयसिंह की बात पर विचार करने के बाद कहा.
'हम्म...वेल लुक एट इट लाइक दिस...जिस तरह का सीन फिल्म में आ रहा था...' जयसिंह का मतलब फिल्म में आए उस किसिंग सीन से था, मनिका की नज़र झुक गई 'क्या वह हमारे समाज में एक्सेप्टेड है..? मेरा मतलब है कुछ साल पहले तक तो इस तरह की फिल्मों की कल्पना तक नहीं कर सकते थे.'
'इह...हाँ पापा बट इसका मतलब ये थोड़े ही है की आप ऐसा बिहेव करो सबके सामने..' मनिका ने तर्क रखा.
'नहीं इसका यह मतलब नहीं है...पर पता नहीं कितने ही हज़ार सालों से चली आ रही परम्परा के नाम पर जो दबी हुई इच्छाएँ...और मेरा मतलब सिर्फ लड़कों या मर्दों से नहीं है, औरत की इच्छाओं का दमन तो हमसे कहीं ज्यादा हुआ है...लेकिन जो मैं कहना चाह रहा हूँ वह यह है कि जब सोसाइटी के बनाए नियम टूटते हैं तो इंसान अपनी आज़ादी के जोश में कभी-कभी कुछ हदें पार कर ही जाता है.' जयसिंह ने ज्ञान की गगरी उड़ेलते हुए मनिका को निरुत्तर कर दिया था 'अब तुम ही सोचो अगर आज जब लड़कियों को सामाज में बराबर का दर्जा मिल रहा है तो भी क्या उन लड़कियों को बिगडैल और ख़राब नहीं कहा जाता जो अपनी आजादी का पूरा इस्तेमाल करना चाहती हैं...जिनके बॉयफ्रेंड होते हैं या जो शराब-सिगरेट पीती हैं..?'
'हाँ...बट...वो भी तो गलत है ना..? आई मीन अल्कोहोल पीना...' मनिका ने तर्क से ज्यादा सवाल किया था.
'कौन कहता है?' जयसिंह ने पूछा.
'सभी कहते हैं पापा...सबको पता है इट्स हार्मफुल.' मनिका बोली.
'सभी कौन..? लोग-समाज-सोसाइटी यही सब ना? अब शराब अगर आपके लिए ख़राब है तो यह बात उनको भी तो पता है...अगर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता तो समाज कौन होता है उनहें रोकनेवाला?' जयसिंह अब टॉप-गियर में आ चुके थे. 'अगर उन्हें अपने पसंद के लड़के के साथ रहना है तो तुम और मैं कौन होते हैं कुछ कहने वाले..? सोचो...सही और गलत की डेफिनिशन भी तो समाज ने ही बना कर हम पर थोपी है.'
'अब मैं क्या बोलूँ पापा..? आप के आइडियाज तो कुछ ज्यादा ही एडवांस्ड हैं.' मनिका ने हल्का सा मुस्का कर कहा. 'बट हमें रहना भी तो इसी सोसाइटी में है ना.' उसने एक और तर्क रखते हुए कहा.
'हाँ रहना है...' जयसिंह बोलने लगे.
'तो फिर हमें रूल्स भी तो फॉलो करने ही पड़ेंगे ना..?' अपना तर्क सिद्ध होते देख मनिका ने उनकी बात काटी.
'हाहाहा...कोई जरूरी तो नहीं है.' जयसिंह ने कहा.
'वो कैसे?' मनिका ने सवालिया निगाहें उनके चेहरे पर टिकाते हुए पूछा.
'वो ऐसे कि रूल्स को तो तोड़ा भी जा सकता है...बशर्ते यह समझदारी से किया जाए.' जयसिंह ने कहा.
'मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा पापा...क्या कहना चाहते हो आप?' मनिका ने उलझन में पड़ते हुए सवाल किया.
'देखो...आज जब हॉल में वे लोग हूटिंग कर रहे थे तो कोई एक आदमी अकेला नहीं कर रहा था बल्कि चारों तरफ से आवाजें आ रही थी. अब सोचो अगर सिर्फ कोई एक अकेला होता तो तुम जैसे समाज के ठेकेदार उसे वहाँ से भगाने में देर नहीं लगाते पर क्यूंकि वे ज्यादा थे तो कोई कुछ नहीं बोला...अगर वे इतने ही ज्यादा गलत थे तो किसी ने आवाज़ क्यूँ नहीं उठाई?' जयसिंह का एक हाथ अब मनिका की कमर पर आ गया था 'मैं बताऊँ क्यूँ..? क्यूंकि असल में उस हॉल में ज्यादातर लोग उसी तरह के सीन देखने आए थे. पर बाकी सबने सभ्यता का नकाब ओढ़ रखा था और उन लोगों पर नाक-भौं सिकोड़ रहे थे जिन्होंने अपनी इच्छाओं को व्यक्त करने की हिम्मत दिखाई थी. सो एकजुट होकर अपनी इच्छा मुताबिक करना पहला तरीका है जिससे समाज के नियमों को तोड़ नहीं तो मोड़ तो सकते ही हैं.'
जयसिंह के तर्क मनिका के आज तक के आत्मसात किए सभी मूल्यों के इतर जा रहे थे लेकिन उनका प्रतिरोध करने के लिए भी उसे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था.
'पर पापा वो इतना रुडली बोल रहे थे उसका क्या? किसी को तो उन्हें रोकना चाहिए था...और आपका पता नहीं मैं तो वहां कोई सीन देखने नहीं गई थी.' मनिका ने सफाई देते हुए कहा.
'हाँ जरूर समाज का तो काम ही है रोकना. पहले दिन से ही समाज रोकना ही तो सिखाता है कभी लड़का-लड़की के नाम पर तो कभी घर-परिवार के नाम पर तो कभी धर्म-आचरण के नाम पर...अब तुम बताओ क्या फिर भी तुम रुकी?' जयसिंह का बात की आखिर में किया सवाल मनिका के समझ नहीं आया.
'क्या मतलब पापा...मैंने क्या किया?' उसने हैरानी से पूछा.
'क्या संचिता से तुम्हारी लड़ाई नहीं होती? वो तुम्हारी माँ है...क्या उनके सामने बोलना तुम्हें शोभा देता है? और फिर समाज भी यही कहता है कि अपने माता-पिता का आदर करो...नहीं कहता तो बताओ?' जयसिंह ने कहा.
'पर पापा मम्मी हमेशा बिना बात के मुझे डांट देती है तो गुस्सा नहीं आएगा क्या? मेरी कोई गलती भी नहीं होती...और मैं कोई हमेशा उनके सामने नहीं बोलती पर जब वो ओवर-रियेक्ट करने लगती है तो क्या करूँ..? अब आप भी मुझे ही दोष दे रहे हो.' मनिका जयसिंह की बात से आहत होते हुए बोली.
'अरे!' जयसिंह ने अब अपना हाथ मनिका की कमर से पीठ तक फिरा कर उसे बहलाया 'मैं तो हमेशा तुम्हारा साथ देता आया हूँ...'
'तो आप ऐसा क्यूँ कह रहे हो कि मैं मम्मी से बिना बात के लड़ती हूँ?' मनिका ने मुहं बनाते हुए अपना सिर उनके कंधे पर टिकाया.
'मैंने ऐसा कब कहा...मैं जो कह रहा हूँ वो तुम समझ नहीं रही हो. तुम संचिता से लड़ाई इसीलिए तो करती हो ना क्यूंकि वो गलत होती है और तुम सही...फिर भी तुम्हे उसके ताने सहने पड़ते हैं क्यूंकि वो तुम्हारी माँ है. लेकिन इस बारे में अगर सोसाइटी में चार जानो के सामने तुम अपना पक्ष रखोगी तो वे तुम्हें ही गलत मानेंगे कि नहीं?' जयसिंह ने इस बार प्यार से उसे समझाया.
'हाँ पापा.' मनिका को भी उनका आशय समझ आ गया था.
'सो अब तुम अपनी माँ से हर बात शेयर नहीं करती क्यूंकि तुम्हें उसके एटीटयुड का पता है और यही तुम्हारी समझदारी है व वह दूसरा तरीका है जिस से समाज में रह कर भी हम अपनी इच्छा मुताबिक जी सकते हैं.'
'मतलब...पापा?' मनिका को उनकी बात कुछ-कुछ समझ आने लगी थी.
'मतलब समाज और लोगों को सिर्फ उतना ही दिखाओ जितना उनकी नज़र में ठीक हो, जैसे तुम अपनी माँ के साथ करती हो...लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि तुम गलत हो और तुम्हारी माँ या समाज के लोग सही हैं. कुछ समझी?'
'हेहे...हाँ पापा कुछ-कुछ...' मनिका अब मुस्का रही थी.
'और ये बात मैंने तुम्हें पहले भी समझाई थी के अगर मैं भी समाज के हिसाब से चलने लगता तो क्या हम यहाँ इतना वक्त बिताते? हम दोनों ही घर से झूठ बोल कर ही तो यहाँ रुके हुए हैं...' जयसिंह ने आगे कहा.
'हाँ पापा आई क्नॉ...आई थिंक आई एम् गेटिंग व्हाट यू आर ट्राइंग टू से...कि सोसाइटी इज नॉट ऑलवेज राईट...और ना ही हम हमेशा सही होते हैं...है ना?' मनिका ने जयसिंह की बात के बीच में ही कहा.
'हाँ..फाइनली.' जयसिंह बोले.
'हीहीही. इतनी भी बेवकूफ नहीं हूँ मैं पापा...' मनिका हँसी.
'हाहाहा. बस समझाने वाला होना चाहिए.' जयसिंह ने हौले से मनिका को अपनी बाजू में भींच कर कहा.
'तो आप हो ना पापा...' मनिका भी उनसे करीबी जता कर बोली.
'हाहाहा...हाँ मैं तो हूँ ही पर मुझे लगा था तुम अपने आप ही समझ गई होगी दिल्ली आने के बाद.' जयसिंह ने बात ख़त्म नहीं होने दी थी.
'वो कैसे?' मनिका ने फिर से कौतुहलवश पूछा.
'अरे वही हमारी बात...कुछ नहीं चलो छोड़ो अब...' जयसिंह आधी सी बात कह रुक गए.
'बताओ ना पापा!? कौनसी बात..?' मनिका ने हठ किया.
'अरे कुछ नहीं...कब से बक-बक कर रहा हूँ मैं भी...' जयसिंह ने फिर से टाला.
'नहीं पापा बताओ ना...प्लीज.' मनिका ने भी जिद नहीं छोड़ी. सो जयसिंह ने एक पल उसकी नज़र से नज़र मिलाए राखी और फिर हौले से बोले,
'भूल गई जब तुम्हें ब्रा-पैंटी लेने के लिए कहा था?' मनिका के चेहरे पर लाली फ़ैल गई थी.

***

'क्या हुआ मनिका?' मनिका के चुप हो जाने पर जयसिंह ने पूछा था.

FUN-MAZA-MASTI गुमराह पिता की हमराह बेटी--8

FUN-MAZA-MASTI

 गुमराह पिता की हमराह बेटी--8

अलमारी में कुछ एक्स्ट्रा लिनन (चादर तौलिए इत्यादि) था और एक ओर उसके शॉपिंग बैग्स रखे हुए थे.
जयसिंह से लड़ाई हो जाने के बाद मनिका ने अपना खरीदा हुआ सामान यह कर के नहीं खोला था कि वो सब उन्होंने उसे दिलाया था. फिर जब उनके बीच सुलह हो गई थी तो ख़ुशी के मारे उसके दीमाग से यह बात निकल गई थी जबकि जयसिंह ने बीच में एक बार उसकी शॉपिंग को ले कर उसे कुछ कहा भी था. जयसिंह ने वह बैग्स लाकर उनके लगेज के पास ही रखे थे लेकिन शायद हाउस-कीपिंग (कमरे की साफ़ सफाई करने वाले) में से किसी ने उठाकर उन्हें अलमारी में रख दिया था. मनिका ने सारे बैग्स निकाले और उत्साह से बेड पर बैठ एक-एक कर उनमें से अपनी लाई चीज़ें निकालने लगी. जयसिंह की पीठ उसकी तरफ थी और वे कुर्सी पर बैठे अभी भी फोन पर लगे थे.
अपने नए कपड़े देख-देख मनिका खुश होती बैठी रही, 'ओह वाओ...मेरे वार्डरॉब में कितनी सारी नई ड्रेसेस आ गईं हैं...सबको दिखाने में कितना मजा आएगा...हहा...' अपनी सहेलियों की प्रतिक्रियाएँ सोच वह आनंदित हो रही थी. 'पर...मम्मी देखेंगी जब..? फिर से वही लड़ाई होगी...खर्चा कम...ढंग के कपड़े...और तेरे पापा...ले-देके यही चार बातें हैं उनके पास...' संचिता से लड़ाई अभी भी उसके जेहन में ताज़ी थी और उसके विचार घूम-फिर के फिर उन्हीं बातों पर लौट आए थे. 'बट पापा ने कहा कि वे सँभाल लेंगे...हाह... पापा के सामने फ़ुस्स हो जातीं है मम्मी की तोप भी...हीहाहा...अरे कल पापा ने कहा था कि उन्हें तो दिखाया ही नहीं कि क्या कुछ शॉप कर के लाई हूँ..?' मनिका ने अपने सामने फैली पोशाकों पर एक नज़र घुमाते हुए सोचा और मुस्काते हुए एक ड्रेस उठा ली थी.
कुर्सी पर बैठे हुए जयसिंह को बाथरूम का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ तो आई थी पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया था और अपने असिस्टेंट को ऑफिस में आ रही दिक्कतों को हैंडल करने के इंस्ट्रक्शन देते रहे,
'पापा..' बाथरूम का दरवाज़ा खुला और आवाज़ आई.
जयसिंह ने कुर्सी पर बैठे हुए ही मुड़ कर पीछे देखा और फोन में बोले, 'हाँ माथुर, जो मैंने कहा है वो कैरी आउट करो और कोई दिक्कत हो तो कल मुझे कॉल कर लेना, अभी थोड़ा बिजी हूँ...' माथुर ने उधर से कुछ कहा था लेकिन जयसिंह फोन काट चुके थे.
'औकात में रहना है.' उनके दीमाग ने लंड को संदेश भेज चेताया था.
मनिका ने बाथरूम में जा कर अपने नए लिए कपड़ों को पहना था, वह एक पल के लिए नर्वस हुई तो थी के 'पता नहीं पापा क्या सोचेंगे?' पर फिर उसे अपनी माँ की समझाइशें याद आ गईं और अपनी माँ को चिढ़ाने (जबकि वे वहाँ नहीं थीं) के चक्कर में उसने कपड़े बदल लिए थे. बाथरूम के शीशे में उसने अपने-आप को निहारा था और अपनी चटख लाल स्लीवलेस टी-शर्ट और काली शार्ट स्कर्ट को देख उसके संकोच ने फिर एक बार उसे आगाह किया था, लेकिन उसे जयसिंह की बात याद आ गई थी 'कपड़े ही तो हैं...' और वह मुस्कुराती हुई बाहर निकल आई थी. उसने यह नहीं सोचा था कि कपड़ों के अंदर जिस्म भी तो होते हैं.
जयसिंह कुछ समझ पाते उससे पहले ही मनिका बाथरूम के दरवाज़े से बाहर निकल आई थी,
'तो पापा? कैसी लग रही हूँ मैं? ये ड्रेस ली थी मैंने...मतलब और भी हैं, पहन के दिखाती हूँ अभी...पहले ये बताओ कैसी है?' मनिका ने चहक कर पूछा.
'अच्छी है...' जयसिंह ऊपर से नीचे तक उसे देखते हुए बोले, मनिका को हल्की सी लाज भी आई पर वह खड़ी रही.
उसकी गोरी-गोरी बाँहें और जांघें देख जयसिंह को पहली रात याद आ गई थी 'ओह्ह मैं तो भूल ही गया था कि कितनी चिकनी है ये कमीनी...' मनिका का स्कर्ट उसके घुटनों से थोड़ा ऊपर तक का था.
'पापा मेरी पिक्स तो क्लिक कर दो इन ड्रेसेस में प्लीज...फ्रेंड्स को भेजूंगी और जलाऊँगी... हीही...' मनिका ने अपना फोन उनकी तरफ बढ़ाया.
लेकिन जयसिंह ने उसके बोलते ही अपने फोन, जो अभी उनके हाथ में ही था, का कैमरा ऑन कर लिया था. मनिका ने अपना फोन पास रखे टेबल पर रख दिया और पोज़ बनाते हुए बोली,
'अच्छा फिर मुझे सेंड कर देना पिक्स बाद में...'
'हम्म..' जयसिंह उसका फोटो खींचते हुए बोले. चिड़िया पिंजरे में आ बैठी थी.
अब मनिका बारी-बारी से कपड़े बदल-बदल उनके सामने आने लगी और जयसिंह उसके फोटो लेने लगे, मनिका ने स्कर्ट के बाद उनको अपनी नई जीन्स पहन कर दिखाईं थी और उसके बाद दो जोड़ी डेनिम हॉट-पैंट्स(डेनिम या कपड़े से बनी शॉर्ट्स) पहन कर आई थी, उसकी ज्यादातर नई टी-शर्ट्स स्लीव्लेस हीं थी. जयसिंह का लंड उनके हर एनकाउंटर पर उछाल मार रहा था लेकिन जयसिंह भी मनिका के बाथरूम में चेंज करने को घुसते ही लंड को शांत करने के प्रयास चालु कर देते थे ताकि बात हाथ से निकलने के पहले ही संभाली जा सके.
उसके बाद मनिका एक काली पार्टी-ड्रेस पहन कर बाहर निकली थी, ड्रेस का कपड़ा सिल्की सा था, जयसिंह देखते ही तड़प गए थे. ड्रेस में क्लीवेज थोड़ा सा गहरा था (इतना ज्यादा भी नहीं कि कुछ दिखे) जिससे मनिका की क्लीवेज-लाइन का थोड़ा सा आभास मिल रहा था और ड्रेस की लंबाई भी इस बार पहले वाले स्कर्ट और हॉट-पैंट्स के मुकाबले कम थी. पर सबसे ज्यादा उत्तेजक बात यह थी कि ड्रेस के चिकने कपड़े ने मनिका के बदन से चिपक कर उसके उभारों को तो निखार ही दिया था लेकिन साथ ही उसकी ब्रा-पैंटी की आउटलाइनस् भी साफ़ नज़र आ रहीं थी.
मनिका ने जब पहली कुछ ड्रेसेस पहन कर उन्हें दिखाईं थी तो पहले वह अपने-आप को शीशे में अच्छे से देख-भाल कर फिर बाहर आती थी लेकिन बार-बार कपड़े बदल कर आने के कारण हर बार उसका ध्यान जल्दी से बाहर आने की तरफ बढ़ता गया था और इस बार वह ड्रेस पहनते ही एक नज़र अपने आप को देख बाहर आ गई थी जबकि उसकी ड्रेस का कपड़ा उसके बाहर आते-आते ही उसके बदन से चिपकना शुरू हुआ था (क्योंकि चिकने मैटेरियल से बने कपड़े में बदन से होने वाले घर्षण से ऐसा होता है). फोटो खींचते वक्त जयसिंह का हाथ एकबारगी काँप गया था.
मनिका के पास दिखाने को अब और कोई ड्रेस नहीं बची थी सो वह खड़ी रही व इस बार जयसिंह ने उसके ज्यादा ही फोटो ले लिए थे.
'बस पापा इतनी ही थीं..' मनिका ने उन्हें बताया.
'बस? इतने से कपड़ों का बिल था वो..?' जयसिंह ने हैरानी जताई.
'हाहाहा...मैंने कहा था ना पापा...क्या हुआ शॉक लग गया आपको?' मनिका ने हँसते हुए उनके थोड़ा करीब आते हुए कहा.
'नहीं-नहीं...पैसे की फ़िक्र थोड़े ही कर रहा हूँ. मुझे लगा और भी ड्रेस होंगी...' जयसिंह ने मुस्का कर कहा और उसे अपनी गोद में आने का इशारा किया. मनिका इतनी कातिल लग रही थी के लाख न चाहने के बाद भी वे अपने लंड की डिमांड को अनसुना नहीं कर सके थे. पर इस बार मनिका ने ही उन्हें बचा लिया,
'और तो पापा दो पर्स लिए थे मैंने और एक वॉच...एंड और क्या था..? हाँ बेल्ट और...सैंडिलस्...' मनिका सोच-सोच कर गिनाने लगी, पर वह उनकी गोद में नहीं बैठी थी क्योंकि उसे एहसास हो गया था कि उसने अंदर पैंटी पहन रखी थी जबकि इन ड्रेसेस के अंदर नीचे अमूमन बॉय-शॉर्ट्स (शॉर्टसनुमा पैंटी) पहनी जातीं हैं. अगर वह जयसिंह की जांघ पर बैठ जाती तो नीचे से खुली ड्रेस ऊपर उठ जाती जिसमें उसके अंडरवियर के एक्सपोज़ हो जाने का खतरा था. मनिका को यह आभास अजीब सा लगा था पर इस बार उसने अपने चेहरे पर शरम की अभिव्यक्ति नहीं होने दी थी, आखिर बेटी तो वह भी जयसिंह की ही थी.
'अच्छा-अच्छा ठीक है.' जयसिंह ने अपनी शॉपिंग लिस्ट सुनाती मनिका को थमने के लिए कहा और एक बार फिर अपने पास बुलाया, पर मनिका ने पीछे हटते हुए कहा,
'पापा मैं चेंज कर के आती हूँ...फिर मुझे पिक्स दिखाना.'
जयसिंह ने भी फिर से उसे नहीं बुलाया और थोड़ी राहत महसूस की थी. फिर उन्हें याद आया,
'मनिका..!?'
'जी पापा?' मनिका बाथरूम के दरवाजे पर पहुँच रुक गई थी.
'वो मेरी दिलाई चीज़ तो तुमने दिखाई ही नहीं पहन कर..' जयसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा.
'कौनसी चीज़...? ओह्ह...हाँ पापा...भूल गई मैं...रुको.' मनिका एक पल बाद समझ गई थी और बेड की तरफ जा कर झुक कर वहाँ रखे कपड़ों में लेग्गिंग्स की जोड़ी खोजने लगी. जयसिंह ने देखा कि उसने अपना एक घुटना मोड़ कर बेड पर रखा हुआ था और उसका दूसरा पैर नीचे फर्श पर था, वह आगे झुकी हुई थी सो उसकी कमर और नितम्ब ऊपर हो गए थे और साथ ही वह ड्रेस भी, जयसिंह का बदन एक बार फिर से गरमा गया था. उन्होंने अपने बचे-खुचे विवेक का इस्तेमाल कर कैमरा वीडियो मोड पर कर लिया था और उस मादक से पोज़ में झुकी अपनी बेटी की गांड का वीडियो बनाने लगे.
कुछ दस सेकंड यह वाकया चला जिसके बाद मनिका ने सीधी होकर मुस्कुराते हुए जयसिंह को अपने हाथ में ली हुई लेग्गिंग्स दिखाई थी और पहन कर आने का बोल बाथरूम में चली गई थी. जयसिंह ने फटाफट वीडियो बंद कर दिया था और उसके जाते ही जल्दी से अपने फोन की गैलरी में जा कर देखा क़ि वो सेव तो हुआ था के नहीं? वीडियो सेव हो गया था लेकिन गैलरी में उसकी थंबनेल (फोटो या वीडियो की झलक देता आइकॉन) देख मनिका को जयसिंह की कारस्तानी का साफ़ पता चल जाना था. जयसिंह ने जल्दी से वीडियो और साथ ही अभी ली हुई तस्वीरों का बैकअप ले उस वीडियो को वहाँ से डिलीट कर दिया था.
मनिका को लेग्गिंग पहन कर बाहर आने में थोड़ा वक्त लग गया था. खड़े-खड़े इतनी पतली पजामी पैरों में पहनने में उसे थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी. तब तक जयसिंह ने भी अपनी सेफ साइड रख ली थी. मनिका ने ऊपर से एक टी-शर्ट डाली और इस बार बिना आईना देखे ही बाहर आ गई. जयसिंह, जो अभी उसकी गांड को अपने मन से निकालने की कोशिश करने में लगे ही थे, पर कहर बरप पड़ा था.
एक तो जयसिंह ने पहले ही लेग्गिंग दो साइज़ छोटी ले कर दी थी उस पर उसका कपड़ा बिल्कुल झीना था तिस पर उसका रंग भी लाइट-स्किन कलर जैसा था; और मनिका यह सब बिन देखे ही बाहर निकल आई थी.
जयसिंह के बदन में करंट दौड़ने लगा था, लेग्गिंग्स के रंग की वजह से उसके कुछ भी न पहने हुए होने का आभास होता था व मनिका के अधो-भाग का एक-एक उभार नज़र आ रहा था. जयसिंह को अभी तक तो अपनी बेटी के कपड़ों में से उसकी जाँघों और नितम्बों का ही दीदार अच्छे से होता आया था लेकिन यह लेग्गिंग्स इतनी ज्यादा टाइट कसी हुई थी कि उसकी टांगों के बीच का फासला '' भी नज़र आने लगा था. कपड़ा पूरी तरह से उसकी जाँघों और योनि पर चिपक गया था और मनिका की योनि का उभार साफ़ दिख रहा था.
'कैसी लग रहीं है पापा?' मनिका चहकते हुए बाहर आई थी.
'उह्ह ह..' जयसिंह ने कुछ शब्द निकालने का प्रयास किया था पर सिर्फ आह ही निकल सकी.
मनिका उनके पास आ पहुंची थी. जयसिंह को इस बार पहले से ही इल्म था की कहाँ-कहाँ ध्यान से देखने पर मनिका के जिस्मानी जादू का लुत्फ़ उठाया जा सकता है. उनकी नज़र सीधी उसके प्राइवेट पार्ट्स (गुप्तांग) पर जा टिकीं थी और उसके करीब आते-आते उन्हें उसकी पहनी हुई पैंटी के रंग और साइज़ का पता चल चुका था. उसने आज अपनी स्काई-ब्लू रंग वाली अंडरवियर पहन रखी थी. मनिका की उभरी हुई योनि देख जयसिंह वैसे ही आपा खो रहे थे जब मनिका उनके ठीक सामने आ कर खड़ी हो गई थी,
'बताओ न पापा?'
'बहुत...बहुत अच्छी ल..लग रही है..' जयसिंह ने तरस कर कहा. अपने लंड को काबू करने की उनकी सारी कोशिशें बेकार जा चुकीं थी.
मनिका उनकी गोद में आ बैठी, जयसिंह को अपनी बेटी की कच्ची सी योनि अपनी जांघ पर टिकती हुई महसूस हुई थी, उनकी रूह कांप गई थी.
'ओह मनिका यू आर सो ब्यूटीफुल...' उनके मुहँ से निकला.
'इश्श पापा. यू आर मेकिंग मी शाय (शरम)...' मनिका ने मुस्काते हुए जवाब दिया 'इतनी भी सुन्दर नहीं हूँ मैं..मुझे बहलाओ मत..'
'तुम्हें क्या पता?' जयसिंह ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा और उस दिन ट्रेन वाली तरह अपना दूसरा हाथ उसकी जांघ पर रख लिया. मनिका की योनि का आभास उन्हें पागल किए जा रहा था. 'आज तो रेप होगा मुझसे लग रहा है..!' जयसिंह ने मन ही मन अपनी लाचारी व्यक्त की थी.
असल में मनिका को भी जयसिंह की तारीफ़ बहुत भायी थी. एक बात और थी जिसने आज मनिका को अपनी ये फैशन परेड करने के लिए उकसाया था लेकिन जिसका भान अभी उसके चेतन मन को नहीं हुआ था; पिछली रोज जब जयसिंह टी.वी. में दिखाई जा रही लडकियाँ ताड़ रहे थे तो मनिका ने नोटिस कर लिया था व उन्हें छेड़ा था. उस बात ने भी उसके आज के फैसले में कहीं ना कहीं एक भूमिका निभाई थी.
जयसिंह उसकी जांघ सहलाना शुरू कर चुके थे.
'पापा फ़ोन दो ना. पिक्स देखते हैं..' मनिका बोली.
जयसिंह ने उसकी जांघ से हाथ हटा अपने बाजू में रखा फ़ोन उठा कर उसे पकड़ा दिया और फिर से उसकी जाँघों पर हाथ ले गए. मनिका फ़ोन की फोटो-गैलरी खोल जयसिंह की ली हुई तस्वीरें देखने लगी. शुरुआत की कुछ फोटो देख वह बोली,
'पापा! कितनी अच्छी पिक्स क्लिक की है आपने...एंड ये ड्रेसेस कितनी अमेजिंग लग रही है ना?' उसने जयसिंह और अपनी, दोनों की ही तारीफ़ करते हुए पूछा था. जयसिंह ने तो हाँ कहना ही था, उनका खड़ा हुआ लिंग भी उनके अंडरवियर में कसमसा कर हाँ कह रहा था.
फिर आगे मनिका की पार्टी-ड्रेस वाले फोटो आने शुरू हो गए, इस बार वह झेंप गई. जयसिंह ने फोटो भी ज्यादा ले रखे थे सो उन्हें आगे कर-कर देखते हुए उसकी झेंप शरम में तब्दील होती जा रही थी. उसने एक फोटो पर रुकते हुए डिलीट-बटन दबाया था, जयसिंह ने तपाक से पूछा कि वह क्या कर रही है? तो उसने थोड़ा सकुचा कर कहा कि वे फोटोज़ ज्यादा अच्छे नहीं आए थे, उसका मतलब था कि उनमें उसके पहने अंडर-गारमेंट्स का पता चल रहा था.
मनिका ने एक दो फोटो ही डिलीट किए थे कि जयसिंह के फ़ोन पर एक बार फिर से रिंग आने लगी, ऑफिस से माथुर का फ़ोन था,
'ओहो आज तो कुछ ज्यादा ही कॉल्स आ रहीं है आपको..!' मनिका ने झुंझला कर कहा.
'बजने दो..अभी तो बात की थी..' जयसिंह ने कहा, उनका चेहरा अब मनिका के बालों के पास था और वे उनकी भीनी-भीनी खुशबू में खोए थे. मनिका ने फ़ोन के अपने आप डिसकनेक्ट हो जाने तक इंतज़ार किया और फिर से उन पिक्स को डिलीट करने लगी जो उसे ज्यादा ही रिवीलिंग लगीं थी. बैक-अप ले चुके जयसिंह बेफिक्र थे. फ़ोन एक बार फिर से बजने लगा.
'हाँ माथुर बोलो?' जयसिंह ने तल्खी से पूछा. उन्होंने मनिका को एक बार फिर से कॉल न उठाने को कहा था लेकिन फ़ोन डिसकनेक्ट होते ही वापस रिंग आने लग गई थी.
उनके सेक्रेटरी ने उन्हें बताया की उनका एक बहुत बड़ा क्लाइंट जो पिछले कुछ दिनों से उनसे बात करने के लिए रोज कॉल कर रहा था, वह भी अभी दिल्ली में था. उसने जब आज फिर से कॉल किया तो उनके सेक्रेटरी ने उसको जयसिंह के दिल्ली गए होने की सूचना दी थी, जिस पर उसने उससे मीटिंग फिक्स करने के लिए कहा था और इसी बाबत उनका सेक्रेटरी उन्हें कॉल पर कॉल कर रहा था.
जयसिंह सोच में पड़ गए. यह क्लाइंट बहुत बड़ी आसामी थी और उनकी कंपनी की बैलेंस-शीट में मौजूद बड़े नामों में से एक था, मीटिंग करनी जरूरी थी; उन्होंने सेक्रेटरी से मीटिंग फिक्स कर उन्हें कॉल करने को कहा. अचानक घटनाक्रम में हुए परिवर्तन ने एक बार फिर उनके हवस के मीटर की सुई को चरम पर पहुँच कर टूटने से बचा लिया था, 'कुछ करना पड़ेगा...जल्द.' जयसिंह ने सोचा और मनिका से बोले,
'जाना पड़ेगा मुझे...एक क्लाइंट यहाँ आया हुआ है.' जयसिंह ने मनिका से कहा.
'बट पापा! वी आर ऑन अ हॉलिडे ना?' मनिका ने बेमन से कहा.
'येस डार्लिंग आई क्नॉ बट ये काफी मालदार क्लाइंट है...इसी जैसों से तो तुम्हारी शॉपिंग पूरी होती है.' जयसिंह ने उसके गाल सहला उसे बहलाया 'चलो गेट उप नाओ, मुझे रेडी भी होना है.' जयसिंह ने आगे कहा था और अभी भी काम-वासना के वशीभूत अपने हाथ से, उनकी जांघ पर बैठी हुई मनिका को उठाने के लिए, उसके नितम्ब पर हल्की सी थपकी दे दी थी.
'आउच...ओके-ओके पापा.' मनिका को उनके इस स्पर्श का अंदेशा नहीं था और वह उचक कर खड़ी हो गई थी, जयसिंह ने बिल्कुल भी ऐसा नहीं दर्शाया कि उन्होंने कोई गलत या अजीब हरकत कर दी हो और उठ कर मीटिंग के लिए तैयार होने चल दिए.
मनिका को अपनी गांड में एक हल्की सी तरंग उठती महसूस हुई थी और वह कुछ पल वैसे ही खड़ी उनको जाते हुए देखती रही थी.

***

जयसिंह रात को लेट वापस आए थे. उन्होंने मनिका को कॉल करके बता दिया था कि आज उन्हें आने में देर हो जाएगी, उनके क्लाइंट ने उन्हें अपने एक-दो जानकार इन्वेस्टर्स से मिलवाया था और निकट भविष्य में जयसिंह को उनसे एक बड़ी डील होती नज़र आ रही थी. मीटिंग से निकल उन्होंने माथुर को फ़ोन कर आज की अपनी मीटिंग का ब्यौरा दिया था और जल्द से जल्द अपने नए क्लाइंट्स के लिए एक पोर्टफोलियो तैयार करने को कहा था.
'अब तो दिल्ली चक्कर लगते रहेंगे..' वे फ़ोन रखते हुए बोले थे.
जब तक जयसिंह अपने हॉटेल रूम में पहुँचे थे मनिका सो चुकीं थी. जयसिंह ने भी बाथरूम में जा कर चेंज किया और आकर लेट गए, 'हे भगवान् ये डील फाइनल हो जाए तो मजा आ जाए.' उन्होंने प्रार्थना की, उनके दीमाग में आज की उनकी बिज़नस मीटिंग के विचार उठ रहे थे. काफी पैसा आने की सम्भावना ने मनिका पर उनका ध्यान अभी जाने नहीं दिया था, पर फिर उन्होंने करवट बदली और उनके विचार भी बदल गए 'और ये डील हो जाए तो डबल मजा आ जाए...' उन्होंने अपनी बेटी के जिस्म की तरफ हाथ बढ़ाते हुए सोचा.
जयसिंह ने शुक्र मनाया कि उन्होंने हाथ मनिका के गाल पर रख उसे सहलाया था. मनिका अभी पूरी तरह से नींद में नहीं थी और उनका स्पर्श पाते ही उसने आँखें खोल लीं थी.
'आह...पापा? आ गए आप?' उसने अंगडाई लेते हुए पूछा.
'हाँ...सोई नहीं अभी तक?' जयसिंह उसे जागती हुई पा कर थोड़ा घबरा गए थे.
'उहूँ...बस नींद आने ही लगी थी आपका वेट करते-करते..' मनिका ने नींद भरी आवाज़ से कहा.
'ह्म्म्म..वो मीटिंग जरा देर तक चलती रही सो लेट हो गया.' जयसिंह ने बताया.
उनींदी हुई मनिका से कुछ देर बात करने के बाद जयसिंह ने उसे सो जाने को कह और एक बार फिर से लाइट ऑफ कर दी थी. मनिका अभी सोई नहीं थी और आज वे भी थक चुके थे, सो उन्होंने भी अपने सिर उठाते लंड को हल्का सा दबा कर शांत करने का प्रयास किया था और कुछ ही देर में उनकी आँख लग गई थी.
जयसिंह सपना देख रहे थे; सपने में वे एक बिज़नस मीटिंग में बैठे थे और एक बेहद बड़ी डील साईन करने के लिए निगोशिएट कर रहे थे. उन्हें आभास हो रहा था जैसे उनके साथ उनका सेक्रेटरी और ऑफिस के कर्मचारी कागजात लेकर बैठे हुए हैं और काफी गहमा-गहमी का माहौल है लेकिन जयसिंह किसी का भी चेहरा साफ-साफ़ नहीं देख पा रहे थे. कुछ देर इसी तरह सपना चलता रहा जब आखिर सामने बैठा क्लाइंट डील साईन करने को राजी हो गया और उसने उठते हुए उनसे हाथ मिलाया. जयसिंह ने भी उठ कर हाथ आगे बढाया था लेकिन अब उनके सामने क्लाइंट की जगह मनिका खड़ी थी और मुस्का रही थी, 'आई अग्री (मान जाना) पापा..!' सपने वाली मनिका ने कहा, उसने एक छोटी सी काली ड्रेस पहन रखी थी. जयसिंह ने नीचे देखा और पाया कि वे खुद नंगे खड़े थे और उनका लंड खड़ा हो कर हिलोरे ले रहा था, तभी मनिका ने हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ लिया; जयसिंह की आँख खुल गई, उनका हाथ पजामे के अन्दर लंड को थामे हुए था और उनके दिल की धड़कनें बढ़ी हुईं थी.
जयसिंह ने खिड़की की तरफ देखा और पाया कि बाहर अभी भी अँधेरा था, उन्होंने सिरहाने रखे फ़ोन में वक्त देखा. सुबह के ४ बजने वाले थे. उन्होंने मनिका की तरफ देखा, वह पेट के बल लेटी सो रही थी. उनका लंड अभी भी उनके हाथ में था पर मनिका को सोते हुए पा कर भी उन्होंने उसे छूने की कोशिश नहीं की थी. वे लेटे-लेटे सोचने लगे,
'उफ़...अब तो साली के सपने भी आने लगे हैं. बड़ी जालिम है इसकी जवानी...पर कुछ होता दिखाई नहीं देता, इसके सिर पर तो दोस्ती का भूत सवार है और मेरे लंड पर इसकी ठुकाई का. दोनों के बीच मेरी बैंड बजी रहती है. क्या करूँ समझ नहीं आता...आज आखिरी दिन है, कल तो चिनाल का इंटरव्यू होगा.' जयसिंह अपनी लाचारगी पर तरस खाते हुए मनिका की उभरी हुई गांड देख रहे थे. 'हर तरह से इसे बहला चुका हूँ...पर आगे दीमाग में कोई तरकीब आ ही नहीं रही है...' कुछ पल इसी तरह फ्रस्टरेट होते रहने के बाद उनके लंड ने एक जोरदार हिचकोला खाया. यकायक जयसिंह के चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी, 'आह ये मैंने पहले क्यूँ नहीं सोचा...दीमाग नहीं...अब लंड की बारी है...'
जयसिंह ख़ुशी-ख़ुशी सो गए, आर या पार की लड़ाई का वक्त आ चुका था.
सूरज निकल आने के साथ ही जयसिंह और मनिका भी उठ गए थे. उन्होंने अपनी दिनचर्या के काम निपटाए और मनिका के कहने पर नाश्ता कमरे में ही मंगवा लिया. मनिका को भी अगले दिन का अपना इंटरव्यू नज़र आने लगा था और जयसिंह को अपनी बुद्धिमता के लाख उदाहरण देने के बावजूद अब वह भी कुछ नर्वस हो गई थी. उसने अपने पिता से कहा कि आज वह इंटरव्यू के लिए पढ़ कर थोड़ा रिवीजन करने का सोच रही थी सो अगर उन्हें भी अपने बिज़नस का कोई जरूरी काम हो तो वे बेफिक्र कर सकते हैं. जयसिंह ने मुहँ-अँधेरे आँख खुलने पर जो तरकीब सोची थी उसे इस्तेमाल करने की हिम्मत अभी तक नहीं बाँध सके थे. उस वक्त तो नींद में उन्होंने फैसला कर लिया था लेकिन सुबह मनिका के उठ जाने के बाद उनका असमंजस और व्याकुलता बढ़ गए थे. एक मौका आ कर हाथ से निकल भी चुका था. उन्होंने मनिका की बात पर सहमत होते हुए कहा कि वैसे तो आज वे फ्री थे और रूम में ही रहेंगे बट अगर कोई काम आन पड़ता है तो शायद उन्हें जाना पड़ जाए.
नाश्ता करने के बाद मनिका अपनी किताबें ले कर बैठ गई और जयसिंह कुछ देर कमरे में इधर-उधर होने के बाद उस से पूल खेलने जाने का बोल कर नीचे चले गए. कुछ घंटों बाद उन्होंने रूम में कॉल कर के मनिका को नीचे लंच के लिए बुलाया, जब वे खाना खत्म कर चुके तो जयसिंह के आग्रह के बाद भी मनिका उनके साथ पूल एरिया में न जा कर पढ़ने के लिए रूम में लौट गई थी.
जयसिंह शाम हुए रूम में लौट कर आए. वे बहुत खुश नज़र आ रहे थे, उनको इस कदर मुस्काते देख बेड पर किताब लिए बैठी मनिका ने उन्हें छेड़ते हुए पूछा,
'क्या हुआ पापा? बड़ा मुस्कुरा रहे हो आज तो...कोई गर्लफ्रेंड बना आए हो क्या?'
'हाहाहा...नहीं-नहीं कहाँ गर्लफ्रेंड...पर हाँ अपनी एक गर्लफ्रेंड की शॉपिंग का जुगाड़ कर आया हूँ...' जयसिंह ने भी हँस कर उसे आँख मार दी थी, उनका इशारा मनिका की तरफ ही था.
'हाहाहा...ये बात है? मुझे भी बताओ फिर तो...' मनिका ने किताब एक तरफ रखते हुए पूछा.
जयसिंह ने उसे बताया कि आज वे पूल में जीत कर आए हैं और जीत की राशि उनके हारे हुए अमाउंट के दोगुने से भी ज्यादा थी व उसे चेक दिखाया. मनिका भी खुश हो गई थी. मनिका ने बताया कि उसने तो बस पढाई ही करी थी दिन भर और अब उसे नींद आ रही थी. जयसिंह ने डिनर भी रूम में ही मंगवा लेने का सुझाव दिया.
खाना खा लेने के बाद मनिका नहाने चली गई और जयसिंह बेड पर बैठ सोच में डूब गए, 'क्या वे यह कर सकेंगे?' कुछ पल बैठे रहने के बाद वे उठे और जा कर सूटकेस में रखे अपने शेविंग-किट में से एक छोटी सी बोतल निकाल लाए. उनका दिल जोरों से धड़क रहा था.
मनिका नहाते वक्त अगले दिन की टेंशन में डूबी थी. उसके पापा आज पूल में जीत कर आए थे इस बात से वह खुश भी थी लेकिन इतने दिन दिल्ली की हवा लग जाने के बाद अब उसे यह डर सता रहा था कि अगर उसका सेलेक्शन नहीं हुआ तो उसे वापस बाड़मेर जाना पड़ सकता है 'अगर कल मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ तो पापा से बोलूंगी कि यहीं किसी और कॉलेज में एडमिशन लेना है मुझे...वापस तो मैं भी नहीं जाने वाली.' उसने सोचा था और नहा कर बाथरूम से बाहर निकली. जयसिंह रोज की तरह सामने काउच पर ही बैठे थे. टी.वी चल रहा था.
मनिका को जैसे काटो तो खून नहीं, उसका दिल, दीमाग और तन तीनों चक्कर खा गए थे.
जयसिंह ने अपने किट से तेल की शीशी निकाली थी और बेड पर आ बैठे थे. फिर उन्होंने अपनी पेंट और अंडरवियर निकाल दिए व हाथों में तेल लेकर अपने काले लंड पर लगाने लगे, लंड तो पहले से ही खड़ा था, अब तेल की मालिश से चमकने लगा था. उस सुबह नहाते वक़्त जयसिंह ने अपने अंतरंग भाग पर से बाल भी साफ़ कर लिए थे, सो उनके लंड के नीचे उनके अंडकोष भी साफ नज़र आ रहे थे. कुछ देर अपने लंड को इसी तरह तेल पिलाने के बाद जयसिंह ने उठ कर अलमारी में रखे एक्स्ट्रा तौलियों में से एक निकाल कर लपेट लिया और अपनी उतारी हुई पेंट और चड्डी को सूटकेस में रख दिया. तेल की शीशी को भी यथास्थान रखने के बाद वे काउच पर जा जमे और मनिका के बाहर आने का इंतज़ार करने लगे थे.
मनिका जब नहा कर बाहर आई तो अपने पिता को काउच पर बैठ टी.वी देखते पाया. वे ऊपर तो शर्ट ही पहने हुए थे लेकिन नीचे उन्होंने एक टॉवल लपेट रखा था और पैर पर पैर रख कर बैठे थे. टॉवल बीच से ऊपर उठा हुआ था और उनकी टांगों के बीच उनका 'डिक!' नज़र आ रहा था. मनिका की आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा.
मनिका ने अपनी सहेलियों के साथ गुपचुप खिखीयाते हुए एक दो पोर्न फ़िल्में देखीं हुई थी लेकिन असली लंड से उसका सामना पहली बार हुआ था और वह भी उसके पिता का था. जयसिंह के भीषण काले लंड को देख उसका बदन शरम और घबराहट से तपने लगा था.
'बस अभी नहाता हूँ...' जयसिंह ने मनिका की तरफ एक नज़र देख कर कहा. उनका हाल भी मनिका से कोई बेहतर नहीं था, दिल की धड़कने रेलगाड़ी सी दौड़ रहीं थी. लेकिन उन्होंने अपनी पूरी इछाश्क्ति से अपने चेहरे के भाव नॉर्मल बनाए रखे थे. मनिका के चेहरे का उड़ा रंग देख उन्होंने झूठी आशंका व्यक्त की, 'क्या हुआ मनिका?'
'क..क...कुछ...कुछ नहीं...पापा..' मनिका ने हकलाते हुए कहा और पलट कर बेड की तरफ चल दी.
जयसिंह उसे जाते हुए देखते रहे, उसकी पीठ उनकी तरफ थी और उसने अपना सूटकेस खोल रखा था, जयसिंह ने अपनी नज़रें टी.वी पर गड़ा लीं, उसी वक्त मनिका ने एक बार फिर उन्हें पलट कर देखा. जयसिंह अपनी बेटी के सामने अपने आप को यूँ एक्सपोस (दिखाना) करने के बाद थोड़े और बोल्ड हो गए थे, हालाँकि डर उन्हें भी लग रहा था कि कहीं कुछ उल्टा रिएक्शन ना हो जाए उसकी तरफ से,
'मनिका!?' उन्होंने पुकारा.
'ज..जी पापा?' मनिका ने थोड़ा सा मुहँ पीछे कर के पूछा. उसकी आवाज़ भर्रा रही थी.
'ये मेरा फ़ोन चार्ज में लगा दो जरा...' जयसिंह ने अपना फ़ोन हाथ में ले उसकी तरफ बढ़ाया.
'जी..हाँ अभी...अभी लगाती हूँ..पापा..' मनिका ने उनकी तरफ देखा और एक बार फिर से सिहर उठी.
थोड़ी हिम्मत कर मनिका पलटी और बिना जयसिंह की टांगों के बीच नज़र ले जाए उनके पास आने लगी, जयसिंह को हाथ में फ़ोन उठाए कुछ पल बीत चुके थे, जैसे ही उन्हें मनिका पास आती दिखी उन्होंने फ़ोन अपने आगे रखे एक छोटे टेबल पर रख दिया था. मनिका की नज़र भी उनके नीचे जाते हाथ के साथ नीची हो गईं, वह जयसिंह से चार फुट की दूरी पर खड़ी थी और उसने झुक कर फ़ोन उठाया, ना चाहते हुए भी उसकी नज़र एक बार फिर से जयसिंह के चमकते लंड और आंडों पर जा टिकी. जयसिंह भी उत्तेजित तो थे ही, मनिका की नज़र कहाँ है इसका आभास उन्हें कनखियों से हो गया था. उन्होंने अपने उत्तेजित हुए लंड की माश्पेशियाँ कसते हुए उसे एक हुलारा दिला दिया, मनिका झट से उछल कर सीधी हुई और लघभग भागती हुई बेड के पास जा कर उनका फ़ोन चार्जर में लगाने की कोशिश करने लगी, उसके हाथ कांप रहे थे.

FUN-MAZA-MASTI गुमराह पिता की हमराह बेटी--7

FUN-MAZA-MASTI

 गुमराह पिता की हमराह बेटी--7

खाना खाने के बाद मनिका और जयसिंह वापस अपने कमरे में न आ हॉटेल गेस्ट-एक्टिविटीज एरिया में गए. दोपहर का वक्त होने की वजह से वहाँ ज्यादा जने नहीं थे. जयसिंह मनिका को ले पूल टेबल के पास पहुँचे, वहाँ दो कपल मस्ती करते हुए पूल खेल रहे थे. जयसिंह ने जा कर एक क्यू-स्टिक (जिससे पूल-स्नूकर खेलते हैं) उठा ली थी पर दूसरों को खेलते देख थोड़े अचकचाकर खड़े हो गए थे. लेकिन वे लोग काफी फ्रेंडली थे और उन्हें देख उनसे भी ज्वाइन करने को कहा और बताया कि वे तो बस लेडीज को खुश करने के लिए वहाँ मसखरी कर रहे थे और अगर वे चाहें तो सीरियसली गेम लगा लेते हैं. इस पर जयसिंह ने भी हाँ कह दिया. उन्होंने अपने-आप को इंट्रोड्यूस किया था तो जयसिंह ने भी अपना परिचय दिया 'आई एम जयसिंह एंड दिस इस मनिका..' और हाथ मिलाया था. उन्होंने यह नहीं बताया था कि मनिका उनकी बेटी है.
वे लोग वेजर (शर्त) लगा कर खेलने लगे. तीनों को उनके साथ आईं लडकियाँ सपोर्ट कर रही थी और वहाँ हँसी और मस्ती का माहौल बन गया था.
सामने वाले लौंडे खेलने में माहिर थे और जल्द ही जयसिंह ने अपने-आप को हारते हुए पाया, लेकिन जयसिंह ने भी हार नहीं मानी थी और शर्त की बाजी बढ़ाते चले जा रहे थे, आखिर एक वक्त आया जब जयसिंह ने ५०००० रूपए का दाँव लगाने का चैलेंज कर डाला. सामने वाले कपल्स के चेहरे पर हैरानी का भाव आ गया था. पर आपस में सलाह कर वे उनकी बात मान गए और खेलने लगे. इस बार गेम की इंटेंसिटी बढ़ी हुई थी और हर स्ट्राइक (चाल) के बाद चिल्लम-चिल्ली मची हुई थी. देखनेवाले कुछ और लोग भी पूल-टेबल के आस-पास आ जमे थे. पर अंत में जयसिंह वह बाजी भी हार गए, माहौल थोड़ा शांत हुआ, जयसिंह ने भी हँस कर अपनी हार स्वीकार कर ली थी.
अब दूसरों ने उन्हें ड्रिंक्स का ऑफर किया जिसे उन्होंने मान लिया. तीनों लड़कियों को वहीँ छोड़ वे लोग बार से ड्रिंक्स लेने चले गए थे, लड़कियों ने अपने लिए मोक्टेल्स (बिना शराब की ड्रिंक्स) मंगवाई थी.
मर्दों के चले जाने के बाद तीनों लडकियाँ बतियाने लगीं, बातों-बातों में सामनेवाली लड़कियों ने मनिका से कहा था,
'ऑब्वियस्ली यू गायस हैव अ लॉट ऑफ़ मनी...'
जब मनिका ने उनसे ऐसा कहने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि जिस तरह से वे लोग शर्त का अमाउंट बढ़ाते जा रहे थे उस से उन्हें ऐसा लगा था और जब जयसिंह ने आखिरी बार पचास हजार का दाँव खेला था तो उन्होंने सिर्फ इसीलिए हाँ भरी थी के वे लोग ऑलरेडी सेवेंटी थाउजेंड जीत कर प्लस में चल रहे थे. वे लोग तो वहाँ एक कंपनी स्पॉन्सर्ड वेकेशन आउटिंग पर आए हुए थे. मनिका ने भी उन्हें बताया कि वह भी पहली बार दिल्ली आई थी और एक-दो दिन में उसका इंटरव्यू था व उसके पापा उसके साथ आए थे. इस पर दोनों ही लड़कियाँ चौंक गई थीं,
'यू मीन टू से यू आर हेयर विद योर डैड?' एक ने पूछा.
'येस...वाय?' मनिका ने उनकी उलझन देख जानना चाहा.
'ओह वेल वी थॉट दैट ही वास् योर...आई मीन हमने नहीं सोचा था कि ही इज़ योर फादर..'
'ओह..हाहाहा...सो यू पीपल थॉट ही इस माय बॉयफ्रेंड ऑर समथिंग..?' मनिका ने हँस कर पूछा था. जिस पर उन दोनों ने भी झेंप भरी स्माइल दे हाँ में सिर हिला दिया.
'इट्स ओके...आई गेट दैट अ लॉट...मेरी सब फ्रेंड्स भी ऐसा ही बोलती हैं...बिकॉज़ वी आर वैरी क्लोज़ टू ईच-अदर..' मनिका ने उन्हें रिलैक्स होने को कहते हुए बताया था.
फिर जयसिंह और वो दोनों बन्दे वापस आ गए थे, उन लोगों ने घुलते-मिलते ड्रिंक्स ख़त्म कीं थी जिसके बाद जयसिंह और मनिका उनसे विदा हो अपने रूम में आ गए थे. आने से पहले जयसिंह ने उनसे उनका रूम नंबर ले लिया था और कमरे में पहुँचते ही रूम-सर्विस से किसी के हाथ एन्वेलोप (लिफाफा) भिजवाने को कहा. जब एक स्टाफ़ का बन्दा एन्वेलोप देने आया तो उन्होंने उसे रुकने को कहा और एन्वेलोप में एक लाख बीस हजार की राशि का चेक डाल कर उसे दिया व उन लोगों के बताए रूम नंबर पे दे आने को भेज दिया. कुछ देर बाद उनके साथ पूल खेल रहे जनों में से एक का उन्हें थैंक्यू कहने को फोन (रिसेप्शन के थ्रू कॉल कनेक्ट करा) भी आया था.
जयसिंह कमरे में आ कर बेड पर लेटे हुए थे और मनिका भी दूसरी तरफ बैठी हुई अपने फोन में कुछ कर रही थी. जयसिंह ने आँखें बंद करी ही थी कि मनिका उनसे बोली,
'पापा...जोश-जोश में वन लैख ट्वेंटी थाउजेंड उड़ा दिए हैं आज आपने...'
'हम्म कोई बात नहीं क्या हो गया तो...पैसे तो आते-जाते रहते हैं.' जयसिंह ने बेफिक्री से कहा.
'इससे अच्छा तो मैं शॉपिंग ही कर लेती..' मनिका ने ठंडी आह भरी.
'हे भगवान्! कितनी शॉपिंग करनी है इस लड़की को?' जयसिंह ने झूठ-मूठ का अचरज दिखाया.
'आपको क्या पता पापा...शॉपिंग तो हर लड़की का सबसे बड़ा सपना होता है...' मनिका ने इठला कर कहा.
'और उस दिन जो पूरा मॉल खरीद कर लाईं थी उसका क्या?' जयसिंह ने याद दिलाया.
'हाँ तो थोड़ी सी और कर लेती...' मनिका मुस्काई.
'उस दिन जो इतनी ड्रेसेज़ लेकर आईं थी वो तो दिखाईं नहीं अभी तक तुमने..?' जयसिंह ने ताना दिया.
'अरे भई पापा दिखा दूँगी तो...अभी मुझे नींद आ रही है...' मनिका ने अंगड़ाई लेते हुए कहा और वह भी लेट गई.
जयसिंह और मनिका दो घंटे सोने के बाद उठे थे. उन्होंने इवनिंग-टी (चाय) का ऑर्डर किया था और बैठ कर टी.वी. देखने लगे. एक हिन्दी फ़िल्म चल रही थी; रेस. फ़िल्म अभी कुछ महीने पहले ही रिलीज़ हुई थी सो मनिका ने लगा ली थी.
जयसिंह के साथ इतने दिनों से रह रही मनिका उनके स्वभाव में आने वाले परिवर्तनों को भाँपने लगी थी, उसने देखा क़ि जयसिंह वैसे तो फ़िल्म में कम ही इंटरेस्ट ले रहे थे पर जब कोई हीरोइन या आईटम सॉन्ग स्क्रीन पर दिखाते थे तो उनकी नज़र जरा पैनी हो जाती थी. मनिका मन ही मन मुस्का उठी थी, 'देखो कैसे भाती हैं बिपाशा और कैटरीना इन्हें...'
कुछ देर बाद फ़िल्म खत्म हो गई, उनकी चाय और स्नैक्स भी डिलीवर हो गए थे सो वे बैठे हुए खाना-पीना कर रहे थे और टेलीविज़न से उनका ध्यान थोड़ा हट गया था. तभी टी.वी. पर 'एनैमोर', जो एक लॉनजुरे बनाने वाली कंपनी है, का एडवर्टिसमेंट (विज्ञापन) आया, अब स्क्रीन पर चल रही इमेज पर दोनों का ही ध्यान चला गया था. कुछ मॉडल्स को ब्रा-पैंटीज़ में अठखेलियाँ करते दिखाया गया था, ऐड कुछ ही सेकंड चला था पर दोनों बाप-बेटी के मनों में अलग-अलग विचार उठा गया था. एक तरफ मनिका को सुबह वाली बात याद आ गई और वह शरमा गई थी व दूसरी तरफ जयसिंह का दिल खुश हो गया था, उन्होंने हल्का सा मुस्काते हुए मनिका की ओर देखा था. मनिका थोड़ी तन के सीधी बैठी थी और अपनी नज़रें टेबल पर रखे स्नैक्स पर गड़ाए थी उसे कनखियों से जयसिंह की नज़र और शरारती मुस्कान का आभास हो गया था, एक-दो पल बाद उससे भी रुका नहीं गया और उसके चेहरे पर भी शर्मीली मुस्कान तैर गई, जयसिंह फिर भी उसे देखते रहे,
'पापा स्टॉप इट ना...?' मनिका ने उनकी तरफ बिना देखे कहा.
'अरे मैंने तो कुछ कहा ही नहीं...' जयसिंह ने मुस्काते हुए कहा.
'पापा! याद है ना मैंने कहा था आपसे कभी बात नहीं करुँगी मुझे छेड़ोगे तो...' मनिका ने उनकी तरफ एक नज़र देख अपनी धमकी दोहराई.
'अच्छा भई मैं दूसरी तरफ मुहँ करके बैठ जाता हूँ अगर तुम कहती हो तो...' जयसिंह ने मुहँ दीवार की तरफ घुमाते हुए कहा.
अब तक मनिका की शरम कुछ कम हो गई थी और उसे जयसिंह की नौटंकी पर हँसी आने लगी थी. उधर जयसिंह चुप-चाप मुहँ फेरे बैठे थे. मनिका को समझ नहीं आ रहा था कि वह अब क्या कहे?
'कपड़े ही तो हैं...' जयसिंह की आवाज़ आई.
'हाहाहाहाहाहा... हेहेहे...हीहीहीही... पापाआआ!' मनिका को उनकी बात ने गुदगुदा कर लोटपोट कर दिया था 'यू आर सो नॉटी पापा...!' वह हँसते हुए बोली थी.
जयसिंह भी हँसते हुए उसकी तरफ घूमे और पास सरक आए. मनिका को अभी भी हँसी छिड़ी हुई थी जब जयसिंह ने पहली बार खुद अपने हाथों से पकड़ कर उसे अपनी गोद में खींच लिया. वह हँसते-हँसते अपने आप को छुड़ाने के प्रयास कर रही थी और साथ ही बोल रही थी कि उन्होंने उसे चिढ़ाया है इसलिए वह उनके पास नहीं आएगी लेकिन असल में वहीं बैठी रही. जयसिंह ने उसे थोड़ा कसकर अपने से लगा लिया था. उधर उनके लंड ने भी उत्साह से सिर उठा रखा था.
'वैसे आप भी कम नहीं हो...पता चल गया मुझे ठीक है ना...' मनिका ने उलाहना देते हुए कहा.
'मैंने क्या किया..?' जयसिंह ने अनजान बनते हुए कहा, उन्हें लग रहा था कि वह उनकी कही बात के लिए ही कह रही है.
'जो आँखें फ़ाड़-फाड़ कर देख रहे थे ना अभी मूवी में बिपाशा-कैटरीना को और डांस करती फिरंगनों को...सब देखा मैंने...' मनिका ने उनकी गोद में बैठे-बैठे उन्हें हल्का सा धक्का दे कर कहा.
जयसिंह मनिका के इस खुलासे से सच में निरुत्तर हो गए थे. मनिका को उनके इस तरह झेंप जाने पर बहुत मजा आ रहा था, उसने खनकती हुई आवाज में आगे कहा,
'अब क्या हुआ...बोलो ना पापा? बढ़ा छेड़ रहे थे मुझे..!'
'अब मूवी भी ना देखूं क्या?' जयसिंह ने कहा था पर उनकी आवाज़ से साफ़ पता चल रहा था कि उनकी चोरी पकड़ी गई थी.
'हाहाहाहा... कैसे भोले बन रहे हो देखो तो...बता दो बता दो...नहीं कहूँगी मम्मी से आई प्रॉमिस..' पहली बार लगाम मनिका के हाथ में आई थी (मतलब उसे तो ऐसा ही लग रहा था) सो वह और जोर से हँसते हुए बोली थी.
'हाँ तो...क्या हो गया देख लिया तो..' जयसिंह ने भी हौले से अपना जुर्म कबूल कर लिया था.
'हाहाहा...' मनिका ने अपनी बात के साबित हो जाने पर ठहाका लगाया, उसे आज कुछ ज्यादा ही हँसी आ रही थी. इसी तरह हँसी-मजाक चलता रहा और रात ढल आई. जयसिंह और मनिका डिनर करने को भी रेस्टॉरेंट में ही गए क्योंकि रूम-सर्विस के विपरीत वहाँ वेटर खाना परोसने के लिए पास में तत्पर रहता है. लेकिन जयसिंह के लंड ने उस रात उन्हें ढंग से खाना भी नहीं खाने दिया.
हुआ ये कि जब जयसिंह और मनिका नीचे रेस्टॉरेंट में जाने के लिए कमरे से निकलने लगे थे तब मनिका ने अपने सूटकेस से लिप-ग्लॉस निकाल कर अपने होंठों पर लगाया था. यह देखना था कि बस जयसिंह का तो काम तमाम हो गया था, बड़ी मुश्किल से एलीवेटर से निकल कर वे रेस्टॉरेंट में कुर्सी तक पहुँचे थे. सामने बैठी मनिका उनसे हँस-मुस्कुरा कर बातें कर रही थी और वे उसके होंठों पर लगे अपने लंड के पानी मिले लिप-ग्लॉस की चमक देख-देख प्रताड़ित हो रहे थे. उन्हें लग रहा था जैसे उनका शरीर दीमाग की बजाय लंड के कंट्रोल में आ गया था और उनके पूरे जिस्म में हवस के मरोड़े उठ रहे थे. वे थोड़ा सा ही खाना खा सके थे और पूरा समय टेबल के नीचे अपने लेफ्ट हाथ से लंड को जकड़े हुए बैठे रहे थे.
उनकी कारस्तानी से अनजान मनिका ने खाना खाने के बाद मंगवाई आइसक्रीम खा कर जब अपने होंठों पर जीभ फिराई तो जयसिंह को हार्ट-अटैक आते-आते बचा था. इस बार वे अपने चेहरे के भावों पर काबू नहीं रख सके थे और मनिका को उनकी बेचैनी का आभास हो गया था.
'क्या बात है पापा?' मनिका के चेहरे पर चिंता झलक आई 'आप ठीक तो हैं?' उसने पूछा.
'ह्म्म्म...कुछ नहीं बस थोड़ा सिर में दर्द है. ' जयसिंह को समझ नहीं आया कि क्या कहें सो उनके जो मुहँ में आया वही बोल गए थे 'साली क्या बताऊँ तू जो मेरे लंड का रस चाट रही है जीभ फिरा-फिरा कर और पूछ रही है क्या हुआ...उससे सिर में नहीं लंड में दर्द है...' जयसिंह ने आँखें मींचते हुए सोचा था.
डिनर के बाद जब वे अपने कमरे में आए तो मनिका ने जयसिंह को जल्दी सो जाने को कहा और उनका सिर दबाने को भी पूछा था. लेकिन इतने दिन की उत्तेजना ने आज भयंकर रूप धारण कर लिया था और जयसिंह को डर था कि मनिका का स्पर्श कहीं उन्हें अपना आपा खोने पर मजबूर न कर दे, सो उन्होंने उसे मना कर दिया था. वे कंबल ओढ़ लेट गए थे ताकि अंदर अपने उफनते लंड को पकड़ कर काबू में रख सकें, उनके रोम-रोम में मनिका ने आग लगा दी थी और उन्होंने सुलगते हुए सोचा था 'इस हरामजादी मनिका को तो तरसा-तरसा कर इससे भीख मंगवाऊंगा मेरे लंड की एक दिन...'


***

मनिका ने देखा कि जयसिंह कपड़े बदले बिना ही सो गए थे. मनिका के पास भी करने को कोई काम न था सो वह भी नहाकर आई और सोने की तैयारी करने लगी. उसके बिस्तर में घुसने से पहले ही रूम का डोर क्नॉक हुआ, लॉन्ड्री वाला उनके कपड़े ले कर आया था. मनिका ने कपड़े रखवा कर उसे कुछ टिप (जयसिंह के पर्स से निकाल) दी थी और वह चला गया. मनिका भी जयसिंह के बगल में लेट गई और सोने की कोशिश करने लगी लेकिन वह दिन में भी एक बार नींद ले चुकी थी इसलिए उसे अभी इतनी जल्दी नींद नहीं आ रही थी पर उसने जयसिंह का ख्याल करके उन्हें कह दिया था कि उसे भी रेस्ट करना था.
वह लेटी-लेटी उस दिन की घटनाओं के बारे में सोचने लगी, कि कैसे दिन की शुरुआत में उसे उसके अंडर-गारमेंट्स शावर में पड़े मिले थे और जयसिंह ने उसका कितना मजाक बनाया था उस बात पर और फिर जब वह सैलून से वापस आई थी तब भी उसके पापा ने कितना स्वीटली रियेक्ट किया था, उसे एहसास हुआ था कि जयसिंह भले ही मजाक कर रहे थे पर उसमें उनकी तारीफ भी छुपी हुई थी और इसीलिए मनिका को लाज आने लगी थी और वह मेकअप उतार आई थी और आज एक बार फिर से लोगों ने उसे जयसिंह की गर्लफ्रेंड समझ लिया था. 'कितना सरप्राइजड थीं वे लड़कियाँ जब मैंने कहा कि वे मेरे पापा हैं...लोग भी न पता नहीं क्या-क्या सोचते रहते हैं.' मनिका ने थोड़ा तुनक कर सोचा था पर फिर उसका ध्यान जयसिंह की फीसिकेलिटी (शारीरिक बनावट) पर चला गया था. वह सोचने लगी कि ४७ साल की उम्र में भी जयसिंह उसके चाचा और ताऊजी की तरह मोटे व बेडौल नहीं थे और उन्होंने अपनी बॉडी को फिट रखा हुआ था 'मे-बी इसी वजह से उन लोगों ने पापा और मुझे कपल इमेजिन कर लिया था...पापा हैस मेंटेंड हिज़ बॉडी सो वैल के कोई सोचता ही नहीं कि वो मेरे पापा हैं.'
मनिका ने जयसिंह की तरफ देखा, कुछ ही पल पहले वे हिले थे और करवट बदल उसकी तरफ मुहँ किया था, उन्हें सोता पा मनिका धीरे से उठ कर अधलेटी हुई व अपने हाथ पीछे से टी-शर्ट में डाल अपनी ब्रा का हुक खोला और वापिस लेट गई.
इतने दिनों से मनिका और जयसिंह रोज बाहर घूम कर आते थे तो थके हुए होते थे और रूम में आ कर उन्हें जल्दी ही नींद आ जाया करती थी (जयसिंह को कभी-कभी नहीं भी आती थी) और उनकी अनबन हो जाने के बाद वे अपने ख्यालों में डूबे ही बैठे या सोए रहा करते थे. लेकिन उनके बीच के गिले-शिकवे मिट चुकने और आज का अपना पूरा दिन हॉटेल में ही रहने के बाद मनिका अच्छे से रेस्टेड थी. सो जब मनिका, जिसे रात को सोते वक़्त ब्रा पहनने की आदत नहीं थी, को कुछ देर तक नींद नहीं आई थी तो उसे अपनी पहनी ब्रा का कसाव खटकने लगा था और इसी वजह से उसने जयसिंह को सोते पा अपनी ब्रा का हुक खोल लिया था.
आग में घी डालना किसे कहते हैं जयसिंह को आज समझ आया था.
खाना खा कर लौटने के बाद जयसिंह मनिका के कहने पर लेट कर रेस्ट करने लगे थे, उन्हें पता था कि अगर वे रोजमर्रा की तरह नहाने घुसे तो शायद अपनी हवस की आँधी को रोक नहीं पाएंगे और मुठ मार बैठेंगे. अपने लिए हुए इस अजीबोगरीब वचन को निभाने के मारे वे बिस्तर पर जा लेटे थे. साथ ही वे इस ताक में भी थे कि क्या पता उनके सो जाने पर मनिका को भी जल्दी नींद आ जाए और वे कुछ छेड़-छाड़ कर अपनी प्यास कुछ शाँत करने में सफल हो सकें और इसी के चलते मनिका के बिस्तर में आ जाने के बाद उन्होंने करवट बदली थी. पर मनिका ने तो उनके मन की आँधी को भूचाल में तब्दील कर दिया था.
जब मनिका ने अपनी ब्रा का हुक खोला था तो उसकी टी-शर्ट पीछे से ऊपर हो गई थी और कमरे की हल्की रौशनी में उसकी नंगी कमर और पीठ का दूधिया रंग जयसिंह ने एक छोटे से पल के लिए अध्-मिंची आँखों से देखा था.
'उह्ह्ह...उम्म्म...' आखिर जयसिंह के मुहँ से दबी हुई आह निकल ही गई थी, शुक्र इस बात का था कि उसके वापस लेट जाने तक वे किसी तरह रुके रहे थे. मनिका ने चौंक कर उनकी तरफ देखा, उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं थी.
'पापा?' मनिका उठ बैठी थी और एक पल के लिए उसका हाथ जल्दी से उसकी पीठ पर चला गया था. 'पापा उठे हुए हैं..?' उसने धड़कते दिल से सोचा. पर जयसिंह पहले की भाँती जड़ पड़े रहे.
'पापा आप जाग रहे हो क्या?' मनिका ने फिर से पूछा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला परंतु इस बार जयसिंह ने फिर से एक आह भरी थी जैसे बहुत अनकम्फ़र्टेबल हों. मनिका ने अब बेड-साईड से लाइट ऑन की और उन्हें ध्यान से देखा. उनके चेहरे पर पसीना आ रखा था.
'पापा! आर यू ऑलराइट?' मनिका ने थोड़ा घबराकर उन्हें हिलाया और उठाने लगी. जयसिंह ने भी एक-दो पल बाद हड़बड़ाने का नाटक कर आँखें खोल दीं और गहरी साँसें भरने लगे.
'पापा यू आर सिक!' मनिका ने उनके तपते माथे पर हाथ रखते हुए कहा. वह उनके ऊपर झुकी हुई थी और उसकी खुली ब्रा में झूलते उरोज जयसिंह के चेहरे के सामने थे.
'हम्म्प्...' उनका पारा और बढ़ गया था.
जयसिंह उठ कर बैठ गए थे, आशँकाओ से भरी मनिका बार-बार उनसे पूछ रही थी कि वे कैसा फील कर रहे हैं और जयसिंह कम्बल के अंदर अपने लंड का गला दबाते हुए उसे आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे थे कि वे ठीक हैं बस उन्हें माइनर सा माइग्रेन (तेज़ सिरदर्द) का अटैक आया था. उन्होंने कहा कि वे नहा कर आते हैं ताकि थोड़ा रिफ्रेश हो जाएं.
'साला अब तो रेसोल्युशन गया भाड़ में...लगता है मुठ मारना ही पड़ेगा वरना आज तो लंड और आँड दोनों की एक्सपायरी डेट आ जाएगी.' सोच कर जयसिंह ने कम्बल के अंदर अपने लंड का मुहँ ऊपर की तरफ कर उसे अपने अंडरवियर के एलास्टिक में कैद किया ताकि उठ खड़े होने पर उनकी पैंट में कहीं तम्बू न बना हो. जब वे उठे थे तब लंड का मुहाना अंडरवियर से दो इंच बाहर निकल झाँक रहा था पर उनकी शर्ट से ढँका होने के कारण मनिका को दिखाई नहीं पड़ सकता था. वे भारी क़दमों से चलते हुए बाथरूम में घुस गए.
बेड पर बैठी मनिका के चेहरे पर चिंता के भाव थे, उसने हाथ पीछे ले जा कर अपनी ब्रा का हुक फिर से लगाया और जयसिंह के बाहर आने का इंतजार करने लगी.
बाथरूम में जा कर जयसिंह ने बाथटब में ठंडा पानी भरा और उसमें अपना बदन डुबो कर लेट गए. अंदर आते-आते एक बार फिर वे अपनी प्रतिज्ञा के प्रति थोड़ा सीरियस हो गए थे. ठंडे पानी से भरे टब में डूबे वे अपने लंड और टट्टों को रगड़ रहे थे ताकि अपनी गर्मी कुछ शांत कर सकें, 'ये अचानक मुझे क्या हो गया है...बिल्कुल भी काबू नहीं कर पा रहा हूँ अपने-आप को...कुतिया की जवानी ने आखिर मेरे दीमाग का फ्यूज उड़ा ही दिया है लगता है...क्या होंठ है रांड के, मेरे लंड-रस का स्वाद तो आया ही होगा उसे....आह्ह...' जयसिंह का लंड उनके हाथ की कैद से बाहर निकलने को फड़फड़ा उठा था. 'भड़वी ने ब्रा का हुक और खोल लिया ऊपर से...क्या झूल रहे थे साली के बोबे...ओहोहो...मसल-मसल कर लाल कर दूँगा...' इसी तरह के गंदे-गंदे विचारों से अपनी बेटी का बलात्कार करते वे आधे घंटे तक पानी में पड़े रहे थे. पर फिर धीरे-धीरे ठंडे पानी का असर होने लगा था, उनके बदन की गर्मी रिलीज़ होने लगी और बदन सुन्न होने लगा. लंड और आँड भी अब शांत पड़ने लगे थे जिससे जयसिंह के दीमाग ने एक बार फिर काम करना शुरू कर दिया था.
'अगर ये हाल रहा तो फिर तो मनिका की झाँट भी हाथ नहीं लगेगी...मुझे अपने बस में रहना ही होगा! लेकिन साली हर वक्त जिस्म की नुमाईश करती रहेगी तो दीमाग तो ख़राब होगा ही...पर उसकी लिप-ग्लॉस तो मैंने ही ख़राब की थी...हाँ तो मुझे क्या पता था ऐसे सामने बैठ कर होंठ चाटेगी रांड..? जो भी हो आज इतना समझ आ गया है कि लंड के आगे दीमाग की एक नहीं चलती है...हाहाहाहा...' जयसिंह मन ही मन हँसे थे. अब वे राहत महसूस करने लगे थे. उनका इरेक्शन भी अब मामूली सा रह गया था. उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि जल्द ही उन्हें कोई अहम कदम उठाना होगा, मनिका के इंटरव्यू को सिर्फ दो दिन बचे थे और अब वे अपनी मंज़िल से भटकने का खतरा मोल नहीं ले सकते थे, यह विचार आते ही उनके लंड का रहा-सहा विरोध भी खत्म हो गया था. जयसिंह ने कामना की के उनकी किस्मत, जिसने अब तक उनका साथ इतना अच्छे से निभाया था, शायद आगे का रास्ता भी दिखा दे और इस तरह एक नए जोश के साथ वे बाथटब से बाहर निकल आए और तौलिए से बदन पोंछ कर अपना पायजामा-कुरता पहन लिया.
जब वे बाहर निकल कर आए तो मनिका बेड से उतरकर उनके पास आई और उनकी ख़ैरियत जाननी चाही. जयसिंह ने मुस्कुरा कर कहा,
'डोंट वरी मनिका...अब सब ठीक है...' और उसका हाथ पकड़ उसे वापस बिस्तर में ले गए थे.

***

बीती रात के बाद जयसिंह को एक बात का भान अच्छी तरह से हो गया था, वो यह कि मनिका का हुस्न भी उनकी मँजिल पर लगा एक ऐसा गुलाब था जिसमे काँटे ही काँटे थे क्यूँकि उसके हुस्न में उनके लिंग को बेबस करने वाला जादू था और उनके लिंग में उनके दीमाग को बेबस करने की शक्ति. अगर उन्हें फूल तोड़ना है तो काँटों से बचते रहना होगा और उसके लिए एक बार गुलाब से नज़र हटानी जरूरी थी.
सवेरे उठ कर जयसिंह ने आत्मचिंतन किया था और पाया कि उन्हें अभी के लिए अपनी काम-वासना को न जागने देते हुए मनिका के मन में काम-क्रीड़ा के प्रति उत्सुकता के बीज बोने पर ध्यान देना होगा. परन्तु वे नहीं जानते थे कि इस बार जयसिंह का साथ उनकी किस्मत नहीं बल्कि उनकी बीवी और मनिका की माँ संचिता देने वाली थी.
दरअसल जब से वे दोनों दिल्ली आए थे मनिका की अपनी माँ से एक बार भी बात नहीं हुई थी. जब भी घर से कॉल आता था जयसिंह के पास ही आता था और वे सब ठीक बता कर फोन रख दिया करते थे. उस दिन उठने के बाद जब जयसिंह और मनिका ने ब्रेकफास्ट कर लिया उसके बाद जयसिंह नहाने चले गए थे.
मनिका बैठी यूँही अखबार के पन्ने पलट रही थी तभी पास पड़े जयसिंह के फोन पर रिंग आने लगी, उसकी माँ का फोन था.
'हैल्लो?' मनिका ने फोन उठाया. उसे अपनी माँ से हुई अपनी आखिरी बातें याद आन पड़ी थी.
'हैल्लो लवली?' उसकी माँ ने पूछा 'कैसे चल रहे हैं इंटरव्यू?' संचिता को उन्होंने झूठ जो कह रखा था कि इंटरव्यू तीन स्टेज में होंगे.
'इंटरव्यू..? ओह हाँ अच्छे हुए मम्मी...परसों लास्ट राउंड है.' मनिका एक पल के लिए समझी नहीं थी पर फिर उसे भी याद आया कि उन्होंने घर पर क्या बोल रखा था, उसने माथे पर हाथ रख सोचा, 'बाप रे अभी पोल खोल देती मैं पापा के इतना समझाने के बाद भी...'
'पापा कहाँ है तुम्हारे?' संचिता ने पूछा.
'नहाने गए है...' मनिका ने बता दिया.
'इतनी लेट..?' संचिता ने एक और सवाल किया.
'ओहो मम्मी...अब यहाँ रूम पर ही रहते हैं तो आराम से उठना-नहाना होता रहता है...' मनिका ने संचिता के सवालों से झुँझला कर कहा. उसे बुरा इस बात से भी लगा था कि उसकी माँ ने एक बार भी उससे उसकी खैरियत नहीं पूछी थी.
जब जयसिंह नहा कर बाहर आए थे तब तक उन्हें आभास हो चुका था क़ि कमरे में मनिका किसी से ऊँची आवाज़ में बाते कर रही थी लेकिन शावर के पानी की आवाज़ में उन्हें उसके कहे बोल साफ़ सुनाई नहीं दिए थे और जब तक उन्होंने शावर ऑफ किया था मनिका की आवाज़ आनी बंद हो चुकी थी. बाहर निकल कर मनिका के तेवर देख उन्होंने पूछा,
'क्या हुआ मनिका? किस से बात कर रहीं थी?'
'आपकी बीवी से और किस से...?' मनिका ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा.
मनिका के अपनी माँ को थोड़ी तल्खी से जवाब देने के बाद उसकी माँ भी छिड़ गईं थी. संचिता ने फिर से वही पुराना राग आलापना शुरू कर दिया था कि कैसे वह हाथ से निकलती ही जा रही है और कितनी बद्तमीज़ भी हो गई है इत्यादि. मनिका के भी दिल्ली आ कर कुछ पर निकल चुके थे वह भी अब वो मनिका नहीं रही थी जो चुपचाप सुन लेती थी.. उसने भी अपनी माँ के सामने बोलना शुरू कर दिया कि कैसे वे हमेशां उस पर लगती रहती हैं जबकि उसकी कोई गलती ही नहीं होती, जिस पर संचिता ने हमेशा की तरह उसके पापा पर उसे शह देने का आरोप मढ़ा था. जयसिंह की बात आने पर मनिका अब उनका भी पक्ष लेने लगी और आखिर गुस्से में आ फोन ही डिसकनेक्ट कर दिया था, उसने फोन रखने से पहले अपनी माँ से कहा था,
'आपसे तो सौ गुना अच्छे हैं पापा...मेरा इतना ख्याल रखते हैं...बेचारे पता नहीं इतने साल से उन्होंने आपको कैसे झेला है..?' (संचिता उसके मुहँ से ऐसी बात सुन स्तब्द्ध रह गई थी)
जयसिंह के बाहर आ जाने के बाद मनिका ने शिकायत पर शिकायत करते हुए उन्हें बताना चालू किया कि कैसे उसको मम्मी ने फिर से डाँट दिया था, 'और बस एक बार जब वो शुरू हो जातीं है तो फिर पूरी दुनियां की कमियाँ मुझ में ही नज़र आने लगती है उनको...लवली ऐसी लवली वैसी...ढंग से बाहर निकलो, ढंग से कपड़े पहनो, ढंग से ये करना ढंग से वो करना...और जब कुछ नहीं बचता तो फिर आप का नाम लेकर ताने...पापा की शह है तुम्हें...पापा बिगाड़ रहे हैं तुम्हें...हद होती है मतलब...!' मनिका का गुस्सा उसकी माँ की कही बातों को याद कर बार-बार फूट रहा था.
'मैं तो मर जाऊं तो ही चैन आएगा उनको...' मनिका रुआँसी हो बोली.
जयसिंह उसके पास गए और उसके कंधे पर हाथ रख उसे ढाँढस बँधाते हुए बोले,
'तुम दोनों का भी हर बार का यही झगड़ा है...फिर भी हर बार तुम अपसेट हो जाती हो, कितनी बार कहा है बोलने दिया करो उसे...'
'हाँ पापा...बट मुझे बुरा नहीं लगता क्या...आप ही बताओ?' मनिका ने उनका सपोर्ट पा कर कहा 'मैंने भी कह दिया आज तो कि आपसे तो पापा अच्छे हैं और वो पता नहीं कैसे झेलते हैं आपको..' और उन्हें बताया.
'हैं..?' जयसिंह की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं थी 'सचमुच ऐसा बोल दिया तुमने अपनी माँ से..?' उन्होंने पूछा.
'हाँ...' मनिका को भी अब लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गई थी.
'हाहाहा...संचिता की तो धज्जियाँ उड़ा दीं तुमने...' जयसिंह हँसते हुए बोले.
'और क्या तो पापा मुझे गुस्सा आ गया था तेज़ वाला..' मनिका ने धीरे से कहा 'पर ज्यादा ही बोल दिया कुछ...' और अपनी गलती स्वीकारी.
'हेहे...अरे तुम चिंता मत करो मैं सँभाल लूँगा उसे...' जयसिंह ने प्यार से मनिका का गाल खींच दिया था. मनिका भी अपनी मुस्कान रोक न सकी.
'ओह पापा काश मम्मी भी आप के जैसी ही कूल और प्यार करने वाली होती...' मनिका ने आह भर कहा.
'अब होतीं तो बात अलग थी मगर अब तो तुम्हें जो है उसी से काम चलाना पड़ेगा...' जयसिंह ने मुस्का कर खुद की तरफ इशारा किया था. 'मम्मी भी मेरी तरह हो सकती थी अगर उसके लंड होता तो..हहा' जयसिंह ने मन में सोचा था और उनकी मुस्कान और बड़ी हो गई थी.
कुछ देर समझाने-बुझाने पर मनिका का मूड कुछ ठीक हो गया था. जयसिंह ने उसके सामने ही अपनी बीवी को फोन लगा कर उससे हर वक़्त टोका-टोकी न करने की अपनी हिदायत दोहरा दी थी. जिस से वह थोड़ी और बहल गई थी.
वे बैठ कर उस दिन के लिए कुछ प्लान करते उससे पहले ही जयसिंह के फ़ोन पर फिर से रिंग आने लगी. इस बार जयसिंह ने ही फोन उठाया, उनके ऑफिस से कॉल आया था. इतने दिन ऑफिस से नदारद रहने की वजह से उनके वहाँ अब काम अटकने लगा था. सो जयसिंह फोन पर अपने काम से जुड़ी अपडेटस् लेने में लग गए थे.
जब मनिका ने देखा कि जयसिंह लम्बी बातचीत करेंगे तो वह इधर-उधर पड़ा उनका छोटा-मोटा सामान व्यवस्थित करने लगी. फिर उसने बेड के पास रखा अपना सूटकेस खोला और लॉन्ड्री से वापस आए अपने कपड़े जँचाने लगी.
जयसिंह और मनिका ने अपना लगेज बेड की एक तरफ बनी एक अलमारी के पास नीचे रखा हुआ था. पहले तो वे सिर्फ दो ही दिन रुकने के इरादे से आए थे, सो उन्होंने अपना सामान ज्यादा खोला नहीं था. फिर जब उनका रुकने का पक्का हो गया तो मनिका को लगा था कि शायद उसके पिता अपना सामान उसमें रखें और जयसिंह, जिनके पास ज्यादा सामान नहीं था, ने मनिका उसे यूज़ कर लेगी (और वे उसका सामान छेड़ लेंगे) करके अलमारी खाली छोड़ दी थी. मनिका ने अपना सामान सेट् करने के बाद भी जब पाया कि जयसिंह फोन पर ही लगे हुए थे तो उसने वैसे ही देखने के लिए अलमारी खोल ली थी.





FUN-MAZA-MASTI गुमराह पिता की हमराह बेटी--6

FUN-MAZA-MASTI

 गुमराह पिता की हमराह बेटी--6

अगली सुबह जब मनिका उठी तो सब कुछ उसे बहुत अच्छा-अच्छा लग रहा था. आँख खुलने के कुछ पल बाद पास लेटे जयसिंह को देख उसे रात की बातें याद आईं और वह अपने पापा से फिर से दोस्ती हो जाने का ख्याल करते ही ख़ुशी से चहकी,
'पापा! आप अभी तक सो रहे हो? देखो आज मैं आपसे पहले उठ गई...'
'उन्ह्ह हम्म...' उनींदे से जयसिंह ने आँखें खोलीं, दो दिन से काउच पर आराम से न सो पाने की वजह से आज उन्हें काफी गहरी नींद आई थी.
'उठो ना पापा...क्या आलस बिखरा रहे हो...' मनिका ने उन्हें हिला कर कहा.
मनिका जयसिंह को उठा कर ही मानी थी, वे दोनों बाथरूम जा कर आ चुके थे और ब्रेकफ़ास्ट ऑर्डर कर दिया था. जयसिंह एक बार फिर अखबार में स्टॉक-मार्केट की ख़बरें देख रहे थे. मनिका भी उनके पास ही बैठी रुक-रुक कर उनसे बातें करते हुए एक मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी जब रूम-सर्विस आ गई. मनिका ने जा कर गेट खोला,
'गुड मॉर्निंग मैम.' उसके सामने वह पहले दिन वाला ही वेटर खड़ा था.
'म..म..मॉर्निंग' मनिका उसकी कुटिल मुस्कान भूली नहीं थी.
वेटर अंदर आ गया और उनका नाश्ता टेबल पर लगाने लगा. मनिका जयसिंह के पास बैठ गई थी पर अब उसकी नज़र फर्श पर टिकी थी. वेटर ने खाना लगा दिया और एक मंद सी मुस्कुराहट लिए खड़ा रहा, जयसिंह ने उसे टिप देते हुए फारिग कर दिया. उसने अदब से झुक कर जयसिंह से कहा था,
'थैंक्यू सर.' और फिर मनिका से मुख़ातिब हो बोला 'थैंक्यू मैम...' मनिका की नज़र उससे मिली थी, वेटर के चेहरे पर फिर वही मुस्कान थी.
वेटर के चले जाने के बाद मनिका ने जयसिंह से कहा,
'आई डोंट लाइक हिम.'
'क्या? हू?' जयसिंह ने अखबार से नजर उठा कर पूछा.
'अरे यही जो अभी गया है...वो वेटर...' मनिका ने बताया.
'हैं? क्यूँ क्या बात हुई...?' जयसिंह ने अखबार साइड में रखते हुए पूछा.
'ऐसे ही बस...अजीब सा आदमी है वो...' मनिका भी उन्हें क्या बताती.
'हाहाहा...पता नहीं क्या हो जाता है तुम्हें चलते-चलते, अब बताओ मैडम को वेटर भी पसंद का चाहिए.' जयसिंह हँस कर बोले.
'क्या है पापा डोंट मेक फन ऑफ़ मी. चलो ब्रेकफास्ट करते हैं.' मनिका ने मुहँ बनाते हुए कहा था.
जब जयसिंह और मनिका ने नाश्ता कर लिया था तो मनिका ने पूछा था कि आज वे क्या करने वाले हैं? जिस पर जयसिंह ने आज-आज रूम में ही रहकर रेस्ट करने की इच्छा जताई थी. मनिका भी मान गई और बोली कि वह नहाने जा रही है. जयसिंह ने उसे मुस्कुरा कर देखा भर था, उनके मन में ख़ुशी की लहर दौड़ गई थी.
जब मनिका नहा कर वापस निकली तो जयसिंह को काउच पर सुस्ताते पाया. दरअसल वे लेट कर नाटक कर रहे थे ताकि मनिका को नहा कर निकलते हुए देख सकें. मनिका ने बाहर आते ही उनकी और देखा था और उन्हें सोता समझ अपने सूटकेस के पास जा कर कपड़े रखने लगी.
'नहा ली मनिका?' जयसिंह ने थोड़ा सा सिर उठा उसकी तरफ देखते हुए कहा.
'हाँ पापा.' मनिका पीछे मुड़ बोली. जयसिंह ने पाया कि उसकी आवाज़ में पहले जैसी चहक नहीं थी.
कुछ देर बाद मनिका आ कर काउच के पास रखी सोफेनुमा कुर्सी पर बैठ गई. जयसिंह उसके चेहरे के भाव देख समझ गए कि वह कुछ कहना चाह रही है पर चुपचाप लेटे रहे और आँखें बंद कर फिर से सोने का नाटक करने लगे.
'आप नहीं ले रहे बाथ?' मनिका ने उनसे पूछा.
'म्मम्म...अभी थोड़ी देर में जाता हूँ... आज तो रूम पर ही हैं ना हम...' जयसिंह ने झूठा आलस दिखाया.
'पापा?' मनिका अपना तकियाकलाम संबोधन इस्तेमाल कर बोली.
'हम्म्?' जयसिंह ने नाटक जारी रखते हुए थोड़ी सी आँख खोल उसे देखा.
'पापा कल रात को...रात को आप शावर से नहाए थे क्या?' मनिका ने पूछा, उसकी नज़रें जमीन पर टिकीं थी और चेहरे पर लालिमा झलक रही थी.
मनिका ख़ुशी-ख़ुशी नहाने घुसी थी पर जैसे ही उसने शावर का पर्दा हटाया था उसे वह नज़र आया जिसने पिछली रात जयसिंह को साँप सुंघा दिया था, उसकी ब्रा और पैंटी जो नल पर लटक रही थी. मनिका एक बार तो सकपका गई, 'ये यहाँ कैसे पहुँची..?' फिर उसे याद आया कि कल रात नहाने के बाद उसने उन्हें वहीँ छोड़ दिया था. वह उन्हें उठाने को हुई थी जब उसे याद आया कि जयसिंह ने रात को आकर बाथ लिया था 'ओह शिट...' और इसलिए उसने बाहर निकल कर जयसिंह से टोह लेते हुए पूछा था कि क्या वे शावर में गए थे.
जब मनिका ने उनसे कहा था कि वह नहाने जा रही है तो जयसिंह को शावर में पड़े उसके अंतवस्त्रो का ख्याल आ गया था और वे मन ही मन प्रसन्न हो उठे थे. रात को अचानक मनिका के माफ़ी मांग लेने से यह बात उनके दीमाग से निकल गई थी. अब उन्होंने बिना कोई भाव चेहरे पर लाए कहा,
'नहीं तो, बाथटब यूज़ किया था मैंने तो...क्यूँ क्या हुआ?'
'ओह...अच्छा. कुछ नहीं पापा ऐसे ही पूछ रही थी.' मनिका ने राहत भरी साँस खींची. 'पापा ने कुछ नहीं देखा थैंक गॉड..' उसने मन ही मन सोचा.
'ऐसे ही?' जयसिंह ने सवाल पर थोड़ा जोर दे पूछा.
'हाँ पापा.' मनिका ने दोहराया.
'अच्छा भई मत बताओ...' जयसिंह ने खड़े होते हुए कहा और मनिका की तरफ देखा 'मैं नहा कर आता हूँ चलो...'
'ओके पापा.' मनिका ने उनकी आधी बात का ही जवाब दिया.
जयसिंह खड़े हो जिस कुर्सी पर वह बैठी थी उसके पास से गुजरते हुए रुक गए और मनिका के कँधे पर हाथ रखा, 'मनिका?'
'हम्म...हाँ पापा...?' मनिका अब पहले सी चहक कर बोली.
जयसिंह ने अपने चेहरे पर एक शरारत भरी मुस्कान लाते हुए कहा 'कपड़े ही तो हैं...हैं ना?' और आगे बढ़ नहाने चले गए.
जयसिंह नहाने घुस गए, पर वे मनिका के मन में शरमो-हया के ज्वार उठा गए थे. उन्होंने पिछली रात की उसी की कही बात को इस तरह से कह दिया था कि मनिका न चाहकर भी मुस्का उठी थी 'हाआआआ...पापा ने देख लीं मेरी अंडरवियर..! हाय राम...' मनिका ने अपना चेहरा दोनों हाथों से छुपा कर सोचा 'और तो और कैसे बन रहे थे...मैंने तो बाथटब यूज़ किया था...झूठे ना हों तो...' मनिका शरम से कुर्सी में गड़ी जा रही थी 'कल तक तो मैंने इतना बखेड़ा खड़ा किया हुआ था और अब अपनी ही बेवकूफी से बेइज्जती हो गई है...क्या सोचा होगा पापा ने भी...कि कैसी बेशरम हूँ मैं... हाय फूटी किस्मत...'
थोड़ी देर बाद जयसिंह नहा कर निकल आए. मनिका, जो कुर्सी पर ही बैठी थी, ने उठते हुए कहा,
'पापा...आई एम् सो एमबैरेस्ड...'
जयसिंह ने उसकी तरफ झूठे असमंजस से देखा. इस पर मनिका ने आगे सफाई पेश की,
'मैं भूल गई थी...कल जल्दी में...' मनिका अटकते हुए इतना ही कह पाई.
अब जयसिंह ने सीरियस सा अंदाज इख़्तियार कर लिया और उसके पास आ गए 'मनिका तुम इतना क्या सोचने लगी? कल रात तो बड़ा बड़प्पन दिखा रहीं थी; कि कपड़े ही तो हैं, अब ये अचानक क्या हुआ?'
मनिका से कुछ पल कुछ कहते ना बना पर जयसिंह के उसे ताकते रहने पर उसने धीरे से कहा, 'हाँ आई क्नॉ पापा...पर शरम तो आती ही है ना...आपने भी क्या सोचा होगा...कि कैसी बेशरम हूँ मैं...'
'ओह गॉड मनिका ये तुम क्या बोले जा रही हो..? मैं ऐसा क्यूँ सोचूँगा भला?' जयसिंह अब अचरज जता रहे थे 'कल जब तुमने मुझे अपना सॉरी बोलने का रीज़न दिया था तब तक मैं अपने आप को ही गलत मान रहा था...पर जब तुमने कहा कि अंडरवियर भी कपड़े ही तो होते हैं तो मुझे भी तुम्हारी बात की सच्चाई का इल्म हुआ, एवरीवन हैस अंडरवियर इसमें क्या एमबैरेसमेंट?...लेकिन अब तुम खुद ही अपनी बात काट रही हो...इस मतलब से तो फिर मैं ही गलत था...' जयसिंह ने मनिका को भावनाओं और तर्क के जाल में फंसाते हुए आगे कहा था.
'नो पापा ऐसा नहीं है...आप सही कह रहे हो बट आप भी समझो ना...अपने पापा से शरम नहीं आएगी क्या? इसीलिए इट्स सो एमबैरेसिंग फॉर मी...' मनिका ने सकुचाते हुए दलील दी.
'ओके मनिका...आई मीन लवली...इट्स ओके...' जयसिंह ने अपना ब्रह्मास्त्र चलाया.
मनिका की आनाकानी पर ब्रेक लग गया था 'पापा ऐसे तो मत कहो...'
'तो कैसे कहूँ?' जयसिंह ने जरा रूखी आवाज़ में कहा.
'प्लीज मेरी बात समझो ना...प्लीज?' मनिका ने मिन्नत की.
जयसिंह समझ गए थे कि अब उनका सामना अपने प्लान के सबसे आखिरी और जटिल हिस्से से हो रहा था. मनिका भले ही उनके साथ कितनी भी फ्रैंक हो चुकी थी पर अभी भी उसके मन में सामाज के नियम-कायदों का एहसास मजबूत था और अगर उन्होंने जबरदस्ती उसे बदलने की कोशिश की तो उनको कुएँ के पास आकर भी प्यासा लौटना पड़ सकता है. सो उन्होंने अभी के लिए पीछे हटना ही उचित समझा,
'ओके मनिका आई अंडरस्टैंड...पर जो हो गया सो हो गया. मैंने उस बात को बिल्कुल माइंड नहीं किया और बस इतना चाहता हूँ कि तुम भी उस पर इतनी फ़िक्र ना करो...कैन यू डू थैट?'
'ओके पापा...' मनिका ने हौले से कहा.
'देन गिव मी अ स्माइल...ऐसे उदासी नहीं चलेगी...' जयसिंह ने मुस्काते हुए उसे उकसाया.
'हेहे..पापा. मैं कहाँ उदास हूँ...' कह मनिका हँस दी.
'गुड़ गर्ल.' जयसिंह ने उसे स्माइल देते देख कहा था और फिर अपने सूटकेस की तरफ चले गए थे.
'हाय...पापा तो लिटरली कुछ ज्यादा ही फ्रैंक हैं...इतना तो मैंने भी नहीं सोचा था. मैंने तो उन्हें मनाने के लिए कहा था बट उन्होंने तो मेरी बात का कुछ और ही मतलब निकाल लिया...अफ्टेरॉल वो हैं तो मेरे पापा ही, उन्हें नहीं तो मुझे तो लाज आएगी ही...बट पापा तो इतना कूल एक्ट कर रहें हैं और मजाक में ले रहे हैं...और यहाँ मैं शरम से मरी जा रही हूँ...क्यूँकि बात सिर्फ अंडरवियर की नहीं है, आई वियर थोंगस् (छोटी और सेक्सी पैंटी)...इसलिए और ज्यादा एमबैरेस हो रही हूँ...' जयसिंह को स्माइल दे कर भी मनिका अपनी दुविधा में फंसी बैठी थी.
'मनिका जरा रूम-सर्विस पर कॉल करके लॉन्ड्री वाले को बुलाना. मेरे सारे कपड़े धोने वाले हो रहे हैं.' जयसिंह की आवाज़ सुन मनिका का ध्यान टूटा.
जयसिंह और मनिका को दिल्ली आए आज बारह दिन हो चले थे और उनके साथ लाए कपड़े एक-दो बार पहन लेने और दिल्ली के प्रदूषण भरे वातावरण के कारण अब धुलाई योग्य हो गए थे. मनिका को भी अपनी कुछ पोशाकें धुलने देने का ख्याल आया था. सो उसने कुर्सी से उठ, अपने मन की उलझन को एक ओर कर, जयसिंह के कहे अनुसार लॉन्ड्री वाले को बुलाने के लिए कॉल किया.
थोड़ी देर में लॉन्ड्री से एक लड़का आया और उनके कपड़े अगली शाम तक ड्राई-क्लीन कर वापस देने का बोल ले गया. अब जयसिंह और मनिका को बाकी का दिन साथ ही बिताना था और अभी तो उनका ब्रेकफास्ट भी नहीं हुआ था. जयसिंह ने सजेस्ट किया क़ि वे नीचे रेस्टॉरेंट में जा कर नाश्ता करें और मनिका को लेकर नीचे चल दिए.
रेस्टॉरेंट में जा उन्होंने ऑर्डर किया और बैठे बतियाने लगे. जयसिंह ने मनिका को याद दिलाया क़ि उसके इंटरव्यू का दिन करीब आ चुका था और उसे थोड़ी तैयारी कर लेनी चाहिए जिस पर मनिका बुरा मानते हुए बोली थी क़ि वे उसकी इंटेलिजेंस की कोई कद्र ही नहीं करते और उसे सब आता है. दरअसल मनिका के ताऊ कॉलेज में प्रोफेसर थे और उन्होंने उसे बहुत अच्छे से तैयारी करवाई थी सो मनिका का ओवर-कॉन्फिडेंट होना लाजमी था.
खैर इस तरह बातें करते हुए अब उन्हें एहसास हुआ कि उनका वापस घर जाने का समय भी आने वाला था. मनिका और जयसिंह की पिछली रात ही फिर से बढ़ी आत्मीयता और सुबह कमरे में हुई बातचीत ने मनिका को इमोशनली थोड़ा सेंसिटिव कर दिया था और घर वापस जाने की बात आने पर उसने वहाँ बैठे-बैठे जयसिंह से अपने मन की कुछ बातें शेयर कर दी थी, कि कैसे उसे उनके इतने खुले विचारों पर अचरज होता है और उनका उसे एक बच्चे की तरह नहीं बल्कि एक समझदार एडल्ट की तरह ट्रीट करना कितना अच्छा लगता है. उसने उन्हें यह भी बताया कि कैसे उसने सोचा था कि काश घर वापस जाने के बाद भी उनके बीच का ये बॉन्ड न टूटे लेकिन वह ये भी समझती थी कि घर जा कर उनके बीच कुछ दूरी आ ही जाएगी क्यूँकि वहाँ का माहौल अलग था व वे अपनी-अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में लगें होंगे.
मन ही मन खुश होते जयसिंह ने सोचा था 'साली कुतिया इतनी भोली भी नहीं है जितना मैंने समझा था. बस इसपर यह दोस्ती का भूत इसी तरह चढ़ा रहे तो आखिरी बाजी भी जीती जा सकती है.' और फिर उसे आश्वाशन दिया था कि वे बिल्कुल नहीं बदलेंगे और उनके बीच का यह दोस्ती का रिश्ता नहीं टूटने देंगे बशर्ते कि वह भी उन पर भरोसा बनाए रखे.
इसपर मनिका ने बहुत खुश हो कर उन्हें आश्वस्त किया था कि वह भी यही चाहती थी. जयसिंह ने उसे एक और दफा अपनी मम्मी के सामने थोड़ा सोच-समझ कर रहने की हिदायत दी थी. उनका वही पुराना तर्क था कि उसकी माँ संचिता सोचती है कि उन्होंने अपने लाड़-प्यार से मनिका को बिगाड़ दिया था, जिसपर मनिका ने भी उनसे हाँ में हाँ मिलाई थी. उनके यूँ बातें करते-करते उनका खाना भी आ गया था.
जयसिंह ब्रेकफास्ट के बाद मनिका को लेकर कुछ देर हॉटेल के गार्डन में घूमने निकल गए थे. एक बार फिर मनिका अब उनकी बाहँ थामे चल रही थी. जब वे गार्डन में घूम कर वापस लौट रहे थे तो मनिका की नज़र एक तरफ लगे बोर्ड पर गई. जिसपर हॉटेल के विभिन्न हिस्सों और फैसिलिटीज़ के नाम और डायरेक्शन लिखे हुए थे. उनमें से एक नाम ने उसका ध्यान आकर्षित किया था 'ब्यूटी एंड स्पा'.
एक-दो दिन से नहाते वक़्त मनिका ने पाया था कि उसके बदन पर फिर से वैक्सिंग करने की जरुरत थी, उसके बदन पर हलके रोएँ आने लगे थे. मनिका ने जवानी की देहलीज पर कदम रखने के साथ ही अपने बदन के सौंदर्य का अच्छे से ख्याल रखना शुरू कर दिया था और इस मामले में उसने कभी भी लापरवाही नहीं बरती थी. घर पर तो उसके पास अपना वैक्सिंग किट था लेकिन यहाँ दिल्ली में अपने पिता के साथ सिर्फ दो दिन का कार्यक्रम बना कर आई होने की वजह से वो उसे लेकर नहीं आई थी. फिर जयसिंह के साथ रूम शेयर करते हुए वह वैसे भी उसका इस्तेमाल नहीं कर सकती थी. सो जब उसने वह साईन-बोर्ड देखा तो जयसिंह से बोली,
'पापा आज तो हम हॉटेल में ही हैं ना?'
'हाँ हैं तो...कहीं बाहर घूमने का मन है तुम्हारा?' जयसिंह ने पूछा.
'नहीं पापा...वो मैं इसलिए पूछ रही थी कि वहाँ पीछे -ब्यूटी एंड स्पा- का बोर्ड लगा था और मैं सोच रही थी कि हेयर-कट और फेशियल करा लूँ.' मनिका जयसिंह से वैक्सिंग का तो कैसे कहती सो उसने बाल कटवाने की बात कही थी, वैसे दोनों ही स्थितियों में कटने तो बाल ही थे.
'हाँ तो करा लो न...' जयसिंह ने कहा.
सो मनिका जयसिंह से उनका क्रेडिट-कार्ड ले उस सैलून में चल दी. जयसिंह, जो उसे गेट तक छोड़ने साथ आए थे, वहाँ से मुड़ कर अपने कमरे में चले गए और मनिका के वापस आने का इंतज़ार करने लगे. उधर मनिका ने सैलून के काउंटर पर जा वैक्सिंग, हेयर-कटिंग और ब्यूटी-फेशियल के लिए पूछा था, काउंटर मैनेज कर रही लड़की ने एक ब्यूटिशियन को बुला दिया था जो मनिका को अंदर ले गई थी.


***

जयसिंह कमरे में आ बेड पर लेट गए थे. मनिका ने उनसे कहा था कि उसे आने में थोड़ा वक़्त लग जाएगा सो उन्होंने सोचा कि वे थोड़ी देर सुस्ता लेंगे. वैसे भी टी.वी. देखने का उनका मन नहीं था और अब तो बस उनको मनिका को लेकर ख्याली पुलाव पकाने में ही मजा आता था. सो वे बिस्तर पर लेट मनिका की कही बातों और अपने आगे के क़दमों के बारे में सोच रहे थे. यह सब सोचते-सोचते वे उत्तेजित होने लगे और उनका लंड खड़ा हो गया. उन्होंने उसे हौले से दबा कर करवट बदली, सामने बेड के पास नीचे मनिका का सूटकेस पड़ा था. जयसिंह बेड से उठ खड़े हुए.
वे उठ कर मनिका के सूटकेस के पास पहुँचे और उसे उठा कर बेड पर रख खोल लिया. सूटकेस में नंबर-लॉक सिस्टम था और मनिका ने उसे लॉक नहीं कर रखा था. जयसिंह के दिल की धड़कने बढ़ गईं थी. सूटकेस खोलते ही उन्हें मनिका के कपड़ों में से उसके परफ्यूम और तन से आने वाली भीनी खुशबू का एहसास हुआ था. वे सूटकेस में उसके कपड़े टटोलने लगे, लेकिन जो वे ढूँढ़ रहे थे वो उन्हें नहीं मिला. वे थोड़े असमंजस में पड़ गए, आखिर उन्हें होना तो यहीं चाहिए था. अब उन्होंने जरा ध्यान से सूटकेस में रखी चीज़ें चेक करना शुरू की, उसमें मनिका के कुछ कपड़े थे जो उन्होंने उसे अभी तक पहने नहीं देखा था, बाकी तो आज उसने उनके साथ ही लॉन्ड्री में दिए ही थे. एक दो डिब्बों में झुमके-रिबन-बालों की क्लिप-बैंड इत्यादि सामान था. एक छोटा मेकअप किट भी उनके हाथ लगा. फिर उन्होंने सूटकेस के ऊपर वाले पार्टीशन में देखना शुरू किया. वहाँ भी मनिका के कुछ कपड़े और एक कपड़े व नायलॉन से बना किट रखा था. जयसिंह ने पाया कि उसने पहली रात जो शॉर्ट्स और गन्जी पहनी थी वे वहाँ रखे हुए थे. पहली रात के मनिका के हुस्न के दीदार की याद आते ही उनका कुछ शांत होता लंड फिर से उछल पड़ा था. अब उन्होंने वह किट बाहर निकाला, उसके साइड में ज़िप लगी हुई थी और वह एक बक्से की तरह खुलता था. जयसिंह ने उसे खोला और उन्हें अपने मन की मुराद मिल गई, उसमें मनिका के अंतवस्त्र थे. उस किट के अंदर लगे एक लेबल से जयसिंह को पता चला कि वह एक लॉनजुरे कैरिंग-केस था. जिसमे ब्रा रखने के लिए अलग से स्तननुमा जगह बनी हुई थी ताकि उनके कप मुड़े ना, और साइड में छोटी-छोटी पॉकेट्स थीं जिनमें मनिका ने बड़े करीने से अपनी पैंटीज़ समेट कर डाल रखीं थी 'कैसी-कैसी चीज़ें है इस रंडी के पास देखो जरा...ब्रा और कच्छियों के लिए भी अलग से केस...वाह'.
अपनी जवान बेटी के अंतवस्त्र हाथ में लेने का मौक़ा जयसिंह एक बार गँवा चुके थे लेकिन इस बार उन्होंने एक पल भी सोचे बिना मनिका की ब्रा-पैंटीयों को निकाल-निकाल कर देखना शुरू किया. कुल मिलाकर उसमे तीन जोड़ी रंग-बिरंगी ब्रा-पैंटीयाँ थीं (ब्रा: पर्पल, गुलाबी और सफ़ेद, पैंटी: पर्पल, हरी और स्काई-ब्लू). मनिका के ये सभी अंतवस्त्र बेहद छोटे-छोटे थे. जयसिंह मनिका की छोटी सी और कोमल पर्पल पैंटी को अपने हाथ में लेकर देख रहे थे. उसकी तीनों ही पैंटी थोंग स्टाइल की थीं 'और एक गुलाबी वाली जो चिनाल ने पहन रखी होगी' उन्होंने सोचा था. जयसिंह की पैंट में अब तक उनका लंड उनके अंडरवियर में छेद करने पर उतारू हो चुका था. जयसिंह रह नहीं सके और मनिका की पैंटी अपने नाक के पास ले जा कर उसकी गंध ली थी. पैंटी धुली हुई थी लेकिन फिर भी उसमें से एक हल्की मादा गंध आ रही थी 'आह्ह्ह...' एक जोरदार आह भर जयसिंह ने अपनी पैंट की ज़िप खोल अंडरवियर के अँधेरे से अपने लंड को आज़ाद किया. लंड उछल कर बाहर आ उनके हाथ से टकराया था और 'थप्प..' की आवाज़ आई थी. जयसिंह ने नीचे देखा और अपने काले घनघोर लंड पर अपनी बेटी की छोटी सी पैंटी लपेट बेड पर पीछे की ओर गिर पड़े.
जयसिंह बेसुध से हो गए थे. पैंटी का कोमल कपड़ा उनके खड़े लंड को गुदगुदा कर और उत्तेजित कर रहा था और उनका लंड फ़ुफ़कारें मार-मार हिल रहा था, उनके दोनों अंड-कोषों ने भी अपने अंदर भरी आग को बाहर निकालने की कोशिशें तेज़ कर दीं थी और दर्द से बिलबिला रहे थे. लेकिन आनंद की चरम् सीमा पर पहुँचने से पहले ही जयसिंह को अपनी भीष्म-प्रतिज्ञा याद आ गई थी, कि वे मुठ नहीं मारेंगे, और उन्होंने किसी तरह अपने आप को संभाल लंड पर से हाथ हटा लिया.
कुछ देर हाँफते हुए पड़े रहने के बाद जयसिंह ने मनिका की पैंटी अपने लंड से उतारी और उसके सभी अंतवस्त्रों के साथ वापस पहले जैसे ही जँचा कर रख दीं. अब उनकी नज़र किट में ही रखे एक काले लिफाफे पर गईं. कौतुहलवश उन्होने उसे भी खोला, उसमें लड़कियोँ द्वारा पीरियड्स में लगाए जानेवाले पैड्स थे और दो कॉटन की नॉर्मल अंडरवियर भी रखी थी जिनका इस्तेमाल भी वे समझ गए 'साली की उन छोटी-छोटी पैंटीज़ में तो पैड टिकते नहीं होंगे...हम्म तो पीरियड्स का सामान अभी तक पैक पड़ा है...पर आज बारह दिन हमें यहाँ आए हो चुके हैं मतलब वक्त करीब है.' जयसिंह जानते थे कि पीरियड्स के वक्त लड़कियों के मन की स्थिति थोड़ी बदल जाती हैं और वे इमोशनल जल्दी हों जाने की प्रवृति में आ जातीं है. जयसिंह के खड़े लंड के मुहाने पर गीलापन आने लगा था.
मनिका के पास कमरे में घुसने के लिए दूसरा की-कार्ड था और उन्हें आए हुए थोड़ी देर हो चुकी थी. उसके लौट कर आने का अंदेशा होने पर उन्होंने धीरे-धीरे सारा सामान वापिस रखना शुरू किया. सामान रख जब वे सूटकेस बंद करने लगे थे तो उनकी नज़र एक बार फिर मनिका के मेकअप किट पर पड़ी. किट तो बंद था परन्तु उसके पास ही मनिका का लिप-ग्लॉस, जो वह रोज लगाया करती थी, बाहर ही रखा था. जयसिंह ने उसे उठाया और ढक्कन खोल उसकी खुशबू ले कर देखा, बिल्कुल वही खुशबू थी जो उन्होंने मनिका के होंठों से आते हुए महसूस की थी. जयसिंह ने अपने लंड के मुहाने पर आए पानी को अपने हाथ के अंगूठे पर लगाया और मनिका के लिप-ग्लॉस के ऊपर-ऊपर फैला कर ढक्कन लगा दिया. लिप-ग्लॉस और प्री-क्म दोनों में ही चिकनापन होने की वजह से किसी को भी देखने पर कोई अंतर पता नहीं लग सकता था. उन्होंने जल्दी से सूटकेस बन्द कर जस का तस रखा और फिर से बेड पर पीठ के बल गिर पड़े, अपनी उस हरकत ने उन्हें उत्तेजना से निढ़ाल कर दिया था.
कुछ पल बाद उनका अपने-आप पर कुछ काबू हुआ और उन्होंने उठ कर बाथरूम में जा अपने हाथ धोए, उनका लंड अभी भी बाहर लटक रहा था, जयसिंह ने पंजो के बल खड़े हो अपना लंड आगे कर वॉशबेसिन के नल के नीचे किया और उसे भी ठंडे पानी की धार से शांत करने लग गए. तभी कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ हुई. जयसिंह हड़बड़ा गए, बाथरूम का दरवाज़ा खुला ही था, और जल्दी से अपना लंड अंदर ठूँस ज़िप बंद कर के हाथ धोए.
'पापा? क्या कर रहे हो? ' मनिका की आवाज़ आई.
'कुछ नहीं बस थोड़ा आलस आ रहा था तो हाथ-मुहँ धो रहा था. आ गईं तुम?' जयसिंह ने कहा.
'हाँ पापा...आ गई हूँ तभी तो आवाज़ आ रही है मेरी...' मनिका ने उनकी खिल्ली उड़ाने के अंदाज़ में कहा.
'हाहाहा.. हाँ भई मान लिया...' जयसिंह बाथरूम से बाहर आते हुए बोले थे. मनिका बेड के पास अपना मोबाइल चार्ज लगा रही थी, उनकी आहट सुन वह पलटी और एक बार फिर जयसिंह के होश फाख्ता हो गए.

***

'आप कौन हैं मिस?' जयसिंह ने अचँभे से कहा.
'हीहीहाहाहा...पापा! क्या है आपको...इट्स मी ना...' मनिका ने कुछ हँसते कुछ लजाते हुए कहा.
जयसिंह वैसे तो अपने ज्यादातर इमोशन मनिका से दिखावे के लिए ही व्यक्त करते थे पर अपने सामने खड़ी खूबसूरत लड़की को देख वे आश्चर्यचकित रह गए थे. मनिका की खूबसूरती के कायल जयसिंह ने देखा कि ब्यूटी-सैलून जाने के बाद तो उसका काया-पलट ही हो गया था. मनिका ने बालों में स्टेप-कट करवाया था जिससे उसके बाल किसी मॉडल से प्रतीत हो रहे थे. उसका चेहरा भी मेकअप से दमक रहा था और गोरे-गोरे गालों पर लालिमा फैली थी. मनिका की आँखों को काले मस्कारा ने और अधिक मनमोहक बना दिया था व उसके होंठों पर एक गाजरी रंग की स्पार्कल-लिपस्टिक लगी थी जिससे वे काम-रस से भरे हुए जान पड़ रहे थे, जब वे उसे तकते रहे और कुछ नहीं बोले तो मनिका ने खीखियाते हुए फिर से कहा,
'पापा! स्टॉप इट ना...' वह तो बस मस्ती-मस्ती में हल्का सा मेकअप करवा आई थी और जयसिंह का रिएक्शन देख उसे लग रहा था कि वे उसकी टाँग खींच उसे सताने के लिए ऐसा कर रहे थे.
'पहले यह तो बता दो कि आप हैं कौन?' जयसिंह ने भी जरा मुस्कुरा कर मजाक करने के अंदाज़ से कहा.
कुछ देर तक यूँ ही उन दोनों के बीच खींच-तान चलती रही, उसकी खूबसूरती को निहारने के मारे जयसिंह रह-रह कर उसे देख मुस्काए जा रहे थे और उसके उनकी तरफ देखने पर कोई कमेंट कर उसे चिढ़ा रहे थे. आखिर मनिका को भी थोड़ी लाज आने लगी और वह बाथरूम में जा कर अपना मुहँ धो कर मेकअप साफ़ कर आई.
'अरे वो लड़की कहाँ गई जो अभी यहाँ बैठी थी?' जयसिंह ने मनिका को मेकअप उतारने के बाद देखते हुए पूछा.
'पापा आप फिर चालू हो गए...' मनिका हँसते हुए बोली.
'अरे भई इतनी सुन्दर लड़की के साथ बैठा था अभी मैं कि क्या बताऊँ?' जयसिंह ने उसे देखते हुए मुस्का कर कहा, 'पर पता नहीं कहाँ गई उठ कर अभी तुम्हारे आने से पहले...'
'हाहाहा पापा...भाग गई वो मुझे देख...' मनिका हँसते हुए बोली.
'ओह...मेरा तो दिल ही टूट गया फिर...' जयसिंह ने झूठा दुःख प्रकट किया.
'ऊऊऊ...क्यों पापा आपकी गर्लफ्रेंड थी क्या वो?' मनिका मजाक करते हुए बोली, जयसिंह को एक बार फिर मौके पर चौका मारने का चाँस मिल गया था.
'मेरी किस्मत में कहाँ ऐसी गर्लफ्रेंड...' जयसिंह ने मगर के आँसू बहाए.
'हाहाहा पापा...गर्लफ्रेंड चाहिए आपको? मम्मी को बता दूँ? बहुत पिटोगे देखना...' मनिका ने ठहाका लगाते हुए कहा था. उसे भी जयसिंह की टांग खिंचाई का मौका जो मिला था.
पर जयसिंह भी उसके पिता यूँ ही नहीं थे, 'बता दो भई...मेरा क्या है तुम ही फँसोगी.' जयसिंह ने शरारत से कहा.
'हैं? वो कैसे?' मनिका ने अचरज जताया.
'तुम ही तो कह रहीं थी उस दिन कि तुम्हारी सहेलियाँ मुझे तुम्हारा बॉयफ्रेंड कहती हैं.' जयसिंह बोले.
'हाँ...ओ शिट...पापा! कितने खराब हो आप...हमेशा मुझे हरा देते हो...' मनिका ने मुहँ बनाकर पाँव पटकते हुए नखरा किया.
'हाहाहा...' जयसिंह हँसते हुए बैठे रहे. 'और वो तो मेरी फ्रेंड्स कहतीं है मैं कोई सच्ची में आपकी गर्लफ्रेंड थोड़े ही ना हूँ...' मनिका ने नाराजगी दिखाते हुए उनके पास बैठते हुए कहा.
जयसिंह बस मुस्का दिए और उसकी तरफ हाथ बढ़ा दूसरे से अपनी जांघ थपथपा उसे गोद में आने का इशारा किया.
'जाओ मैं नहीं आती...गंदे हो आप...' मनिका नखरे कर ही थी.
'अरे भई सॉरी अब नहीं हँसता तुम पर...बस...' जयसिंह के चेहरे पर अभी भी शरारत थी.
'आप हँसोगे देख लेना...मुझे पता है ना...' मनिका ने उन्हें अविश्वास से देखते हुए कहा.
'अरे भई अभी तो नहीं हँस रहा ना...' जयसिंह भी कहाँ मानने वाले थे, 'सो अभी तो आ जाओ...' उन्होंने फिर अपनी जांघ पर हाथ रखते हुए उसे अपनी गोद में बुलाया.
'देख लेना पापा अगर आपने मुझे फिर तंग किया तो आपसे कभी बात नहीं करुँगी...' मनिका ने शिकायत भरे लहजे से कहा था पर उठ कर उनकी गोद में आ गई थी.
'लेकिन तुमने तो मुझसे नाराज ना होने का प्रॉमिस किया था न?' जयसिंह ने उसका मुहँ अपनी तरफ करते हुए पूछा.
'वो...वो तो मैंने ऐसे ही आपको उल्लू बनाने के लिए कर दिया था.' मनिका के चेहरे पर भी शरारती मुस्कान लौट आई थी.
'अच्छा ये बात थी...' जयसिंह ने मुस्का कर कहा और अपने दोनों हाथ मनिका के पेट पर ले जा उसे गुदगुदा दिया. 'आह क्या कच्चा बदन है...कुतिया हर वक़्त महकती भी रहती है...आह...' उन्होंने मनिका के जवान जिस्म पर इस तरह हाथ सेंकते हुए सोचा था, मनिका भी हिल-डुल रही थी सो उनका चेहरा उसके बालों में आ गया था.
'ईईईईईई...हाहाहा...पापाआआअ...नहीं नाराज होती...ईई...' मनिका उनकी गोद में उछलती हुई हँस रही थी.
जयसिंह ने उसे एक दो बार और गुदगुदा कर छोड़ दिया था क्यूंकि उसके इस तरह हिलने से उनकी पैंट में भी तूफ़ान उठने लगा था. मनिका अब खिलखिलाती हुई उनके साथ लग बैठी थी, उसकी साँस जरा फूली हुई थी. पहली बार उसका पूरा भार जयसिंह के शरीर पर था. जयसिंह अपने बदन पर इस तरह उसके यौवन भरे जिस्म का एहसास पाकर अपनी उत्तेजना को बड़ी मुस्किल से कंट्रोल कर पा रहे थे.
कुछ देर बाद जयसिंह की मुश्किल मनिका ने हल कर दी जब उसने उनकी गोद से उठते हुए उनसे भूख लगी होने का कहा था. सो आज एक बार फिर से वे नीचे रेस्टोरेंट में खाना खाने को चले गए थे.








Raj-Sharma-Stories.com

Raj-Sharma-Stories.com

erotic_art_and_fentency Headline Animator