Friday, January 28, 2022

वीरान जजीरा -8

FUN-MAZA-MASTI


वीरान जजीरा -8




 

 

फिर हम खाना बनाने लगे ताकि रात में बाहर बैठकर खाना ना तैयार करना पड़े। बाहर बड़ी सर्दी हो जाती थी। इसलिए अभी से तैयार कर लिया था की रात को सिर्फ़ खाना हो हमें। आख़िर रात ही गई। मेरी बहन राधा का अरमानों भरी रात। जो हर लड़की की जिंदगी में एक बार ज़रूर आती है। आज मेरी बहन की जिंदगी में वोही रात थी। वोही रात जब कोई लड़की पहली दफा अपनी टांगों के बीच का खजाना किसी मर्द के लिए खोलती है। वोही रात जब उसका जिस्म किसी मर्द के गरम आगोश में सिसकता है, तड़पता है। आज मेरी बहन की जिंदगी में भी वोही रात थी। लेकिन कितनी जुदा, कितनी अलग।

 

हमने रात का खाना खाया। वोही भुनी हुई मछली, चंद जंगली फ्रूट, उबली हुई एक झाड़ी जिसका जायका बिल्कुल मेथी की तरह था। यह था हमारा खाना। जो आप जानिए बेहद सेहत बख़्श था। फिर दीदी जहाज के सामान के बचे हुये संदूक से एक शराब की बोतल निकाल लाईं-“आज प्रेम तुम भी मेरे साथ पीओगे। हम दोनों शराब पीन के बाद शुरू करेंगे। क्योंकी तुम जानो शराब से तुम मेरी चूत में काफी देर में अपनी मनी छोड़ोगे…”

 

लेकिन दीदी देर से क्यों छोड़ूं मैं…”

 

दीदी बोलीं-“तुम जितनी देर में अपनी मनी मेरी चूत में छोड़ागे, मैं और तुम उतना ही मजा करेंगे और अगर तुमने फौरन ही छोड़ दी तो मेरी मनी छूटी ही ना होगी और तुम फारिग होकर लेटे होगे…” दीदी ने बोतल खोली   और मैं और दीदी उसको घूंट घूंट पीने लगे।

 

 दीदी कभी कभी पीती थीं। या जब हम बहुत बीमार हो जाते थे तो हमको दर्द कम करने की दवा के तौर पर कभी पिला देतीं थीं। अब भी हमारे पास काफी सारी बाटल्स बाकी थीं। मैंने तो चंद घूंट ही पिये होंगे की मेरा सिर चकराने लगा। दीदी ने भी दो घूंट और भर कर बोतल का कैप मजबूती से बंद कर दिया और बिस्तर पर जाकर लेट गईं। और टांगें खोलकर मुझे आकर अपनी टांगों के बीच में बैठने को कहा।

 

कामिनी भी उठकर दीदी की चूत के पास बैठ चुकी थी। और उसकी नजरें भी दीदी की खुली हुई चूत के अन्द्रुनी गुलाबी सुराख पर थीं।

 

दीदी मुझसे बोलीं-“प्रेम आओ पहले कामिनी की मनी निकलवा दें ताकि इसकी हालात ना खराब हो। और यह मनी क़तरा क़तरा बहाती  हमें देखकर तड़पती रहे। यह कहते हुये दीदी ने कामिनी की रानों के बीच हाथ डालकर उसे खोला और अपना मुँह कामिनी की चूत से चिपका दिया।

 

कामिनी ने मेरा लंड पकड़ा और अपने मुँह में भर कर चूसने लगी। इससे मुझे पता चला की वह काफी देर से मेरा लंड चूसना चाह रही थी।

 

कुछ देर बाद दीदी उठीं और उन्होंने मेरा लंड खींचकर कामिनी के मुँह से निकाला और बोलीं-“अब बस प्रेम तुम कामिनी की चूत चूसकर उसकी मनी चूसो जब तक मैं अपनी चूत कामिनी से चुसवाती हूँ, इससे यह गीली भी हो जाएगी और तुम्हें डालने में आसानी होगी। वरना तेल वगैरह तो है नहीं हमारे पास कोकनट ओयल से और भी जाम हो जायेगी चूत…”

 

मैं कामिनी की रानें खोलकर उसकी गरम गरम चूत चूसने लगा जो पहले ही दीदी के थूक से गीली हो रही थी। दीदी कामिनी के मुँह पर बैठी अंदर तक उससे चुसवा रहीं थीं। और फिर कामिनी की मनी से मेरा मुँह भरने लगा। हम उतर आए कामिनी पर से। अब दीदी फिर बिस्तर पर लेट चुकी थीं और उनकी टांगें खुलीं थीं। जिनसे अब भी कामिनी का थूक टपक रहा था। मैं दीदी की टांगों के दरम्यान बैठ गया। मेरा लंड दीदी की खुली चूत से चंद इंच के फासले पर था और हल्के हल्के झटके मार रहा था।

 

दीदी बोलीं-“देखो प्रेम यह मेरा मुँह नहीं है। यह चूत है जो पहली बार खुलेगी। मेरी चीखों की परवाह नहीं करना। लेकिन जिस तरह मेरे मुँह में दीवानों की तरह झटके मारते हो मनी छोड़ते वक्त चूत में आहिस्ता आहिस्ता करना। फिकर ना करो यह कुछ ही दिनों की बात है फिर जैसा चाहे करना। मैं नहीं रोकूंगी तुम्हें। मेरी चूत से खून निकलते देखकर घबराना नहीं यह होता है। और इससे कोई नुकसान नहीं होता। अच्छा अब तैयार हो जाओ…”

 

मैंने अपना लंड हाथ से सीधा किया और उसका ऊपरी सिरा, यानी उसकी टोपी दीदी की चूत पर रख दी। आहह आप जानिए दोस्तों। एक अजीब सी लहर मेरे जिस्म में दौड़ती चली गई। क्या गर्मी थी वहाँ। ऐसा लगता था की बाहर के सर्द मौसम का चूत के अन्द्रुनी मौसम पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा था। सिर्फ़ टोपी ही उस नरम हल्की सी भीगी लेकिन बहुत गरम चूत पर रखने से मेरा हाल बुरा होने लगा था। अभी तो आगे बहुत मंज़िलें तय करनी थीं।

 

मैंने आहिस्तगी से लंड को अंदर घुसाना शुरू किया ही था दीदी बोलीं-“प्रेम अपना पूरा बोझ ना डालो सिर्फ़ लंड को आगे की तरफ डालो। वो खुद अंदर घुसता चला जाएगा।

 

मैंने अपनी कमर और कुल्हों को सख़्त रखा और लंड को आगे की तरफ बढ़ाने लगा। मैं हैरान था मेरे लंड की लंबाइ  दीदी की चूत की गहराइयों में खोती जा रही थीं। लंड आहिस्ता आहिस्ता गायब हो रहा था, उस रेशमी गुलाबी चूत में।

 

बाजी का जिस्म ऐंठा हुआ था। उन्होंने अपना हाथ कामिनी के हाथों में दिया हुआ था। लेकिन आँख से आूँसू मुस्तकिल बह रहे थे। मुझको भी यही एहसास हो रहा था। मेरा लंड एक बहुत ही तंग लेकिन गरम सुराख में रेंगता हुआ आगे बढ़ रहा था। मेरा लंड आधा दीदी की चूत में जा चुका था।

 

अचानक दीदी की दर्द में डूबी आवाज आई-“आहह प्रेम बस करो आज एहसास हुआ बहुत ही लंबा है तुम्हारा लंड तो। ऐसा लगता है मर जाउन्गि। ख़तम होने का नाम ही नहीं ले रहा।

 

मैं बोला-“दीदी अभी तो आधा गया है…”

 

दीदी बोलीं-“हाई अभी आधा गया है और मेरा दर्द से बुरा हाल है। तुम ऐसा केरो प्रेम जितना जा चुका है बस उतना ही डालकर आगे पीछे करो जब इतना सुराख खुल जाए तो फिर आगे बढ़ाना…”

 

मैंने सिर हिलाते हुये अपना लंड वापिस खींच लिया। वो दीदी की चूत की दीवारों से रगड़ खाता हुआ वापिस गया।

 

दीदी की एक जबरदस्त चीख निकल गई। मैंने देखा लंड पर काफी नमी लगी हुई थी। अब मैंने दोबारा डाला। दीदी की चूत अब काफी गीली हो चुकी थी, इसलिए जरा आराम से चला गया। मैं आहिस्ता आहिस्ता आगे पीछे करने लगा। लेकिन शायद दीदी यह भूल गईं थीं की यूँ आगे पीछे करने से मेरा क्या हाल होगा। यकीन जानिए दोस्तों मैं तो गोया हवा में उड़ने लगा।

 

मेरा बस नहीं चल रहा था की मैं अपने पूरे वजूद के साथ दीदी की चूत में घुस जाऊँ। मैंने सोचा जो होगा देखा जाएगा। और एक जबरदस्त झटके से मेरा लंड दीदी की चूत की सारी रुकावटों को तोड़ता हुआ उन गहराइयों में गुम हो गया और मैं तो पागल ही हो गया। मेरा लंड, मोटा और लंबा लंड, जो कभी कामिनी और दीदी अपने मुँह में पूरा ना ले सकी थीं।

 

आज दीदी की चूत में पूरा गायब हो चुका था। और दीदी की तो चीखें आसामान फाड़ रही थीं। और वो बहुत ही नंगी नंगी गालियाँ मुझे दे रही थीं। उनकी आँखों से आूँसू बह रहे थे। कामिनी अलग सहमी हुई बैठी थी। और मैं अपना लंड अंदर घुसाए मजे से दीदी के मम्मे चूसने में लगा हुआ था। दीदी की आवाजों में कमी आने लगी। वो आहिस्ता आहिस्ता मध्यम पड़ने लगीं। और मुझे भी कुछ कमी का एहसास हुआ। मैंने एक झटके से लंड को चूत से वापिस खींचा।

 

और दोस्तों दीदी की चूत से खून तेज़ी से बहने लगा। मेरे लंड पर भी काफी खून लगा था। दीदी की चीखें अब फिर मेरे कान फाड़े दे रहीं थीं। वो ना जाने क्या क्या बके जा रहीं थीं। रो रही थीं। लेकिन ना तो मुझे हटाया और ना टांगें बंद की। मैंने फिर अपना लंड उसी खून बहाती चूत में डाल दिया।   

 

मैं झटके मार रहा था। मेरा बस नहीं चल रहा था। मुझे अपने लंड पर गुस्सा रहा था की यह इतना छोटा क्यों पड़ गया। अभी तो आगे जाना था आगे और भी गहराइयां थीं। लेकिन मेरा लंड बस इतनी ही गहराई में जा सकता था। और आप जानिए यह गहराइयां भी कमोबेश 9 इंच तक थीं।

 

दीदी की आवाज रुक चुकी थी। वो बे-सुध पड़ी थीं। हाँ मेरे झटके मारने से उनका जिस्म हिल रहा था वरना उनके जिस्म में कोई तहरीक (हरकत )  ना थी। और फिर मेरा फौवारा छूटा और मेरी मनी उन गहराइयों में बहती ना जाने कहाँ गई। और मैं हारे हुये खिलाड़ी की तरह दीदी के मम्मों पर गिर कर सांसें लेने लगा। और ना जाने कब सो गया।

 

आँख खुली तो दीदी मुझे जगा रही थी-“उठो प्रेम जागो मेरे ऊपर से उठो…”

 

मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। ऐसा करने से मेरा लंड जो दीदी की चूत में ही सिकुडा पड़ा था। और मनी के जमने की वजह से चूत की अन्द्रुनी दीवारों से चिपक सा गया था, खिंचता हुआ दीदी की चूत से बाहर निकला। दीदी की चीख निकल गई।

 

कामिनी भी जो सो चुकी थी उठ बेठी। कामिनी ने पूछा-“दीदी बहुत तकलीफ हुई क्या मैं तो नहीं लूंगी कभी अपनी चूत में भाई का लंड…”

 

दीदी मुश्कुराते हुये-“अरे कामिनी तुझे क्या मालूम कितना मजा आया है मुझे…”

 

कामिनी बोली-“और यह क्या है दीदी…” उसका इशारा दीदी की चूत से बहे हुये जमे हुये खून की तरफ था।

 

अरे यह तो बस एक बार निकलता है। अभी देखो प्रेम फिर मुझे चोदेगा…”

 

कामिनी बोली-“दीदी अब आप फिर चीखेंगी…”

 

दीदी बोलीं-“नहीं अब नहीं, अब मैं एक नये तरीके से अपनी चूत खुलवाऊूँगी…” यह कहकर दीदी घोड़ी बन गईं…” फिर दीदी ने अपना पेट आगे झुकाते हुये गान्ड को बाहर की तरफ निकाला। ऐसा करने से उनकी चूत एकदम ऊपर की तरफ हो गई।

 

वो बोलीं-“प्रेम चल अब लंड डाल हाँ अभी गान्ड के सुराख में ना डालना दोबारा चूत में ही डाल…”

 

मैं खड़ा हो गया। मेरा लंड तो पहले ही खड़ा हो चुका था। और मैंने अपनी घोड़ी बनी दीदी की चूत में अपना लंड डाल दिया बहुत तकलीफ हुई उन्हें लेकिन अब मैं आराम आराम से झटके दे रहा था। फिर भी हर झटके से वो अपनी गान्ड भींच लेतीं थीं। जिससे चूत और लंड को जकड़ लेती। इससे पता चलता था की लंड के उनकी चूत में चलने से उन्हें तकलीफ हो रही है।

 

खैर, कुछ ही देर बाद मेरी मनी दीदी की चूत में भर चुकी थी और मैं सो गया। मुझे होश आया तो सूरज आधा सफर तय कर चुका था। मैं उठकर बाहर आया तो कामिनी और दीदी बैठी कुछ बातें कर रहीं थीं। दीदी बेहद खुश थीं। उनके चेहरे पर कोई खास बात थी। गुलाबी हो रही थीं वो।

 

मैं आकर बैठ गया। बोला-“दीदी अपनी चूत दिखाओ। बहुत दर्द है ना…”   

 

दीदी ने टांगें खोल दीं-“ऊऊफफ़् ये क्या हाल हो गया…” मैं बोला-“दीदी यह चूत इतनी सूजी हुई क्यों है।

 

दीदी बोलीं-“अरे अभी कुछ देर में सही हो जाएगी। अभी मैं गरम पानी से धो लूंगी ना। अभी कामिनी मुझे नहला देगी। लेकिन उससे पहले प्रेम तू मुझे एक बार फिर घोड़ी बनाकर चोद ना…”

 

मैं बोला-“फिर दीदी आपको और तकलीफ तो नहीं होगी…”

 

दीदी बोलीं-“होगी लेकिन इस तकलीफ का इलाज यही है की जल्दी जल्दी चुदाई की जाए वरना रात को अगर किया तो बहुत ही दर्द करेगी…”

 

मैं खड़ा हो गया। दीदी ने बैठे बैठे ही मेरा लंड अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगीं। फिर मुँह से निकाल कर अपने हसीन और नरम सीने के बीच की माँग में फँसा लिया और मैं आगे पीछे करने लगा। लेकिन वो मजा कहाँ जो चूत में था।

 

मैं बोला-“दीदी घोड़ी बनो ना…”

 

दीदी घोड़ी बन गई और मैंने उस सूजी हुई चूत में अपना लंड डाल दिया। दीदी चीखने लगी।

 

कामिनी आकर दीदी के मम्मे सहलाने लगी। उनकी गान्ड पर हाथ फेरने लगी। मुझसे बोली-“दीदी ने ही कहा था ऐसा करने को?”

 

फिर दीदी और कामिनी एक दूसरे के होंठ चूसने लगीं। और फिर कामिनी दीदी के मुँह के सामने उकड़ू बैठ गई और अपनी चूत चुसवाने लगी दीदी से। दीदी की भी अब चीखें रुक चुकीं थीं और मैं झटके मार रहा था। मैं और कामिनी एक साथ ही अपनी मनी छोड़कर फारिग हुये। दीदी कब फारिग होतीं थीं यह पता ही नहीं चलता था। अब तो जब मैं अपना लंड उनकी चूत से निकालता तो मेरी ही मनी बहती थी वहाँ से। दीदी उठकर लंगड़ाते हुये कामिनी का सहारा लिए सामने बैठ गई। और कामिनी उन्हें थोड़ी देर पहले गरम किए पानी से नहलाने लगी।

 

मैं एक तरफ बैठा खाना खा रहा था। मेरा लंड दर्द कर रहा था। मैंने कामिनी से कहा कामिनी मैं भी नहाऊंगा। मेरा पानी भी गरम कर दे। और कामिनी ने एक लकड़ी की बनी बाल्टी जो हमें जजीरे पर जहाज की बहुत सी टूटी फूटी चीजों के साथ मिली थी उसको पानी से भरकर आग पर काफी ऊपर लटका दिया। पानी गरम होने के बाद मैं नहाने बैठ गया। दीदी और कामिनी अंदर झोंपड़े में ना जाने क्या बातें कर रहे थे।

 

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