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Saturday, May 31, 2014

FUN-MAZA-MASTI कामोन्माद -12

FUN-MAZA-MASTI
 कामोन्माद -12

 हांलाकि संध्या के मुख में मेरा लिंग था लेकिन फिर भी मुझे उसके गले से निकलती संतुष्टि की सिसकारी सुनायी दी। उसने कुछ देर तक तो शिश्नाग्र को चाटा और चूसा, लेकिन जैसे जैसे वह चरम सुख तक पहुँचने लगी, उसकी क्रिया धीमी पड़ गयी। कुछ देर में उसका सर पीछे की तरफ लुढ़क गया। संध्या अपनी कामेन्द्रियों पर होने वाले इस इस भारी भरकम हमले से अभिभूत हो गयी। वह इस समय मुंह से साँसे भर रही थी। उसके लिए यह निश्चित रूप से स्वर्ग की सैर करने जैसा था।

मुझे वैसे भी अपना वीर्य संध्या की योनि के अंदर डालना था - याद है न, उसकी माँ का आदेश था! अपने स्खलन के तुरंत बाद ही संध्या ने मेरा लिंग अपनी कोमल उँगलियों से पकड़ लिया था। मेरे उन्माद की भी यह सीमा ही थी। अगर वह आठ-दस बार मेरे लिंग को दबा ही देती तो मैं स्खलित हो जाता। अतः मैं जल्दी से अपनी अवस्था से हट गया और वापस पहले जैसे ही उसके सामने बैठ गया। मैंने कुछ एक क्षण गहरी साँसे भरी, जिससे की अपने लिंग पर मुझे और व्यापक नियंत्रण मिल सके।

इसी विराम वेला में मैंने संध्या को देखा - एक तरुण, विवाहित, और सम्भोग-तृप्त हिन्दू नारी का सौंदर्य अतुलनीय होता है। संध्या का दोषरहित, सुन्दर और नितांत नग्न शरीर - उसकी छाती पर सजे हुए प्यारे स्तनों का जोड़ा, एकहरा शरीर, सुडौल नितम्ब, और स्वस्थ, नरम जांघें (जो इस समय मेरे दोनों तरफ फैली हुई थीं); हाथों में रची मेहंदी और चूड़ियाँ, गले में मंगलसूत्र, कानो में कर्णफूल, नाक में एक छोटी सी चमकती हुई कील, मांग में नारंगी सिन्दूर और फैले हुए बाल - वह इस समय स्वयं रति देवी का ही रूप लग रही थी।

मैंने उसका चेहरा अपने दोनों हथेलियों में लेकर उसके होंठों पर एक भरपूर चुम्बन दिया और कहा, "वाह! तुम एक बहुत खूबसूरत लड़की हो!" अब तक मेरी साँसे मेरे नियंत्रण में आ गयी थीं और मेरा लिंग भी। उसकी उत्तेजना बरकरार थी लेकिन बेकाबू नहीं। फिर मैंने संध्या कि टाँगे सावधानी से अलग करीं और जगह बनायी और अपने लिंग को हाथ में लेकर उसकी योनि में धीरे धीरे सरका दिया। लिंग का सर अपने गंतव्य में प्रवेश कर चुका था।

"आर यू रेडी?" मैंने संध्या से पूछा। उसने तेजी से सर हिला कर हामी भरी।

 योनि बुरी तरह से चिकनी थी, अतः लिंग को कोई भी प्रतिरोध नहीं मिलना था। वैसे भी संध्या अभी अभी संपन्न हुए सम्भोग कि पृष्ठभूमि में लस्त पड़ी हुई थी। उसको जागृत करने के लिए इससे अच्छा तरीका और नहीं हो सकता था। मैंने अपने लिंग को एक तेज़ धक्का दिया - दो बातें एक साथ हुईं - एक तो संध्या के मुख से एक लम्बी सीत्कार निकल गयी और दूसरा, चूंकि मेरा लिंग अभूतपूर्व तरीके से स्तंभित था, इसलिए संध्या के योनि मार्ग ने अत्यंत शानदार तरीके से मेरे लिंग कि पूरी लम्बाई को जकड लिया। मैंने बिना रुके धक्के लगाना आरम्भ कर दिया और नीचे से संध्या ने अपने धक्को से उनका मिलान करना। मैंने संध्या के चेहरे को देखा। उसकी आँखें बंद थीं और उसके होठ कामुकता से पृथक थे। हम दोनों ही इस रति-क्रिया का बराबर आनंद ले रहे थे।

संध्या अपने नितम्बो को इस समय न केवल ऊपर नीचे, वरन, एक गोल गति में भी घुमा रही थी - इससे मेरे लिंग का दो-आयामी दोहन होने लगा था। इससे उसके भगनासे का भी बराबर उत्तेजन हो रहा था। उसकी गति भी बढ़ने लगी थी - सम्भवतः वह दूसरी बार स्खलित होने वाली थी। यह तो एकदम अद्भुत घटना थी। लेकिन मैंने सपने हाथों से उसके नितम्बो को पकड़ कर उसकी गति को थोडा नियंत्रण में लाया। मैं चाहता था कि हमारा यह सम्भोग थोडा और देर तक चले। उसकी गति पर तो मैं बस कुछ ही पल ठहर पाता। कुछ देर तक हम नियंत्रित रहे लेकिन पुनः संध्या कि गति तेज हो गयी - इस बार मैंने उसको रोका नहीं, बल्कि मैंने खुद भी अपनी गति बढ़ा दी।

"कम ऑन स्वीटी! कम विद मी!" मुझे मालूम पड़ गया था कि अब हम दोनों ही स्खलन के बेहद करीब हैं। अतः मेरी इच्छा यह थी कि हम दोनों साथ साथ आयें।

"कम ऑन गर्ल! कम फॉर मी!"

मैंने यह बहुत ऊंची आवाज़ में बोला था। भगवान् ही जाने कि बगल के कमरे में बैठे मेरे ससुराल वाले क्या सोच रहे होंगे। मेरी हर 'कम ऑन' पर संध्या के धक्के और तीव्र हो जा रहे थे - वह मेरा मंतव्य समझ रही थी। उसके उसके नाखून मेरी पीठ में गड़ने लगे थे - लेकिन मुझे यह पीड़ा भी इस समय मनोहर लग रही थी।


 अचानक ही मैंने उसकी योनि में एक बदलाव महसूस किया - उसकी दीवारें तेजी से संकुचित / कम्पित होने लगीं और योनि रस की एक धारा मेरे लिंग को भिगोने लगी। पहले संध्या ने हलकी हलकी सिसकारी भरी और फिर एक बड़ी सांस भरी। उसके बाद एक लम्बी "आँह" जैसी आवाज़ आयी। मुझे अच्छा लगा कि संध्या अब अपने रति-निष्पत्ति के आनंद का निर्लज्ज्ता से आस्वादन करने लगी है। उसके बाद कोई चार पांच धक्कों में मेरे स्खलित वीर्य का पहला माल बड़ी प्रचंडता से मेरे लिंग से निकल कर संध्या की गहराई में चला गया। संध्या ने भी इसको महसूस किया होगा, क्योंकि उसी के साथ उसने भी उच्च स्वर में सांस भरी। संध्या कि रति निष्पत्ति का उन्माद अभी बस शुरू ही हुआ था - उसने अपने दोनों पैर मेरे इर्द-गिर्द कस कर जकड लिए और पूरे जोश से धक्के लगाने लगी। उसके हर धक्के के साथ मैंने वीर्य का कुछ कुछ माल उसकी योनि में छोड़ा। उसकी योनि मेरे लिंग पर कुछ इस तरह संकुचित को रही थी जैसे उसको पूर्णतयः दुह लेगी - और उसने किया भी वही। कुछ देर ऐसे ही करने के बाद हम दोनों पूरी तरह से निढाल पड़ गए।

मैं संध्या के बगल ही गिर गया - उसके शरीर कि तपन को मैं महसूस कर पा रहा था। इस ठंडक में भी हम दोनों का शरीर पसीने से ढक गया था। हम दोनों ही जम कर हांफ रहे थे। मैंने उसको अपनी बाँह के घेरे में लेकर कस के पकड़ लिया। हम न जाने कब तक ऐसे ही पड़े रहे, और जब चेतना लौटी तो हम लोग पुनः एक दूसरे को चूमने लगे - लेकिन इस बार कोमलता से।

अंततः मैंने उसके कोमल होंठो को चूमना छोड़ कर उससे पूछा, "सो गर्ल, डू यू लाइक मेकिंग लव?"

संध्या ने थोड़ी देर सोचकर कहा, "यस, ओह यस!" उसकी आँखें चमक रही थीं। संध्या को इस तरह से खुश देखना बहुत ही सुखदाई था।








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Friday, December 13, 2013

FUN-MAZA-MASTI कामोन्माद -11

FUN-MAZA-MASTI
 कामोन्माद -11

 संध्या ने बिस्तर को थोडा व्यवस्थित किया और मेरे पहले बैठने का इंतज़ार करने लगी। मैं उसका आशय समझ कर जल्दी से बिस्तर के कगार पर बैठ गया, और उसको इशारे से अपनी तरफ बुलाया। संध्या मुस्कुराते हुए मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। मानव शरीर और मष्तिष्क अपने परिवेश से कितनी जल्दी अनुबन्ध स्थापित कर लेता है! पिछले दो दिवस से चल रही अनवरत यौन क्रिया ने संध्या के दिमाग का कुछ ऐसा ही अनुकूलन कर दिया था - जैसे ही हमको एकांत मिलता, संध्या को लगता कि सम्भोग होने वाला है। वैसे मेरे भी हालत उसके सामान ही थी - संध्या मेरे आस पास रहती तो मेरे मन में और लिंग में हलचल सी होने लगती।

"कम .... गिव मी अ किस!" मैंने उसकी कमर को थामते हुए कहा। मेरी इस बात से संध्या के गाल एकदम से सुर्ख हो गए। मैंने बड़ी मृदुलता से उसके सर को मेरी तरफ झुकाया और उसकी आँखों में देखा। वहाँ लज्जा, प्रेम, रोमांच और प्रसन्नता के मिले-जुले भाव थे। मैंने अपने होंठों को उसके होंठो से सटाया और अपनी जीभ को उसके होंठो के बीच धीरे से धकेल दिया। संध्या के होंठ सहजता से खुल गए, और मेरी जीभ उसके मुख में चली गयी। मैंने अपनी जीभ से उसके मुख के भीतर टटोलना शुरू कर दिया और कुछ ही पलों में उसकी जीभ को महसूस किया। संध्या ने भी मेरा अनुसरण करते हुए अपनी जीभ चलानी शुरू कर दी।

इस सुंदरी को इस प्रकार चूमने का संवेदन अतुल्य था - मुझे लगा कि मैं पुनः अपने किशोरावस्था में आ गया। मुझे चूमते हुए संध्या अब और झुक गयी - उसकी बाहें मेरे गले का घेरा डाले थीं। उसके कोमल बालों का मेरे चेहरे पर स्पर्श बहुत ही आनंददायक था। मैंने उसके कपोलों पर अपनी हथेलियों से थोडा और दबाव डाला और उसको फ्रेंच किस करना जारी रखा। कुछ देर बाद मैंने उसकी पीठ को सहलाते हुए अपने चुम्बन को एक भिन्न दिशा देना आरम्भ किया, और अंततः उसके नितम्ब को थाम लिया और उसको अपनी गोदी में बिठा लिया, कुछ इस तरह की उसके दोनों पैर मेरे दोनों तरफ रहें और उसकी योनि वाला हिस्सा मेरे लिंग वाले हिस्से के ठीक सामने रहे।
अद्भुत बात है, मैंने सोचा, कि मैंने पिछले दो दिनों में सेक्स का मैराथन किया था और आज की पदयात्रा के कारण थक भी गया था। स्वाभाविक रूप से मुझमें अभी उत्तेजना नहीं आनी चाहिए थी। लेकिन, मेरे लिंग कि अवस्था कुछ और ही कह रही थी। किसी ज्ञानी ने सही ही कहा है कि लिंगों का अपना ही दिमाग होता है - भले ही विज्ञान कुछ और ही कहे। संध्या का पेडू मेरे लिंग से एकदम सटा हुआ था, लिहाज़ा, उसको निश्चित तौर पर मेरे लिंग का कड़ापन महसूस हो रहा था। मैं निश्चित रूप से बहुत उत्तेजित हो चला था।

मैंने उसके आकर्षक नितम्बो को अपने हथेलियों से सौंदना शुरू किया। संध्या मत्त होकर मेरे सीने को सहला रही थी - सम्भव है कि उसको भी अब मेरे सामान ही उत्तेजना प्राप्त हो गयी हो। क्रिया को आगे बढ़ाने के लिए मैंने उसके शलवार का नाडा ढीला कर दिया और अपनी तर्जनी से उसके पुट्ठों के बीच की घाटी को सहलाया। वह सम्भवतः मुझे चूमने में अत्यधिक व्यस्त थी, अतः मेरी इस क्रिया कि उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखायी। मैंने अपना हाथ ऊपर सरका कर उसके पेट और पसलियों को सहलाते हुए उसके स्तनों के आधार को छुआ। संध्या ने थोडा सा हट कर मेरे हाथों समुचित स्थान दिया। मैंने अपने हथेलियों को अपने सीने और उसके स्तन के बीच के स्थान में आगे बढ़ा कर, उसके स्तनो को पुनः महसूस करना शुरू किया। ठोस स्तनो से उसके दोनों निप्प्ल तन कर खड़े हुए थे, और कुर्ते और स्वेटर के ऊपर से भी अच्छी तरह से टटोले जा सकते थे।

मेरा लिंग पूरी तरह से अब खड़ा हो गया था, और निश्चित तौर पर संध्या उसको महसूस कर सकती थी। सम्भवतः वह लिंग के कड़ेपन का आनंद भी उठा रही थी, क्योंकि इस समय अपने नितम्ब वह बहुत थोड़ा भी मेरी गोद पर घिस रही थी। यह अविश्वसनीय रूप से कामुक था। इसी उत्तेजना में मैंने उसके कूल्हों पर अपने हाथ चलाना शुरू कर दिया। लेकिन शलवार के ऊपर से यह काम करने में कोई ख़ास मज़ा नहीं आ रहा था, अतः मैंने कुछ इस तरह कि संध्या को न मालूम पड़े, उसकी शलवार को नीचे कि ओर सरका दिया। संध्या ने चड्ढी पहनी हुई थी - लेकिन इस समय उसके इस खूबसूरत हिस्से का अधिक अभिगम मिल गया था। मैंने अपनी हथेलियों से उसके नंगे चूतड़ों का आनंद उठाना आरम्भ कर दिया। अचानक ही मैंने धीरे से मेरी उंगलियों से उसके नितंबों के बीच की दरार को छुआ। मेरे ऐसा करते ही संध्या का चुम्बन रुक गया, और उसके साँसे अब और गहरी, और तेज हो गयीं। हमारी आँखें आपस में मिलीं। उसका चेहरा संतोष की एक सुंदर नरम अभिव्यक्ति लिए था, और मैं इस दृश्य को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ। मैं मुस्कुराया और संध्या भी। मैंने उसकी सुंदर नाक को चूमा और उसको बताया कि मैं उसको बहुत प्यार करता हूँ।


 संध्या मेरी गोद से उठ खड़ी हुई और मैंने बिना कोई समय खोए उसका शलवार और चड्ढी पूरी तरह से उतार दिया। मैंने देखा की संध्या की योनि अभी होने वाली रति क्रिया के पूर्वानुमान से गीली हो गयी थी। मैंने उसको वापस अपनी गोद में बैठा लिया और चूमना आरम्भ किया। मैंने अभी तक अपने कपडे नहीं उतारे थे, लिहाज़ा उसकी योनि का गीलापन, अब मेरे कपड़ो को भिगो रहा था। मेरे हाथ इस समय उसके कुर्ते के अंदर था, और मैं उसकी पीठ को सहला रहा था। उसकी पीठ को सहलाते हुए मैं उसकी पीठ के निचले हिस्से को, जहाँ डिंपल होते हैं, अपनी उंगलियों से सहलाने लगा। संध्या का शरीर स्वयं ही मेरे स्पर्श से ताल मिलाने लगा। मैंने धीरे धीरे अपने हाथों को उसके शरीर के ऊपर की तरफ ले जाने लगा। मेरा परम लक्ष्य उसके छोटे और ठोस स्तनों की सुंदर जोड़ी थी। लेकिन मैं इस काम में कोई जल्दी नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था कि संध्या अपने शरीर को सहलाये और दुलराये जाने की अनुभूति का पूरा आनंद उठाये।

मैंने उसकी पसलियों को सहलाया और सहलाते हुए अपने अंगूठों से उसके स्तनों के बाहरी गोलाइयों को छुआ। उसका शरीर इस संवेदन के जवाब में पीछे को तरफ झुक गया, लेकिन यह कुछ इतनी जल्दी से हुआ कि उसको सम्हालने के चक्कर में मेरे हाथ फिसल कर उसके स्तनो पर जा टिके। संध्या ने मुझे चूमना जारी रखा, और मेरे हाथों को अपने स्तनों पर महसूस करके पूरी तरह से खुश लग रही थी। मैंने उसके शानदार स्तनों को सहलाया। मेरे हाथों ने उसके स्तनों को पूरी तरह से ढक रखा था और उनको इस तरह से पूरी तरह से प्रवरण करने में सक्षम होने की अनुभूति अद्भुत थी। मैंने कोमलता से उसके स्तनाग्रों को सहलाया - जवाब में संध्या एक गहरी सांस भरती हुई पीछे कि तरफ मुड़ गयी। उसने चूमना बंद कर दिया था और मुँह से भारी साँसे भर रही थी। उसके शरीर की मेरे स्पर्श की इस तरह से प्रतिक्रिया करते देखना अद्भुत था।

अब समय आ गया था कि संध्या को पूर्णतया नग्न कर दिया जाए। मैंने उसके कुर्ते का निचला हिस्सा पकड़ कर उसको निकालने लगा। संध्या ने भी अपने हाथ उठा कर कुर्ते को उतारने में सहयोग किया। इस प्रकार नग्न होने के बाद, संध्या पीठ के बल लेट गयी - इसके दोनों हाथ उसके दोनों तरफ थे। मैं भी एक करवट में उसके बगल आकर लेट गया और दृष्टि भर कर उसके रूप का रसास्वादन करने लगा। उसके स्तन इतने सुन्दर थे कि मैं उनको अपनी पूरी उम्र देख सकता था - खूबसूरती से तराशे हुए! मैंने अपने सामने चल रहे इस अद्भुत दृश्य की प्रशंसा में दीर्घश्वास छोड़ा। संध्या ने वह आवाज़ सुन कर मेरी तरफ गर्व और लज्जा के मिले-जुले भाव से देखा।


 मैंने लेटे लेटे ही उसके रूप का दृष्टि निरिक्षण करना जारी रखा - और उसके स्तनों, पसलियों और पेट से होते हुए उसके आकर्षक कूल्हे का अवलोकन किया। लेते हुए उसका पेट थोड़ा अवतल लग रहा था (बैठे हुए वह सपाट लगता है) और उसकी कूल्हे की हड्डियां पेट से अधिक ऊपर उठी हुई थीं और स्पष्ट रूप से परिभाषित दिख रही थीं। मेरे लिए इस प्रकार का नारी शरीर अत्यधिक आकर्षक है। दृष्टि थोड़ी और आगे बढ़ी तो उसके जघन क्षेत्र के बाल दिखने लगे। और नीचे देखा तो उसका सूजा हुआ भगोष्ठ और उन दोनों के बीच में स्थित लगभग बाल-विहीन, उसके अन्तर्भाग का द्वार, बहुत ही लुभावना दिख रहा था। मेरे इस निरिक्षण क्रिया के बीच में संध्या ने कुछ भी नहीं कहा - इस समय उसकी साँसे भी आश्चर्यजनक रूप से शांत थीं। मुझे अचानक ही अपने कार्यस्थल से एक मज़ेदार बात याद आ गयी - कि अगर मैं संध्या पर कोई रिपोर्ट लिख रहा होता, तो उसको मैं 'A1' मूल्यांकन देता।

उसी समय मुझे ध्यान आया कि मैं तो अभी भी पूरी तरह से कपड़े पहने हुए था। मैंने जल्दी से अपने सारे कपडे उतार दिए, जिससे मुख्य कार्य में कोई विलम्ब न हो। मेरा इरादा संध्या के शरीर के एक एक इंच का आस्वादन अपने हाथ और मुंह से करने का था। मैंने उसके इस काम के लिए चेहरे से आरम्भ करने कि सोची। मैंने संध्या को होंठों पर चूमा तो वह भी मुझे चूमने लगी, लेकिन मेरा प्लान अलग था। मैंने उसके पूरे चेहरे को चूमा और फिर उसके कान के निकट गया। मैंने उसके कान को चूमते हुए उसकी लोलकी को धीरे से काटन और चबाना शुरू किया। उसके दूसरे कान के साथ भी यही हुआ। मैंने साथ ही साथ अपने खाली हाथों से उसके शरीर को सहलाना भी शुरू किया। इस सम्मिलित प्रहार का असर यह हुआ कि संध्या कि साँसे फिर से बढ़ने लगीं। ऐसे ही सहलाते सहलाते मैंने उसके एक स्तन को अपने हाथ से ढक लिया और कुछ देर उनको यूँ ही दबाया। मैंने देखा कि संध्या कि आँखें अब बमुश्किल ही खुल पा रही थीं।

मैं उसकी गर्दन से होते हुए नीचे कि तरफ जाकर उसके सीने के ऊपरी हिस्से चूमने लगा। नीचे बढ़ते हुए मैंने उसके स्तनों के बीच के हिस्से, उनके नीचे और आसपास चूमा और जीभ से छेड़ा। संध्या की सांस अब काफी बढ़ गयीं थीं और उसकी आँखें कास कर बंद हो गयी थीं। उसके दोनों हाथ अभी भी उसके बगल में ही थे, लेकिन उन्माद में उसकी मुट्ठियां बंध गयीं थीं। मैंने एक और बात देखी, और वह यह कि उसने अपनी कामुक अवचेतना में अपनी टाँगे थोड़ी खोल दी थीं जिससे मैंन उसके योनि-क्षेत्र का अन्वेषण कर सकूं, मैंने अभी तक उसके स्तनों पर अपना कार्य समाप्त नहीं किया गया था।

 मैंने उसके एक निपल पर अपनी जीभ फिराई - संध्या ने कांपते हुए तेज़ सांस भरी। उसकी छाती एकदम से ऊपर उठ गयी, जिससे उसका स्तन मेरे मुंह में अनायास ही भर गया। मैंने उसके चेहरे को देखा, उसकी आँखें अभी भी कस कर बंद थीं, लेकिन सांस भरने के कारण उसके होंठ थोड़ा जुदा थे। मैंने पुनः उसके निपल को चाटा तो एक बार फिर से उसकी छाती मेरे उठ कर मेरे छेड़ते हुए मुंह में भर गयी। मैंने उस निपल को मुंह में भरा और धीरे से चूसने, चबाने और काटने लगा। उसकी साँसे अब और अधिक तेजी से चलने लगीं साँस ले रहा था और बेचैनी में अपने सर को इधर उधर चलाने लगी। ऐसा करने से उसके बाल बिस्तर पर फ़ैल गए। वाह! क्या गज़ब की सेक्सी लग रही थी वह! कुछ देर उसके स्तन को इसी प्रकार छेड़ने के बाद मैंने दूसरे स्तन पर भी यही क्रिया आरम्भ कर दी, लेकिन पहले वाले स्तन को छोड़ा नहीं - उसको अपने हाथ से लगातार मसलता, दुलारता रहा। संध्या की कामोत्तेजना देखने लायक थी - उसका पूरा शरीर कसमसाने लगा, और उसने अपने दोनों पैर और ऊपर खींच लिए थे। मैंने समय देख कर उसके स्तन को छोड़ा और ऊपर पहुँच कर होंठ पर उसे चूमा। संध्या ने पहले की तुलना में कहीं अधिक शक्ति के साथ मेरे मुंह में अपनी जीभ डाल कर मुझे वापस चूमा। उसने उन्माद में आ कर मुझे पकड़ लिया था।

कुछ देर ऐसे ही चूमने के बाद मैंने पुनः उसके स्तनो का भोग लगाना आरम्भ कर दिया। उसके शरीर पर वह दोनों स्वादिष्ट स्तन जिस तरह से परोसे हुए थे, मैं ही क्या, कोई भी होता तो अपने आपको रोक न पाता। मुझे लगा कि संध्या कुछ कुछ कह रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ मेरे एक तो स्तनपान कि क्रिया के कारण धीरे-धीरे आ रही थी और ऊपर से मेरे स्वयं के उन्माद के कारण मुझे लग रहा था कि बहुत दूर से आ रही है।

"हँ?" मैंने बड़े प्रयास के बाद उसके स्तन से मुंह हटा कर पूछा।

"काश .......... इनमें ..... दूध होता …" संध्या ने दबी हुई आवाज़ में कहा।

'वाकई! काश इनमे दूध होता!' मैंने सोचा, तो मुंह में और स्वाद आ गया। मैंने और जोश में आकर उनको चूमना, चूसना और दबाना जारी रखा। मैंने कब तक ऐसा किया मुझे ध्यान नहीं, लेकिन एक समय ऐसा भी आया की संध्या दर्द भरी सिसकी भरने लगी। मुझे समझ आ गया की अब दूसरे स्तन की बारी है, और यही क्रिया उस पर भी आरम्भ कर दी। निश्चित तौर पर अब तक संध्या का संकोच समाप्त हो चला था, और वह कामुक आनंद से पूर्णतया अभिभूत हो गयी थी।

 अब आगे बढ़ने का समय हो चला था। मैं उसके पेट को लगातार चूमते हुए उसके गुप्तांग तक पहुँचने लगा। मेरे हर चुम्बन के जवाब में संध्या कसमसाने लगती। इस समय उसके दोनों हाथ मेरे बालों में घुस कर मेरे सर को कभी पकड़ते तो कभी सहलाते। मैं चूमते हुए जल्दी ही उसकी योनि तक पहुँच गया। मैंने उसके जघन क्षेत्र को चूमा तो संध्या ने अपने कूल्हों को मेरे मुंह में ठेल दिया। मैंने अपनी जीभ से कुछ देर चाटा। उसकी योनि के इतने करीब होने के कारण मैं उसकी मंद स्त्रैण-गंध सूंघ सकता था। मेरा लिंग अविश्वसनीय ढंग से कड़ा हो गया था, और मैं चाहता था कि संध्या उसको महसूस कर सके।

ऐसे ही समय के लिए महान ऋषि वात्स्यायन जी ने "कोकिला योग" कि खोज की थी। कोकिला - जिसको आज कल कि भाषा में 69 कहा जाता है। "69" सम्भोग क्रीड़ा के पूर्व का वह कामुक विन्यास है जो आप और आपके साथी को, एक दूसरे को, एक साथ मौखिक सेक्स देने के लिए अनुमति देता है। इस योग में आप और आपका साथी अपने मुंह से एक दूसरे के जननांगों को एक अभूतपूर्व निजता के साथ काम-सुख प्रदान कर सकते हैं। अतः, मैं उठ कर पूरी तरह से संध्या के ऊपर औंधा हो गया - जिससे मेरे दोनों पाँव उसके दोनों तरफ रहे और मेरा मुंह उसकी योनि पर और मेरा लिंग संध्या के मुंह के सामने रहे।

"अ … अ … आप क … क … क्या कर रहे ह … हैं?" संध्या के मुख से अस्फुट से स्वर निकले। पता नहीं उसको कैसा लगेगा, जब वह अपने चेहरे के सामने मेरा चूतड़ देखेगी! मेरी एकमात्र उम्मीद यह थी कि संध्या मेरे लिंग पर अपना ध्यान केंद्रित करे, न कि किसी अन्य हिस्से पर।

"जो मैं कर रहा हूँ, आप भी वही करो।" मैंने भी हाँफते हुए कहा, और अपने नितम्ब को नीचे कि तरफ दबाया जिससे मेरा लिंग उसके मुख के पास पहुँच जाए। संध्या पहले भी मेरा लिंग अपने मुंह में ले चुकी थी, अतः उसको दोबारा यह करने में कोई समस्या नहीं हुई। अगले ही छण मुझे अपने लिंग पर एक गर्म, नम और मखमली एहसास हुआ।

संध्या की योनि पहले से ही रसीली हो गयी थी। मैंने अपने अंगूठों से उसकी योनि द्वार को सरकाया और अपनी जीभ को उसकी स्वादिष्ट योनि द्वार में सरका दिया। स्त्रियों के गुप्तांग (मूलाधार, भगशेफ और योनि) बहुत संवेदनशील होते हैं और मामूली उत्तेजन से भी कामुक प्रतिक्रिया दिखाने लगते हैं। अतः मैंने अपनी जीभ को सौम्य और धीमी गति से चलना शुरू किया - ठीक इस प्रकार जैसे कि आइसक्रीम को चाटा जाता है। मैंने धीरे धीरे शुरुआत करके, चाटने की गति बढ़ा दी - और साथ ही साथ चाटने का तरीका और चाटने का दबाव भी बदलता रहा। मैंने धीरे-धीरे, अपनी उँगलियों से उसके भगोष्ठ को फैला कर उसकी स्वादिष्ट योनि के अंदर अपनी जीभ से अन्वेषण किया और ऐसा करने से मैंने उसके समस्त कामुक क्रोड़ के तार झनझना दिए।


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FUN-MAZA-MASTI कामोन्माद -10

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 कामोन्माद -10


नीलम का परिप्रेक्ष्य:


नीलम ने जो कुछ देखा, उससे उसका मन जुगुप्सा से पुनः भर गया। दीदी जीजू के छुन्नू को मुँह में भर कर चूस रही थी।

'पहले जीजू, और अब दीदी! ये शादी करते ही क्या हो गया इसको? कितना गन्दा गन्दा काम! और वो भी ऐसे खुले में? और वो जीजू ने दीदी के ऊपर ही पेशाब कर दिया! (नीलम की रूद्र का वीर्यपात पेशाब करने जैसा लगा)? अरे इतनी जोर से लगी थी तो वहां बगल में कर लेते!'

नीलम ने देखा की कुछ देर चूसने के बाद दीदी जीजू से अलग हो गयी और दोनों ही उठ कर झील की तरफ चलने लगे। वहां पहुँच कर जीजू और दीदी अपने अपने शरीर को धोने लगे, और कुछ देर में वापस आकर उसी टीले पर बैठ गए। और आपस में एक दूसरे को गले लगा कर चूमने और पलासने लगे। लेकिन दोनों ने कपडे अभी तक नहीं पहने।

'अरे! ऐसे तो दोनों को ठंडक लग जाएगी और इनकी तबियत ख़राब हो जाएगी। कुछ तो करना पड़ेगा! ये दोनों तो न जाने कब तक कपडे नहीं पहनेंगे - मैं ही उनके पास चली जाती हूँ। जब इन्ही लोगो को कोई शर्म नहीं है तो मैं क्यों शरमाऊँ?'

 मेरा परिपेक्ष्य:


"दीदी?" यह आवाज़ सुन कर हम दोनों ही चौंक गए - हमारा चुम्बन और आलिंगन टूट गया और उस आवाज़ की दिशा में हड़बड़ा कर देखने लगे। मैंने देखा की वहां तो नीलम खड़ी है।

"अरे! नीलम?" संध्या हड़बड़ा गयी - एक हाथ से उसने अपने स्तन और दूसरे से अपनी योनि छुपाने का प्रयास किया। "…. तू कब आई?" यह प्रश्न उसने अपनी शर्मिंदगी छुपाने के लिए किया था। संध्या को समझ आ गया था की उन दोनों की गरमागरम रति-क्रिया नीलम बहुत देर से देख रही है।

मैंने नीलम को देखकर अपनी नितांत नग्नता को महसूस किया और मैं भी हड़बड़ी में अपने शरीर को ढकने का असफल प्रयास करने लगा। हमारे कपडे उस चट्टान पर थोड़ा दूर रखे हुए थे, अतः चाह कर भी हम लोग जल्दी से कपडे नहीं पहन सकते थे।

"दीदी मैं अभी आई हूँ …. माँ ने आप दोनों के पीछे भेजा था मुझे, आप लोगो को वापस लिवाने के लिए। वो कह रही थी की मौसम खराब हो जाएगा और आप लोगो की तबियत न ख़राब हो जाए!"

कहते हुए उसने एक भरपूर नज़र मेरे शरीर पर डाली। मुझे मालूम था की नीलम ने मुझे और संध्या को पूरा नग्न तो देख ही लिया है, तो अब छुपाने को क्या ही है? अतः मैंने भी अपने शरीर को छुपाने की कोई कोशिश नहीं की - उसने हमको काफी देर तक देखा होगा - संभव है की सम्भोग करते हुए भी। संभव नहीं, निश्चित है। लिहाज़ा, अब उससे छुपाने को अब कुछ रह नहीं गया था।

नीलम के हाव भाव देख कर मुझे लगा की वह हमारी नग्नता से काफी नर्वस है। हो सकता है की हमारे सम्भोग को देख कर वह लज्जित या जेहनी तौर पर उलझ गयी हो। उधर संध्या बड़े जतन से अपने स्तनों को अपने हाथों से ढँके हुए थी।

"अच्छा …" संध्या ने शर्माते हुए कहा। वो बेचारी जितना सिमटी जा रही थी, उसके अंग उतने अधिक अनावृत होते जा रहे थे। "…. वो हमारे कपड़े यहाँ ले आ …. प्लीज!" संध्या ने विनती करी। नीलम बात मान कर हमारे कपड़े लाने लगी।

"आप लोग ऐसे नंग्युल …. मेरा मतलब ऐसे नंगे क्यों हैं? ठंडक लग जायेगी न! कर क्या रहे थे आप लोग?" उसने एक ही सांस में पूछ डाला।

"हम लोग एक दूसरे को प्यार कर रहे थे, बच्चे!" मैंने माहौल को हल्का बनाने के लिए कहा।

"प्यार कर रहे थे, या मेरी दीदी को मार रहे थे। मैंने देखा … दीदी दर्द के मारे कराह रही थी, लेकिन आप थे की उसको मारते ही जा रहे थे।"

मुझे लगा की नीलम हम दोनों को ऐसे देख कर संभवतः चकित हो गयी है - वैसे जब बच्चे इस तरह की घटना घटते देखते हैं, तो समझ नहीं पाते की क्या हो रहा है। कई बार वे डर भी जाते हैं, और उस डर की घुटन से अजीब तरह से बर्ताव करने लगते हैं। नीलम सतही तौर पर उतनी बुरी हालत में नहीं लग रही थी, लेकिन कुछ कह नहीं सकते थे। मुझे लग रहा था की उसमें इस घटना को समझने की दक्षता तो थी, लेकिन अभी उचित और पर्याप्त ज्ञान नहीं था।

उसने पहले संध्या को, और फिर मुझको हमारे कपड़े दिए, मैंने कपडे लेते हुए उसका हाथ पकड़ लिया और अपने ओर खींच कर उसकी कमर को पकड़ लिया और उसकी आँख में आँख डाल कर, मुस्कुराते हुए, बहुत ही नरमी से कहा,

"तुम्हारी दीदी को मारने की मैं सपने में भी नहीं सोच सकता - वो जान है मेरी! उसकी ख़ुशी मेरे लिए सब कुछ है और मैं उसकी ख़ुशी के लिए कुछ भी करूंगा। हम लोग वाकई एक दूसरे को प्यार कर रहे थे - वैसे जैसे की शादीशुदा लोग करते हैं। लेकिन, तुम अभी यह बात नहीं समझोगी। जब तुम्हारी शादी हो जायेगी न, तब तुमको मालूम होगा की दाजू सही कह रहे थे। तब तक मेरी कही हुई बात पर भरोसा करो …. ओके? तुम्हारी दीदी और मैं, हम दोनों एक हैं!"

नीलम ने अत्यंत मिले जुले भाव से मुझे देखा (मुझे स्पष्ट नहीं समझ आया की वह क्या सोच रही थी) और फिर सर हिला कर हामी भरी। मैंने उसके माथे पर एक छोटा सा चुम्बन दिया। मैंने देखा की उधर संध्या कपड़े पहनते हुए हमको ध्यान से देख रही है, और जब मैंने नीलम को चूमा, तो संध्या मुस्कुरा उठी। उस मुस्कान में मेरे लिए प्रशंसा और प्यार भरा हुआ था। नीलम मेरे द्वारा इस तरह खुले आम चूमे जाने से शरमा गयी - उसके गाल सेब जैसे लाल हो गए, अतः मैंने उसको जोर से गले से लगा लिया, जिससे उसको और शर्मिंदगी न हो।

जब वो अलग हुई तो बोली, "दाजू, आप बहुत अच्छे हो! … और एक बात कहूं? आप और दीदी साथ में बहुत सुन्दर लगते हैं!" इसके जवाब में नीलम को मेरी तरफ से एक और चुम्बन मिला, और कुछ ही देर में संध्या की तरफ से भी, जो अब तक अपने कपडे पहन चुकी थी।

कोई दो मिनट में हम दोनों ही शालीनता पूर्वक तरीके से कपड़े पहन कर, नीलम के साथ वापस घर को रवाना हो रहे थे। 

 वापस आते समय हम बिलकुल अलग रास्ते से आये और तब मुझे समझ आया की संध्या मुझे लम्बे और एकांत रास्ते से लायी थी - यह सोच कर मेरे होंठों पर शरारत भरी मुस्कान आ गयी। खैर, इस नए रास्ते के अपने फायदे थे। यह रास्ता अपेक्षाकृत छोटा था और इस रास्ते पर घर और दुकाने भी थीं। वैसे अगर मन में मौसम खराब होने की आशंका हो तो अच्छा ही है की आप आबादी वाली जगह पर हों - इससे सहायता मिलने में आसानी रहती है।

इस छोटी जगह में मैं एक मुख़्तलिफ़ इंसान था। ऐसा सोचिये जैसे की स्वदेस फिल्म का 'मोहन भार्गव'। मैं स्थानीय नहीं था, बल्कि बाहर से आया था; मेरे हाव भाव और ढंग बहुत भिन्न थे; मुझे इनकी भाषा नहीं आती थी, इन्ही लोगो को दया कर के मुझसे हिंदी में बात करनी पड़ती थी - मुझसे ये लोग कई सारे मजेदार प्रश्न पूछते जिनसे इनका भोलापन ही उजागर होता; और तो और बहुत सारे लोग मुझे बहुत ही जिज्ञासु निगाहों से देखते थे - मुझसे बात करने के बजाय मुझे देख कर आपस में ही खुसुर पुसुर करने लगते। लेकिन, अब सबसे बड़ी बात यह थी की मैं यहाँ का दामाद था। इसलिए लोग ऐसे ही काफी मित्रवत व्यवहार कर रहे थे। यहाँ जितने भी लोगों ने हमको देखा, सभी ने हमसे मुलाक़ात की, अपने घर में बुलाया और आशीर्वाद दिया। नाश्ते इत्यादि के आग्रह करने पर हमने कई लोगो को टाला, लेकिन एक परिवार ने हमको जबरदस्ती घर में बुला ही लिया और हमारे लिए चाय और हलके नाश्ते का बंदोबस्त भी किया। वहां करीब आधे घंटे बैठे और जब तक हम लोग वापस आये तब शाम होने लगी थी।

इस समय तक मुझे वाकई ठंडक लगने लगी थी - और लम्बे समय तक अनावृत अवस्था में रहने से ठण्ड कुछ अधिक ही लग रही थी।

घर आकर देखा की आस पास की पाँच-छः स्त्रियाँ आकर रसोई घर में कार्यरत थी। पता चला की आज भी कुछ पकवान बनेंगे! मैंने सवेरे जो मैती आन्दोलन के लिए जिस प्रकार का सहयोग दिया था, उससे प्रभावित होकर स्त्रियाँ कर-सेवा करने आई थी और साझे में खाना बना रही थी। वो सारे परिवार आ कर एक साथ खाना खायेंगे। मैंने संध्या से गुजारिश करी की कुछ स्थानीय और रोज़मर्रा का खाना बनाए। वो तो तुरंत ही शुरू ही किया गया था, इसलिए मेरी यह विनती मान ली गयी।


खाने के पहले करीबी लोग साथ बैठ कर हंसी मजाक कर रहे थे। एक भाई साहब अपने घर से म्यूजिक सिस्टम ले आये थे और उस पर 'गोल्डन ओल्डीस' वाले गीत बजा रहे थे। उन्होंने ने ही बताया की संध्या गाती भी है, और बहुत अच्छा गाती है। उसकी यह कला तो खैर मुझे मालूम नहीं थी। वैसे भी, हमको एक दूसरे के बारे में मालूम ही क्या था? मुझे उसके बारे में बस यह मालूम था की उसको देखते ही मेरे दिल ने आवाज़ दी की यही वह लड़की है जिसके साथ तुम्हे पूरी उम्र गुजारनी है।

मेरे अनुरोध करने पर संध्या ने गाना आरम्भ किया ---

'तेरा मेरा प्यार अमर, फिर क्यो मुझ को लगता हैं डर ,
मेरे जीवन साथी बता, क्यो दिल धड़के रह रह कर'

उसकी आवाज़ का भोलापन और सच्चाई मेरे दिल को सीधा छू गया। उसकी आवाज़ लता जी जैसी तो नहीं थी, लेकिन उसकी मिठास उनकी आवाज़ से सौ गुना अधिक थी। मेरा मन उस आवाज़ के सागर में गोते लगाने लगा।

'कह रहा हैं मेरा दिल अब ये रात ना ढले,
खुशियों का ये सिलसिला, ऐसे ही चला चले''

मेरे मन में हमारे साथ बिताये हुए इन दो दिनों की घटनाएं और दृश्य चलचित्र की भाँति चलने लगे। मन में एक हूक सी हो गयी। संध्या के बगैर एक भी पल नहीं चाहिए मुझे मेरे जीवन में!

'चलती हू मैं तारों पर, फिर क्यो मुझ को लगता हैं डर'

वही डर जो मुझे भी लगता है। प्यार में होना, जहाँ अत्यधिक संतोषप्रद और परिपूरक होता है, वहीँ अपने प्रेम को खोने का डर भी लगता है। गाना ख़तम हो गया था, और मैं संध्या की आँखों में देख रहा था - और वो मुझे! उसकी आँखों में यकीन दिलाने वाली चमक थी - इस बात का यकीन की मैं तुम्हारे साथ हूँ, हमेशा! मेरे ह्रदय में एक धमक सी हो गयी। ऐसा कभी नहीं हुआ। हमारा प्रेम बढ़ता ही जा रहा था, और हमारे साथ के प्रत्येक पल के साथ और प्रगाढ़ होता जा रहा था।


जब थाली परोसी गयी तो मैं घबरा गया - ये रोज़मर्रा की थाली है?! मुझको जो परोसा गया वह था - पुलाव, राजमा दाल, स्वांटे के पकौड़े, स्वाले (एक तरह के परांठे), और खीर - जो संध्या ने बनायी। सबसे अच्छी बात मुझको यह लगी की सभी लोग टाट-पट्टी पर साथ में बैठ कर साथ में खाना खा रहे थे। यहाँ लगता है की स्त्रियाँ अपने पतियों के साथ बैठ कर खाना नहीं खाती, लेकिन मेरे दबाव में संध्या मेरे साथ ही खाने बैठ गयी। वह सलज्ज, लेकिन संयत लग रही थी। पहले तो शादी होने के बाद भी शलवार-कुर्ता पहनना, फिर खुलेआम एक रोमांटिक गाना, और अब साथ में बैठ कर खाना - इस छोटी सी जगह के लिए बहुत बड़ा अपवाद था।

पहाड़ पर चढ़ने, और ठंडक में इतनी देर तक अनावृत रहने से मेरी भूख काफी बढ़ गयी थी, इसलिए मैंने छक कर खाया, और संध्या को भी आग्रह कर के खिलाया। खाने के बाद कस्बे के बड़े-बूढ़े लोग भी साथ आ गए - हम लोग अलाव जला कर उसके इर्द-गिर्द बैठे और कुछ देर यूँ ही इधर उधर की बात की। यहाँ पर कल और रहना था और परसों वापस अपने शहर - कंक्रीट जंगल - को! मेरे पास वैसे तो छुट्टियाँ काफी थीं, लेकिन अभी तक हनीमून का कोई प्लान नहीं बनाया था।

मैंने संध्या से शादी के पहले पूछा था की वो कहाँ जाना पसंद करेगी, लेकिन यह प्रतीत होता था की उसको हनीमून जैसी चीज़ के बारे में कुछ भी नहीं मालूम था। और उस समय हम दोनों इतनी कम बाते करते थे की यह संभव नहीं था की इसके बारे में संध्या को तफसील से बता पाऊँ! मुझे यह अचानक ही याद आया की हनीमून का तो कोई प्लान ही नहीं बनाया है।

'ठीक है …. अभी संध्या से इस विषय में चर्चा करूँगा।' मैंने सोचा।

वैसे भी विदेश में जा कर हनीमून करना संभव नहीं था, क्योंकि एक तो संध्या के पास पासपोर्ट नहीं था, और दूसरा उसके लिए काफी योजना करनी होती है। खैर उसी से यह बात करने पर कोई हल निकलेगा। मैंने अपने शादी-शुदा दोस्तों को एस एम एस भेजे की मुझे हनीमून आईडिया भेजें - जो भारत में हों - वो भी तुरंत। मैंने वैसे भी कहीं मनोरंजन के इरादे से यात्रा नहीं करी थी - बस एक बार की, तो उसी में मुझको अपनी जीवन संगिनी भी मिल गयी।

अगले पन्द्रह मिनट में शादी की बधाई के साथ मुझे कम से कम बीस अलग अलग जगहों के बारे में मालूम हो गया - पहाड़ो से लेकर रेगिस्तान तक, धर्म स्थानों (आखिर हनीमून के लिए कौन गधा धर्म-स्थान जाता है?) से लेकर नग्न-बीचों तक। पहाड़, धर्म-स्थान, रेगिस्तान, और जंगल वाले आईडिया मैंने नकार दिए (हाँलाकि जंगल वाला आईडिया मुझे बहुत अच्छा लगा - लेकिन मैंने सोचा की उसको बाद में देखा जाएगा।

नग्न बीच तो भारत में तो होते नहीं - लेकिन बीच का आईडिया मस्त है, मैंने सोचा। संध्या के लिए एकदम नया होगा। उसने अभी तक सिर्फ पहाड़ ही देखे हैं - इस जगह से आगे कभी गयी ही नहीं। उसने बस किताबों में ही पढ़ा होगा। मैंने अपने दोस्तों को पुनः एस एम एस भेजे की मुझे बीच के विभिन्न आईडिया बताएं।

अगले आधे घंटे में मुझको गोवा, केरल, अंडमान और लक्षद्वीप के बारे में मालूम हो गया। लगभग सभी ने गोवा के बारे में बोला अवश्य। इसी से मुझे स्पष्ट हो गया की वहां नहीं जाना है - निश्चित रूप से बहुत ही भीड़-भाड़ वाली जगह होगी। कोई ऐसी जगह चाहिए जो साफ़ सुथरी हो, सुरक्षित हो, और जहाँ पर्याप्त एकांत भी मिले।

फिर मैंने अपने बॉस को फ़ोन किया और अपना प्लान बताया। आप लोगो सोचेंगे की ऐसा बॉस सभी को मिले - लेकिन उसने पहले तो मुझे विवाह की बधाइयाँ दीं और फिर बहुत ही ख़ुशी से मुझको वापस आने के लिए 'अपना समय लेने' को कहा (इतने दिनों के काम में मैंने शायद ही कभी छुट्टी ली हो - उसको कभी कभी यह डर लगता था की कहीं मुझे काम के कारण बर्न-आउट न हो जाए। वो मेरे जैसे लाभकर कर्मचारी का क्षय नहीं करना चाहता था। उसने मुझे अंडमान जाने को कहा, और यह भी बताया की उसका एक मित्र है जो वहां एक उम्दा होटल का मालिक है। और यह की वह होटल एकदम फर्स्ट क्लास है (वह खुद भी वहां रह चुका है), और वह अपने दोस्त को मुझे डिस्काउंट देने के लिए भी बोलेगा। मुझे तो उसका सुझाव बहुत अच्छा लगा, लेकिन संध्या की रजामंदी भी उतनी ही अवश्यक थी। अतः मैंने उसको कहा की मैं सवेरे फोन कर के बताऊँगा। 

"यहाँ तो बहुत ठंडक हो जाती है! बाप रे! आप लोग रहते कैसे हैं?" मैंने कमरे के अन्दर आते हुए संध्या से पूछा। मैं अपने हाथों को रगड़ कर गरम करने का प्रयास कर रहा था। संध्या इस समय कुछ कपडे तह करके एक तरफ रख रही थी।

"आपको आदत नहीं है न! इसीलिए आपको इतनी ठंडक लग रही है। और आप सिर्फ एक स्वेटर क्यों लाये? पहाडों पर आए और वो भी इस मौसम में! कुछ और गर्म कपडे रखने चाहिए थे न?" संध्या ने हँसते हुए जवाब दिया।

"आपको कैसे मालूम की मेरे पास सिर्फ एक स्वेटर है? मेरे पीछे पीछे मेरा सामान चेक कर रही थीं क्या?" मैंने मजाक करते हुए कहा।

"हाँ! आपके कुछ कपड़े आपके बैग में रखने थे, इसलिए।" संध्या ने पत्नी-सुलभ अधिकार और मान वाली आवाज़ में कहा। मैं मुस्कुराया - अब 'मेरा सामान' जैसा कुछ नहीं है!

"आपने कभी बताया ही नहीं, की आप इतना बढ़िया गाती हैं? मैं अब तो रोज़ सुनूँगा गाने!" संध्या ने कुछ नहीं कहा, बस लज्जा से मुस्कुराई। मेरे चेहरे पर उसके लिए प्रेम, प्रशंसा, और गर्व के कितने ही सारे मिले जुले भाव आये। मेरी आवाज़ आर्द्र हो चली, लेकिन फिर भी मैंने उसको कहा,

"सच कहूं? यू चेंज्ड माय लाइफ! थैंक यू!" मेरी यह बात सुनते सुनते संध्या की आँखें भर आईं, और वो तेज़ी से मेरे पास आकर मुझसे लिपट गयी। अब 'आई लव यू' कहने की ज़रुरत नहीं थी। हम दोनों इन मामूली औपचारिकताओं से ऊपर उठ गए थे। मैंने उसको अपने से चिपटाए हुए ही कहा, "आपको मालूम है न, की परसों एकदम सवेरे ही हम लोगो को यहाँ से वापस जाना है?"

यह सुन कर संध्या जाहिर तौर पर उदास हो गयी और उसने बहुत धीरे से सर हिलाया।

"जानू, प्लीज! उदास मत होइए! हम लोग यहाँ हमेशा तो नहीं रह सकते हैं न? जाना तो होगा?" उसने फिर से सर हिलाया।

"माँ बाबा को छोड़ कर जाने से दुःख तो होगा, लेकिन मैं आपका पूरा ख़याल रखूंगा। आपको मुझ पर भरोसा है न?" संध्या ने मेरी आँखों में एक गहन दृष्टि डाली और कहा,

"आप पर जितना भरोसा है, मुझे वो खुद पर नहीं है! आपके साथ मैं कहीं भी जाऊंगी। और मुझे मालूम है की आप मुझे हमेशा खुश रखेंगे। इसका उल्टा तो मैं सोच भी नहीं सकती।"

मैंने संतोषप्रद सांस भरी, "चलिए, बिस्तर पर चलते हैं …"




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Thursday, December 5, 2013

FUN-MAZA-MASTI कामोन्माद -9

FUN-MAZA-MASTI
 कामोन्माद -9 

 मैंने अपनी जीभ से उसके योनि रस का आस्वादन करते हुए, भगनासे को चाटना आरम्भ कर दिया।

"आऊऊ!" संध्या कराही, "थोडा थोड़ा दर्द होता है!"

अरे! अगर मज़ा लेना है तो कुछ तो सहना पड़ेगा न! लेकिन मेरे पास संध्या को यह समझाने का समय और संयम नहीं था। मैंने उस छोटे से बिंदु को चाटना जारी रखा। संध्या ने एक गहरी सांस छोड़ी, और अपने नितम्बो को मेरे चाटने की ताल में ऊपर की तरफ हिलाना शुरू कर दिया - मानो वह स्वयं ही अपनी योनि का भोग चढ़ा रही हो। कुछ देर तक यूँ ही चाटने के बाद मैंने अचानक से उसके समस्त गुप्तांग को अपने मुंह में भर कर कास के चूस लिया और अपनी जीभ को बड़े ही हिंसात्मक तरीके से उसके भगनासे पर फिराने लगा।

संध्या की गले से एक अत्यंत कामुक सिसकारी छूट गयी और उसका शरीर कामोत्तेजना में दोहरा हो गया। उसके हाथ मेरे सर को बलपूर्वक पकड़ कर अपनी योनि में खीचने लगे। उसके हाँफते हुए गले से आहें निकलने लगीं।

उसका शरीर एक कमानी जैसा हो गया, और मेरे सर पर उसकी पकड़ और भी मजबूत हो गयी और अचानक ही उसका शरीर एकदम से कड़ा हो गया। संध्या के शरीर में तीन बार झटके आये, और तीनो बार उसके मुंह से "ऊउह्ह्ह्ह!" निकला। अंततः, वह निढाल होकर लेट गयी।

संध्या मुख मैथुन के ऐसे प्रहार के आघात के बाद अपनी आँखे बंद किये लेटी हुई थी - उसके स्तन उसकी तेज़ चलती साँसों के साथ ही उठ बैठ रहे थे और उसकी साँसे अभी भी उसके मुंह से आ-जा रही थीं। उसकी जांघे वापस खुल गयी थीं और उसकी छोटी सी योनि मेरे मौखिक परिचर्या के कारण पूरी तरह से गीली हो गयी थी - उसकी योनि से काम-रस अभी भी निकल रहा था।

 हलकी ठण्ड होने के बावजूद संध्या का शरीर पसीने की एक पतली परत से ढक गया था। मैंने उसके हाँफते हुए मुख को अपने मुख में लेकर भरपूर चुम्बन दिया - हमारे तीन संसर्गों में ही हमारे बीच के गुणधर्म और ऊर्जा कई गुना बढ़ चुके थे। इस विस्तीर्ण निर्जन प्राकृतिक स्थान में अपनी भावनाएँ अवरुद्ध करने का कोई अर्थ नहीं था। लिहाज़ा, हमारा जोश पाशविक जुनून तक पहुँच गया। हमारा चुम्बन कामोन्माद की पराकाष्ठ पर था - चुम्बनों के बीच में हम एक दूसरे के होंठों को हल्के हलके चबा भी रहे थे। मुझे लगा की हमारी जिह्वाएँ एक कठिन मल्लयुद्ध में भिड़ने वाली थी की संध्या कसमसाते हुए बोली, "जी …. मुझे टॉयलेट करना है।"

टॉयलेट? मुझे अब कुछ कुछ समझ आ रहा था। अवश्य ही संध्या को सम्भोग के बाद मूत्र करने का संवेदन होता है। हो सकता है। ये सब सोचते हुए मुझे एक विचार आया। हम लोग इतने दुष्कर कार्य कर रहे थे, क्यों न एक कार्य और जोड़ लें?

"टॉयलेट जाना है? और अगर मैं न जाने दूँ तो?" कहते हुए मैंने उसको अपनी बाँहों के घेरे में पकड़ कर और जोर से पकड़ लिया। संध्या कसमसाने लगी।

"प्लीज! जाने दीजिये न! नहीं तो यहीं पर हो जाएगा!" कहते हुए संध्या शरमा गयी।

"हा हा! ठीक है, कर लो …. लेकिन, मुझे देखना है।"

मेरी बात सुन कर संध्या की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयीं! मेरी कामासक्ति के प्रयोग में संध्या ने अभी तक पूरा साथ दिया था, लेकिन उसके लिए ये एक नया विषय था।

"क्या?! छी! आप भी न!"

"क्या छी? मैंने तो आपका सब कुछ देख लिया है, फिर इसमें क्या शर्म?" मेरी बात सुन कर संध्या और भी शरमा गयी। मैं अब उठ कर बैठ गया और साथ ही साथ संध्या को भी उसकी बाँहे पकड़ कर बैठा लिया, और इसके बाद मैंने संध्या की टाँगे थोड़ी फैला दीं। मेरी इस हरकत से संध्या खिलखिला कर हंस दी।

"इस तरह से?" मैंने सर हिल कर हामी भरी …. "मुझे नहीं लगता की मैं ऐसे कर सकती हूँ!"

"जानेमन, अगर इस तरह से नहीं कर सकती, तो फिर बिलकुल भी नहीं कर सकती।" मैंने ढिठाई से कहा। 


मैंने संध्या का टखना जकड़ रखा था, और दृढ़ निश्चय कर रखा था की मैं उसको मूत्र करते हुए अवश्य देखूँगा - और अगर हो सका तो उसकी मूत्र-धार को स्पर्श भी करूंगा। उस समय नहीं मालूम था की यह अनुभव मुझे अच्छा भी लगेगा या नहीं - बस उस समय मुझे यह तजुर्बा लेना था। अंग्रेजी में जिसे 'किंकी' कहते हैं, वही! संध्या ने थोड़ी कसमसाहट करके मेरी पकड़ छुड़ानी चाही, लेकिन नाकामयाब रही और अंततः उसने विरोध करना बंद कर दिया। उसने अपनी मुद्रा थोड़ी सी व्यवस्थित करी - पत्थर पर ही वह उकड़ू बैठ गयी - उसके ऐसा करने से मुझे उसकी योनि का मनचाहा दर्शन होने लगा।

"आप सचमुच मुझे ये सब करते देखना चाहते हैं?" मैंने हामी भरी, "…. ये सब कितना गन्दा है!"

"जानू! इसीलिए! मैं बस एक बार देखना चाहता हूँ। अगर हम दोनों को अच्छा नहीं लगा तो फिर नहीं करेंगे! ओके? जैसे आपने मेरी बात अभी तक मानी है, वैसे ही यह बात भी मान लीजिये।"

"जी, ठीक है … मैं कोशिश करती हूँ।"

यह कहते हुए संध्या ने अपनी आँखें बंद कर लीं, और मूत्र पर ध्यान लगाया। उसकी योनि के पटल खुल गए - मैंने देखा की वहां की माँस पेशियाँ थोडा खुल और बंद हो रही थीं (मूत्राशय को मुक्त करने का प्रयास)। संध्या के चमकते हुए रस-सिक्त गुप्तांग को ऐसी अवस्था में देखना अत्यंत सम्मोहक था।


मैंने देखा की मूत्र अब निकलने लगा है - शुरू में सिर्फ कुछ बूँदें निकली, फिर उन बूँदों ने रिसाव का रूप ले लिया, और कुछ ही पलों में मूत्र की अनवरत धार छूट पड़ी। संध्या का मुँह राहत की साँसे भर रहा था। उसकी आँखें अभी भी बंद थीं - मैंने अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसके मूत्र के मार्ग में लाया और तत्क्षण उसकी गर्मी को महसूस करने लगा।

कोई दस सेकंड के बाद संध्या का मूत्र त्यागना बंद हुआ। वह अभी भी आँखें बंद किये हुई थी - उसकी योनि की पेशियाँ सिकुड़ और खुल रही थीं और उसमें से मूत्र निकलना अब बंद हो चला था। मेरे दिमाग में न जाने क्या समाया की मैंने आगे बढ़ कर उसकी योनि को अपने मुंह में भर लिया, और संध्या के मूत्र का पहला स्वाद लिया - यह नमकीन और थोड़ा तीखा था। मुझे इसका स्वाद कोई अच्छा नहीं लगा लेकिन उसका स्वाद अद्वितीय था और इसलिए मुझे बहुत रोचक लगा। मैंने उसकी योनि से अपना मुँह कास कर चिपका लिया और उसको चूस कर सुखा दिया।

मेरी इस हरकत से संध्या मेरे ऊपर ही गिर गयी - उसकी टांगों में कम्पन सा हो रहा था। उसने जैसे तैसे अपने शरीर का भार व्यवस्थित किया, जिससे मुझे परेशानी न हो, और फिर मुझे भावुक हो कर जकड कर एक ज़ोरदार चुम्बन दिया, "हनी … आई लव यू! …. ये … बहुत …. अजीब था। मेरा मतलब … यह बहुत उत्तेजक है, लेकिन बहुत ही …. अजीब!"

संध्या को इस प्रकार अपनी भावनाएँ बताते हुए देखने से मुझे बहुत अच्छा लगा। एक प्रेमी युगल को अपनी अपनी काम भावनाएं एक दूसरे को बतानी चाहिए। तभी एक दूसरे को पूर्ण रूपेण संतुष्ट किया जा सकता है।

"आई लाइक्ड इट! इसको थोड़ा और आगे ले जायेंगे!" मैंने कहा और संध्या को पुनः चूमने लगा।


 नीलम का परिप्रेक्ष्य:


नीलम कोई पाँच मिनट से झाड़ी के पीछे खड़ी हुई अपने दीदी और जीजाजी के रति-सम्भोग के दृश्यों को देख रही थी। उसके माँ और पिताजी ने उसको उन दोनों के पीछे भेज दिया था की उनको वापस ले आये, क्योंकि मौसम कभी भी गड़बड़ हो सकता है। नीलम रास्ते में लोगो से पूछते हुए इस तरफ आ गयी थी - उसको संध्या की इस फेवरिट स्थान का पता था। नीलम उस जगह पर पहुँचने ही वाली थी की उसको किसी लड़की के कराहने और सिसकने की आवाज़ आई।

वह आवाज़ की दिशा में बढ़ ही रही थी की उसने झील के बगल वाले प्रस्तर खंड पर दीदी और जीजू को देखा - वह दोनों पूर्णतः नंग्युल (नग्न) थे - दीदी लेटी हुई थी - उसके पाँव फैले हुए थे और आँखें बंद थीं - जीजू का सर दीदी की रानों (जाँघों) की बीच की जगह सटा हुआ था और वो उसकी पेशाब करने वाली जगह को चूम, चाट और पलास (सहला) रहे थे। उनके इस हरकत से ही दीदी की कराहटें निकल रही थीं।

'छिः! जीजू कितने गंदे हैं! दीदी दर्द से कराह रही है और वो हैं की ऐसी गन्दी जगह को पलास रहे हैं!' ऐसा सोचते हुए नीलम की निगाहें अपने जीजू के निचले हिस्से पर पड़ी - उनका छुन्नू और अंडे दिख रहे थे। वह पहले सोचती थी की दीदी बहुत दुबली है, लेकिन उसको ऐसे निरावृत देख कर उसको समझ आया की वो तो एकदम गुंट (सुन्दर और सुडौल) है। जीजू भी बिना कपड़ों के कितने सुन्दर लगते हैं!

नीलम को कुछ ही पलों में समझ आ गया की उसका यह आंकलन की दीदी दर्द से कराह रही है, दरअसल गलत था - वह वस्तुतः मज़े में आहें भर रही है। कोई चाहे कितना भी मासूम क्यों न हो, सयाना होते होते रति क्रिया का नैसर्गिक ज्ञान उसमें स्वयं आ जाता है। नीलम को स्त्री पुरुष के शारीरिक बनावट का अंतर मालूम था और उसको यह भी मालूम था की लिंग और योनि का आपस में क्या सम्बन्ध है।

लेकिन उसको यह नहीं ज्ञात था की इस संयोजन में आनंद भी आता है। इस कारण से उसको अपनी भोली-भाली दीदी को इस प्रकार आनंद प्राप्त करने को उद्धत देख कर आश्चर्य हुआ।

'कितनी निर्लज्जता से दीदी खुद भी अपनी योनि को जीजू के मुँह में ठेले जा रही थी! कैसी छंछा (चरित्रहीन औरत) जैसी हरकत कर रही है दीदी!'

एक बात देख कर नीलम को काफी रोमांच आया - जीजू के हाथ दीदी के दोनों दुदल (स्तन) और दुदल-घुंडी (निप्पल) को रह रह कर मींज भी रहे थे। इस समय दीदी जीजू के सर को पकड़ कर अपनी योनि में खीच रही थी और हाँफ रही थी। नीलम ने देखा की अचानक ही दीदी का शरीर कमानी जैसा हो गया, और उसके शरीर में झटके आने लगे। फिर वह निढाल होकर लेट गयी।


कुछ देर दीदी लेटी रही और फिर उठ कर जीजू से कुछ बाते करने लगी। फिर वह ऐसी मुद्रा में बैठ गयी जैसे पेशाब करते समय बैठते हैं - लेकिन पत्थर पर और वह भी जीजू के सामने? दीदी को ऐसा करते हुए तो वह सोच भी नहीं सकती थी - लेकिन जो प्रत्यक्ष में हो रहा है उसका क्या?

'इसको बिलकुल भी शर्म नहीं है क्या?'

नीलम को अपनी दीदी को ऐसे खुलेआम पेशाब करते देख कर झटका लगा और एक और झटका तब लगा जब जीजू ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसके पेशाब की धार को छुआ। और उसका मन जुगुप्सा से भर गया जब उसने देखा की जीजू ने दीदी के पेशाब वाली जगह को अपने मुंह में भर लिया।

'ये दीदी जीजू क्या कर रहे हैं? कितना गन्दा गन्दा काम!'

नीलम वहां से वापस जाने ही वाली थी की उसने देखा की दीदी और जीजू आपस में कुछ बात कर रहे हैं और जीजू का छुन्नू तेजी से उन्नत होता जा रहा है - उसका आकार प्रकार देख कर नीलम का दिल धक् से रह गया।

'यह क्या है?' नीलम ने सिर्फ बच्चों के शिश्न देखे थे, जो की मूंगफली के आकार जैसे होते हैं। वो भी कभी कभी उन्नत होते हैं, लेकिन जीजू का तो सबसे अलग ही है। अलग … और बहुत सुंदर … और और बहुत … बड़ा भी! ये तो उसकी स्कूल की स्केल से भी ज्यादा लम्बा लग रहा था और मोटा भी था - बहुत मोटा।

दीदी ने बहुत ही प्यार से जीजू के छुन्नू को धीरे धीरे पलासना शुरू कर दिया था, और साथ ही साथ वो चट्टान पर कुछ इस तरह से लेट गयी की उसकी उसकी रानें पूरी तरह से खुल गयी। लेकिन फिर भी दीदी अपने उस हाथ से, जो जीजू के छुन्नू पर नहीं था, अपनी पेशाब करने वाली जगह को और फैला रही थी। दीदी की फैली हुई योनि को देख कर नीलम के दिल में एक आशंका या डर सा बैठ गया।


'क्या करने वाली है ये?'

और फिर वही हुआ जिसकी उसको आशंका थी - जीजू अपना छुन्नू दीदी की योनि में धीरे धीरे डालने लगे। दीदी की छाती तेज़ साँसों के कारण धौंकनी जैसे ऊपर नीचे हो रही थी।

'दीदी को कितना दर्द होगा! बेचारी देखो कैसे उसकी साँसे डर के मारे बढ़ गयी हैं!'

दीदी नीचे की तरफ, जीजू के छुन्नू को देख रही थी - जीजू अब साथ ही साथ दीदी के दुदल मींज रहे थे और चुटकी से दबा रहे थे। अंततः जीजू का पूरा का पूरा छुन्नू दीदी के अन्दर चला गया - दीदी के गले से एक गहरी आह निकल गयी। नीलम को वह आह सुनाई पड़ी - उसके दिमाग को लगा की दीदी दर्द के मारे कराह रही है, लेकिन उसके दिल को सुख भरी आह सुनाई दी।

जीजू ने दीदी से कुछ कहा। जवाब में दीदी ने सर हिला कर हामी भरी।

'दीदी ठीक तो है? बाप रे! इतनी मोटी और लम्बी चीज़ कोई अगर मेरे में डाल दे तो मैं तो मर ही जाऊंगी!' नीलम ने सोचा।

"करिए न … रुकिए मत।" नीलम को दीदी की हलकी सी आवाज़ सुनाई दी।

'दीदी क्या करने को कह रही है? और वो ऐसी हालत में बोल भी कैसे पा रही है। मेरी तो जान ही निकल जाती और मैं रोने लगती।'

दीदी की बात सुन कर जीजू की कमर धीरे धीरे आगे पीछे होने लगी - लेकिन ऐसे की उनका छुन्नू पूरे समय दीदी के अन्दर ही रहे और बाहर न निकले।

'हे भगवान्!' नीलम अब मंत्रमुग्ध होकर अपने दीदी और जीजा के यौन संसर्ग का दृश्य देख रही थी।

 संध्या का परिप्रेक्ष्य:

संध्या को पिछले के रति-संयोगों में वैसा नहीं महसूस हुआ था, जैसा की उसको अभी हो रहा था। उसके पति का बृहद लिंग उसकी नन्ही सी योनि का इस प्रकार उल्लंघन और उपभोग कर रहा था जिसकी व्याख्या करना अत्यंत कठिन था! वह लिंग जिस तरह से उसकी योनि द्वार को फैला रहा था और इस क्रिया से होने वाला कष्ट भी अब उसको प्रिय लगने लगा था। उस लिंग के प्रत्येक प्रवेशन से उन दोनों के जघन क्षेत्र एकदम ठीक जगह पर, एकदम ठीक बल के साथ टकरा रहे थे। और उसके पति के वृषण उसके नितम्बो पर नरम नरम चपत लगा रहे थे।

ऐसा सुख संध्या को पहले नहीं महसूस हुआ। यह संवेदना थी आनंद की, कष्ट की, आनंदातिरेक की और एक तरह की हानि की। और कुछ भी हो, इस काम में मज़ा बहुत आ रहा था।

जब संध्या के विवाह का दिन निकट आने लगा, तो पास पड़ोस की तीन चार 'भाभियों' ने उसको अंतहीन और अधकचरी यौन शिक्षा प्रदान की। उनके हिसाब से पुरुष का लिंग सामान्यतः संकरा, थोड़ा लटकता हुआ, पतली ककड़ी जैसे आकार का होता है। किन्तु उसके पति का लिंग तो उनके बताये जैसा तो बिलकुल ही नहीं था - बल्कि उसके विपरीत कहीं अधिक प्रबल, लम्बा और मोटा था। उन्होंने यह भी बताया था की यौन क्रिया तो बस दो से चार मिनट में ख़तम हो जाती है, और ऐसा कोई घबराने वाली बात नहीं होती, और यह भी की ये तो पुरुष अपने मज़े के लिए करते हैं। लेकिन उसका पति इस विभाग में भी निश्चित रूप में लाखों में एक है - एक तो उनके बीच का एक भी यौन प्रसंग कम से कम पंद्रह बीस मिनट से कम नहीं चला … और तो और 'उन्होंने' उसके आनंद को हर बार वरीयता दी। भाभियों के हिसाब से सेक्स का मतलब लिंग का योनि में अन्दर बाहर जाना और तीन चार मिनट में काम ख़तम। लेकिन अब तक उन दोनों ने जितनी भी बार भी सेक्स किया, उतनी ही बार सब कुछ नया नया था।


आखिर कितनी विषमता हो सकती है, इस चिरंतन काल से चली आ रही नैसर्गिक क्रिया में? संध्या को अपनी योनि में एक तेज़ धक्का महसूस हुआ - उसने ध्यान किया की उसके पति का लिंग कुछ और फूल रहा था। और जिस तरह से वह लिंग उसके क्रोड़ को निःशेष कर रहा था, उससे वह अपने पति और उसके लिंग, दोनों की ही मुरीद बन चुकी थी। उसको मन ही मन ज्ञात हो चला था की रूद्र की वो पूरी तरह गुलाम बन गयी है। पहले तो अपने व्यक्तित्व, फिर अपने व्यवहार और अब अपने यौन-सामर्थ्य से उसके पति ने उसको पूरी तरह से जीत लिया था। इसके एवज़ में वह कुछ भी कहेंगे तो वह करेगी।अगर रूद्र चाहे तो दिन के चौबीसों घंटे उसके साथ सम्भोग कर सकता है और वो मना नहीं कर सकती थी।

 मेरा परिप्रेक्ष्य:

आमतौर पर पुरुष एक स्खलन के आधे घंटे तक पुनः संसर्ग के लिए नहीं तैयार हो पाते। लेकिन संध्या की कशिश ही कुछ ऐसी है की मैं तुरंत तैयार हो जाता हूँ। उसका अद्वितीय रूप, उसका भोलापन, उसकी सरलता और उसका कमसिन शरीर मेरी कामातुरता को कई गुना बढ़ा देता है। कभी कभी मन होता है की उसकी योनि में अपने लिंग का इतने बल से घर्षण करूँ की वहां लाल हो जाए। लेकिन, स्त्रियाँ हिंसा से नहीं, प्रेम से जीती जाती है। लिहाज़ा, मैं अपने मन के पशु पर लगाम लगा कर लयबद्ध तरीके से उसकी योनि का मर्दन कर रहा हूँ। उसकी कसी हुई और चिकनी योनि में मेरे लिंग का आवागमन बहुत ही सुखमय लग रहा है।

 संध्या का परिप्रेक्ष्य:


संध्या की कामाग्नि कुछ इस प्रकार से धधक रही है की उसको न तो अपने नीचे के शिलाखंड की शीतलता महसूस हो रही है और न ही अपने पर्यावरण की। इस समय उसके पूरे अस्तित्व का केंद्र उसकी योनि थी, जहाँ पर उसके पति का लिंग अपन कर्त्तव्य कर रहा था। उसके हर धक्के में आनंद और पीड़ा की ऐसी मधुर झंकार छूट रही थी की उसको लग रहा था की वह स्वयं ही कोई वाद्य-यन्त्र हो। ऐसे ही आनंद के सागर में हिचकोले खाते हुए उसकी दृष्टि झाड़ियों के पीछे चली गयी।


'कोई तो वहां है!' हाँलाकि उसके नेत्रों में खींचे वासना के डोरे उसकी अवलोकन को धुंधला बना रहे थे, लेकिन थोडा जतन करने से उसको कुछ स्पष्ट दिखने लगा। जो व्यक्ति था, उसके कपडे बहुत ही जाने पहचाने थे। पर समझ नहीं आ रहा था की ये है कौन!

किन्तु, अपने आपको ऐसे नितांत नग्न और यौन की ऐसी प्रच्छन्न अवस्था में किसी और के द्वारा देखे जाने के एहसास से संध्या की कामुकता और बढ़ गयी।

'कोई देखता है तो देखे! आखिर वह अपने पति के साथ समागम कर रही है, किसी गैर के साथ थोड़े ही! और देखना ही क्या? जा कर सबको बताये की संध्या और उसका पति किस तरह से सेक्स करते हैं। और यह भी की उसके पति का लिंग कितना प्रबल है!'

यह सोचते हुए कुछ ही पलों में वह रति-निष्पत्ति के आनंदातिरेक पर पहुँच गयी। उसकी योनि से काम रस बरस पड़ा और रूद्र के लिंग को भिगोने लगा। आनंद की एक प्रबल सिसकारी उसके होंठों से निकल गयी। लेकिन रूद्र का प्रहार अभी भी जारी था - उसके हर धक्के के साथ ही साथ संध्या उछल जाती। उसको इस समय न तो अपने आस पास का अभिज्ञान था और न ही भौतिकता के किसी भी नियम का। पूर्ण आनंद से ओत प्रोत होकर संध्या इस समय अन्तरिक्ष की सैर कर रही थी।

 नीलम का परिप्रेक्ष्य:


नीलम का दिल एकदम से बैठ गया - 'दीदी उसी की तरफ देख रही है! क्या उसने मुझको देख लिया होगा? ऐसा लगता तो नहीं! अगर देखा होता तो शायद वो अपने आपको ढकने की कोशिश करती?' उसकी दृष्टि इस समय इस अत्यंत रोचक मैथुन के केंद्र बिंदु पर मानो चिपक ही गयी थी। जीजू का विकराल लिंग दीदी की छोटी सी योनि के अन्दर बाहर जल्दी जल्दी फिसल रहा था, और दीदी उसके हर धक्के से उछल रही थी, और आहें भर रही थी।




मेरा परिप्रेक्ष्य:


मैंने अचानक ही संध्या की योनि में चिकनाई बढती हुई देखी, जो की मेरे अगले धक्कों में ही मेरे लिंग के साथ बाहर आने लगी। संध्या के शरीर की थरथराहट, गहरी गहरी साँसे, पसीने की परत, यह सब एक ही और संकेत कर रहे थे, और वह यह की संध्या को चरम सुख प्राप्त हो गया है। लेकिन मेरी मंजिल अभी भी दो तीन मिनट दूर थी, इसलिए मैंने धक्के लगाना जारी रखा। कोई एक मिनट बाद संध्या के शरीर की थरथराहट काफी कम हो गयी और वह अपनी आँखें खोल कर मेरी तरफ देखने लगी। कुछ देर और धक्के लगाने के बाद मुझे अपने अन्दर एक परिचित दबाव बनता महसूस हुआ। मैंने तत्क्षण कुछ नया करने का सोचा। ठीक तभी जब मेरा स्खलन होने वाला था, मैंने अपना लिंग बाहर निकाल लिया और हाथ से अपने लिंग को पकड़ कर मैथुन जैसे गति देने लगा। संध्या ताज्जुब से मेरी इस हरकत को देखने लगी। उसके चेहरे के हाव भाव बड़ी तेजी से बदल रहे थे। मुझे उसको देख कर ऐसा लगा की उसको समझ आ गया है की मेरा प्लान अपने वीर्य को बाहर फेंकने का है। और यह एक निरादर भरा कार्य था।

वह कुछ कर या कह पाती उससे पहले ही मैंने अपने आप को छोड़ दिया - मेरे गर्म, सफ़ेद वीर्य के लम्बे मोटे डोरे उसके पेट और जाँघों पर छलक गए। वीर्य की कुछ छोटी छोटी बूँदें उसके योनि के बालों पर उलझ गईं। ऐसा करते हुए मेरी भरी हुई साँसों के साथ कराहें भी निकल गयीं - मेरे पाँव इस तरह कांपे की मुझे लगा की मैं अभी गिर जाऊँगा। मैंने पकड़ कर अपने आप को सम्हाला।

संध्या ने मेरे वीर्य से सने और रक्त वर्ण लिंग को देखा, फिर अपने पेट पर पड़े वीर्य को देखा और फिर बड़े अविश्वास से मेरी तरफ देखा। कुछ देर ऐसे ही घूरने के बाद उसने हाँफते हुए बोला,

"आपने ऐसे क्यों किया? मैंने आपको बोला था की आपका बीज मुझे मेरे अन्दर चाहिए!"

मैं अभी भी अपने आनंद के चरम पर था।

"जानेमन! सॉरी! आगे से सारा सीमन आपके अन्दर ही डालूँगा!"

मेरी बात सुन कर पहले तो उसको संतोष हुआ और फिर यह सोच कर की मेरा वीर्य लेने के लिए उसको सम्भोग करना पड़ेगा, उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया।

"इन द मीनटाइम, क्लीन दिस …" मैंने लिंग की तरफ इशारा करते हुए कहा।

संध्या मेरे यह कहने पर उठी और मेरे अर्ध उत्तेजित लिंग को अपने मुंह में लेकर चूसने लगी।




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FUN-MAZA-MASTI कामोन्माद -8

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 कामोन्माद -8  


"कोई नहीं है …." मैंने ख़ुशी ख़ुशी उद्घोषणा की, और वापस उसको चूमने में व्यस्त हो गया। मैंने देखा की संध्या ने अपने कुर्ते के बटन वापस नहीं लगाए थे, मतलब यह की वह भी तैयार थी। मैंने उसके कुर्ते के अन्दर हाथ डाल कर उसके स्तनों को हलके हलके से दबाया और फिर उसके कुर्ते को उसके शरीर से उतारने लग गया।

"वाकई कोई नहीं है न?" संध्या ने घबराई आकुलता से पूछा - अब तक कुर्ते का दामन उसके स्तनों के स्तर तक उठ चुका था।

मैंने उसको फिर से चूम लिया।

"यहाँ बस दो ही लोग आने वाले थे … जो की आ चुके हैं" मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

संध्या भी उत्तर में मुस्कुराई और मुस्कुराते हुए उसने अपने दोनों हाथ उठा दिए, जिससे मैं उसके कुर्ते को उतार सकूं। कुरता उतरते ही उसके सुन्दर और दिलचस्प स्तन दिखने लग गए। उसके निप्पल पहले ही खड़े हुए थे - या तो यह ठंडी हवा का प्रभाव था, या फिर कामुक उत्तेजना का। मैंने उसके स्तनों को अपने हाथों में समेट लिया। संध्या के दृदय के स्पंदन, उसके स्तनों की कोमलता और उसके निप्पलों के कड़ेपन को महसूस करके मुझे उसकी उत्तेजना का अनुमान हो गया। हम वापस अपने कामुक चुम्बनों के आदान प्रदान में व्यस्त हो गए।

संध्या की उत्तेजना बढती ही जा रही थी - वह मेरे चुम्बनों का उत्तर और भी भूखे चुम्बनों से दे रही थी। उसके होंठ मेरे होंठो को बुरी तरह चूम रहे थे, और अब उसके हाथ मेरे पजामे के नाड़े को टटोल कर खोलने की कोशिश कर रहे थे। उसकी इस हरकत से मुझे आश्चर्य हुआ।

'प्रकृति और उसके अजीब प्रभाव' मैंने मन ही मन सोचा।

नाडा खुलते ही मेरा पजामा नीचे सरक गया, और सामने अंडरवियर को उभारता हुआ मेरा लिंग दिखने लगा। ठंडी हवा से मेरे जांघो और अन्य संवेदनशील स्थानों पर रोंगटे खड़े हो गए। संध्या ने कल रात की दी हुई शिक्षा का पालन करते हुए मेरे अंडरवियर को नीचे सरका दिया। मेरा उत्तेजित लिंग अब मुक्त था। बिना कोई देर किये उसने लिंग को अपने गरम हाथो में पकड़ कर प्यार से सहलाने लगी। अब तक मैंने भी उसकी शलवार को नाड़े से मुक्त कर दिया था। मैं उससे अलग हुआ और उसकी चड्ढी और शलवार को एक साथ ही नीचे सरका कर उसके शरीर से अलग कर दिया। अब पूर्णतया अनावृत संध्या इस निर्जन प्राकृतिक सौन्दर्य का एक हिस्सा बन चुकी थी। मैंने भी अपना कुरता और अन्य वस्त्र तुरंत अपने शरीर से अलग कर दिए। हम दोनों ही अब पूर्णरूपेण नग्न हो गए थे - प्रेम-योग में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए।


संध्या की कशिश ही कुछ ऐसी थी की मैं उसके साथ कितनी भी बार सम्भोग कर सकता था। हमारे इस संक्षिप्त सम्बन्ध में मुझे संध्या के संग का आनंद आने लगा - उसके शरीर का भोग करना, उसके शरीर के हर अंग और उसकी हर भावनाओं का अन्वेषण करना - यह सब मुझे बहुत आनंद देने लग गया था। संध्या का हाथ मेरे लिंग पर था, और उसको सहला रहा था। मुझे उसकी इस क्रिया से आनंद आने लग गया। उसने ऐसा बस दस बारह सेकंड ही किया होगा की उसने अपना हाथ मेरे लिंग से हटा लिया और पत्थर पर लेट गयी - सम्भोग की मुद्रा में - अपनी टाँगे थोड़ा खोल कर।

"ये क्या है? छोड़ क्यों दिया?" मैंने उसको छेड़ा।

"आइये न!"क्या बात है!

"नहीं! ऐसे नहीं। कुछ अलग करते हैं!"

"अलग? क्या?"

"अरे! यह कोई ज़रूरी नहीं है की पीनस हमेशा वेजाइना के अन्दर ही जाए!"

"जी …. पीनस क्या होता है? और वो दूसरा आपने क्या कहा?"

"पीनस होता है यह," मैंने अपने लिंग को पकड़ कर दिखाया, "… और वेजाइना होती है यह …." मैंने उसकी योनि की तरफ इशारा किया।"अब समझ में आया आपको?"

"जी! आया …. लेकिन 'ये' 'इसके' अन्दर नहीं आएगा, तो … फिर …. कहाँ …. जाएगा?" संध्या थोड़ी अस्पष्ट लग रही थी।

"अगर बताऊँगा तो आप नाराज़ तो नहीं होंगी?"

"आप तो मेरे मालिक है … आपकी बात मानना मेरा फ़र्ज़ है!"

"हनी!" मैंने थोड़ा जोर देते हुए कहा, "मैं तुमको एक बात बोलना चाहता हूँ - और वह यह की किसी शादी में पति-पत्नी दोनों का दर्ज़ा बराबर का होता है। लिहाज़ा, कोई मालिक और कोई गुलाम नहीं हो सकता। और, सेक्स जितना मेरे मज़े के लिए है, उतना ही आपके मज़े के लिए है। इसलिए हम दोनों को ही अपने और एक-दूसरे के मज़े का ध्यान रखना होगा। समझी?"

"जी …. समझ गयी …. आप कुछ बताने वाले थे?"

"हाँ … मैं यह कह रहा था की क्यों न आज आप मेरे 'इसको', अपने मुंह में लें?"

"जीईई!!? मुंह में?"

"हाँ! अगर आप ऐसा करेंगी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा …. लेकिन तभी करियेगा, जब आपका मन करे। मैं कोई दबाव नहीं डालूँगा।"

"नहीं … दबाव वाली बात नहीं है। लेकिन …." बोलते बोलते संध्या रुक गयी।

"हाँ हाँ …. बताइए न?"


"जी … लेकिन माँ ने बोला था की.…" कहते कहते संध्या के गाल सुर्ख होने लगे।

मैंने उसको आगे बोलने का हौसला देते हुए सर हिलाया।

"यही की …. आपका … 'बीज' …… बेकार … खर्च न होने दूँ!" संध्या ने जैसे तैसे अपनी बात ख़तम की।

"ह्म्म्म! माँ ने ऐसा कहा?" संध्या ने सर हिलाया, "अच्छा, मुझे एक बात बताइए …." संध्या ने बड़े भोलेपन से मुझे देखा, "…. आपको इससे क्या समझ आया?"

उसने कुछ देर सोचा और कहा, "यही की आपका … वीर्य …. मेरे अन्दर …" वह शर्म से इतनी गड़ गयी की आगे कुछ नहीं बोल पायी।

"हाँ! लेकिन, वीर्य को 'अन्दर' लेने का सिर्फ यही तो एक रास्ता नहीं है …", संध्या मेरी बात को ध्यान से सुन रही थी, "…. जहाँ तक मुझे मालूम है, तीन रास्ते हैं - पहला तो यह की आप इसको अपनी योनि में जाने दें, जैसे की हमने पहले किया है," संध्या इस बात से शर्म से और भी लाल हो गयी, लेकिन मैंने अपनी बात कहनी जारी रखी, "दूसरा यह की 'इसको' आप अपने मुँह में लें, और जब मैं वीर्य छोड़ूँ तो आप उसको पी जाएँ …." संध्या का चेहरा अनिश्चितता और जुगुप्सा से थोडा विकृत हो गया, "… और तीसरा 'गुदा मैथुन'…"

"गुदा?" उसके पूछने पर मैंने उसके नितम्बों पर अपना हाथ फिराया।"

मतलब आपका लिंग मेरे पीछे! बाप रे!" वह थोडा सा रुकी, फिर बोली "न बाबा! मुझे नहीं लगता की यह 'वहां' पर फिट होगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा। उसने कहना जारी रखा, "क्या आप वहाँ डालना चाहते हैं?"

"देखो, कुछ लोग ऐसा करते हैं, और कुछ स्त्रियाँ इसको पसंद भी करती हैं - अगर ठीक ढंग से किया जाए तो!"

"आप.…?"

"अगर आप ट्राई करना चाहती हैं तो.…."

"जी …. मुझे नहीं मालूम। लेकिन अगर ठीक लगा तो कर भी सकती हूँ। आप मुझे वह सब बताइए जिससे मैं आपको खुश रख सकूं।"

"हनी! मैंने पहले ही कहा है, की यह सिर्फ मेरे लिए नहीं है - आपके लिए भी उतना ही है। आप मुझे खुश करना चाहती हैं, यह एक अच्छी बात है.. लेकिन, मैंने भी आपको खुश करना चाहता हूँ।"


इतना कह कर मैं चुप हो गया.. इस सारे वार्तालाप में मेरे लिंग का उत्थान जाता रहा.. संध्या ने मन ही मन में कुछ तय किया, और फिर हलकी कंपकंपी के साथ मेरे लिंग को अपने हाथ में ले लिया। उसकी छोटी छोटी उंगलिया मेरे लिंग के चारों तरफ लिपटी हुई थीं, जिनसे वो इसको कभी दबाती, तो कभी हलके से खींचती। वह कुछ देर तक यूँ ही खेलती रही - उसने मेरे वृषण को भी अपने हाथ में लिया - उनकी हलकी हलकी मालिश की और उनको कुछ इस प्रकार अपनी हथेली में उठाया जैसे की वह उनका भार जानना चाहती हो। फिर उसने लिंग की जड़ को पकड़ कर धीरे धीरे ऊपर-नीचे वाला झटका देने लगी - मेरे लिंग के आकार में अब तक खासा बढ़ोत्तरी हो चली थी।

संध्या ने मेरी तरफ एक शरारती मुस्कान फेंकी, "मुझे नहीं लगता की यह मेरे वहां पर फिट हो पायेगा।"

उसने मेरे लिंग के साथ छेड़-खानी करनी बंद नहीं करी। इस समय वह उसकी पूरी लम्बाई पर अपना हाथ फिरा रही थी, जिसके कारण मेरे शिश्न का शिश्नग्रच्छद पीछे सरक गया और उसका गुलाबी चमकदार हिस्सा दिखने लगा। उसने अचानक ही मेरे लिंग की नालिकपथ से रिसते हुए द्रव को देखा।

"ये यहाँ से क्या निकल रहा है?" उसने उत्सुकतावश पूछा।

"इसको 'प्री-कम' कहते हैं" मैंने बताया।

उसने कुछ देर मेरे लिंग को यूँ ही देखा, और फिर धीरे से आगे झुक कर, मानो एक प्रयोगात्मक तरीके से प्री-कम को चाट लिया, और फिर मेरी तरफ देखा। मैंने उस पर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली।

उसने मुस्कुराते हुए कहा, "थोड़ा नमकीन है …. लेकिन, आपका टेस्ट अच्छा है।"

फिर, थोड़ा रुक कर, "मुझे बताइये की आपको कैसा पसंद है?"

मुझे लगा की जैसे वह मुझसे पूछ रही हो की वह मुख-मैथुन कैसे करे।

मैंने पूछा, "आपने लोलीपॉप खाया है?" उसने हाँ में सर हिलाया।

"बस इस गुलाबी हिस्से को लोलीपॉप के जैसे ही चूसो और चाटो। आप चाहे तो लिंग का और हिस्सा भी अन्दर ले सकती हैं.…. लेकिन, ध्यान से - यह बहुत ही नाज़ुक होता है - दांत न लगने देना।

"संध्या ने समझते हुए अपनी जीभ पुनः बाहर निकाली और धीरे धीरे से मेरे लिंग के इस गुलाबी हिस्से को चारो तरफ से चाटा, और फिर इस प्रक्रिया में पुनः निकले हुए प्री-कम को चाट लिया। मेरे सात इंच लम्बे लिंग को बीच से पकड़ कर उसने अपने मुंह को धीरे धीरे खोलना शुरू किया। जब मेरा लिंग उसके मुंह के बिलकुल करीब आया, तब मुझे उसकी गरम साँसे अपने लिंग पर महसूस हुई। यह कुछ ऐसा संवेदन था, जिससे मुझे लगा की मैं अभी स्खलित हो जाऊँगा।
 अब उसके होंठ मेरे लिंग के गुलाबी हिस्से के करीब आधे भाग पर जम गए। संध्या बस एक पल को ठहरी, और फिर उसने लिंग को अपने मुँह में सरका लिया। मुझको एक जबरदस्त संवेदी अघात लगा। आप लोगो में जो लोग इतने भाग्यवान हैं, जिनको अपनी पत्नी या प्रेमिका से मुख-मैथुन का सुख मिला है, वो लोग यह बात समझ सकते हैं। और जिन लोगो को यह सुख नहीं मिला हैं, उनको अवश्य ही अपनी पत्नी या प्रेमिका से यह विनती करनी चाहिए। यह आघात था संध्या के गरमागरम मुंह में निगले जाने का.. और यह आघात था इस संज्ञान का की एक अति-सुन्दर किशोरी यह कर रही थी.… 


जैसा मैंने पहले भी बताया है, मेरा लिंग संध्या की कलाई से भी ज्यादा मोटा है। लिहाज़ा, यह बहुत अन्दर नहीं जा सकता था। संध्या ने भी यह अनुमान लगा लिया होगा की कितना अन्दर जा सकता था, क्योंकि उसने करीब करीब तीन इंच अपने मुंह में लिया होगा जब उसको घुटन सी महसूस हुई।

"बहुत ज्यादा अन्दर लेने की ज़रुरत नहीं है।" मैंने उसको कहा. उसने मेरे लिंग को मुंह में लिए लिए ही सर हिलाया, और धीरे धीरे अपनी जीभ को मेरे लिंग के सर और बाकी हिस्से पर फिरना शुरू कर दिया। मैंने महसूस किया की वह इसको थोड़ा चूस भी रही थी (उसके गाल वैसे ही हो रहे थे जैसा की चूसते समय होते हैं)…

"थोडा और तेज़!" मैंने उसको प्रोत्साहित किया। उसकी गति बढ़ गयी.. संध्या इसको हलके से चूसती और शिश्नाग्र को चुभलाती थी - जिससे मेरे लिंग का कड़ापन और बढ़ जा रहा था।

कभी कभी वो गलती से अपने दांतों से लिंग को हलके हलके काट भी रही थी और जोर जोर से चूस रही थी। इस चूषण का असर मेरे लिंग पर वैसा ही जैसे उसकी योनि की मांस-पेशियाँ मेरे लिंग पर कसती हैं। इस क्रिया में बीच बीच में संध्या मेरे शिश्नाग्र के छेद के अन्दर अपनी जीभ भी घुसाने का प्रयास कर रही थी। इसके कारण मुखो रह रह के बिजली के झटके जैसे लग रहे थे। मेरे गले से उन्माद की तेज़ आवाज़ छूट पड़ी, और पूरा शरीर थरथराने लगा।

कुछ ही समय बीता होगा की मुझे अपने वृषण पर वैसा ही एहसास हुआ जैसा स्खलन के पूर्व होता है.… संभवतः, संध्या ने भी यह महसूस किया होगा (हमारे प्रेम-मिलन के पूर्व अनुभव से उसको यह ज्ञान तो हो ही गया होगा)…. अब चूँकि वह मेरा 'बीज' नष्ट नहीं कर सकती थी, अतः उसको मेरा वीर्य पीना तय था!

इस संज्ञान से मेरा स्खलन बहुत ही तीव्र हुआ - मेरे गले से साथ ही साथ एक भारी कराह भी निकली। संभवतः उसको यह उम्मीद नहीं थी की मैं इस तीव्रता के साथ स्खलित होऊंगा। उसको थोड़ी सी उबकाई आ गयी, और इस कारण से मेरे दुसरे और तीसरे स्खलन का कुछ वीर्य उसके होंठो से बाहर ही छलक गया। लेकिन उसने अपने आपको संयत किया और आगे आने वाले स्खलनों को पी गयी। तत्पश्चात उसने मेरे लिंग को पम्प की तरह से चला कर बाकी बचा हुआ वीर्य भी निकाल कर गटक गयी।मेरे घुटने कमज़ोर होकर कांपने लगे - मुझे लगा की मैं अभी चक्कर खाकर गिर जाऊँगा।

ऐसा ख़याल आते ही, मैंने संध्या के दोनों कंधे थाम लिए, लेकिन फिर भी मेरे पैरों का कम्पन गया नहीं। संध्या ने मेरा लिंग अभी भी अपने मुंह से बाहर नहीं निकाला था, लेकिन अभी वह उसको बहुत ही नरमी से चूस रही थी। उसको संभवतः महसूस हुआ होगा की अब कुछ भी नहीं निकल रहा है - उसने मेरी तरफ देखा और अपने मुंह को मेरे लिंग से अलग कर के कहा, "मैंने ठीक से किया?"

मैंने हामी भरी तो उसने आगे कहा, "आपने कितना ढेर सारा छोड़ा! … आप अभी खुश हैं?"

"बहुत!" मैं बस इतना ही बोल पाया।

 वह खिलखिला कर हंस पड़ी.… मैं नीचे संध्या के बराबर आकर बैठ गया और उसको चूमने लगा। मुझे अपने वीर्य का स्वाद आने लगा.. लेकिन संध्या के स्वाद से मिलने के कारण मुझे ये अभी स्वादिष्ट लग रहा था। उसको चूमते हुए मैं उसकी पीठ सहलाने लगा - हवा की ठंडी के कारण उसकी त्वचा की सतह ठंडी हो गयी थी, लेकिन शरीर के अन्दर की गर्मी ख़तम नहीं हुई थी।

मुझे अचानक ही वातावरण की ठंडी का एहसास हुआ, तो मैंने उठ कर संध्या को अपने साथ ही उठा लिया और चट्टान पर अपने कपड़े बिछा कर फिर उसको बैठने को बोला।

जब वो बैठ गयी, तो मैंने कहा, "अब मेरी बारी है …. आपको खुश करने की!"

यह कहते हुए मैंने संध्या को हल्का सा धक्का देकर उस जुगाड़ी बिस्तर पर लिटा दिया, और उसके मुख को पूरी कामुकता के साथ चूमने लगा। मेरे मुख को जगह देने के लिए संध्या का मुख भी पूरी तरह से खुला हुआ था। उसकी जीभ मेरी जीभ के साथ टैंगो नृत्य कर रही थी। कुछ देर उसके मुख को चूमने के बाद मैंने उसके दाहिने कंधे को चूमना शुरू किया और उसके ऊपरी सीने को चूमते हुए उसके बाएँ स्तन पर आकर टिक गया। संध्या ने अपने हाथो की गोद बना कर मेरे सर को सहारा दिया, और मैंने उसके स्तन को शाही अंदाज़ में भोगना आरम्भ कर दिया - पहले मैंने उसके बाएं स्तन को चूसा, चूमा और दबाया, और फिर यही क्रिया उसके दायें स्तन पर की।

काफी समय स्तनों को भोगने के बाद मैं उसके धड़ को चूमते हुए उसके पेट तक आ गया। वहां मैंने उसकी नाभि के चारों तरफ अपनी जीभ से वृत्ताकार तरीके से चाटा, और फिर नाभि के अन्दर जीभ डाल कर कुछ देर चाटने का प्रोग्राम किया। मेरी इस हरकत से संध्या की खिलखिलाहट छूट गयी। इसके बाद मैंने उसको सरल रेखा में चूमना शुरू किया और उसकी योनि के दरार के एकदम शुरूआती को चूम लिया। संध्या के गले से आनंद की चीख निकल गयी और साथ ही साथ उसने अपने नितम्ब कुछ इस तरह उठा दिए जिससे उसकी योनि और मेरे मुख का संपर्क न छूटे! इस निर्जन स्थान में निर्बाध प्रेम संयोग करने के कारण वह बहुत ही आश्वस्त लग रही थी। लेकिन मैंने वह हिस्सा फिलहाल छोड़ दिया और उसके जांघ के भीतरी हिस्से को चूमने लगा। संध्या ने अपनी जांघे खोल दी - इस उम्मीद में की मैं उसकी योनि पर हमला करूंगा। मैंने देखा की संध्या की योनि के दोनों होंठ उसके काम-रस से भीग गए थे। मैंने उसके दाहिने पैर को उठाया और उसको चूमना शुरू किया - मैं उसकी पिंडली चूमते हुए टखने तक पहुंचा और उसके मेहंदी से सजे पैर को चूमा।

चूमते हुए मैंने उसके पैर के अंगूठे को कुछ देर चूसा भी।मेरे ऐसा करने से संध्या ने खिलखिलाते हुए अपना पैर वापस खीच लिया, और बोली, "गुदगुदी होती है!"मैंने फिर यही क्रिया उसके बाएं पैर पर करनी शुरू की। कुछ देर ऐसे ही खिलवाड़ करने के बाद मैं वापस जांघो के रास्ते होते हुए उसकी योनि की तरफ बढ़ने लगा। हाँलाकि, हम लोग पहले भी सम्भोग कर चुके थे, लेकिन संध्या की योनि का ऐसा प्रदर्शन नहीं हुआ था। दिन के उजाले में मुझे उसका आकार प्रकार ठीक से दिखा - उसकी योनि के मांसल होंठ उसके टांगों के बीच के हिस्से की तरफ झुके हुए थे और चिकने और स्थूल थे (जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ, इनका रंग सामन मछली के मांस के रंग का था)। इनके ऊपरी हिस्से में गुलाबी मूंगे के रंग का हुड था, जिसमे से उसका भगनासा दिख रहा था। संध्या की साँसे अब तक बहुत भारी हो चली थीं।

मैंने संध्या की टाँगे पूरी तरह से खोल दीं - उसके शरीर का लचीलापन मेरे लिए बहुत ही आश्चर्यजनक था! उसकी जांघे लगभग एक-सौ-साठ अंश तक खुल गयी थीं! मैंने अपनी जीभ से उसकी योनि के निचले हिस्से को ढंका और नीचे से ऊपर की तरफ चाटा - बहुत ही धीरे धीरे! जैसे ही मेरी जीभ का संपर्क उसके भगनासे से हुआ, उसकी सिसकी छूट गयी, और साथ ही साथ उसके शरीर में एक थरथराहट भी।

"हे भगवान!" वो बस इतना ही बोल पायी। लेकिन मेरे लिए यह काफी था।मैंने अपने मुख को वहां से हटाया और बैठे हुए ही अपने दोनों अंगूठों की सहायता से उसके योनि पुष्प की पंखुड़ियों को खोल कर उसके भगनासे को अनावृत कर दिया। उसकी योनि के अंदरूनी होंठ पतले थे और काफी छोटे थे। योनि-छिद्र गुलाबी लाल रंग का था, और उसका व्यास करीब करीब चौथाई इंच रहा होगा। उसकी योनि में से जिसमे दूधिया, लेकिन पारभासी द्रव रिस रहा था और योनि से होते हुए उसकी गुदा की तरफ जा रहा था।



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FUN-MAZA-MASTI कामोन्माद -7

FUN-MAZA-MASTI
 कामोन्माद -7
 

आप सभी ने तो देखा ही होगा - 'ब्लू फिल्मों' में हीरो कुछ इस तरह दिखाए जाते हैं की मानो वो चार-चार घंटे लम्बे यौन मैराथन को भी मजे में कर सकते हैं। और इतनी देर तक उनका लिंग भी खड़ा रहता है और उनकी टांगो और जांघों में ताकत शेष रहती है। संभव है की कुछ लोग शायद ऐसा करते भी होंगे, और उनकी स्त्रियों से मुझे पूरी सहानुभूति भी है। मुझे अपने बारे में मालूम था की मैं ऐसे मैराथन नहीं खेल सकता हूँ। वैसे भी मैं आज तक किसी भी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिला हूँ जिसने ऐसा दावा किया हो। खैर, यह सब कहने का मतलब यह है की मेरे लिए यह सब जल्दी ही ख़तम होने वाला था ....

मैंने ऊपर जा कर संध्या के होंठ चूमने शुरू कर दिए - हम दोनों ही कामुकता के उन्माद के चरम पर थे और एक दूसरे से उलझे जा रहे थे। संध्या की टाँगे मेरे कंधो पर कुछ इस तरह लिपटी हुई थी की मुझे कुछ भी करने से पहले उसकी टांगो को खोलना पड़ता। मैंने वही किया और उसके सामानांतर आकर उसको पकड़ लिया। ऐसा करने से मेरा उन्नत शिश्न अपने तय निशाने से जा चिपका।

मुझे लगता है की यौन क्रिया हम सभी को नैसर्गिक रूप में मिलती है - चाहे किसी व्यक्ति को वात्स्यायन की विभिन्न मुद्राओं का ज्ञान न भी हो, फिर भी स्त्री-पुरुष दोनों ही सेक्स की आधारभूत क्रिया से भली भाँति परिचित होते ही हैं। कुछ ऐसा ही ज्ञान इस समय संध्या भी दिखा रही थी। वह अभी भी कामुकता के सागर में गोते लगा रही थी और पूरी तरह से अन्यमनस्क थी। लेकिन उसका जघन क्षेत्र धीरे-धीरे झूल रहा था - कुछ इस तरह जिससे उसकी योनि मेरे लिंग के ऊपर चल फिर रही थी और उसके अनजाने में ही, मेरे लिंग को अपने रस से भिगो रही थी।

संध्या अचानक से रुक गयी - उसने अपनी पलकें खोल कर, अपनी नशीली आँखों से मुझे देखा। और फिर बिस्तर पर लेट गयी।

'कहीं यह आ तो नहीं गयी!' मेरे दिमाग में ख़याल आया। 'ये तो सारा खेल चौपट हो गया।'

मैं एक पल अनिश्चय की हालत में रुक गया और अगले ही पल संध्या ने लेटे-लेटे ही अपना हाथ बढ़ा कर मेरे लिंग को पकड़ लिया और उसको अपनी योनि की दिशा में खीचने लगी। मैं भी उसकी ही गति के साथ साथ चलता रहा। अंततः, वह मेरे लिंग को पकड़े हुए अपनी योनि द्वार पर सटा कर सहलाने लगी।

यह पूरी तरह से अविश्वसनीय था।

संध्या मुझे सेक्स करने के लिए खुद ही आमंत्रित कर रही थी!!

कामोन्माद का ऐसा प्रदर्शन!

वाह!

अब आगे जो मुझे करना था, वह पूरी तरह साफ़ था। मैंने बिलकुल भी देर नहीं की। संध्या को मन ही मन इस निमंत्रण के लिए धन्यवाद करते हुए मैंने उसको हौले से अपनी बाँहों में पकड़ लिया। ऐसा करने से उसके दोनों निप्पल (जो अब पूरी तरह से कड़क हो चले थे) मेरे सीने पर चुभने लगे। मैंने संध्या को फिर से कई बार चूमा - और हर बार और गहरा चुम्बन। चूमने के बाद, मैंने उसके नितम्बों को पकड़ कर हौले हौले दबा दिया; साथ ही साथ मैंने अपने पैरों को कुछ इस तरह व्यवस्थित किया जिससे मेरा लिंग, संध्या की योनि को छूने लगे।

मैंने लिंग को हाथ से पकड़ कर, पहले संध्या के भगनासे पर फिराया, और फिर वहां से होते हुए उसके भगोष्ठ के बीच में लगा कर अन्दर की यात्रा प्रारंभ की। मेरे लिंग की इस यात्रा में उसका साथ संध्या ने भी दिया। जैसे ही मैंने आगे की तरफ जोर लगाया, नीचे से संध्या ने भी जोर लगाया। इन दोनों प्रयासों के फलस्वरूप, मेरा लिंग, संध्या की योनि में कम से कम तीन चौथाई समां गया। संध्या की उत्तेजना इसी बात से प्रमाणित हो जाती है। मैंने संध्या की गर्मागरम, कसी हुई, गीली, रसीली योनि में और अन्दर सरकना चालू कर दिया। संध्या की आँखें बंद थी, और हम दोनों में से कोई भी कुछ भी नहीं बोल रहा था। लेकिन फिर भी, ऐसा लगता था मानो हम दोनों इस नए 'केबल-कनेक्शन' के द्वारा बतला रहे हों। इस समय शब्दों की कोई आवश्यकता नहीं थी। मैंने महसूस किया की मैं अपनी डार्लिंग के अन्दर पूरी तरह से समां गया हूँ।

इस छण में हम दोनों कुछ देर के लिए रुक गए - अपनी साँसे संयत करने के लिए। साथ ही साथ एक दूसरे के शरीर के स्पर्श का आनंद भी लेने के लिए। करीब बीस तीस सेकंड के आराम के बाद मैंने लिंग को थोडा बाहर निकाल कर वापस उसकी योनि की आरामदायक गहराई में ठेल दिया। संध्या की योनि के अन्दर की दीवारों ने मेरे लिंग को कुछ इस तरह कस कर पकड़ लिया जैसे की ये दोनों ही एक दूसरे के लिए ही बने हुए हों। अब मैंने अपने लिंग को उसकी योनि में चिर-परिचित अन्दर बाहर वाली गति दे दी। साथ ही साथ, हम दोनों एक दूसरे को चूमते भी जा रहे थे।

मेरी कामना थी की यह कार्य कम से कम दस मिनट तक किया जा सके, लेकिन मैं सिर्फ पच्चीस से तीस धक्कों तक ही टिक सका। अपने आखिरी धक्के में मैं जितना भी अन्दर जा सकता था, चला गया। शायद मेरे इशारे को समझते हुए संध्या ने भी अपने नितम्ब को ऊपर धकेल दिया। मेरा पूरा शरीर स्खलन के आनंद में सख्त हो गया - मेरे लिंग का गर्म लावा पूरी तीव्रता से संध्या की कोख में खाली होता चला गया। पूरी तरह से खाली होने के बाद मैंने संध्या को बिस्तर से उठा कर अपने से कस कर लिपटा लिया, और उसके कोमल मुख को बहुत देर तक चूमता रहा। यह आभार प्रकट करने का मेरा अपना ही तरीका था।

हम लोग कुछ समय तक ऐसे ही एक दूसरे के आलिंगन में बंधे हुए यौन क्रिया के आनंद रस पीते रहे, की अचानक संध्या कसमसाने लगी। मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि उसकी ओर डाली।

"क्या हुआ?"

"जी ... टॉयलेट जाना है ...." उसने कसमसाते हुए बोला।

जैसा की मैंने पहले ही बताया है, संध्या को सेक्स करने के बाद मूत्र विसर्जन का अत्यधिक तीव्र एहसास होता है। वैसे भी सुबह उठने के बाद सभी को यह एहसास तो होता ही है ... लिहाज़ा संध्या को और भी तीव्र अनुभूति हो रही थी। उसके याद दिलाने से मुझे भी टॉयलेट जाने का एहसास होने लगा। और इस कमरे से लगा हुआ कोई टॉयलेट नहीं था - मतलब अब तो कमरे से बाहर घर के अन्दर वाले बाथरूम में जाना पड़ेगा। इतनी सुबह तो बाहर बगीचे में तो जाया नहीं जा सकता न। वैसे भी अब उठने का समय तो हो ही गया था। आज के दिन कुछ पूजायें करनी थी, और उसके लिए नहाना धोना इत्यादि तो करना ही था।

हम दोनों ही उठ गए। मूर्खता की बात यह की हम दोनों के सामान इस कमरे में नहीं थे। संध्या ने न जाने कैसे कैसे अपने आप को सम्हाल कर साड़ी, पेटीकोट और ब्लाउज पहना। यह सब करते करते हम दोनों को कम से कम दस मिनट लग गए। इस बीच मैंने भी अपना कुरता और पजामा पहन लिया। उस बेचारी का इस समय बुरा हाल हो रहा होगा - एक तो सेक्स का दर्द और ऊपर से मूत्र का तीव्र एहसास! संध्या धीरे-धीरे चलते हुए दरवाज़े तक पहुंची। दरवाज़ा खोलने से पहले उसको कुछ याद आया, और उसने अपने सर को पल्लू से ढक लिया।

'हह! भारतीय बहुओं के तौर तरीके! ये लड़की तो अपने मायके से ही शुरू हो गयी!' मैंने मज़े लेते हुए सोचा।

"जाग गयी बेटा!" ये शक्ति सिंह थे ... अब उनको क्या बताया जाए की जाग तो बहुत देर पहले ही गए हैं। और ऐसा तो हो नहीं सकता की अपनी बेटी की कामुक कराहें उन्होंने न सुनी हो। संध्या प्रत्युत्तर में सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी। उसने जल्दी से बाथरूम की तरफ का रुख किया। संध्या के पीछे ही मैं कमरे से बाहर निकला।

"... आइये आइये .." मुझे देख कर उन्होंने कहना जारी रखा, "बैठिये .. नीलम बेटा, जीजाजी के लिए चाय लाओ ..... आप जल्दी से फ्रेश हो जाइये ... आज भी काफी सारे काम हैं।"

कम जान पहचान होने के कारण मैं मना नहीं कर सका। वैसे भी, गरम चाय इस ठण्डक में आराम तो देगी ही। अब मैंने अपने चारों तरफ नज़र दौड़ाई - घर में सामान्य से अधिक लोग थे। 'शादी-ब्याह का घर है', मैंने सोचा, '... सारे रिश्तेदार आये होंगे ..'

सभी लोग मेरी तरफ उत्सुकतापूर्वक देख रहे थे .. लेकिन अगर मेरी नज़र किसी की नज़र से मिलती तो वो तुरंत अपनी नज़र नीची कर लेते - मानो को कोई चोरी पकड़ी गयी हो। एक-दो औरतें लेकिन बड़ी ढिठाई से मुझे घूरे जा रही थी। मैंने उनको नज़रंदाज़ करना ही उचित समझा। शक्ति सिंह से आगे कोई बात नहीं हो पायी ... वो आगे के इंतजाम के लिए कमरे से बाहर चले गए थे। लिहाज़ा, अब मेरे पास चाय आने के इंतज़ार के अतिरिक्त और कोई काम नहीं बचा था।
 मुझे अब ठण्ड लगने लग गयी थी .. मेरे पास इस समय कोई गरम कपड़ा नहीं था। मेरा सामान कहीं नहीं दिख रहा था। 'इतनी ठण्ड में तो जान निकल जायेगी' मैंने सोचा।

"जीजू, आपकी चाय ...." यह सुन कर मेरी जान में जान आई।

"थैंक यू!" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

".. और ये है आपके लिए शाल!" नीलम ने बाल-सुलभ चंचलता के साथ कहा।

"नीलम! यू आर अन एंजेल! .... फ़रिश्ता हो तुम!" मैंने मुस्कुराते हुए मन से आभार प्रकट किया।


नीलम के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी।

"जीजू ... आपकी स्माइल मुझे बहुत पसंद है ..." नीलम ने चंचलता से कहना जारी रखा, "... और आपसे मैं एक बात कहूँ?"

"हाँ .. बोलो न" मैंने चाय की पहली चुस्की लेते हुए कहा।

"मैं आपको जीजू न बोलूँ तो चलेगा?"

"बिलकुल!"

"मैं आपको दाजू कहूँ?"

"कह सकती हो .. लेकिन इसका मतलब क्या होता है?"

"दाजू होता है बड़ा भाई ... आप मेरे बड़े भैया ही तो हैं न..." नीलम की इस स्नेह भरी बात ने मेरे ह्रदय के न जाने कैसे अनजान तार छेड़ दिए। मेरा मन हुआ की इस बच्ची को जोर से गले लगा लूँ! एक रोड-ट्रिप पर निकला था, और आज एक पूरा परिवार है मेरे पास!

नहा-धो कर मैंने नाश्ता किया - इस बीच संध्या मेरे सामने नहीं आई। वह अन्दर ही थी ... अपने परिजनों के साथ बात-चीत कर रही होगी। खैर, जब वह बाहर निकली, तो उसने नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी। बाकी का पहनावा कल के जैसा ही था। मैंने भी एक कुर्ता और चूड़ीदार पजामा पहना हुआ था। हम दोनों ने ही शाल ओढ़ा हुआ था। दिन में भी ठंडक काफी थी। आज की व्यवस्था यह थी की इस कसबे की मानी हुई संरक्षक देवी के दर्शन और पूजा-पाठ करनी थी। उनका मंदिर घर से कोई एक किलोमीटर दूर पहाड़ के ऊपर बना था। लिहाज़ा वहां पर जाने के लिए पैदल ही रास्ता था। अगर मुझे मालूम होता, तो संध्या को रात में इतना परेशान न करता। खैर, अब किया भी क्या जा सकता था।

पहाड़ी रास्ते पर चलते हुए मैंने संध्या से पूछा की क्या वह ठीक से चल पा रही है …. जिसका उत्तर उसने हाँ में दिया। कुछ देर चलते रहने के बाद मंदिर आया। वहां पंडित जी पहले से ही तैयार थे, और हमारे आते ही उनके मंत्रोच्चारण शुरू हो गए। कुछ देर में पूजा सम्पन्न हुई और हम लोग मंदिर के बाहर एक चौरस मैदान में आकर रुके। पंडित जी यहाँ भी आकर मंत्र पढने लगे और कुछ ही देर में उन्होंने मुझे एक पौधा दिया, और मुझे उसको रोपने को बोला। मुझे उस समय याद आया की उत्तराँचल में कुछ वर्षो से एक आन्दोलन जैसा चला हुआ है, जिसको "मैती" कहा जाता है।

आज के दौर में "ग्लोबल वार्मिंग" मानवता और धरती दोनों के लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभरा, ऐसे में मैती आंदोलन अपने आप में एक बड़ी मिसाल है। कुछ लोगों के लिए यह सिर्फ रस्म भर हो सकता हैं, लेकिन वास्तविकता में यह एक ऐसा भावनात्मक पर्यावरणीय आंदोलन है जिसे अगर व्यापक प्रचार मिले तो पर्यावरण प्रदूषित ही ना हो। इस रीति में शादी के समय वैदिक मंत्रेच्चार के बीच दूल्हा-दुल्हन द्वारा फलदार पौधों का रोपण किया जाता है। जब भी उत्तराँचल के किसी गांव में किसी लड़की की शादी होती है, तो विदाई के समय दूल्हा-दुल्हन को गांव के एक निश्चित स्थान पर ले जाकर फलदार पौधा लगवाया जाता है। दूल्हा पौधो को रोपित करता है और दुल्हन इसे पानी से सींचती है, फिर गाँव के बड़े बूढ़े लोग नव-दम्पत्ति को आशीर्वाद देते हैं।


मुझे पता चला की दूल्हा अपनी इच्छा अनुसार मैती संरक्षकों (जिनको मैती बहन कहा जाता है) को पैसे भी देता है, जो की रस्म के बाद रोपे गए पौधों की रक्षा करती हैं, खाद, पानी देती हैं, जानवरों से बचाती हैं। मैती बहनों को जो पैसा दूल्हों के द्वारा इच्छानुसार मिलता है, उसे रखने के लिए मैती बहनों द्वारा संयुक्त रूप से खाता खुलवाया जाता है। उसमें यह राशि जमा होती है। खाते में अधिक धानराशि जमा होने पर इसे गरीब बच्चों की पढ़ाई पर भी खर्च किया जाता है। 'ऐसे प्रयास के लिए तो मैं कितने ही पैसे दे सकता हूँ' मैंने सोचा, लेकिन उस समय मेरी जेब में इतने पैसे नहीं थे। इसलिए मैंने उन लोगो को घर पर अपने साथ बुलाया। वहां पर मैंने एक लाख रुपये का चेक काट कर उनको दिया। मुझे लगा की आज का दिन कुछ सार्थक हुआ। 

आज का कार्यक्रम अब समाप्त हो गया था, खाना-पीना करने के बाद अब मेरे पास कुछ भी करने को नहीं था। मुझे संध्या का साथ चाहिए था, लेकिन यहाँ पर लोगों का जमावड़ा था। जो भी अंतरंगता और एकांत मुझे उसके साथ मिला था, वह सिर्फ रात को सोते समय ही था। मैं उसके साथ कहीं खुले में या अकेले बिताना चाहता था। मैं अपनी कुर्सी से उठ कर अन्दर के कमरे में गया, जहाँ संध्या थी। मैंने देखा की अनगिनत औरतें और लड़कियां उसको घेर कर बैठी हुई थी। मुझे उनको देख कर चिढ़ हो गयी। मुझे वहां दरवाज़े पर सभी ने खड़ा हुआ देखा … संध्या ने भी। मैंने उसको इशारे से मेरी ओर आने को कहा। संध्या उठी, और अपना पल्लू ठीक करती हुई मेरी तरफ आई।

"जी?"

"संध्या … कहीं बाहर चलते हैं।"

"कहाँ?"

"मुझे क्या मालूम? आपका शहर है …. आपको जो ठीक लगे, मुझे दिखाइए …."

"लेकिन, यहाँ पर इतने सारे लोग हैं …"

"अरे! इनसे तो आप रोज़ मिलती होंगी। मुझे आपके साथ कुछ अकेले में समय चाहिए …"

संध्या के गाल यह सुन कर सुर्ख लाल हो गए। संभवतः, उसको रात और सुबह की याद हो आई हो।

"जी, ठीक है।"

"और एक बात, यह साड़ी उतार दीजिये।"

"जी???"

"अरे! मेरा मतलब है की शलवार कुरता पहन कर आओ। चलने फिरने में आसानी रहेगी। हाँ, मुझे आप शलवार कुर्ते में ज्यादा पसंद हैं …." मैंने उसको आँख मारते हुए कहा।

"जी, ठीक है। मैं थोड़ी देर में बाहर आ जाऊंगी।"
 मुझे नहीं पता की उसने शलवार कुर्ता पहन कर बाहर आने के लिए अपने घर में क्या क्या झिक झिक करी होगी, लेकिन क्योंकि यह आदेश मेरी तरफ से आया था, कोई उसका विरोध नहीं कर सका। संध्या ने हलके हरे रंग का बूटेदार शलवार कुर्ता और उससे मिलान किया हुआ दुपट्टा पहना हुआ था। उसके ऊपर उसने लगभग मिलते रंग का स्वेटर पहना हुआ था। इस पहनावे और लाल रंग की चूड़ियों में वह बला की खूबसूरत लग रही थी। इस समय दोपहर के डेढ़ बज रहे थे। ठंडक और दोपहर होने के कारण आस पास कोई लोग भी नहीं दिखाई दे रहे थे। अच्छी बात यह थी की ठंडी हवा नहीं चल रही थी, नहीं तो यूँ बाहर घूमने से तबियत भी बिगड़ सकती थी। संध्या मुझे मुख्या सड़क से पृथक, पहाड़ी रास्तों से प्रकृति के सुन्दर दृश्यों के दर्शन करने को ले गयी। कुछ देर तक पैदल चढ़ाई करनी पड़ी, लेकिन एक समय पर समतल मैदान जैसा भी आ गया। संध्या ने बताया की इसको बुग्याल बोलते हैं। इन चौरस घास के मैदानों में हरी घास और मौसमी फूलों की मानो एक कालीन सी बिछी हुई रहती है। यहाँ से चारों तरफ दूर-दूर तक ऊंचे-ऊंचे देवदार और चीड के पेड़ देखे जा सकते थे।

"क्या मस्त जगह है …" कहते हुए मैंने संध्या का हाथ थाम लिया, और उसने भी मेरा हाथ दृढ़ता से पकड़ लिया।

"मैं आपको अपनी सबसे फेवरिट जगह ले चलूँ?" संध्या ने उत्साह के साथ पूछा।

"बिलकुल! इसीलिए तो आपके साथ बाहर आया हूँ।"

इस समय अचानक ही किसी तरफ से करारी ठंडी हवा चली।

"अगर ऐसे ही हवा चलती रही तो ठंडक बढ़ जायेगी" मैंने कहा। संध्या ने सहमती में सर हिलाया।

"हाँ, इस समय तक पहाडो पर बर्फ गिरनी शुरू हो जाती है …. लेकिन अभी ठीक है… चार बजे से पहले लौट चलेंगे लेकिन, नहीं तो बहुत ठंडक हो जायेगी।" उसने कहा, और बुग्याल में एक तरफ को चलती रही। कोई पांच-छः मिनट चलने पर मुझे सामने की तरफ एक झील दिखने लगी। उसके बगल में ही एक झोपड़ा भी बना हुआ था। संध्या वहां जा कर रुक गयी। पास से देखने पर यह झोपड़ा नहीं, एक घर जैसा लग रहा था। कहने को तो एकदम वीरान जगह थी, लेकिन कितनी रोमांटिक! एक भी आदमी नहीं था आस पास।

"यहाँ मैं बचपन में कई बार आती थी …. यह घर मेरे दादाजी ने बनवाया था, लेकिन दादाजी के बाद पिताजी नीचे कस्बे में रहने लगे - वहां हमारी खेती है। पिछले दस साल से हम लोग यहाँ नहीं रहते हैं। लेकिन मैं यहाँ अक्सर आती हूँ। मुझे यह जगह बहुत पसंद है।"

"क्या बात है!" मैंने एक बाल-सुलभ उत्साह से कहा, "मैंने इससे सुन्दर जगह नहीं देखी …" मैंने रुकते हुए कहा, "और मैंने तुमसे सुन्दर लड़की आज तक नहीं देखी।"

संध्या उत्तर में हलके से मुस्कुरा दी। घर के सामने, झील के लगा हुआ पत्थर का बैठने का स्थान बना हुआ था। हम दोनों उसी पर बैठ गए। इसी समय बदल का एक छोटा सा टुकड़ा सूरज के सामने आ गया और एक ताज़ी बयार भी चली। मौसम एकदम से रोमांटिक हो चला। ऐसे में एक सुन्दर सी झील के सामने, अपनी प्रेमिका के साथ बैठ कर आनंद उठाना अत्यंत सुखद था।
 मेरे मन में एक कल्पना थी - और वह यह की खुले में - संभवतः किसी खेत में या किसी एकांत, निर्जन जगह में - सम्भोग करना। यह स्थान कुछ वैसा ही था। वैसे यह बहुत संभव था की गाँव और कसबे का कोई व्यक्ति यहाँ आ सकता, लेकिन मेरे हिसाब से इस समय और इस मौसम में यह होने की सम्भावना थोड़ी कम थी। यह देख कर मेरे दिमाग में अपनी कल्पना को मूर्त रूप देने की संभावना जाग उठी। ताज़ी, सुगन्धित हवा ने मेरे अन्दर एक नया जोश भर दिया था।

मैंने संध्या की छरहरी कमर में अपनी बाँह डाल कर उसको अपने से चिपटा लिया। संध्या भी बहुत ही मुश्किल से मिले इस एकांत का आनंद उठाना चाहती थी - वह भी मुझसे सिमट सी गयी। मैंने अपना गाल, संध्या के गाल से सटा दिया और सामने के सुन्दर दृश्य का आनंद लेने लगा। ऐसे सुन्दर पर्वतों की गोद में, दुनिया के भीड़-भाड़ से दूर …. यह एक ऐसी दुनिया थी, जहाँ जीवन पर्यन्त रहा जा सकता था।

"आई लव यू" मैंने कहा और संध्या के गाल को चूम लिया। संध्या ने फिर से मुझे अपनी भोली मुस्कान दिखाई। उसके ऐसा करते ही मैंने उसके मुखड़े को अपनी बाँहों में भरा और उसके सुन्दर कोमल होंठों को चूम लिया। मैंने उसको विशुद्ध प्रेम और अभिलाषा के साथ चूम रहा था। संध्या मेरे लिए पूरी तरह से "परफेक्ट" थी। हाँलाकि वह अभी नव-तरुणी ही थी, और उसके शरीर के विकास की बहुत संभावनाएं थी। मुझे उसके शरीर से बहुत लगाव था - लेकिन मेरे मन में उसके लिए प्रेम सिर्फ शारीरिक बंधन से नहीं बंधा हुआ था, बल्कि उससे काफी ऊपर था। लेकिन यह सब कहने का यह अर्थ नहीं है की मुझे उसके शरीर के भोग करने में कोई एतराज़ था। मैं उससे जब भी मौका मिले, प्रेम-योग करने की इच्छा रखता था। संध्या मेरे चुम्बन से पहले तो एकदम से पिघल गयी - उसका शरीर ढीला पड़ गया। उसकी इस निष्क्रियता ने असाधारण रूप से मेरे अन्दर की लालसा को जगा दिया।

मैंने उसके होंठो को चूमना जारी रखा - मेरे मन में उम्मीद थी की वह भी मेरे चुम्बन पर कोई प्रतिक्रिया दिखाएगी। मुझे बहुत इंतज़ार नहीं करना पड़ा। उसने बहुत नरमी से मेरे होंठो को चूमना शुरू कर दिया, और मुझे अपनी बांहों में बाँध लिया। मैंने उसको अपनी बांहों में वैसे ही पकड़े रखा हुआ था, बस उसको अपनी तरफ और समेट लिया। हम दोनों के अन्दर से अपने इस चुम्बन के आनंद की कराहें निकलने लगीं। पहाड़ की ताज़ी, सुगन्धित हवा ने हम दोनों के अन्दर स्फूर्ति भर दी।

न जाने कैसे और क्यों मैंने इन चुम्बनों के बीच संध्या के स्वेटर को उसके शरीर से उतार दिया। संध्या पहाड़ो पर ही पली बढ़ी थी - यह ठंडक वस्तुतः उसके लिए सुखदायक थी। स्वेटर तो उसने बस किसी अप्रत्याशित ठंडक से बचने के लिए पहना हुआ था। ठंडी ताज़ी बयार के सुख से संध्या के मुंह से सुख वाली आह निकल गयी। मैंने उसको पुनः चूमना शुरू कर दिया और साथ ही साथ उसके कुर्ते के ऊपरी बटन खोलने लगा। मुझे ऐसा करते देख कर संध्या चुम्बन तोड़ कर पीछे हट गयी।

"रुकिए! प्लीज!" उसने अपनी आँखें सिकोड़ते हुए कहा, "… यहाँ नहीं। अगर कोई देख लेगा तो?"

"मुझे नहीं लगता यहाँ कोई इस समय आएगा।"

"लेकिन दिन में ….?"

"क्यों? दिन में क्या बुराई है? सब कुछ साफ़ साफ़ दिखता है!" मैंने शैतानी भरा जवाब दिया।

"आप भी न … आपकी बीवी को अगर कोई ऐसी हालत में देखेगा तो क्या आपको अच्छा लगेगा?"

"ह्म्म्म … इस बारे में सोचा नहीं कभी। लेकिन अभी लग रहा है की मेरी इतनी सेक्सी बीवी है, तो क्या ही बुराई है?" मैंने उल्टा जवाब देना जारी रखा।

"प्लीज …." संध्या ने विनती की। लेकिन मेरे हाथ तब तक उसके कुर्ते के सारे बटन खोल चुके थे (सिर्फ तीन बटन ही तो थे)।

उसने हथियार डाल ही दिए, "अच्छा ठीक है … लेकिन प्लीज एक बार देख लीजिये की कोई आस पास नहीं है।" वो बेचारी मेरी किसी भी बात का विरोध नहीं कर रही थी।

"ओके स्वीट हार्ट!" मैंने अनिच्छा से उससे अलग होते हुए कहा। मैंने जल्दी से चारों तरफ का सर्वेक्षण किया। वैसे मेरे ऐसा करने का कोई फायदा नहीं था। मुझे पहाड़ी इलाको की कोई जानकारी नहीं थी। कोई भी व्यक्ति, जो इस इलाके का जानकार हो, अगर चाहे तो बड़ी आसानी से मेरी दृष्टि से बच सकता था। मुझे यह पूरा काम समय की बर्बादी ही लग रहा था। मैं जल्दी ही वापस आ गया।

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