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Wednesday, April 21, 2010

सेक्स स्लेव्स अंजलि की दास्तान पार्ट--3

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अंजलि की दास्तान पार्ट--3

गतांक से आगे.......................
"ऊऊउउउउउउईईई माआ मेयारगॅयेयियीयेयी" मैं पूरी ताक़त से चीख उठी.
" जा जाकर गवलेकर के लिए शराब का एक पेग बना ला. और टेबल तक
घुटनो के बल जाएगी समझी." क़य्यूम ने तेज आवाज़ मे कहा. इतनी
जलालत तो शायद किसी को नहीं मिली होगी. मैं हाथों और घुटनो के
बल डाइनिंग टेबल तक गयी. मेरी चूचिया पके अनरों की तरह झूल
रही थी. मैं उसके लिए एक पेग बना कर लौट आई.
" गुड अब कुच्छ पालतू होती लग रही है."
गोवेलेकर ने मेरे हाथ से ग्लास लेकर मुझे खींच कर वापस अपने
गोद मे बिठा लिया. फिर मेरे होंठों से ग्लास को च्छुअते हुए कहा "ले
एक सीप कर." मैने अपना चेहरा मोड़ लिया. मैने जिंदगी मे कभी
शराब को हाथ भी नहीं लगाया था. हमारे घरों मे ये सब चलता
था मगर मेरे ब्रिज ने भी कभी शराब को नहीं च्छुआ था.
उसने वापस ग्लास मेरे होंठों से लगाया. मैने साँस रोक कर थोडा सा
अपने मुँह मे लिया. बदबू इतनी थी की उबकाई आने लगी. वो नाराज़
होज़ाएँगे सोच कर जैसे तैसे उसे पी लिया.
" और नहीं. प्लीज़, मैं आपलोगों को कुच्छ भी करने से नहीं रोक
रही. ये काम मुझसे नहीं होगा" पता नहीं दोनो को क्या सूझा की
फिर उन्हों ने मुझे पीने के लिए ज़ोर नहीं किया.
गोवलेकर मेरे बदन पर हाथ फेरराहा था. मेरे स्तनों को चूम रहा
था और अपना ग्लास खाली कर रहा था. मुझे फिर अपनी गोद से उतार कर
ज़मीन पर बिठा दिया. मैने उसके पॅंट की ज़िप खोली और उसके लिंग को
निकाल कर उसे मुँह मे ले ली. अपने एक हाथ से क़य्यूम के लिंग को
सहला रही थी. बारी बारी से दोनो लिंग को मुँह मे भर कर कुच्छ देर
तक चूस्टी और दूसरे के लिंग को मुट्ठी मे भर कर आगे पीछे
करती.फिर यही काम दूसरे के साथ करती. काफ़ी देर तक दोनो शराब
पीते रहे फिर गोवलेकर उठ कर मुझे एक झटके से गोद मे उठा लिया
और बेड रूम मे ले गया. बेडरूम मे आकर मुझे बिस्तर पर पटक दिया.
क़य्यूम भी साथ साथ आ गया था. वो तो पहले से ही नग्न था. गोवलेकर
भी अपने अक्पडे उतारने लगा. मैं बिस्तर पर लेटी उसको अपने कपड़े उतार
ते देख रही थी. मैने उनके अगले कदम के बारे मे सोच कर अपने आप
अपने पैर फैला दिए. मेरी योनि बाहर दिखने लगी. गोवलेकर का लिंग
क़य्यूम की तरह ही मोटा और काफ़ी लंबा था. उसने अपने कपड़े वहीं फेक
कर बिस्तर पर चढ़ गया. मैं उसके लिंग को हाथ मे लेकर अपनी योनि की
ओर खींची. मगर वो आगे नहीं बढ़ा. उसने मुझे बाहों से पकड़ कर
उल्टा कर दिया और मेरे नितंबों से चिपक गया. अपने हाथों से दोनो
नितंबों को अलग कर के छेद पर उंगली फिराने लगा मैं उसका इरादा
समझ गयी कि वो मेरे गुदा को फाड़ने का इरादा बनाए हुए है. मैं
डर से चिहुनक उठी क्योंकि इस ओर मैं अभी तक अंजान थी. सुना था की
अप्राकृतिक मैथुन मे बहुत दर्द होता है. और गावलेकर का इतना मोटा
लिंग कैसे जाएगा ये भी सोच रही थी. क़य्यूम ने उसकी ओर क्रीम का एक
डिब्बा बढ़ाया. उसने ढेर सारा क्रीम लेकर मेरे पिच्छाले छेद पर
लगा दिया फिर एक उंगली से उसको छेद के अंदर तक लगा दिया. उंगली के
अंदर जाते ही मैं उच्छल पड़ी. पता नही आज मेरी क्या दुर्गति होने
वाली थी. इन आदमख़ोरों से रहम की उम्मीद करना बेवकूफी थी.
क़य्यूम मेरे चेहरे के सामने आकर मेरा मुँह ज़ोर से अपने लिंग पर दाब
दिया. मैं च्चटपटा रही थी तो उसने मुझे सख्ती से पकड़ रखा था.
मुँह से गूओं गूओं की आवाज़ ही निकल परही थी. गवलेकर ने मेरे
नितंबों को फैला कर मेरे गुदा द्वार पर अपना लिंग सताया. फिर आगे की
ओर एक तेज धक्का लगाया.उसके लिंग के आगे के हिस्सा मेरे पिछे जगह
बनाते हुए धँस गया. मेरी हालत खराब हो रही थी. आँखें बाहर
की ओर उबाल कर आ रही थी. कुच्छ देर उसी पोज़िशन मे रुका रहा दर्द
हल्का सा कम हुआ तो उसने दुगने वेग से एक और धक्का लगाया. मुझे
लगा मानो कोई मोटा मूसल मेरे अंदर डाल दिया गया हो. वो इसी तरह
कुच्छे देर तक रुका रहा. फिर उसने अपने लिंग को हरकत दे दी. मेरी
जान निकली जा रही थी. वो दोनो आगे और पीछे से अपने अपने डंडों
से मेरी कुटाई किए जा रहे थे. धीरे धीरे दर्द कम होने लगा. फिर
तो दोनो तेज तेज धक्के मारने लगे. दोनो मे मानो कॉंपिट्षन हो रही
थी कि कौन देर तक रुकता है. मगर मेरी हालत की किसे चिंता थी.
क़य्यूम के स्टॅमिना की तो मैं लोहा मानने लगी. तकरीबन घंटे भर
बाद दोनो ने अपने अपने लिंग से पिचकारी छोड़ दी. मेरे दोनो छेद
टपकने लगे.
फिर तो रात भर ना तो खुद सोए ना मुझे सोने दिया. सुबह तक तो मैं
भाव शून्य हालत मे हो गयी थी.
सुबह दोनो मुझे जिस्म को जी भर कर नोचने के बाद चले गये. जाते
जाते क़य्यूम अपने नौकर से कह गया.
` इसे गर्म गर्म दूध पीला. इसकी हालत थोड़ा ठीक हो तो घर पर
च्छुड़वा देना. और तू भी कुच्छ देर चाहे तो मुँह मारले `
मैं बिस्तर पर बिना किसी हुलचूल के पड़ी थी. टाँगें फैली हुई
थी. तीनों छेदों पर वीर्य के निशान थे. पूरे बदन पर अनगिनत
दाँतों के और वीर्य के निशान पड़े हुए थे. स्तन और निपल सूजे
हुए थे. कुच्छ यही हालत मेरी योनि की भी हो रही थी.
फटी फटी आँखों से दोनो को देख रही थी.
` तू घर जा तेरे पति को दो एक घंटों मे रिहा कर दूँगा' गवलकर्
ने पॅंट पहनते हुए कहा `भाई क़य्यूम मज़ा आ गया. क्या पटाखा ढूँढ
लाया है. तबीयात खुश हो गयी. हम अपनी बातों से फिरने वाले
नहीं हैं. तुझे कभी भी मेरी ज़रूरत पड़े तो जान हाजिर है.'
क़य्यूम मुस्कुरा दिया. फिर दोनो तैयार होकर निकल गये.
मैं वैसी ही नग्न पड़ी रही बिस्तर पर. तभी भीमा दूध का ग्लास लेकर आया और मुझे सहारा देकर उठाया. मैने उसके हाथों से दूध का ग्लास ले
लिया. उसने मुझे एक पेन किल्लर भी दिया. मैने दूध का ग्लास खाली
कर दिया. उसने खाली ग्लास हाथ से लेकर मेरे होंठों पर लगे दूध
को अपनी जीभ से चाट कर सॉफ कर दिया. कुच्छ देर तक मेरे होंठों
को चूमता रहा और मेरे बदन पर आहिस्ता से हाथ फेरता रहा. फिर वो
उठा और डेटोल लाकर मेरे ज़ख़्मों पर लगा दिया. अब मेरे शरीर मे
कुच्छ जान महसूस कर रही थी. फिर कुच्छ देर बाद आकर मुझे सहारा
देकर उठाया और मेरे बदन को बाहों मे भर कर मुझे उसी हालत मे
बाथरूम मे ले गया. वहाँ काफ़ी देर तक उसने मुझे गर्म पानी से
नहलाया. बदन पोंच्छ कर मुझे बिस्तर पर ले गया. मुझे मेरे कपड़े
लाकर दिया. वो जैसे ही जाने लगा. मैने उसका हाथ पकड़ लिया. मेरे
आँखों मे उसके लिए क्रितग्यता के भाव थे. मैं उसके करीब आकर उसके
बदन से लिपट गयी.
मैं तब बहुत हल्का महसूस कर रही थी. मैं खुद ही उसका हाथ
पकड़ कर बिस्तर पर ले गयी. मैने उस से लिपटे हुए ही उसके पॅंट
की तरफ हाथ बढ़ाया. मैं उसके अहसानों का बदला चुका देना चाहती
थी. वो मेरे होंठों को, मेरी गर्दन को, मेरे गालों को चूमने लगा.
मेरे स्तनों पर हल्के से हाथ फिराने लगा.
« प्लीज़ मुझे प्यार करो. इतना प्यार करो कि कल रात की घटनाएँ
मेरे दिमाग़ से हमेशा के लिए उतर जाएँ. » मैं बेतहासा रोने लगी.
वो मेरे एक एक अंग को चूम रहा था. एक एक अंग को सहलाता प्यार करता.
उसके होंठ फूलों की पंखुड़ियों की तरह पूरे बदन पर महसूस कर
रही थी. अब मैं खुद ही गर्म होने लगी मैं खुद ही उस से लिपटने
लगी उसे चूमने लगी. उसका हाथ मैने अपने हाथों मे लेकर अपनी योनि
पर रख दिया. वो मेरी योनि को सहलाने लगा. फिर उसने मुझे बिस्तर के
कोने पर बिठा कर मेरे सामने घुटनो के बल मूड गया. मेरे दोनो
पैरों को अपने कंधे पर चढ़ा कर मेरी योनि पर अपने होंठ चिपका
दिए. उसकी जीभ साँप की तरह सरसरती हुई. उसकी मुँह से निकाल कर
मेरी योनि मे प्रवेश कर गयी. मैने उसके सिर को अपने हाथों मे ले
रखा था. उत्तेजना मे मैं उसके बालों को सहला रही थी उसके सिर को
योनि पर दाब रही थी. मेरे मुँह से सिसकारियाँ निकल रही थी.
कुच्छ देर मे मैं तो अपनी कमर उचकाने लगी. और उसके मुँह पर ही
ढेर हो गयी. मेरे शरीर से मेरा सारा विसाद मेरे वीर्य के रूप
मे निकल्ने लगा. वो मेरे वीर्य को अपने मुँह मे खींचता जा रहा
था. कल से इतनी बार मेरे साथ संभोग हुआ कि मैं गिनती ही भूल
गयी मगर आज भीमा की हरकतों सेअब मेरा खुल कर वीर्यापत हुआ.
भीमा के साथ मैं पूरे दिल से संभोग कर रही थी. इसलिए अच्च्छा
भी लग रहा था. मैने उसे बिस्तर पर पटका और उसके ऊपर सवार हो
गयी. उसके बदन से कपड़ों को नोच कर हटा दिया. उसका मोटा ताज़ा लिंग
तना हुआ खड़ा था. काफ़ी बालिस्त बदन था. मैं उसके बदन को चूमने
लगी. वो उठने की कोशिश किया तो मैने गुर्र्राटे हुए कहा,
« चुप चाप पड़ा रह. मेरे बदन को भोगना चाहता था ना तो फिर भाग
क्यों रहा है. ले भोग मेरे बदन को »
मैने उसे चित लिटा दिया और उसके लिंग के उपर अपनी योनि रखी. अपने
हाथों से उसके लिंग को सेट किया और उसके लिंग पर बैठ गयी. उसका
लिंग मेरी योनि की दीवारों को चूमता हुआ अंदर चला गया. फिर तो मैं
उसके लिंग पर उठने-बैठने लगी. मैने सिर पीछे की ओर झटक दिया
और अपने हाथों को उसके सीने पर फिराने लगी. वो मेरे स्तनों को
सहला रहा था. मेरे निपल्स को उंगलियों से इधर उधर घुमा रहा
था. निपल्स भी एग्ज़ाइट्मेंट मे खड़े हो गये थे. काफ़ी देर तक इस
पोज़िशन मे करने के बाद मुझे वापस नीचे लिटा कर मेरे टाँगों को
अपने कंधे पर रख दिया. इस से योनि उपर की ओर हो गयी. अब लिंग
योनि मे जाता हुआ सॉफ दिख रहा था. हम दोनो उत्तेजित हो कर एक साथ
झार गये. वो मेरे बदन पर ही लुढ़क गया और तेज तेज साँसें लेने
लगा. मैने उसके होंठों पर एक प्यार भरा चुंबन दिया. फिर नीचे
उतर कर तैयार हो गयी. भीमा मुझे घर तक छोड़ आया.
दोपहर तक मेरे पति रिहा होकर घर आ गये. क़य्यूम ने अपना बयान
बदल लिया था. मैने उन्हें उनके जमानत की कीमत नहीं बताई.
मगर अगले दिन ही उस कंपनी को छोड़ कर वहाँ से वापस जाने का
मैने एलान कर दिया. ब्रिज ने भले ही कुच्छ नहीं पूचछा मगर
शायद उसे भी उसकी रिहाई की कीमत की भनक पड़ गयी थी. इसलिए
उसने भी मुझे ना नहीं किया और हम कुच्छ ही दिन मे अपना थोड़ा बहुत
समान पॅक करके वो सहर छोड़ कर वापस जालंधर आ गये.












आपका दोस्त राज शर्मा
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj

































































































































































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सेक्स स्लेव्स अंजलि की दास्तान पार्ट--2

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अंजलि की दास्तान पार्ट--2

गतांक से आगे.......................

मैं उसके पास आकर खड़ी हो गयी. उसने अपने हाथों से मेरी योनि को
कुच्छ देर तक मसला फिर पॅंटी को नीचे करता चला गया. आब मैं
पूरी तरह नंगी हो कर उसके सामने खड़ी थी.
"राजे जा और मेरा कॅमरा उठा ला" मैं घबरा गयी.
"आपने जो चाहा मैं दे रही हूँ फिर ये सब क्यूँ"
"तुझे मुह्न खोलने के लिए मना किया था ना"
एक आदमी एक मूवी कॅमरा ले आया. उन्हों ने सेंटर टेबल से सारा समान
हटा दिया. क़य्यूम मेरी योनि पर हाथ फिरा रहा था. मेरे योनि पर
रेशमी घुंघराले बालों को सहला रहा था.
" चल बैठ यहाँ" उसने सेंटर टेबल की ओर इशारा किया.
मैं सेंटर टेबल पर बैठ गयी. उसने मेरी टाँगों को ज़मीन से उठा
कर टेबल पर रखने को कहा. मैने वैसा ही किया.
" अब टाँगें चौरी कर" मैं शर्म से दोहरी हो गयी मगर मेरे पास
और कोई रास्ता नहीं था. मैने अपनी टाँगों को थोड़ा फैलाया.
" और फैला" मैने टाँगों को उनके सामने पूरी तरह फैला दिया. मेरी
योनि उनके आँखों के सामने बेपर्दा थी. योनि के दोनो लब खुल गये
थे. मैं चारों के सामने योनि फैला कर बैठी हुई थी. उनमे से एक
मेरी योनि की तस्वीरें ले रहा था.
" अपनी चूत मे उंगली डाल कर उसको चौड़ा कर." क़य्यूम ने कहा. वो अब
अपनी तहमद खोल कर अपने काले मूसल जैसे लिंग पर हाथ फेर रहा
था. मैं तो उसके लिंग को देख कर ही सिहर गयी. गधे जैसा इतना
मोटा और लंबा लिंग मैने पहली बार देखा था. लिंग भी पूरा काला
था. मैं अपनी योनि मे उंगली डाल कर उसे सबके सामने फैला दिया.
चारों हँसने लगे.
"देखा मुझसे पंगा लेने का अंजाम. बड़ा गुरूर था इसको अपने रूप
पर. देख आज मेरे सामने कैसे नंगी अपनी योनि फैला कर बैठी हुई
है." क़य्यूम ने अपनी दो मोटी मोटी उंगलियाँ मेरी योनि मे घुसा दी.
मैं एक दम से सिहर उठी. मैं भी अब गरम होने लगी थी. मेरा दिल तो
नहीं चाह रहा था मगर जिस्म उसकी बात नहीं सुन रहा था.
उसकी उंगलियाँ कुच्छ देर तक अंदर खलबली मचाने के बाद बाहर
निकली तो योनि रस से चुपड़ी हुई थी. वो अपनी उंगलिओ को अपनी नाक
तक ले जाकर सूँघा फिर सब को दिखा कर कहा,
"अब ये भी गरम होने लगी है." मेरे होंठों पर अपनी उंगलियाँ छुआ
कर कहा. "ले चाट इसे."
मैने अपनी जीभ निकाल कर अपने कामरस को पहली बार चखा. सारे
एक दम से मेरे बदन पर टूट पड़े. कोई मेरी चूचियो को मसल रहा
था तो कोई मेरी योनि मे उंगली डाल रहा था. मैं उनके बीच मे
छटपटा रही थी. क़य्यूम ने सबको रुकने का इशारा किया. मैने देखा
उसके कमर से तहमद हटी हुई है. और कला भुजंग सा लिंग तना हुआ
खड़ा है.
उसने मेरे सिर को पकड़ा और अपने लिंग पर दाब दिया.
"इसे ले अपने मुँह मे" उसने कहा"मुँह खोल."
मैने झिझकते हुए अपना मुँह खोला तो उसका लिंग अंदर घुसता चला
गया. बड़ी मुश्किल से ही उसके लिंग के उपर के हिस्से को मुँह मे ले पा
रही थी. वो मेरे सिर को अपने लिंग पर दाब रहा था. उसका लिंग गले
के द्वार पर जाकर फँस गया. मेरा दम घुटने लगा मैं च्चटपटा रही
थी. उसने अपने हाथों का ज़ोर मेरे सिर से हटाया. कुच्छ सेकेंड्स के
लिए कुच्छ राहत मिली तो मैने अपना सिर उपर खींचा. लिंग के कुच्छ
इंच बाहर निकलते ही उसने वापस मेरा सिर दबा दिया. इस तरह वो मेरे
मुँह मे अपना लिंग अंदर बाहर करने लगा. मैने कभी मुख मैथुन
नहीं किया था इसलिए मुझे शुरू शुरू मे काफ़ी दिक्कत हुई. उबकाई सी
आ रही थी. धीरे धीरे उसके लिंग की अभ्यस्त हो गयी. अब मेरा
शरीर भी गर्म हो गया था. मेरी योनि गीली होने लगी.
बाकी तीनों मेरे बदन को मसल रहे थे. मुख मैथुन करते करते
मुँह दर्द करने लगा था मगर वो था कि छोड़ ही नहीं रहा था. कोई
बीस मिनिट तक मेरे मुँह को चोदने के बाद उसका लिंग झटके खाने
लगा. उसने अपना लिंग बाहर निकाला.
" मुँह खोल कर रख." उसने कहा. मैने मुँह खोल दिया. ढेर सारा
वीर्य उसकी लिंग से तेज धार सी निकल कर मेरे मुँह मे जा रही थी.
जिसे एक आदमी मूवी कॅमरा मे क़ैद कर रहा था जब मुँह मे और आ नही
पाया तो काफ़ी सारा वीरया मुँह से छतियो पर टपकने लगा. उसने
कुच्छ वीर्य मेरे चेहरे पर भी टपका दिया.
" बॉस का एक बूँद वीर्य भी बेकार नहीं जाए" एक चम्चे ने कहा.
उसने अपनी उंगलियों से मेरी छातियो एवं मेरे चेहरे पर लगे वीर्य
को समेट कर मेरे मुँह मे डाल दिया. मुझे मन मार कर भी सारा
गटाकना पड़ा....
इस रंडी को बेडरूम मे ले चल." क़य्यूम ने कहा.
दो आदमी मुझे उठाकर लगभग खींचते हुए बेडरूम मे ले गये.
बेड्र्रों मे एक बड़ा सा पलंग बिच्छा था. मुझे पलंग पर पटक दिया
गया.
क़य्यूम अपने हाथों मे ग्लास लेकर बिस्तर के पास एक कुर्सी पर बैठ
गया.
" चलो शुरू हो जाओ" उसने अपने चम्चो से कहा.
तीनो मुझ पर टूट पड़े. मेरी टाँगें फैला कर एक ने अपना मुँह मेरी
योनि पर चिपका दिया. अपनी जीभ निकाल कर मेरे योनि को चूसने
लगा. उसकी जीभ मेरे अंदर गर्मी फैला रही थी. मैने उसके सिर को
पकड़ कर अपने योनि पर ज़ोर से दबा रखा था. मैं च्चटपटाने
लगी.मुँह से "आआआआहूऊऊऊहह ऊऊऊफ़फ्फ़ आहह उूउउइइ"
जैसी आवाज़ें निकल रही थी. मैं अपना सिर झटक रही थी अपने उपर
काबू रखने के लिए मगर मेरा शेरर था की बेकाबू होता जा रहा
था.
बाकी दोनो मे से एक मेरे निपल्स पर दात गढ़ा रहा था तो एक ने मेरे
मुँह मे अपना लिंग डाल दिया. सामूहिक संभोग का दृश्या था. और
क़य्यूम पास बैठा मुझे नुचते हुए देख रहा था.
क़य्यूम का लेने के बाद इस आदमी का लिंग तो बच्चे जैसा लग रहा
था. वो बहुत जल्दी झाड़ गया. अब जो आदमी मेरी योनि चूस रहा था वो
मेरी योनि से अलग हो गया. मैने अपनी योनि को जितना हो सकता था
उँचा किया कि वो वापस अपनी जीभ अंदर डाल दे. मगर उसका इरादा
कुच्छ और ही था.
उसने मेरे टाँगों को मोड़ कर अपने कंधे पर रख दिया और एक झटके
मे अपना लिंग मेरी योनि मे डाल दिया. इस अचानक हुए हमले से मैं
च्चटपटा गयी. अब वो मेरी योनि मे तेज तेज झटके मारने लगा.
दूसरा जो मेरी छातियोंको मसल रहा था मेरी छाती पर सवार हो गया
और मेरे मुँह मे अपना लिंग डाल दिया. फिर मेरे मुँह को योनि की तरह
चोदने लगा. उसके अंडकोस मेरी ठुड्डी से रगर खा रहे थे. दोनो ज़ोर
ज़ोर से धक्के लगा रहे थे. मेरी योनि पानी छोड़ने लगी. मैं
चीखना चाह रही थी मगर मुँह से सिर्फ़ "उम्म्म्म उंफ़्ह" जैसी आवाज़ ही
निकल रही थी. दोनो एक साथ वीर्य निकल कर मेरे बदन पर लुढ़क
गये.
मैं ज़ोर ज़ोर से साँसें ले रही थी. बुरी तरह थक गयी थी मगर
आज मेरे नसीब मे आराम नहीं लिखा था. उनके हट ते ही क़य्यूम उठा
और मेरे पास आकर मुझे खींच कर उठाया और बिस्तर के कोने पर
चौपाया बना दिया. फिर वो बिस्तर के पास खड़े होकर अपना लिंग मेरी
टपकती योनि पर लगाया और एक झटके से अंदर डाल दिया. योनि गीली
होने के कारण उसका मूसल जैसा लिंग लेते हुए भी कोई दर्द नहीं
महसूस हुआ. मगर ऐसा लग रहा था मानो वो मेरे पूरे शरीर को
चीरता हुआ मुँह से निकल जाएगा. फिर वो धक्के देने लगा. मजबूत
पलंग भी उसके धक्के से चरमराने लगा. फिर मेरी क्या हालत हो
रही होगी इसकी तो सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है. मैं चीख रही
थी.
"आहह ऊओ प्ल्ल्लीईस्से. प्लेयस्स म्मूउजझीए छ्होद डो. अया
अया नाअहीइन प्प्ल्ल्लीस्स्सी" मैं तड़प रही थी मगर वो था कि
अपनी रफ़्तार बढ़ता ही जा रहा था. पूरे कमरे मे फूच फूच की
आवाज़ें गूँज रही थी. बाकी तीनो उठ कर मेरे करीब आगाए थे और
मेरी चुदाई का नज़ारा देख रहे थे. मैं बस दुआ कर रही थी कि उसका
लिंग जल्दी पानी छोड़ दे. मगर पता नही वो किस चीज़ का बना हुआ
था कि उसकी रफ़्तार मे कोई कमी नहीं आ रही थी. कोई आधे घंटे तक
मुझे चोदने के बाद उसने अपना वीरया मेरी योनि मे डाल दिया. मैं
मुँह के बाल बिस्तर पर गिर गयी. मेरा पूरा शरीर बुरी तरह टूट
रहा था. गला सूख रहा था.
"पानी" मैने पानी माँगा तो एक ने एक ग्लास पानी मेरे होंठों से लगा
दिया. मेरे होठ वीर्य से लिसडे हुए थे उन्हे पोंच्छ कर मैने गतगत
पूरा पानी पी लिया.
पानी पीने के बाद शरीर मे कुच्छ जान आई. तीनो वापस मेरे बदन
से चिपक गये. अब मैं बिस्तेरके किनारे पैर लटका के बैठ गयी. एक
का लिंग अपनी दोनो छातियो के बीच ले रखी थी और बाकी दोनो के
लिंग को बारी बारी से मुँह मे लेकर चूस रही थी. वो मेरी छातियों
को चोद रहा था. मैं अपने दोनो हाथों से अपनी चूचियो को उसके लिंग
पर दोनो ओर से दबा रखी थी. उसने मेरी चूचियो पर वीर्य गिरा
दिया. फिर बाकी दोनो मुझे बारी बारी से चौपाया बना कर चोदे. उनके
उनके वीर्य पात हो जाने के बाद वो चले गये.
मैं बिस्तर पर चित पड़ी हुई थी. दोनो पैर फैले हुए थे. मेरी
योनि से वीर्य चूकर बिस्तर पर गिर रहा था. मेरे बाल चेहरा
छातिया सब पर वीर्य फैला हुआ था. छातियो पर दतो के लाल नीले
निशान नज़र आ रहे थे. क़य्यूम पास खड़ा मेरे बदन की तस्वीरें
खींच रहा था मगर मैं उसे मना करने की स्तिथि मे नहीं थी. गला
भी दर्द कर रहा था. क़य्यूम बिस्तर के पास आकर मेरे निपल्स को
पकड़ कर उन्हे उमेथ्ते हुए अपनी ओर खींचा. मैं दर्द के मारे उठती
चली गयी और उसके बदन से सॅट गयी.
" जा किचन मे. भीमा ने खाना बना लिया होगा. टेबल पर खाना
लगा. और हां तू इसी तरह रहेगी" मुझे कमरे के दरवाजे की तरफ
धकेल कर मेरे नग्न नितंब पर एक चपत लगाई.
मैं अपने शरीर को सिकोर्ते हुए इक हाथ से अपने स्तन युगल को और एक
हाथ से अपने टाँगों के जोड़ को ढकने की असफल कोशिशी करती हुई
किचन मे प्रवेश हुई. अंदर 45 साल का एक रसोइया था. जिसने मुझे
देख कर एक सीटी बजाई. और मेरे पास आकर मुझे सीधा खड़ा कर
दिया. मैं झुकी जा रही थी. मगर उसने मेरी नहीं चलने दिया.
ज़बरदस्ती मेरे सीने पर से हाथ हटा दिया.
"शानदार"उसने कहा. मई शर्म से दोहरी हो रही थी. एक निचले स्तर
के गँवार का सामने मे अपनी इज़्ज़त बचाने मे असमर्थ थी. उसने फिर
खींच कर योनि पर से दूसरा हाथ हटाया. मैने टाँगें सिकोड ली.
यह देख कर उसने मेरे स्तनो को मसल दिया. स्तानो को उस से बचाने के
लिए नीचे की ओर झुकी तो उसने अपनी दो उंगलियाँ मेरी योनि मे पीछे
की तरफ से डाल दिया. मेरी योनि वीर्य से गीली हो रही थी.
"खूब चुदी हो लगता है" उसने कहा.
"शेर खुद खाने के बाद कुच्छ बोटियाँ गीदडो के लिए भी छोड़
देता है. एक आध मौका साहब मुझे भी देंगे.तब तेरी खबर
लूँगा"कहकर उसने मुझे अपने बदन से लपेट लिया.
"कय्यमजी ने खाना लगाने के लिए कहा है." मैने उसे धक्का देते
हुए कहा. उसने मुझसे अलग होने से पहले मेरे होंठों को एक बार कस
कर चूम लिया.
" चल तुझे तो तसल्ली से चोदेन्गे पहले साहब को जी भर के मसल
लेने दो."उसने कहा. फिर मुझे खाने का समान पकड़ने लगा.
मैने टेबल पर खाना लगाया. फिर डिन्नर उसकी गोद मे बैठ कर लेना
पड़ा. वो भी नग्न बैठा था. उसका लिंग सिक्युडा हुआ था. मेरी योनि
उसके नरम पड़े लिंग को चूम रही थी. खाते हुए कभी मुझे
मसलता कभी चूमता जा रहा था. उसके मुँह से शराब की दुर्गंध
अराही थी. वो जब भी मुझे चूमता. मुझे उसपर गुस्सा आ जाता. खाते
खाते ही उसने मोबाइल पर कही रिंग किया.
"हाला, कौन गवलेकर?"
"क्या कर रहा है?"
"अबे इधर आजा. घर पर बोल देना कि रात मे कहीं गश्त पर जाना
है. यहीं रात गुजरेंगे. हमारे ब्रिज साहब की जमानत यहीं है
मेरी गोद मे."कहकाक उसने मेरे एक निपल को ज़ोर से उमेटा. दोनो निपल
बुरी तरह दर्द कर रहे थे. नहीं चाहते हुए भी मैं चीख उठी.
"सुना? अब झता झट आजा सारे काम छोड़ कर"रात भर अपन दोनो इसकी
जाँच पड़ताल करेंगे."
मैं समझ गयी की क़य्यूम ने इनस्पेक्टर गवलेकर को रात मे अपने घर
बुलाया है. और दोनो रात भर मुझे चोदेन्गे.
खाना खाने के बाद मुझे बाहों मे समेटे हुए ड्रॉयिंग रूम मे आगेया.
मुझे अपनी बाहों मे लेकर मेरे होंठों पर अपने मोटे मोटे भद्दे
होंठ रख कर चूमने लगा. फिर अपनी जीभ मेरे मुँह मे डाल दी. और
मेरे मुँह का अपनी जीभ से मुआयना करने लगा. फिर वो सोफे पर बैठ
गया और मुझे ज़मीन पर अपने कदमों पर बिठाया. टाँगें खोल कर
मुझे अपनी टाँगों की जोड़ पर खींच लिया. मैं उसका इशारा समझ कर
उसके लिंग को चूसने लगी. वो मेरे बालों पर हाथ फिरा रहा था. फिर
मैने उसके लिंग को मुँह मे ले लिया. उसके लिंग को चूसने लगी. जीभ
निकाल कर उसके लिंग के उपर फिराने लगी. धीरे धीरे उसका लिंग
हरकत मे आता जा रहा था. वो मेरे मुँह मे फूलने लगा. मैं और तेज़ी
से उसके लिंग पर अपना मुँह चलाने लगी. कुच्छ ही देर मे लिंग फिर से
पूरी तरह तन कर खड़ा हो गया था. वापस उसे योनि मे लेने की सोच
कर ही झुरजुरी सी आ रही थी. योनि का तो बुरा हाल था. ऐसा लग
रहा था मानो अंदर से छिल गया हो. मैं इसलिए उसके लिंग पर और
तेज़ी से मुँह उपर नीचे करने लगी जिस से उसका मुँह मे ही निकल
जाए. मगर वो तो पूरा सांड की तरह स्टॅमिना रखता था. मेरी बहुत
कोशिशों के बाद उसके लिंग से प्रेकुं निकालने लगा मैं थक गयी
मगर उसके लिंग से वीर्य निकला ही नहीं. तभी दरवान ने आकर
गवलेकर के आने की सूचना दी.
"उसे यहीं भेज दे." मैं उठने लगी तो उसने कंधे पर ज़ोर लगा कर
कहा.
" तू कहाँ उठ रही है. चल अपना काम करती रह." कहकर उसने वापस
मेरे मुँह से अपना लिंग सटा दिया. मैने भी मुँह खोल कर उसके लिंग
को वापस अपने मुँह मे ले लिया.
तभी गवलेकर अंदर आया. वो कोई छह फीट का लंबा कद्दावर बदन
वाला आदमी है. मेरे उपर नज़र पड़ते ही उसका मुँह खुला का खुला रह
गया. मैने कातर नज़रों से उसकी तरफ देखा.
"वा भाई क़य्यूम क्या नज़ारा है. इस हूर को कैसे वश मे किया."
गवलेकर ने हंसते हुए कहा.
" आ बैठ. बड़ी शानदार चीज़ है. मक्खन की तरह मुलायम और
भट्टी की तरह गरम." क़य्यूम ने मेरे सिर को पकड़ कर उस की तरह
घुमाया, "ये है अंजलि सिंग. अपने ब्रिज की बीवी. इसने कहा मेरे पति
को छोड़ दो मैने कहा रात भर के लिए मेरे लंड पर बैठक लगा
फिर देखेंगे. समझदार औरत है मान गयी. अब ये रात भर तेरे
पहलू को गर्म करेगी. जितनी चाहे ठोको"
गवलेकर आकर पास मे बैठ गया. क़य्यूम ने मुझे उसकी ओर धकेल दिया.
गवलेकर मुझे खींच कर अपनी गोद मे बिठा लिया. और मुझे चूमने
लगा. मुझे तो अब अपने उपर घिन सी आने लगी थी. मगर इनकी बात तो
मान नि ही थी. वरना ये तो मुर्दे को भी नोच लेते हैं. मेरे बदन को
क़य्यूम ने सॉफ करने नहीं दिया था. इसलिए जगह जगह वीर्य सूख
कर सफेद पपड़ी की तरह दिख रही थी. दोनो स्तनों पर लाल लाल दाग
देख कर गवलेकर ने कहा,
"तू तो लगता है काफ़ी जमानत उसूल कर चुक्का है."
"हां सोच पहले देखूं तो सही अपने स्टॅंडर्ड की है या नहीं" क़य्यूम
ने कहा.
"प्लीज़ साहब मुझे छोड़ दीजिए सुबह तक मैं मर जाऊंगी." मैने
गवलेकर से मिन्नतें की.
" घबरा मत सुबह तक तो तुझे वैसे ही छोड़ देंगे. जिंदगी भर
तुझे अपने पास थोड़े ही रखना है." गवलेकर ने मेरे निपल्स को दो
उंगलियों के बीच मसल्ते हुए कहा.
"तूने अगर अब एक भी बकवास की ना तो तेरा तेंठूआ दबा दूँगा" क़य्यूम
ने गुर्र्राटे हुए कहा, ""तेरी अकड़ पूरी तरह गयी नहीं है शायद"
कहकर उसने मेरी दोनो चूचियो को पकड़ कर ऐसा उमेटा की मेरी तो
जान ही निकाल गयी.


क्रमशः......................






आपका दोस्त राज शर्मा
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj































































































































































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सेक्स स्लेव्स अंजलि की दास्तान पार्ट--1

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अंजलि की दास्तान पार्ट--1

दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा आप के लिए एक और नई कहानी अंजलि की दास्तान लेकर हाजिर हूँ
मेरा नाम अंजलि सिंग है. मैं एक शादी शुदा महिला हूँ. गुजरात मे सूरत के पास एक टेक्सटाइल इंडस्ट्री मे हज़्बेंड मिस्टर. ब्रिजभूषण सिंग ( वी कॉल हिम ब्रिज) इंजिनियर के पोस्ट मे काम करते हैं. उनके
टेक्सटाइल मिल मे हमेशा लेबर प्राब्लम रहती है.

मजदूरों का नेता क़य्यूम बहुत ही काइयां टाइप का आदमी है. ऑफीसर लोगों को उस आदमी को हमेशा पटा कर रखना पड़ता है. मेरे पति की उस से बहुत पट ती थी. मुझे उनकी दोस्ती फूटी आँख भी नहीं सुहाति थी
शादी के बाद मैं जब नयी नयी आई थी वो पति के साथ अक्सर आने लगा. उसकी आँखें मेरी बदन पर फिरती रहती थी. मेरा बदन वैसे भी काफ़ी सेक्सी था. वो पूरे बदन पर नज़रें फेरता रहता था. ऐसा लगता था मानो वो कल्पना में मुझे नग्न कर रहा हो. शादी के बाद मुझे किसी को यह बताने के बाद बहुत शर्म आती थी. फिर भी मैने ब्रिज को समझाया कि ऐसे आदमियों से दोस्ती छोड़ दे मगर वो तर्क देता था कि प्राइवेट कंपनी मे नौकरी करने पर थोड़ा बहुत ऐसे लोगों से बना कर रखना पड़ता ही है. उनके तर्क के आगे मैं चुप हो जाती थी. मैने कहा भी कि वो आदमी मुझे बुरी नज़रों से घूरता रहता है. मगर वो मेरी बात पर कोई तवज्जो नहीं देते थे. क़य्यूम कोई 45 साल का भैसे की तरह काला आदमी था. उसका काम हर वक़्त कोई ना कोई खुराफात करना रहता था. उसकी पहुँच उपर तक थी. उसका दबदबा आस पास की कई कंपनी मे चलता था. बाजार के नुक्कड़ पर उसकी कोठी थी जिसमे वो अकेला ही रहता था. कोई फॅमिली नहीं थी मगर लोग बताते हैं कि वो बहुत ही रंगीला आदमी है और अक्सर उसके घर मे लड़कियाँ भेजी जाती थी. हर वक़्त कई चंचों से घिरा
रहता था. वो सब देखने मे गुण्डों से लगते थे. सूरत और इसके
आसपास काफ़ी टेक्सटाइल के छ्होटे मोटे फॅक्टरीस हैं. इन सब मे क़य्यूम
की अग्या के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता था. उसकी पहुँच यहाँ के
एमएल ए से भी ज़्यादा है.

ब्रिज के सामने ही कई बार मेरे साथ गंदे मज़ाक भी करता था. मैं
गुस्से से लाल हो जाती थी मगर ब्रिज हंस कर टाल देता था. बाद मे
मेरे शिकायत करने पर मुझे बाहों मे लेकर मेरे होंठों को चूम
कर कहता,
"अंजू तुम हो ही ऐसी की किसी का भी मन डोल जाए तुम पर. अगर कोई
तुम्हें देख कर ही खुश हो जाता हो तो हमे क्या फ़र्क़ पड़ता है."
घर के डोर की च्चितकनी मे कोई नुखस था. दरवाजे को ज़ोर से
धक्का देने पर च्चितकनी अपने आप गिर जाती थी.
होली से दो दिन पहले एक दिन पहले किसी काम से क़य्यूम हमारे घर
पहुँचा. दिन का वक़्त था. मैं उस समय बाथ रूम मे नहा रही थी.
बाहर से काफ़ी आवाज़ लगाने पर भी मुझे सुनाई नहीं दिया था. शायद
उसने घंटी भी बजाई होगी मगर अंदर पानी की आवाज़ मे मुझे कुच्छ
भी सुनाई नहीं दिया. मैं अपने धुन मे गुनगुनाती हुई नहा रही थी.
उसने दरवाजे को हल्का सा धक्का दिया तो दरवाजे की च्चितकनी गिर
गयी और दरवाजा खुल गया. क़य्यूम ने बाहर से आवाज़ लगाई मगर
कोई जवाब ना पाकर दरवाजा खोल कर झाँका. कमरा खाली पाकर वो
अंदर प्रवेश कर गया. उसे शायद बाथरूम से पानी गिरने की एवं
मेरे गुनगुनाने की आवाज़ आई तो पहले तो वो वापस जाने के लिए मुड़ा
मगर फिर कुच्छ सोच कर धीरे से दरवाजे को अंदर से बंद कर लिया.
और मूड कर बेड रूम मे प्रवेश कर गया. मैने पूरे घर मे अकेले
होने के कारण कपड़े बाहर बेड पर ही रख रखे थे. उन पर उसकी
नज़र पड़ते ही आँखों मे चमक आगयी. उसने सारे कपड़े समेट कर
अपने पास रख लिए. मैं इन सब से अंजान गुनगुनाती हुई नहा रही
थी. नहाना ख़त्म कर के बदन तौलिए से पोंच्छ कर पूरी तरह नग्न
बाहर निकली. वो दरवाजे के पीछे छुपा हुआ था इसलिए उसपर नज़र
नहीं पड़ी. मैने पहले ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर अपने हुस्न
को निहारा. फिर बदन पर पाउडर च्चिड़क कर कपड़ों की तरफ़ हाथ
बढ़ाए. मगर कपड़ों को बिस्तर पर ना पाकर चोंक गयी. तभी
दरवाजे के पीछे से क़य्यूम लपक कर मेरे पीछे आया और मेरे नग्न
बदन को अपनी बाहों की गिरफ़्त में ले लिया. मैं एक दम सकते मे
आगेई. समझ मे नहीं आरहा था कि क्या करें. उसके हाथ मेरे बदन
पर फिर रहे थे. मेरे एक निपल को अपने मुँह मे ले लिया और दोसरे को
हाथों से मसल रहा था. एक हाथ मेरी योनि पर फिर रहे थे.
अचानक उसकी दो उंगलिया मेरी योनि मे प्रवेश कर गयी. मैं एकद्ूम से
चिहुनक उठी और उसे एक ज़ोर से झटका दिया और उसकी बाहों से निकल
गयी. मैं चीखते हुए मैं डोर की तरफ दौरी मगर कुण्डी खोलने
से पहले फिर उसकी गिरफ़्त मे आगेई. वो मेरे स्तनों को बुरी तरह
मसल रहा था.
"छोड़ कमीने नहीं तो मैं शोर मचाउन्गि" मैने चीखते हुए कहा.
तभी हाथ चितकनी तक पहुँच गये. और दरवाजा खोल दिया. मेरे
इस हरकत की उसे शायद उम्मीद नहीं थी. मैने एक जोरदार झापड़ उसके
गाल पर लगाया और अपने नग्न हालत की परवाह ना करते हुए मैने
दरवाजे को खोल दिया. शेरनी की तरह चीखी,
"निकल जा मेरे घर से." और उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया.
उसकी हालत चोट खाए शेर की तरह हो रही थी. चेहरा गुस्से से लाल
सुर्ख हो रहा था. उसने फुंफ़कार्टे हुए कहा,
"साली बड़ी सती सावित्री बन रही है. अगर तुझे अपने नीचे ना
लिटाया तो मेरा नाम भी क़य्यूम नहीं. देखना एक दिन तू आएगी मेरे
पास मेरे लंड को लेने. उस समय अगर तुझे अपने इस लिंग पर ना
कूदवाया तो देखना.
मैने भड़क से उस के मुँह पर दरवाजा बंद कर दिया. मैं वहीं
दरवाजे से लग कर रोने लगी.
शाम को जब ब्रिज आया तो उसपर भी फट पड़ी. मैने उसे सारी बात
बताई और ऐसे दोस्त रखने के लिए उसे भी खूब खरी खोटी सुनाई.
पहले तो ब्रिज ने मुझे मनाने की काफ़ी कोशिश की. कहा कि ऐसे बुरे
आदमी से क्या मुँह लगना. मगर मैं तो आज उसकी बातों मे आने वाली
नहीं थी. आख़िर वो उस से भिड़ने निकला. क़य्यूम से झगड़ा करने पर
क़य्यूम ने भी खूब गलियाँ दी. उसने कहा
"तेरी बीवी नंगी होकर दरवाजा खोल कर नहाए तो इसमे सामने वाले की
क्या ग़लती है. अगर इतनी ही सती सावित्री है तो बोला कर कि बुर्क़े में
रहे."
उसके आदमियों ने धक्के देकर ब्रिज को बाहर निकाल दिया. पोलीस मे
कंप्लेन लिखाने गये मगर पोलीस ने कंप्लेन लिखने से मना कर
दिया. सब उससे घबराते थे. खैर खून का घूँट पीकर चुप हो जाना
पड़ा. बदनामी का भी डर था. और ब्रिज की नौकरी का भी सवाल था.
धीरे धीरे समय गुजरने लगा. चौराहे पर अक्सर क़य्यूम अपने
चेले चपटों के साथ बैठा रहता था मैं कभी वहाँ से गुजरती
तो मुझे देख कर अपने साथियों से कहता.
"ब्रिज की बीवी बड़ी कंटीली चीज़ है. उसकी छातियों को मसल मसल
कर मैने लाल कर दिया था. चूत मे भी उंगली डाली थी. नहीं
मानते हो तो पूछ लो."
"क्यों अंजलि जी याद है ना मेरे हाथों का स्पर्श"
"कब आ रही है मेरे बिस्तर पर"
मैं ये सब सुन कर चुपचाप सिर झुकाए वहाँ से गुजर जाती थी.


दो महीने बाद की बात है. अचानक शाम को ब्रिज के फॅक्टरी से
फोन आया,
"मेडम, आप म्र्स. सिंग बोल रही हैं?"
"हां बोलिए" मैने कहा.
" मेडम पोलीस फॅक्टरी आई थी और सिंग साहब को गिरफ्तार कर ले
गयी."
"क्या? क्यों?" मेरी समझ मे ही नहीं आया कि सामने वाला क्या बोल रहा
है.
"मेडम कुच्छ ठीक से समझ मे नहीं आरहा है. आप तुरंत यहाँ
आजाईए."
मैं जैसी थी वैसी ही दौरी गयी ब्रिज के ऑफीस. मैं एक सूती की
साडी पहनी हुई थी.
वहाँ के मलिक कामदार साहब से मिली तो उन्हों ने बताया कि दो दिन
पहले उनके फॅक्टरी मे कोई आक्सिडेंट हुआ था जिसे पोलीस मर्डर का केस
बना कर ब्रिज के खिलाफ चरगेशीट दायर कर दी थी. मैं एकद्ूम
चकित रह गयी. ऐसा कुच्छ भी नहीं हुआ था.
"लेकिन आप तो जानते हैं कि ब्रिज ऐसा आदमी नहीं है. वो आपके के
पास पिच्छले कई सालों से काम कर रहा है. कभी आपको उनके खिलाफ
कोई भी शिकायत मिली है क्या." मैने मिस्टर. कामदार से पूचछा.
" देखिए म्र्स. सिंग मैं भी जानता हूँ की इसमे ब्रिज का कोई भी
हाथ नहीं है मगर मैं कुच्छ भी कहने मे असमर्थ हूँ."
" आख़िर क्यों?"
" क्योंकि उसका एक चस्मदीद गवाह है. क़य्यूम"
मेरे सिर पर जैसे बूम फट पड़ा मेरी आँखों के सामने सारी बातें
सॉफ होती चली गयी.
" वो कहता है कि उसने ब्रिज को जान बूझ कर उस आदमी को मशीन मे
धक्का देते देखा था."
"ये साब सारा सर झूठ है वो कमीना जान बूझ कर ब्रिज को फँसा
रहा है." मैने लगभग रोते हुए कहा.
" देखिए मुझे आपसे हमदर्दी है मगर मैं आपको कोई भी मदद
नहीं कर पा रहा हूँ. इनस्पेक्टर गवलेकर का भी क़य्यूम से अच्छी
दोस्ती है. सारे वर्कर्स ब्रिज के खिलाफ हो रहे हैं. मेरी मानो तो
आप क़य्यूम से मिल लो वो अगर अपना बयान बदल ले तो ही ब्रिज बच
सकता है."
"थूकती हूँ मैं उस कमीने पर" कहकर मैं वहाँ से पैर पटकती
हुई निकल गयी.
मगर मेरे समझ मे नहीं आरहा था कि मैं क्या करूँ. मैं पोलीस
स्टेशन पहुँची. वहाँ काफ़ी देर बाद ब्रिज से मिलने दिया गया. उसकी
हालत देख कर तो मुझे रोना आ गया. बॉल बिखरे हुए थे. आँखों
के नीचे कुच्छ सूजन थी शायद पोलीस वालों ने मारपीट भी की
होगी. मैने उस से बात करने की कोशिश की मगर वो कुच्छ ज़्यादा
नहीं बोल पाया. उसने बस इतना ही कहा,
" अब कुच्छ नहीं हो सकता. अब तो क़य्यूम ही कुच्छ कर सकता है."
मुझे किसी ओर से आशा की कोई किरण नहीं दिखाई दे रही थी. आख़िर
कर मैने क़य्यूम से मिलने का निर्णय किया. शायद उसे मुझ पर रहम
अजाए.
शाम के लगभग आठ बज गये थे. मैं क़य्यूम के घर पहुँची. गेट
पर दरवान ने रोका तो मैने कहा,
"साहब को कहना म्र्स. सिंग आई हैं."
गार्ड अंदर चला गया. कुच्छ देर बाद बाहर आकर कहा, "अभी साहब
अभी बिज़ी हैं कुच्छ देर इंतेज़ार कीजिए."
पंद्रह मिनिट बाद मुझे अंदर जाने दिया. मकान काफ़ी बड़ा था.
अंदर ड्रॉयिंग रूम मे क़य्यूम दीवान पर आधा लेटा हुआ था. उसके तीन
चम्चे कुर्सियों पर बैठे हुए थे. सबके हाथों मे शराब के
ग्लास थे. सामने टेबल पर एक बॉटल खुली हुई थी. मैने कमरे की
हालत देखते हुए झिझक्ति हुई अंदर प्रवेश किया.
"आ बैठ." क़य्यूम ने अपने सामने एक खाली कुर्सी की तरफ इशारा किया.
" वो वो मैं आपसे ब्रिज के बारे में बात करना चाहती थी." मैं जल्दी
वाहा से भागना चाहती थी.
" ये अपने सुदर्शन कपड़ा मिल के इंजिनियर की बीवी है. बड़ी सेक्सी
चीज़ है." उसने अपने ग्लास से एक घूँट लेते हुए कहा.
सारे मुझे वासना भारी नज़रों से देखने लगे. उनकी आँखों मे लाल डोरे
तेर रहे थे.
"हाँ बोल क्या चाहिए?"
" ब्रिज ने कुच्छ भी नहीं किया" मैने उससे मिन्नत की.
"मुझे मालूम है"
"पोलीस कहते हैं की आप अपना बयान बाल लेंगे तो वो छूट जाएँगे"
"क्यों? क्यों बदलून मैं अपना बयान?
"प्लीज़, हम पूर..."
"सड़ने दो साले को बीस साल जैल में. आया था मुझसे लड़ने."
"प्लीज़ आप ही एक मात्र आशा हो."
" लेकिन क्यूँ? क्यूँ बदलू मैं अपना बयान? मुझे क्या मिलेगा" क़य्यूम
ने अपने मोटे जीभ पर होंठ फेरते हुए कहा.
" आप कहिए आपको क्या चाहिए. अगर बस मे हुआ तो हम ज़रूर देंगे"
कहते हुए मैने अपनी आँखें झुका ली. मुझे पता था कि अब क्या होने
वाला है.
क़य्यूम अपनी जगह से उठा. अपना ग्लास टेबल पर रख कर चलता हुआ
मेरे पीछे अगया. मई आँखें सख्ती से बंद कर उसके पैरों के
पद्चाप सुन रही थी. मेरी हालत उस खरगोश की तरह हो गयी थी जो
अपना सिर झाड़ियों मे डाल कर सोचता है कि भेड़िए से वो बच जाएगा.
उसने मेरे पीछे आकर सारी के आँचल को पकड़ा और उन्हे छातियो पर
से हटा दिया. फिर उसके हाथ आगे आए और सख्ती से मेरी छातियो को
मसल्ने लगे.
"मुझे तुम्हारा जिस्म चाहिए पूरे एक दिन के लिए" उसने मेरे कानों के
पास धीरे से कहा. मैने सहमति मे अपना सिर झुका लिया.
"ऐसे नहीं अपने मुँह से बोल" उसने मेरे ब्लाउस के अंदर अपने हाथ
डाल कर सख्ती से चूचियो को निचोर्ने लगा. इतने लोगों के सामने
मैं शरम से गढ़ी जा रही थी. मैने सिर हिलाया
"मुँह से बोल"
"हां" मैने धीरे से बुद बुडाया.
"ज़ोर से बोल. कुच्छ सुनाई नहीं दिया. तुझे सुनाई दिया रे चापलू?"
उसने एक से पूचछा.
"नहीं" जवाब आया.
"मुझे मंजूर है." मैने इस बार कुच्छ ज़ोर से कहा.
"क्यों फूलणदेवी जी, मैने कहा था ना तू खुद आएगी मेरे घर और
कहेगी की प्लीज़ मुझे चोदो. कहाँ गयी तेरी अकड़? तू पूरे 24
घंटों के लिए मेरे कब्ज़े में रहेगी. मैं जैसा चाहूँगा तुझे
वैसा ही करना होगा. तुझे अगले 24 घंटे बस अपनी योनि खोल कर
रंडियों की तरह चुदवाना है. उसके बाद तू और तेरा मर्द दोनो आज़ाद
हो जाओगे."उसने कहा" और नहीं तो तेरा मर्द तो 20 साल के लिए अंदर
होगा ही तुझे भी वेश्याव्र्त्ती के लिए अंदर करवा दूँगा. फिर तो तू
वैसे ही वहाँ से पूरी वेश्या बन कर ही बाहर निकलेगी."
"मुझे मंजूर है" मैने अपने आँसुओं पर काबू पाते हुए कहा. वो
जाकर वापस अपनी जगह जाकर बैठ गया.
"चल शुरू हो जा. अपने सारे कपड़े उतार मुझे औरतों के बदन पर
कपड़े अच्छे नहीं लगते" उसने ग्लास अपने होंठों से लगाया, अब ये
कपड़े कल शाम के दस बजे के बाद ही मिलेंगे. चल इनको भी दिखा
तो सही की तुझे अपने किस हुश्न पर इतना गुरूर है. मैने काँपते
हाथों से ब्लाउस के बटन खोलना शुरू कर दिया. सारे बटन्स
खोलकर ब्लाउस के दोनो हिस्सों को अपनी चूचियो के उपर से हटाया तो
ब्रा मे कसे हुए मेरे दोनो योवन उन भूखी आँखों के सामने आगाए.
मैने ब्लाउस को अपने बदन से अलग कर दिया. चारों की आँखें
चमक उठी. मैने बदन से सारी हटा दिया. फिर मैने झिझकते हुए
पेटिकट की डोरी खींच दी. पेट्कोट स्रसारता हुआ पैरों पर ढेर हो
गया चारों की आँखों मे वासना के सुर्ख डोरे तेर रहे थे. मैं उनके
सामने ब्रा और पॅंटी मे खड़ी होगआई.
"मैने कहा था सारे कपड़े उतारने को" क़य्यूम ने गुर्रते हुए कहा.
"प्लीज़ मुझे और जॅलील मत करो" मैने उससे मिन्नतें की.
"आबे राजे फ़ोन लगा गोवलेकर को. बोल साले ब्रिज को रात भर हवाई
जहाज़ बना कर डंडे मारे और इस रंडी को भी अंदर कर दे"
"नहीं नहीं, ऐसा मत करना. आप जैसा कहोगे मैं वैसा ही
करूँगी." कहते हुए मैं अपने हाथ पीछे लेजकर ब्रा का हुक खोल
दिया. ब्रा को आहिस्ता से बदन से अलग कर दिया. आब मैने पूरी तरह
से समरपन का फ़ैसला कर लिया. ब्रा के हटते ही मेरे दूधिया उरोज
रोशनी मे चमक उठे. चारों अपनी अपनी जगह पर कसमसने लगे.
तीनो गरम हो चुके थे. उनके पॅंट पर उभार सॉफ नज़र अरहा था.
क़य्यूम लूँगी के ऊपर से ही अपने लिंग पर हाथ फेर रहा था. लूँगी के
उपर से ही उसके उभार को देख कर लग रहा था कि अब मेरी खैर नहीं.
मैने अपनी उंगलियाँ पॅंटी की एलास्टिक मे फँसैई तो क़य्यूम बोल उठा.
"ठहर जा. यहाँ आ मेरे पास"










आपका दोस्त राज शर्मा
साधू सा आलाप कर लेता हूँ ,
मंदिर जाकर जाप भी कर लेता हूँ ..
मानव से देव ना बन जाऊं कहीं,,,,
बस यही सोचकर थोडा सा पाप भी कर लेता हूँ
आपका दोस्त
राज शर्मा

(¨`·.·´¨) Always
`·.¸(¨`·.·´¨) Keep Loving &
(¨`·.·´¨)¸.·´ Keep Smiling !
`·.¸.·´ -- raj































































































































































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