Saturday, March 14, 2015

FUN-MAZA-MASTI गुमराह पिता की हमराह बेटी--7

FUN-MAZA-MASTI

 गुमराह पिता की हमराह बेटी--7

खाना खाने के बाद मनिका और जयसिंह वापस अपने कमरे में न आ हॉटेल गेस्ट-एक्टिविटीज एरिया में गए. दोपहर का वक्त होने की वजह से वहाँ ज्यादा जने नहीं थे. जयसिंह मनिका को ले पूल टेबल के पास पहुँचे, वहाँ दो कपल मस्ती करते हुए पूल खेल रहे थे. जयसिंह ने जा कर एक क्यू-स्टिक (जिससे पूल-स्नूकर खेलते हैं) उठा ली थी पर दूसरों को खेलते देख थोड़े अचकचाकर खड़े हो गए थे. लेकिन वे लोग काफी फ्रेंडली थे और उन्हें देख उनसे भी ज्वाइन करने को कहा और बताया कि वे तो बस लेडीज को खुश करने के लिए वहाँ मसखरी कर रहे थे और अगर वे चाहें तो सीरियसली गेम लगा लेते हैं. इस पर जयसिंह ने भी हाँ कह दिया. उन्होंने अपने-आप को इंट्रोड्यूस किया था तो जयसिंह ने भी अपना परिचय दिया 'आई एम जयसिंह एंड दिस इस मनिका..' और हाथ मिलाया था. उन्होंने यह नहीं बताया था कि मनिका उनकी बेटी है.
वे लोग वेजर (शर्त) लगा कर खेलने लगे. तीनों को उनके साथ आईं लडकियाँ सपोर्ट कर रही थी और वहाँ हँसी और मस्ती का माहौल बन गया था.
सामने वाले लौंडे खेलने में माहिर थे और जल्द ही जयसिंह ने अपने-आप को हारते हुए पाया, लेकिन जयसिंह ने भी हार नहीं मानी थी और शर्त की बाजी बढ़ाते चले जा रहे थे, आखिर एक वक्त आया जब जयसिंह ने ५०००० रूपए का दाँव लगाने का चैलेंज कर डाला. सामने वाले कपल्स के चेहरे पर हैरानी का भाव आ गया था. पर आपस में सलाह कर वे उनकी बात मान गए और खेलने लगे. इस बार गेम की इंटेंसिटी बढ़ी हुई थी और हर स्ट्राइक (चाल) के बाद चिल्लम-चिल्ली मची हुई थी. देखनेवाले कुछ और लोग भी पूल-टेबल के आस-पास आ जमे थे. पर अंत में जयसिंह वह बाजी भी हार गए, माहौल थोड़ा शांत हुआ, जयसिंह ने भी हँस कर अपनी हार स्वीकार कर ली थी.
अब दूसरों ने उन्हें ड्रिंक्स का ऑफर किया जिसे उन्होंने मान लिया. तीनों लड़कियों को वहीँ छोड़ वे लोग बार से ड्रिंक्स लेने चले गए थे, लड़कियों ने अपने लिए मोक्टेल्स (बिना शराब की ड्रिंक्स) मंगवाई थी.
मर्दों के चले जाने के बाद तीनों लडकियाँ बतियाने लगीं, बातों-बातों में सामनेवाली लड़कियों ने मनिका से कहा था,
'ऑब्वियस्ली यू गायस हैव अ लॉट ऑफ़ मनी...'
जब मनिका ने उनसे ऐसा कहने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि जिस तरह से वे लोग शर्त का अमाउंट बढ़ाते जा रहे थे उस से उन्हें ऐसा लगा था और जब जयसिंह ने आखिरी बार पचास हजार का दाँव खेला था तो उन्होंने सिर्फ इसीलिए हाँ भरी थी के वे लोग ऑलरेडी सेवेंटी थाउजेंड जीत कर प्लस में चल रहे थे. वे लोग तो वहाँ एक कंपनी स्पॉन्सर्ड वेकेशन आउटिंग पर आए हुए थे. मनिका ने भी उन्हें बताया कि वह भी पहली बार दिल्ली आई थी और एक-दो दिन में उसका इंटरव्यू था व उसके पापा उसके साथ आए थे. इस पर दोनों ही लड़कियाँ चौंक गई थीं,
'यू मीन टू से यू आर हेयर विद योर डैड?' एक ने पूछा.
'येस...वाय?' मनिका ने उनकी उलझन देख जानना चाहा.
'ओह वेल वी थॉट दैट ही वास् योर...आई मीन हमने नहीं सोचा था कि ही इज़ योर फादर..'
'ओह..हाहाहा...सो यू पीपल थॉट ही इस माय बॉयफ्रेंड ऑर समथिंग..?' मनिका ने हँस कर पूछा था. जिस पर उन दोनों ने भी झेंप भरी स्माइल दे हाँ में सिर हिला दिया.
'इट्स ओके...आई गेट दैट अ लॉट...मेरी सब फ्रेंड्स भी ऐसा ही बोलती हैं...बिकॉज़ वी आर वैरी क्लोज़ टू ईच-अदर..' मनिका ने उन्हें रिलैक्स होने को कहते हुए बताया था.
फिर जयसिंह और वो दोनों बन्दे वापस आ गए थे, उन लोगों ने घुलते-मिलते ड्रिंक्स ख़त्म कीं थी जिसके बाद जयसिंह और मनिका उनसे विदा हो अपने रूम में आ गए थे. आने से पहले जयसिंह ने उनसे उनका रूम नंबर ले लिया था और कमरे में पहुँचते ही रूम-सर्विस से किसी के हाथ एन्वेलोप (लिफाफा) भिजवाने को कहा. जब एक स्टाफ़ का बन्दा एन्वेलोप देने आया तो उन्होंने उसे रुकने को कहा और एन्वेलोप में एक लाख बीस हजार की राशि का चेक डाल कर उसे दिया व उन लोगों के बताए रूम नंबर पे दे आने को भेज दिया. कुछ देर बाद उनके साथ पूल खेल रहे जनों में से एक का उन्हें थैंक्यू कहने को फोन (रिसेप्शन के थ्रू कॉल कनेक्ट करा) भी आया था.
जयसिंह कमरे में आ कर बेड पर लेटे हुए थे और मनिका भी दूसरी तरफ बैठी हुई अपने फोन में कुछ कर रही थी. जयसिंह ने आँखें बंद करी ही थी कि मनिका उनसे बोली,
'पापा...जोश-जोश में वन लैख ट्वेंटी थाउजेंड उड़ा दिए हैं आज आपने...'
'हम्म कोई बात नहीं क्या हो गया तो...पैसे तो आते-जाते रहते हैं.' जयसिंह ने बेफिक्री से कहा.
'इससे अच्छा तो मैं शॉपिंग ही कर लेती..' मनिका ने ठंडी आह भरी.
'हे भगवान्! कितनी शॉपिंग करनी है इस लड़की को?' जयसिंह ने झूठ-मूठ का अचरज दिखाया.
'आपको क्या पता पापा...शॉपिंग तो हर लड़की का सबसे बड़ा सपना होता है...' मनिका ने इठला कर कहा.
'और उस दिन जो पूरा मॉल खरीद कर लाईं थी उसका क्या?' जयसिंह ने याद दिलाया.
'हाँ तो थोड़ी सी और कर लेती...' मनिका मुस्काई.
'उस दिन जो इतनी ड्रेसेज़ लेकर आईं थी वो तो दिखाईं नहीं अभी तक तुमने..?' जयसिंह ने ताना दिया.
'अरे भई पापा दिखा दूँगी तो...अभी मुझे नींद आ रही है...' मनिका ने अंगड़ाई लेते हुए कहा और वह भी लेट गई.
जयसिंह और मनिका दो घंटे सोने के बाद उठे थे. उन्होंने इवनिंग-टी (चाय) का ऑर्डर किया था और बैठ कर टी.वी. देखने लगे. एक हिन्दी फ़िल्म चल रही थी; रेस. फ़िल्म अभी कुछ महीने पहले ही रिलीज़ हुई थी सो मनिका ने लगा ली थी.
जयसिंह के साथ इतने दिनों से रह रही मनिका उनके स्वभाव में आने वाले परिवर्तनों को भाँपने लगी थी, उसने देखा क़ि जयसिंह वैसे तो फ़िल्म में कम ही इंटरेस्ट ले रहे थे पर जब कोई हीरोइन या आईटम सॉन्ग स्क्रीन पर दिखाते थे तो उनकी नज़र जरा पैनी हो जाती थी. मनिका मन ही मन मुस्का उठी थी, 'देखो कैसे भाती हैं बिपाशा और कैटरीना इन्हें...'
कुछ देर बाद फ़िल्म खत्म हो गई, उनकी चाय और स्नैक्स भी डिलीवर हो गए थे सो वे बैठे हुए खाना-पीना कर रहे थे और टेलीविज़न से उनका ध्यान थोड़ा हट गया था. तभी टी.वी. पर 'एनैमोर', जो एक लॉनजुरे बनाने वाली कंपनी है, का एडवर्टिसमेंट (विज्ञापन) आया, अब स्क्रीन पर चल रही इमेज पर दोनों का ही ध्यान चला गया था. कुछ मॉडल्स को ब्रा-पैंटीज़ में अठखेलियाँ करते दिखाया गया था, ऐड कुछ ही सेकंड चला था पर दोनों बाप-बेटी के मनों में अलग-अलग विचार उठा गया था. एक तरफ मनिका को सुबह वाली बात याद आ गई और वह शरमा गई थी व दूसरी तरफ जयसिंह का दिल खुश हो गया था, उन्होंने हल्का सा मुस्काते हुए मनिका की ओर देखा था. मनिका थोड़ी तन के सीधी बैठी थी और अपनी नज़रें टेबल पर रखे स्नैक्स पर गड़ाए थी उसे कनखियों से जयसिंह की नज़र और शरारती मुस्कान का आभास हो गया था, एक-दो पल बाद उससे भी रुका नहीं गया और उसके चेहरे पर भी शर्मीली मुस्कान तैर गई, जयसिंह फिर भी उसे देखते रहे,
'पापा स्टॉप इट ना...?' मनिका ने उनकी तरफ बिना देखे कहा.
'अरे मैंने तो कुछ कहा ही नहीं...' जयसिंह ने मुस्काते हुए कहा.
'पापा! याद है ना मैंने कहा था आपसे कभी बात नहीं करुँगी मुझे छेड़ोगे तो...' मनिका ने उनकी तरफ एक नज़र देख अपनी धमकी दोहराई.
'अच्छा भई मैं दूसरी तरफ मुहँ करके बैठ जाता हूँ अगर तुम कहती हो तो...' जयसिंह ने मुहँ दीवार की तरफ घुमाते हुए कहा.
अब तक मनिका की शरम कुछ कम हो गई थी और उसे जयसिंह की नौटंकी पर हँसी आने लगी थी. उधर जयसिंह चुप-चाप मुहँ फेरे बैठे थे. मनिका को समझ नहीं आ रहा था कि वह अब क्या कहे?
'कपड़े ही तो हैं...' जयसिंह की आवाज़ आई.
'हाहाहाहाहाहा... हेहेहे...हीहीहीही... पापाआआ!' मनिका को उनकी बात ने गुदगुदा कर लोटपोट कर दिया था 'यू आर सो नॉटी पापा...!' वह हँसते हुए बोली थी.
जयसिंह भी हँसते हुए उसकी तरफ घूमे और पास सरक आए. मनिका को अभी भी हँसी छिड़ी हुई थी जब जयसिंह ने पहली बार खुद अपने हाथों से पकड़ कर उसे अपनी गोद में खींच लिया. वह हँसते-हँसते अपने आप को छुड़ाने के प्रयास कर रही थी और साथ ही बोल रही थी कि उन्होंने उसे चिढ़ाया है इसलिए वह उनके पास नहीं आएगी लेकिन असल में वहीं बैठी रही. जयसिंह ने उसे थोड़ा कसकर अपने से लगा लिया था. उधर उनके लंड ने भी उत्साह से सिर उठा रखा था.
'वैसे आप भी कम नहीं हो...पता चल गया मुझे ठीक है ना...' मनिका ने उलाहना देते हुए कहा.
'मैंने क्या किया..?' जयसिंह ने अनजान बनते हुए कहा, उन्हें लग रहा था कि वह उनकी कही बात के लिए ही कह रही है.
'जो आँखें फ़ाड़-फाड़ कर देख रहे थे ना अभी मूवी में बिपाशा-कैटरीना को और डांस करती फिरंगनों को...सब देखा मैंने...' मनिका ने उनकी गोद में बैठे-बैठे उन्हें हल्का सा धक्का दे कर कहा.
जयसिंह मनिका के इस खुलासे से सच में निरुत्तर हो गए थे. मनिका को उनके इस तरह झेंप जाने पर बहुत मजा आ रहा था, उसने खनकती हुई आवाज में आगे कहा,
'अब क्या हुआ...बोलो ना पापा? बढ़ा छेड़ रहे थे मुझे..!'
'अब मूवी भी ना देखूं क्या?' जयसिंह ने कहा था पर उनकी आवाज़ से साफ़ पता चल रहा था कि उनकी चोरी पकड़ी गई थी.
'हाहाहाहा... कैसे भोले बन रहे हो देखो तो...बता दो बता दो...नहीं कहूँगी मम्मी से आई प्रॉमिस..' पहली बार लगाम मनिका के हाथ में आई थी (मतलब उसे तो ऐसा ही लग रहा था) सो वह और जोर से हँसते हुए बोली थी.
'हाँ तो...क्या हो गया देख लिया तो..' जयसिंह ने भी हौले से अपना जुर्म कबूल कर लिया था.
'हाहाहा...' मनिका ने अपनी बात के साबित हो जाने पर ठहाका लगाया, उसे आज कुछ ज्यादा ही हँसी आ रही थी. इसी तरह हँसी-मजाक चलता रहा और रात ढल आई. जयसिंह और मनिका डिनर करने को भी रेस्टॉरेंट में ही गए क्योंकि रूम-सर्विस के विपरीत वहाँ वेटर खाना परोसने के लिए पास में तत्पर रहता है. लेकिन जयसिंह के लंड ने उस रात उन्हें ढंग से खाना भी नहीं खाने दिया.
हुआ ये कि जब जयसिंह और मनिका नीचे रेस्टॉरेंट में जाने के लिए कमरे से निकलने लगे थे तब मनिका ने अपने सूटकेस से लिप-ग्लॉस निकाल कर अपने होंठों पर लगाया था. यह देखना था कि बस जयसिंह का तो काम तमाम हो गया था, बड़ी मुश्किल से एलीवेटर से निकल कर वे रेस्टॉरेंट में कुर्सी तक पहुँचे थे. सामने बैठी मनिका उनसे हँस-मुस्कुरा कर बातें कर रही थी और वे उसके होंठों पर लगे अपने लंड के पानी मिले लिप-ग्लॉस की चमक देख-देख प्रताड़ित हो रहे थे. उन्हें लग रहा था जैसे उनका शरीर दीमाग की बजाय लंड के कंट्रोल में आ गया था और उनके पूरे जिस्म में हवस के मरोड़े उठ रहे थे. वे थोड़ा सा ही खाना खा सके थे और पूरा समय टेबल के नीचे अपने लेफ्ट हाथ से लंड को जकड़े हुए बैठे रहे थे.
उनकी कारस्तानी से अनजान मनिका ने खाना खाने के बाद मंगवाई आइसक्रीम खा कर जब अपने होंठों पर जीभ फिराई तो जयसिंह को हार्ट-अटैक आते-आते बचा था. इस बार वे अपने चेहरे के भावों पर काबू नहीं रख सके थे और मनिका को उनकी बेचैनी का आभास हो गया था.
'क्या बात है पापा?' मनिका के चेहरे पर चिंता झलक आई 'आप ठीक तो हैं?' उसने पूछा.
'ह्म्म्म...कुछ नहीं बस थोड़ा सिर में दर्द है. ' जयसिंह को समझ नहीं आया कि क्या कहें सो उनके जो मुहँ में आया वही बोल गए थे 'साली क्या बताऊँ तू जो मेरे लंड का रस चाट रही है जीभ फिरा-फिरा कर और पूछ रही है क्या हुआ...उससे सिर में नहीं लंड में दर्द है...' जयसिंह ने आँखें मींचते हुए सोचा था.
डिनर के बाद जब वे अपने कमरे में आए तो मनिका ने जयसिंह को जल्दी सो जाने को कहा और उनका सिर दबाने को भी पूछा था. लेकिन इतने दिन की उत्तेजना ने आज भयंकर रूप धारण कर लिया था और जयसिंह को डर था कि मनिका का स्पर्श कहीं उन्हें अपना आपा खोने पर मजबूर न कर दे, सो उन्होंने उसे मना कर दिया था. वे कंबल ओढ़ लेट गए थे ताकि अंदर अपने उफनते लंड को पकड़ कर काबू में रख सकें, उनके रोम-रोम में मनिका ने आग लगा दी थी और उन्होंने सुलगते हुए सोचा था 'इस हरामजादी मनिका को तो तरसा-तरसा कर इससे भीख मंगवाऊंगा मेरे लंड की एक दिन...'


***

मनिका ने देखा कि जयसिंह कपड़े बदले बिना ही सो गए थे. मनिका के पास भी करने को कोई काम न था सो वह भी नहाकर आई और सोने की तैयारी करने लगी. उसके बिस्तर में घुसने से पहले ही रूम का डोर क्नॉक हुआ, लॉन्ड्री वाला उनके कपड़े ले कर आया था. मनिका ने कपड़े रखवा कर उसे कुछ टिप (जयसिंह के पर्स से निकाल) दी थी और वह चला गया. मनिका भी जयसिंह के बगल में लेट गई और सोने की कोशिश करने लगी लेकिन वह दिन में भी एक बार नींद ले चुकी थी इसलिए उसे अभी इतनी जल्दी नींद नहीं आ रही थी पर उसने जयसिंह का ख्याल करके उन्हें कह दिया था कि उसे भी रेस्ट करना था.
वह लेटी-लेटी उस दिन की घटनाओं के बारे में सोचने लगी, कि कैसे दिन की शुरुआत में उसे उसके अंडर-गारमेंट्स शावर में पड़े मिले थे और जयसिंह ने उसका कितना मजाक बनाया था उस बात पर और फिर जब वह सैलून से वापस आई थी तब भी उसके पापा ने कितना स्वीटली रियेक्ट किया था, उसे एहसास हुआ था कि जयसिंह भले ही मजाक कर रहे थे पर उसमें उनकी तारीफ भी छुपी हुई थी और इसीलिए मनिका को लाज आने लगी थी और वह मेकअप उतार आई थी और आज एक बार फिर से लोगों ने उसे जयसिंह की गर्लफ्रेंड समझ लिया था. 'कितना सरप्राइजड थीं वे लड़कियाँ जब मैंने कहा कि वे मेरे पापा हैं...लोग भी न पता नहीं क्या-क्या सोचते रहते हैं.' मनिका ने थोड़ा तुनक कर सोचा था पर फिर उसका ध्यान जयसिंह की फीसिकेलिटी (शारीरिक बनावट) पर चला गया था. वह सोचने लगी कि ४७ साल की उम्र में भी जयसिंह उसके चाचा और ताऊजी की तरह मोटे व बेडौल नहीं थे और उन्होंने अपनी बॉडी को फिट रखा हुआ था 'मे-बी इसी वजह से उन लोगों ने पापा और मुझे कपल इमेजिन कर लिया था...पापा हैस मेंटेंड हिज़ बॉडी सो वैल के कोई सोचता ही नहीं कि वो मेरे पापा हैं.'
मनिका ने जयसिंह की तरफ देखा, कुछ ही पल पहले वे हिले थे और करवट बदल उसकी तरफ मुहँ किया था, उन्हें सोता पा मनिका धीरे से उठ कर अधलेटी हुई व अपने हाथ पीछे से टी-शर्ट में डाल अपनी ब्रा का हुक खोला और वापिस लेट गई.
इतने दिनों से मनिका और जयसिंह रोज बाहर घूम कर आते थे तो थके हुए होते थे और रूम में आ कर उन्हें जल्दी ही नींद आ जाया करती थी (जयसिंह को कभी-कभी नहीं भी आती थी) और उनकी अनबन हो जाने के बाद वे अपने ख्यालों में डूबे ही बैठे या सोए रहा करते थे. लेकिन उनके बीच के गिले-शिकवे मिट चुकने और आज का अपना पूरा दिन हॉटेल में ही रहने के बाद मनिका अच्छे से रेस्टेड थी. सो जब मनिका, जिसे रात को सोते वक़्त ब्रा पहनने की आदत नहीं थी, को कुछ देर तक नींद नहीं आई थी तो उसे अपनी पहनी ब्रा का कसाव खटकने लगा था और इसी वजह से उसने जयसिंह को सोते पा अपनी ब्रा का हुक खोल लिया था.
आग में घी डालना किसे कहते हैं जयसिंह को आज समझ आया था.
खाना खा कर लौटने के बाद जयसिंह मनिका के कहने पर लेट कर रेस्ट करने लगे थे, उन्हें पता था कि अगर वे रोजमर्रा की तरह नहाने घुसे तो शायद अपनी हवस की आँधी को रोक नहीं पाएंगे और मुठ मार बैठेंगे. अपने लिए हुए इस अजीबोगरीब वचन को निभाने के मारे वे बिस्तर पर जा लेटे थे. साथ ही वे इस ताक में भी थे कि क्या पता उनके सो जाने पर मनिका को भी जल्दी नींद आ जाए और वे कुछ छेड़-छाड़ कर अपनी प्यास कुछ शाँत करने में सफल हो सकें और इसी के चलते मनिका के बिस्तर में आ जाने के बाद उन्होंने करवट बदली थी. पर मनिका ने तो उनके मन की आँधी को भूचाल में तब्दील कर दिया था.
जब मनिका ने अपनी ब्रा का हुक खोला था तो उसकी टी-शर्ट पीछे से ऊपर हो गई थी और कमरे की हल्की रौशनी में उसकी नंगी कमर और पीठ का दूधिया रंग जयसिंह ने एक छोटे से पल के लिए अध्-मिंची आँखों से देखा था.
'उह्ह्ह...उम्म्म...' आखिर जयसिंह के मुहँ से दबी हुई आह निकल ही गई थी, शुक्र इस बात का था कि उसके वापस लेट जाने तक वे किसी तरह रुके रहे थे. मनिका ने चौंक कर उनकी तरफ देखा, उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं थी.
'पापा?' मनिका उठ बैठी थी और एक पल के लिए उसका हाथ जल्दी से उसकी पीठ पर चला गया था. 'पापा उठे हुए हैं..?' उसने धड़कते दिल से सोचा. पर जयसिंह पहले की भाँती जड़ पड़े रहे.
'पापा आप जाग रहे हो क्या?' मनिका ने फिर से पूछा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला परंतु इस बार जयसिंह ने फिर से एक आह भरी थी जैसे बहुत अनकम्फ़र्टेबल हों. मनिका ने अब बेड-साईड से लाइट ऑन की और उन्हें ध्यान से देखा. उनके चेहरे पर पसीना आ रखा था.
'पापा! आर यू ऑलराइट?' मनिका ने थोड़ा घबराकर उन्हें हिलाया और उठाने लगी. जयसिंह ने भी एक-दो पल बाद हड़बड़ाने का नाटक कर आँखें खोल दीं और गहरी साँसें भरने लगे.
'पापा यू आर सिक!' मनिका ने उनके तपते माथे पर हाथ रखते हुए कहा. वह उनके ऊपर झुकी हुई थी और उसकी खुली ब्रा में झूलते उरोज जयसिंह के चेहरे के सामने थे.
'हम्म्प्...' उनका पारा और बढ़ गया था.
जयसिंह उठ कर बैठ गए थे, आशँकाओ से भरी मनिका बार-बार उनसे पूछ रही थी कि वे कैसा फील कर रहे हैं और जयसिंह कम्बल के अंदर अपने लंड का गला दबाते हुए उसे आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे थे कि वे ठीक हैं बस उन्हें माइनर सा माइग्रेन (तेज़ सिरदर्द) का अटैक आया था. उन्होंने कहा कि वे नहा कर आते हैं ताकि थोड़ा रिफ्रेश हो जाएं.
'साला अब तो रेसोल्युशन गया भाड़ में...लगता है मुठ मारना ही पड़ेगा वरना आज तो लंड और आँड दोनों की एक्सपायरी डेट आ जाएगी.' सोच कर जयसिंह ने कम्बल के अंदर अपने लंड का मुहँ ऊपर की तरफ कर उसे अपने अंडरवियर के एलास्टिक में कैद किया ताकि उठ खड़े होने पर उनकी पैंट में कहीं तम्बू न बना हो. जब वे उठे थे तब लंड का मुहाना अंडरवियर से दो इंच बाहर निकल झाँक रहा था पर उनकी शर्ट से ढँका होने के कारण मनिका को दिखाई नहीं पड़ सकता था. वे भारी क़दमों से चलते हुए बाथरूम में घुस गए.
बेड पर बैठी मनिका के चेहरे पर चिंता के भाव थे, उसने हाथ पीछे ले जा कर अपनी ब्रा का हुक फिर से लगाया और जयसिंह के बाहर आने का इंतजार करने लगी.
बाथरूम में जा कर जयसिंह ने बाथटब में ठंडा पानी भरा और उसमें अपना बदन डुबो कर लेट गए. अंदर आते-आते एक बार फिर वे अपनी प्रतिज्ञा के प्रति थोड़ा सीरियस हो गए थे. ठंडे पानी से भरे टब में डूबे वे अपने लंड और टट्टों को रगड़ रहे थे ताकि अपनी गर्मी कुछ शांत कर सकें, 'ये अचानक मुझे क्या हो गया है...बिल्कुल भी काबू नहीं कर पा रहा हूँ अपने-आप को...कुतिया की जवानी ने आखिर मेरे दीमाग का फ्यूज उड़ा ही दिया है लगता है...क्या होंठ है रांड के, मेरे लंड-रस का स्वाद तो आया ही होगा उसे....आह्ह...' जयसिंह का लंड उनके हाथ की कैद से बाहर निकलने को फड़फड़ा उठा था. 'भड़वी ने ब्रा का हुक और खोल लिया ऊपर से...क्या झूल रहे थे साली के बोबे...ओहोहो...मसल-मसल कर लाल कर दूँगा...' इसी तरह के गंदे-गंदे विचारों से अपनी बेटी का बलात्कार करते वे आधे घंटे तक पानी में पड़े रहे थे. पर फिर धीरे-धीरे ठंडे पानी का असर होने लगा था, उनके बदन की गर्मी रिलीज़ होने लगी और बदन सुन्न होने लगा. लंड और आँड भी अब शांत पड़ने लगे थे जिससे जयसिंह के दीमाग ने एक बार फिर काम करना शुरू कर दिया था.
'अगर ये हाल रहा तो फिर तो मनिका की झाँट भी हाथ नहीं लगेगी...मुझे अपने बस में रहना ही होगा! लेकिन साली हर वक्त जिस्म की नुमाईश करती रहेगी तो दीमाग तो ख़राब होगा ही...पर उसकी लिप-ग्लॉस तो मैंने ही ख़राब की थी...हाँ तो मुझे क्या पता था ऐसे सामने बैठ कर होंठ चाटेगी रांड..? जो भी हो आज इतना समझ आ गया है कि लंड के आगे दीमाग की एक नहीं चलती है...हाहाहाहा...' जयसिंह मन ही मन हँसे थे. अब वे राहत महसूस करने लगे थे. उनका इरेक्शन भी अब मामूली सा रह गया था. उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि जल्द ही उन्हें कोई अहम कदम उठाना होगा, मनिका के इंटरव्यू को सिर्फ दो दिन बचे थे और अब वे अपनी मंज़िल से भटकने का खतरा मोल नहीं ले सकते थे, यह विचार आते ही उनके लंड का रहा-सहा विरोध भी खत्म हो गया था. जयसिंह ने कामना की के उनकी किस्मत, जिसने अब तक उनका साथ इतना अच्छे से निभाया था, शायद आगे का रास्ता भी दिखा दे और इस तरह एक नए जोश के साथ वे बाथटब से बाहर निकल आए और तौलिए से बदन पोंछ कर अपना पायजामा-कुरता पहन लिया.
जब वे बाहर निकल कर आए तो मनिका बेड से उतरकर उनके पास आई और उनकी ख़ैरियत जाननी चाही. जयसिंह ने मुस्कुरा कर कहा,
'डोंट वरी मनिका...अब सब ठीक है...' और उसका हाथ पकड़ उसे वापस बिस्तर में ले गए थे.

***

बीती रात के बाद जयसिंह को एक बात का भान अच्छी तरह से हो गया था, वो यह कि मनिका का हुस्न भी उनकी मँजिल पर लगा एक ऐसा गुलाब था जिसमे काँटे ही काँटे थे क्यूँकि उसके हुस्न में उनके लिंग को बेबस करने वाला जादू था और उनके लिंग में उनके दीमाग को बेबस करने की शक्ति. अगर उन्हें फूल तोड़ना है तो काँटों से बचते रहना होगा और उसके लिए एक बार गुलाब से नज़र हटानी जरूरी थी.
सवेरे उठ कर जयसिंह ने आत्मचिंतन किया था और पाया कि उन्हें अभी के लिए अपनी काम-वासना को न जागने देते हुए मनिका के मन में काम-क्रीड़ा के प्रति उत्सुकता के बीज बोने पर ध्यान देना होगा. परन्तु वे नहीं जानते थे कि इस बार जयसिंह का साथ उनकी किस्मत नहीं बल्कि उनकी बीवी और मनिका की माँ संचिता देने वाली थी.
दरअसल जब से वे दोनों दिल्ली आए थे मनिका की अपनी माँ से एक बार भी बात नहीं हुई थी. जब भी घर से कॉल आता था जयसिंह के पास ही आता था और वे सब ठीक बता कर फोन रख दिया करते थे. उस दिन उठने के बाद जब जयसिंह और मनिका ने ब्रेकफास्ट कर लिया उसके बाद जयसिंह नहाने चले गए थे.
मनिका बैठी यूँही अखबार के पन्ने पलट रही थी तभी पास पड़े जयसिंह के फोन पर रिंग आने लगी, उसकी माँ का फोन था.
'हैल्लो?' मनिका ने फोन उठाया. उसे अपनी माँ से हुई अपनी आखिरी बातें याद आन पड़ी थी.
'हैल्लो लवली?' उसकी माँ ने पूछा 'कैसे चल रहे हैं इंटरव्यू?' संचिता को उन्होंने झूठ जो कह रखा था कि इंटरव्यू तीन स्टेज में होंगे.
'इंटरव्यू..? ओह हाँ अच्छे हुए मम्मी...परसों लास्ट राउंड है.' मनिका एक पल के लिए समझी नहीं थी पर फिर उसे भी याद आया कि उन्होंने घर पर क्या बोल रखा था, उसने माथे पर हाथ रख सोचा, 'बाप रे अभी पोल खोल देती मैं पापा के इतना समझाने के बाद भी...'
'पापा कहाँ है तुम्हारे?' संचिता ने पूछा.
'नहाने गए है...' मनिका ने बता दिया.
'इतनी लेट..?' संचिता ने एक और सवाल किया.
'ओहो मम्मी...अब यहाँ रूम पर ही रहते हैं तो आराम से उठना-नहाना होता रहता है...' मनिका ने संचिता के सवालों से झुँझला कर कहा. उसे बुरा इस बात से भी लगा था कि उसकी माँ ने एक बार भी उससे उसकी खैरियत नहीं पूछी थी.
जब जयसिंह नहा कर बाहर आए थे तब तक उन्हें आभास हो चुका था क़ि कमरे में मनिका किसी से ऊँची आवाज़ में बाते कर रही थी लेकिन शावर के पानी की आवाज़ में उन्हें उसके कहे बोल साफ़ सुनाई नहीं दिए थे और जब तक उन्होंने शावर ऑफ किया था मनिका की आवाज़ आनी बंद हो चुकी थी. बाहर निकल कर मनिका के तेवर देख उन्होंने पूछा,
'क्या हुआ मनिका? किस से बात कर रहीं थी?'
'आपकी बीवी से और किस से...?' मनिका ने गुस्से से तमतमाते हुए कहा.
मनिका के अपनी माँ को थोड़ी तल्खी से जवाब देने के बाद उसकी माँ भी छिड़ गईं थी. संचिता ने फिर से वही पुराना राग आलापना शुरू कर दिया था कि कैसे वह हाथ से निकलती ही जा रही है और कितनी बद्तमीज़ भी हो गई है इत्यादि. मनिका के भी दिल्ली आ कर कुछ पर निकल चुके थे वह भी अब वो मनिका नहीं रही थी जो चुपचाप सुन लेती थी.. उसने भी अपनी माँ के सामने बोलना शुरू कर दिया कि कैसे वे हमेशां उस पर लगती रहती हैं जबकि उसकी कोई गलती ही नहीं होती, जिस पर संचिता ने हमेशा की तरह उसके पापा पर उसे शह देने का आरोप मढ़ा था. जयसिंह की बात आने पर मनिका अब उनका भी पक्ष लेने लगी और आखिर गुस्से में आ फोन ही डिसकनेक्ट कर दिया था, उसने फोन रखने से पहले अपनी माँ से कहा था,
'आपसे तो सौ गुना अच्छे हैं पापा...मेरा इतना ख्याल रखते हैं...बेचारे पता नहीं इतने साल से उन्होंने आपको कैसे झेला है..?' (संचिता उसके मुहँ से ऐसी बात सुन स्तब्द्ध रह गई थी)
जयसिंह के बाहर आ जाने के बाद मनिका ने शिकायत पर शिकायत करते हुए उन्हें बताना चालू किया कि कैसे उसको मम्मी ने फिर से डाँट दिया था, 'और बस एक बार जब वो शुरू हो जातीं है तो फिर पूरी दुनियां की कमियाँ मुझ में ही नज़र आने लगती है उनको...लवली ऐसी लवली वैसी...ढंग से बाहर निकलो, ढंग से कपड़े पहनो, ढंग से ये करना ढंग से वो करना...और जब कुछ नहीं बचता तो फिर आप का नाम लेकर ताने...पापा की शह है तुम्हें...पापा बिगाड़ रहे हैं तुम्हें...हद होती है मतलब...!' मनिका का गुस्सा उसकी माँ की कही बातों को याद कर बार-बार फूट रहा था.
'मैं तो मर जाऊं तो ही चैन आएगा उनको...' मनिका रुआँसी हो बोली.
जयसिंह उसके पास गए और उसके कंधे पर हाथ रख उसे ढाँढस बँधाते हुए बोले,
'तुम दोनों का भी हर बार का यही झगड़ा है...फिर भी हर बार तुम अपसेट हो जाती हो, कितनी बार कहा है बोलने दिया करो उसे...'
'हाँ पापा...बट मुझे बुरा नहीं लगता क्या...आप ही बताओ?' मनिका ने उनका सपोर्ट पा कर कहा 'मैंने भी कह दिया आज तो कि आपसे तो पापा अच्छे हैं और वो पता नहीं कैसे झेलते हैं आपको..' और उन्हें बताया.
'हैं..?' जयसिंह की आँखें आश्चर्य से बड़ी हो गईं थी 'सचमुच ऐसा बोल दिया तुमने अपनी माँ से..?' उन्होंने पूछा.
'हाँ...' मनिका को भी अब लगा कि वह कुछ ज्यादा ही बोल गई थी.
'हाहाहा...संचिता की तो धज्जियाँ उड़ा दीं तुमने...' जयसिंह हँसते हुए बोले.
'और क्या तो पापा मुझे गुस्सा आ गया था तेज़ वाला..' मनिका ने धीरे से कहा 'पर ज्यादा ही बोल दिया कुछ...' और अपनी गलती स्वीकारी.
'हेहे...अरे तुम चिंता मत करो मैं सँभाल लूँगा उसे...' जयसिंह ने प्यार से मनिका का गाल खींच दिया था. मनिका भी अपनी मुस्कान रोक न सकी.
'ओह पापा काश मम्मी भी आप के जैसी ही कूल और प्यार करने वाली होती...' मनिका ने आह भर कहा.
'अब होतीं तो बात अलग थी मगर अब तो तुम्हें जो है उसी से काम चलाना पड़ेगा...' जयसिंह ने मुस्का कर खुद की तरफ इशारा किया था. 'मम्मी भी मेरी तरह हो सकती थी अगर उसके लंड होता तो..हहा' जयसिंह ने मन में सोचा था और उनकी मुस्कान और बड़ी हो गई थी.
कुछ देर समझाने-बुझाने पर मनिका का मूड कुछ ठीक हो गया था. जयसिंह ने उसके सामने ही अपनी बीवी को फोन लगा कर उससे हर वक़्त टोका-टोकी न करने की अपनी हिदायत दोहरा दी थी. जिस से वह थोड़ी और बहल गई थी.
वे बैठ कर उस दिन के लिए कुछ प्लान करते उससे पहले ही जयसिंह के फ़ोन पर फिर से रिंग आने लगी. इस बार जयसिंह ने ही फोन उठाया, उनके ऑफिस से कॉल आया था. इतने दिन ऑफिस से नदारद रहने की वजह से उनके वहाँ अब काम अटकने लगा था. सो जयसिंह फोन पर अपने काम से जुड़ी अपडेटस् लेने में लग गए थे.
जब मनिका ने देखा कि जयसिंह लम्बी बातचीत करेंगे तो वह इधर-उधर पड़ा उनका छोटा-मोटा सामान व्यवस्थित करने लगी. फिर उसने बेड के पास रखा अपना सूटकेस खोला और लॉन्ड्री से वापस आए अपने कपड़े जँचाने लगी.
जयसिंह और मनिका ने अपना लगेज बेड की एक तरफ बनी एक अलमारी के पास नीचे रखा हुआ था. पहले तो वे सिर्फ दो ही दिन रुकने के इरादे से आए थे, सो उन्होंने अपना सामान ज्यादा खोला नहीं था. फिर जब उनका रुकने का पक्का हो गया तो मनिका को लगा था कि शायद उसके पिता अपना सामान उसमें रखें और जयसिंह, जिनके पास ज्यादा सामान नहीं था, ने मनिका उसे यूज़ कर लेगी (और वे उसका सामान छेड़ लेंगे) करके अलमारी खाली छोड़ दी थी. मनिका ने अपना सामान सेट् करने के बाद भी जब पाया कि जयसिंह फोन पर ही लगे हुए थे तो उसने वैसे ही देखने के लिए अलमारी खोल ली थी.





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