Friday, May 24, 2013

हिंदी सेक्सी कहानियाँ प्रेम युद्ध-2

हिंदी सेक्सी कहानियाँ
 प्रेम युद्ध-2
लेखक : प्रेम गुरु 
प्रेषिका : स्लिमसीमा 
"मधुर, क्या मैं एक बार आपके हाथों को चूम सकता हूँ ?" 
मेरे अधरों पर गर्वीली मुस्का थिरक उठी। अपे प्रियतम को प्रणय-िवेद करते देख कर रूप-गर्विता होे का अहसास किता मादक और रोमांचकारी होता है, मैंे आज जाा था। मैंे म में सोचा 'पूरी फूलों की डाली अपी खुशबू बिखरे के लिए सामे बिछी पड़ी है और वो केवल एक पत्ती गुलाब की मांग रहे हैं !' 
मैंे अपे हाथ उकी ओर बढ़ा दिए। 
्होंे कांपते हाथों से मेरे दोों हाथों को एक बार फिर से पकड़ लिया और होले से उ पर अपे होंठ लगा दिए। उकी छुअ मात्र से ही मेरा पूरा बद एक अोखे आंद और रोमांच से झा उठा। 
चुम्ब प्रेम का प्यारा सहचर होता है। चुम्ब हृदय स्पंद का मौ ्देश और प्रेम गुंज का लहराता हुआ कम्प होता है। यह तो व जीव का प्रारम्भ है। 
'ओ.... मेरे प्रेम के प्रथम चुम्ब ! मैं तुम्हें अपे हृदय में छुपा कर रखूँगी और अपे स्मृति मंदिर में किसी अमोल खजाे की तरह सारे जीव भर संजोकर अपे पास रखूंगी' 
कुछ पलों तक वो अपे होंठों से मेरी हथेलियों को चूमते रहे। उकी गर्म साँसें और हृदय की धड़क मैं अपे पास महसूस कर रही थी। मेरा भी रोम रोम पुलकित हो रहा था। बारी बारी वो दोों हाथों को चूमते रहे। फिर अचाक उ्होंे अपी बाहें मेरी ओर फैला दी। मैं किसी अजाे जादू से बंधी उके सीे से लग गई। उ्होंे मुझे जोर से अपे बाहुपाश में भींच लिया। 
मेरे और उके दिलों की धड़क जैसे कोई प्रतियोगिता ही जीता चाह रही थी। प्रेम धीरे धीरे मेरी पीठ पर हाथ फिराे लगे। अब उके दोों हाथ मेरे काों के दोों ओर आ गए और उ्होंे मेरा सर पकड़ लिया। मेरी लरजती आँखें किसी ए रोमांच में उींदी सी हो रही थी, अधर कांप रहे थे और पलकें अपे आप मुंद रही थी। 
ओह…. अचाक मैंे उकी गर्म साँसें अपे माथे पर महसूस की। फिर उके थरथराते होंठों से मेरा माथा चूमा और फिर मेरी बंद पलकों को चूम लिया। मैं तो बस बंद पलकों से उके बरसते प्रेम को ही अुभव करती रह गई 
के कांपते होंठ जैसे कह रहे थे 'मधुर, आज मैं तुम्हारे इ लरजते अधरों और पलकों की सारी लाज हर कर इमें सतरंगी सपे भर दूंगा मेरी प्रियतमा' 
मैंे म ही म कहा 'हाँ मेरे साज !' पर मैंे अपी पलकें हीं खोली। मैं भला उके इस सुहरे सपे को कैसे तोड़ सकती थी। 
फिर उके होंठ मेरे गालों से होते हुए मेरे अधरों पर आकर रुक गए। होले से बस मेरे अधरों को छू भर दिया। जैसे कोई आशा भंवरा किसी कलि के ऊपर बैठ कर होले होले उसका मकरंद पी लेता है। आह …. बरसों के प्यासे इ अधरों का प्रथम चुम्ब तो मेरे रोम रोम को जैसे पुलकित करे लगा। मेरा म अब चाहे लगा था कि वो जोर से मेरे अधरों को अपे मुँह में भर कर किसी कुशल भंवरे की तरह इका सारा मधु पी जाएँ। आज मैंे जाा कि गुलाब की अधखिली कलि पर पड़ी ओस (शबम) की बूँद पर जब सूरज की पहली किरण पड़ती है तो वो चटक कर क्यों खिल उठती है। अमराई की भीी सुगंध को पाकर कोयलिया क्यों पीहू पीहू बोले लगती है। 
"मधुर ?" 
"हाँ मेरे प्रियतम !" 
"मधुर मैं एक चातक की तरह अपे धड़कते दिल और लरजते होंठों से तुम्हारे अधरों को चूम रहा हूँ। आज तुमे मेरे उ सारे ख़्वाबों को जैसे पंख लगा कर हकीकत में बदल डाला है। मैं अपी सपीली आँखों में तुम्हारे लिए झिलमिलाते सितारों की रोशी संजो लाया हूँ। तुम्हारे इ अधरों की मिठास तो मैं अगले सात ज्मों तक भी हीं भूल पाऊंगा मेरी प्रियतमा !" 
"मेरे प्रेम ! मेरे प्रियतम ! मेरे प्रथम साज ! … आह …" पता हीं किस जादू से बंधी मैं बावरी हुई उके होंठों को जोर जोर से चूमे लगी। आज मैंे जाा कि क्यों सरिता सागर से मिले भागी जा रही है ? क्यों बादल पर्वतों की ओर दौड़ रहे हैं। क्यों परवाे अपी जाकी परवाह किये बिा शमा की ओर दौड़े चले आते हैं, पपीहरा पी कहाँ पी कहाँ की रट क्यों लगाए है। क्यों कोई कलि किसी भ्रमर को अपी और ललचाई आँखों से ताक रही है …. 
एक बात बताऊँ ? जब रमेश भैया की शादी हुई थी तब मैं मिक्की (मेरी भतीजी) जिती बड़ी थी। कई बार मैंे भैया और भाभी को आपस में चूमा चाटी करते देखा था। भाभी तो भैया से भी ज्यादा उतावली लगती थी। मुझे पहले तो अटपटा सा लगता था पर बाद में उ बातों को स्मरण करके मैं कई बार रोमांच में डूब जाया करती थी। प्रेम से सगाई होे के बाद उस रात मैंे मिक्की को अपी बाहों में भर कर उसे खूब चूमा था। मिक्की तो खैर बच्ची थी पर उस दि मैंे चुम्ब का असली अर्थ जाा था। हाय राम …. मैं भी किता ग्दा सोच रही हूँ। 
प्रेम े मुझे अपी बाहों में जकड़ रखा था। मैं अब चित्त लेट गई थी और वो थोड़ा सा मेरे ऊपर आ गए थे। उ्हे मेरा सर अपे हाथों में पकड़ लिया और फिर अपे जलते होंठ मेरे बरसों के प्यासे लरजते अधरों से जैसे चिपका ही दिए थे। मैंे भी उ्हें अपी बाहों में जोर से कस लिया। उके चौड़े सीे के ीचे मेरे उरोज दब रहे थे। उके शरीर से आती पौरुष गंध े तो मुझे जैसे काम विव्हल ही बा दिया था। 
मुझे लगा मैं अपे आप पर अप ियंत्रण खो दूँगी। मेरे लिए यह ितांत या अुभव था। मैं धीरे धीरे प्रेम के रंग में डूबती जा रही थी। एक मीठी कसक मेरे सारे शरीर को झा रही थी। 
हम दोों आँखें बंद किये एक दूसरे को चूमे जा रहे थे। कभी वो अपी जीभ मेरे मुँह में डाल देते कभी मैं अपी जीभ उके मुँह में डाल देती तो वो उसे किसी कुल्फी की तरह चूसे लगते। कभी वो मेरे गालों को कभी गले को चूमते रहे। मेरे कोमल र्म मुलायम अधर उके हठीले होंठों के ीचे पिस रहे थे। मुझे लग रहा था कहीं ये छिल ही ा जाएँ पुच की आवाज के साथ उके मुँह का रस और आती मीठी सुगंध मुझे अ्दर तक रोमांच में सुवासित करे लगी थी। मैं तो बस उम्… उम्…. ही करती जा रही थी। 
अब उका एक हाथ मेरे उरोजों पर भी फिरे लगा था। मुझे अपी जांघों के बीच भी कुछ कसमसाहट सी अुभव होे लगी थी। मुझे लगा कि मेरी लाडो के अ्दर कुछ कुलबुलाे लगा है और उसमें गीलाप सा आ गया है। अब वो थोड़े से ीचे हुए और मेरे उरोजों की घाटी में मुँह लगा कर उसे चूमे लगे। मेरे लिए यह किसी स्वर्गिक आंद से कम हीं था। मैं तो आज चाह रही थी कि वो मेरी सारी लाज हर लें। मेरी तो मीठी सिसकियाँ ही िकले लगी थी। 
अचाक उके हाथ मेरी पीठ पर आ गया और और कुर्ती के अ्दर हाथ डाल कर मेरी र्म पीठ को सहलाे लगे। मुझे लगा यह तंग कुर्ती और चोली अब हमारे प्रेम में बाधक ब रही है। 
"मधुर !" 
"उम्म्म …?" 
"वो… वो… मैं तुम्हारी कमर पर भी एक गज़रा लगा दूं क्या ?" 
ओह … यह प्रेम भी अजीब आदमी है। प्रेम के इ ्मुक्त क्षणों में इ्हें गज़रे याद आ रहे हैं। ऐसे समय में तो यह कहा चाहिए था कि 'मधुर अब कपड़ों की दीवार हटा दो !' मुझे हंसी आ गई 
प्रेम मेरे ऊपर से हट गया। मेरा म से अलग होे को हीं कर रहा था पर जब प्रेम हट गया तो मैं भी उठ कर पलंग के दूसरी तरफ (जहां छोटी मेज पर गुलदा और ाईट लेम्प रखा था) खड़ी हो गई 
प्रेम े मेरी कुर्ती को थोड़ा सा ऊपर करके मेरी कमर पर गज़रा बांध दिया। फिर मेरी ाभि के ीचे पेडू पर एक चुम्ब लेते हुए बोला "मधुर ! अगर तुम यह कुर्ती िकाल दो तो तुम्हारी पतली कमर और ाभि के ीचे गज़रे की यह लटक बहुत खूबसूरत लगेगी।" 
मैं उका मोरथ बहुत अच्छी तरह जानती थी। वो सीधे तौर पर मुझे अपे कपड़े उतारे को हीं बोल पा रहे थे। अगर वो बोलते तो क्या मैं उ्हें अब मा कर पाती ? मैंे मुस्कुराते हुए उकी और देखा और अपे हाथ ऊपर उठा दिए। प्रेम े झट से कुर्ती को ीचे से पकड़ कर उसे िकाल दिया। अब तो मेरी कमर से ऊपर केवल डोरी वाली एक पतली सी अंगिया (चोली) और अमृत कलशों के बीच झूलता मंगलसूत्र ही बचा था। मुझे लगा अचाक मेरे उरोज कुछ भारी से हो रहे हैं और इस चोली को फाड़ कर बाहर िकले को मचल रहे हैं। मैंे मारे शर्म के अपी आँखें बंद कर ली। 
अब प्रेम े मुझे अपे सीे से लगा लिया। उके दिल की धड़क मुझे साफ़ महसूस हो रही थी। उके फिसलते हाथ कभी पीठ पर बंधी चोली की डोरी से टकराते कभी मेरे ितम्बों पर आ जाते। मेरी सारी देह एक अूठे रोमांच में डूबे लगी थी। 
अचाक उके हाथ मेरे लहंगे की डोरी पर आ गए और इस से पहले की मैं कुछ समझूं उ्होंे डोरी को एक झटका लगाया और लहंगा किसी मरी हुई चिड़िया की तरह मेरे पैरों में गिर पड़ा। मेरी जाँघों के बीच तो अब मात्र एक छोटी सी पेंटी और छाती पर चोली ही रह गई थी। प्रेम के हाथ मेरी जाँघों के बीच कुछ टटोले को आतुर होे लगे थे। मुझे तो अब ध्या आया कि ाईट लैम्प की रोशी में मेरा तो सब कुछ ही उजागर हो रहा है। 
"ओह हीं प्रेम … ? पहले यह लाइट … ओह … रुको … प्लीज …। " मेरे लिए तो यह अप्रत्याशित था। मेरी तो कुछ समझ ही हीं आ रहा था। मैं अपे आपको उकी पकड़ से छुड़ाे के लिए कसमसा रही थी ताकि ीचे होकर अपा लहंगा संभाल सकूं। हमारी इसी झकझोर में मेरा हाथ साथ वाली मेज पर पड़े गुलदा से जा टकराया। इसी आपाधापी में में वो गुलदा ीचे गिर कर टूट गया और मेरी तर्जी अंगुली में भी उसका एक टुकड़ा चुभ गया। 
चोट कोई ज्यादा हीं थी पर अंगुली से थोड़ा सा खू िकले लगा था। प्रेम े जब अंगुली से खू िकलता देखा तब उ्हें अपी जल्दबाजी और गलती का अहसास हुआ। 
"स … सॉरी … म … मधु मुझे माफ़ कर देा !" 
"क … कोई बात हीं !" मैंे अपी अंगुली को दूसरे हाथ से पकड़ते हुए कहा। 
"ओह…. सॉरी मधु … तुम्हारे तो खू िकले लगा है !" वो कुछ उदास से हो गए। 
अब उ्होंे पहले तो मेरा हाथ पकड़ा और फिर अचाक मेरी अंगुली को अपे मुँह में ले लिया। मैंे बचप में कई बार ऐसा किया था। जब कभी चोट लग जाती थी तो मैं अक्सर उस पर दवाई या डिटोल लगाे के स्था पर अपा थूक लगा लिया करती थी। पर आज लगी इस चोट के बारे में कल जब मील पूछेगी तो क्या बताऊँगी ? 
मुझे बरबस हिंदी के एक प्रसिद्ध कवि की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आ गई : 

 वला रस भेद  जानत, सेज गई जिय मांह डरी 
रस बात कही तब चौंक चली तब धाय के कंत े बांह धरी 
 दोउ की झकझोर में कटी ाभि ते अम्बर टूट परी 
कर कामिी दीपक झांप लियो, इही कारण सु्दर हाथ जरी 
इही कारण सु्दर हाथ जरी... 

अब प्रेम े उठ कर उस ाईट लैम्प को बंद तो कर दिया पर रोशदा और खिड़की से आती चाँद की रोशी में भी सब कुछ तो ज़र आ ही रहा था। रही सही कसर बाथरूम में जलती लाइट पूरी कर रही थी। अब तो मेरे शरीर पर केवल एक चोली और पेंटी या गज़रे ही बचे रह गए थे। मैंे लाज के मारे अपा एक हाथ वक्ष पर रख लिया और दूसरा हाथ अपे अमोल खजाे पर रख कर घूम सी गई 
ओह … मुझे अब समझ आया कि गज़रा लगाा तो एक बहाा था वो तो मेरे कपड़े उतरवाा चाहता था। कित ासमझ है यह प्रेम भी। अगर वो मुझे स्वयं अपे कपड़े उतारे को भी कहता तो क्या मैं इस मधुर मिल के उ्मुक्त पलों में उ्हें मा कर पाती ? 
प्रेम कुछ शर्मिंदा सा हो गया था उसे मुझे पीछे से अपी बाहों में भरे रखा। उका एक हाथ मेरी कमर पर था और दूसरा मेरे उरोजों पर। वो मेरी पीछे चिपक से गए थे। अब मुझे अप ितम्बों पर कुछ कठोर सी चीज की चुभ महसूस हुई। मैंे अपी जांघें कस कर बंद कर ली। पुरुष और ारी में किता बड़ा विरोधाभास है। प्रकृति े पुरुष की हर चीज और अंग को कठोर बाया है चाहे उका हृदय हो, उकी छाती हो, उका स्वभाव हो, उके विचार हों या फिर उके कामांग। पर ारी की हर चीज में माधुर्य और कोमलता भरी होती है चाहे उसकी भावाएं हों, शरीर हो, हृदय हो या फिर उका कोई भी अंग हो। 
प्रेम कुछ उदास सा हो गया था। वो अपी इस हरकत पर शायद कुछ शर्मिंदगी सी अुभव कर रहा था। मैं अपे प्रियतम को इस मधुर मिल की वेला में इस प्रकार उदास हीं होे देा चाहती थी। मैं घूम कर फिर से उके सीे से लग गई और उके गले में बाहें डाल कर उके होंठों पर एक चुम्ब ले लिया। जैसे किसी शरारती बच्चे को किसी भूल के लिए क्षमा कर दिया जाये तो उसका हौसला और बढ़ जाता है प्रेम े भी मेरे होंठों, गालों और उरोजों की घाटी में चुम्बों की झड़ी ही लगा दी। इसी उठापटक में मेरा जूड़ा खुल गया था और मेरे सर के बाल मेरे ितम्बों तक आ गए। 
कई भागों में समाप्य ! 
आपका प्रेम गुरु premguru2u@gmail.com
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