Saturday, November 5, 2011

हिंदी सेक्सी कहानियाँ मुंबई लोकल--2

हिंदी सेक्सी कहानियाँ

मुंबई लोकल--2

गतान्क से आगे...............
"एक बात तो पक्की है दोस्त" सुशील ने मेरी लंबी बात आ जवाब दिया "ये
ज़्यादा दिन ऐसे नही चल सकता. किसी ना किसी तरह से इस सबका कोई ना कोई
अंजाम तो होगा ही. पर हां तेरी बात से इनकार नही है मुझे,

निशा है तो कमाल की पर कमाल की चीज़ें कभी कभी ख़तरनाक भी होती हैं"

"तू ऐसा कैसे कह सकता है यार. तूने कभी उससे बात भी करके देखा है?"

"सब औरतें एक जैसी ही होती हैं दोस्त" सुशील ने सिगरेट का लंबा कश लेते
हुए कहा "और इनमें उनका कोई दोष भी नही है. भगवान ने बनाया ही ऐसा है
उनको, एक जैसा. तीरिया चरित्र के बारे में तो सुना है ना?"


मैं गुस्से से घूरकर देखा तो सुशील समझ गया के वो हद के बाहर जा रहा था.


"देख यार" वो आगे होकर मेरा हाथ पकड़ते हुए बोला "मैं सिर्फ़ ये कह रहा
हूँ के तू जो कर रहा है ख़तरनाक है. तेरी पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर सकता
है. जो इज़्ज़त तूने इन सारे सालों में कमाई है एक पल में ख़तम हो सकती
है"


वो सही कह रहा था. मेरी बीवी, मेरे परिवार, मेरे दोस्तों, और सोसाइटी की
नज़र में मेरी बहुत इज़्ज़त थी जो कि एक पल में ख़तम हो जाती अगर लोगों
को ये खबर हो जाती के मैं बुढ़ापे में ऐसे गुल खिला रहा हूँ.

"देख तू इस वक़्त 2 औरतों के साथ भिड़ा हुआ है" सुशील ने अपनी बात जारी
रखी "और औरतें हमारी तरह नही होती" तुझे लगता है के तेरी बीवी बेवकूफ़
है? आइ आम शुवर के शक तो उसको अब तक ऑलरेडी हो ही चुका होगा"

"उसने कुच्छ कहा तो नही अब तक" मैने जवाब दिया

"ऑफ कोर्स नही कहा होगा. वो तुझसे ज़्यादा समझदार है. वो इस उमर में अपनी
शादी थोड़े ही ख़तम करेगी"

"वैसे आजकल कहती है के उसको अजीब अजीब ख्वाब आते हैं. कहती है के उसके
सपनो में मैं किसी दूसरी औरत के साथ होता हूँ. पर फिर खुद ही हॅस्कर बात
टाल देती है"

"मुझे तो लगता है के वो तुझे इशारा कर रही है के उसको सब पता है"

"कभी कभी तो यार सोचता हूँ के खुद ही उसे सब बता दूं"

सुशील के हाथ से जैसे विस्की का ग्लास गिरते गिरते बचा.

"तेरा ना साले सही में दिमाग़ खराब हो गया है" उसने मुझे घूरते हुए कहा
"ये ग़लती कभी मत करना. अट लीस्ट उस दिन तक तो नही जब के तूने प्रिया को
छ्चोड़के का अपना मन बना लिया हो"
सर कटी लाशों का केस जैसे ख़तम होने का नाम ही नही ले रहा था. इस बार
मीडीया वाले ने बात को हद से ज़्यादा तूल दे दिया था. रोज़ाना अख़बार में
कोई ना कोई हेडलाइन होती थी. कोई इनको स्टोन्मन मर्डर्स के साथ जोड़ रहा
था तो कोई कहता था के अभी और लोग मरेंगे, और लाशें मिलेंगी.

"हम अपनी कोशिश में कोई कमी नही छ्चोड़ रहे. जो भी इस सबके पिछे है वो
क़ानून से नही बचेगा"

मैने एक प्रेस कान्फरेन्स में कहा

"क्या उन लाशों के सर मिले अब तक" एक रिपोर्टर ने सवाल किया

"नही उनकी तलाश भी अब तक जारी है" मैने जवाब में कहा


और इस सबका असर पब्लिक पर पड़ता हुआ भी दिखाई देने लगा था. जोगेश्वरी तो
क्या, आस पास के सारे रेलवे स्टेशन्स के करीब लोग देर रात अकेले नही
घूमते थे. लेट नाइट लोकल ट्रेन्स में लोग अब कम ही नज़र आते थे और अकेले
तो बिल्कुल भी नही. जहाँ लाशें मिली थी उस इलाक़े में लोग 10 बजे के बाद
अकेले तो दिखाई देते ही नही थे. एक अंजान सा ख़ौफ्फ जैसे पूरे जोगेश्वरी
में फेल गया था. हर कोई
उम्मीद कर रहा था के मैं जल्दी ही खूनी को पकड़ कर इस सारे तमाशे को ख़तम कर दूँगा.


पर मेरे लिए खूनी को पकड़ने के साथ साथ एक और परेशानी वाली बात उठ खड़ी
हुई थी. निशा ने एक दिन अचानक मेरे सर पर बॉम्ब गिरा दिया था के वो
प्रेग्नेंट थी और बच्चा गिराना नही चाहती थी.

"मुझे लगा के हम शादी करने वाले थे?" रोते रोते उसने फोन पर मुझे कहा

"पर मैं ऑलरेडी शादी शुदा हूँ" मैने जवाब दिया

"मैं सोच रही थी के तुम अपनी बीवी को छ्चोड़कर मेरे पास आ जाओगे. मैं
अपना सब कुच्छ तुम्हारे साथ बाटना चाहती हूँ, तुम्हें पूरी तरह अपनी
ज़िंदगी में लाना चाहती हूँ" वो सिसकते हुए बोली

"पर हम ऐसे भी तो साथ ही हैं ना" मैने कहा

"नही. ऐसे नही. ऐसे तो समाज के सामने ये बहुत बड़ा पाप है" उसने जवाब
दिया और फोन रख दिया


मेरा ध्यान मेरे काम से हट गया. मुझे समझ ही नही आ रहा था के मैं क्या कर
रहा हूँ. दिन रात मैं बस निशा के बारे में ही सोचता रहता था. काश ऐसा हो
जाता के प्रिया मुझे खुद ही छ्चोड़कर चली जाती? काश ऐसा हो जाता के निशा
उतने में ही खुश रहती जितना के मैं उसे दे रहा था? औरतों के साथ क्यूँ
ऐसा होता है के उन्हें जितना भी दिया जाए कम है? ऐसा लगता है के जितना
तुम दो उतने ज़्यादा की उन्हें ज़रूरत रहती है. उस दिन तक जबके तुम्हारे
पास देने को और कुच्छ बाकी ना रह जाए.


मर्डर इन्वेस्टिगेशन जैसे चींटी की चाल चल रही थी. मेरे पास ना कोई मोटिव
था, ना कोई शक के घेरे में था और ना ही केस में कोई लीड्स मिली थी. मेरे
उपेरवाले मुझपर दबाव डाल रहे थे, प्रेस मेरा मज़ाक उड़ा रही थी और मेरे
नीचेवाले मेरा मज़ाक उड़ा रहे थे. किसी को शायद ये समझ नही आ रहा
था के मुंबई पोलीस का डेकरेटेड ऑफीसर अचानक इतना ढीला कैसे पड़ गया.
एक दिन मैं केस के सिलसिले में जोगेश्वरी रेलवे स्टेशन पर गया पर आधे
घंटे की झक झक के बाद जब कुच्छ हासिल नही हुआ तो मैं और मेरे साथ का
कॉन्स्टेबल वापिस पुलिस जीप की तरफ बढ़े.


रेलवे स्टेशन के अंदर बने एक पुल की सीढ़ियों के पास खड़ा एक आदमी कुच्छ
पेपर्स बाँट रहा था, किसी चीज़ का इशतहार.

"प्रोफेसर नोफ़रत" एक काग़ज़ का टुकड़ा उसने मेरे हाथ में भी थमा दिया
"ज़िंदगी के हर मामले में आपकी मदद कर सकते हैं. अपना हाथ एक बार ज़रूर
दिखाएँ......"

"क्या बकवास है ये" मैने काग़ज़ एक तरफ उच्छाल दिया

"आपके लिए बकवास हो सकता है सर" मेरे साथ चल रहे कॉन्स्टेबल ने काग़ज़
फिर उठाया "पर बहुत सारे लोग यकीन रखते हैं इसमें. और अब तो अस्ट्रॉलजी
एक साइन्स भी बन गयी है. मैं तो कहता हूँ के 90% लोग रोज़ अख़बार में
अपना हॉरोस्कोप ज़रूर पढ़ते होंगे"

"शायद" मैने वो काग़ज़ का टुकड़ा उससे वापिस लिया और उसपर नज़र डाली.


किसी हाथ देखने वाला का इशतहार था जो अपने आपको प्रोफेसर कहलवाना पसंद
करता था, ना कि बाबा.

क्रमशः...................

MUMBAI LOCAL--2

gataank se aage...............
"Ek baat toh pakki hai dost" Sushil ne meri lambhi baat a jawab diya
"Ye zyada din aise nahi chal sakta. Kisi na kisi tarah se is sabka koi
na koi anjaam toh hoga hi. Par haan teri baat se inkaar nahi hai
mujhe,

Nisha hai toh kamal ki par kamal ki cheezen kabhi kabhi khatarnaak bhi
hoti hain"

"Tu aisa kaise keh sakta hai yaar. Tune kabhi usse baat bhi karke dekha hai?"

"Sab auraten ek jaisi hi hoti hain dost" Sushil ne cigarette ka lamba
kash lete hue kaha "Aur inmein unka koi dosh bhi nahi hai. Bhagwan ne
banaya hi aisa hai unko, ek jaisa. Tiriya charitra ke baare mein toh
suna hai na?"


Main gusse se ghoorkar dekha toh Sushil samajh gaya ke vo had ke bahar
ja raha tha.


"Dekh yaar" Vo aage hokar mera haath pakadte hue bola "Main sirf ye
keh raha hoon ke tu jo kar raha hai khatarnaak hai. Teri poori zindagi
barbad kar sakta hai. Jo izzat une in saare saalon mein kamayi hai ek
pal mein khatam ho sakti hai"


Vo sahi keh raha tha. Meri biwi, mere pariwar, mere doston, aur
society ki nazar mein meri bahut izzat thi jo ki ek pal mein khatam ho
jaati agar logon ko ye khabar ho jaati ke main budhape mein aise gul
khila raha hoon.

"Dekh tu is waqt 2 auraton ke saath bhida hua hai" Sushil ne apni baat
jaari rakhi "Aur auraten hamari tarah nahi hoti" Tujhe lagta hai ke
teri biwi bevakoof hai? I am sure ke shak toh usko ab tak already ho
hi chuka hoga"

"Usne kuchh kaha toh nahi ab tak" Maine jawab diya

"Of course nahi kaha hoga. Vo tujhse zyada samajhdaar hai. Vo is umar
mein apni shaadi thode hi khatam karegi"

"Vaise aajkal kehti hai ke usko ajeeb ajeeb khwab aate hain. Kehti hai
ke uske sapno mein main kisi doosri aurat ke saath hota hoon. Par phir
khud hi haskar baat taal deti hai"

"Mujhe toh lagta hai ke vo tujhe ishara kar rahi hai ke usko sab pata hai"

"Kabhi kabhi toh yaar sochta hoon ke khud hi use sab bata doon"

Sushil ke haat se jaise whiskey ka glass girte girte bacha.

"Tera na saale sahi mein dimag kharab ho gaya hai" Usne mujhe ghoorte
hue kaha "Ye galti kabhi mat karna. At least us din tak toh nahi jab
ke tune Priya ko chhodke ka apna man bana liya ho"
Sarkati laashon ka case jaise khatam hone ka naam hi nahi le raha tha.
Is baar media wale ne baat ko hadh se zyada tool de diya tha. Rozana
akhbaar mein koi na koi headline hoti thi. Koi inko stoneman murders
ke saath jod raha tha toh koi kehta tha ke abhi aur log marenge, aur
laashen milengi.

"Ham apni koshish mein koi kami nahi chhod rahe. Jo bhi is sabke
pichhe hai vo kanoon se nahi bachega"

Maine ek press conference mein kaha

"Kya un laashon ke sar mile ab tak" Ek reporter ne sawal kiya

"Nahi unki talash bhi ab tak jaari hai" Maine jawab mein kaha


Aur is sabka asar public par padta hua bhi dikhai dene laga tha.
Jogeshwari toh kya, aas paas ke saare railway stations ke kareeb log
der raat akele nahi ghoomte the. Late night local trains mein log ab
kam hi nazar aate the aur akele toh bilkul bhi nahi. Jahan laashen
mili thi us ilaake mein log 10 baje ke baad akele toh dikhai dete hi
nahi the. Ek anjaan sa khauff jaise poore Jogeshwari mein phel gaya
tha. Har koi
ummed kar raha tha ke main jaldi hi khooni ko pakad kar is saare
tamashe ko khatam kar doonga.


Par mere liye khooni ko pakadne ke saath saath ek aur pareshani wali
baat uth khadi hui thi. Nisha ne ek din achanak mere sar par bomb gira
diya tha ke vo pregnant thi aur bachcha girana nahi chahti thi.

"Mujhe laga ke ham shaadi karne wale the?" Rote rote usne phone par mujhe kaha

"Par main already shaadi shuda hoon" Maine jawab diya

"Main soch rahi thi ke tum apni biwi ko chhodkar mere paas aa jaoge.
Main apna sab kuchh tumhare saath baatna chahti hoon, tumhein poori
tarah apni zindagi mein lana chahti hoon" Vo sisakte hue boli

"Par ham aise bhi toh saath hi hain na" Maine kaha

"Nahi. Aise nahi. Aise toh samaj ke saamne ye bahut bada paap hai"
Usne jawab diya aur phone rakh diya


Mera dhyaan mere kaam se hat gaya. Mujhe samajh hi nahi aa raha tha ke
main kya kar raha hoon. DIn raat main bas Nisha ke baare mein hi
sochta rehta tha. Kaash aisa ho jata ke Priya mujhe khud hi chhodkar
chali jaati? Kaash aisa ho jata ke Nisha utne mein hi khush rehti
jitna ke main use de raha tha? Auraton ke saath kyun aisa hota hai ke
unhen jitna bhi diya jaaye kam hai? Aisa lagta hai ke jitna tum do
utne zyada ki unhen zaroorat rehti hai. Us din tak jabke tumhare paas
dene ko aur kuchh baaki na reh jaaye.


Murder investigation jaise cheenti ki chaal chal rahi thi. Mere paas
na koi motive tha, na koi shak ke ghere mein tha aur na hi case mein
koi leads mili thi. Mere uperwale mujhpar dabav daal rahe the, press
mera mazak uda rahi thi aur mere nichewale mera mazak uda rahe the.
Kisi ko shayad ye samajh nahi aa raha
tha ke Mumbai police ka decorated officer achanak itna dheela kaise pad gaya.
Ek din main case ke silsile mein Jogeshwari railway stataion par gaya
par aadhe ghante ki jhak jhak ke baad jab kuchh haasil nahi hua toh
main aur mere saath ka constable vaapis pilice jeep ki taraf badhe.


Railway station ke andar bane ek pull ki sidhiyon ke paas khada ek
aadmi kuchh papers baant raha tha, kisi cheez ka ishtehaar.

"Professor Nofrat" Ek kagaz ka tukda usne mere haath mein bhi thama
diya "Zindagi ke har mamle mein aapki madad kar sakte hain. Apna haath
ek baar zaroor dikhayen......"

"Kya bakwaas hai ye" Maine kagaz ek taraf uchhal diya

"Apke liye bakwaas ho sakta hai sir" Mere saath chal rahe constable ne
kagaz phir uthaya "Par bahut saare log yakeen rakhte hain ismein. Aur
ab toh Astrology ek science bhi ban gayi hai. Main toh kehta hoon ke
90% log roz akhbaar mein apna horoscope zaroor padhte honge"

"Shayad" Maine vo kagaz ka tukda usse vaapis liya aur uspar nazar daali.


Kisi haath dekhne wala ka ishtehaar tha jo apne aapko Professor
kehalvana pasand karta tha, na ki Baba.

क्रमशः...................


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