FUN-MAZA-MASTI
बदनाम रिश्ते-
मेरी बड़ी बहिन राखी-2
हम लोग नदी पर पहुंच गये और फिर अपने काम में लग गये, कपडों की सफाई के बाद मैने उन्हे, एक तरफ सुखने के लिये डाल दीये और फिर हम दोनो ने नहाने की तैयारी शुरु कर दी। राखी ने भी अपनी साडी उतार के पहले उसको साफ किया फिर हर बार की तरह अपने पेटिकोट को उपर चढा के अपना ब्लाउस निकला, फिर उसको साफ किया और फिर अपने बदन को रगड-रगड के नहाने लगी। मैं भी बगल में बैठा उसको निहारते हुए नहाता रहा। बे-खयाली में एक-दो बार तो मेरी लुन्गी भी, मेरे बदन पर से हट गई थी। पर अब तो ये बहुत बार हो चुका था। इसलिये मैने इस पर कोइ ध्यान नही दीया। हर बार की तरह आभा ने भी अपने हाथों को पेटिकोट के अन्दर डाल के खुब रगड-रगड के नहाना चालु रखा। थोडी देर बाद मैं नदी में उतर गया। राखी ने भी नदी में उतर के एक-दो डुबकियां लगाई, और फिर हम दोनो बाहर आ गये। मैने अपने कपडे चेन्ज कर लीये और पजामा और कुर्ता पहन लिया।राखी ने भी पहले अपने बदन को टोवेल से सुखाया, फिर अपने पेटिकोट के इजरबंध को जिसको कि, वो छाती पर बांध के रखती थी, पर से खोल लिया और अपने दांतो से पेटिकोट को पकड लिया, ये उसका हंमेशा का काम था, मैं उसको पत्थर पर बैठ के, एक-टक देखे जा रहा था। इस प्रकार उसके दोनो हाथ फ्री हो गये थे। अब सुखे ब्लाउस को पहनने के लीये पहले उसने अपना बांया हाथ उस में घुसाया, फिर जैसे ही वो अपना दाहिना हाथ ब्लाउस में घुसाने जा रही थी कि, पता नही क्या हुआ उसके दांतो से उसका पेटिकोट छुट गया और सीधे सरसराते हुए नीचे गीर गया। और उसका पुरा का पुरा नन्गा बदन एक पल के लीये मेरी आंखो के सामने दिखने लगा। उसकी बडी-बडी चुचियां, जिन्हे मैने अब तक कपडों के उपर से ही देखा था, उसके भारी-भारी चुतड, उसकी मोटी-मोटी जांघे और झांठ के बाल, सब एक पल के लीये मेरी आंखो के सामने नन्गे हो गये। पेटिकोट के नीचे गीरते ही, उसके साथ ही आभा भी, हाये करते हुए तेजी के साथ नीचे बैठ गई। मैं आंखे फाड-फाड के देखते हुए, गुंगे की तरह वहीं पर खडा रह गया। राखी नीचे बैठ कर अपने पेटिकोट को फिर से समेटती हुई बोली,
"ध्यान ही नही रहा। मैं, तुझे कुछ बोलना चाहती थी और ये पेटिकोट दांतो से छुट गया।"
मैं कुछ नही बोला। राखी फिर से खडी हो गई और अपने ब्लाउस को पहनने लगी। फिर उसने अपने पेटिकोट को नीचे किया और बांध लिया। फिर साडी पहन कर वो वहीं बैठ के अपने भीगे पेटिकोट को साफ कर के तैयार हो गई। फिर हम दोनो खाना खाने लगे। खाना खाने के बाद हम वहीं पेड की छांव में बैठ कर आराम करने लगे। जगह सुम-सान थी। ठंडी हवा बह रही थी। मैं पेड के नीचे लेटे हुए, आभा की तरफ घुमा तो वो भी मेरी तरफ घुमी। इस वक्त उसके चेहरे पर एक हलकी-सी मुस्कुराहट पसरी हुई थी। मैने पुछा,
"राखी , क्यों हस रही हो ?"
तो वो बोली,
"मैं कहां हस रही हुं ?"
"झुठ मत बोलो, तुम मुस्कुरा रही हो।"
"क्या करुं ? अब हंसने पर भी कोइ रोक है, क्या ?"
"नही, मैं तो ऐसे ही पुछा रहा था। नही बताना है तो मत बताओ।"
"अरे, इतनी अच्छी ठंडी हवा बह रही है, चेहरे पर तो मुस्कान आयेगी ही।"
"हां, आज गरम ईस्त्री (वुमन) की सारी गरमी जो निकल जायेगी।"
"क्या मतलब, ईस्त्री (आयरन) की गरमी कैसे निकल जायेगी ? यहां पर तो कहीं ईस्त्री नही है।"
"अरे राखी , तुम भी तो ईस्त्री (वुमन) हो, मेरा मतलब ईस्त्री माने औरत से था।"
"चल हट बदमाश, बडा शैतान हो गया है। मुझे क्या पता था की, तु ईस्त्री माने औरत की बात कर रहा है।"
"चलो, अब पता चल गया ना।""हां, चल गया। पर सच में यहां पेड की छांव में कितना अच्छा लग रहा है। ठंडी-ठंडी हवा चल रही है, और आज तो मैने पुरी हवा खायी है।",
राखी बोली।
"पुरी हवा खायी है, वो कैसे ?"
"मैं पुरी नन्गी जो हो गई थी।",
फिर बोली,
"हाये, तुझे मुझे ऐसे नही देखना चाहिए था ?"
"क्यों नही देखना चाहिए था ?"
"अरे बेवकूफ, इतना भी नही समजता। एक बहिन को, उसके भाई के सामने नंगा नही होना चाहिए था।"
"कहां नंगी हुई थी, तुम ? बस एक सेकन्ड के लिये तो तुम्हारा पेटिकोट नीचे गीर गया था।"
(हालांकि, वही एक सेकन्ड मुझे एक घन्टे के बराबर लग रहा था।)
"हां, फिर भी मुझे नंगा नही होना चाहिए था। कोई जानेगा तो क्या कहेगा कि, मैं अपने भाई के सामने नन्गी हो गई थी।"
"कौन जानेगा ?, यहां पर तो कोई था भी नही। तु बेकार में क्यों परेशान हो रही है ?"
"अरे नही, फिर भी कोई जान गया तो।",
फिर कुछ सोचती हुई बोली,
"अगर कोई नही जानेगा तो, क्या तु मुझे नंगा देखेगा ?"
मैं और राखी दोनो एक दुसरे के आमने-सामने, एक सुखी चादर पर, सुम-सान जगह पर, पेड के नीचे एक-दुसरे की ओर मुंह कर के लेटे हुए थे। और राखी की साडी उसके छाती पर से ढलक गई थी। राखी के मुंह से ये बात सुन के मैं खामोश रह गया और मेरी सांसे तेज चलने लगी।राखी ने मेरी ओर देखाते हुए पुछा,
"क्या हुआ ?'
मैने कोई जवाब नही दिया, और हलके से मुस्कुराते हुए उसकी छातियों की तरफ देखने लगा, जो उसकी तेज चलती सांसो के साथ उपर नीचे हो रही थी। वो मेरी तरफ देखते हुए बोली,
"क्या हुआ ?, मेरी बात का जवाब दे ना। अगर कोई जानेगा नही तो क्या तु मुझे नंगा देख लेगा ?"
इस पर मेरे मुंह से कुछ नही निकला, और मैने अपना सिर नीचे कर लिया. राखी ने मेरी ठुड्डी पकड के उपर उठाते हुए, मेरी आंखो में झांखते हुए पुछा,
"क्या हुआ रे ?, बोलना, क्या तु मुझे नंगा देख लेगा, जैसे तुने आज देखा है ?"
मैने कहा,
"हाय राखी , मैं क्या बोलुं ?"
मेरा तो गला सुख रहा था। राखी ने मेरे हाथ को अपने हाथों में ले लिया और कहा,
"इसका मतलब तु मुझे नंगा नही देख सकता, है ना ?"
मेरे मुंह से निकल गया,
"हाये राखी , छोडो ना।",
मैं हकलाते हुए बोला,
"नही राखी , ऐसा नही है।"
"तो फिर क्या है ? तु अपनी बहिन को नंगा देख लेगा क्या ?"
"हाये, मैं क्या कर सकता था ?, वो तो तुम्हरा पेटिकोट नीचे गीर गया, तब मुझे नंगा दिख गया। नही तो मैं कैसे देख पाता ?"
"वो तो मैं समझ गई, पर उस वक्त तुझे देख के मुझे ऐसा लगा, जैसे की तु मुझे घूर रहा है। ,,,,,,,,,,,,इसलिये पुछा।"
"हाये बहिन, ऐसा नही है। मैने तुम्हे बताया ना। तुम्हे बस ऐसा लगा होगा।"
"इसका मतलब, तुझे अच्छा नही लगा था ना।"
"हाये बहिन, छोडो.",
मैं हाथ छुडाते हुए, अपने चेहरे को छुपाते हुए बोला।
बहिन ने मेरा हाथ नही छोडा और बोली,
"सच-सच बोल, शरमाता क्यों है ?"
मेरे मुंह से निकल गया,
"हां, अच्छा लगा था।"
इस पर राखी ने मेरे हाथ को पकडा के, सीधे अपनी छाती पर रख दिया, और बोली,
"फिर से देखेगा बहिन को नंगा, बोल देखेगा ?" मेरे मुंह से आवाज नही निकल पा रही थी। मैं बडी मुश्किल से अपने हाथों को उसकी नुकिली, गुदाज छातियों पर स्थिर रख पा रहा था। ऐसे में, मैं भला क्या जवाब देता। मेरे मुंह से एक कराहने की सी आवाज नीकली। राखी ने मेरी ठुड्डी पकड कर, फिर से मेरे मुंह को उपर उठाया और बोली,
"क्या हुआ ? बोलना, शरमाता क्यों है ? जो बोलना है बोल।"
मैं कुछ नही बोला। थोडी देर तक उसकी चुचियों पर, ब्लाउस के उपर से ही हल्का-सा हाथ फेरा। फिर मैने हाथ खींच लिया। राखी कुछ नही बोली, गौर से मुझे देखती रही। फिर पता नही, क्या सोच कर वो बोली,
"ठीक है, मैं सोती हुं यहीं पर। बडी अच्छी हवा चल रही है, तु कपडों को देखते रहेना, और जो सुख जाये उन्हे उठा लेना। ठीक है ?"
और फिर, मुंह घुमा कर, एक तरफ सो गई। मैं भी चुप-चाप वहीं आंखे खोले लेटा रहा। राखी की चुचियां धीरे-धीरे उपर-नीचे हो रही थी। उसने अपना एक हाथ मोड कर, अपनी आंखो पर रखा हुआ था, और दुसरा हाथ अपनी बगल में रख कर सो रही थी। मैं चुप-चाप उसे सोता हुआ देखता रहा। थोडी देर में उसकी उठती-गीरती चुचियों का जादु मेरे उपर चल गया, और मेरा लंड खडा होने लगा। मेरा दिल कर रह था कि, काश मैं फिर से उन चुचियों को एक बार छु लुं। मैने अपने आप को गालियां भी नीकाली। क्या उल्लु का पठ्ठा हुं मैं भी। जो चीज आराम से छुने को मिल रही थी, तो उसे छुने की बजाये मैं हाथ हटा लिया। पर अब क्या हो सकता था। मैं चुप-चाप वैसे ही बैठा रहा। कुछ सोच भी नही पा रहा था। फिर मैने सोचा कि, जब उस वक्त राखी ने खुद मेरा हाथ अपनी चुचियों पर रख दिया था, तो फिर अगर मैं खुद अपने मन से रखुं तो शायद डांटेगी नही, और फिर अगर डांटेगी तो बोल दुन्गा, तुम्ही ने तो मेरा हाथ उस वक्त पकड कर रखा था, तो अब मैं अपने आप से रख दिया। सोचा, शायद तुम बुरा नही मानोगी। यही सब सोच कर मैने अपने हाथों को धीरे-से उसकी चुचियों पर ले जा के रख दिया, और हल्के-हल्के सहलाने लगा। मुझे गजब का मजा आ रहा था। मैने हल्के-से उसकी साडी को, पुरी तरह से उसके ब्लाउस पर से हटा दिया और फिर उसकी चुचियों को दबाया। ओओह, इतना गजब का मजा आया कि, बता नही सकता। एकदम गुदाज और सख्त चुचियां थी, राखी की इस उमर में भी। मेरा तो लंड खडा हो गया, और मैने अपने एक हाथ को चुचियों पर रखे हुए, दुसरे हाथ से अपने लंड को मसलने लगा। जैसे-जैसे मेरी बेताबी बढ रही थी, वैसे-वैसे मेरे हाथ दोनो जगहों पर तेजी के साथ चल रहे थे। मुझे लगता है कि, मैने राखी की चुचियों को कुछ ज्यादा ही जोर से दबा दिया था। शायद इसलिये राखी की आंख खुल गई। और वो एकदम से हडबडाते उठ गई, और अपने आंचल को संभालते हुए, अपनी चुचियों को ढक लिया, और फिर मेरी तरफ देखती हुइ बोली,
"हाये, क्या कर रहा था तु ? हाय, मेरी तो आंख लग गई थी।"
मेरा एक हाथ अभी भी मेरे लंड पर था, और मेरे चेहरे का रंग उड गया था। राखी ने मुझे गौर से एक पल के लिये देखा और सारा मांजरा समझ गई, और फिर अपने चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए बोली,
"हाये, देखो तो सही !! क्या सही काम कर रहा था ये लडका। मेरा भी मसल रहा था, और उधर अपना भी मसल रहा था।"
फिर राखी उठ कर सीधा खडी हो गई और बोली,
"अभी आती हुं।",
कह कर मुस्कुराते हुए झाडियों कि तरफ बढ गई। झाडियों के पीछे से आ के, फिर अपने चुतडों को जमीन पर सटाये हुए ही, थोडा आगे सरकते हुए मेरे पास आई। उसके सरक कर आगे आने से उसकी साडी थोडी-सी उपर हो गई, और उसका आंचल उसकी गोद में गीर गया। पर उसको इसकी फिकर नही थी। वो अब एकदम से मेरे नजदीक आ गई थी और उसकी गरम सांसे मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थी। वो एक पल के लिये ऐसे ही मुझे देखती रही, फिर मेरी ठुड्डी पकड कर मुझे उपर उठाते हुए, हल्के-से मुस्कुराते हुए धीरे से बोली,
"क्यों रे बदमाश, क्या कर रहा था ?, बोलना, क्या बदमाशी कर रहा था, अपनी बहिन के साथ ?"
फिर मेरे फूले-फूले गाल पकड कर हल्के-से मसल दिये। मेरे मुंह से तो आवाज ही नही नीकल रही थी। फिर उसने हल्के-से अपना एक हाथ मेरी जांघो पर रखा और सहलाते हुए बोली,
"हाये, कैसे खडा कर रख है, मुए ने ?"
फिर सीधा पजामे के उपर से मेरे खडे लंड (जो की बहिन के जगने से थोडा ढीला हो गया था, पर अब उसके हाथों का स्पर्श पा के फिर से खडा होने लगा था) पर उसने अपना हाथ रख दिया,
"उईइ मां, कैसे खडा कर रखा है ?, क्या कर रहा था रे, हाथ से मसल रहा था, क्या ? हाये बेटा, और मेरी इसको भी मसल रहा था ? तु तो अब लगता है, जवान हो गया है। तभी मैं कहुं कि, जैसे ही मेरा पेटिकोट नीचे गीरा, ये लडका मुझे घुर-घुर के क्यों देख रहा था ? हाये, इस लडके की तो अपनी बहिन के उपर ही बुरी नजर है।"
"हाये बहिन, गलती हो गई, माफ कर दो।"
"ओहो, अब बोल रहा है गलती हो गई, पर अगर मैं नही जगती तो, तु तो अपना पानी नीकाल के ही मानता ना ! मेरी छातियों को दबा दबा के !! उमम्म्,,,, बोल, नीकालता की नही, पानी ?"
"हाये बहिन, गलती हो गई।"
"वाह रे तेरी गलती, कमाल की गलती है। किसी का मसल दो, दबा दो, फिर बोलो की गलती हो गई। अपना मजा कर लो, दुसरे चाहे कैसे भी रहे।",
कह कर बहिन ने मेरे लंड को कास् के दबाया, उसके कोमल हाथों का स्पर्श पा के मेरा लंड तो लोहा हो गया था, और गरम भी काफी हो गया था। "हाये राखी छोडो, क्या कर रही हो ?" आभा उसी तरह से मुस्कुराती हुई बोली,
"क्यों प्यारे, तुने मेरा दबाया तब, तो मैने नही बोला कि छोडो। अब क्यों बोल रहा है, तु ?"
मैने कहा,
"हाये, राखी तु दबायेगी तो सच में मेरा पानी निकल जायेगा। हाये, छोडो ना आभा।" "क्यों, पानी निकालने के लिये ही तो तु दबा रहा था ना मेरी छातियां ? मैं अपने हाथ से निकाल देती हुं, तेरे गन्ने से तेरा रस। चल, जरा अपना गन्ना तो दिखा।"
"हाये राखी , छोडो, मुझे शरम आती है।"
"अच्छा, अभी तो बडी शरम आ रही है, और हर रोज जो लुन्गी और पजामा हटा-हटा के, जब सफाई करता है तब,,,?, तब क्या मुझे दिखाई नही देता क्या ?, अभी बडी एक्टींग कर रहा है।"
"हाय, नही राखी , तब की बात तो और है, फिर मुझे थोडे ही पता होता था की तुम देख रही हो।"
ओह, ओह, मेरे भोले राजा, बडा भोला बन रहा है, चल दिखा ना, देखुं कितना बडा और मोटा है, तेरा गन्ना ? मैं कुछ बोल नही पा रहा था। मेरे मुंह से शब्द नही निकल पा रहे थे। और लग रहा था जैसे, मेरा पानी अब निकला की तब निकला। इस बीच राखी ने मेरे पजामे का नाडा खोल दिया, और अंदर हाथ डाल के मेरे लंड को सीधा पकड लिया। मेरा लंड जो की केवल उसके छु ने के कारण से फुफकारने लगा था, अब उसके पकडने पर अपनी पुरी औकात पर आ गया और किसी मोटे लोहे की रोड की तरह एकदम तन कर उपर की तरफ मुंह उठाये खडा था। राखी मेरे लंड को अपने हाथों में पकडने की पुरी कोशिश कर रही थी, पर मेरे लंड की मोटाई के कारण से वो उसे अपनी मुठ्ठी में, अच्छी तरह से कैद नही कर पा रही थी। उसने मेरे पजामे को वहीं खुले में, पेड के नीचे, मेरे लंड पर से हटा दिया।
"हाये राखी , छोडो, कोई देख लेगा। ऐसे कपडे मत हटाओ।"
मगर राखी शायद पुरे जोश में आ चुकी थी।
"चल, कोई नही देखता। फिर सामने बैठी हुं, किसी को नजर भी नही आयेगा। देखुं तो सही, मेरे भाई का गन्ना आखिर, है कितना बडा ?"
और मेरा लंड देखते ही, आश्चर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया। एकदम से चौंकती हुई बोली,
"हाये दैय्या,,,!! ये क्या ,,,,??? इतना मोटा, और इतना लम्बा ! ये कैसे हो गया रे, तेरे जीजा का तो बित्ते भर का भी नही है, और यहां तु बेलन के जैसा ले के घुम रहा है।"
"ओह बहिन, मेरी इसमे क्या गलती है। ये तो शुरु में पहले छोटा-सा था, पर अब अचानक इतना बडा हो गया है, तो मैं क्या करुं ?"
"गलती तो तेरी ही है, जो तुने इतना बडा जुगाड होते हुए भी, अभी तक मुझे पता नही चलने दिया। वैसे जब मैने देखा था नहाते वक्त, तब तो इतना बडा नही दिख रहा था रे,,,,?"
"हाये बहिन, वो,,, वो,,,,"
मैं हकलाते हुए बोला,
"वो इसलिये, क्योंकि उस समय ये उतना खडा नही रहा होगा। अभी ये पुरा खडा हो गया है।"
"ओह, ओह, तो अभी क्यों खडा कर लिया इतना बडा ?, कैसे खडा हो गया अभी तेरा ?अब मैं क्या बोलता कि कैसे खडा हो गया। ये तो बोल नही सकता था कि, बहिन तेरे कारण खडा हो गया है मेरा। मैने सकपकाते हुए कहा,
"अरे, वो ऐसे ही खडा हो गया है। तुम छोडो, अभी ठीक हो जायेगा।"
"ऐसे कैसे खडा हो जाता है तेरा ?",
बहिन ने पुछा, और मेरी आंखो में देख कर, अपने रसीले होठों का एक कोना दबा के मुसकाने लगी ।
"अरे, तुमने पकड रखा है ना, इसलिये खडा हो गया है मेरा। क्या करुं मैं ?, हाये छोड दो ना।"
मैं किसी भी तरह से, बहिन का हाथ अपने लंड पर से हटा देना चाहता था। मुझे ऐसा लग रहा था कि, बहिन के कोमल हाथों का स्पर्श पा के कहीं मेरा पानी निकल ना जाये। फिर बहिन ने केवल पकडा तो हुआ नही था। वो धीरे-धीरे मेरे लंड को सहला भी, और बार-बार अपने अंगुठे से मेरे चिकने सुपाडे को छु भी रही थी।
"अच्छा, अब सारा दोष मेरा हो गया, और खुद जो इतनी देर से मेरी छातियां पकड के मसल रहा था और दबा रहा था, उसका कुछ नही ?""चल मान लिया गलती हो गई, पर सजा तो इसकी तुझे देनी पडेगी, मेरा तुने मसला है, मैं भी तेरा मसल देती हुं।",
कह कर बहिन अपने हाथो को थोडा तेज चलाने लगी और मेरे लंड का मुठ मारते हुए, मेरे लंड की मुंडी को अंगुठे से थोडी तेजी के साथ घीसने लगी। मेरी हालत एकदम खराब हो रही थी। गुदगुदाहत और सनसनी के मारे मेरे मुंह से कोई आवाज नही निकल पा रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कि, मेरा पानी अब निकला की तब निकला। पर बहिन को मैं रोक भी नही पा रहा था। मैने सिसयाते हुए कहा,
"ओह बहिन, हाये निकल जायेगा, मेरा निकल जायेगा।"
इस पर बहिन और जोर से हाथ चलाते हुए अपनी नजर उपर करके, मेरी तरफ देखते हुए बोली,
"क्या निकल जायेगा ?"
"ओह, ओह, छोडोना, तुम जानती हो, क्या निकल जायेगा,,,? क्यों परेशान कर रही हो ?"
"मैं कहां परेशान कर रही हुं ? तु खुद परेशान हो रहा है।"
"क्यों, मैं क्यों भला खुद को परेशान करुन्गा ? तुम तो खुद ही जबरदस्ती, पता नही क्यों मेरा मसले जा रही हो ?"
"अच्छा, जरा ये तो बता, शुरुआत किसने कि थी मसलने की ?",
कह कर बहिन मुस्कुराने लगी।
मुझे तो जैसे सांप सुंघ गया था। मैं भला क्या जवाब देता। कुछ समझ में ही नही आ रहा था कि क्या करुं, क्या ना करुं ? उपर से मजा इतना आ रहा था कि जान निकली जा रही थी। तभी बहिन ने अचानक मेरा लंड छोड दिया और बोली,
"अभी आती हुं।"
और एक कातिल मुस्कुराहट छोडते हुए उठ कर खडी हो गई, और झाडियों की तरफ चल दी। मैं उसको झाडियों कि ओर जाते हुए देखता हुआ, वहीं पेड के नीचे बैठा रहा। झाडियां, जहां हम बैठे हुए थे, वहां से बस दस कदम की दूरी पर थी। दो-तीन कदम चलने के बाद राखी पिछे कि ओर मुडी और बोली,
"क्यों रे ?, उस समय जब मैं छु रही थी, तब तो बडा भोला बन रहा था। और जब मैं पेशाब करने गई थी, तो वहां पिछे खडा हो के क्या कर रहा था, शैतान !!"
मैने अपनी ठुड्डी पर से राखी का हाथ हटाते हुए, फिर अपने सिर को निचे झुका लिया और हकलाते हुए बोला,
"ओह राखी, तुम् भी ना,,,,,,"
"मैने क्या किया ?",
राखी ने हल्की-सी चपत मेरे गाल पर लगाई और पुछा।
"राखी, तुमने खुद ही तो कहा था, हल्का होना है तो, आ जाओ।"
इस पर राखी ने मेरे गालों को हल्के-से खींचते हुए कहा,
"अच्छा बेटा, मैने हल्का होने के लिये कहा था, पर तु तो वहां हल्का होने की जगह भारी हो रहा था। मुझे पेशाब करते हुए घुर-घुर कर देखने के लिये तो मैने नही कहा था तुम्हे, फिर तु क्यों घुर-घुर कर मजे लुट रहा था ?"
"हाय, मैं कहां मजा लुट रहा था, कैसी बाते कर रही हो राखी ?'
"ओह हो, शैतान अब तो बडा भोला बन रहा है।',
कह कर हल्के-से मेरी झांटो को दबा दिया।
"हाये, क्या कर रही हो,,,?"
पर उसने छोडा नही और मेरी आंखो में झांखते हुए फिर धीरे-से अपना हाथ मेरे लंड पर रख दिया और फुसफुसाते हुए पुछा,
"फिर से दबाउं ?"
मेरी तो हालत उसके हाथ के छुने भर से फिर से खराब होने लगी। मेरी समझ में एकदम नही आ रहा था कि क्या करुं। कुछ जवाब देते हुए भी नही बन रहा था कि क्या जवाब दुं। तभी वो हल्का-सा आगे की ओर सरकी और झुकी। आगे झुकते ही उसका आंचल उसके ब्लाउस पर से सरक गया। पर उसने कोई प्रयास नही किया उसको ठीक करने का। अब तो मेरी हालत और खराब हो रही थी। मेरी आंखो के सामने उसकी नारीयल के जैसी सख्त चुचियां जीनको सपने में देख कर, मैने ना जाने कितनी बार अपना माल गीराया था, और जीसको दुर से देख कर ही तडपता रहता था, नुमाया थी। भले ही चुचियां अभी भी ब्लाउस में ही कैद थी, परंतु उनके भारीपन और सख्ती का अंदाज उनके उपर से ही लगाया जा सकता था। ब्लाउस के उपरी भाग से उसकी चुचियों के बीच की खाई का उपरी गोरा-गोरा हिस्सा नजर आ रहा था। हालांकि, चुचियों को बहुत बडा तो नही कहा जा सकता, पर उतनी बडी तो थी ही, जितनी एक स्वस्थ शरीर की मालकिन की हो सकती है। मेरा मतलब है कि इतनी बडी जीतनी कि आप के हाथों में ना आये, पर इतनी बडी भी नही की आप को दो-दो हाथो से पकडनी पडे, और फिर भी आपके हाथ ना आये। एकदम किसी भाले की तरह नुकिली लग रही थी, और सामने की ओर निकली हुई थी। मेरी आंखे तो हटाये नही हट रही थी। तभी राखी ने अपने हाथों को मेरे लंड पर थोडा जोर से दबाते हुए पुछा,
"बोलना, और दबाउं क्या ?"
"हाये,,,,,,राखी, छोडो ना।"
उसने जोर से मेरे लंड को मुठ्ठी में भर लिया।
"हाये राखी, छोडो बहुत गुद-गुदी होती है।"
"तो होने दे ना, तु खाली बोल दबाउं या नही ?"
"हाये दबाओ राखी, मसलो।"
"अब आया ना, रस्ते पर।"
"हाये राखी, तुम्हारे हाथों में तो जादु है।"
"जादु हाथों में है या,,,,,,!!!, या फिर इसमे है,,,,??"
(अपने ब्लाउस की तरफ इशारा कर के पुछा।)
"हाये राखी, तुम तो बस,,,,,?!!"
"शरमाता क्यों है ?,बोलना क्या अच्छा लग रहा है,,?"
"हाय राखी,, मैं क्या बोलुं ?"
"क्यों क्या अच्छा लग रहा है,,,?, अरे, अब बोल भी दे शरमाता क्यों है,,?"
"हाये राखी दोनो अच्छे लग रहे है।"
"क्या, ये दोनो ? "
(अपने ब्लाउस की तरफ इशारा कर के पुछा)
"हां, और तुम्हारा दबाना भी।"
"तो फिर शरमा क्यों रहा था, बोलने में ? ऐसे तो हर रोज घुर-घुर कर मेरे अनारो को देखता रहता है।फिर राखी ने बडे आराम से मेरे पुरे लंड को मुठ्ठी के अंदर कैद कर हल्के-हल्के अपना हाथ चलाना शुरु कर दिया।
"तु तो पुरा जवान हो गया है, रे!"
"हाये राखी,,,,"
"हाये, हाये, क्या कर रहा है। पुरा सांढ की तरह से जवान हो गया है तु तो। अब तो बरदाश्त भी नही होता होगा, कैसे करता है,,,?"
"क्या राखी,,,,?"
"वही बरदाश्त, और क्या ? तुझे तो अब छेद (होल) चाहिये। समझा, छेद मतलब ?"
"नही राखी, नही समझा,,"
"क्या उल्लु लडका है रे, तु ? छेद मतलब नही समझता,,,,?!!"
मैने नाटक करते हुए कहा,
"नही राखी, नही समझता।"
इस पर राखी हल्के-हल्के मुस्कुराने लगी और बोली,
"चल समझ जायेगा, अभी तो ये बता कि कभी इसको (लंड की तरफ इशारा करते हुए) मसल-मसल के माल गीराया है ?"
"माल मतलब,,,!? क्या होता है, राखी,,,?"
"अरे उल्लु, कभी इसमे से पानी गीराया है, या नही ?" "हाय, वो तो मैं हर-रोज गीराता हुं। सुबह-शाम दिनभर में चार-पांच बार। कभी ज्यादा पानी पी लिया तो ज्यादा बार हो जाता है।"
"हाये, दिनभर में चार-पांच बार ? और पानी पीने से तेरा ज्यादा बार निकलता है ? कही तु पेशाब करने की बात तो नही कर रहा ?"
"हां राखी, वही तो मैं तो दिनभर में चार-पांच बार पेशाब करने जाता हुं।"
इस पर राखी ने मेरे लंड को छोड कर, हल्के-से मेरे गाल पर एक झापड लगाई और बोली,
"उल्लु का उल्लु ही रह गया, क्या तु ?"
फिर बोली
"ठहर जा, अभी तुझे दिखाती हुं, माल कैसे निकल जाता है ?"
फिर वो अपने हाथों को तेजी से मेरे लंड पर चलाने लगी। मारे गुद-गुदी और सनसनी के मेरा तो बुरा हाल हो रखा था। समझ में नही आ रहा था क्या करुं। दिल कर रहा था की हाथ को आगे बढा कर राखी की दोनो चुचियों को कस के पकड लुं, और खूब जोर-जोर से दबाउं। पर सोच रहा था कि कहीं बुरा ना मान जाये। इस चक्कर में मैने कराहते हुए सहारा लेने के लिये, सामने बैठी राखी के कंधे पर अपने दोनो हाथ रख दिये। वो उस पर तो कुछ नही बोली, पर अपनी नजरे उपर कर के मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए बोली,
"क्यों मजा आ रहा है की, नही,,,?"
"हाये राखी, मजे की तो बस पुछो मत। बहुत मजा आ रहा है।"
मैं बोला। इस पर राखी ने अपना हाथ और तेजी से चलाना शुरु कर दिया और बोली,
"साले, हरामी कहीं के !!! मैं जब नहाती हुं, तब घुर-घुर के मुझे देखता रहता है। मैं जब सो रही थी, तो मेरे चुंचे दबा रहा था, और अभी मजे से मुठ मरवा रहा है। कमीने, तेरे को शरम नही आती ?" मेरा तो होश ही उड गया। ये राखी क्या बोल रही थी। पर मैने देखा की उसका एक हाथ अब भी पहले की तरह मेरे लंड को सहलाये जा रहा था। तभी राखी, मेरे चेहरे के उडे हुए रंग को देख कर हसने लगी, और हसते हुए मेरे गाल पर एक थप्पड लगा दिया। मैने कभी भी इस से पहले राखी को, ना तो ऐसे बोलते सुना था, ना ही इस तरह से बर्ताव करते हुए देखा था। इसलिये मुझे बडा आश्चर्य हो रहा था।
पर उसके हसते हुए थप्पड लगाने पर तो मुझे, और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ की, आखिर ये चाहती क्या है। और मैने बोला की,
"माफ कर दो राखी, अगर कोई गलती हो गई हो तो।"
इस पर राखी ने मेरे गालों को हल्के सहलाते हुए कहा की,
"गलती तो तु कर बैठा है, बेटे। अब केवल गलती की सजा मिलेगी तुझे।"
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बदनाम रिश्ते-
मेरी बड़ी बहिन राखी-2
हम लोग नदी पर पहुंच गये और फिर अपने काम में लग गये, कपडों की सफाई के बाद मैने उन्हे, एक तरफ सुखने के लिये डाल दीये और फिर हम दोनो ने नहाने की तैयारी शुरु कर दी। राखी ने भी अपनी साडी उतार के पहले उसको साफ किया फिर हर बार की तरह अपने पेटिकोट को उपर चढा के अपना ब्लाउस निकला, फिर उसको साफ किया और फिर अपने बदन को रगड-रगड के नहाने लगी। मैं भी बगल में बैठा उसको निहारते हुए नहाता रहा। बे-खयाली में एक-दो बार तो मेरी लुन्गी भी, मेरे बदन पर से हट गई थी। पर अब तो ये बहुत बार हो चुका था। इसलिये मैने इस पर कोइ ध्यान नही दीया। हर बार की तरह आभा ने भी अपने हाथों को पेटिकोट के अन्दर डाल के खुब रगड-रगड के नहाना चालु रखा। थोडी देर बाद मैं नदी में उतर गया। राखी ने भी नदी में उतर के एक-दो डुबकियां लगाई, और फिर हम दोनो बाहर आ गये। मैने अपने कपडे चेन्ज कर लीये और पजामा और कुर्ता पहन लिया।राखी ने भी पहले अपने बदन को टोवेल से सुखाया, फिर अपने पेटिकोट के इजरबंध को जिसको कि, वो छाती पर बांध के रखती थी, पर से खोल लिया और अपने दांतो से पेटिकोट को पकड लिया, ये उसका हंमेशा का काम था, मैं उसको पत्थर पर बैठ के, एक-टक देखे जा रहा था। इस प्रकार उसके दोनो हाथ फ्री हो गये थे। अब सुखे ब्लाउस को पहनने के लीये पहले उसने अपना बांया हाथ उस में घुसाया, फिर जैसे ही वो अपना दाहिना हाथ ब्लाउस में घुसाने जा रही थी कि, पता नही क्या हुआ उसके दांतो से उसका पेटिकोट छुट गया और सीधे सरसराते हुए नीचे गीर गया। और उसका पुरा का पुरा नन्गा बदन एक पल के लीये मेरी आंखो के सामने दिखने लगा। उसकी बडी-बडी चुचियां, जिन्हे मैने अब तक कपडों के उपर से ही देखा था, उसके भारी-भारी चुतड, उसकी मोटी-मोटी जांघे और झांठ के बाल, सब एक पल के लीये मेरी आंखो के सामने नन्गे हो गये। पेटिकोट के नीचे गीरते ही, उसके साथ ही आभा भी, हाये करते हुए तेजी के साथ नीचे बैठ गई। मैं आंखे फाड-फाड के देखते हुए, गुंगे की तरह वहीं पर खडा रह गया। राखी नीचे बैठ कर अपने पेटिकोट को फिर से समेटती हुई बोली,
"ध्यान ही नही रहा। मैं, तुझे कुछ बोलना चाहती थी और ये पेटिकोट दांतो से छुट गया।"
मैं कुछ नही बोला। राखी फिर से खडी हो गई और अपने ब्लाउस को पहनने लगी। फिर उसने अपने पेटिकोट को नीचे किया और बांध लिया। फिर साडी पहन कर वो वहीं बैठ के अपने भीगे पेटिकोट को साफ कर के तैयार हो गई। फिर हम दोनो खाना खाने लगे। खाना खाने के बाद हम वहीं पेड की छांव में बैठ कर आराम करने लगे। जगह सुम-सान थी। ठंडी हवा बह रही थी। मैं पेड के नीचे लेटे हुए, आभा की तरफ घुमा तो वो भी मेरी तरफ घुमी। इस वक्त उसके चेहरे पर एक हलकी-सी मुस्कुराहट पसरी हुई थी। मैने पुछा,
"राखी , क्यों हस रही हो ?"
तो वो बोली,
"मैं कहां हस रही हुं ?"
"झुठ मत बोलो, तुम मुस्कुरा रही हो।"
"क्या करुं ? अब हंसने पर भी कोइ रोक है, क्या ?"
"नही, मैं तो ऐसे ही पुछा रहा था। नही बताना है तो मत बताओ।"
"अरे, इतनी अच्छी ठंडी हवा बह रही है, चेहरे पर तो मुस्कान आयेगी ही।"
"हां, आज गरम ईस्त्री (वुमन) की सारी गरमी जो निकल जायेगी।"
"क्या मतलब, ईस्त्री (आयरन) की गरमी कैसे निकल जायेगी ? यहां पर तो कहीं ईस्त्री नही है।"
"अरे राखी , तुम भी तो ईस्त्री (वुमन) हो, मेरा मतलब ईस्त्री माने औरत से था।"
"चल हट बदमाश, बडा शैतान हो गया है। मुझे क्या पता था की, तु ईस्त्री माने औरत की बात कर रहा है।"
"चलो, अब पता चल गया ना।""हां, चल गया। पर सच में यहां पेड की छांव में कितना अच्छा लग रहा है। ठंडी-ठंडी हवा चल रही है, और आज तो मैने पुरी हवा खायी है।",
राखी बोली।
"पुरी हवा खायी है, वो कैसे ?"
"मैं पुरी नन्गी जो हो गई थी।",
फिर बोली,
"हाये, तुझे मुझे ऐसे नही देखना चाहिए था ?"
"क्यों नही देखना चाहिए था ?"
"अरे बेवकूफ, इतना भी नही समजता। एक बहिन को, उसके भाई के सामने नंगा नही होना चाहिए था।"
"कहां नंगी हुई थी, तुम ? बस एक सेकन्ड के लिये तो तुम्हारा पेटिकोट नीचे गीर गया था।"
(हालांकि, वही एक सेकन्ड मुझे एक घन्टे के बराबर लग रहा था।)
"हां, फिर भी मुझे नंगा नही होना चाहिए था। कोई जानेगा तो क्या कहेगा कि, मैं अपने भाई के सामने नन्गी हो गई थी।"
"कौन जानेगा ?, यहां पर तो कोई था भी नही। तु बेकार में क्यों परेशान हो रही है ?"
"अरे नही, फिर भी कोई जान गया तो।",
फिर कुछ सोचती हुई बोली,
"अगर कोई नही जानेगा तो, क्या तु मुझे नंगा देखेगा ?"
मैं और राखी दोनो एक दुसरे के आमने-सामने, एक सुखी चादर पर, सुम-सान जगह पर, पेड के नीचे एक-दुसरे की ओर मुंह कर के लेटे हुए थे। और राखी की साडी उसके छाती पर से ढलक गई थी। राखी के मुंह से ये बात सुन के मैं खामोश रह गया और मेरी सांसे तेज चलने लगी।राखी ने मेरी ओर देखाते हुए पुछा,
"क्या हुआ ?'
मैने कोई जवाब नही दिया, और हलके से मुस्कुराते हुए उसकी छातियों की तरफ देखने लगा, जो उसकी तेज चलती सांसो के साथ उपर नीचे हो रही थी। वो मेरी तरफ देखते हुए बोली,
"क्या हुआ ?, मेरी बात का जवाब दे ना। अगर कोई जानेगा नही तो क्या तु मुझे नंगा देख लेगा ?"
इस पर मेरे मुंह से कुछ नही निकला, और मैने अपना सिर नीचे कर लिया. राखी ने मेरी ठुड्डी पकड के उपर उठाते हुए, मेरी आंखो में झांखते हुए पुछा,
"क्या हुआ रे ?, बोलना, क्या तु मुझे नंगा देख लेगा, जैसे तुने आज देखा है ?"
मैने कहा,
"हाय राखी , मैं क्या बोलुं ?"
मेरा तो गला सुख रहा था। राखी ने मेरे हाथ को अपने हाथों में ले लिया और कहा,
"इसका मतलब तु मुझे नंगा नही देख सकता, है ना ?"
मेरे मुंह से निकल गया,
"हाये राखी , छोडो ना।",
मैं हकलाते हुए बोला,
"नही राखी , ऐसा नही है।"
"तो फिर क्या है ? तु अपनी बहिन को नंगा देख लेगा क्या ?"
"हाये, मैं क्या कर सकता था ?, वो तो तुम्हरा पेटिकोट नीचे गीर गया, तब मुझे नंगा दिख गया। नही तो मैं कैसे देख पाता ?"
"वो तो मैं समझ गई, पर उस वक्त तुझे देख के मुझे ऐसा लगा, जैसे की तु मुझे घूर रहा है। ,,,,,,,,,,,,इसलिये पुछा।"
"हाये बहिन, ऐसा नही है। मैने तुम्हे बताया ना। तुम्हे बस ऐसा लगा होगा।"
"इसका मतलब, तुझे अच्छा नही लगा था ना।"
"हाये बहिन, छोडो.",
मैं हाथ छुडाते हुए, अपने चेहरे को छुपाते हुए बोला।
बहिन ने मेरा हाथ नही छोडा और बोली,
"सच-सच बोल, शरमाता क्यों है ?"
मेरे मुंह से निकल गया,
"हां, अच्छा लगा था।"
इस पर राखी ने मेरे हाथ को पकडा के, सीधे अपनी छाती पर रख दिया, और बोली,
"फिर से देखेगा बहिन को नंगा, बोल देखेगा ?" मेरे मुंह से आवाज नही निकल पा रही थी। मैं बडी मुश्किल से अपने हाथों को उसकी नुकिली, गुदाज छातियों पर स्थिर रख पा रहा था। ऐसे में, मैं भला क्या जवाब देता। मेरे मुंह से एक कराहने की सी आवाज नीकली। राखी ने मेरी ठुड्डी पकड कर, फिर से मेरे मुंह को उपर उठाया और बोली,
"क्या हुआ ? बोलना, शरमाता क्यों है ? जो बोलना है बोल।"
मैं कुछ नही बोला। थोडी देर तक उसकी चुचियों पर, ब्लाउस के उपर से ही हल्का-सा हाथ फेरा। फिर मैने हाथ खींच लिया। राखी कुछ नही बोली, गौर से मुझे देखती रही। फिर पता नही, क्या सोच कर वो बोली,
"ठीक है, मैं सोती हुं यहीं पर। बडी अच्छी हवा चल रही है, तु कपडों को देखते रहेना, और जो सुख जाये उन्हे उठा लेना। ठीक है ?"
और फिर, मुंह घुमा कर, एक तरफ सो गई। मैं भी चुप-चाप वहीं आंखे खोले लेटा रहा। राखी की चुचियां धीरे-धीरे उपर-नीचे हो रही थी। उसने अपना एक हाथ मोड कर, अपनी आंखो पर रखा हुआ था, और दुसरा हाथ अपनी बगल में रख कर सो रही थी। मैं चुप-चाप उसे सोता हुआ देखता रहा। थोडी देर में उसकी उठती-गीरती चुचियों का जादु मेरे उपर चल गया, और मेरा लंड खडा होने लगा। मेरा दिल कर रह था कि, काश मैं फिर से उन चुचियों को एक बार छु लुं। मैने अपने आप को गालियां भी नीकाली। क्या उल्लु का पठ्ठा हुं मैं भी। जो चीज आराम से छुने को मिल रही थी, तो उसे छुने की बजाये मैं हाथ हटा लिया। पर अब क्या हो सकता था। मैं चुप-चाप वैसे ही बैठा रहा। कुछ सोच भी नही पा रहा था। फिर मैने सोचा कि, जब उस वक्त राखी ने खुद मेरा हाथ अपनी चुचियों पर रख दिया था, तो फिर अगर मैं खुद अपने मन से रखुं तो शायद डांटेगी नही, और फिर अगर डांटेगी तो बोल दुन्गा, तुम्ही ने तो मेरा हाथ उस वक्त पकड कर रखा था, तो अब मैं अपने आप से रख दिया। सोचा, शायद तुम बुरा नही मानोगी। यही सब सोच कर मैने अपने हाथों को धीरे-से उसकी चुचियों पर ले जा के रख दिया, और हल्के-हल्के सहलाने लगा। मुझे गजब का मजा आ रहा था। मैने हल्के-से उसकी साडी को, पुरी तरह से उसके ब्लाउस पर से हटा दिया और फिर उसकी चुचियों को दबाया। ओओह, इतना गजब का मजा आया कि, बता नही सकता। एकदम गुदाज और सख्त चुचियां थी, राखी की इस उमर में भी। मेरा तो लंड खडा हो गया, और मैने अपने एक हाथ को चुचियों पर रखे हुए, दुसरे हाथ से अपने लंड को मसलने लगा। जैसे-जैसे मेरी बेताबी बढ रही थी, वैसे-वैसे मेरे हाथ दोनो जगहों पर तेजी के साथ चल रहे थे। मुझे लगता है कि, मैने राखी की चुचियों को कुछ ज्यादा ही जोर से दबा दिया था। शायद इसलिये राखी की आंख खुल गई। और वो एकदम से हडबडाते उठ गई, और अपने आंचल को संभालते हुए, अपनी चुचियों को ढक लिया, और फिर मेरी तरफ देखती हुइ बोली,
"हाये, क्या कर रहा था तु ? हाय, मेरी तो आंख लग गई थी।"
मेरा एक हाथ अभी भी मेरे लंड पर था, और मेरे चेहरे का रंग उड गया था। राखी ने मुझे गौर से एक पल के लिये देखा और सारा मांजरा समझ गई, और फिर अपने चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए बोली,
"हाये, देखो तो सही !! क्या सही काम कर रहा था ये लडका। मेरा भी मसल रहा था, और उधर अपना भी मसल रहा था।"
फिर राखी उठ कर सीधा खडी हो गई और बोली,
"अभी आती हुं।",
कह कर मुस्कुराते हुए झाडियों कि तरफ बढ गई। झाडियों के पीछे से आ के, फिर अपने चुतडों को जमीन पर सटाये हुए ही, थोडा आगे सरकते हुए मेरे पास आई। उसके सरक कर आगे आने से उसकी साडी थोडी-सी उपर हो गई, और उसका आंचल उसकी गोद में गीर गया। पर उसको इसकी फिकर नही थी। वो अब एकदम से मेरे नजदीक आ गई थी और उसकी गरम सांसे मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थी। वो एक पल के लिये ऐसे ही मुझे देखती रही, फिर मेरी ठुड्डी पकड कर मुझे उपर उठाते हुए, हल्के-से मुस्कुराते हुए धीरे से बोली,
"क्यों रे बदमाश, क्या कर रहा था ?, बोलना, क्या बदमाशी कर रहा था, अपनी बहिन के साथ ?"
फिर मेरे फूले-फूले गाल पकड कर हल्के-से मसल दिये। मेरे मुंह से तो आवाज ही नही नीकल रही थी। फिर उसने हल्के-से अपना एक हाथ मेरी जांघो पर रखा और सहलाते हुए बोली,
"हाये, कैसे खडा कर रख है, मुए ने ?"
फिर सीधा पजामे के उपर से मेरे खडे लंड (जो की बहिन के जगने से थोडा ढीला हो गया था, पर अब उसके हाथों का स्पर्श पा के फिर से खडा होने लगा था) पर उसने अपना हाथ रख दिया,
"उईइ मां, कैसे खडा कर रखा है ?, क्या कर रहा था रे, हाथ से मसल रहा था, क्या ? हाये बेटा, और मेरी इसको भी मसल रहा था ? तु तो अब लगता है, जवान हो गया है। तभी मैं कहुं कि, जैसे ही मेरा पेटिकोट नीचे गीरा, ये लडका मुझे घुर-घुर के क्यों देख रहा था ? हाये, इस लडके की तो अपनी बहिन के उपर ही बुरी नजर है।"
"हाये बहिन, गलती हो गई, माफ कर दो।"
"ओहो, अब बोल रहा है गलती हो गई, पर अगर मैं नही जगती तो, तु तो अपना पानी नीकाल के ही मानता ना ! मेरी छातियों को दबा दबा के !! उमम्म्,,,, बोल, नीकालता की नही, पानी ?"
"हाये बहिन, गलती हो गई।"
"वाह रे तेरी गलती, कमाल की गलती है। किसी का मसल दो, दबा दो, फिर बोलो की गलती हो गई। अपना मजा कर लो, दुसरे चाहे कैसे भी रहे।",
कह कर बहिन ने मेरे लंड को कास् के दबाया, उसके कोमल हाथों का स्पर्श पा के मेरा लंड तो लोहा हो गया था, और गरम भी काफी हो गया था। "हाये राखी छोडो, क्या कर रही हो ?" आभा उसी तरह से मुस्कुराती हुई बोली,
"क्यों प्यारे, तुने मेरा दबाया तब, तो मैने नही बोला कि छोडो। अब क्यों बोल रहा है, तु ?"
मैने कहा,
"हाये, राखी तु दबायेगी तो सच में मेरा पानी निकल जायेगा। हाये, छोडो ना आभा।" "क्यों, पानी निकालने के लिये ही तो तु दबा रहा था ना मेरी छातियां ? मैं अपने हाथ से निकाल देती हुं, तेरे गन्ने से तेरा रस। चल, जरा अपना गन्ना तो दिखा।"
"हाये राखी , छोडो, मुझे शरम आती है।"
"अच्छा, अभी तो बडी शरम आ रही है, और हर रोज जो लुन्गी और पजामा हटा-हटा के, जब सफाई करता है तब,,,?, तब क्या मुझे दिखाई नही देता क्या ?, अभी बडी एक्टींग कर रहा है।"
"हाय, नही राखी , तब की बात तो और है, फिर मुझे थोडे ही पता होता था की तुम देख रही हो।"
ओह, ओह, मेरे भोले राजा, बडा भोला बन रहा है, चल दिखा ना, देखुं कितना बडा और मोटा है, तेरा गन्ना ? मैं कुछ बोल नही पा रहा था। मेरे मुंह से शब्द नही निकल पा रहे थे। और लग रहा था जैसे, मेरा पानी अब निकला की तब निकला। इस बीच राखी ने मेरे पजामे का नाडा खोल दिया, और अंदर हाथ डाल के मेरे लंड को सीधा पकड लिया। मेरा लंड जो की केवल उसके छु ने के कारण से फुफकारने लगा था, अब उसके पकडने पर अपनी पुरी औकात पर आ गया और किसी मोटे लोहे की रोड की तरह एकदम तन कर उपर की तरफ मुंह उठाये खडा था। राखी मेरे लंड को अपने हाथों में पकडने की पुरी कोशिश कर रही थी, पर मेरे लंड की मोटाई के कारण से वो उसे अपनी मुठ्ठी में, अच्छी तरह से कैद नही कर पा रही थी। उसने मेरे पजामे को वहीं खुले में, पेड के नीचे, मेरे लंड पर से हटा दिया।
"हाये राखी , छोडो, कोई देख लेगा। ऐसे कपडे मत हटाओ।"
मगर राखी शायद पुरे जोश में आ चुकी थी।
"चल, कोई नही देखता। फिर सामने बैठी हुं, किसी को नजर भी नही आयेगा। देखुं तो सही, मेरे भाई का गन्ना आखिर, है कितना बडा ?"
और मेरा लंड देखते ही, आश्चर्य से उसका मुंह खुला का खुला रह गया। एकदम से चौंकती हुई बोली,
"हाये दैय्या,,,!! ये क्या ,,,,??? इतना मोटा, और इतना लम्बा ! ये कैसे हो गया रे, तेरे जीजा का तो बित्ते भर का भी नही है, और यहां तु बेलन के जैसा ले के घुम रहा है।"
"ओह बहिन, मेरी इसमे क्या गलती है। ये तो शुरु में पहले छोटा-सा था, पर अब अचानक इतना बडा हो गया है, तो मैं क्या करुं ?"
"गलती तो तेरी ही है, जो तुने इतना बडा जुगाड होते हुए भी, अभी तक मुझे पता नही चलने दिया। वैसे जब मैने देखा था नहाते वक्त, तब तो इतना बडा नही दिख रहा था रे,,,,?"
"हाये बहिन, वो,,, वो,,,,"
मैं हकलाते हुए बोला,
"वो इसलिये, क्योंकि उस समय ये उतना खडा नही रहा होगा। अभी ये पुरा खडा हो गया है।"
"ओह, ओह, तो अभी क्यों खडा कर लिया इतना बडा ?, कैसे खडा हो गया अभी तेरा ?अब मैं क्या बोलता कि कैसे खडा हो गया। ये तो बोल नही सकता था कि, बहिन तेरे कारण खडा हो गया है मेरा। मैने सकपकाते हुए कहा,
"अरे, वो ऐसे ही खडा हो गया है। तुम छोडो, अभी ठीक हो जायेगा।"
"ऐसे कैसे खडा हो जाता है तेरा ?",
बहिन ने पुछा, और मेरी आंखो में देख कर, अपने रसीले होठों का एक कोना दबा के मुसकाने लगी ।
"अरे, तुमने पकड रखा है ना, इसलिये खडा हो गया है मेरा। क्या करुं मैं ?, हाये छोड दो ना।"
मैं किसी भी तरह से, बहिन का हाथ अपने लंड पर से हटा देना चाहता था। मुझे ऐसा लग रहा था कि, बहिन के कोमल हाथों का स्पर्श पा के कहीं मेरा पानी निकल ना जाये। फिर बहिन ने केवल पकडा तो हुआ नही था। वो धीरे-धीरे मेरे लंड को सहला भी, और बार-बार अपने अंगुठे से मेरे चिकने सुपाडे को छु भी रही थी।
"अच्छा, अब सारा दोष मेरा हो गया, और खुद जो इतनी देर से मेरी छातियां पकड के मसल रहा था और दबा रहा था, उसका कुछ नही ?""चल मान लिया गलती हो गई, पर सजा तो इसकी तुझे देनी पडेगी, मेरा तुने मसला है, मैं भी तेरा मसल देती हुं।",
कह कर बहिन अपने हाथो को थोडा तेज चलाने लगी और मेरे लंड का मुठ मारते हुए, मेरे लंड की मुंडी को अंगुठे से थोडी तेजी के साथ घीसने लगी। मेरी हालत एकदम खराब हो रही थी। गुदगुदाहत और सनसनी के मारे मेरे मुंह से कोई आवाज नही निकल पा रही थी। ऐसा लग रहा था, जैसे कि, मेरा पानी अब निकला की तब निकला। पर बहिन को मैं रोक भी नही पा रहा था। मैने सिसयाते हुए कहा,
"ओह बहिन, हाये निकल जायेगा, मेरा निकल जायेगा।"
इस पर बहिन और जोर से हाथ चलाते हुए अपनी नजर उपर करके, मेरी तरफ देखते हुए बोली,
"क्या निकल जायेगा ?"
"ओह, ओह, छोडोना, तुम जानती हो, क्या निकल जायेगा,,,? क्यों परेशान कर रही हो ?"
"मैं कहां परेशान कर रही हुं ? तु खुद परेशान हो रहा है।"
"क्यों, मैं क्यों भला खुद को परेशान करुन्गा ? तुम तो खुद ही जबरदस्ती, पता नही क्यों मेरा मसले जा रही हो ?"
"अच्छा, जरा ये तो बता, शुरुआत किसने कि थी मसलने की ?",
कह कर बहिन मुस्कुराने लगी।
मुझे तो जैसे सांप सुंघ गया था। मैं भला क्या जवाब देता। कुछ समझ में ही नही आ रहा था कि क्या करुं, क्या ना करुं ? उपर से मजा इतना आ रहा था कि जान निकली जा रही थी। तभी बहिन ने अचानक मेरा लंड छोड दिया और बोली,
"अभी आती हुं।"
और एक कातिल मुस्कुराहट छोडते हुए उठ कर खडी हो गई, और झाडियों की तरफ चल दी। मैं उसको झाडियों कि ओर जाते हुए देखता हुआ, वहीं पेड के नीचे बैठा रहा। झाडियां, जहां हम बैठे हुए थे, वहां से बस दस कदम की दूरी पर थी। दो-तीन कदम चलने के बाद राखी पिछे कि ओर मुडी और बोली,
"बडी जोर से पेशाब आ रही थी, तुझे आ रही हो तो तु भी चल, तेरा लंड भी थोडा ढीला हो जायेगा। ऐसे बेशरमों की तरह से खडा किये हुए है।"
और फिर अपने निचले होंठ को हल्के-से काटते हुए आगे चल दी। मेरी कुछ समझ में ही नही आ रहा था कि मैं क्या करुं। मैं कुछ देर तक वैसे ही बैठा रहा। इस बीच राखी झाडियों के पिछे जा चुकी थी। झाडियों की इस तरफ से जो भी झलक मुझे मिल रही, वो देख कर मुझे इतना तो पता चल ही गया था कि, राखी अब बैठ चुकी है और शायद पेशाब भी कर रही है। मैने फिर थोडी हिम्मत दिखाई और उठ कर झाडियों की तरफ चल दिया। झाडियों के पास पहुंच कर नजारा कुछ साफ दिखने लगा था। राखी आराम से अपनी साडी उठा कर बैठी हुई थी, और मुत रही थी उसके इस अंदाज से बैठने के कारण, पिछे से उसकी गोरी-गोरी झांघे तो साफ दिख ही रही थी, साथ-साथ उसके मख्खन जैसे चुतडों का निचला भाग भी लगभग साफ-साफ दिखाई दे रहा था। ये देख कर तो मेरा लंड और भी बुरी तरह से अकडने लगा था। हालांकि उसकी झांघो और चुतडों की झलक देखने का ये पहला मौका नही था, पर आज, और दिनो से कुछ ज्यादा ही उत्तेजना हो रही थी। उसके पेशाब करने की अवाज तो आग में घी का काम कर रही थी। सु,,,उ,उ,उ,,सु,,,सु,उ,उ,उ, करते हुए, किसी औरत के मुतने की आवाज में पता नही क्या आकर्षण होता है, किशोर उमर के सारे लडकों को अपनी ओर खींच लेती है। मेरा तो बुरा हाल हो रखा था। तभी मैने देखा कि राखी उठ कर खडी हो गई। जब वो पलटी तो मुझे देख कर मुस्कुराते हुए बोली,
"अरे, तु भी चला आया ? मैने तो तुझे पहले ही कहा था कि, तु भी हल्का हो ले।"
फिर आराम से अपने हाथों को साडी के उपर बुर पे रख कर, इस तरह से दबाते हुए खुजाने लगी जैसे, बुर पर लगी पेशाब को पोंछ रही हो और, मुस्कुराते हुए चल दी, जैसे कि कुछ हुआ ही नही। मैं एक पल को तो हैरान परेशान सा वहीं पर खडा रहा। फिर मैं भी झाडियों के पिछे चला गया और पेशाब करने लगा। बडी देर तक तो मेरे लंड से पेशाब ही नही निकला, फिर जब लंड कुछ ढीला पडा, तब जा के पेशाब निकलना शुरु हुआ। मैं पेशाब करने के बाद वापस, पेड के निचे चल पडा।
पेड के पास पहुंच कर मैने देखा राखी बैठी हुई थी। मेरे पास आने पर बोली,
"आ बैठ, हल्का हो आया ?",
कह कर मुस्कुराने लगी। मैं भी हल्के-हल्के मुस्कुराते, कुछ शरमाते हुए बोला,
"हां, हल्का हो आया।"
और बैठ गया। मेरे बैठने पर राखी ने मेरी ठुड्डी पकड कर मेरा सिर उठा दिया और सीधा मेरी आंखो में झांकते हुए बोली,और फिर अपने निचले होंठ को हल्के-से काटते हुए आगे चल दी। मेरी कुछ समझ में ही नही आ रहा था कि मैं क्या करुं। मैं कुछ देर तक वैसे ही बैठा रहा। इस बीच राखी झाडियों के पिछे जा चुकी थी। झाडियों की इस तरफ से जो भी झलक मुझे मिल रही, वो देख कर मुझे इतना तो पता चल ही गया था कि, राखी अब बैठ चुकी है और शायद पेशाब भी कर रही है। मैने फिर थोडी हिम्मत दिखाई और उठ कर झाडियों की तरफ चल दिया। झाडियों के पास पहुंच कर नजारा कुछ साफ दिखने लगा था। राखी आराम से अपनी साडी उठा कर बैठी हुई थी, और मुत रही थी उसके इस अंदाज से बैठने के कारण, पिछे से उसकी गोरी-गोरी झांघे तो साफ दिख ही रही थी, साथ-साथ उसके मख्खन जैसे चुतडों का निचला भाग भी लगभग साफ-साफ दिखाई दे रहा था। ये देख कर तो मेरा लंड और भी बुरी तरह से अकडने लगा था। हालांकि उसकी झांघो और चुतडों की झलक देखने का ये पहला मौका नही था, पर आज, और दिनो से कुछ ज्यादा ही उत्तेजना हो रही थी। उसके पेशाब करने की अवाज तो आग में घी का काम कर रही थी। सु,,,उ,उ,उ,,सु,,,सु,उ,उ,उ, करते हुए, किसी औरत के मुतने की आवाज में पता नही क्या आकर्षण होता है, किशोर उमर के सारे लडकों को अपनी ओर खींच लेती है। मेरा तो बुरा हाल हो रखा था। तभी मैने देखा कि राखी उठ कर खडी हो गई। जब वो पलटी तो मुझे देख कर मुस्कुराते हुए बोली,
"अरे, तु भी चला आया ? मैने तो तुझे पहले ही कहा था कि, तु भी हल्का हो ले।"
फिर आराम से अपने हाथों को साडी के उपर बुर पे रख कर, इस तरह से दबाते हुए खुजाने लगी जैसे, बुर पर लगी पेशाब को पोंछ रही हो और, मुस्कुराते हुए चल दी, जैसे कि कुछ हुआ ही नही। मैं एक पल को तो हैरान परेशान सा वहीं पर खडा रहा। फिर मैं भी झाडियों के पिछे चला गया और पेशाब करने लगा। बडी देर तक तो मेरे लंड से पेशाब ही नही निकला, फिर जब लंड कुछ ढीला पडा, तब जा के पेशाब निकलना शुरु हुआ। मैं पेशाब करने के बाद वापस, पेड के निचे चल पडा।
पेड के पास पहुंच कर मैने देखा राखी बैठी हुई थी। मेरे पास आने पर बोली,
"आ बैठ, हल्का हो आया ?",
कह कर मुस्कुराने लगी। मैं भी हल्के-हल्के मुस्कुराते, कुछ शरमाते हुए बोला,
"हां, हल्का हो आया।"
"क्यों रे ?, उस समय जब मैं छु रही थी, तब तो बडा भोला बन रहा था। और जब मैं पेशाब करने गई थी, तो वहां पिछे खडा हो के क्या कर रहा था, शैतान !!"
मैने अपनी ठुड्डी पर से राखी का हाथ हटाते हुए, फिर अपने सिर को निचे झुका लिया और हकलाते हुए बोला,
"ओह राखी, तुम् भी ना,,,,,,"
"मैने क्या किया ?",
राखी ने हल्की-सी चपत मेरे गाल पर लगाई और पुछा।
"राखी, तुमने खुद ही तो कहा था, हल्का होना है तो, आ जाओ।"
इस पर राखी ने मेरे गालों को हल्के-से खींचते हुए कहा,
"अच्छा बेटा, मैने हल्का होने के लिये कहा था, पर तु तो वहां हल्का होने की जगह भारी हो रहा था। मुझे पेशाब करते हुए घुर-घुर कर देखने के लिये तो मैने नही कहा था तुम्हे, फिर तु क्यों घुर-घुर कर मजे लुट रहा था ?"
"हाय, मैं कहां मजा लुट रहा था, कैसी बाते कर रही हो राखी ?'
"ओह हो, शैतान अब तो बडा भोला बन रहा है।',
कह कर हल्के-से मेरी झांटो को दबा दिया।
"हाये, क्या कर रही हो,,,?"
पर उसने छोडा नही और मेरी आंखो में झांखते हुए फिर धीरे-से अपना हाथ मेरे लंड पर रख दिया और फुसफुसाते हुए पुछा,
"फिर से दबाउं ?"
मेरी तो हालत उसके हाथ के छुने भर से फिर से खराब होने लगी। मेरी समझ में एकदम नही आ रहा था कि क्या करुं। कुछ जवाब देते हुए भी नही बन रहा था कि क्या जवाब दुं। तभी वो हल्का-सा आगे की ओर सरकी और झुकी। आगे झुकते ही उसका आंचल उसके ब्लाउस पर से सरक गया। पर उसने कोई प्रयास नही किया उसको ठीक करने का। अब तो मेरी हालत और खराब हो रही थी। मेरी आंखो के सामने उसकी नारीयल के जैसी सख्त चुचियां जीनको सपने में देख कर, मैने ना जाने कितनी बार अपना माल गीराया था, और जीसको दुर से देख कर ही तडपता रहता था, नुमाया थी। भले ही चुचियां अभी भी ब्लाउस में ही कैद थी, परंतु उनके भारीपन और सख्ती का अंदाज उनके उपर से ही लगाया जा सकता था। ब्लाउस के उपरी भाग से उसकी चुचियों के बीच की खाई का उपरी गोरा-गोरा हिस्सा नजर आ रहा था। हालांकि, चुचियों को बहुत बडा तो नही कहा जा सकता, पर उतनी बडी तो थी ही, जितनी एक स्वस्थ शरीर की मालकिन की हो सकती है। मेरा मतलब है कि इतनी बडी जीतनी कि आप के हाथों में ना आये, पर इतनी बडी भी नही की आप को दो-दो हाथो से पकडनी पडे, और फिर भी आपके हाथ ना आये। एकदम किसी भाले की तरह नुकिली लग रही थी, और सामने की ओर निकली हुई थी। मेरी आंखे तो हटाये नही हट रही थी। तभी राखी ने अपने हाथों को मेरे लंड पर थोडा जोर से दबाते हुए पुछा,
"बोलना, और दबाउं क्या ?"
"हाये,,,,,,राखी, छोडो ना।"
उसने जोर से मेरे लंड को मुठ्ठी में भर लिया।
"हाये राखी, छोडो बहुत गुद-गुदी होती है।"
"तो होने दे ना, तु खाली बोल दबाउं या नही ?"
"हाये दबाओ राखी, मसलो।"
"अब आया ना, रस्ते पर।"
"हाये राखी, तुम्हारे हाथों में तो जादु है।"
"जादु हाथों में है या,,,,,,!!!, या फिर इसमे है,,,,??"
(अपने ब्लाउस की तरफ इशारा कर के पुछा।)
"हाये राखी, तुम तो बस,,,,,?!!"
"शरमाता क्यों है ?,बोलना क्या अच्छा लग रहा है,,?"
"हाय राखी,, मैं क्या बोलुं ?"
"क्यों क्या अच्छा लग रहा है,,,?, अरे, अब बोल भी दे शरमाता क्यों है,,?"
"हाये राखी दोनो अच्छे लग रहे है।"
"क्या, ये दोनो ? "
(अपने ब्लाउस की तरफ इशारा कर के पुछा)
"हां, और तुम्हारा दबाना भी।"
"तो फिर शरमा क्यों रहा था, बोलने में ? ऐसे तो हर रोज घुर-घुर कर मेरे अनारो को देखता रहता है।फिर राखी ने बडे आराम से मेरे पुरे लंड को मुठ्ठी के अंदर कैद कर हल्के-हल्के अपना हाथ चलाना शुरु कर दिया।
"तु तो पुरा जवान हो गया है, रे!"
"हाये राखी,,,,"
"हाये, हाये, क्या कर रहा है। पुरा सांढ की तरह से जवान हो गया है तु तो। अब तो बरदाश्त भी नही होता होगा, कैसे करता है,,,?"
"क्या राखी,,,,?"
"वही बरदाश्त, और क्या ? तुझे तो अब छेद (होल) चाहिये। समझा, छेद मतलब ?"
"नही राखी, नही समझा,,"
"क्या उल्लु लडका है रे, तु ? छेद मतलब नही समझता,,,,?!!"
मैने नाटक करते हुए कहा,
"नही राखी, नही समझता।"
इस पर राखी हल्के-हल्के मुस्कुराने लगी और बोली,
"चल समझ जायेगा, अभी तो ये बता कि कभी इसको (लंड की तरफ इशारा करते हुए) मसल-मसल के माल गीराया है ?"
"माल मतलब,,,!? क्या होता है, राखी,,,?"
"अरे उल्लु, कभी इसमे से पानी गीराया है, या नही ?" "हाय, वो तो मैं हर-रोज गीराता हुं। सुबह-शाम दिनभर में चार-पांच बार। कभी ज्यादा पानी पी लिया तो ज्यादा बार हो जाता है।"
"हाये, दिनभर में चार-पांच बार ? और पानी पीने से तेरा ज्यादा बार निकलता है ? कही तु पेशाब करने की बात तो नही कर रहा ?"
"हां राखी, वही तो मैं तो दिनभर में चार-पांच बार पेशाब करने जाता हुं।"
इस पर राखी ने मेरे लंड को छोड कर, हल्के-से मेरे गाल पर एक झापड लगाई और बोली,
"उल्लु का उल्लु ही रह गया, क्या तु ?"
फिर बोली
"ठहर जा, अभी तुझे दिखाती हुं, माल कैसे निकल जाता है ?"
फिर वो अपने हाथों को तेजी से मेरे लंड पर चलाने लगी। मारे गुद-गुदी और सनसनी के मेरा तो बुरा हाल हो रखा था। समझ में नही आ रहा था क्या करुं। दिल कर रहा था की हाथ को आगे बढा कर राखी की दोनो चुचियों को कस के पकड लुं, और खूब जोर-जोर से दबाउं। पर सोच रहा था कि कहीं बुरा ना मान जाये। इस चक्कर में मैने कराहते हुए सहारा लेने के लिये, सामने बैठी राखी के कंधे पर अपने दोनो हाथ रख दिये। वो उस पर तो कुछ नही बोली, पर अपनी नजरे उपर कर के मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए बोली,
"क्यों मजा आ रहा है की, नही,,,?"
"हाये राखी, मजे की तो बस पुछो मत। बहुत मजा आ रहा है।"
मैं बोला। इस पर राखी ने अपना हाथ और तेजी से चलाना शुरु कर दिया और बोली,
"साले, हरामी कहीं के !!! मैं जब नहाती हुं, तब घुर-घुर के मुझे देखता रहता है। मैं जब सो रही थी, तो मेरे चुंचे दबा रहा था, और अभी मजे से मुठ मरवा रहा है। कमीने, तेरे को शरम नही आती ?" मेरा तो होश ही उड गया। ये राखी क्या बोल रही थी। पर मैने देखा की उसका एक हाथ अब भी पहले की तरह मेरे लंड को सहलाये जा रहा था। तभी राखी, मेरे चेहरे के उडे हुए रंग को देख कर हसने लगी, और हसते हुए मेरे गाल पर एक थप्पड लगा दिया। मैने कभी भी इस से पहले राखी को, ना तो ऐसे बोलते सुना था, ना ही इस तरह से बर्ताव करते हुए देखा था। इसलिये मुझे बडा आश्चर्य हो रहा था।
पर उसके हसते हुए थप्पड लगाने पर तो मुझे, और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ की, आखिर ये चाहती क्या है। और मैने बोला की,
"माफ कर दो राखी, अगर कोई गलती हो गई हो तो।"
इस पर राखी ने मेरे गालों को हल्के सहलाते हुए कहा की,
"गलती तो तु कर बैठा है, बेटे। अब केवल गलती की सजा मिलेगी तुझे।"
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