Monday, January 27, 2014

बदनाम रिश्ते खानदानी चुदाई का सिलसिला--16

FUN-MAZA-MASTI

बदनाम रिश्ते
खानदानी चुदाई का सिलसिला--16
गतान्क से आगे..............

  दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी का सोलहवां पार्ट लेकर हाजिर हूँ
बाबूजी को आख़िरी सिग्नल मिल गया था. उनमे एक नया जोश आ चुका था. एक ज़बरदस्त झटके से उन्होने मुन्नी को मोड दिया और उसके सूट के नीचे हाथ डाल के उसकी सलवार का नाडा खोल दिया. सलवार ढीली होते ही हाथ कछि के एलास्टिक में गया और 2 सेकेंड में कछि और सलवार पैरों में थे. मुन्नी के हाथ से लंड छूट ही नही रहा था. बाबूजी ने उसके पैरों से सलवार निकलवा दी और उसके सिर को बेड की तरफ धकेला. टांगे सीधी किए मुन्नी का चेहरा नरम गद्दे से सॅट गया. बाबूजी ने सूट को पिछे से उठाते हुए एक बार नंगी गांद और चूत का जायज़ा लिया और बिना देर किए सॅट से लंड चूत के मुख्य द्वार पे भिड़ा दिया.

''यहीं चाहिए था ना....'' बाबूजी ने चूतरो को दोनो तरफ से पकड़ते हुए झटका लिया. सूपड़ा अंदर घुसा. चूत चहेक उठी.

''उूुउउम्म्म्ममममम....हां ...पूराअ दो.....जड़ तक....यहाँ तक्क.....इन्हे भी मेरे शरीर से चिपकने दो...उउउइईई......हाआअन्न्‍नणणन्.......दूऊव.......'' मुन्नी ने गद्दे में सिर को सपोर्ट देते हुए पिछे मूड के देखा और हाथ बढ़ा के टट्टों को सहलाते हुए कहा.

लंड ने कसमसाई हुई गीली चूत को खोलना शुरू किया..देखते ही देखते चूत लोडा निगल गई....निगोडी चूत....काली....जिसमे रोज़ कोई घुसता था...उस चूत का मालिक ...पर आज एक नया किरायेदार आ गया......जो किराए के तौर पे नए सूट देता है.....ऊओह.....किराए में बहुत सारा वीर्य भी देता है........उउम्म्म्म...

बाबूजी ने रफ़्तार पकड़नी शुरू की ..पर कुच्छ कमी थी. सूट प्राब्लम कर रहा था...लंड को जड़ तक बिठाते हुए बाबूजी आगे झुके और सूट को उतारना शुरू कर दिया..बाजुएँ उपर को उठी और फिर देखते ही देखते सूट बाजुओं से फिसलने लगा. इसी बीच ब्रा का हुक भी 2 अंजान मर्दाने हाथों ने खोल दिया था और अब 2 नंगे बदन एक दूसरे को धक्के देने में लगे हुए थे.

सत्त सॅट्ट की आवाज़ फ्हिछ फ़ीच्छ में बदलते देर नही लगी. शुरुआत की दबी हुई आहें अब एक लगतार निकलती हुई सिसकी बन गई थी....वो सिसकी जो कि चूत से जनम लेके गले तक पहुँची थी. मम्मे मसले जा रहे थे..निपल रह रह के खींच रहे थे...गांद बार बार पिछे को लंड पे ठोकर मार रही थी....पसीना बहने लगा था और दो बदनो की खुश्बू अब मिलने लगी थी.....समय सिर्फ़ 5 मिनिट...

''ऊओह...उउंाआआ............ऊओह बाआबबू....चुद गई रे..............ऊओह हाआंन्‍ननणणन्....झारवाआअ दे ....जल्दी.......सब्र नही होता.........जल्दी कर दे....हान्ंननणणन्......निचोड़ मेरे संतरे.....ऊओह....माआ.......ऊओहिईउउुउउंमाआ...........हाआंन्न..हान्णन्न्.....इष्ह.....''
एक नई चूत की फ़ुआर कैसी लगती है बाबूजी को इसका एहसास एक बार फिर से हुआ...

हर औरत अपने तरीके से झरती है और मुन्नी का स्वरूप भी अलग ही था. सिर दोनो तरफ हिल रहा था और गांद रह रह के थपकी दे रही थी. झरते हुए कंपन पूरे शरीर को थिरका रही थी. सूखी पत्ती जैसे पेड़ की शाख पे तेज़ हवा में लहराती है...और उसी तेज़ हवा में एक दम से अलग हो के हवा में लहरा जाती है.....फ्ह्ह्ह्ह्हुउउछ्ह्ह्ह की आवाज़ के साथ शाख से पत्ती अलग हो गई. मुन्नी बिस्तर पे पीठ के बल लूड़क गई और दोनो हाथ अपनी मुनिया पे रख के ज़ोर ज़ोर से हिलने लगी....उसकी सिसकियाँ अब एक लंबी आआआआआहह में तब्दील हो गई थी. पूरा बदन बिस्तर पे पड़े पड़े दोनो साइड में झूल रहा था. दोनो हाथ इतने ज़ोर से चूत के उपर के हिस्से को दबाए हुए थे कि हाथों की नसें भी उभर आई थी.

'' बाबूजी अब संतरे खाना छोड़िए और आम के बाग़ीचे की सैर कीजिए.....दो आमों से सजे पेड़ आपका इंतेज़ार कर रहे हैं...'' नंगी कम्मो...इठलाती हुई ..नंगी शारदा का हाथ पकड़ के कमरे में दाखिल हुई.......................

बाबूजी के हथियार ने एक और झटका लिया और फिर उनकी बंदूक नए माल की तरफ मूड गई.

बाबूजी की आँखों की हवस और चमक दोनो नंगी औरतों को देख के बढ़ गई. कम्मो जितना इठला रही थी वही शारदा उतना ही शर्मा रही थी. कम्मो के थोड़े पिछे खड़े उसने अपने हाथों से अपनी चूत धकि हुई थी. गदराया हुआ गथीला बदन देख के बाबूजी समझ गए कि ये चुदाइ में मस्त चुदेगि. दोनो मम्मे बड़े बड़े आमों के आकार के थे और उनके काली काली लंबी निपल झूल रही थी. दोनो निपल एक दम कड़े थे. उनपे हल्की चमक थी ..शायद कम्मो ने चूसे थे. बाबूजी के लंड ने एक झटका लिया और फिर उन्होने खड़े खड़े अपनी बाहें खोल दी.

''आओ मेरी रानिओ आ जाओ मेरी बाहों में..अपने जिस्म को मेरे जिस्म से छूने दो. '' ये एक आदेश था और उसका पालन करने में कम्मो को देर ना लगी. झट से बाबूजी की बाहों में आते हुए उसने उन्हे कस के भींचा और फिर बाबूजी के होंठो से अपने रसीले होंठ लगा के लंबा सा चुंबन लिया. कम्मो के जाने पहचाने मम्मो के घर्षण से बाबूजी थर्का गए और उन्होने कम्मो की चूत में अपनी जुड़ी हुई उंगली डाली. कम्मो ने कसमसा के अपनी गांद हिलाई और फिर उंगली बाहर निकाल के चूस ली. 3 कदम की दूरी पे खड़ी शारदा के उरोज उपर नीचे होने लगे. बिस्तर पे अब शांत पड़ी मुन्नी अपनी मुनिया को हल्के हल्के दबाने लगी.

''आओ शारदा यहाँ आओ..मैं तुम्हे महसूस करना चाहता हूँ. यहाँ आओ और मुझे अपना आम रस चखने दो...'' बाबूजी ने कम्मो को अपने बगल में खड़ा करते हुए कहा. कम्मो के हाथ उनके रस से भीगे लंड को पूचकार कर सहला रहे थे और साथ ही वो अपने मम्मे पे पड़ा बाबूजी का हाथ दबा रही थी. शरमाती हुई लाजाति हुई शारदा बाबूजी के नज़दीक 1 फीट की दूरी पे खड़ी हो गई. शारदा की हाइट और बॉडी कम्मो से मिलती जुलती थी. सिर्फ़ 2 फरक थे. एक उसके चुतडो का उभार जो कि कम्मो से ज़ियादा था और दूसरे उसकी चूत पे घनी काली झाटें. बाबूजी ने उसके उसके चेहरे पे अपनी जुड़ी हुई उंगली को माथे से लेकर गालों पे फेरा. पराए पुरुष का टच पाते ही शारदा काँप उठी. उसके बदन में झुरजुरी दौड़ गई और घुटने जैसे कमज़ोर हो गए. होंठ लरजते हुए खुल गए और बाबूजी ने उनका निमंत्रण स्वीकार करते हुए अपने होंठ उनसे मिला दिए.

शारदा अब पिघल गई. उसके हाथ बरबस बाबूजी के चेहरे पे चले गए और फिर उसकी बाहें उनकी गर्दन के आसपास. बाबूजी और उसकी हाइट में काफ़ी फरक था और जितना वो झुके हुए थे उसके हिसाब से शारदा को उन्हे चूमने के लिए अपने पंजे पे खड़ा होना पड़ा. अपनी बाजुओं का हार कसते हुए जैसे ही वो पंजो पे हुई तो उसका बॅलेन्स बिगड़ गया. बाबूजी ने उसकी कमर को पकड़ते हुए उसे सहारा दिया और झट से उसे उपर उठा लिया. जैसा कि नेचर करवाती है शारदा एक बच्चे की तरह उनसे झूल गई और लटक गई. उसके मोटे मम्मे सॅट्ट से बाबूजी की छाती में धँस गए और बाबूजी उसके वजन को समहालने के लए उसके चुतडो पे हाथ रखते हुए उसे उठाने की कोशिश कर रहे थे.

शारदा ने बाबूजी की गर्दन का सपोर्ट लेते हुए अपनी टांगे खोली और उनकी कमर के इर्द गिर्द अपनी जांघे लपेट के उन्हे बेतहाशा चूमने लगी. साँसों की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी और बाबूजी के लंड की ठोकर उसकी चूत के मुहाने पे थी. शब्द निकलने बंद हो गए थे और सिर्फ़ होंठो के चूसे जाने की आवाज़ें आ रही थी. कम्मो समझ गई कि उसकी बारी बाद में आएगी...बाबूजी को नया माल चखना है. बिना कुच्छ बोले कम्मो ज़मीन पे घुटनो के बल बैठी. उसके चेहरे के सामने शारदा की गांद झूल रही थी. बाबूजी के बड़े बड़े हाथ उसको मसल रहे थे. बाबूजी का लंड चूत के द्वार पे घर्षण कर रहा था जैसे कि शारदा ने अपनी चूत उसपे चादर की तरह बिच्छा दी हो. कम्मो ने आगे बढ़ के बाबूजी के सुपादे पे थूका और हथेली से उसे मला और फिर दूसरे हाथ से शारदा की फांके खोलते हुए लंड को अड्जस्ट किया. लंड का सूपड़ा सॅट्ट से चूत में दाखिल हुआ और शारदा बाबूजी के मूह में चिहुनकि.

बाबूजी ने गांद हिलाई और अपने हाथों से शारदा की गांद मसल्ते हुए उसे अपना डंडा पूरी तरीके से अंदर घुसेड दिया. पराए मर्द से चुद्ने की अभिलाषा रखने वाली शारदा की मनोकामना पूरी हो गई. बाबूजी के 7 इंच ने उसे निहाल कर दिया और वो चुंबन छोड़ के उनसे पूरी तरह लिपट गई. बाबूजी के कान और गर्दन को चूमते हुए उसने आहें भरनी शुरू की और बाबूजी के लंड पे 2 - 3 बार उच्छली. लंड अब पूरी तरह सेट हो चुका था. झांतों के बीच से चूत की फांके नज़र आ रही थी. झाँते भी चूत रस से भीग रही थी. कम्मो की नज़र अब शारदा के चॉकलॅटी गांद के छेद पे थी. बाबूजी अब उसे गांद से पकड़ के अपने लंड की सवारी करवा रहे थे. गांद का छेद बार बार खुल रहा था. कम्मो ने निशाना लगाया और उसपे 2 बार थूका. फिर कम्मो ने वो किया जो वो हरिया काका के साथ करती थी. अपनी 2 उंगलिओ को चाट के उसने थूक से सने छेद को टटोलना शुरू कर दिया. देखते ही देखते करीब 1 इंच दोनो उंगलियाँ गांद में घुसा दी. कम्मो उंगलियाँ फँसाए हुए ही खड़ी हो गई और शारदा की पीठ से चिपक गई. नज़ारा देखते ही बनता था. कम्मो और बाबूजी के बीच में फाँसी शारदा अब सिर को छत की तरफ किए बड़बड़ाए जा रही थी.

''ऊऊओह मदर्चोद.....क्या कर रही है रंडी...मेरी गांद में उंगली मत डाल ...बाबू के लंड का मज़ा लेने दे...साली छिनाल तेरा बाबू तो मस्त घोड़ा है री..तेरे जीजाजी से कहीं बड़ा है इसका...मज़ा आ गया री...थॅंक यू..ऊओ बाबू.....मेरे चूचे कस के चूस दे....ख़ाआ जा ना मुझे...आज रात यहीं शादी मनाते है और तू मेरा नया दूल्हा.....जम के चोदिओ मेरी फुददी...अहाआ....मज़ा गया री...क्या लोडा है...गरम सरीखा....बाबू मेरी बच्चे दानी में अभी भी जान है और बच्चे जनने की ...मा बना दे मुझे एक बार फिर से .......ऊओह ...'''

''देखा री छिनाल जब शादी में कह रही थी कि चल मेरे साथ तो मना कर रही थी..देखा ना मेरी बात मान के कितना सुख मिला तुझे और ये मुन्नी साली इसकी तो लॉटरी लग गई...बाबूजी ये अब इसी शहर में आ गई है और इसे नौकरी चाहिए....मैने इससे कहा था कि दिलवा दूँगी ...और देखो मैने इसे आपका मूसल ही दिलवा दिया...अब आप इसको नौकरी भी दे देना....सेवा में कोई कमी नही रखेगी..जितनी दुबली पतली है उतनी ही बड़ी चुदास है ये...'' कम्मो तेज़ी से शारदा की गांद में उंगली करते हुए बोली. दूसरे हाथ से वो उसके चूतर को सपोर्ट दे रही थी.

बाबूजी खड़े खड़े थोड़े थक रहे थे सो पिछे खिसकते हुए वो अपनी ईज़ी चेर पे बैठ गए. गांद को ईज़ी चेर के किनारे पे अड्जस्ट करते हुए उन्होने पोज़िशन ली और शारदा ने पैर ज़मीन पे टिकाते हुए उनके लंड पे कूदना शुरू किया. कम्मो ने गांद से उंगली निकाली और उसपे थूका और फिर एक  साइड में आधी झुकी अवस्था में खड़े खड़े गंद को चोद्ने लगी. कम्मो के मोटे मम्मे शारदा के मूह के पास झूल रहे थे और शारदा ने रंडीपना दिखाते हुए उन्हे चूसना शुरू कर दिया. बाबूजी को ये देख के मिन्नी और राखी की याद आ गई. वो दोनो भी अपने बड़े बड़े मम्मे एक दूसरे से ऐसी ही चुस्वाति थी.

मुन्नी अब बिस्तर पे रुक नही पा रही थी और अपना दुबला पतला शरीर लिए बाबूजी के बगल में जाके खड़ी हो गई. बाबूजी ने सिर घुमाया और उसकी चूत चाटना शुरू किया. मुन्नी ने अपनी एक टाँग कुर्सी की बाजू पे रख दी और चूत के पटल खोल दिए. बाबूजी की निपुण जीभ अब उसकी खुली चूत में नाचने लगी. अपना हाथ बढ़ा के उन्होने अपनी जुड़ी हुई उंगली को शारदा से चुस्वाया और उसपे थूक लगवाया और फिर हाथ घुमाते हुए मुन्नी की गांद में घुसेड दी. गांद का छेद सूखा था सो कम्मो ने एक बार फिर से वही किया जो उसने शारदा के साथ किया था. 2 बार थूक के गांद गीली की और बाबूजी ने चूत में मूह लगाए लगाए कम्मो को धन्यवाद दिया.

सीन देखते ही बनता था. 4 नंगे बदन चुदाई के समारोह में खुल के हिस्सा ले रहे थे. छेद भरे हुए थे और मूह से सिसकारियाँ और थूक की लारे निकल रही थी. बाबूजी का कड़क हथियार अब किसी भी समय फूट सकता था. कम्मो की उंगली और बाबूजी के लंड का घर्षण शारदा को पूरी तरह से तैयार कर चुके थे. 2 मीं की और कुदम कुदाइ के बाद शारदा से रहा नही गया और वो ज़ोर से चीखते हुए झरने लगी. उसने बाबूजी के लंड पे कूदना बंद कर दिया और अपने दोनो मम्मे पकड़ के एक पोज़िशन में बैठ गई. उसकी गांद में चलती हुई उंगलिओ की हरकत बंद नही हुई और कम्मो ने उसके मम्मे बुरी तरह से दबाने शुरू कर दिए. शारदा की कंपन भी ज़बरदस्त थी. उसकी आँखें फटी की फटी रह गई थी. सपने में भी उसने नही सोचा था कि उसको कभी ऐसे लंड का सुख मिलेगा. 10 साल की शादी शुदा ज़िंदगी में ये उसका पहल इतना ज़बरदस्त ऑर्गॅज़म था. पूरे 2 मीं तक वो झरती रही. झाँटे पूरी भीग गई. कम्मो ने उसकी गांद से उंगली निकाली और उसके पिछे खड़े होके उसे अपनी बाहों का सहारा दिया. बाबूजी का लंड अभी भी झाड़ा नही था और 2 औरतें संतुष्ट हो चुकी थी. पर कम्मो के दिमाग़ में कुच्छ और ही चल रहा था.

उसने शारदा को बाबूजी से अलग किया और शारदा वही कार्पेट पे लूड़क गई. अब बारी कम्मो की थी. बाबूजी की तरफ पीठ करते हुए वो बड़े स्टाइल से उनके लंड पे बैठी और धीरे धीरे चूत में खिसका लिया. बाबूजी का लोडा एक बार फिर अपनी जानी पहचानी जगह पे था. शारदा कार्पेट पे लेटे हुए हाँफ रही थी. बाबूजी के टट्टों में होती हुई उथल पुथल देख रही थी. कम्मो की चूत टट्टों तक सेट हुई पड़ी थी. कम्मो ने बाबूजी पे लेटते हुए उनको पिछे मूड के किस करना शुरू कर दिया. बाबूजी के मूह से मुन्नी का रस चाटना उसे अच्छा लगा. मुन्नी की बुर भी ज़ियादा दूर नही थी सो उसने मुन्नी की बुर को अड्जस्ट करते हुए चाटना शुरू किया. बाबूजी ने अब अपना ध्यान मुन्नी से हटा के कम्मो को चूत पे किया और अपनी गांद को नीचे से हिलाते हुए उसकी चुदाई शुरू की.

मुन्नी की चूत एक बार फिर झरने को तैयार थी. कम्मो की जीभ के साथ उसकी गांद में बाबूजी की उंगली अभी भी धँसी हुई थी. उसके संतरे उसके हाथों में सजे हुए थे. अचानक से मुन्नी ने दोनो हाथों से कम्मो का सिर दबोच लिया और अपनी चूत को उसकी नाक और होंठो पे घिसने लगी. 8 - 10 घस्सो में ही उसकी चूत ने फिर से फुहार छोड़ी और कम्मो का मूह भर गया. काँपते हुए मुन्नी एक बार फिर से कार्पेट पे लेट गई. उससे 2 फिट की दूरी पे पड़ी शारदा ने उसके संतरे अपने मूह में भर लए और निचोड़ निचोड़ के चूसने लगी. मुन्नी का ऑर्गॅज़म पहले जैसे ही हुआ और जब तक वो शांत हुई तब तक बाबूजी और कम्मो तैयार हो चुके थे.

'' बाबूजी जल्दी छोड़ो चूत में अपना रस ...मैं भी बस तैयार हूँ ..दोनो साथ में आएँगे...ऊओ बाबूजी ..हाआँ बस ऐसे ही ...हां ऐसे ही बस - 5 ठोकर और मारो बाबूजी...एस्स...1 2 3 4 5 ...ऊओ मा..........हान्ंणणन्....बाबूजीइीइ.............'' कम्मो अपने चूचे दबाते हुए झरने लगी. बाबूजी ने भी झटके मारते हुए अपना वीर्य पात करना शुरू कर दिया. अब तक शांत हो चुकी मुन्नी और शारदा नीचे पड़े पड़े उनका साथ साथ झरना देखते रहे. बाबूजी जिस प्यार से कम्मो को चूम रहे थे ऐसा लग रहा था कि दोनो का जनम जनम का चुदाई का रिश्ता हो.

दोनो का झरना ख़तम होते ही बाबूजी ने अपने लंड को हल्के झटके देते हुए बाहर निकाला. लंड अब करीब 5 इंच का हो चुका था और चूतरस और वीर्य मिश्रण से सना हुआ था. शारदा से रुका नही गया और उसने आगे बढ़ के पीठ के बल लेटते हुए निच्चे से लंड को मूह में भर लिया. उसको देखते हुए मुन्नी भी उसके उपर लेट के बाबूजी के लंड के आस पास के हिस्से को चाटने लगी. इतने में कम्मो की चूत से रस बाहर आने लगा और मुन्नी ने बिना किसी झिझक के उसे चाटना शुरू किया. बाबूजी का लंड और टटटे अच्छे से सॉफ कर लेने के बाद शारदा खड़ी हुई और मुन्नी को अपने साथ लेके बाबूजी के साइड में खड़ी हो गई. कम्मो का चहरा मोड़ते हुए शारदा ने अपनी जीभ बाहर निकाली और बाबूजी की बाहर निकली हुई जीभ से मिला दी. दूसरी तरफ से मुन्नी की जीभ और मूडी हुई कम्मो की जीभ भी उनसे जा मिली. इस तरीके से बाबूजी को पहली बार अपनी बहुओं के सिवाए एक साथ 3 औरतों की जीभ चाटने का सुखद एहसास हुआ.

हफ्ते भर के बिज़ी शेड्यूल के बाद शनिवार की शाम आई. पूरे हफ्ते काम काम और सिर्फ़ काम ही चलता रहा. 3नो भाई बिज़्नेस में विलीन थे और बाबूजी भी उनके साथ लगे रहे. घर पे 3नो बहुएँ अपनी सेहत का ध्यान रखते हुए जितना भी कर सकती थी कर लेती थी. सरला ने घर की बागडोर पूरी तरह ले ली थी. कम्मो के कहने पे मुन्नी को भी काम मिल गया. बाबूजी ने दोनो को सख़्त हिदायत दी कि किसी भी तरीके की छेड़ छाड़ उन्हे नही करनी है. जो भी होगा बाबूजी मौका देख के खुद ही करेंगे. बीच में घर पे कंचन बुआ और फूफा जी भी आए. सबको फूफा जी और सखी की मा सरला के संबंधों और बाबूजी के साथ हुए कांड का पता था पर किसी ने भी उसे दर्शाया नही. फूफा जी की नज़र रह रह के सरला के मस्त चुतडो और कम्मो की गदराई जवानी को निहारती रही. सरला उनकी नज़रों से उत्तेजित हो रही थी पर कुच्छ हो नही सकता था.

खैर शनिवार की शाम को बाबूजी अपना ड्रिंक लेके बैठ गए. 3नो भाई और बहुएँ भी वहीं अपने ड्रिंक्स लेके बैठे. सरला को सिर दर्द था सो वो जल्दी खाना और दवाई खा के अपने कमरे में सोने चली गई. कम्मो और मुन्नी को अब से सनडे को भी आना था. बाबूजी के मन में कुच्छ प्लान चल रहे थे. पर अभी तक उन्होने किसी से कोई बात नही की थी. कुच्छ देर के बाद खाने का समय हुआ तो बाबूजी ने 3नो बहुओं को खाना खा के सोने जाने के लए कहा. उन्होने 3नो भाईओं से बिज़्नेस के बारे में कुच्छ बातें करनी थी. 3नो बहुओं को थोड़ा अजीब लगा क्योंकि ज़ियादातर शनिवार और इतवार को बिज़्नेस की बातें नही होती थी और अगर होती भी थी तो उन लोगों के सामने. पर आज कुच्छ अलग था और उनमे से किसी की हिम्मत नही हुई की बाबूजी से कुच्छ पुच्छें. वैसे भी 3नो काफ़ी थॅकी हुई थी सो खाना खा के अपने अपने कमरे में सोने चली गई.

ड्रिंक्स के दौर चलते रहे और फिर करीब रात के 11 बजे सब खाना खाने बैठे. खाने के बाद बाबूजी ने एक ड्रिंक और बनाया और सबको पास बुला लिया. 3नो भाई ध्यान से उनकी ओर देखने लगे.

''मेरे बच्चों आज मुझे तुम लोगोंको अपना एक फ़ैसला सुनाना है. अगर तुम लोगों को लगे कि फ़ैसला ग़लत है तो बता देना. अब जब तुम लोग पेरेंट्स बनने वाले हो और इस घर का श्राप भी ख़तम होने वाला है तो मैने एक फ़ैसला लिया है. अगले 3 साल में बहुओं की 1 और प्रेग्नेन्सी के बाद तुम 3नो अलग अलग रहना शुरू कर दोगे. हमारा घर काफ़ी बड़ा है पर इतने बच्चों के साथ एक साथ रहना मुश्किल होगा. सो मैने सोचा है कि अपने घर की ज़मीन पे तुम लोगों के लिए 2 घर और बनवाउन्गा. मैं राजू और उसका परिवार इसी घर में रहेंगे. तुम दोनो के लिए इसी कॉंपाउंड में 2 घर बनेंगे. जब तक कि तुम्हारे बच्चे बड़े नही हो जाते तब तक सिर्फ़ एक किचन से ही खाना होगा. बाकी कामो के लए घर अलग रहेंगे. इसी तरह से बिज़्नेस में भी अब मैं 3नो को अलग अलग लाइन्स दूँगा. और ये सब तैयारी नेक्स्ट वीक से शुरू हो जाएगी. 3 साल के बाद मैं सब कामो से रिटाइयर्मेंट लेके आराम की ज़िंदगी जीऊँगा.'' बाबूजी ने ड्रिंक की चुस्कियाँ लेते हुए कहा.
क्रमशः.............................................


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