Saturday, January 11, 2014

बदनाम रिश्ते- मेरी बड़ी बहिन राखी-3

FUN-MAZA-MASTI

बदनाम रिश्ते-
मेरी बड़ी बहिन राखी-3


मैने कहा,
"क्या गलती हो गई मेरे से, राखी ?"

"सबसे बडी गलती तो ये है कि, तु खाली घुर-घुर के देखता है बस, करता-धरता तो कुछ है नही। खाली घुर-घुर के कितने दिन देखता रहेगा ?'

"क्या करुं राखी ? मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा।'

"साले, बेवकूफ की औलाद, अरे करने के लिये इतना कुछ है, और तुझे समझ में ही नही आ रहा है।"

"क्या राखी, बताओ ना ?"

"देख, अभी जैसे कि तेरा मन कर रहा है की, तु मेरे अनारो से खेले, उन्हे दबाये, मगर तु वो काम ना करके केवल मुझे घुरे जा रहा है। बोल तेरा मन कर रहा है, की नही, बोलना ?"

"हाये राखी, मन तो मेरा बहुत कर रहा है।'

"तो फिर दबा ना। मैं जैसे तेरे औजार से खेल रही हुं, वैसे ही तु मेरे सामान से खेल। दबा,  दबा।"

बस फिर क्या था मेरी तो बांछे खिल गई। मैने दोनो हथेलियों में दोनो चुंचो को थाम लिया, और हल्के-हल्के उन्हे दबाने लगा।, राखी बोली,
"शाबाश,,,!!!! ऐसे ही दबा ले। जीतना दबाने का मन करे उतना दबा ले, कर ले मजे।" फिर मैं पुरे जोश के साथ, हल्के हाथों से उसकी चुचियों को दबाने लगा। ऐसी मस्त-मस्त चुचियां पहली बार किसी ऐसे के हाथ लग जाये, जीसने पहले किसी चुंची को दबाना तो दूर, छुआ तक ना हो तो बंदा तो जन्नत में पहुंच ही जायेगा ना। मेरा भी वही हाल था, मैने हल्के हाथों से संभल-संभल के चुचियों को दबाये जा रहा था। उधर राखी के हाथ तेजी से मेरे लंड पर चल रहे थे। तभी राखी ने, जो अब तक काफी उत्तेजित हो चुकी थी, मेरे चेहरे की ओर देखते हुए कहा,
"क्यों, मजा आ रहा है ना। जोर से दबा मेरी चुचियों को भाई, तभी पुरा मजा मिलेगा। मसलता जा,,,,देख अभी तेरा माल मैं कैसे निकालती हुं।"

मैने जोर से चुचियों को दबाना शुरु कर दिया था, मेरा मन कर रहा था की मैं राखी का ब्लाउस खोल के चुचियों को नंगा करके उनको देखते हुए दबाउं। इसलिये मैने राखी से पुछा,
"हाये राखी, तेरा ब्लाउस खोल दुं ?"

इस पर वो मुस्कुराते हुए बोली,
"नही, अभी रहने दे। मैं जानती हुं की तेरा बहुत मन कर रहा होगा की तु मेरी नंगी चुचियों को देखे। मगर, अभी रहने दे।"

मैं बोला,
"ठीक है राखी, पर मुझे लग रहा है की मेरे औजार से खुछ निकलने वाला है।"

इस पर राखी बोली,
"कोई बात नही भाई निकलने दे, तुझे मजा आ रहा है ना ?"

"हां राखी, मजा तो बहुत आ रहा है।"

"अभी क्या मजा आया है भाई,,,? अभी तो और आयेगा, अभी तेरा माल निकाल ले फिर देख, मैं तुझे कैसे जन्नत की सैर कराती हुं,,,!!"

"हाये राखी , ऐसा लगता है, जैसे मेरे में से कुछ निकलने वाला है।"

"हाय, निकल जायेगा।"

"तो निकलने दे, निकल जाने दे अपने माल को।",
कह कर राखी  ने अपना हाथ और ज्यादा तेजी के साथ चलाना शुरु कर दिया। मेरा पानी अब बस निकलने वाला ही था। मैने भी अपना हाथ अब तेजी के साथ राखी  के अनारो पर चलाना शुरु कर दिया था। मेरा दिल कर रह था उन प्यारी-प्यारी चुचियों को अपने मुंह में भर के चुसुं। लेकिन वो अभी संभव नही था। मुझे केवल चुचियों को दबा-दबा के ही संतोष करना था। ऐसा लग रहा था, जैसे कि मैं अभी सातवें आसमान पर उड रहा था। मैं भी खूब जोर-जोर सिसयाते हुए बोलने लगा,
"ओह राखी , हां राखी , और जोर से मसलो, और जोर से मुठ मारो, निकाल दो मेरा सारा पानी।"

पर तभी मुझे ऐसा लगा, जैसे कि राखी  ने लंड पर अपनी पकड ढीली कर दी है। लंड को छोड कर, मेरे अंडो को अपने हाथ से पकड के सहलाते हुए राखी  बोली,
"अब तुझे एक नया मजा चखाती हुं, ठहर जा।"

और फिर धीरे-धीरे मेरे लंड पर झुकने लगी। लंड को एक हाथ से पकडे हुए, वो पुरी तरह से मेरे लंड पर झुक गई, और अपने होंठो को खोल कर, मेरे लंड को अपने मुंह में भर लिया। मेरे मुंह से एक आह निकल गई। मुझे विश्वास नही हो रहा था की वो ये क्या कर रही है। मैं बोला,
"ओह राखी , ये क्या कर रही हो ? हाय छोडना, बहुत गुद-गुदी हो रही है।"

मगर वो बोली,
"तो फिर मजे ले इस गुद-गुदी के। करने दे, तुझे अच्छा लगेगा।"

"हाये राखी , क्या इसको मुंह में भी लिया जाता,,,,,,,,?"

"हां, मुंह में भी लिया जाता है, और दुसरी जगहो पर भी। अभी तु मुंह में डालने का मजा लुट।",
कह कर तेजी के साथ मेरे लंड को चुसने लगी। री तो कुछ समझ में नही आ रहा था। गुद-गुदी और सनसनी के कारण मैं मजे के सातवें आसमान पर झुल रहा था। राखी ने पहले मेरे लंड के सुपाडे को अपने मुंह में भरा और धीरे-धीरे चुसने लगी, और मेरी ओर बडे सेक्षी अंदाज में अपनी नजरों को उठा के बोली,
"कैसा लाल-लाल सुपाडा है रे, तेरा ?! एकदम पहाडी आलु के जैसा। लगता है अभी फट जायेगा। इतना लाल-लाल सुपाडा कुंवारे लडको का ही होता है।"

फिर वो और कस-कस के मेरे सुपाडे को अपने होंठो में भर-भर के चुसने लगी। नदी के किनारे, पेड की छांव में, मुझे ऐसा मजा मिल रहा था, जीसकी मैने आज-तक कल्पना तक नही की थी। राखी , अब मेरे आधे-से अधिक लौडे को अपने मुंह में भर चुकी थी, और अपने होंठो को कस के मेरे लंड के चारो तरफ से दबाये हुए, धीरे-धीरे उपर सुपाडे तक लाती थी। फिर उसी तरह से सरकते हुए नीचे की तरफ ले जाती थी। उसको शायद इस बात का अच्छी तरह से एहसास था की, ये मेरा किसी औरत के साथ पहला संबंध है, और मैने आज तक किसी औरत के हाथो का स्पर्श अपने लंड पर नही महसुस किया है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, वो मेरे लंड को बीच-बीच में ढीला भी छोड देती थी, और मेरे अंडो को दबाने लगती थी। वो इस बात का पुरा ध्यान रखे हुए थी की, मैं जल्दी ना झडुं। मुझे भी गजब का मजा आ रहा था, और ऐसा लग रहा था, जैसे कि मेरा लंड फट जायेगा। मगर मुझसे अब रहा नही जा रहा था। मैने राखी  से कहा,
"हाये राखी अब निकल जायेगा। राखी , मेरा माल अब लगता है, नही रुकेगा।"

उसने मेरी बातों की ओर कोई ध्यान नही दिया, और अपनी चुसाई जारी रखी। मैने कहा,
"राखी तेरे मुंह में ही निकल जायेगा। जल्दी से अपना मुंह हटा लो।"

इस पर राखी  ने अपना मुंह थोडी देर के लिये हटाते हुए कहा की,
"कोई बात नही, मेरे मुंह में ही निकाल। मैं देखना चाहती हुं की कुंवारे लडके के पानी का स्वाद कैसा होता है।"

और फिर अपने मुंह में मेरे लंड को कस के जकडते हुए, उसने अब अपना पुरा ध्यान केवल, मेरे सुपाडे पर लगा दिया, और मेरे सुपाडे को कस-कस के चुसने लगी, उसकी जीभ मेरे सुपाडे के कटाव पर बार-बार फिरा रही थी। मैं सिसयाते हुए बोलने लगा,
"ओह राखी , पी जाओ तो फिर। चख लो मेरे लंड का सारा पानी। ले लो अपने मुंह में। ओह, ले लो, कितना मजा आ रहा है। हाय, मुझे नही पता था की इतना मजा आता है। हाये निकल गया,,,,, निकल गया, हाये राखी निकलाआआ,,,,,,!!!"तभी मेरे लंड का फौवारा छुट पडा, और तेजी के साथ भलभला कर मेरे लंड से पानी गीरने लगा। मेरे लंड का सारा का सारा पानी, सीधे राखी  के मुंह में गीरता जा रहा था। और वो मजे से मेरे लंड को चुसे जा रही थी। कुछ देर तक लगातार वो मेरे लंड को चुसती रही। मेरा लौडा अब पुरी तरह से उसके थुक से भीग कर गीला हो गया था, और धीरे-धीरे सीकुड रहा था। पर उसने अब भी मेरे लंड को अपने मुंह से नही निकाला था और धीरे-धीरे मेरे सीकुडे हुए लंड को अपने मुंह में किसी चोकलेट की तरह घुमा रही थी। कुछ देर तक ऐसा ही करने के बाद, जब मेरी सांसे भी कुछ शांत हो गई, तब राखी  ने अपना चेहरा मेरे लंड पर से उठा लिया और अपने मुंह में जमा, मेरे विर्य को अपना मुंह खोल कर दिखाया और हल्के से हस दी। फिर उसने मेरे सारे पानी को गटक लिया और अपनी साडी के पल्लु से अपने होंठो को पोंछती हुई बोली,
"हाये, मजा आ गया। सच में कुंवारे लंड का पानी बडा मिठा होता है। मुझे नही पता था की, तेरा पानी इतना मजेदार होगा ?!!"

फिर मेरे से पुछा,
"मजा आया की नही ?"

मैं क्या जवाब देता। जोश ठंडा हो जाने के बाद, मैने अपने सिर को नीचे झुका लिया था, पर गुद-गुदी और सनसनी तो अब भी कायम थी। तभी राखी  ने मेरे लटके हुए लौडे को अपने हाथों में पकडा और धीरे से अपनी साडी के पल्लु से पोंछते हुए पुछा,
"बोलना, मजा आया की नहि ?" मैने शरमाते हुए जवाब दिया,
"हाय राखी , बहुत मजा आया। इतना मजा कभी नही आया था।"

तब राखी  ने पुछा,
"क्यों, अपने हाथ से भी करता था, क्या ?"

"कभी कभी मांराखी , पर उतना मजा नही आता था जीतना आज आया है।"
"औरत के हाथ से करवाने पर तो ज्यादा मजा अयेगा ही, पर इस बात का ध्यान रखियो की, किसी को पता ना चले।"

"हां राखी , किसी को पता नही चलगा।"

"हां, मैं वही कह रही हुं की, किसी को अगर पता चलेगा तो लोग क्या, क्या सोचेन्गे और हमारी-तुम्हारी बदनामी हो जायेगी। क्योंकि हमारे समाज में एक बहिन   और  भाई के बीच इस तरह का संबंध उचित नही माना जाता है, समझा ?"

मैने भी अब अपनी शर्म के बंधन को छोड कर जवाब दिया,
"हां बहिन , मैं समझता हुं। हम दोनो ने जो कुछ भी किया है, उसका मैं किसी को पता नही चलने दुन्गा।"

तब बहिन  उठ कर खडी हो गई। अपनी साडी के पल्लु को और मेरे द्वारा मसले गये ब्लाउस को ठीक किया और मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए, अपनी बुर को अपनी साडी से हल्के-से दबाया और साडी को चुत के उपर ऐसे रगडा जैसे की पानी पोंछ रही हो। मैं उसकी इस क्रिया को बडे गौर से देख रहा था। मेरे ध्यान से देखने पर वो हसते हुए बोली,
"मैं जरा पेशाब कर के आती हुं। तुझे भी अगर करना है तो चल, अब तो कोई शरम नही है।"

मैने हल्के-से शरमाते हुए, मुस्कुरा दिया तो बोली,
"क्यों, अब भी शरमा रहा है, क्या ?"मैने इस पर कुछ नही कहा, और चुप-चाप उठ कर खडा हो गया। वो आगे चल दी और मैं उसके पिछे-पिछे चल दिया। झाडियों तक की दस कदम की ये दुरी, मैने बहिन  के पिछे-पिछे चलते हुए उसके गोल-मटोल गदराये हुए चुतडों पर नजरे गडाये हुए तय की। उसके चलने का अंदाज इतना मदहोश कर देने वाला था। आज मेरे देखने का अंदाज भी बदला हुआ था। शायद इसलिये मुझे उसके चलने का अंदाज गजब का लग रहा था। चलते वक्त उसके दोनो चुतड बडे नशिले अंदाज में हिल रहे थे, और उसकी साडी उसके दोनो चुतडों के बीच में फंस गई थी, जिसको उसने अपने हाथ पिछे ले जा कर निकाला। जब हम झाडियों के पास पहुंच गये तो बहिन  ने एक बार पिछे मुड कर मेरी ओर देखा और मुस्कुराई। फिर झाडियों के पिछे पहुंच कर बिना कुछ बोले, अपनी साडी उठा के पेशाब करने बैठ गई। उसकी दोनो गोरी-गोरी जांघे उपर तक नंगी हो चुकी थी, और उसने शायद अपनी साडी को थोडा जान-बुझ कर पिछे से उपर उठा दिया था। जीस के कारण, उसके दोनो चुतड भी नुमाया हो रहे थे। ये सीन देख कर मेरा लंड फिर से फुफकारने लगा। उसके गोरे-गोरे चुतड बडे कमाल के लग रहे थे। बहिन  ने अपने चुतडों को थोडा-सा उंचकाया हुआ था, जीस के कारण उसकी गांड की खाई भी दिख रही थी। हल्के-भुरे रंग की गांड की खाई देख कर दिल तो यही कर रहा था की पास जा के उस गांड की खाई में धीरे-धीरे उन्गली चलाउं और गांड के भुरे रंग के छेद को अपनी उन्गली से छेडु और देखु की कैसे पक-पकाता है। तभी बहिन  पेशाब कर के उठ खडी हुई और मेरी तरफ घुम गई। उसने अभी तक साडी को अपनी झांघो तक उठा रखा था। मेरी ओर देख कर मुस्कुराते हुए, उसने अपनी साडी को छोड दिया और नीचे गीरने दिया। फिर एक हाथ को अपनी चुत पर साडी के उपर से ले जा के रगडने लगी, जैसे कि पेशाब पोंछ रही हो, और बोली,
"चल, तु भी पेशाब कर ले, खडा-खडा मुंह क्या ताक रहा है ?"

मैं जो की अभी तक इस सुंदर नजारे में खोया हुआ था, थोडा-सा चौंक गया।फिर हकलाते हुए बोला,
"हां, हां, अभी करता हुं,,,,,, मैने सोचा पहले तुम कर लो इसलिये रुका था।" फिर मैने अपने पजामे के नाडे को खोला, और सीधे खडे-खडे ही मुतने की कोशिश करने लगा। मेरा लंड तो फिर से खडा हो चुका था, और खडे लंड से पेशाब ही नही निकल रहा था। मैने अपनी गांड तक का जोर लगा दिया, पेशाब करने के चक्कर में।बहिन  वहीं बगल में खडी हो कर मुझे देखे जा रही थी। मेरे खडे लंड को देख कर, वो हसते हुए बोली,
"चल जल्दी से कर ले पेशाब, देर हो रही है। घर भी जाना है।"

मैं क्या बोलता। पेशाब तो निकल नही रहा था। तभी बहिन ने आगे बढ कर मेरे लंड को अपने हाथों में पकड लिया और बोली,
"फिर से खडा कर लिया, अब पेशाब कैसे उतरेगा ?",
कह कर लंड को हल्के-हल्के सहलाने लगी।

अब तो लंड और टाईट हो गया, पर मेरे जोर लगाने पर पेशाब की एक-आध बुंद नीचे गीर गई। मैने बहिन  से कहा,
"अरे, तुम छोडोना इसको, तुम्हारे पकडने से तो ये और खडा हो जायेगा। हाये छोडो,,,,!"

और बहिन   का हाथ अपने लंड पर से झटकने की कोशिश करने लगा। इस पर राखी  ने हसते हुए कहा,
"मैं तो छोड देती हुं, पर पहले ये तो बता कि खडा क्यों किया था ? अभी दो मिनट पहले ही तो तेरा पानी निकाला था मैने, और तुने फिर से खडा कर लिया। कमाल का लडका है, तु तो।"

मैं खुछ नही बोला अब लंड थोडा ढीला पड गया था, और मैने पेशाब कर लिया। मुतने के बाद जल्दी से पजामे के नाडे को बांध कर, मैं राखी के साथ झाडियों के पिछे से निकल आया। राखी के चेहरे पर अब भी मंद-मंद मुस्कान आ रही थी। मैं जल्दी-जल्दी चलते हुए आगे बढा और कपडे के गठर को उठा कर, अपने माथे पर रख लिया। राखी ने भी एक गठर को उठा लिया और अब हम दोनो   भाई- बहिन  जल्दी-जल्दी गांव के पगदंडी वाले रास्ते पर चलने लगे। गरमी के दिन थे, अभी भी सुरज चमक रहा था। थोडी दूर चलने के बाद ही मेरे माथे से पसिना छलकने लगा। मैं जान-बुझ कर राखी के पिछे-पिछे चल रह था, ताकि राखी के मटकते हुए चुतडों का आनंद लुट सकुं, और मटकते हुए चुतडों के पिछे चलने का एक अपना ही आनंद है। आप सोचते रहते हो कि, ये, कैसे दिखते होंगे, ये चुतड बिना कपडों के, या फिर आपका दिल करता है कि, आप चुपके से पिछे से जाओ और उन चुतडों को अपनी हथेलियों में दबा लो और हल्के मसलो और सहलाओ। फिर हल्के-से उन चुतडों के बीच की खाई, यानीकि गांड के गढ्ढे पर अपना लंड सीधा खडा कर के सटा दो, और हल्के-से रगडते हुए प्यारी-सी गरदन पर चुम्मियां लो। ये सोच आपको इतना उत्तेजित कर देती है, जितना शायद अगर आपको सही में चुतड मिले भी अगर मसलने और सहलाने को तो शायद उतना उत्तेजित ना कर पये। चलो बहुत बकवास हो गई। आगे की कहानी लिखते है। तो मैं अपना लंड पजामे में खडा किये हुए, अपनी लालची नजरों को राखी के चुतडों पर टिकाये हुए चल रह था। राखी ने मुठ मार कर मेरा पानी तो निकाल ही दिया था, इस कारण अब उतनी बेचैनी नही थी, बल्कि एक मिठी-मिठी-सी कसक उठ रही थी, और दिमाग बस एक ही जगह पर अटका पडा था। तभी राखी पिछे मुड कर देखते हुए बोली,
"क्यों रे, पिछे-पिछे क्यों चल रहा है ? हर रोज तो तु घोडे की तरह आगे-आगे भगता फिरता रहता था ?"

मैने शरमिन्दगी में अपने सिर को नीचे झुका लिया, हालांकि अब शर्म आने जैसी कोई बात तो थी नही। सब-कुछ खुल्लम-खुल्ला हो चुका था, मगर फिर भी मेरे दिल में अब भी थोडी बहुत हिचक तो बाकी थी ही। राखी ने फिर कुरेदते हुए पुछा,
"क्यों, क्या बात है, थक गया है क्या ?"

मैने कहा,
"नही राखी, ऐसी कोई बात तो है नही। बस ऐसे ही पिछे चल रह हुं।"

तभी राखी ने अपनी चाल धीमी कर दी, और अब वो मेरे साथ-साथ चल रही थी। मेरी ओर अपनी तिरछी नजरों से देखते हुए बोली,
"मैं भी अब तेरे को थोडा बहुत समझ्ने लगी हुं। तु कहां अपनी नजरें गडाये हुए है, ये मेरी समझ में आ रह है। पर अब साथ-साथ चल, मेरे पिछे-पिछे मत चल। क्योंकि गांव नजदीक आ गया है। कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा ?",
कह कर मुस्कुरने लगी।

मैने भी समझदार बच्चे की तरह अपना सिर हिला दिया और साथ-साथ चलने लगा। राखी धीरे-से फुसफुसाते हुए बोलने लगी,
"घर चल, तेरा जीजा  तो आज घर पर है नही। फिर आराम से जो भी देखना है, देखते रहना।"

मैने हल्के-से विरोध किया,
"क्या राखी, मैं कहां कुछ देख रहा था ? तुम तो ऐसे ही बस, तभी से मेरे पिछे पडी हो।"

इस पर राखी बोली,
"लल्लु, मैं पिछे पडी हुं, या तु पिछे पडा है ? इसका फैसला तो घर चल के कर लेना।"

फिर सिर पर रखे कपडों के गठर को एक हाथ उठा कर सीधा किया तो उसकी कांख दिखने लगी। ब्लाउस उसने आधी-बांह का पहन रखा था। गरमी के कारण उसकी कांख में पसिना आ गया था, और पसिने से भीगी उसकी कांखे देखने में बडी मदमस्त लग रही थी। मेरा मन उन कांखो को चुम लेने का करने लगा था। एक हाथ को उपर रखने से उसकी साडी भी उसकी चुचियों पर से थोडी-सी हट गई थी और थोडा बहुत उसका गोरा-गोरा पेट भी दिख रहा था। इसलिये चलने की ये स्थिति भी मेरे लिये बहुत अच्छी थी और मैं आराम से वासना में डुबा हुआ अपनी बहिन  के साथ चलने लगा। शाम होते-होते हम अपने घर पहुंच चुके थे। कपडों के गठर को ईस्त्री करने वाले कमरे में रखने के बाद, हमने हाथ-मुंह धोये और फिर बहिन  ने कहा कि  भाई चल कुछ खा-पी ले। भूख तो वैसे मुझे कुछ खास लगी नही थी (दिमाग में जब सेक्ष का भूत सवार हो तो, भूख तो वैसे भी मर जाती है), पर फिर भी मैने अपना सिर सहमती में हिला दिया। राखी ने अब तक अपने कपडों को बदल लिया था, मैने भी अपने पजामे को खोल कर उसकी जगह पर लुंगी पहन ली। क्योंकि गरमी के दिनो में लुंगी ज्यादा आरामदायक होती है। राखी रसोई घर में चली गई, और मैं कोयले कि अंगिठी को जलाने के लिये, ईस्त्री करने वाले कमरे में चला, गया ताकि ईस्त्री का काम भी कर सकु। अंगिठी जला कर मैं रसोई में घुसा तो देख राखी वहीं, एक मोढे पर बैठ कर ताजी रोटियां सेक रही थी। मुझे देखते ही बोली,
"जल्दी से आ, दो रोटी खा ले। फिर रात का खाना भी बना दुन्गी।"

मैं जल्दी से वहीं मोढे (वुडन प्लेन्क) पर बैठ गया। सामने राखी ने थोडी सी सब्जी और दो रोटियां दे दी। मैं चुप-चाप खाने लगा। राखी ने भी अपने लिये थोडी सी सब्जी और रोटी निकाल ली और खाने लगी। रसोई घर में गरमी काफि थी। इस कारण उसके माथे पर पसिने कि बुंदे चुहचुहाने लगी। मैं भी पसिने से नहा गया था। राखी ने मेरे चेहरे की ओर देखते हुए कहा,
"बहुत गरमी है।"

मैने कहा, "हां।"
और अपने पैरों को उठा के, अपनी लुंगी को उठा के, पुरा जांघो के बीच में कर लिया। राखी मेरे इस हरकत पर मुस्कुराने लगी पर बोली कुछ नही। वो चुंकि घुटने मोड कर बैठी थी, इसलिये उसने पेटिकोट को उठा कर, घुटनो तक कर दिया और आराम से खाने लगी। उसकी गोरी पिन्डलियों और घुटनो का नजारा करते हुए, मैं भी खाना खाने लगा। लंड की तो ये हालत थी अभी की, राखी  को देख लेने भर से उसमे सुरसुरी होने लगती थी। यहां राखी मस्ती में दोनो पैर फैला कर घुटनो से थोडा उपर तक साडी उठा कर, दिखा रही थी। मैने राखी से कहा
"एक रोटी और दे।"

"नही, अब और नही। फिर रात में भी खाना तो खाना है, ना। अच्छी सब्जी बना देती हुं, अभी हल्का खा ले।"

"क्या राखी, तुम तो पुरा खाने भी नही देती। अभी खा लुन्गा तो, क्या हो जायेगा ?"

"जब, जिस चीज का टाईम हो, तभी वो करना चाहिए। अभी तु हल्क-फुल्का खा ले, रात में पुरा खाना।"

मैं इस पर बडबडाते हुए बोला,
"सुबह से तो खाली हल्का-फुल्का ही खाये जा रहा हुं। पुरा खाना तो पता नही, कब खाने को मिलेगा ?"

ये बात बोलते हुए मेरी नजरें, उसकी दोनो जांघो के बीच में गडी हुई थी। हम दोनो बहन  भाई को, शायद द्विअर्थी बातें करने में महारत हांसिल हो गई थी। हर बात में दो-दो अर्थ निकल आते थे। राखी भी इसको अच्छी तरह से समझती थी इसलिये मुस्कुराते हुए बोली,
"एकबार में पुरा पेट भर के खा लेगा, तो फिर चला भी न जायेगा। आराम से धीरे-धीरे खा।"

मैं इस पर गहरी सांस लेते हुए बोला,
"हां, अब तो इसी आशा में रात का इन्तेजार करुन्गा कि शायद, तब पेट भर खाने को मिल जाये।"

राखी मेरी तडप का मजा लेते हुए बोली,
"उम्मीद पर तो दुनिया कायम है। जब इतनी देर तक इन्तेजार किया तो, थोडा और कर ले। आराम से खाना, अपने  जीजा की तरह जल्दी क्यों करता है ?"

मैं ने तब तक खाना खतम कर लिया था, और उठ कर लुंगी में हाथ पोंछ कर, रसोई से बाहर निकाल गया। राखी ने भी खाना खतम कर लिया था। मैं ईस्त्री वाले कमरे आ गया, और देखा कि अंगीठी पुरी लाल हो चुकी है। मैं ईस्त्री गरम करने को डाल दी और अपनी लुंगी को मोड कर, घुटनो के उपर तक कर लिया। बनियान भी मैने उतार दी, और ईस्त्री करने के काम में लग गया। हालांकि, मेरा मन अभी भी रसोई-घर में ही अटका पर था, और जी कर रह था मैं  राखी के आस पास ही मंडराता रहुं। मगर, क्या कर सकता था काम तो करना ही था। थोडी देर तक रसोई-घर में खट-पट की आवाजे आती रही। मेरा ध्यान अभी भी रसोई-घर की तरफ ही था। पूरे वातावरण में ऐसा लगता था कि एक अजीब सी खुश्बु समाई हुई है। आंखो के आगे बार-बार, वही राखी की चुचियों को मसलने वाला द्रश्य तैर रहा था। हाथों में अभी भी उसका अहसास बाकि था। हाथ तो मेरे कपडों को ईस्त्री कर रहे थे, परंतु दिमाग में दिनभर की घटनाये घुम रही थी। मेरा मन तो काम करने में नही लग रह था, पर क्या करता। तभी  राखी के कदमो की आहट सुनाई दी। मैने मुड कर देखा तो पाया की,  राखी मेरे पास ही आ रही थी। उसके हाथ में हांसिया (सब्जी काटने के लिये गांव में इस्तेमाल होने वाली चीज) और सब्जी का टोकरा था। मैने  राखी की ओर देखा, वो मेरी ओर देख के मुस्कुराते हुए वहीं पर बैठ गई। फिर उसने पुछा,
"कौन-सी सब्जी खायेगा ?"

मैने कहा,
"जो सब्जी तुम बना दोगी, वही खा लुन्गा।"

इस पर  राखी ने फिर जोर दे के पुछा,
"अरे बता तो, आज सारी चीज तेरी पसंद की बनाती हुं। तेरा  जीजा तो आज है नही, तेरी ही पसंद का तो ख्याल रखना है।"

तब मैने कहा,
"जब जीजा नही है तो, फिर आज केले या बैगन की सब्जी बना ले। हम दोनो वही खा लेन्गे। तुझे भी तो पसंद है, इसकी सब्जी।"

राखी    ने मुस्कुराते हुए कहा,
"चल ठीक है, वही बना देती हुं।"

और वहीं बैठ के सब्जीयां काटने लगी। सब्जी काटने के लिये, जब वो बैठी थी, तब उसने अपना एक पैर मोड कर, जमीन पर रख दिया था और दुसरा पैर मोड कर, अपनी छाती से टीका रखा था। और गरदन झुकाये सब्जीयां काट रही थी। उसके इस तरह से बैठने के कारण उसकी एक चुंची, जो की उसके एक घुटने से दब रही थी, ब्लाउस के बाहर निकलने लगी और उपर से झांखने लगी। गोरी-गोरी चुंची और उस पर की नीली-नीली रेखायें, सब नुमाया हो रहा था । मेरी नजर तो वहीं पर जा के ठहर गई थी। राखी    ने मुझे देखा, हम दोनो की नजरें आपस में मिली, और मैने झेंप कर अपनी नजर नीचे कर ली और ईस्त्री करने लगा। इस पर राखी ने हसते हुए कहा,
"चोरी-चोरी देखने की आदत गई नही। दिन में इतना सब-कुछ हो गया, अब भी,,,,,,,,,,,???" मैने कुछ नही कहा और अपने काम में लगा रह। तभी राखी ने सब्जी काटना बंध कर दिया, और उठ कर खडी हो गई और बोली,
"खाना बना देती हुं, तु तब तक छत पर बिछावन लगा दे। बडी गरमी है आज तो, ईस्त्री छोड कल सुबह उठ के कर लेना।"

मैने ने कहा,
"बस थोडा-सा और करदुं, फिर बाकी तो कल ही करुन्गा।"

मैं ईस्त्री करने में लग गया और, रसोई घर से फिर खट-पट की आवाजें आने लगी। यानी की राखी ने खाना बनाना शुरु कर दिया था। मैने जल्दी-से कुछ कपडों को ईस्त्री की, फिर अंगीठी बुझाई और अपने तौलिये से पसिना पोंछता हुआ बाहर निकाल आया। हेन्डपम्प के ठंडे पानी से अपने मुंह-हाथो को धोने के बाद, मैने बिछावन लिया और छत पर चल गया। और दिन तो तीन लोगो का बिछावन लगता था, पर आज तो दो का ही लगाना था। मैने वहीं जमीन पर पहले चटाई बिछाई, और फिर दो लोगो के लिये बिछावन लगा कर निचे आ गया। राखी, अभी भी रसोई में ही थी। मैं भी रसोई-घर में घुस गया। राखी ने साडी उतार दी थी, और अब वो केवल पेटिकोट और ब्लाउस में ही खाना बना रही थी। उसने अपने कंधे पर एक छोटा-सा तौलिया रख लिया था और उसी से अपने माथे का पसिना पोंछ रही थी। मैं जब वहां पहुंचा, तो राखी सब्जी को कलछी से चला रही थी और दुसरी तरफ रोटियां भी सेक रही थी।
 
मैने कहा,
"कौन-सी सब्जी बना रही हो, केले या बैगन की ?"

राखी ने कहा,
"खुद ही देख ले, कौन-सी है ?"

"खूश्बु तो बडी अच्छी आ रही है। ओह, लगता है दो-दो सब्जी बनी है।"

"खा के बताना, कैसी बनी है ?"

"ठीक है राखी, बता और कुछ तो नही करना ?"
कहते-कहते मैं एकदम राखी के पास आ के बैठ गया था। राखी मोढे पर अपने पैरों को मोड के और अपने पेटिकोट को जांघो के बीच समेट कर बैठी थी। उसके बदन से पसिने की अजीब-सी खूश्बु आ रही थी। मेरा पुरा ध्यान उसकी जांघो पर ही चला गया था। राखी ने मेरी ओर देखते हुए कहा,
"जरा खीरा काट के सलाड भी बना ले।"

"वाह राखी, आज तो लगता है, तु सारी ठंडी चीजे ही खायेगी ?"

"हां, आज सारी गरमी उतार दुन्गी, मैं।"

"ठीक है राखी, जल्दी-से खाना खा के छत पर चलते है, बडी अच्छी हवा चल रही है।"

राखी ने जल्दी-से थाली निकली, सब्जीवाले चुल्हे को बंध कर दिया। अब बस एक-या दो रोटियां ही बची थी, उसने जल्दी-जल्दी हाथ चलाना शुरु कर दिया। मैने भी खीरा और टमाटर काट के सलाड बना लिया। राखी ने रोटी बनाना खतम कर के कहा,
"चल, खाना निकाल देती हुं। बाहर आंगन में मोढे पर बैठ के खायेन्गे। " मैने दोनो परोसी हुई थालीयां उठाई, और आंगन में आ गया । राखी वहीं आंगन में, एक कोने पर अपना हाथ-मुंह धोने लगी। फिर अपने छोटे तौलिये से पोंछते हुए, मेरे सामने रखे मोढे पर आ के बैठ गई। हम दोनो ने खाना सुरु कर दिया। मेरी नजरें राखी को उपर से नीचे तक घुर रही थी।राखी ने फिर से अपने पेटिकोट को अपने घुटनो के बीच में समेट लिया था और इस बार शायद पेटिकोट कुछ ज्यादा ही उपर उठा दिया था। चुचियां, एकदम मेरे सामने तन के खडी-खडी दिख रही थी। बिना ब्रा के भी राखी की चुचियां ऐसी तनी रहती थी, जैसे की दोनो तरफ दो नारियल लगा दिये गये हो। इतनी उमर बीत जाने के बाद भी थोडा-सा भी ढलकाव नही था। जांघे, बिना किसी रोयें के, एकदम चिकनी, गोरी और मांसल थी। पेट पर उमर के साथ थोडा-सा मोटापा आ गया था। जिसके कारण पेट में एक-दो फोल्ड पडने लगे थे, जो देखने में और ज्यादा सुंदर लगते थे। आज पेटिकोट भी नाभी के नीचे बांधा गया था। इस कारण से उसकी गहरी गोल नाभी भी नजार आ रही थी। थोडी देर बैठने के बाद ही राखी को पसिना आने लगा, और उसकी गरदन से पसिना लुढक कर उसके ब्लाउस के बीचवाली घाटी में उतरता जा रह था। वहां से, वो पसिना लुढक कर उसके पेट पर भी एक लकीर बना रहा था, और धीरे-धीरे उसकी गहरी नाभी में जमा हो रहा था। मैं इन सब चीजो को बडे गौर से देख रहा था। राखी ने जब मुझे ऐसे घुरते हुए देखा तो हसते हुए बोली,
"चुप-चाप ध्यान लगा के खाना खा, समझा !!!!"

और फिर अपने छोटेवाले तौलिये से अपना पसिना पोंछने लगी। मैं खाना खाने लगा और बोला,
"राखी, सब्जी तो बहुत ही अच्छी बनी है।"

"चल तुझे पसंद आयी, यही बहुत बडी बात है मेरे लिये। नही तो आज-कल के लडको को घर का कुछ भी पसंद ही नही आता।"

"नही राखी ऐसी बात नही है। मुझे तो घर का 'माल' ही पसंद है।"
ये, माल शब्द मैने बडे धीमे स्वर में कहा था कि, कहीं राखी ना सुन ले। राखी को लगा की शायद मैने बोला है, घर की दाल। इसलिये वो बोली,
"मैं जानती हुं, मेरा भाई बहुत समझदार है, और वो घर के दाल-चावल से काम चला सकता है। उसको बाहर के 'मालपुए' (एक प्रकार की खानेवाली चीज, जोकि मैदे और चीनी की सहायता से बनाई जाती है, और फुली हुए पांव की तरह से दिखती है।) से कोई मतलब नही है।"

राखी ने मालपुआ शब्द पर शायद ज्यादा ही जोर दिया था, और मैने इस शब्द को पकड लिया। मैने कहा,
"पर राखी, तुझे मालपुआ बनाये काफि दिन हो गये। कल मालपुआ बना, ना ?"

"मालपुआ तुझे बहुत अच्छा लगता है, मुझे पता है। मगर इधर इतना टाईम कहां मिलता था, जो मालपुआ बना सकु ? पर अब मुझे लगता है, तुझे मालपुआ खिलाना ही पडेगा।"

मैने ने कहा,
"जल्दी खिलाना, राखी।"
और हाथ धोने के लिये उठ गया।

राखी भी हाथ धोने के लिये उठ गई। हाथ-मुंहा धोने के बाद, राखी फिर रसोई में चली गई, और बिखरे पडे सामानो को संभालने लगी। मैने कहा,
"छोडोना राखी, चलो सोने जल्दी से। यहां बहुत गरमी लग रही है।"

"तु जा ना, मैं अभी आती। रसोई-घर गंदा छोडना अच्छी बात नही है।"

मुझे तो जल्दी से राखी के साथ सोने की हडबडी थी कि, कैसे राखी से चिपक के उसके मांसल बदन का रस ले सकु। पर राखी रसोई साफ करने में जुटी हुई थी। मैने भी रसोई का सामान संभालने में उसकी मदद करनी शुरु कर दी। कुछ ही देर में सारा सामान, जब ठीक-ठाक हो गया तो हम दोनो रसोई से बाहर आ गये। राखी ने कहा,
"जा, दरवाजा बंध कर दे।"

मैं दौड कर गया और दरवाजा बंध कर आया। अभी ज्यादा देर तो नही हुई थी, रात के ९:३० ही बजे थे। पर गांव में तो ऐसे भी लोग जल्दी ही सो जाया करते है। हम दोनो  बहिन -भाई   छत पर आके बिछावन पर लेट गये। बिछावन पर राखी भी, मेरे पास ही आ के लेट गई थी। राखी के इतने पास लेटने भर से मेरे शरीर में, एक गुद-गुदी सी दौड गई। उसके बदन से उठनेवाली खूश्बु, मेरी सांसो में भरने लगी, और मैं बेकाबु होने लगा था। मेरा लंड धीरे-धीरे अपना सिर उठाने लगा था। तभी राखी मेरी ओर करवट ले के घुमी और पुछा,
"बहुत थक गये होना ?"

"हां राखी, जिस दिन नदी पर जाना होता है, उस दिन तो थकावट ज्यादा हो ही जाती है।"

"हां, बडी थकावट लग रही है, जैसे पुरा बदन टूट रह हो।"

"मैं दबा दुं, थोडी थकान दूर हो जायेगी।"

"नही रे, रहने दे तु, तु भी तो थक गया होगा।""नही राखी उतना तो नही थका, कि तेरी सेवा ना कर सकु।"

राखी के चेहरे पर एक मुस्कान फैल गई, और वो हसते हुए बोली,
"दिन में इतना कुछ हुआ था, उससे तो तेरी थकान और बढ गई होगी।"

"हाये, दिन में थकान बढने वाला तो कुछ नही हुआ था।"

इस पर राखी थोडा-सा और मेरे पास सरक कर आई। राखी के सरकने पर मैं भी थोडा-सा उसकी ओर सरका। हम दोनो की सांसे, अब आपस में टकराने लगी थी। राखी ने अपने हाथो को हल्के से मेरी कमर पर रखा और धीरे धीरे अपने हाथो से मेरी कमर और जांघो को सहलाने लगी। राखी की इस हरकत पर मेरे दिल की धडकन बढ गई, और लंड अब फुफकारने लगा था। राखी ने हल्के-से मेरी जांघो को दबाया। मैने हिम्मत कर के हल्के-से अपने कांपते हुए हाथो को बढा के राखी की कमर पर रख दिया। राखी कुछ नही बोली, बस हल्का-सा मुस्कुरा भर दी। मेरी हिम्मत बढ गई और मैं अपने हाथो से राखी की नंगी कमर को सहलाने लगा। राखी ने केवल पेटिकोट और ब्लाउस पहन रखा था। उसके ब्लाउस के उपर के दो बटन खुले हुए थे। इतने पास से उसकी चुचियों की गहरी घाटी नजर आ रही थी और मन कर रह था जल्दी से जल्दी उन चुचियों को पकड लुं। पर किसी तरह से अपने आप को रोक रखा था। राखी ने जब मुझे चुचियों को घुरते हुए देखा तो मुस्कुरातेहाये, राखी तुम भी क्या बात कर रही हो, मैं कहां घुर रह था ?"

"चल झुठे, मुझे क्या पता नही चलता ? रात में भी वही करेगा, क्या ?"

"क्या राखी ?"

"वही, जब मैं सो जाउन्गी तो अपना भी मसलेगा, और मेरी छातियों को भी दबायेगा।"

"हाय राखी।"

"तुझे देख के तो यही लग रहा है कि, तु फिर से वही हरकत करने वाला है।"

"नही, राखी।"

मेरे हाथ अब राखी कि जांघो को सहला रहे थे।

"वैसे दिन में मजा आया था ?",
पुछ कर, राखी ने हल्के-से अपने हाथो को मेरी लुन्गी के उपर लंड पर रख दिया। मैने कहा,
"हाये राखी, बहुत अच्छा लगा था।"

"फिर करने का मन कर रह है, क्या ?"

"हाये, राखी।"

इस पर राखी ने अपने हाथो का दबाव जरा-सा, मेरे लंड पर बढा दिया और हल्के हल्के दबाने लगी। राखी के हाथो का स्पर्श पा के, मेरी तो हालत खराब होने लगी थी। ऐसा लगा रह था कि, अभी के अभी पानी निकल जायेगा। तभी राखी बोली,
"जो काम, तु मेरे सोने के बाद करने वाला है, वो काम अभी कर ले। चोरी-चोरी करने से तो अच्छा है कि, तु मेरे सामने ही कर ले।"

मैं कुछ नही बोला और अपने कांपते हाथो को, हल्के-से राखी की चुचियों पर रख दिया। राखी ने अपने हाथो से मेरे हाथो को पकड कर, अपनी छातियों पर कस के दबाया और मेरी लुन्गी को आगे से उठा दिया और अब मेरे लंड को सीधे अपने हाथो से पकड लिया। मैने भी अपने हाथो का दबाव उसकी चुचियों पर बढा दिया। हुए बोली,
"क्या इरादा है तेरा ? शाम से ही घुरे जा रह है, खा जायेगा क्या ?" मेरे अंदर की आग एकदम भडक उठी थी, और अब तो ऐसा लगा रह था कि, जैसे इन चुचियों को मुंह में ले कर चुस लुं। मैने हल्के-से अपनी गरदन को और आगे की ओर बढाया और अपने होठों को ठीक चुचियों के पास ले गया । राखी शायद मेरे इरादे को समझ गई थी। उसने मेरे सिर के पिछे हाथ डाला और अपनी चुचियों को मेरे चेहरे से सटा दिया। हम दोनो अब एक-दुसरे की तेज चलती हुई सांसो को महसुस कर रहे थे। मैने अपने होठों से ब्लाउस के उपर से ही, राखी की चुचियों को अपने मुंह में भर लिया और चुसने लगा। मेरा दुसरा हाथ कभी उसकी चुचियों को दबा रह था, कभी उसके मोटे-मोटे चुतडों को।राखी ने भी अपना हाथ तेजी के साथ चलना शुरु कर दिया था, और मेरे मोटे लंड को अपने हाथ से मुठीया रही थी। मेरा मजा बढता जा रहा था, तभी मैने सोचा ऐसे करते-करते तो राखी फिर मेरा निकाल देगी, और शायद फिर कुछ देखने भी न दे। जबकि मैं आज तो राखी को पुरा नंगा करके, जी भर के उसके बदन को देखना चाहता था। इसलिये मैने राखी के हाथो को पकड लिया और कहा,
"राखी, रुको।"

"क्यों, मजा नही आ रह है, क्या ? जो रोक रहा है।"

" राखी, मजा तो बहुत आ रह है, मगर ?"

"फिर क्या हुआ ?"

"फिर राखी, मैं कुछ और करना चाहता हुं। ये तो दिन के जैसे ही हो जायेगा।"

इस पर राखी मुस्कुराते हुए पुछा,
"तो तु और क्या करना चाहता है ? तेरा पानी तो ऐसे ही निकलेगा ना, और कैसे निकलेगा ?"

" नही राखी, पानी नही निकालना मुझे।"

"तो फिर क्या करना है ?"

"राखी, देखना है।"

"क्या देखना है, रे ?" " राखी, ये देखना है।",
कह कर, मैने एक हाथ सीधा राखी की बुर पर रख दिया।

" बदमाश, ये कैसी तमन्ना पाल ली, तुने ?"

"राखी, बस एक बार दिखा दो, ना।"

"नही, ऐसा नही करते। मैने तुम्हे थोडी छुट क्या दे दी, तुम तो उसका फायदा उठाने लगे।"

"राखी, ऐसे क्यों कर रही हो तुम ? दिन में तो कितना अच्छे से बातें कर रही थी।"

"नही, मैं तेरी  बहिन हुं,भाई ।"

"राखी, दिन में तो तुमने कितना अच्छा दिखाया भी था, थोडा बहुत ?"

"मैने कब दिखाया ? झुठ क्यों बोल रहा है ?"

"राखी, तुम जब पेशाब करने गई थी, तब तो दिखा रही थी।"

"हाये राम, कितना बदमाश है रे, तु ? मुझे पता भी नही लगा, और तु देख रहा था। हाय दैया, आज कल के लौंडो का सच में कोई भरोसा नही। कब अपनी बहिन पर बुरी नजर रखने लगे, पता ही नही चलता ?"

"राखी, ऐसा क्यों कह रही हो ? मुझे ऐसा लगा जैसे, तुम मुझे दिखा रही हो, इसलिये मैने देखा।"

"चल हट, मैं क्यों दिखाउन्गी ? कोई बहिन ऐसा करती है, क्या ?"

"हाय, मैने तो सोचा था कि, रात में पुरा देखुन्गा। "

"ऐसी उल्टी-सीधी बातें मत सोचा कर, दिमाग खराब हो जायेगा।"

" ओह बहिन, दिखा दो ना, बस एक बार। खाली देख कर सो जाउन्गा।"पर बहिन ने मेरे हाथो को झटक दिया, और उठकर खडी हो गई। अपने ब्लाउस को ठीक करने के बाद, छत के कोने की तरफ चल दी। छत का वो कोना घर के पिछवाडे की तरफ पडता था, और वहां पर एक नाली (मोरी) जैसा बना हुआ था, जिस से पानी बह कर सीधे नीचे बहनेवाली नाली में जा गीरता था। बहिन उसी नाली पर जा के बैठ गई। अपने पेटिकोट को उठा के पेशाब करने लगी। मेरी नजरें तो बहिन का पिछा कर ही रही थी। ये नजारा देख के तो मेरा मन और बहक गया । दिल में आ रहा था कि जल्दी से जाके, राखी के पास बैठ के आगे झांख लुं, और उसकी पेशाब करती हुई चुत को कम से कम देख भर लुं। पर ऐसा ना हो सका। राखी ने पेशाब कर लिया, फिर वो वैसे ही पेटिकोट को जांघो तक, एक हाथ से उठाये हुए मेरी तरफ घुम गई और अपनी बुर पर हाथ चलाने लगी, जैसे कि पेशाब पोंछ रही हो और फिर मेरे पास आ के बैठ गई। मैने राखी के बैठने पर उसका हाथ पकड लिया और प्यार से सहलाते हुए बोला,
"राखी, बस एक बार दिखा दो ना, फिर कभी नही बोलुन्गा दिखने के लिये।"

"एक बार ना कह दिया तो तेरे को समझ में नही आता है, क्या ?"

"आता तो है, मगर बस एक बार में क्या हो जायेगा ? "

"देख, दिन में जो हो गया सो हो गया। मैने दिन में तेरा लंड भी मुठीया दिया था, कोई बहिन  ऐसा नही करती। बस इससे आगे नही बढने दुन्गी।"

बहिन  ने पहली बार गंदे शब्द का उपयोग किया था। उसके मुंह से लंड सुन के ऐसा लगा, जैसे अभी झड के गीर जायेगा। मैने फिर धीरे से हिम्मत कर के कहा,
" बहिन क्या हो जायेगा अगर एक बार मुझे दिखा देगी तो ? तुमने मेरा भी तो देखा है, अब अपना दिखा दो ना ।"

"तेरा देखा है, इसका क्या मतलब है ? तेरा तो मैं बचपन से देखते आ रही हुं। और रही बात चुंची दिखाने और पकडाने की, वो तो मैने तुझे करने ही दिया है ना, क्योंकि बचपन में तो तु इसे पकडता-चुसता ही था। पर चुत की बात और है, वो तो तुने होश में कभी नही देखी ना, फिर उसको क्यों दिखाउं ?"

राखी अब खुल्लम-खुल्ला गन्दे शब्दो का उपयोग कर रही थी। " जब इतना कुछ दिखा दिया है तो, उसे भी दिखा दो ना। ऐसा, कौन-सा काम हो जायेगा ?"

 राखी ने अब तक अपना पेटिकोट समेट कर जांघो के बीच रख लिया था और सोने के लिये लेट गई थी। मैने इस बार अपना हाथ उसकी जांघो पर रख दिया। मोटी-मोटी गुदाज जांघो का स्पर्श जानलेवा था। जांघो को हल्के-हल्के सहलाते हुए, मैं जैसे ही हाथ को उपर की तरफ ले जाने लगा, राखी ने मेरा हाथ पकड लिया और बोली,
"ठहर, अगर तुझसे बरदास्त नही होता है तो ला, मैं फिर से तेरा लंड मुठीया देती हुं।",
कह कर मेरे लंड को फिर से पकड कर मुठीयाने लगी, पर मैं नही माना और ‘एक बार, केवल एक बार’, बोल के जिद करता रहा। राखी ने कहा"बडा जिद्दी हो गया रे, तु तो। तुझे जरा भी शरम नही आती, अपनी  बहिन   को चुत दिखाने को बोल रहा है। अब यहां छत पर कैसे दिखाउं ? अगल-बगल के लोग कहीं देख लेन्गे तो ? कल देख लियो।"
" कल नही अभी दिखा दे। चारो तरफ तो सब-कुछ सुम-सान है, फिर अभी भला कौन हमारी छत पर झांकेगा ?"

"छत पर नही, कल दिन में घर में दिखा दुन्गी, आराम से।"

तभी बारीश की बुंदे तेजी के साथ गीरने लगी। ऐसा लगा रहा था, मेरी तरह आसमान भी बुर नही दिखाये जाने पर रो पडा है।  बहिन ने कहा,
"ओह, बारीश शुरु हो गई। चल, जल्दी से बिस्तर समेट ले। नीचे चल के सोयेन्गे।"


FUN-MAZA-MASTI Tags = Future | Money | Finance | Loans | Banking | Stocks | Bullion | Gold | HiTech | Style | Fashion | WebHosting | Video | Movie | Reviews | Jokes | Bollywood | Tollywood | Kollywood | Health | Insurance | India | Games | College | News | Book | Career | Gossip | Camera | Baby | Politics | History | Music | Recipes | Colors | Yoga | Medical | Doctor | Software | Digital | Electronics | Mobile | Parenting | Pregnancy | Radio | Forex | Cinema | Science | Physics | Chemistry | HelpDesk | Tunes| Actress | Books | Glamour | Live | Cricket | Tennis | Sports | Campus | Mumbai | Pune | Kolkata | Chennai | Hyderabad | New Delhi | कामुकता | kamuk kahaniya | उत्तेजक | मराठी जोक्स | ट्रैनिंग | kali | rani ki | kali | boor | सच | | sexi haveli | sexi haveli ka such | सेक्सी हवेली का सच | मराठी सेक्स स्टोरी | हिंदी | bhut | gandi | कहानियाँ | छातियाँ | sexi kutiya | मस्त राम | chehre ki dekhbhal | khaniya hindi mein | चुटकले | चुटकले व्‍यस्‍कों के लिए | pajami kese banate hain | हवेली का सच | कामसुत्रा kahaniya | मराठी | मादक | कथा | सेक्सी नाईट | chachi | chachiyan | bhabhi | bhabhiyan | bahu | mami | mamiyan | tai | sexi | bua | bahan | maa | bharat | india | japan |funny animal video , funny video clips , extreme video , funny video , youtube funy video , funy cats video , funny stuff , funny commercial , funny games ebaums , hot videos ,Yahoo! Video , Very funy video , Bollywood Video , Free Funny Videos Online , Most funy video ,funny beby,funny man,funy women

No comments:

Raj-Sharma-Stories.com

Raj-Sharma-Stories.com

erotic_art_and_fentency Headline Animator