Saturday, January 11, 2014

बदनाम रिश्ते- मेरी बड़ी बहिन राखी-5

FUN-MAZA-MASTI


बदनाम रिश्ते-
मेरी बड़ी बहिन राखी-5


मैं फिर से अपने काम में जुट गया और पहलीवाली चुंची दबाते हुए, दुसरी को पुरे मनोयोग से चुसने लगा। बहिन सिसकीयां ले रही थी और चुसवा रही थी। कभी-कभी अपना हाथ मेरी कमर के पास ले जा के, मेरे लोहे जैसे तने हुए लंड को पकड के मरोड रही थी। कभी अपने हाथों से मेरे सिर को अपनी चुचियों पर दबा रही थी। इस तरह काफि देर तक मैं उसकी चुचियों को चुसता रहा। फिर बहिन ने खुद अपने हाथों से मेर सिर पकड के अपनी चुचियों पर से हटाया और मुस्कुराते मेरे चेहरे की ओर देखने लगी। मेरे होंठ मेरे खुद के थुक से भीगे हुए थे।बहिन  की बांयी चुंची अभी भी मेरे लार से चमक रही थी, जबकि दाहिनी चुंची पर लगा थुक सुख चुका था पर उसकी दोनो चुचियां लाल हो चुकी थी, और निप्पलों का रंग हल्के काले से पुरा काला हो चुका था (ऐसा बहुत ज्यादा चुसने पर खून का दौर भर जाने के कारण हुआ था)।

राखी ने मेरे चेहरे को अपने होंठो के पास खींच कर मेरे होंठो पर एक गहरा चुम्बन लिया और अपनी कातिल मुस्कुराहट फेंकते हुए मेरे कान के पास धीरे से बोली,
"खाली दुध ही पीयेगा या मालपुआ भी खायेगा ? देख तेरा मालपुआ तेरा इन्तजार कर रह है, राजा।"

मैने भी राखी के होंठो का चुम्बन लिया और फिर उसके भरे-भरे गालो को, अपने मुंह में भर कर चुसने लगा और फिर उसके नाक को चुम और फिर धीरे से बोला,
"ओह राखी, तुम सच में बहुत सुंदर हो।"

इस पर राखी ने पुछा,
"क्यों, मजा आया ना, चुसने में ?"

"हां राखी, गजब का मजा आया, मुझे आजतक ऐसा मजा कभी नही आया था।"

तब राखी ने अपने पैरो के बीच इशारा करते हुए कहा,
"नीचे और भी मजा आयेगा। यह तो केवल तिजोरी का दरवाजा था, असली खजाना तो नीचे है। आजा , आज तुझे असली मालपुआ खिलाती हुं।" मैं धीरे से खिसक कर राखी के पैरो पास आ गया। राखी ने अपने पैरो को घुटनो के पास से मोडे कर फैला दिया और बोली,
"यहां बीच में। दोनो पैरो के बीच में आ के बैठ। तब ठीक से देख पायेगा, अपनी राखी का खजाना।"

मैं उठ कर राखी के दोनो पैरो के बीच घुटनो के बल बैठ गया और आगे की ओर झुका। मेरे सामने वो चीज थी, जिसको देखने के लिये मैं मरा जा रहा था। मां ने अपनी दोनो जांघे फैला दी, और अपने हाथों को अपनी चूत के उपर रख कर बोली,
"ले देख ले, अपना मालपुआ। अब आज के बाद से तुझे यही मालपुआ खाने को मिलेगा।"

मेरी खुशी का तो ठीकाना नही था। सामने बहिन की खुली जांघो के बीच झांठो का एक त्रिकोण सा बन हुआ था। इस त्रिकोणिय झांठो के जंगल के बीच में से, बहिन की फुली हुए गुलाबी बुर का छेद झांख रहा था, जैसे बादलों के झरमट में से चांद झांखता है। मैने अपने कांपते हाथों को बहिन की चिकनी जांघो पर रख दिया और थोडा सा झुक गया। उसकी  चूत के बाल बहुत बडे-बडे नही थे। छोटे-छोटे घुंघराले बाल और उनके बीच एक गहरी लकिर से चीरी हुई थी। मैने अपने दाहिने हाथ को जांघ पर से उठा कर हकलाते हुए पुछा,
"राखी, मैं इसे छु,,,,,लुं,,,,,?"

"छु ले, तेरे छुने के लिये ही तो खोल के बैठी हुं।"

मैने अपने हाथों को राखी की चुत को उपर रख दिया। झांठ के बाल एकदम रेशम जैसे मुलायम लग रहे थे। हालांकि आम तौर पर झांठ के बाल थोडे मोटे होते है, और उसके झांठ के बाल भी मोटे ही थे पर मुलायम भी थे। हल्के-हल्के मैं उन बालों पर हाथ फिराते हुए, उनको एक तरफ करने की कोशिश कर रह था। अब चुत की दरार और उसकी मोटी-मोटी फांके स्पष्ट रुप से दिख रही थी। राखी की चूत एक फुली हुई और गद्देदार लगती थी। चुत की मोटी-मोटी फांके बहुत आकर्षक लग रही थी। मेरे से रहा नही गया और मैं बोल पडा,
" ये तो सच-मुच में मालपुए के जैसी फुली हुई है। "

"हां भाई, यही तो तेरा असली मालपुआ है। आज के बाद जब भी मालपुआ खाने का मन करे, यही खाना।"

"हां बहिन, मैं तो हंमेशा यही मालपुआ खाउन्गा। ओह बहिन, देखोना इस से तो रस भी निकल रहा है।"
(चुत से रिसते हुए पानी को देख कर मैने कहा।)

"भाई, यही तो असली माल है, हम औरतो का। ये रस, मैं तुझे अपनी चूत  की थाली में सजा कर खिलाउन्गी। दोनो फांको को खोल के देख कैसी दिखती है ? हाथ से दोनो फांक पकड कर, खींच कर चूत  को चिरोड कर देख।" सच बताता हुं दोनो फांको को चीर कर, मैने जब चुत के गुलाबी रस से भीगे छेद को देखा, तो मुझे यही लगा कि मेरा तो जनम सफल हो गया है। चुत के अंदर का भाग एकदम गुलाबी था और रस भीगा हुआ था जब मैने उस छेद को छुआ तो मेरे हाथों में चिप-चिपा-सा रस लग गया । मैने उस रस को वहीं बिस्तर की चद्दर पर पोंछ दिया और अपने सिर को आगे बढा कर राखी की चूत को चुम लिया। राखी ने इस पर मेरे सिर को अपनी चुत पर दबाते हुए हल्के-से सिसकाते हुए कहा,
"बिस्तर पर क्यों पोंछ दिया, उल्लु ? यही बहिन  का असली प्यार है, जोकि तेरे लंड को देख के चुत के रस्ते छलक कर बाहर आ रहा है। इसको चख के देख, चुस ले इसको।"

"हाये बहिन , चुसु मैं तेरी बुर को ?  चाटु इसको ?"

"हां  भाई  चाट ना, चुस ले अपनी बहिन  की चुत के सारे रस को। दोनो फांको को खोल के उसमे अपनी जीभ डाल दे, और चुस। और ध्यान से देख, तु तो बुर की केवल फांको को देख रहा है। देख मैं तुझे दिखाती हुं।"

और  राखी  ने अपनी चुत को पुरा चिरोड दिया और अंगुली रख कर बताने लगी,
"देख, ये जो छोटा वाला छेद है ना, वो मेरे पेशाब करने वाला छेद है। बुर में दो-दो छेद होते है। उपर वाला पेशाब करने के काम आता है और नीचेवाला जो ये बडा छेद है, वो चुदवाने के काम आता है। इसी छेद में से रस निकलता है, ताकि मोटे से मोटा लंड आसानी से चुत को चोद सके। और भाई  ये जो पेशाब वाले छेद के ठीक उपर जो ये नुकिला सा निकला हुआ है, वो क्लीट कहलाता है। ये औरत को गर्म करने का अंतिम हथियार है। इसको छुते ही औरत एकदम गरम हो जाती है, समझ में आया ?"

"आ गया समझ में। हाय, कितनी सुंदर है, ये तुम्हारी चूत। मैं चाटु इसे बहिन   ?"

"हां भाई, अब तु चाटना शुरु कर दे। पहले पुरी बुर के उपर अपनी जीभ को फिरा के चाट, फिर मैं आगे बताती जाती हुं, कैसे करना है ?"

मैने अपनी जीभ निकाल ली, और राखी की बुर पर अपनी जुबान को फिराना शुरु कर दिया। पुरी चुत के उपर मेरी जीभ चल रही थी। मैं फुली हुई गद्देदार बुर को अपनी खुरदरी जुबान से, उपर से नीचे तक चाट रहा था। अपनी जीभ को दोनो फांको के उपर फेरते हुए, मैने ठीक बुर की दरार पर अपनी जीभ रखी और मैं धीरे-धीरे उपर से नीचे तक चुत की पुरी दरार पर जीभ को फिराने लगा। बुर से रिस-रिस कर निकलता हुआ रस, जो बाहर आ रहा था उसका नमकीन स्वाद मुझे मिल रहा था। जीभ जब चुत के उपरी भाग में पहुंच कर क्लीट से टकराती थी, तो राखी की सिसकीयां और भी तेज हो जाती थी। राखी ने अपने दोनो हाथों को शुरु में तो कुछ देर तक अपनी चुचियों पर रख था, और अपनी चुचियों को अपने हाथ से ही दबाती रही। मगर बाद में उसने अपने हाथों को मेरे सिर के पिछे लगा दिया और मेरे बालों को सहलाते हुए मेरे सिर को अपनी चुत पर दबाने लगी।मेरी चुत चुसाई बादस्तुर जारी थी और अब मुझे इस बात का अंदाज हो गया था कि,राखी  को सबसे ज्यादा मजा अपनी क्लीट की चुसाई में आ रहा है। इसलिये मैने इस बार अपनी जीभ को नुकिला कर के, क्लीट से भिडा दिया और केवल क्लीट पर अपनी जीभ को तेजी से चलाने लगा। मैं बहुत तेजी के साथ क्लीट के उपर जीभ चला रहा था और फिर पुरी क्लीट को अपने होंठो के बीच दबा कर, जोर-जोर से चुसने लगा। राखी ने उत्तेजना में अपने चुतडों को उपर उछाल दिया और जोर से सिसकीयां लेते हुए बोली,
"हाये दैया, उईई मां,,,,,,, शी शी,,,,, चुस ले, ओह,,,,,, चुस ले,,,, मेरे भगनशे को। ओह, शीश,,,, क्या खुब चुस रहा है रे तु ???? ओह म,,मैने तो सोचा भी नही थाआआआ,,,, कि तेरी जीभ ऐसा कमाल करेगी। हाये रे,,,,,  भाईआ,,,,, तु तो कमाल का निकला,,,,,,,, आह, ओओओह,,,,, ऐसे ही चुस,,, अपने होंठो के बीच में भगनशे को भर के,,,, इसी तरह से चुस ले, ओह  भाई चुसो, चुसो  भाई,,,,,,,"

राखी  के उत्साह बढाने पर मेरी उत्तेजना अब दुगुनी हो चुकी थी। मैं दुगुने जोश के साथ, एक कुत्ते की तरह से लप-लप करते हुए, पुरी बुर को चाटे जा रहा था। अब मैं चुत के भगनशे के साथ-साथ पुरी चुत के मंस (गुद्दे) को अपने मुंह में भर कर चुस रहा था, और राखी  की मोटी फुली हुई चुत अपने झांठो समेत मेरे मुंह में थी। पुरी राखी  को एक बार रसगुल्ले की तरह से मुंह में भर कर चुसने के बाद, मैने अपने होंठो को खोल कर चुत के चोदनेवाले छेद के सामने टिका दिया, और बुर के होंठो से अपने होंठो को मिला कर मैने खूब जोर-जोर से चुसना सुरु कर दिया। बुर का नशिला रस रिस-रिस कर निकल रहा था, और सीधा मेरे मुंह में जा रहा था। मैने कभी सोचा भी नही था कि, मैं चुत को ऐसे चुसुन्गा, या फिर चुत की चुसाई ऐसे कि जाती है। पर शायद चुत सामने देख कर चुसने की कला अपने आप आ जाती है। फुद्दी और जीभ की लडाई अपने आप में ही इतनी मजेदार होती है कि, इसे सिखने और सिखाने की जुरुरत नही पडती। बस जीभ को फुद्दी दिखा दो, बाकी का काम जीभ अपने आप कर लेती है। राखी  की सिसकीयां और शाबाशी और तेज हो चुकी थी। मैने अपने सिर को हल्का-सा उठा के राखी  को देखते हुए, अपने बुर के रस से भीगे होंठो से राखी  से पुछा,
"कैसा लग रहा है राखी , तुझे अच्छा लग रहा है ना ?"

राखी  ने सिसकाते हुए कहा,
"हाये,भाई मत पुछ, बहुत अच्छा लग रहा है, मेरे  भाई । इसी मजे के लिये तो तेरी बहिन  तरस रही थी। चुस ले मेरी बुर कोओओओओओओ,,,,, और जोर से चुस्स्स्स्स्स्स्,,,,, सारा रस पी लेएएएएए मेरे सैंया, तु तो जादुगर है रेएएएएएएएए, तुझे तो कुछ बताने की भी जुरुरत नही। हाये मेरी बुर की फांको के बीच में अपनी जीभ डाल के चुस भाई , और उसमे अपनी जीभ को लबलबाते हुए अपनी जीभ को मेरी चुत के अंदर तक घुमा दे। हाये घुमा दे, राजा  भाई  घुमा दे,,,,,,,"
बहिन के बताये हुए रास्ते पर चलना तो  भाई  का फर्ज बनता है, और उस फर्ज को निभाते हुए, मैने बुर की दोनो फांको को फैला दिया और अपनी जीभ को उसकी चुत में पेल दिया। बुर के अंदर जीभ घुसा कर, पहले तो मैने अपनी जीभ और उपरी होंठ के सहारे बुर की एक फांक को पकड के खूब चुसा। फिर दुसरी फांक के साथ भी ऐसा ही किया। फिर चुत को जितना चिरोड सकता था उतना चिरोड कर, अपनी जीभ को बुर के बीच में डाल कर उसके रस को चटकारे ले कर चाटने लगा। चुत का रस बहुत नशीला था और राखी की चुत कामोत्तेजना के कारण खूब रस छोड रही थी। रंगहीन, हल्का चिप-चिपा रस चाट कर खाने में मुझे बहुत आनंद आ रहा था। राखी घुटी-घुटी आवाज में चीखते हुए बोल पडी,
"ओह, चाट ऐसे हि चाट मेरे राजा, चाट चाट के मेरे सारे रस को खा जाओ। हाये रे मेरा भाई, देखो कैसे कुत्ते की तरह से अपनी  बहिन  की बुर को चाट रह है। ओह चाट ना, ऐसे ही चाट मेरे कुत्ते भाई, अपनी कुतिया बहिन  की बुर को चाट, और उसकी बुर के अंदर अपनी जीभ को हिलाते हुए मुझे अपनी जीभ से चोद डाल।"

मुझे बडा आश्चर्य हुआ कि एक तो बहिन मुझे कुत्ता कह रही है, फिर खुद को भी कुतिया कह रही है। पर मेरे दिलो-दिमाग में तो अभी केवल बहिन  की रसीली बुर की चटाई घुसी हुई थी। इसलिये मैने इस तरफ ध्यान नही दिया। बहिन  की आज्ञा का पालन किया, और जैसे उसने बताया था उसी तरह से, अपनी जीभ से ही उसकी चुत को चोदना शुरु कर दिया। मैं अपनी जीभ को तेजी के साथ बुर में से अंदर-बाहर कर रहा था, और साथ ही साथ चुत में जीभ को घुमाते हुए चुत के गुलाबी छेद से अपने होंठो को मिला के अपने मुंह को चुत पर रगड भी रहा था। मेरी नाक बार-बार चुत के भगनशे से टकरा रही थी और शायद वो भी बहिन  के आनंद का एक कारण बन रही थी। मेरे दोनो हाथ बहिन  की मोटी, गुदाज जांघो से खेल रहे थे। तभी बहिन ने तेजी के साथ अपने चुतडों को हिलाना शुरु कर और जोर-जोर से हांफते हुए बोलने लगी,
"ओह निकल जायेगा, ऐसे ही बुर में जीभ चलाते रहना भाई ,,,,, ओह, सी,,,,सीइ शीइशिशि, साली बहुत खुजली करती थी। आज निकाल दे, इसका सारा पानी।"

और अब  राखी दांत पीस कर लगभग चीखते हुए बोलने लगी,
"ओह होओओओओ,,,, शीईईई साले कुत्ते, मेरे प्यारे  भाई, मेरे लाल,,,, हाये रे,,,, चुस और जोर-से चुस अपनी बहिन की चूत  को,,,,, जीभ से चोद देएएएएए अभी,,,,,,, सीईईइ ईई चोदनाआआ कुत्ते,,,, हरामजादे और जोर-से चोद सालेएएएएएएएए, ,,,,,,,, चोद डाल अपनी बहिन को,,,, हाय निकला रे,,, मेरा तो निकल गया। ओह,,,, मेरे चुदक्कड भाई ,,, निकाल दिया रे तुने तो,,,,, अपनी बहिन को अपनी जीभ से चोद डाला।"

कहते हुए बहिन ने अपने चुतडों को पहले तो खूब जोर-जोर से उपर् की तरफ उछाला, फिर अपनी आंखो को बंध कर के चुतडों को धीरे-धीरे फुदकाते हुए झडने लगी,
"ओह,,, गईईईई मैं,,,, मेरे राजाआआ,,,, मेरा निकल गया, मेरे सैंयाआआ। हाये तुने मुझे जन्नत की सैर करवा दी रे। हाय मेरे भाई ,,, ओह,,,, ओह,,, मैं गई,,,, बहिन  ,,"  की बुर मेरे मुंह पर खुल-बंद हो रही थी। बुर की दोनो फांको से रस, अब भी रिस रहा था। पर  बहिन अब थोडी ठंडी पड चुकी थी, और उसकी आंखे बंध थी। उसने दोनो पैर फैला दिये थे, और सुस्त-सी होकर लंबी-लंबी सांसे छोडती हुई लेट गई। मैने अपनी जीभ से चोद-चोद कर, अपनी बहिन   को झाड दिया था। मैने बुर पर से अपने मुंह को हटा दिया, और अपने सिर को  बहिन   की जांघो पर रख कर लेट गया। कुछ देर तक ऐसे हि लेटे रहने के बाद, मैने जब सिर उठा के देख तो पाया की बहिन    अब भी अपने आंखो को बंध किये बेशुध होकर लेटी हुई है।

मैं चुप-चाप उसके पैरो के बीच से उठा और उसकी बगल में जा कर लेट गया । मेरा लंड फिर से खडा हो चुका था, पर मैने चुप-चाप लेटना ही बेहतर समझा और बहिन   की ओर करवट ले कर, मैने अपने सिर को उसकी चुचियों से सटा दिया और एक हाथ पेट पर रख कर लेट गया । मैं भी थोडी बहुत थकावट महसुस कर रहा था, हालांकि लंड पुरा खडा था और चोदने की ईच्छा बाकी थी। मैं अपने हाथों से  बहिन   के पेट, नाभी और जांघो को सहला रहा था। मैं धिरे-धिरे ये सारा काम कर रहा था, और कोशिश कर रहा था कि, राखी   ना जागे। मुझे लग रहा था कि, अब तो राखी   सो गई है और मुझे शायद मुठ मार कर ही संतोष करना पडेगा। इसलिये मैं चाह रहा था कि, सोते हुए थोडा सा राखी   के बदन से खेल लुं, और फिर मुठ मार लुन्गा। मुझे राखी   की जांघ बडी अच्छी लगी और मेरा दिल कर रहा था कि, मैं उन्हे चुमु और चाटु। इसलिये मैं चुप-चाप धीरे से उठा, और फिर राखी   के पैरो के पास बैठ गया । राखी   ने अपना एक पैर फैला रखा था, और दुसरे पैर को घुटनो के पास से मोड कर रख हुआ था। इस अवस्था में वो बडी खूबसुरत लग रही थी। उसके बाल थोडे बिखरे हुए थे। एक हाथ आंखो पर और दुसरा बगल में था। पैरों के इस तरह से फैले होने से उसकी बुर और गांड, दोनो का छेद स्पष्ट रुप से दिख रहा था। धीरे-धीरे मैं अपने होंठो को उसकी जांघो पर फेरने लगा, और हल्की-हल्की चुम्मियां उसकी रानो से शुरु कर के उसके घुटनो तक देने लगा। एकदम मख्खन जैसी गोरी, चीकनी जांघो को अपने हाथों से पकड कर हल्के-हल्के मसल भी रहा था। मेरा ये काम थोडी देर तक चलता रहा, तभी राखी   ने अपनी आंखे खोली और मुझे अपनी जांघो के पास देख कर वो एकदम से चौंक कर उठ गई, और प्यार से मुझे अपनी जांघो के पास से उठाते हुए बोली,
"क्या कर रहा है  भाई  ????,,,, जरा आंख लग गई थी। देख ना इतने दिनो के बाद, इतने अच्छे-से पहली बार मैने वासना का आनंद उठाया है। इस तरह पिछली बार कब झडी थी, मुझे तो ये भी याद नही। इसलिये शायद संत्रुष्टी और थकान के कारण आंख लग गई।"

"कोई बात नही  बहिन  , तुम सो जाओ।"

तभी  बहिन   की नजर मेरे ८.५ ईंच के लौडे की तरफ गई और वो चौंक के बोली,
"अरे, ऐसे कैसे सो जाउं ?"

(और मेरा लौडा अपने हाथ में पकड लिया।)
"मेरे भाई का लंड खडा हो के, बार-बार मुझे पुकार रहा है, और मैं सो जाउं।"

", इसको तो मैं हाथ से ढीला कर लुन्गा, तुम सो जाओ।"

"नही मेरे भाई, आजा जरा-सा बहिन के पास लेट जा। थोडा दम ले लुं, फिर तुझे असली चीज का मजा दुन्गी।"

मैं उठ कर बहिन के बगल में लेट गया । अब हम दोनो बहिन-भाई एक-दुसरे की ओर करवट लेते हुए, एक-दुसरे से बाते करने लगे। बहिन ने अपना एक पैर उठाया ,और अपनी मोटी जांघो को मेरी कमर पर डाल दिया। फिर एक हाथ से मेरे खडे लौडे को पकड के उसके सुपाडे के साथ धीरे-धीरे खेलने लगी। मैं भी  राखी की एक चुंची को अपने हाथों में पकड कर धीरे-धीरे सहलाने लगा, और अपने होंठो को  राखी के होंठो के पास ले जा कर एक चुंबन लिया।  राखी ने अपने होंठो को खोल दिया। चुम्मा-चाटी खतम होने के बाद  राखी ने पुछा,
"और   भाई, कैसा लगा बहिन की चूत  का स्वाद ? अच्छा लगा, या नही ?" "हाये  राखी, बहुत स्वादिष्ट था, सच में मजा आ गया।"

"अच्छा, चलो मेरे भाई को अच्छा लगा, इससे बढ कर मेरे लिये कोई बात नही।"

" राखी , तुम सच में बहुत सुंदर हो। तुम्हारी चुचियां कितनी खूबसुरत है। मैं,,,,, मैं क्या बोलुं ?  राखी , तुम्हारा तो पुरा बदन खूबसुरत है।"

"कितनी बार बोलेगा ये बात तु, मेरे से ? मैं तेरी आंखे नही पढ सकती क्या ? जिनमे मेरे लिये इतना प्यार छलकता है।"

मैं  राखी  से फीर पुरा चिपक गया । उसकी चुचियां मेरी छाती में चुभ रही थी, और मेरा लौडा अब सीधा उसकी चुत पर ठोकर मार रहा था। हम दोनो एक-दुसरे की आगोश में कुछ देर तक ऐसे ही खोये रहे। फिर मैने अपने आप को अलग किया और बोला,
" राखी , एक सवाल करुं ?"

"हां पुछ, क्या पुछना है ?"

" राखी , जब मैं तुम्हारी चुत चाट रह था, तब तुमने गालियां क्यों निकाली ?"

"गालियां और मैं, मैं भला क्यों गालियां निकालने लगी ?"

"नही  राखी , तुम गालियां निकाल रही थी। तुमने मुझे कुत्ता कहा, और,,, और खुद को कुतिया कहा, फिर तुमने मुझे हरामी भी कहा।"

"मुझे तो याद नही भाई कि, ऐसा कुछ मैने तुम्हे कहा था। मैं तो केवल थोडा-सा जोश में आ गई थी, और तुम्हे बता रही थी कि कैसे क्या करना है। मुझे तो एकदम याद नही कि मैने ये शब्द कहे "नही  राखी , तुम ठीक से याद करने की कोशिश करो। तुमने मुझे हरामी या हरामजादा कहा था, और खूब जोर से झड गई थी।"

"मुझे तो ऐसा कुछ भी याद नही है, फिर भी अगर मैने कुछ कहा भी था तो मैं अपनी ओर से माफी मांगती हुं। आगे से इन बातों का ख्याल रखुन्गी।"

" इसमे माफी मांगने जैसी कोई बात नही है। मैने तो जो तुम्हारे मुंह से सुना, उसे ही तुम्हे बता दिया। खैर, जाने दो तुम्हारा भाई हुं, अगर तुम मुझे दस-बीस गालियां दे भी दोगी तो क्या हो जायेगा ?"

" ऐसी बात नही है। अगर मैं तुझे गालियां दुन्गी तो, हो सकता है तु भी कल को मेरे लिये गालियां निकाले, और मेरे प्रति तेरा नजरीया बदल जाये। तु मुझे वो सम्मान ना दे, जो आजतक मुझे दे रहा है।"

"नही ऐसा कभी नही होगा। मैं तुम्हे हमेशा प्यार करता रहुन्गा और वही सम्मान दुन्गा, जो आजतक दिया है। मेरी नजरों में तुम्हारा स्थान हमेशा उंचा रहेगा।"

"ठीक है , अब तो हमारे बीच एक, दुसरे तरह का संबंध स्थापित हो गया है। इसके बाद जो कुछ होता है, वो हम दोनो की आपसी समझदारी पर निर्भर करता है।"

"हां  तुमने ठीक कहा, पर अब इन बातों को छोड कर, क्यों ना असली काम किया जाये ? मेरी बहुत इच्छा हो रही है कि, मैं तुम्हे चोदुं। देखोना , मेरा डण्डा कैसा खडा हो गया है ?"

"हां  भाई, वो तो मैं देख ही रही हुं कि, मेरे  भाई का हथियार कैसा तडप रहा है, बहिन का मालपुआ खाने को ? पर उसके लिये तो पहले बहिन को एक बार फिर से थोडा गरम करना पडेगा  भाई।" "हाये बहिन, तो क्या अभी तुम्हारा मन चुदवाने का नही है ?"

"ऐसी बात नही है,  चुदवाने का मन तो है, पर किसी भी औरत को चोदने से पहले थोडा गरम करना पडता है। इसलिये बुर चाटना, चुंची चुसना, चुम्मा चाटी करना और दुसरे तरह के काम किये जाते है।"

"इसका मतलब है कि, तुम अभी गरम नही हो और तुम्हे गरम करना पडेगा। ये सब कर के,,,,,"

"हां, इसका यही मतलब है।"

"पर  तुम तो कहती थी, तुम बहुत गरम हो और अभी कह रही हो कि गरम करना पडेगा ?"

"अबे उल्लु, गरम तो मैं बहुत हुं। पर इतने दिनो के बाद, इतनी जबरदस्त चुत चटाई के बाद, तुने मेरा पानी निकाल दिया है, तो मेरी गरमी थोडी देर के लिये शांत हो गई है। अब तुरन्त चुदवाने के लिये तो गरम तो करना ही पडेगा ना। नही तो अभी छोड दे, कल तक मेरी गरमी फिर चढ जायेगी और तब तु मुझे चोद लेना।"

"ओह नही , मुझे तो अभी करना है, इसी वक्त।"

"तो अपनी बहिन को जरा गरम कर दे, और फिर मजे ले चुदाई का।मैने फिर से बहिन की दोनो चुचियां पकड ली और उन्हे दबाते हुए, उसके होंठो से अपने होंठ भीडा दिये। बहिन ने भी अपने गुलाबी होंठो को खोल कर मेरा स्वागत किया, और अपनी जीभ को मेरे मुंह में पेल दिया। बहिन के मुंह के रस में गजब का स्वाद था। हम दोनो एक-दुसरे के होंठो को मुंह में भर कर चुसते हुं, आपस में जीभ से जीभ लडा रहे थे। बहिन की चुचियों को अब मैं जोर-जोर से दबाने लगा था और अपने हाथों से उसके मांसल पेट को भी सहला रह था। उसने भी अपने हाथों के बीच में मेरे लंड को दबोच लिया था और कस-कस के मरोडते हुए, उसे दबा रही थी। बहिन ने अपना एक पैर मेरी कमर के उपर रख दिया था और, अपनी जांघो के बीच मुझे बार-बार दबोच रही थी।

अब हम दोनो की सांसे तेज चलने लगी थी। मेरा हाथ अब बहिन की पीठ पर चल रहा था, और वहां से फिसलते हुए सीधा उसके चुतडों पर चल गया । अभी तक तो मैने बहिन के मक्खन जैसे गुदाज चुतडों पर उतना ध्यान नही दिया था, परन्तु अब मेरे हाथ वहीं पर जा के चिपक गये थे। ओह चुतडों को हाथों से मसलने का आनंद ही कुछ और है। मोटे-मोटे चुतडों के मांस को अपने हाथों में पकड कर कभी धीरे, कभी जोर से मसलने का अलग ही मजा है। चुतडों को दबाते हुए मैने अपनी उन्गलियों को चुतडों के बीच की दरार में डाल दिया, और अपनी उन्गलियों से उसके चुतडों के बीच की खाई को धीरे-धीरे सहलाने लगा। मेरी उन्गलियां राखी की गांड के छेद पर धीरे-धीरे तैर रही थी। राखी की गांड का छेद एकदम गरम लग रहा था। राखी, जो कि मेरे गालो को चुस रही थी, अपना मुंह हटा के बोल उठी,
"ये क्या कर रह है रे, गांड को क्यों सहला रहा है ? "

  तुम्हारी ये देखने में बहुत सुंदर लगती है, सहलाने दो ना,,,,,,,"

"चुत का मजा लिया नही, और चला है गांड का मजा लुटने।",
कह कर राखी हसने लगी।

मेरी समझ में तो कुछ आया नही, पर जब राखी   ने मेरे हाथों को नही हटाया तो मैने राखी की गांड के पकपकाते छेद में अपनी उन्गलिआं चलाने की अपने दिल की हसरत पुरी कर ली। और बडे आराम से धीरे-धीरे कर के अपनी एक उन्गली को हल्के हल्के उसकी गांड के गोल सिकुडे हुए छेद पर धीरे-धीरे चल रह था। मेरी उन्गली का थोडा सा हिस्स भी शायद गांड में चला गया था, पर राखी  ने इस पर कोई ध्यान नही दिया था। कुछ देर तक ऐसे ही गांड के छेद को सहलाता और चुतडों को मसलता रहा। मेरा मन ही नही भर रहा था। तभी राखी ने मुझे अपनी जांघो के बीच और कस के दबोच कर मेरे गालो पर एक प्यार भरी थपकी लगाई और मुंह बिचकाते हुए बोली,
"चुतीये, कितनी देर तक चुतड और गांड से ही खेलता रहेगा, कुछ आगे भी करेगा या नही ? चल आ जा, और जरा फिर से चुंची को चुस तो।"

मैं राखी की इस प्यार भरी झिडकी को सुन कर, अपने हाथों को राखी के चुतडों पर से हटा लिया और मुस्कुराते हुए राखी के चेहरे को देख और प्यार से उसके गालो पर चुम्बन डाल कर बोला,
"जैसी मेरी राखी की इच्छा।" और उसकी एक चुंची को अपने हाथों से पकड कर, दुसरी चुंची से अपना मुंह सटा दिया और निप्पलों को मुंह में भर के चुसने का काम शुरु कर दिया।राखी की मस्तानी चुचियों के निप्पल फिर से खडे हो गये और उसके मुंह से सिसकारीयां निकलने लगी। मैं अपने हाथों को उसकी एक चुंची पर से हटा के नीचे उसकी जांघो के बीच ले गया और उसकी बुर को अपने मुठ्ठी में भर के जोर से दबाने लगा। बुर से पानी निकलना शुरु हो गया था। मेरी उन्गलियों में बुर का चिपचिपा रस लग गया । मैने अपनी बीच वाली उन्गली को हल्के से चुत के छेद पर धकेला। मेरी उन्गली सरसराती हुई बुर के अंदर घुस गई। आधी उन्गली को चुत में पेल कर मैने अंदर-बाहर करना शुरु कर दिया। राखी की आंखे एकदम से नशिली होती जा रही थी और उसकी सिसकारियां भी तेज हो गई थी। मैं उसकी एक चुंची को चुसते हुए चुत के अंदर अपनी आधी उन्गली को गचा-गच पेले जा रह था। राखी  ने मेरे सिर को दोनो हाथों से पकड कर अपनी चुचियों पर दबा दिया और खूब जोर-जोर से सिसकाते हुए बोलने लगी,
"ओह, सीई,,,,,स्स्स्स्स्स्स्स्, एए,,,, चुस, जोर से निप्पल को काट ले, हरामी। जोर से काट ले मेरी इन चुचियों को हाये,,,,,"

और मेरी उन्गली को अपनी बुर में लेने के लिये अपने चुतडों को उछालने लगी थी। राखी के मुंह से फिर से हरामी शब्द सुन कर मुझे थोडा बुरा लगा। मैने अपने मुंह को उसकी चुचियों पर से हटा दिया, और उसके पेट को चुमते हुए उसकी बुर की तरफ बढ गया। चुत से उन्गलीयां निकाल कर मैने चुत की दोनो फांको को पकड के फैलाया और जहां कुछ सेकंड पहले तक मेरी उन्गलीयां थी, उसी जगह पर अपनी जीभ को नुकिला कर के डाल दिया। जीभ को बुर के अंदर लिबलिबाते हुए, मैं भगनशे को अपनी नाक से रगडने लगा। राखी की उत्तेजना बढती जा रही थी। अब उसने अपने पैरो को पुरा खोल दिया था और मेरे सिर को अपनी बुर पर दबाती हुई चिल्लाई,
"चाट साले, मेरी बुर को चाट। ऐसे ही चाट कर खा जा। एक बार फिर से मेरा पानी निकाल दे, हरामी। बुर चाटने में तो तु पुरा उस्ताद निकला रे। चाट ना अपनी बहिन की बुर को, मैं तुझे चुदाई का बादशाह बना दुन्गी, मेरे चुत-चाटु राजाआआ साले।"


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