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ट्यूशन का मजा-3
गतांक से आगे.............................
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ट्यूशन का मजा-3
गतांक से आगे.............................
"तेरा
लंड खड़ा हुआ कि नहीं नालायक" चौधरी सर ने चुम्मा तोड़कर मुझे पूछा पर अब
उनकी आवाज में गुस्से की बजाय थोड़ा सा अपनापन था. दीदी और सर की चूमाचाटी
देखकर मेरा लंड आधा खड़ा हो गया था. मैं उसे प्यार से सहलाता हुआ और खड़ा कर
रहा था. अब मुझे मजा आने लगा था, डर कम हो गया था. लंड ने सिर उठाना शुरू
कर दिया था.
"बहुत अच्छे, पूरा तन्ना कर खड़ा करो" मेरी पीठ थपथपाकर शाबासी देते हुए चौधरी सर लीना दीदी की ओर मुड़े "अच्छा तो लीना, चुम्मे का मजा लेते हुए तेरा ये भाई और कुछ करता है कि नहीं? याने देखो ऐसे!" कहकर उन्होंने फ़िर से दीदी को एक हाथ से पास खींचकर चूमना शुरू कर दिया और दूसरे हाथ से फ़्रॉक के ऊपर से ही उसके मम्मों को सहलाना शुरू कर दिया. इस बार दीदी कुछ नहीं बोली, बस आंखें बंद करके बैठी रही. जरूर उसे मजा आ रहा था.
धीरे धीरे सर ने दीदी के मम्मों को हौले हौले मसलना शुरू कर दिया. "ऐसे करता है या नहीं? इसे अकल है कि नहीं कि अपनी खूबसूरत दीदी का चुम्मा कैसे लिया जाता है!" फ़िर मेरी ओर मुड़कर उन्होंने मेरे खड़े थरथराते लंड को देखा. मैं अब मस्त था, बहुत मजा आ रहा था, दीदी और सर के बीच की कार्यवाही देखकर मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था.
"अब खड़ा हुआ है मस्त. अनिल, काफ़ी सुंदर है तेरा लंड. इसे बस ऐसे ही हथेली से रगड़ते हो या ऐसे भी करते हो?" कहते हुए चौधरी सर ने मेरे लंड को हथेली में लेकर दबाया. फ़िर लंड को मुठ्ठी में लेकर अंगूठे से सुपाड़े के नीचे मसलना शुरू किया. मेरा और तन कर खड़ा हो गया और मेरे मुंह से सिसकी निकल गयी.
"मजा आया?" सर ने मुस्कराकर पूछा. मैंने मुंडी डुलाई. "जल्दी से मस्त करना हो लंड को तो ऐसे करते हैं. मुझे लगा था कि तुझे आता होगा पर तुझे अभी काफ़ी कुछ सीखना है, लेसन देने पड़ेंगे" वे बोले.
उनका हाथ मेरे लंड पर अपना जादू चलाता रहा. वे मुड़कर फ़िर दीदी के साथ चालू हो गये. फ़िर से दीदी की चूंची को फ़्रॉक के ऊपर से मसलते हुए बोले "ब्रा नहीं पहनती लीना तू अभी? उमर तो हो गयी है तेरी."
"पहनती हूं सर" लीना दीदी सहम कर बोली "ट्रेनिंग ब्रा पहनती हूं पर हमेशा नहीं"
"कोई बात नहीं, अभी तो जरा जरा सी हैं, अच्छी कड़ी हैं इसलिये बिना ब्रा के भी चल जाता है. अब बता तेरा भाई ऐसे मसलता है चूंची? या निपल को ऐसे करता है?" कहकर वे दीदी का निपल जो अब कड़ा हो गया था और उसका आकार दीदी के टाइट फ़्रॉक में से दिख रहा था, अंगूठे और उंगली में लेकर मसलने लगे. दीदी ’सी’ ’सी’ करने लगी. वह अब बेहद गरम हो गयी थी. अपनी जांघें एक पर एक रगड़ रही थी.
सर मजे ले लेकर दीदी की ये अवस्था देख रहे थे. उन्होंने प्यार से मुस्करा कर दूर से ही होंठ मिला कर चुंबन का नाटक किया. दीदी एकदम मस्ता गई, मचलकर उसने खुद ही अपनी बांहें फ़िर से सर के गले में डाल दी और उनसे लिपट कर उनके होंठ चूसने लगी.
सर का हाथ अब भी मेरे लंड पर था और वे उसे अंगूठे से मसल रहे थे. मैंने देखा कि अब चौधरी सर का दूसरा हाथ दीदी की चूंची से हट कर उसकी जांघों पर पहुंच गया था. दीदी की जांघें सहला कर चौधरी सर ने उसका फ़्रॉक धीरे धीरे ऊपर खिसकाया और दीदी की बुर पर पैंटी के ऊपर से ही फ़ेरने लगे. दीदी ने उनका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो सर ने चुम्मा लेते लेते ही उसे आंखें दिखा कर सावधान किया. बेचारी चुपचाप सर को चूमते हुए बैठी रही. सर चड्डी के कपड़े पर से ही उसकी बुर को सहलाते रहे.
"बहुत अच्छे, पूरा तन्ना कर खड़ा करो" मेरी पीठ थपथपाकर शाबासी देते हुए चौधरी सर लीना दीदी की ओर मुड़े "अच्छा तो लीना, चुम्मे का मजा लेते हुए तेरा ये भाई और कुछ करता है कि नहीं? याने देखो ऐसे!" कहकर उन्होंने फ़िर से दीदी को एक हाथ से पास खींचकर चूमना शुरू कर दिया और दूसरे हाथ से फ़्रॉक के ऊपर से ही उसके मम्मों को सहलाना शुरू कर दिया. इस बार दीदी कुछ नहीं बोली, बस आंखें बंद करके बैठी रही. जरूर उसे मजा आ रहा था.
धीरे धीरे सर ने दीदी के मम्मों को हौले हौले मसलना शुरू कर दिया. "ऐसे करता है या नहीं? इसे अकल है कि नहीं कि अपनी खूबसूरत दीदी का चुम्मा कैसे लिया जाता है!" फ़िर मेरी ओर मुड़कर उन्होंने मेरे खड़े थरथराते लंड को देखा. मैं अब मस्त था, बहुत मजा आ रहा था, दीदी और सर के बीच की कार्यवाही देखकर मेरा लंड पूरा खड़ा हो गया था.
"अब खड़ा हुआ है मस्त. अनिल, काफ़ी सुंदर है तेरा लंड. इसे बस ऐसे ही हथेली से रगड़ते हो या ऐसे भी करते हो?" कहते हुए चौधरी सर ने मेरे लंड को हथेली में लेकर दबाया. फ़िर लंड को मुठ्ठी में लेकर अंगूठे से सुपाड़े के नीचे मसलना शुरू किया. मेरा और तन कर खड़ा हो गया और मेरे मुंह से सिसकी निकल गयी.
"मजा आया?" सर ने मुस्कराकर पूछा. मैंने मुंडी डुलाई. "जल्दी से मस्त करना हो लंड को तो ऐसे करते हैं. मुझे लगा था कि तुझे आता होगा पर तुझे अभी काफ़ी कुछ सीखना है, लेसन देने पड़ेंगे" वे बोले.
उनका हाथ मेरे लंड पर अपना जादू चलाता रहा. वे मुड़कर फ़िर दीदी के साथ चालू हो गये. फ़िर से दीदी की चूंची को फ़्रॉक के ऊपर से मसलते हुए बोले "ब्रा नहीं पहनती लीना तू अभी? उमर तो हो गयी है तेरी."
"पहनती हूं सर" लीना दीदी सहम कर बोली "ट्रेनिंग ब्रा पहनती हूं पर हमेशा नहीं"
"कोई बात नहीं, अभी तो जरा जरा सी हैं, अच्छी कड़ी हैं इसलिये बिना ब्रा के भी चल जाता है. अब बता तेरा भाई ऐसे मसलता है चूंची? या निपल को ऐसे करता है?" कहकर वे दीदी का निपल जो अब कड़ा हो गया था और उसका आकार दीदी के टाइट फ़्रॉक में से दिख रहा था, अंगूठे और उंगली में लेकर मसलने लगे. दीदी ’सी’ ’सी’ करने लगी. वह अब बेहद गरम हो गयी थी. अपनी जांघें एक पर एक रगड़ रही थी.
सर मजे ले लेकर दीदी की ये अवस्था देख रहे थे. उन्होंने प्यार से मुस्करा कर दूर से ही होंठ मिला कर चुंबन का नाटक किया. दीदी एकदम मस्ता गई, मचलकर उसने खुद ही अपनी बांहें फ़िर से सर के गले में डाल दी और उनसे लिपट कर उनके होंठ चूसने लगी.
सर का हाथ अब भी मेरे लंड पर था और वे उसे अंगूठे से मसल रहे थे. मैंने देखा कि अब चौधरी सर का दूसरा हाथ दीदी की चूंची से हट कर उसकी जांघों पर पहुंच गया था. दीदी की जांघें सहला कर चौधरी सर ने उसका फ़्रॉक धीरे धीरे ऊपर खिसकाया और दीदी की बुर पर पैंटी के ऊपर से ही फ़ेरने लगे. दीदी ने उनका हाथ पकड़ने की कोशिश की तो सर ने चुम्मा लेते लेते ही उसे आंखें दिखा कर सावधान किया. बेचारी चुपचाप सर को चूमते हुए बैठी रही. सर चड्डी के कपड़े पर से ही उसकी बुर को सहलाते रहे.
दीदी
ने जब सांस लेने को चौधरी सर के मुंह से अपना मुंह अलग किया तो चौधरी सर
बोले "लीना, तेरी चड्डी तो गीली लग रही है! ये क्या किया तूने? बच्ची है
क्या? कुछ बच्चों जैसा तो नहीं कर दिया?"
दीदी नजरें झुका कर लाल चेहरे से बोली "नहीं सर ... ऐसा कैसे करूंगी, वो आप जो .... याने .... " फ़िर चुप हो गयी.
"अरे मैं तो मजाक कर रहा था, मुझे मालूम है तू बच्ची नहीं रही. और इस गीलेपन का मतलब है कि मजा आ रहा है तुझे! क्या बदमाश भाई बहन हो तुम दोनों! पर मजा क्यों आ रहा है ये तो बताओ? क्यों रे अनिल? अभी रो रहे थे, अब मजा आने लगा?" चौधरी सर ने पूछा. उनकी आवाज में अब कुछ शैतानी से भरी थी.
मैं क्या कहता, चुप रहा. "क्यों री लीना? मेरे करने से मजा आ रहा है? पहले तो मुझे चूमने से भी मना कर रही थीं. अब क्या सर अच्छे लगने लगे? बोलो.. बोलो" चौधरी सर ने पूछा.
लीना ने आखिर लाल हुए चेहरे को उठा कर उनकी ओर देखते हुए कहा. "हां सर आप बहुत अच्छे लगते हैं, जब ऐसा करते हैं, कैसा तो भी लगता है" मैंने भी हां में हां मिलाई. "हां सर, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसा कभी नहीं लगा, अकेले में भी"
"अच्छा, अब ये बताओ कि मैं सिर्फ़ अच्छा करता हूं इसलिये मजा आ रहा है या अच्छा भी लगता हूं तुम दोनों को?" चौधरी सर अब मूड में आ गये थे. मैंने देखा कि उनकी पैंट में तंबू सा तन गया था. अपना हाथ उन्होंने अब दीदी की पैंटी के अंदर डाल दिया था. शायद उंगली से वे अब दीदी की चूत की लकीर को रगड़ रहे थे क्योंकि अचानक दीदी सिसक कर उनसे लिपट गयी और फ़िर से उन्हें चूमने लगी "ओह सर बहुत अच्छा लगता है, आप बहुत अच्छे हैं सर"
"अच्छा हूं याने? अच्छे दिल का हूं कि दिखने में भी अच्छा लगता हूं तुम दोनों को" चौधरी सर ने फ़िर पूछा. दीदी का चुम्मा खतम होते ही उन्होंने मेरी ओर सिर किया और मेरा गाल चूम लिया. "क्यों रे अनिल? तू बता, वैसे तुम और तेरी बहन भी देखने में अच्छे खासे चिकने हो"
मैं अब बहुत मस्त हो गया था. सर से चिपट कर बैठने में अब अटपटा नहीं लग रहा था. मेरा ध्यान बार बार उनके तंबू की ओर जा रहा था. अनजाने में मैं धीरे धीरे अपने चूतड़ ऊपर नीचे करके सर की हथेली में मेरे लंड को पेलने लगा था. अपने लंड को ऊपर करते हुए मैं बोला "आप बहुत हैंडसम हैं सर, सच में, हमें बहुत अच्छे लगते हैं. दीदी अभी शरमा रही है पर मुझसे कितनी बार बोली है कि अनिल, चौधरी सर कितने हैंडसम हैं. कल सर जब आप ने इसके बाल सहलाये थे और गालों को हाथ लगाया था तो दीदी को बहुत अच्छा लगा था"
"तेरी दीदी भी बड़ी प्यारी है." सर ने दो तीन मिनिट और दीदी की पैंटी में हाथ डालकर उंगली की और फ़िर हाथ निकालकर देखा. उंगली गीली हो गयी थी. सर ने उसे चाट लिया. "अच्छा स्वाद है लीना, शहद जैसा" लीना आंखें बड़ी करके देख रही थी, शर्म से उसने सिर झुका लिया. "अरे शरमा क्यों रही है, सच कह रहा हूं. एकदम मीठी छुरी है तू लीना, रस से भरी गुड़िया है"
चौधरी सर उठ कर खड़े हो गये. "बैठो, मैं अब तुम्हारी मैडम को बुलाता हूं. तुम दोनों ने जो किया सो किया, तुमको न रोक कर बड़ा गलत कर रही थीं वे, पर अब जाने दो, तुम दोनों भाई बहन सच में बड़े प्यारे हो, तुम्हें माफ़ किया जाता है, मैडम को भी बता दूं. बड़े नरम दिल की हैं वे, वहां परेशान हो रही होंगी कि मैं तुम दोनों की धुनाई तो नहीं कर रहा .... पर उसके पहले ... लीना ... तुम अपनी पैंटी उतारो और सोफ़े पर टिक कर बैठो"
लीना घबराकर शर्माती हुई बोली "पर सर ... आप क्या करेंगे?"
"डरो नहीं, जरा ठीक से चाटूंगा तुम्हारी बुर. गलती तुम्हारी है, मैडम के साथ ये सब करने के पहले से सोचना था तुमको, और फ़िर तेरी चूत का स्वाद इतना रसीला है कि चाटे बिना मन नहीं मानेगा मेरा. अब गलती की है तुमने तो भुगतना तो पड़ेगा ही. चलो, जल्दी करो नहीं तो कहीं फ़िर मेरा इरादा बदल गया तो भारी पड़ेगा तुम लोगों को ...." टेबल पर पड़े बेंत को हाथ लगाकर वे थोड़े कड़ाई से बोले.
"नहीं सर, अभी निकालती हूं. अनिल तू उधर देख ना! मुझे शर्म आती है" मेरी ओर देखकर दीदी बोली, उसके गाल गुलाबी हो गये थे.
"अरे उससे अब क्या शरमाती हो. इतना नाटक सब रोज करती हो उसके साथ, आज दोनों मिल कर मैडम को .... और अब शरमा रही हो! चलो जल्दी करो"
लीना ने धीरे से अपनी पैंटी उतार दी. उसकी गोरी चिकनी बुर एकदम लाजवाब लग रही थी. बस थोड़े से जरा जरा से रेशमी बाल थे. मेरी भी सांस चलने लगी. आज पहली बार दीदी की बुर देखी थी, रोज कहता था तो दीदी मुकर जाती थी. बुर गीली थी, ये दूर से भी मुझे दिख रहा था.
"अब टांगें फ़ैलाओ और ऊपर सोफ़े पर रखो. ऐसे ... शाब्बास" चौधरी सर उसके सामने बैठते हुए बोले. लीना दीदी टांगें उठाकर ऐसे सोफ़े पर बैठी हुई बड़ी चुदैल सी लग रही थी, उसकी बुर अब पूरी खुली हुई थी और लकीर में से अंदर का गुलाबी हिस्सा दिख रहा था. चौधरी सर ने उसकी गोरी दुबली पतली जांघों को पहले चूमा और फ़िर जीभ से दीदी की बुर चाटने लगे.
"ओह ... ओह ... ओह ... सर ... प्लीज़" लीना शरमा कर चिल्लाई. "ये क्या कर रहे हैं?"
"क्या हुआ? दर्द होता है?" सर ने पूछा?
"नहीं सर ... अजीब सा ... कैसा तो भी होता है" हिलडुलकर अपनी बुर को सर की जीभ से दूर करने की कोशिश करते हुए दीदी बोली "ऐसे कोई ... वहां ... याने जीभ ... मुंह लगाने से ... ओह ... ओह"
"लीना, बस एक बार कहूंगा, बार बार नहीं कहूंगा. मुझे अपने तरीके से ये करने दो" सर ने कड़े लहजे में कहा और एक दो बार और चाटा. फ़िर दो उंगलियों से बुर के पपोटे अलग कर के वहां चूमा और जीभ की नोक लगाकर रगड़ने लगे. दीदी ’अं’ ’अं’ अं’ करने लगी.
"अब भी कैसा तो भी हो रहा है? या मजा आ रहा है लीना?" सर ने मुस्कराकर पूछा.
"बहुत अच्छा लग रहा है सर .... ऐसा कभी नहीं .... उई ऽ ... मां ....नहीं रहा जाता सर .... ऐसा मत कीजिये ना ...अं ...अं.." कहकर दीदी फ़िर पीछे सरकने की कोशिश करने लगी, फ़िर अचानक चौधरी सर के बाल पकड़ लिये और उनके चेहरे को अपनी बुर पर दबा कर सीत्कारने लगी. सर अब कस के चाट रहे थे, बीच में बुर का लाल लाल छेद चूम लेते या उसके पपोटों को होंठों जैसे अपने मुंह में लेकर चूसने लगते.
दीदी अब आंखें बंद करके हांफ़ते हुए अपनी कमर हिलाकर सर के मूंह पर अपनी चूत रगड़ने लगी. फ़िर एक दो मिनिट में ’उई... मां ... मर गयी ऽ ...’ कहते हुए ढेर हो गयी, उसका बदन ढीला पड़ गया और वो सोफ़े में पीछे लुढ़क गयी.
दीदी नजरें झुका कर लाल चेहरे से बोली "नहीं सर ... ऐसा कैसे करूंगी, वो आप जो .... याने .... " फ़िर चुप हो गयी.
"अरे मैं तो मजाक कर रहा था, मुझे मालूम है तू बच्ची नहीं रही. और इस गीलेपन का मतलब है कि मजा आ रहा है तुझे! क्या बदमाश भाई बहन हो तुम दोनों! पर मजा क्यों आ रहा है ये तो बताओ? क्यों रे अनिल? अभी रो रहे थे, अब मजा आने लगा?" चौधरी सर ने पूछा. उनकी आवाज में अब कुछ शैतानी से भरी थी.
मैं क्या कहता, चुप रहा. "क्यों री लीना? मेरे करने से मजा आ रहा है? पहले तो मुझे चूमने से भी मना कर रही थीं. अब क्या सर अच्छे लगने लगे? बोलो.. बोलो" चौधरी सर ने पूछा.
लीना ने आखिर लाल हुए चेहरे को उठा कर उनकी ओर देखते हुए कहा. "हां सर आप बहुत अच्छे लगते हैं, जब ऐसा करते हैं, कैसा तो भी लगता है" मैंने भी हां में हां मिलाई. "हां सर, बहुत अच्छा लग रहा है, ऐसा कभी नहीं लगा, अकेले में भी"
"अच्छा, अब ये बताओ कि मैं सिर्फ़ अच्छा करता हूं इसलिये मजा आ रहा है या अच्छा भी लगता हूं तुम दोनों को?" चौधरी सर अब मूड में आ गये थे. मैंने देखा कि उनकी पैंट में तंबू सा तन गया था. अपना हाथ उन्होंने अब दीदी की पैंटी के अंदर डाल दिया था. शायद उंगली से वे अब दीदी की चूत की लकीर को रगड़ रहे थे क्योंकि अचानक दीदी सिसक कर उनसे लिपट गयी और फ़िर से उन्हें चूमने लगी "ओह सर बहुत अच्छा लगता है, आप बहुत अच्छे हैं सर"
"अच्छा हूं याने? अच्छे दिल का हूं कि दिखने में भी अच्छा लगता हूं तुम दोनों को" चौधरी सर ने फ़िर पूछा. दीदी का चुम्मा खतम होते ही उन्होंने मेरी ओर सिर किया और मेरा गाल चूम लिया. "क्यों रे अनिल? तू बता, वैसे तुम और तेरी बहन भी देखने में अच्छे खासे चिकने हो"
मैं अब बहुत मस्त हो गया था. सर से चिपट कर बैठने में अब अटपटा नहीं लग रहा था. मेरा ध्यान बार बार उनके तंबू की ओर जा रहा था. अनजाने में मैं धीरे धीरे अपने चूतड़ ऊपर नीचे करके सर की हथेली में मेरे लंड को पेलने लगा था. अपने लंड को ऊपर करते हुए मैं बोला "आप बहुत हैंडसम हैं सर, सच में, हमें बहुत अच्छे लगते हैं. दीदी अभी शरमा रही है पर मुझसे कितनी बार बोली है कि अनिल, चौधरी सर कितने हैंडसम हैं. कल सर जब आप ने इसके बाल सहलाये थे और गालों को हाथ लगाया था तो दीदी को बहुत अच्छा लगा था"
"तेरी दीदी भी बड़ी प्यारी है." सर ने दो तीन मिनिट और दीदी की पैंटी में हाथ डालकर उंगली की और फ़िर हाथ निकालकर देखा. उंगली गीली हो गयी थी. सर ने उसे चाट लिया. "अच्छा स्वाद है लीना, शहद जैसा" लीना आंखें बड़ी करके देख रही थी, शर्म से उसने सिर झुका लिया. "अरे शरमा क्यों रही है, सच कह रहा हूं. एकदम मीठी छुरी है तू लीना, रस से भरी गुड़िया है"
चौधरी सर उठ कर खड़े हो गये. "बैठो, मैं अब तुम्हारी मैडम को बुलाता हूं. तुम दोनों ने जो किया सो किया, तुमको न रोक कर बड़ा गलत कर रही थीं वे, पर अब जाने दो, तुम दोनों भाई बहन सच में बड़े प्यारे हो, तुम्हें माफ़ किया जाता है, मैडम को भी बता दूं. बड़े नरम दिल की हैं वे, वहां परेशान हो रही होंगी कि मैं तुम दोनों की धुनाई तो नहीं कर रहा .... पर उसके पहले ... लीना ... तुम अपनी पैंटी उतारो और सोफ़े पर टिक कर बैठो"
लीना घबराकर शर्माती हुई बोली "पर सर ... आप क्या करेंगे?"
"डरो नहीं, जरा ठीक से चाटूंगा तुम्हारी बुर. गलती तुम्हारी है, मैडम के साथ ये सब करने के पहले से सोचना था तुमको, और फ़िर तेरी चूत का स्वाद इतना रसीला है कि चाटे बिना मन नहीं मानेगा मेरा. अब गलती की है तुमने तो भुगतना तो पड़ेगा ही. चलो, जल्दी करो नहीं तो कहीं फ़िर मेरा इरादा बदल गया तो भारी पड़ेगा तुम लोगों को ...." टेबल पर पड़े बेंत को हाथ लगाकर वे थोड़े कड़ाई से बोले.
"नहीं सर, अभी निकालती हूं. अनिल तू उधर देख ना! मुझे शर्म आती है" मेरी ओर देखकर दीदी बोली, उसके गाल गुलाबी हो गये थे.
"अरे उससे अब क्या शरमाती हो. इतना नाटक सब रोज करती हो उसके साथ, आज दोनों मिल कर मैडम को .... और अब शरमा रही हो! चलो जल्दी करो"
लीना ने धीरे से अपनी पैंटी उतार दी. उसकी गोरी चिकनी बुर एकदम लाजवाब लग रही थी. बस थोड़े से जरा जरा से रेशमी बाल थे. मेरी भी सांस चलने लगी. आज पहली बार दीदी की बुर देखी थी, रोज कहता था तो दीदी मुकर जाती थी. बुर गीली थी, ये दूर से भी मुझे दिख रहा था.
"अब टांगें फ़ैलाओ और ऊपर सोफ़े पर रखो. ऐसे ... शाब्बास" चौधरी सर उसके सामने बैठते हुए बोले. लीना दीदी टांगें उठाकर ऐसे सोफ़े पर बैठी हुई बड़ी चुदैल सी लग रही थी, उसकी बुर अब पूरी खुली हुई थी और लकीर में से अंदर का गुलाबी हिस्सा दिख रहा था. चौधरी सर ने उसकी गोरी दुबली पतली जांघों को पहले चूमा और फ़िर जीभ से दीदी की बुर चाटने लगे.
"ओह ... ओह ... ओह ... सर ... प्लीज़" लीना शरमा कर चिल्लाई. "ये क्या कर रहे हैं?"
"क्या हुआ? दर्द होता है?" सर ने पूछा?
"नहीं सर ... अजीब सा ... कैसा तो भी होता है" हिलडुलकर अपनी बुर को सर की जीभ से दूर करने की कोशिश करते हुए दीदी बोली "ऐसे कोई ... वहां ... याने जीभ ... मुंह लगाने से ... ओह ... ओह"
"लीना, बस एक बार कहूंगा, बार बार नहीं कहूंगा. मुझे अपने तरीके से ये करने दो" सर ने कड़े लहजे में कहा और एक दो बार और चाटा. फ़िर दो उंगलियों से बुर के पपोटे अलग कर के वहां चूमा और जीभ की नोक लगाकर रगड़ने लगे. दीदी ’अं’ ’अं’ अं’ करने लगी.
"अब भी कैसा तो भी हो रहा है? या मजा आ रहा है लीना?" सर ने मुस्कराकर पूछा.
"बहुत अच्छा लग रहा है सर .... ऐसा कभी नहीं .... उई ऽ ... मां ....नहीं रहा जाता सर .... ऐसा मत कीजिये ना ...अं ...अं.." कहकर दीदी फ़िर पीछे सरकने की कोशिश करने लगी, फ़िर अचानक चौधरी सर के बाल पकड़ लिये और उनके चेहरे को अपनी बुर पर दबा कर सीत्कारने लगी. सर अब कस के चाट रहे थे, बीच में बुर का लाल लाल छेद चूम लेते या उसके पपोटों को होंठों जैसे अपने मुंह में लेकर चूसने लगते.
दीदी अब आंखें बंद करके हांफ़ते हुए अपनी कमर हिलाकर सर के मूंह पर अपनी चूत रगड़ने लगी. फ़िर एक दो मिनिट में ’उई... मां ... मर गयी ऽ ...’ कहते हुए ढेर हो गयी, उसका बदन ढीला पड़ गया और वो सोफ़े में पीछे लुढ़क गयी.
सर अब
फ़िर से जीभ से ऊपर से नीचे तक दीदी की बुर चाटने लगे, जैसे कुत्ते चाटते
हैं. एक दो मिनिट चाटने के बाद वे उठ कर खड़े हो गये. उनके पैंट का तंबू अब
बहुत बड़ा हो गया था.
"अच्छा लगा लीना? मजा आया?" सर ने पूछा. दीदी कुछ बोली नहीं, बस शरमा कर अपना चेहरा हाथों से छुपा लिया और मुंडी हिलाकर हां बोली.
"अच्छी है लीना तेरी बुर, बहुत मीठी है. जरूर मैडम ने गेस कर लिया होगा कि कैसे मतवाले जवान भाई बहन हो तुम दोनों नहीं तो वो हाथ भी नहीं लगाने देतीं तुम दोनों को. चलो, उन्हें बुलाता हूं, फ़ालतू डांट दिया बेचारी को" कहकर वे उठे और जाकर दरवाजा खोला. मैडम दरवाजे पर ही खड़ी थीं. शायद सुन रही होंगी कि अंदर क्या हो रहा है. बाद में मुझे लगा कि शायद वे की होल से अंदर भी देख रही थीं. मैंने जल्दी दे लंड पैंट के अंदर करके ज़िप लगा ली.
दरवाजा खोलते ही वे अंदर आ गयीं "सुनिये सर, माफ़ कर दीजिये, बच्चे ही हैं, हो जाता है, आखिर जवानी का नशा है. इन्हें पीटा तो नहीं? तुम्हारा कोई भरोसा नहीं, तुमको गुस्सा आ गया एक बार तो ..." वे अब भी उसी हालत में थीं, ब्लाउज़ सामने से खुला हुआ था और ब्रा दिख रही थी. मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा कि पैंटी भी शायद नहीं पहनी थी, पर साड़ी के कारण कुछ दिख नहीं रहा था.
"पीटने वाला था, बेंत भी निकाली थी, आज इनका मैं भुरता बना देता, खास कर इस लीना की तो चमड़ी उधेड़ देता, बड़ी है अनिल से, दीदी है इसकी, इसे तो अकल होना चाहिये! पर पता नहीं क्यों, ये इनोसेंट से लगे मुझे, रो भी रहे थे, माफ़ी मांग रहे थे, इन्हें समझाया बुझाया, उस में टाइम लग गया."
"चलो अच्छा किया. आखिर बेचारे नासमझ हैं. पर ये लीना चड्डी उतार कर क्यों बैठी है? और ये अनिल?" मेरे लंड को देखकर मुस्कराते हुए वे बोलीं.
"अरे कुछ नहीं, जरा धमका कर देख रहा था और पूछ रहा था कि ये भाई बहन आपस में क्या करते हैं रात को, इनकी नानी तो बूढ़ी है, सो जाती है जल्दी, है ना अनिल? मैं बस देख रहा था कि अब भी सच कहते हैं या नहीं!" चौधरी सर ने पूछा.
मैडम बोलीं "अब क्या करें इनका?"
"कुछ नहीं, माफ़ कर देते हैं. पर इन्हें काफ़ी कुछ सिखाने की जरूरत है. ऐसा करो तुम लीना को अपने कमरे में ले जाओ और जरा एक पाठ और पढ़ाओ. इनको संभालना, समझाना अब हमारी ड्यूटी है, कहीं बिगड़ गये तो ..."
लीना सिर झुकाकर पैंटी पहनने लगी तो मैडम बोलीं "अरे रहने दे, बाद में पहन लेना. अभी चल मेरे साथ उस कमरे में" और चौधरी सर की ओर मुस्कराते हुए वे लीना दीदी का हाथ पकड़कर ले गयीं. मैं भी पीछे हो लिया तो चौधरी सर मेरा हाथ पकड़कर बोले ’तू किधर जाता है बदमाश? तेरा पाठ अभी पूरा नहीं हुआ है. लीना का कम से कम एक तो लेसन हो गया! और अब मैडम भी लेसन लेने वाली हैं"
मैं घबराते हुए बोला "सर, मैं ... अब क्या करूं?" वहां मैडम ने अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया था.
"घबरा मत, इधर आ और बैठ" चौधरी सर ने सोफ़े पर बैठते हुए मुझे इशारा किया. मेरा लंड अब भी खड़ा था, पर अब फटाफट बैठने लगा था. डर लग रहा था पर एक अजीब से सनसनाहट भी हो रही थी दिमाग में. अंदाजा हो गया था कि अब क्या होगा, सर किस किस्म के आदमी थे, ये भी साफ़ हो चला था. पर कोई चारा नहीं था. जो कहेंगे वो करना ही पड़ेगा ये मालूम था.
क्रमशः। ..........................."अच्छा लगा लीना? मजा आया?" सर ने पूछा. दीदी कुछ बोली नहीं, बस शरमा कर अपना चेहरा हाथों से छुपा लिया और मुंडी हिलाकर हां बोली.
"अच्छी है लीना तेरी बुर, बहुत मीठी है. जरूर मैडम ने गेस कर लिया होगा कि कैसे मतवाले जवान भाई बहन हो तुम दोनों नहीं तो वो हाथ भी नहीं लगाने देतीं तुम दोनों को. चलो, उन्हें बुलाता हूं, फ़ालतू डांट दिया बेचारी को" कहकर वे उठे और जाकर दरवाजा खोला. मैडम दरवाजे पर ही खड़ी थीं. शायद सुन रही होंगी कि अंदर क्या हो रहा है. बाद में मुझे लगा कि शायद वे की होल से अंदर भी देख रही थीं. मैंने जल्दी दे लंड पैंट के अंदर करके ज़िप लगा ली.
दरवाजा खोलते ही वे अंदर आ गयीं "सुनिये सर, माफ़ कर दीजिये, बच्चे ही हैं, हो जाता है, आखिर जवानी का नशा है. इन्हें पीटा तो नहीं? तुम्हारा कोई भरोसा नहीं, तुमको गुस्सा आ गया एक बार तो ..." वे अब भी उसी हालत में थीं, ब्लाउज़ सामने से खुला हुआ था और ब्रा दिख रही थी. मुझे न जाने क्यों ऐसा लगा कि पैंटी भी शायद नहीं पहनी थी, पर साड़ी के कारण कुछ दिख नहीं रहा था.
"पीटने वाला था, बेंत भी निकाली थी, आज इनका मैं भुरता बना देता, खास कर इस लीना की तो चमड़ी उधेड़ देता, बड़ी है अनिल से, दीदी है इसकी, इसे तो अकल होना चाहिये! पर पता नहीं क्यों, ये इनोसेंट से लगे मुझे, रो भी रहे थे, माफ़ी मांग रहे थे, इन्हें समझाया बुझाया, उस में टाइम लग गया."
"चलो अच्छा किया. आखिर बेचारे नासमझ हैं. पर ये लीना चड्डी उतार कर क्यों बैठी है? और ये अनिल?" मेरे लंड को देखकर मुस्कराते हुए वे बोलीं.
"अरे कुछ नहीं, जरा धमका कर देख रहा था और पूछ रहा था कि ये भाई बहन आपस में क्या करते हैं रात को, इनकी नानी तो बूढ़ी है, सो जाती है जल्दी, है ना अनिल? मैं बस देख रहा था कि अब भी सच कहते हैं या नहीं!" चौधरी सर ने पूछा.
मैडम बोलीं "अब क्या करें इनका?"
"कुछ नहीं, माफ़ कर देते हैं. पर इन्हें काफ़ी कुछ सिखाने की जरूरत है. ऐसा करो तुम लीना को अपने कमरे में ले जाओ और जरा एक पाठ और पढ़ाओ. इनको संभालना, समझाना अब हमारी ड्यूटी है, कहीं बिगड़ गये तो ..."
लीना सिर झुकाकर पैंटी पहनने लगी तो मैडम बोलीं "अरे रहने दे, बाद में पहन लेना. अभी चल मेरे साथ उस कमरे में" और चौधरी सर की ओर मुस्कराते हुए वे लीना दीदी का हाथ पकड़कर ले गयीं. मैं भी पीछे हो लिया तो चौधरी सर मेरा हाथ पकड़कर बोले ’तू किधर जाता है बदमाश? तेरा पाठ अभी पूरा नहीं हुआ है. लीना का कम से कम एक तो लेसन हो गया! और अब मैडम भी लेसन लेने वाली हैं"
मैं घबराते हुए बोला "सर, मैं ... अब क्या करूं?" वहां मैडम ने अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया था.
"घबरा मत, इधर आ और बैठ" चौधरी सर ने सोफ़े पर बैठते हुए मुझे इशारा किया. मेरा लंड अब भी खड़ा था, पर अब फटाफट बैठने लगा था. डर लग रहा था पर एक अजीब से सनसनाहट भी हो रही थी दिमाग में. अंदाजा हो गया था कि अब क्या होगा, सर किस किस्म के आदमी थे, ये भी साफ़ हो चला था. पर कोई चारा नहीं था. जो कहेंगे वो करना ही पड़ेगा ये मालूम था.
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