FUN-MAZA-MASTI
ट्यूशन का मजा-4
गतांक से आगे.............................
वे मेरे लंड से खेलते रहे. दोनों हाथों में लेकर बेलन से बेलते, कभी मुठ्ठी में लेकर दबाते और कभी अंगूठे और उंगली में लेकर मसलते "अब बोल, क्या कह रहा था तू कि लड़का है? तो लड़के याने मर्द आपस मजा नहीं कर सकते क्या ऐसे? तुझे मजा आया कि नहीं? मैं भी लड़का हूं, तू भी लड़का है, पर इससे कोई फ़रक पड़ा तेरी मस्ती में? बोल, कैसा लगा ये लेसन?"
"सर आप बहुत अच्छा सिखाते हैं" मैं उन्हें देखकर शरमाता हुआ बोला.
’और दिखने में कैसा लगता हूं? कि लड़का हूं इसलिये अच्छा नहीं लगता?" चौधरी सर ने मेरे लंड के सुपाड़े को चूमते हुए पूछा.
"नहीं सर, बहुत प्यारे लगते हैं, मैडम जैसे ही. कितने हैंडसम हैं आप" मैं अब हाथ को मेरी गोद में झुके उनके सिर के घने बालों में चला रहा था.
अब तक मेरे लंड में फ़िर गुदगुदी होने लगी थी और वह सिर उठाने लगा था. देख कर चौधरी सर ने उसे फ़िर मुंह में ले लिया और चूसने लगे. एक हाथ से वे अब मेरे पैर के तलवे में गुदगुदी कर रहे थे. मेरा जल्द ही पूरा खड़ा हो गया.
"तो ये पाठ पसंद आया तुझे?" चौधरी सर उठ कर सोफ़े पर बैठकर मुझे फ़िर बांहों में भरके बोले. अब मेरी हिम्मत बंध गयी थी. चौधरी सर ने जिस तरह से मेरा लंड चूसा था, मैं उनका गुलाम ही हो गया था. इसलिये अब बिना हिचकिचाहट मैंने खुद ही उनके होंठ चूम लिये. "हां सर, आप बहुत अच्छे हैं सर"
"तो अब चल, पाठ में जो सीखा, कर के बता. मेरे ऊपर कर" मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने अपने तंबू पर रखते हुए कहा.
मैं बिना शरमाये सर के तंबू पर हाथ फ़िराने लगा. मेरा दिल भी अब उनका लंड देखने का कर रहा था पर थोड़ा डर भी लग रहा था कि शायद चूसना पड़ेगा!
मेरे हाथ से मस्त होकर सर बोले "हां ... बहुत अच्छे ... और चलाओ हाथ अपना अनिल ... लगता है ऐसा ही करते हो क्लास में क्यों? तभी तजुर्बा है लगता है ... बदमाश कहीं के!"
दो मिनिट बाद सर बोले "अब ज़िप खोलो बेटे, मेरा लंड बाहर निकालो"
मैंने ज़िप खोली. अंदर सर ने जांघिया पहना था और लंड खड़ा हो कर अपने आप स्लिट से बाहर आ गया था. ज़िप खोलते ही पूरा टन्न से बाहर आ गया.
"बाप रे ..." मेरे मुंह से निकल आया.
"क्या हुआ?" चौधरी सर मुस्करा रहे थे.
"बहुत बड़ा है सर, मुझे पता नहीं था कि किसीका इतना बड़ा होता है" सर के तन्ना कर खड़े लंड की ओर आंखें फ़ाड़ कर देखता हुआ मैं बोला.
"अच्छा लगा तुझे? ठीक से देख, हाथ में ले" सर बोले.
मैंने लंड हाथ में लिया.
"कैसा है, पूरा वर्णन करके बता"
"सर ऐसा लगता है जैसा गोरा मोटा मूसल है, गन्ने जैसा रसीला लगता है" मैं बोला.
"हां, और बोल" मस्त होकर सर बोले.
"सर नसें उभरी हुई हैं, एकदम मस्त दिखती हैं सर. और सर ये गोल गोल ...."
"इसे क्या कहते हैं बोल? मालूम होगा तुझे, अगर नहीं मालूम है तो एक तमाचा मारूंगा" सर मस्ती भरी आवाज में बोले.
"सुपाड़ा सर"
"ये हुई ना बात. तो बोल, कैसा है सुपाड़ा?"
"सर ....किसी टमाटर जैसा रसीला लग रहा है, लाल लाल फ़ूला हुआ. कभी रसीले सेब जैसा लगता है."
"और ?"
"सर स्किन ऐसे तनी है जैसे हवा भरा गुब्बारा ... कैसी मखमल सी लगती है ये गुलाबी स्किन ..."
"चल अब ठीक से पकड़" चौधरी सर ने कहा. मैंने लंड को दो मुठ्ठियों में लिया, फ़िर भी पूरा नहीं आया, डंडे का दो इंच भाग और सुपाड़ा मेरी ऊपर की मुठ्ठी के बाहर निकले थे.
"सर बहुत बड़ा है सर, दो हथेली में भी पकड़ाई में नहीं आता है. सर .... नाप के देखूं?" मैंने उसुकता से पूछा.
क्रमशः। ...........................
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ट्यूशन का मजा-4
गतांक से आगे.............................
मैं उनके पास बैठ गया तो उन्होंने मुझे कमर में हाथ डालकर पास खींच लिया. "अब बता, लीना की चूत देख कर मजा आया?"
"हां सर"
"आज तक सच में नहीं देखी थी?"
"नहीं सर, आपकी कसम. वो क्या है, दीदी चांस नहीं देती हाथ वाथ लगाने का"
"वैसे उसने नहीं तेरे को हाथ लगाने की कोशिश की? याने यहां? आखिर तू भी जवान है और वो भी" सर मेरे लंड को पैंट के ऊपर से सहलाते हुए बोले.
"नहीं सर, वैसे कई बार मेरा खड़ा रहता है घर में, उसे दिखता है तो टक लगाकर देखती है और मेरा मजाक उड़ाती है लीना दीदी"
अचानक सर ने मुझे खींच कर गोद में बिठा लिया.
"सर, ये क्या ... " मैं घबरा कर चिल्लाया.
"गोद में बैठ अनिल, स्टूडेंट भले सयाना हो जाये, टीचर के लिये छोटा ही रहता है"
बैठे बैठे मुझे उनके लंड का उभार अपने चूतड़ के नीचे महसूस हो रहा था. उन्होंने मुझे बांहों में भर लिया और मेरे बाल चूम लिये. फ़िर मेरा सिर अपनी ओर मोड़ते हुए बोले "अब तू चुम्मा देकर दिखा, लीना ने तो फ़र्स्ट क्लास दिखा दिया."
"पर सर ... मैं तो ... मैं तो लड़का हूं" मैंने हकलाते हुए कहा.
"तो क्या हुआ! ऐसा कहां लिखा है कि लड़के लड़के चुम्मा नहीं ले सकते? वैसे तू इतना चिकना है कि लड़की ही है समझ ले मेरे लिये. अब नखरा न कर, लीना तो पास हो गयी अपने लेसन में, तुझे फ़ेल होना है क्या?"
मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी मर्द के साथ मैं इस तरह की हालत में होऊंगा. मैंने डरते डरते उनके होंठों पर होंठ रख दिये. उन्हें चूमते हुए चौधरी सर ने मेरी ज़िप खोल कर लंड बाहर निकाल लिया और उसे हाथ में लेकर पुचकारने लगे. लंड में इतनी मीठी गुदगुदी होने लगी कि धीरे धीरे मेरी सारी हिचकिचाहट और - ये कुछ गलत हो रहा है - ये एहसास पूरा मन से निकल गया. डर भी खतम हो गया. अब बचा था तो बस लंड में होती अजीब मीठी चाहत की फ़ीलिंग जिसके आगे दुनिया का कोई नियम नहीं टिकता.
पास से मैंने सर को देखा, वे सच में काफ़ी हैंडसम थे. बहुत देर बस सर चूम रहे थे और मैं चुप बैठा था पर आखिर मैंने भी उनके होंठों को चूमना शुरू कर दिया. उनके होंठ मांसल मांसल से थे, पास से सर ने लगाये आफ़्टर शेव की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी.
"मुंह बंद क्यों है तेरा? ठीक से किस करना हो तो मुंह खुला होना चाहिये, इससे किस करने वाले पास आते हैं और प्यार बढ़ता है" सर बोले. मैंने अपना मुंह खोला और सर ने भी अपने होंठ अलग अलग करके मेरे निचले होंठ को अपने होंठों में लिया और चूसने लगे. अब मुझे उनके मुंह का गीलापन महसूस हो रहा था, स्वाद भी आ रहा था.
"शाब्बास, अब ये बता कि तू जीभ नहीं लड़ाता अपनी दीदी से? ऐसे ... जरा मुंह खोल तो बताता हूं. तेरी दीदी के साथ भी करने वाला था पर बेचारी बहुत शर्मा रही थी आज पहली बार ... तूने सच में जीभ नहीं लड़ाई अब तक किसी से?" वे एक हाथ से मेरे लंड को और एक से मेरी जांघों को सहलाते हुए बोले.
"नहीं सर, अब तक नहीं ... जब किस भी नहीं किया तो ये तो दूर की बात है"
"कोई बात नहीं, अब करके देख, जीभ बाहर निकाल" वे बोले. मैंने मुंह खोला और जीभ निकाली. सर ने अपनी जीभ भी मुंह से निकाली और मेरी जीभ से लड़ाने लगे. पहले मुझे अटपटा लगा पर फ़िर उनकी वो लाल लाल लंबी जीभ अच्छी लगने लगी. मैंने भी अपनी जीभ हिलाना शुरू कर दी. चौधरी सर ने सहसा उसे अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगे
"हां सर"
"आज तक सच में नहीं देखी थी?"
"नहीं सर, आपकी कसम. वो क्या है, दीदी चांस नहीं देती हाथ वाथ लगाने का"
"वैसे उसने नहीं तेरे को हाथ लगाने की कोशिश की? याने यहां? आखिर तू भी जवान है और वो भी" सर मेरे लंड को पैंट के ऊपर से सहलाते हुए बोले.
"नहीं सर, वैसे कई बार मेरा खड़ा रहता है घर में, उसे दिखता है तो टक लगाकर देखती है और मेरा मजाक उड़ाती है लीना दीदी"
अचानक सर ने मुझे खींच कर गोद में बिठा लिया.
"सर, ये क्या ... " मैं घबरा कर चिल्लाया.
"गोद में बैठ अनिल, स्टूडेंट भले सयाना हो जाये, टीचर के लिये छोटा ही रहता है"
बैठे बैठे मुझे उनके लंड का उभार अपने चूतड़ के नीचे महसूस हो रहा था. उन्होंने मुझे बांहों में भर लिया और मेरे बाल चूम लिये. फ़िर मेरा सिर अपनी ओर मोड़ते हुए बोले "अब तू चुम्मा देकर दिखा, लीना ने तो फ़र्स्ट क्लास दिखा दिया."
"पर सर ... मैं तो ... मैं तो लड़का हूं" मैंने हकलाते हुए कहा.
"तो क्या हुआ! ऐसा कहां लिखा है कि लड़के लड़के चुम्मा नहीं ले सकते? वैसे तू इतना चिकना है कि लड़की ही है समझ ले मेरे लिये. अब नखरा न कर, लीना तो पास हो गयी अपने लेसन में, तुझे फ़ेल होना है क्या?"
मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी मर्द के साथ मैं इस तरह की हालत में होऊंगा. मैंने डरते डरते उनके होंठों पर होंठ रख दिये. उन्हें चूमते हुए चौधरी सर ने मेरी ज़िप खोल कर लंड बाहर निकाल लिया और उसे हाथ में लेकर पुचकारने लगे. लंड में इतनी मीठी गुदगुदी होने लगी कि धीरे धीरे मेरी सारी हिचकिचाहट और - ये कुछ गलत हो रहा है - ये एहसास पूरा मन से निकल गया. डर भी खतम हो गया. अब बचा था तो बस लंड में होती अजीब मीठी चाहत की फ़ीलिंग जिसके आगे दुनिया का कोई नियम नहीं टिकता.
पास से मैंने सर को देखा, वे सच में काफ़ी हैंडसम थे. बहुत देर बस सर चूम रहे थे और मैं चुप बैठा था पर आखिर मैंने भी उनके होंठों को चूमना शुरू कर दिया. उनके होंठ मांसल मांसल से थे, पास से सर ने लगाये आफ़्टर शेव की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी.
"मुंह बंद क्यों है तेरा? ठीक से किस करना हो तो मुंह खुला होना चाहिये, इससे किस करने वाले पास आते हैं और प्यार बढ़ता है" सर बोले. मैंने अपना मुंह खोला और सर ने भी अपने होंठ अलग अलग करके मेरे निचले होंठ को अपने होंठों में लिया और चूसने लगे. अब मुझे उनके मुंह का गीलापन महसूस हो रहा था, स्वाद भी आ रहा था.
"शाब्बास, अब ये बता कि तू जीभ नहीं लड़ाता अपनी दीदी से? ऐसे ... जरा मुंह खोल तो बताता हूं. तेरी दीदी के साथ भी करने वाला था पर बेचारी बहुत शर्मा रही थी आज पहली बार ... तूने सच में जीभ नहीं लड़ाई अब तक किसी से?" वे एक हाथ से मेरे लंड को और एक से मेरी जांघों को सहलाते हुए बोले.
"नहीं सर, अब तक नहीं ... जब किस भी नहीं किया तो ये तो दूर की बात है"
"कोई बात नहीं, अब करके देख, जीभ बाहर निकाल" वे बोले. मैंने मुंह खोला और जीभ निकाली. सर ने अपनी जीभ भी मुंह से निकाली और मेरी जीभ से लड़ाने लगे. पहले मुझे अटपटा लगा पर फ़िर उनकी वो लाल लाल लंबी जीभ अच्छी लगने लगी. मैंने भी अपनी जीभ हिलाना शुरू कर दी. चौधरी सर ने सहसा उसे अपने मुंह में ले लिया और चूसने लगे
मुझे
बहुत मजा आ रहा था. अब अपने आप मेरा बदन ऊपर नीचे होकर सर के हाथ की पकड़
मेरे लंड पर बढ़ाने की कोशिश कर रहा था. सर ने मेरी आंखों में झांकते हुए
मुस्कराकर अपनी जीभ मेरे मुंह में डाल दी और मैं उसे चूसने लगा. अब मैं भी
मजे ले लेकर चूमा चाटी कर रहा था. चौधरी सर के मुंह का स्वाद मुझे अच्छा लग
रहा था, जीभ एकदम गीली और रसीली थी. सर का लंड अब उनकी पैंट के नीचे से ही
साइकिल के डंडे सा मेरी जांघों के बीच सट गया था और मुठिया मुठिया कर मुझे
बार बार ऊपर उठा रहा था. मैं सोचने लगा कि कितना तगड़ा होगा सर का लंड जो
मेरे वजन को भी आसानी से उठा रहा है.
दस मिनिट चूमा चाटी करके सर आखिर रुके "तेरे चुम्मे तो लीना से भी मीठे हैं अनिल. तुझे उससे ज्यादा मार्क मिले इस लेसन में. अब अगला लेसन करेंगे, जवानी के रस वाला. लीना का रस तो बड़ा मीठा था, अब तेरा कैसा है जरा दिखा"
मैं उनकी ओर देखने लगा. मेरी सांस तेज चल रही थी. लंड कस कर खड़ा था. मुझे नीचे सोफ़े पर बिठाते हुए सर बोले ’तू बैठ आराम से, देख मैं क्या करता हूं. सीख जरा, ये लेसन बड़ा इंपॉर्टेंट है"
सर मेरे सामने बैठ गये, फ़िर मेरे लंड को पास से देखने लगे. "मस्त है, काफ़ी रसीला लगता है" फ़िर जीभ से धीरे से मेरे सुपाड़े को गुदगुदाया. मैं सिहर उठा. सहन नहीं हो रहा था. "क्यों रे तुझे भी कैसा कैसा होता है लीना जैसे?" और फ़िर से मेरे सुपाड़े पर जीभ रगड़ने लगे.
"हां सर ... प्लीज़ सर ... मत कीजिये सर ... मेरा मतलब है और कीजिये सर ... अच्छा भी लगता है सर पर ... सहन नहीं होता है" मैं बोला.
"अच्छा, अब बता, ये अच्छा लगता है?" कहकर उन्होंने मेरे लंड को ऊपर करके मेरे पेट से सटाया और उसकी पूरी निचली मांसल बाजू नीचे से ऊपर तक चाटने लगे. मुझे इतना मजा आया कि मैंने उनका सिर पकड़ लिया ’ओह .. ओह .. सर ... बहुत मजा आता है"
"ये बात हुई ना, याद रखना इस बात को और अब देख, ये कैसा लगता है?" कहकर वे बीच बीच में जीभ की नोक से मेरे सुपाड़े के जरा नीचे दबाते और गुदगुदाने लगते. मैं दो मिनिट में झड़ने को आ गया. "सर ... सर ... आप ... आप कितने अच्छे हैं सर .... ओह ... ओह ... " और मेरा लंड उछलने लगा.
चौधरी सर मुस्कराये और बोले "लगता है रस निकलने वाला है तेरा. जल्दी निकल आता है अनिल, पूरा मजा भी नहीं लेने देता तू. यहां मार्क कम मिलेंगे तुझे. वो लीना भी ऐसी झड़ने ही की जल्दबाजी वाली थी. खैर तुमको भी क्या कहें, आखिर नौसिखिये हो तुम दोनों, सिखाना पड़ेगा तुम लोगों को और" कहकर उन्होंने मेरे लंड को पूरा मुंह में ले लिया और चूसने लगे. साथ ही वे मेरी जांघों को भी सहलाते जाते थे. चौधरी सर की जीभ अब मेरे लंड को नीचे से रगड़ रही थी और उनका तालू मेरे सुपाड़े से लगा था. मैंने कसमसा कर उनका सिर पकड़ा और अपने पेट पर दबा कर उचक उचक कर उनके मुंह में लंड पेलने लगा. सर कुछ नहीं बोले, बस चूसते रहे.
अगले ही पल मेरी हिचकी निकल गयी और मैं झड़ गया. मैंने सर का सिर पकड़कर हटाने की कोशिश की पर सर चूसते रहे, मेरे उबल उबल कर निकलते वीर्य को वे निगलते जा रहे थे. जब मेरा लंड आखिर शांत हुआ तो मैंने उनका सिर छोड़ा और पीछे सोफ़े पर टिक कर लस्त हो गया. सर अब भी मेरे लंड को चूसते रहे. फ़िर उसे मुंह से निकालकर हथेली में लेकर रगड़ने लगे. "तेरा रस बहुत मीठा है अनिल, लीना से भी, वैसे उसका भी एकदम मस्त है, तुझे फ़ुल मार्क इस टेस्ट में, तू बोल, तुझे मजा आया?"
"हां सर .... बहुत .... लगता था पागल हो जाऊंगा, सर ... थैंक यू सर ... इतना मजा कभी नहीं आया था जिंदगी में पर सर ... वो मैंने आपका सिर हटाने की कोशिश तो की थी ... आपने ही ... सब मुंह में ले लिया ..."
"क्या ले लिया?"
"यही सर ... याने ये सफ़ेद ..."
"ये जो सफ़ेद मलाई निकली तेरे लंड से, उसको क्या कहते हैं?"
"वीर्य कहते हैं सर" मैंने कहा.
"शाबास. तुझे मालूम है. वीर्य याने सच में जवानी का टॉनिक होता है, बेशकीमती, उसको कभी वेस्ट मत करना, जब जब हो सके, उसे मुंह में ही लेना, निगलने की कोशिश करना, सेहत के लिये मस्त होता है"
दस मिनिट चूमा चाटी करके सर आखिर रुके "तेरे चुम्मे तो लीना से भी मीठे हैं अनिल. तुझे उससे ज्यादा मार्क मिले इस लेसन में. अब अगला लेसन करेंगे, जवानी के रस वाला. लीना का रस तो बड़ा मीठा था, अब तेरा कैसा है जरा दिखा"
मैं उनकी ओर देखने लगा. मेरी सांस तेज चल रही थी. लंड कस कर खड़ा था. मुझे नीचे सोफ़े पर बिठाते हुए सर बोले ’तू बैठ आराम से, देख मैं क्या करता हूं. सीख जरा, ये लेसन बड़ा इंपॉर्टेंट है"
सर मेरे सामने बैठ गये, फ़िर मेरे लंड को पास से देखने लगे. "मस्त है, काफ़ी रसीला लगता है" फ़िर जीभ से धीरे से मेरे सुपाड़े को गुदगुदाया. मैं सिहर उठा. सहन नहीं हो रहा था. "क्यों रे तुझे भी कैसा कैसा होता है लीना जैसे?" और फ़िर से मेरे सुपाड़े पर जीभ रगड़ने लगे.
"हां सर ... प्लीज़ सर ... मत कीजिये सर ... मेरा मतलब है और कीजिये सर ... अच्छा भी लगता है सर पर ... सहन नहीं होता है" मैं बोला.
"अच्छा, अब बता, ये अच्छा लगता है?" कहकर उन्होंने मेरे लंड को ऊपर करके मेरे पेट से सटाया और उसकी पूरी निचली मांसल बाजू नीचे से ऊपर तक चाटने लगे. मुझे इतना मजा आया कि मैंने उनका सिर पकड़ लिया ’ओह .. ओह .. सर ... बहुत मजा आता है"
"ये बात हुई ना, याद रखना इस बात को और अब देख, ये कैसा लगता है?" कहकर वे बीच बीच में जीभ की नोक से मेरे सुपाड़े के जरा नीचे दबाते और गुदगुदाने लगते. मैं दो मिनिट में झड़ने को आ गया. "सर ... सर ... आप ... आप कितने अच्छे हैं सर .... ओह ... ओह ... " और मेरा लंड उछलने लगा.
चौधरी सर मुस्कराये और बोले "लगता है रस निकलने वाला है तेरा. जल्दी निकल आता है अनिल, पूरा मजा भी नहीं लेने देता तू. यहां मार्क कम मिलेंगे तुझे. वो लीना भी ऐसी झड़ने ही की जल्दबाजी वाली थी. खैर तुमको भी क्या कहें, आखिर नौसिखिये हो तुम दोनों, सिखाना पड़ेगा तुम लोगों को और" कहकर उन्होंने मेरे लंड को पूरा मुंह में ले लिया और चूसने लगे. साथ ही वे मेरी जांघों को भी सहलाते जाते थे. चौधरी सर की जीभ अब मेरे लंड को नीचे से रगड़ रही थी और उनका तालू मेरे सुपाड़े से लगा था. मैंने कसमसा कर उनका सिर पकड़ा और अपने पेट पर दबा कर उचक उचक कर उनके मुंह में लंड पेलने लगा. सर कुछ नहीं बोले, बस चूसते रहे.
अगले ही पल मेरी हिचकी निकल गयी और मैं झड़ गया. मैंने सर का सिर पकड़कर हटाने की कोशिश की पर सर चूसते रहे, मेरे उबल उबल कर निकलते वीर्य को वे निगलते जा रहे थे. जब मेरा लंड आखिर शांत हुआ तो मैंने उनका सिर छोड़ा और पीछे सोफ़े पर टिक कर लस्त हो गया. सर अब भी मेरे लंड को चूसते रहे. फ़िर उसे मुंह से निकालकर हथेली में लेकर रगड़ने लगे. "तेरा रस बहुत मीठा है अनिल, लीना से भी, वैसे उसका भी एकदम मस्त है, तुझे फ़ुल मार्क इस टेस्ट में, तू बोल, तुझे मजा आया?"
"हां सर .... बहुत .... लगता था पागल हो जाऊंगा, सर ... थैंक यू सर ... इतना मजा कभी नहीं आया था जिंदगी में पर सर ... वो मैंने आपका सिर हटाने की कोशिश तो की थी ... आपने ही ... सब मुंह में ले लिया ..."
"क्या ले लिया?"
"यही सर ... याने ये सफ़ेद ..."
"ये जो सफ़ेद मलाई निकली तेरे लंड से, उसको क्या कहते हैं?"
"वीर्य कहते हैं सर" मैंने कहा.
"शाबास. तुझे मालूम है. वीर्य याने सच में जवानी का टॉनिक होता है, बेशकीमती, उसको कभी वेस्ट मत करना, जब जब हो सके, उसे मुंह में ही लेना, निगलने की कोशिश करना, सेहत के लिये मस्त होता है"
वे मेरे लंड से खेलते रहे. दोनों हाथों में लेकर बेलन से बेलते, कभी मुठ्ठी में लेकर दबाते और कभी अंगूठे और उंगली में लेकर मसलते "अब बोल, क्या कह रहा था तू कि लड़का है? तो लड़के याने मर्द आपस मजा नहीं कर सकते क्या ऐसे? तुझे मजा आया कि नहीं? मैं भी लड़का हूं, तू भी लड़का है, पर इससे कोई फ़रक पड़ा तेरी मस्ती में? बोल, कैसा लगा ये लेसन?"
"सर आप बहुत अच्छा सिखाते हैं" मैं उन्हें देखकर शरमाता हुआ बोला.
’और दिखने में कैसा लगता हूं? कि लड़का हूं इसलिये अच्छा नहीं लगता?" चौधरी सर ने मेरे लंड के सुपाड़े को चूमते हुए पूछा.
"नहीं सर, बहुत प्यारे लगते हैं, मैडम जैसे ही. कितने हैंडसम हैं आप" मैं अब हाथ को मेरी गोद में झुके उनके सिर के घने बालों में चला रहा था.
अब तक मेरे लंड में फ़िर गुदगुदी होने लगी थी और वह सिर उठाने लगा था. देख कर चौधरी सर ने उसे फ़िर मुंह में ले लिया और चूसने लगे. एक हाथ से वे अब मेरे पैर के तलवे में गुदगुदी कर रहे थे. मेरा जल्द ही पूरा खड़ा हो गया.
"तो ये पाठ पसंद आया तुझे?" चौधरी सर उठ कर सोफ़े पर बैठकर मुझे फ़िर बांहों में भरके बोले. अब मेरी हिम्मत बंध गयी थी. चौधरी सर ने जिस तरह से मेरा लंड चूसा था, मैं उनका गुलाम ही हो गया था. इसलिये अब बिना हिचकिचाहट मैंने खुद ही उनके होंठ चूम लिये. "हां सर, आप बहुत अच्छे हैं सर"
"तो अब चल, पाठ में जो सीखा, कर के बता. मेरे ऊपर कर" मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने अपने तंबू पर रखते हुए कहा.
मैं बिना शरमाये सर के तंबू पर हाथ फ़िराने लगा. मेरा दिल भी अब उनका लंड देखने का कर रहा था पर थोड़ा डर भी लग रहा था कि शायद चूसना पड़ेगा!
मेरे हाथ से मस्त होकर सर बोले "हां ... बहुत अच्छे ... और चलाओ हाथ अपना अनिल ... लगता है ऐसा ही करते हो क्लास में क्यों? तभी तजुर्बा है लगता है ... बदमाश कहीं के!"
दो मिनिट बाद सर बोले "अब ज़िप खोलो बेटे, मेरा लंड बाहर निकालो"
मैंने ज़िप खोली. अंदर सर ने जांघिया पहना था और लंड खड़ा हो कर अपने आप स्लिट से बाहर आ गया था. ज़िप खोलते ही पूरा टन्न से बाहर आ गया.
"बाप रे ..." मेरे मुंह से निकल आया.
"क्या हुआ?" चौधरी सर मुस्करा रहे थे.
"बहुत बड़ा है सर, मुझे पता नहीं था कि किसीका इतना बड़ा होता है" सर के तन्ना कर खड़े लंड की ओर आंखें फ़ाड़ कर देखता हुआ मैं बोला.
"अच्छा लगा तुझे? ठीक से देख, हाथ में ले" सर बोले.
मैंने लंड हाथ में लिया.
"कैसा है, पूरा वर्णन करके बता"
"सर ऐसा लगता है जैसा गोरा मोटा मूसल है, गन्ने जैसा रसीला लगता है" मैं बोला.
"हां, और बोल" मस्त होकर सर बोले.
"सर नसें उभरी हुई हैं, एकदम मस्त दिखती हैं सर. और सर ये गोल गोल ...."
"इसे क्या कहते हैं बोल? मालूम होगा तुझे, अगर नहीं मालूम है तो एक तमाचा मारूंगा" सर मस्ती भरी आवाज में बोले.
"सुपाड़ा सर"
"ये हुई ना बात. तो बोल, कैसा है सुपाड़ा?"
"सर ....किसी टमाटर जैसा रसीला लग रहा है, लाल लाल फ़ूला हुआ. कभी रसीले सेब जैसा लगता है."
"और ?"
"सर स्किन ऐसे तनी है जैसे हवा भरा गुब्बारा ... कैसी मखमल सी लगती है ये गुलाबी स्किन ..."
"चल अब ठीक से पकड़" चौधरी सर ने कहा. मैंने लंड को दो मुठ्ठियों में लिया, फ़िर भी पूरा नहीं आया, डंडे का दो इंच भाग और सुपाड़ा मेरी ऊपर की मुठ्ठी के बाहर निकले थे.
"सर बहुत बड़ा है सर, दो हथेली में भी पकड़ाई में नहीं आता है. सर .... नाप के देखूं?" मैंने उसुकता से पूछा.
क्रमशः। ...........................
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