FUN-MAZA-MASTI
ट्यूशन का मजा-5
गतांक से आगे.............................
सर अब मेरे लाड़ करने लगे. कभी मेरे गाल पुचकारते, कभी मेरे बालों को प्यार से बिखराते पर अपने लंड को अब वे खुद नहीं छू रहे थे, हाथ दूर रखे थे. "हां .... हां अनिल बेटे .... बहुत अच्छे मेरे बच्चे .... तू तो बिना सिखाये ही फ़र्स्ट आ रहा है इस लेसन में .... तेरी परीक्षा है वो यह कि बिना मेरे हाथ लगाये ... याने सिर्फ़ तू ही करेगा मेरे लंड से खेल ... कितनी देर में तू मुझे दिलासा देता है .... तू कर लेगा अनिल.... कला है तुझमें ...थोड़ा और निगल बेटे .... जरा और अंदर ले मेरा लंड .... हां ऐसे ही .... और .... और ले...तेरा मुंह तो मखमली है मेरे बेटे ... क्या नरम नरम है ... ओह ... आह ... बहुत प्यारा है तू अनिल .... हीरा है हीरा ...." सर का लंड और निगलने के चक्कर में मुझे खांसी आ गयी तो वे बोले "अब नहीं होता और तो रहने दे .... बाद में सिखा दूंगा .... अब जरा मेरे लंड को पकड़कर मुठ्ठ मार .... तेरा प्रसाद तेरे लिये तैयार है बेटे... निकाल ले उसे बाहर"
मैं सर के लंड के डंडे को पकड़कर मुठियाता हुआ उनकी मुठ्ठ मारने लगा. साथ ही मुंह में लिये सुपाड़े को और कस के तालू और जीभ में दबाया और चूसने लगा. सर ऊपर नीचे होने लगे, मेरे मुंह को अपने लंड से चोदने की कोशिश करने लगे. मैं लगातार मुठ्ठी ऊपर नीचे करके उनको हस्तमैथुन करा रहा था.
"ओह ऽ.. हां ऽ मेरे राजा ऽ ... आह ऽ " करके सर ने मेरे सिर को पकड़ लिया. उनका लंड अब उछल उछल कर झड़ने लगा था. मेरे मुंह में गरम गरम चिपचिपे वीर्य की फ़ुहार निकल पड़ी. मैं आंखें बंद करके पीता रहा. अब मेरा सारा परहेज खतम हो गया था. मजा आ रहा था. सर को ऐसे मीठा तड़पा दिया यह सोच कर गर्व सा लग रहा था. चिपचिपा वीर्य मेरे तालू से चिपक गया था पर ऐसा लग रहा था जैसे थोड़ा नमक मिली जरा सी कसैली मलाई हो. चार पांच बड़े चम्मच जितना वीर्य निकला सर के लंड से, मैं सब निगल गया. सोच रहा था कि कटोरी भर होता तो और मजा आता.
आखिर सर ने मेरे मुंह से लंड निकाला. मुझे ऊपर खींच कर गोद में ले लिया और एक गहरा चुंबन लेकर बोले "बहुत अच्छे अनिल, तू तो अव्वल नंबर है इस लेसन में. वैसे इस लेसन के और भी भाग हैं, वो मैं तुझे सिखा दूंगा. पर आज जो तूने किया उसके लिये शाब्बास बेटे. अब बता, स्वाद आया? मजा आया?" मैंने पलकें झपकाकर हां कहा क्योंकि मैं अब भी चटखारे ले लेकर जीभ से लिपटे चिपचिपे कतरों का स्वाद ले रहा था
मुझे अच्छा भी लग रहा था सर के मुंहसे तारीफ़ सुनकर. मेरा लंड भी अब मस्त खड़ा था. डर भी निकल गया था इसलिये मैं उनकी गोद में उनकी ओर मुड़ कर बैठ गया और शर्ट के ऊपर से ही उनके पेट पर लंड रगड़ने लगा. चूमाचाटी चलती रही. सर अब बड़ी प्यार भरी आंखों से मेरी ओर देख रहे थे. मैंने सर का लंड अब भी कस कर हाथ में पकड रखा था. वह धीरे धीरे फ़िर से लंबा होने लगा.
कुछ देर बाद वे उठे और बोले "चलो, अब जरा देखते हैं कि तेरी दीदी का पाठ खतम हुआ कि नहीं. वैसे ये बता कि मजा आया? ... याने प्रसाद कैसा लगा? स्वाद आया या नहीं?"
"अच्छा लग रहा था सर. कितना चिपचिपा था? चिपकता था तालू में! खारा खारा सा है सर ... जैसे मलाई में नमक मिला दिया हो. सर .... एक बात पूछूं सर?" मैंने उनके पीछे चलते हुए कहा. वे मेरे लंड को लगाम सा पकड़ कर खींचते हुए मुझे दूसरे कमरे में ले जा रहे थे.
"सर अब कल से .... याने फ़िर से आप ... मतलब सर ...." मैं थोड़ा शरमा गया.
"बोलो बोलो अब डरने की कोई बात नहीं है, तुम दोनों ने साबित कर दिया है कि कितने अच्छे स्टूडेंट हो. अब मैडम और मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है ... हां ऐसे ही कहा मानना पड़ेगा अब रोज. बोलो तुम क्या पूछ रहे थे?"
"सर अब रोज ऐसे ही ... याने ऐसे ही लेसन होंगे क्या?" मैंने पूछा.
"हां होंगे तो? पसंद नहीं आये?" सर ने पूछा.
"नहीं सर, अच्छे लगे, बहुत मजा आया. इसलिये पूछ रहा था"
"चलो तूम्हारी दीदी से भी पूछ लेते हैं. और इसका क्या करें?" मेरे लंड को पकड़कर वे बोले "ये तेरा तो फ़िर से खड़ा हो गया है. इसे ऐसे घर भेजना ठीक नहीं है, रात को फ़िर शैतानी करने लगोगे तुम भाई बहन" कहते हुए सर दरवाजा खोल कर अंदर घुस गये.
अंदर मैडम पलंग पर लेट कर दीदी की चूत चूस रही थीं. उनकी ब्रा गायब थी और प्यारे प्यारे छोटे छोटे मम्मे नंगे थे. उनकी साड़ी कमर के ऊपर थी और उनकी गोरी छरहरी जांघें फ़ैली हुई थीं. गोरी बुर एकदम चिकनी थी, शायद शेव की हुई थी. दीदी के फ़्रॉक के दो बटन खुले थे और दीदी की जरा जरा सी कड़क चूंचियां दिख रही थीं. दीदी टांगें फ़ैलाकर सिरहाने से टिक कर मैडम के सामने बैठी थी और ’ओह ... ओह मैडम ... हां मैडम .... प्लीज़ मैडम" कर रही थी. उसने हाथों में मैडम का सिर पकड़ रखा था जिसे वह बुर पर दबाये हुए थी. मैडम का एक हाथ अपनी बुर पर था और वे उसमें उंगली कर रही थीं. जीभ निकालकर वे दीदी की बुर पूरी ऊपर से नीचे तक चाट रही थीं.
क्रमशः। ...........................
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ट्यूशन का मजा-5
गतांक से आगे.............................
"बिलकुल
देख. इसे कहते हैं असली स्टूडेंट! हर चीज की उत्सुकता होनी चाहिये. इस पाठ
में तू अच्छा करेगा अनिल. जा, उस ड्रावर में से टेप ले आ"
मैं टेप ले आया.
"पहले खुद का नाप. बता कितना है?"
मैंने अकेले में कई बार नापा था फ़िर भी सर के सामने फ़िर से नापा. "सर, पांच इंच से ज्यादा है पर साढ़े पांच इंच के नीचे है"
"चल ठीक है, अब मेरा नाप. यहां नीचे से लगा, जड़ से और ऊपर तक ले जा. कितना है?"
"सर पौने आठ इंच है सर. ठहरिये सर फ़िर से देखता हूं" कहकर मैंने फ़िर टेप ठीक से लगायी "आठ इंच है सर! कितना बड़ा है!! इतना मोटा और लंबा!" मैं सुपाड़े को हथेली में भरकर बोला. "दूर से तो ऐसा लगता है जैसे फुट भर का हो"
"अब मोटाई देख. ऐसे नहीं मूरख, पाई सिखाया है ना तुझे? याद है ना? नहीं तो मारूंगा. टेप को डंडे में लपेट और देख. फ़िर मोटाई बता" सर ने कहा.
मैंने डंडे के चारों ओर टेप लपेटी. "सर सवा छह इंच के करीब है. याने ...."
"जल्दी बता .... सर्कमफ़्रेंस अगर साढ़े छह इंच है तो डायमीटर कितना है" मैं हिसाब लगाने लगा. "३.१४ से भाग करके .... कितना होगा .... ?" मैं बुदबुदाया. सिर चकराने लगा.
चौधरी सर ने मेरी पीठ में एक घूंसा मारा, हल्के से. "अरे मूरख, यहां क्या पेपर पेन्सिल लेकर गुणा भाग करेगा? पाई बराबर ३ समझ ले, अब बता"
"सर दो से जरा सा ज्यादा हुआ. याने आपका लंड दो इंच से थोड़ा ज्यादा मोटा है" मैं बोला.
"बहुत अच्छे. अब सुपाड़ा नाप" सर खुश होकर बोले. सुपाड़े के चारों ओर टेप लपेटी तो साढ़े सात इंच नाप आया. मैंने झट तीन से भागा" सर, अढ़ाई इंच के करीब है, बाप रे कितना मोटा है सुपाड़ा, लगता है जैसे आधे पाव का एक टमाटर हो" मेरे मुंह से निकल पड़ा.
"देखा ना, कैसा लगा सर का लंड अब बता?" सर बड़े गर्व से बोले. वे अब खुद ही अपने लंड को सहला रहे थे.
"सर बहुत .... बहुत .... मतवाला है सर. बहुत सुंदर, बहुत .... रसीला लगता है सर और कितना मजबूत और जानदार है सर"
"मान गया ना? अरे मेरा लंड ऐसा है कि किसी को भी स्वर्ग की सैर करवा दे, बस सैर करने वाला शौकीन होना चाहिये. रस चखेगा इसका? बोल?"
"हां सर, लगता है कि अभी चबा चबा कर खा जाऊं सर"
"तो शुरू हो जा. खेल उससे, उसे मस्त कर, स्वाद देख. याद है वह सब करना है जो मैंने किया था" सर पीछे टिक कर बैठते हुए बोले.
मैं टेप ले आया.
"पहले खुद का नाप. बता कितना है?"
मैंने अकेले में कई बार नापा था फ़िर भी सर के सामने फ़िर से नापा. "सर, पांच इंच से ज्यादा है पर साढ़े पांच इंच के नीचे है"
"चल ठीक है, अब मेरा नाप. यहां नीचे से लगा, जड़ से और ऊपर तक ले जा. कितना है?"
"सर पौने आठ इंच है सर. ठहरिये सर फ़िर से देखता हूं" कहकर मैंने फ़िर टेप ठीक से लगायी "आठ इंच है सर! कितना बड़ा है!! इतना मोटा और लंबा!" मैं सुपाड़े को हथेली में भरकर बोला. "दूर से तो ऐसा लगता है जैसे फुट भर का हो"
"अब मोटाई देख. ऐसे नहीं मूरख, पाई सिखाया है ना तुझे? याद है ना? नहीं तो मारूंगा. टेप को डंडे में लपेट और देख. फ़िर मोटाई बता" सर ने कहा.
मैंने डंडे के चारों ओर टेप लपेटी. "सर सवा छह इंच के करीब है. याने ...."
"जल्दी बता .... सर्कमफ़्रेंस अगर साढ़े छह इंच है तो डायमीटर कितना है" मैं हिसाब लगाने लगा. "३.१४ से भाग करके .... कितना होगा .... ?" मैं बुदबुदाया. सिर चकराने लगा.
चौधरी सर ने मेरी पीठ में एक घूंसा मारा, हल्के से. "अरे मूरख, यहां क्या पेपर पेन्सिल लेकर गुणा भाग करेगा? पाई बराबर ३ समझ ले, अब बता"
"सर दो से जरा सा ज्यादा हुआ. याने आपका लंड दो इंच से थोड़ा ज्यादा मोटा है" मैं बोला.
"बहुत अच्छे. अब सुपाड़ा नाप" सर खुश होकर बोले. सुपाड़े के चारों ओर टेप लपेटी तो साढ़े सात इंच नाप आया. मैंने झट तीन से भागा" सर, अढ़ाई इंच के करीब है, बाप रे कितना मोटा है सुपाड़ा, लगता है जैसे आधे पाव का एक टमाटर हो" मेरे मुंह से निकल पड़ा.
"देखा ना, कैसा लगा सर का लंड अब बता?" सर बड़े गर्व से बोले. वे अब खुद ही अपने लंड को सहला रहे थे.
"सर बहुत .... बहुत .... मतवाला है सर. बहुत सुंदर, बहुत .... रसीला लगता है सर और कितना मजबूत और जानदार है सर"
"मान गया ना? अरे मेरा लंड ऐसा है कि किसी को भी स्वर्ग की सैर करवा दे, बस सैर करने वाला शौकीन होना चाहिये. रस चखेगा इसका? बोल?"
"हां सर, लगता है कि अभी चबा चबा कर खा जाऊं सर"
"तो शुरू हो जा. खेल उससे, उसे मस्त कर, स्वाद देख. याद है वह सब करना है जो मैंने किया था" सर पीछे टिक कर बैठते हुए बोले.
अगले
दस मिनिट मैं चौधरी सर के लंड से खेलता रहा. उसे तरह तरह से हाथ में लिया,
दबाया, रगड़ा, पुचकारा, अपने गाल और माथे पर रगड़ा. फ़िर सर के सामने जमीन पर
बैठ कर चाटने लगा.
"आ ऽ ह ऽ ... अब आया मजा मेरे बेटे. ऊपर से नीचे तक चाट! कुत्ते चाटते हैं ना वैसे, पूरी जीभ सटा के!" सर मस्त होकर बोले.
सर का लंड चाटने में बहुत मजा आ रहा था. पर मन सुपाड़े का स्वाद लेने को करता था. मैंने लंड को फ़िर से मुठ्ठी में पकड़ा और सुपाड़े की सतह पर जीभ फ़िराने लगा जैसे आइसक्रीम का कोन हो. एकदम मुलायम रेशमी चमड़ी थी, तनी हुई! लगता है कि मेरे नौसिखिये होने के बावजूद सर को मजा आ गया क्योंकि वे ऊपर नीचे होने लगे "हां .... हां बेटे ... और चाट .... वो नोक पर छेद देखता है ना .... वहां जीभ लगा"
मैंने देखा कि सुपाड़े के बीचे के मूतने के छेद पर एक सफ़ेद मोती सा छलक आया था. "सर वहां तो ...." मैंने हिचकते हुए कहा.
"वहां क्या .... बोल .... बोल... क्या है वहां?" सर ने मेरे बाल पकड़कर कहा.
"सर वीर्य की बूंद है"
"अब उसका क्या करना है? बोलो बोलो अनिल ... उसका क्या करना है?" उन्होंने कड़ी आवाज में पूछा. फ़िर खुद ही बोले "उसे चाटना है, स्वाद लेना है, अंदर के खजाने का कैसा जायका है यह आजमाना है. समझा ना?"
जवाब में मैंने हिचकते हुए उसे बूंद को जीभ से टीप लिया. खारा सा कसैला सा स्वाद था. मुझे अच्छा लगा. मैंने सुपाड़े का आधा हिस्सा मुंह में लिया और चूसने लगा. सर "ओह ...ओह" करने लगे. फ़िर मेरे बाल खींच कर बोले "अरे मूरख दांत क्यों लगा रहा है? पर चल कोई बात नहीं, उससे भी मुझे मजा आ रहा है ... हां .... हां .... ऐसे ही बेटे"
"सर ... मुंह में ठीक से लेकर चूसूं सर?" मैंने पूछा. सर तो तैयार ही बैठे थे. मेरे कान पकड़कर बोले "तो और क्या कह रहा हूं मैं तब से नालायक लड़के?"
"सर ... बहुत बड़ा है सर. मुंह में नहीं आयेगा" मैंने हिचकते हुए कहा.
"पूरा मुंह खोल, फ़िर आयेगा. मैं मदद करता हूं चल. पर पहले बता. मुंह में लेकर क्या करेगा?"
"सर चूसूंगा"
"कैसे चूसेगा?"
"सर कुल्फ़ी चूसते हैं वैसे चूसूंगा."
"कब तक चूसेगा?" सर मेरे बाल सहलाते हुए बोले.
"जब तक आप झड़ नहीं जाते सर"
"झड़ने के बाद क्या करेगा? वीर्य थूक डालेगा, है ना? अच्छे बच्चे ऐसा ही करते हैं ना? बोल ... जल्दी बोल!" सर ने मेरी आंखों में देख कर कहा.
"नहीं सर" हिचकिचाते हुए मैंने कहा "निगल जाऊंगा सर"
"क्या समझ कर? बोलो बोलो क्या समझ कर?"
मैं चुप रहा. समझ में नहीं आ रहा था क्या कहूं. सर ने फ़िर कड़ाई के स्वर में पूछा "बोलो अनिल. क्या समझकर निगलोगे अपने सर का वीर्य? कड़वी दवाई समझ कर?"
"नहीं सर." मैं बोल पड़ा "आप का प्रसाद समझकर"
सर खुश हो गये. झुक कर मुझे चूम लिया "ये बोला ना अब ठीक से. अरे तेरे टीचर का प्रसाद है ये, बेशकीमती, मेरा शिष्य बनकर रहेगा तो बहुत ऐश करेगा. अब चल जल्दी मुंह खोल"
मैंने मुंह खोला. सर ने सुपाड़ा होंठों के बीच फ़िट कर दिया. फ़िर मेरे गाल पिचकाकर मेरा मुंह और खोला और सुपाड़ा अंदर सरका दिया. मेरे मुंह में सर का वो बड़ा सुपाड़ा पूरा भर गया. मैं आंखें बंद करके चूसने लगा. अब बहुत अच्छा लग रहा था. सुपाड़े में से बड़ी भीनी भीनी खुशबू आ रही थी. मैं जीभ से रगड़ रगड़ कर और तालू से सुपाड़े को चिपकाकर लड्डू जैसे चूसने लगा.
"आ ऽ ह ऽ ... अब आया मजा मेरे बेटे. ऊपर से नीचे तक चाट! कुत्ते चाटते हैं ना वैसे, पूरी जीभ सटा के!" सर मस्त होकर बोले.
सर का लंड चाटने में बहुत मजा आ रहा था. पर मन सुपाड़े का स्वाद लेने को करता था. मैंने लंड को फ़िर से मुठ्ठी में पकड़ा और सुपाड़े की सतह पर जीभ फ़िराने लगा जैसे आइसक्रीम का कोन हो. एकदम मुलायम रेशमी चमड़ी थी, तनी हुई! लगता है कि मेरे नौसिखिये होने के बावजूद सर को मजा आ गया क्योंकि वे ऊपर नीचे होने लगे "हां .... हां बेटे ... और चाट .... वो नोक पर छेद देखता है ना .... वहां जीभ लगा"
मैंने देखा कि सुपाड़े के बीचे के मूतने के छेद पर एक सफ़ेद मोती सा छलक आया था. "सर वहां तो ...." मैंने हिचकते हुए कहा.
"वहां क्या .... बोल .... बोल... क्या है वहां?" सर ने मेरे बाल पकड़कर कहा.
"सर वीर्य की बूंद है"
"अब उसका क्या करना है? बोलो बोलो अनिल ... उसका क्या करना है?" उन्होंने कड़ी आवाज में पूछा. फ़िर खुद ही बोले "उसे चाटना है, स्वाद लेना है, अंदर के खजाने का कैसा जायका है यह आजमाना है. समझा ना?"
जवाब में मैंने हिचकते हुए उसे बूंद को जीभ से टीप लिया. खारा सा कसैला सा स्वाद था. मुझे अच्छा लगा. मैंने सुपाड़े का आधा हिस्सा मुंह में लिया और चूसने लगा. सर "ओह ...ओह" करने लगे. फ़िर मेरे बाल खींच कर बोले "अरे मूरख दांत क्यों लगा रहा है? पर चल कोई बात नहीं, उससे भी मुझे मजा आ रहा है ... हां .... हां .... ऐसे ही बेटे"
"सर ... मुंह में ठीक से लेकर चूसूं सर?" मैंने पूछा. सर तो तैयार ही बैठे थे. मेरे कान पकड़कर बोले "तो और क्या कह रहा हूं मैं तब से नालायक लड़के?"
"सर ... बहुत बड़ा है सर. मुंह में नहीं आयेगा" मैंने हिचकते हुए कहा.
"पूरा मुंह खोल, फ़िर आयेगा. मैं मदद करता हूं चल. पर पहले बता. मुंह में लेकर क्या करेगा?"
"सर चूसूंगा"
"कैसे चूसेगा?"
"सर कुल्फ़ी चूसते हैं वैसे चूसूंगा."
"कब तक चूसेगा?" सर मेरे बाल सहलाते हुए बोले.
"जब तक आप झड़ नहीं जाते सर"
"झड़ने के बाद क्या करेगा? वीर्य थूक डालेगा, है ना? अच्छे बच्चे ऐसा ही करते हैं ना? बोल ... जल्दी बोल!" सर ने मेरी आंखों में देख कर कहा.
"नहीं सर" हिचकिचाते हुए मैंने कहा "निगल जाऊंगा सर"
"क्या समझ कर? बोलो बोलो क्या समझ कर?"
मैं चुप रहा. समझ में नहीं आ रहा था क्या कहूं. सर ने फ़िर कड़ाई के स्वर में पूछा "बोलो अनिल. क्या समझकर निगलोगे अपने सर का वीर्य? कड़वी दवाई समझ कर?"
"नहीं सर." मैं बोल पड़ा "आप का प्रसाद समझकर"
सर खुश हो गये. झुक कर मुझे चूम लिया "ये बोला ना अब ठीक से. अरे तेरे टीचर का प्रसाद है ये, बेशकीमती, मेरा शिष्य बनकर रहेगा तो बहुत ऐश करेगा. अब चल जल्दी मुंह खोल"
मैंने मुंह खोला. सर ने सुपाड़ा होंठों के बीच फ़िट कर दिया. फ़िर मेरे गाल पिचकाकर मेरा मुंह और खोला और सुपाड़ा अंदर सरका दिया. मेरे मुंह में सर का वो बड़ा सुपाड़ा पूरा भर गया. मैं आंखें बंद करके चूसने लगा. अब बहुत अच्छा लग रहा था. सुपाड़े में से बड़ी भीनी भीनी खुशबू आ रही थी. मैं जीभ से रगड़ रगड़ कर और तालू से सुपाड़े को चिपकाकर लड्डू जैसे चूसने लगा.
सर अब मेरे लाड़ करने लगे. कभी मेरे गाल पुचकारते, कभी मेरे बालों को प्यार से बिखराते पर अपने लंड को अब वे खुद नहीं छू रहे थे, हाथ दूर रखे थे. "हां .... हां अनिल बेटे .... बहुत अच्छे मेरे बच्चे .... तू तो बिना सिखाये ही फ़र्स्ट आ रहा है इस लेसन में .... तेरी परीक्षा है वो यह कि बिना मेरे हाथ लगाये ... याने सिर्फ़ तू ही करेगा मेरे लंड से खेल ... कितनी देर में तू मुझे दिलासा देता है .... तू कर लेगा अनिल.... कला है तुझमें ...थोड़ा और निगल बेटे .... जरा और अंदर ले मेरा लंड .... हां ऐसे ही .... और .... और ले...तेरा मुंह तो मखमली है मेरे बेटे ... क्या नरम नरम है ... ओह ... आह ... बहुत प्यारा है तू अनिल .... हीरा है हीरा ...." सर का लंड और निगलने के चक्कर में मुझे खांसी आ गयी तो वे बोले "अब नहीं होता और तो रहने दे .... बाद में सिखा दूंगा .... अब जरा मेरे लंड को पकड़कर मुठ्ठ मार .... तेरा प्रसाद तेरे लिये तैयार है बेटे... निकाल ले उसे बाहर"
मैं सर के लंड के डंडे को पकड़कर मुठियाता हुआ उनकी मुठ्ठ मारने लगा. साथ ही मुंह में लिये सुपाड़े को और कस के तालू और जीभ में दबाया और चूसने लगा. सर ऊपर नीचे होने लगे, मेरे मुंह को अपने लंड से चोदने की कोशिश करने लगे. मैं लगातार मुठ्ठी ऊपर नीचे करके उनको हस्तमैथुन करा रहा था.
"ओह ऽ.. हां ऽ मेरे राजा ऽ ... आह ऽ " करके सर ने मेरे सिर को पकड़ लिया. उनका लंड अब उछल उछल कर झड़ने लगा था. मेरे मुंह में गरम गरम चिपचिपे वीर्य की फ़ुहार निकल पड़ी. मैं आंखें बंद करके पीता रहा. अब मेरा सारा परहेज खतम हो गया था. मजा आ रहा था. सर को ऐसे मीठा तड़पा दिया यह सोच कर गर्व सा लग रहा था. चिपचिपा वीर्य मेरे तालू से चिपक गया था पर ऐसा लग रहा था जैसे थोड़ा नमक मिली जरा सी कसैली मलाई हो. चार पांच बड़े चम्मच जितना वीर्य निकला सर के लंड से, मैं सब निगल गया. सोच रहा था कि कटोरी भर होता तो और मजा आता.
आखिर सर ने मेरे मुंह से लंड निकाला. मुझे ऊपर खींच कर गोद में ले लिया और एक गहरा चुंबन लेकर बोले "बहुत अच्छे अनिल, तू तो अव्वल नंबर है इस लेसन में. वैसे इस लेसन के और भी भाग हैं, वो मैं तुझे सिखा दूंगा. पर आज जो तूने किया उसके लिये शाब्बास बेटे. अब बता, स्वाद आया? मजा आया?" मैंने पलकें झपकाकर हां कहा क्योंकि मैं अब भी चटखारे ले लेकर जीभ से लिपटे चिपचिपे कतरों का स्वाद ले रहा था
मुझे अच्छा भी लग रहा था सर के मुंहसे तारीफ़ सुनकर. मेरा लंड भी अब मस्त खड़ा था. डर भी निकल गया था इसलिये मैं उनकी गोद में उनकी ओर मुड़ कर बैठ गया और शर्ट के ऊपर से ही उनके पेट पर लंड रगड़ने लगा. चूमाचाटी चलती रही. सर अब बड़ी प्यार भरी आंखों से मेरी ओर देख रहे थे. मैंने सर का लंड अब भी कस कर हाथ में पकड रखा था. वह धीरे धीरे फ़िर से लंबा होने लगा.
कुछ देर बाद वे उठे और बोले "चलो, अब जरा देखते हैं कि तेरी दीदी का पाठ खतम हुआ कि नहीं. वैसे ये बता कि मजा आया? ... याने प्रसाद कैसा लगा? स्वाद आया या नहीं?"
"अच्छा लग रहा था सर. कितना चिपचिपा था? चिपकता था तालू में! खारा खारा सा है सर ... जैसे मलाई में नमक मिला दिया हो. सर .... एक बात पूछूं सर?" मैंने उनके पीछे चलते हुए कहा. वे मेरे लंड को लगाम सा पकड़ कर खींचते हुए मुझे दूसरे कमरे में ले जा रहे थे.
"सर अब कल से .... याने फ़िर से आप ... मतलब सर ...." मैं थोड़ा शरमा गया.
"बोलो बोलो अब डरने की कोई बात नहीं है, तुम दोनों ने साबित कर दिया है कि कितने अच्छे स्टूडेंट हो. अब मैडम और मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है ... हां ऐसे ही कहा मानना पड़ेगा अब रोज. बोलो तुम क्या पूछ रहे थे?"
"सर अब रोज ऐसे ही ... याने ऐसे ही लेसन होंगे क्या?" मैंने पूछा.
"हां होंगे तो? पसंद नहीं आये?" सर ने पूछा.
"नहीं सर, अच्छे लगे, बहुत मजा आया. इसलिये पूछ रहा था"
"चलो तूम्हारी दीदी से भी पूछ लेते हैं. और इसका क्या करें?" मेरे लंड को पकड़कर वे बोले "ये तेरा तो फ़िर से खड़ा हो गया है. इसे ऐसे घर भेजना ठीक नहीं है, रात को फ़िर शैतानी करने लगोगे तुम भाई बहन" कहते हुए सर दरवाजा खोल कर अंदर घुस गये.
अंदर मैडम पलंग पर लेट कर दीदी की चूत चूस रही थीं. उनकी ब्रा गायब थी और प्यारे प्यारे छोटे छोटे मम्मे नंगे थे. उनकी साड़ी कमर के ऊपर थी और उनकी गोरी छरहरी जांघें फ़ैली हुई थीं. गोरी बुर एकदम चिकनी थी, शायद शेव की हुई थी. दीदी के फ़्रॉक के दो बटन खुले थे और दीदी की जरा जरा सी कड़क चूंचियां दिख रही थीं. दीदी टांगें फ़ैलाकर सिरहाने से टिक कर मैडम के सामने बैठी थी और ’ओह ... ओह मैडम ... हां मैडम .... प्लीज़ मैडम" कर रही थी. उसने हाथों में मैडम का सिर पकड़ रखा था जिसे वह बुर पर दबाये हुए थी. मैडम का एक हाथ अपनी बुर पर था और वे उसमें उंगली कर रही थीं. जीभ निकालकर वे दीदी की बुर पूरी ऊपर से नीचे तक चाट रही थीं.
क्रमशः। ...........................
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