FUN-MAZA-MASTI
बदनाम रिश्ते
गतान्क से आगे..............
दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी का पच्चीसवाँ पार्ट लेकर हाजिर हूँ
मिन्नी तेज़ गति से चलते हुए बाबूजी के कमरे में आई और बच्चे को उनसे ले लिया. बच्चे को ढूढ़ पिलाने के लिए अपने कमरे में जाने के लए मूडी तो अचानक उसके मंन में कुच्छ आया और वो वहीं बाबूजी के कमरे का दरवाज़ा बंद करके ईज़ी चेर पे बैठ गई. अपना ब्लाउस ढीला करते हुए उसने अपनी राइट चूची निकाली और दूध से नम हुई निपल को बच्चे के मूह में डाल दिया. बाबूजी जो की कुच्छ फाइल्स देख रहे थे थोड़ा सकपका गए. सरला के घर में रहते हुए मिन्नी उनके कमरे में ऐसी अवस्था में बैठी हुई थी तो उन्हे थोड़ी सी घबराहट हुई.
''बहू तू अपने कमरे में चली जा. कहीं समधन जी ना जाग जाएँ..फिर अच्छा नही होगा. '' बाबूजी ने करीब करीब आदेश दिया.
''बाबूजी आप चिंता ना करें. दरवाज़ा बंद है और अगर सरला आंटी आई भी तो मैं इसे दूध पिलाना बंद कर दूँगी. उनके आने पे मैं अपने कमरे में चली जाउन्गि. पर अभी मुझे आपसे कुच्छ बातें करनी हैं. कुच्छ ऐसी बातें जो हमारे भविश्य से जुड़ी हैं.'' मिन्नी ने बाबूजी की ओर देखते हुए अपनी दूसरी चूची भी ब्लाउस से बाहर निकाल दी. फिर बच्चे को पलट के दूसरी चूची का निपल उसके मूह में भर दिया.
बाबूजी जो कि स्टडी टेबल की कुर्सी पे बैठे हुए काम करने की कोशिश कर रहे थे अब हल्का सा मूड़ के मिन्नी को देखने लगे. मिन्नी के मम्मे अभी भी पहले जैसे ही लग रहे थे. सरला की तेल मालिश का आइडिया बहुत ही अच्छा रिज़ल्ट दे रहा था. बच्चे का छोड़ा हुआ निपल एक दम कड़क था और चमक रहा था. मिन्नी डाइरेक्ट्ली बाबूजी को नही देख रही थी. बच्चे की ओर देखते हुए उसने बाबूजी को संबोधित किया था. उसके चेहरे पे अभी किसी भी तरीके के भाव नही थे पर उसकी जवानी का भोला पन अब थोड़ा मेचुरिटी में बदल चुका था. बाबूजी के सामने एक परिपक्व चुदी चुदाई मेच्यूर मिलफ (मोम आइ वुड लाइक टू फक) थी. बाबूजी का लंड अपने आप हरकत में आने लगा. मूह में अपने चश्में की दांडी को दबाए बाबूजी मिन्नी की खूबसूरती को निहार रहे थे. आज से करीब साल पहले यही मम्मे उनके मूह की और लंड की शोभा बढ़ाते थे. वक्त बदल गया था और सब कुच्छ एक अरसे जैसा लगता था पर मिन्नी की कामुकता अभी भी बरकरार थी और उसके चूचों का स्वाद अभी भी बाबूजी की ज़ुबान पे ....
''बोल बहू..क्या बात करनी है..??'' बाबूजी ने हल्के हाथ से अपनी धोती को अड्जस्ट किया. लंड टेंट बनाने को तैयार हो रहा था.
''बाबूजी मुझे पुछ्ना था कि क्या अब हमारा परिवार पहले जैसा नही हो पाएगा..??? क्या जिस तरीके के वीकेंड हम लोग मिल के मनाया करते थे अब वो नही हो पाएँगे..?? मुझे ये बात कुच्छ दिन से परेशान कर रही है. और शायद राखी और सखी को भी. पिच्छले कई दिनो से मैं राजू के साथ हल्का फूलका सेक्स करने लगी हूँ. पर उनमे शायद अभी जोश कम हो गया है या फिर कोई और बात है. मुझे अब सेक्स की भूख फिर से लगने लगी है. क्या ऐसा तो नही कि जब तक हम लोग पहले जैसे सामूहिक संभोग नही करेंगे तब तक हमारे मर्द हममे दोबारा रूचि नही लेंगे ?? बताइए बाबूजी क्योंकि अब धीरे धीरे सब्र के बाँध टूटने लगे हैं. जैसे जैसे शरीर वापिस शेप में आ रहा है वैसे वैसे ही काम वासना भी जाग रही है. '' मिन्नी के बच्चे ने अब निपल चूसना छोड़ दिया था और फिर से सो गया था. मिन्नी दोनो नंगे चूचे लिए करीब करीब आधी नंगी अवस्था में बैठे हुए बाबूजी की नज़रों से नज़रें मिलाते हुए उनसे सवाल कर रही थी. उसके चेहरे पे अब मादकता झलकने लगी थी.
बाबूजी उसका सवाल सुन कर अपनी सीट से उठे और पहले कुच्छ सोचते हुए कमरे में टहलते रहे. एक कोने से दूसरे कोने तक 2 - 3 मीं खामोश रहने के बाद वो मिन्नी के नज़दीक आए और कुर्सी के आगे खड़े हो गए. फिर ईज़ी चेर के दोनो बाजुओं पे अपने हाथ रखते हुए वो आधे झुके और मिन्नी की आँखों में आँखें डाल के उससे सवाल किया.
''तुम क्या चाहती हो बहू ?? और तुम्हे क्या लगता है कि सखी और राखी क्या चाहते हैं ?? मर्दों का मुझे पता है कि वो क्या चाहते होंगे. मर्द जात तो कुत्ति चीज़ है जहाँ भी मौका मिलेगा तो मूह मारेगा. इन तीनो को अगर फ़ैसला लेना हो तो ये तो एक दूसरे के बेडरूम में घुस जाएँ. सबसे ज़ियादा चेंज तो तुम 3नो बहुओं में आया है. शादी से पहले तुम लोग कच्ची कलियाँ थी. फिर फूल बनी और अब तुम फल देने वाले पेड़ बन चुकी हो. तुम लोग बताओ कि क्या करना है. फिर मैं सोचूँगा.'' बाबूजी की आँखें एक पल के लए भी मिन्नी के चेहरे से हटी नही और ना ही मिन्नी की नज़रें उनकी आँखों से.
''बाबूजी मेरे फ़ैसले के लिए मेरे पास शब्द नही हैं ...है तो सिर्फ़ ये ..जो मैं अभी कर के दिखाउन्गि....'' कहते हुए मिन्नी ने बाबूजी की धोती में अपना हाथ डाल दिया. एक बार फिर से एक पुराने दोस्त से मिलने का सुखद एहसास दोनो के बदन में दौड़ने लगा. बाबूजी का आधा तना हुआ लोड्ा मिन्नी के हाथों स्पर्श पाते ही पूरा सख़्त हो गया. मिन्नी के हाथ एक बार फिर उसी लंड की नोक से खेल रहे थे जिस नोक से गाढ़ा सफेद थूक उसने अपनी टाँगों, मम्मो और मूह में ना जाने कितनी बार लिया था.
''उफ्फ बहू मुझे तेरा जवाब मिल गया....उम्म्म इससे ज़ियादा कुच्छ नही जानना मुझे...तेरा फ़ैसला क्या है ये तो मैं जान गया....''बाबूजी के बदन में एक तेज़ झुरजुरी सी दौड़ गई. पर मिन्नी की तरफ से जवाब अभी अधूरा था. उसने आगे बढ़ के बाबूजी के होठों से अपने होंठ मिलाए और उन्हे चूसने लगी. बाबूजी का मूह थोड़ा सा खुला और जीभ बाहर को आई पर फिर 2 - 3 सेकेंड में वो अंदर चली गई और होंठ सिल गए. मिन्नी का हाथ उनके लंड को पकड़े हुए था पर लंड अचानक से हल्का ढीला पड़ने लगा था. मिन्नी इससे पहले कि कुच्छ और करती या कहती बाबूजी ने उसका हाथ बाहर खींच दिया और जाके अपनी कुर्सी पे बैठ गए.
''बहू अब तू जा और रेस्ट कर. मुझे तेरा जवाब मिल गया और अब मुझे सखी और राखी से अपने तरीके से जवाब लेने हैं. उसके बाद मैं आज रात अपना फ़ैसला तुम लोगों को सुना दूँगा. अगर तुम लोगों को उस फ़ैसले से इनकार होगा तो देखेंगे. अब तुम जाओ..मैं कुच्छ सोचता हूँ. ये सरला का चक्कर भी देखना पड़ेगा..'' आख़िरी सेंटेन्स कहते हुए बाबूजी के चेहरे पे शिकन आ गई और उन्होने एक ठंडी साँस ली.
''ठीक है बाबूजी मैं जाती हूँ ..पर जाने से पहले एक बात आपको बताना ज़रूरी समझती हूँ. जिस औरत को लेके आप परेशान हो रहे हैं उस औरत के भी कुच्छ ऐसे राज़ हैं जो आपको नही पता. मैं ये यकीन से कह सकती हूँ कि अगर आपको वो बातें पता चल जाएँ तो आपकी दुविधा का अंत हो सकता है.'' मिन्नी अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए बोली.
''क्या मतलब है बहू..सॉफ सॉफ कहो...क्या तुम सरला की बात कर रही हो..?? मेरे, कंचन और तुम्हारे फुफाजी के अलावा ऐसा क्या राज़ है सरला का जो मुझे नही पता..?? बताओ मुझे.'' बाबूजी ने आदेश दिया.
''बाबूजी 2 बातें ध्यान से सोचिएगा कि बच्चों के पैदा होने से पहले सरला आंटी का चेहरा कितना खिला खिला रहता था. और उसकी वजह थी इस घर के मर्द, वो मर्द जिनमे आप शामिल नही थे सिवाए एक बार के शायद. दूसरे जब से बच्चे हुए तब से वो जैसे मुरझा गई हैं. घर के मर्दों से अलग अलग रहती हैं. आपका और उनका रिश्ता समधी समधन का है सबके सामने और कभी कभी लवर्स का पीठ पिछे. पर यहाँ इस घर में 2 या फिर शायद 3 ऐसे मर्द हैं जिन्होने सबकी पीठ पिछे उनके साथ अच्छे ख़ासे संबंध बनाए थे. बस फिलहाल मैं इतना ही कहूँगी. आप सोचिए इन बातों को और अगर कुच्छ समझ ना आए तो मुझे बुला लीजिएगा. मैं सब बता दूँगी.'' मिन्नी थोड़ा सा गुस्से में बोली. बाबूजी का लंड छुड़ाना और उसकी ऑलमोस्ट भीगी हुई चूत को अतृप्त छोड़ देना उसे अच्छा नही लगा था.
इससे पहले कि बाबूजी कुच्छ और कहते मिन्नी उनके कमरे से बाहर चल दी. बाबूजी मूह खोले अवाक उसको जाते हुए देखते रहे और फिर एक गहरी सोच में डूब गए.
शाम को एक बार फिर से ड्रॉयिंग रूम में महफ़िल जमी. सभी सदस्य एक साथ पहुँच गए. बाबूजी और मिन्नी थोड़े सीरीयस मूड में थे. सरला आस यूषुयल थोड़ा बहुत मुस्कुरा रही थी. तीनो बच्चे अपनी अपनी मा के पास थे. राजू और संजय किचन से समान ला रहे थे और सुजीत सबको ड्रिंक्स दे रहा था. आदमियो को विस्की और लॅडीस को शरबत. बच्चों को दूध पिलाने की ड्यूरेशन में तीनो बहुओं ने ड्रिंक्स पे रोक लगा रखी थी. सरला वहीं बैठी तीनो से गप्पें मार रही थी और बीच बीच में मुस्कुरा देती.
बाबूजी थोड़े शांत अपनी जगह पे बैठे सोच रहे थे. सुजीत ने उनकी ड्रिंक साइड टेबल पे रख दी और फिर किचन में चला गया. थोड़ी देर बाद सब इकट्ठे हुए, चियर्स किया और बाबूजी की तरफ देखने लगे. स्नॅक्स का दौर शुरू हुआ. बाबूजी ने एक एक करके सबको गौर से देखा. मिन्नी की नज़रों में गुस्सा और सवाल थे. राखी और सखी नॉर्मल थी. सरला भुजी भुजी थी पर अपने को कंट्रोल करके रखा हुआ था. तीनो भाई नॉर्मल हल्की फुल्की चिटचॅट कर रहे थे और बीच बीच में बच्चों से खेल रहे थे. बाबूजी ने सबको देखते हुए चुप्पी तोड़ी.
''हां तो आज हम सब यहाँ बच्चों के नाम सोचने के लिए इकट्ठे हुए हैं. पर उससे पहले मुझे आप सब से कुच्छ कहना है. सबसे पहले मैं सरला जी के लए कुच्छ कहना चाहता हूँ.
सरला जी आपको हमारे घर में आए हुए करीब 10 महीने हो रहे हैं. इन 10 महीनो में जिस प्रकार आपने मेरी बहुओं का ख़याल रखा है और इस घर के कामो को देखा है उसके लिए मैं और हम सब आपके बहुत आभारी हैं. आपने अपना घर परिवार छोड़ के यहाँ की ज़िम्मेवारियाँ ली ऐसा आजकल कोई नही करता. जब आप यहाँ आई थी तो बिना किसी झिझक के आपने इस परिवार को अपनाया और सबको भरपूर प्यार दिया. पर पिच्छले कुच्छ दिनो से मैं देख रहा हूँ कि आप उदास रहती हैं. अपने में खोई खोई रहती हैं, बहुओं और बच्चों को लेके बिज़ी रहती हैं. क्या ऐसी कोई बात है जो कि आप के मंन को चुभ गई है ? या कोई चिंता है जो कि आपको खाए जा रही है ? मुझे बताइए शायद मैं कुच्छ कर सकूँ..''
''समधी जी ऐसी कोई बात नही है..बस मुझे लगता है कि मुझे वापिस अपने घर जाना चाहिए. बच्चे अब इतने बड़े हो गए हैं कि बहुएँ उन्हे संभाल सकती हैं. मुझे अपने घर की याद सताती है सो मुझे जाने का मंन है. शायद इसी वजह से मैं कभी कभी गुम्सुम रहती हूँ. यहाँ सबके बीच रहते हुए भी कभी कभी अकेली महसूस करती हूँ.'' सरला ने थोड़ा उदास होते हुए कहा.
''ठीक है सरला जी आप जैसा ठीक समझे, वैसे एक बात ज़रूर है ....आप सच नही कह रही. कोई बात है जो आपको खाए जा रही है और वो बात आपको अपने घर जाने के बाद भी परेशान करती रहेगी...खैर आप समझदार है सो मैं और क्या कहूँ...
अब मुझे एक और ज़रूरी बात कहनी है बाकी सबसे. बच्चों आगर तुम्हे याद हो कि कुच्छ समय पहले हमने घर और काम के बटवारे को लेके कुच्छ बातें की थी. उस समय बहुएँ साथ में नही थी. तब तुम सब ने एक राई दी थी कि ऐसा कुच्छ नही होना चाहिए. हम सब एक संयुक्त परिवार है और रहेंगे. पर मुझे बहुत दुख के साथ ये डिसिशन लेना पड़ रहा है कि जैसा मैने सोचा था वैसा बटवारा अब करने का समय आ गया है. '' बाबूजी की बात जैसे बॉम्ब की तरह पड़ी. सबके चेहरे परेशान थे और मूह खुले के खुले. यहाँ तक की सरला भी हैरान थी.
''बाबूजी ये ..ये आप क्या कह रहे हैं बाबूजी....ये सब...अचानक..ऐसा क्यों बाबूजी...क्या हमसे कोई ग़लती हो गई..क्या हुआ प्लीज़ बताइए ..प्लीज़ ऐसा फ़ैसला ना लीजिए ..बोलिए बाबूजी...क्या ग़लती हुई या क्या बात है...'' राजू घर का सबसे बड़ा लड़का एक छ्होटे बच्चे की तरह बिखाल उठा. ऐसा लग रहा था कि वो अभी बोलते हुए फूट पड़ेगा. उसकी ये हालत देख के बाबूजी का मन भी एक बार के लिए डोल गया. पर ये सब उनको कहना और करना था. संयम बरतते हुए उन्होने बात आगे बढ़ाई.
''हां राजू ग़लती तो हुई है तुम लोगों से. सबसे नही पर कुच्छ लोगों से...कौन कौन हैं ये मैं नही जानता. पर इतना जानता हूँ कि आज पहली बार ऐसा कुच्छ हुआ है जो कि घर के मुखिया से च्छुपाया गया है. वो विश्वास और प्यार जो की इस परिवार की नींव है उसपे किसी ने चोट पहुँचाई है. इन हालत में इससे पहले कि ऐसे किस्से और आगे हों और घर के सदस्यों में एक दूसरे के प्रति नफ़रत हो, तो इस घर की बाँट हो जानी चाहिए.'' बाबूजी ने सबकी आँखों में बारी बारी देखते हुए ये शब्द कहे. एक बार को उनको लगा कि सरला की आँखों में डर आ गया और उसने चोर नज़र से सुजीत को देखा. सुजीत और सरला.......बाबूजी को कुच्छ कुच्छ समझ आने लगा. बात कहते कहते उनका दिमाग़ चला और उन्हे पुराने किस्से याद आ गए.
सब एक दूसरे को देखने लगे. सुजीत ने सबकी तरफ देखा. सबके घबराए हुए चेहरे और दबदबाती आँखों को देख के उसे शरम महसूस होने लगी. बाबूजी के इस फ़ैसले के पिछे क्या वजह थी ये उसे समझ आ गया था. शायद ऐसा ही कुच्छ संजय को भी लगा. उसका मन भी बहुत उखड़ा हुआ था. राजू जो कि कम्मो और मुन्नी के साथ किए गए कांड को भूल चुका था, उसे भी अचानक लगने लगा कि कहीं बाबूजी उसकी और इशारा तो नही कर रहे. राखी और सखी दोनो ही हैरान थी पर मिन्नी को समझ आ गया था कि बाबूजी ने बात को कहाँ घुमाया है.
इससे पहले की कोई कुच्छ कहता सरला ने सबसे पहले अपना मूह खोला. उसके मन में बड़ी जबरदस्त उथल पुथल चल रही थी. डर, आत्म्गलानि, शर्मिंदगी, गुस्सा और ना जाने कैसे कैसे भाव एक साथ उसके मन में चल रहे थे.
''समधी जी मुझे लगता है कि मुझे यहाँ से जाना चाहिए क्योंकि ये सब बातें आपके परिवार रिलेटेड हैं...मेरा यहा कोई काम नही.....'' सरला उठ के जाने लगी.
''बैठिए समधन जी. आप हमारे घर की सदस्य हैं. इन सबकी बड़ी हैं. आपका दर्जा मेरे बराबर का है इस घर में और कोई भी ये नही कह सकता कि आप इस घर से अलग हैं. आप ना माने तो आपकी मर्ज़ी पर हम आपको अपना मानते हैं. इसलिए आप कहीं नही जाएँगी ....सब बातें आपके सामने होंगी. '' बाबूजी ने कड़क आवाज़ में आदेश दिया.
''नही समधी जी.....हर रिश्ते की मर्यादा होती है और ये सब बातें जो चल रही हैं......ये इस रिश्ते से बाहर हैं इसलिए मेरा यहाँ रहना ठीक नही है.'' सरला ने अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए.
''और अगर ये रिश्ते की मर्यादा पहले ही भंग हो चुकी हो ...?? और वो भी अगर आपने की हो....खुद....और आपका ऐसा करना ही वो वजह हो जिसकी वजह से मैं ये फ़ैसला ले रहा हूँ..तब भी आप यहाँ से जाएँगी ...???'' बाबूजी की आवाज़ उँची थी और कठोर. उसमे बड़ा सवाल था. सरला के पैर जहाँ थे वहीं जम के रह गए. सखी की आँखें और मूह खुला था और वो अपनी मा को देख रही थी. सबकी तरफ पीठ करके खड़ी सरला पहले तो डर गई और फिर ना जाने क्यों उसके मन में बहुत ज़ोर का गुस्सा आया और वो उबल पड़ी.
''राजपाल जी अब आप मेरी बात ध्यान से सुनिए...'' आज पहली बार उम्र में बड़ी होने के बावजूद सरला ने बाबूजी को नाम से बुलाया था.
"" मा ये तुम क्या कह रही हो...'' सखी के मूह से अचानक तीखे स्वर निकले. उसे अपनी मा से ये उम्मीद नही थी कि वो उसके ससुर को फर्स्ट नेम से बुलाए.
''तुम चुप रहो बहू...ये समधी और समधन के बीच की बात है...कहिए सरला जी मैं सुन रहा हूँ....'' बाबूजी ने गुस्से पे काबू पाते हुए बात आगे की.
'' तो सुनिए आप....मैने कोई मर्यादा भंग नही की ...की है तो आप सब लोगों ने. इन बच्चों को देखिए और पहचानिए इन्हे...... इनके चेहरे आपकी बातों के जवाब दे देंगे. यही वजह है जो मैं इतने दिन से यहाँ से जाना चाहती हूँ. यही वजह है.....कि अब शायद मैं अपनी बेटी को भी बेटी कहना पसंद नही करती..पर मजबूरी है...जनम दिया है कोख से'' कहते हुए सरला रो पड़ी. उसके आँसू बहने लगे और उसकी बातें सुन के सखी भी फूट फूट के रो पड़ी.
''तो ठीक है सरला जी अब आप सुनिए वो सब बातें जो आप कहते हुए कह नही पाई और वो सब चीज़ें जो आप देखते हुए भी देख नही पाई. हां ये सब बच्चे मेरी इन बहुओं की कोख से हुए हैं पर इनके बाप वो नही हैं जो कि समाज को दिखते हैं. ये सब बच्चे एक जोड़े के नही हैं. और इसके पिछे की वजह भी आप को बताउन्गा. पर वो बाद में. पहले आप को वो बता दूं जो आप अब तक देख के भी समझ नही पाई. ये सब बच्चे सब कुच्छ जानते हुए भी इसी परिवार में रहना चाहते है और इन छ्होटे मासूम बच्चों को अपनी औलाद की तरह पालना चाहते हैं. शायद आपने देखा कि सखी का बेटा उसके और सुजीत पे गया है पर प्यार उसे संजय से मिलता है. राखी की बेटी शकल से राजू पे गई है पर हमेशा सुजीत की गोद में खेलती है. उसी तरह संजय का बेटा मिन्नी का दूध पीता है पर बाप कहलाने का सुख राजू का ही है. आप ये सब देख के भी समझ नही पाई कि बहुओं के गर्भ का ठहरना आपके आने से पहले हुआ.
आप के आने से पहले किसके पेट में किसका बच्चा था ये आपको नही पता था. आपने सबको अच्छे से देखा और प्यार दिया. बच्चे होते ही आप सब समझ गई पर क्या कभी ये सोचा कि एक बहू का बच्चा उसके पति का नही होता तो उसके कॅरक्टर पे शक करना सही था. पर जब तीनो के ही अलग अलग थे तो ऐसा क्यों? कभी सोचा कि जो बातें आप देख समझ सकती हैं वो क्या हम सब नही ? कभी सोचा कि इसके बावजूद आज तक किसी बहू या बेटे ने कोई शिकायत या झगड़ा किया ? नही सोचा. तो अब सुनिए वो सब बातें जिस वजह से इनमे इतना प्यार था, है और रहेगा. '' ये कहते हुए बाबूजी ने शॉर्ट में सारी कहानी सरला को सुना दी.
क्रमशः........................ ...
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बदनाम रिश्ते
खानदानी चुदाई का सिलसिला--25
गतान्क से आगे..............
दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा इस कहानी का पच्चीसवाँ पार्ट लेकर हाजिर हूँ
मिन्नी तेज़ गति से चलते हुए बाबूजी के कमरे में आई और बच्चे को उनसे ले लिया. बच्चे को ढूढ़ पिलाने के लिए अपने कमरे में जाने के लए मूडी तो अचानक उसके मंन में कुच्छ आया और वो वहीं बाबूजी के कमरे का दरवाज़ा बंद करके ईज़ी चेर पे बैठ गई. अपना ब्लाउस ढीला करते हुए उसने अपनी राइट चूची निकाली और दूध से नम हुई निपल को बच्चे के मूह में डाल दिया. बाबूजी जो की कुच्छ फाइल्स देख रहे थे थोड़ा सकपका गए. सरला के घर में रहते हुए मिन्नी उनके कमरे में ऐसी अवस्था में बैठी हुई थी तो उन्हे थोड़ी सी घबराहट हुई.
''बहू तू अपने कमरे में चली जा. कहीं समधन जी ना जाग जाएँ..फिर अच्छा नही होगा. '' बाबूजी ने करीब करीब आदेश दिया.
''बाबूजी आप चिंता ना करें. दरवाज़ा बंद है और अगर सरला आंटी आई भी तो मैं इसे दूध पिलाना बंद कर दूँगी. उनके आने पे मैं अपने कमरे में चली जाउन्गि. पर अभी मुझे आपसे कुच्छ बातें करनी हैं. कुच्छ ऐसी बातें जो हमारे भविश्य से जुड़ी हैं.'' मिन्नी ने बाबूजी की ओर देखते हुए अपनी दूसरी चूची भी ब्लाउस से बाहर निकाल दी. फिर बच्चे को पलट के दूसरी चूची का निपल उसके मूह में भर दिया.
बाबूजी जो कि स्टडी टेबल की कुर्सी पे बैठे हुए काम करने की कोशिश कर रहे थे अब हल्का सा मूड़ के मिन्नी को देखने लगे. मिन्नी के मम्मे अभी भी पहले जैसे ही लग रहे थे. सरला की तेल मालिश का आइडिया बहुत ही अच्छा रिज़ल्ट दे रहा था. बच्चे का छोड़ा हुआ निपल एक दम कड़क था और चमक रहा था. मिन्नी डाइरेक्ट्ली बाबूजी को नही देख रही थी. बच्चे की ओर देखते हुए उसने बाबूजी को संबोधित किया था. उसके चेहरे पे अभी किसी भी तरीके के भाव नही थे पर उसकी जवानी का भोला पन अब थोड़ा मेचुरिटी में बदल चुका था. बाबूजी के सामने एक परिपक्व चुदी चुदाई मेच्यूर मिलफ (मोम आइ वुड लाइक टू फक) थी. बाबूजी का लंड अपने आप हरकत में आने लगा. मूह में अपने चश्में की दांडी को दबाए बाबूजी मिन्नी की खूबसूरती को निहार रहे थे. आज से करीब साल पहले यही मम्मे उनके मूह की और लंड की शोभा बढ़ाते थे. वक्त बदल गया था और सब कुच्छ एक अरसे जैसा लगता था पर मिन्नी की कामुकता अभी भी बरकरार थी और उसके चूचों का स्वाद अभी भी बाबूजी की ज़ुबान पे ....
''बोल बहू..क्या बात करनी है..??'' बाबूजी ने हल्के हाथ से अपनी धोती को अड्जस्ट किया. लंड टेंट बनाने को तैयार हो रहा था.
''बाबूजी मुझे पुछ्ना था कि क्या अब हमारा परिवार पहले जैसा नही हो पाएगा..??? क्या जिस तरीके के वीकेंड हम लोग मिल के मनाया करते थे अब वो नही हो पाएँगे..?? मुझे ये बात कुच्छ दिन से परेशान कर रही है. और शायद राखी और सखी को भी. पिच्छले कई दिनो से मैं राजू के साथ हल्का फूलका सेक्स करने लगी हूँ. पर उनमे शायद अभी जोश कम हो गया है या फिर कोई और बात है. मुझे अब सेक्स की भूख फिर से लगने लगी है. क्या ऐसा तो नही कि जब तक हम लोग पहले जैसे सामूहिक संभोग नही करेंगे तब तक हमारे मर्द हममे दोबारा रूचि नही लेंगे ?? बताइए बाबूजी क्योंकि अब धीरे धीरे सब्र के बाँध टूटने लगे हैं. जैसे जैसे शरीर वापिस शेप में आ रहा है वैसे वैसे ही काम वासना भी जाग रही है. '' मिन्नी के बच्चे ने अब निपल चूसना छोड़ दिया था और फिर से सो गया था. मिन्नी दोनो नंगे चूचे लिए करीब करीब आधी नंगी अवस्था में बैठे हुए बाबूजी की नज़रों से नज़रें मिलाते हुए उनसे सवाल कर रही थी. उसके चेहरे पे अब मादकता झलकने लगी थी.
बाबूजी उसका सवाल सुन कर अपनी सीट से उठे और पहले कुच्छ सोचते हुए कमरे में टहलते रहे. एक कोने से दूसरे कोने तक 2 - 3 मीं खामोश रहने के बाद वो मिन्नी के नज़दीक आए और कुर्सी के आगे खड़े हो गए. फिर ईज़ी चेर के दोनो बाजुओं पे अपने हाथ रखते हुए वो आधे झुके और मिन्नी की आँखों में आँखें डाल के उससे सवाल किया.
''तुम क्या चाहती हो बहू ?? और तुम्हे क्या लगता है कि सखी और राखी क्या चाहते हैं ?? मर्दों का मुझे पता है कि वो क्या चाहते होंगे. मर्द जात तो कुत्ति चीज़ है जहाँ भी मौका मिलेगा तो मूह मारेगा. इन तीनो को अगर फ़ैसला लेना हो तो ये तो एक दूसरे के बेडरूम में घुस जाएँ. सबसे ज़ियादा चेंज तो तुम 3नो बहुओं में आया है. शादी से पहले तुम लोग कच्ची कलियाँ थी. फिर फूल बनी और अब तुम फल देने वाले पेड़ बन चुकी हो. तुम लोग बताओ कि क्या करना है. फिर मैं सोचूँगा.'' बाबूजी की आँखें एक पल के लए भी मिन्नी के चेहरे से हटी नही और ना ही मिन्नी की नज़रें उनकी आँखों से.
''बाबूजी मेरे फ़ैसले के लिए मेरे पास शब्द नही हैं ...है तो सिर्फ़ ये ..जो मैं अभी कर के दिखाउन्गि....'' कहते हुए मिन्नी ने बाबूजी की धोती में अपना हाथ डाल दिया. एक बार फिर से एक पुराने दोस्त से मिलने का सुखद एहसास दोनो के बदन में दौड़ने लगा. बाबूजी का आधा तना हुआ लोड्ा मिन्नी के हाथों स्पर्श पाते ही पूरा सख़्त हो गया. मिन्नी के हाथ एक बार फिर उसी लंड की नोक से खेल रहे थे जिस नोक से गाढ़ा सफेद थूक उसने अपनी टाँगों, मम्मो और मूह में ना जाने कितनी बार लिया था.
''उफ्फ बहू मुझे तेरा जवाब मिल गया....उम्म्म इससे ज़ियादा कुच्छ नही जानना मुझे...तेरा फ़ैसला क्या है ये तो मैं जान गया....''बाबूजी के बदन में एक तेज़ झुरजुरी सी दौड़ गई. पर मिन्नी की तरफ से जवाब अभी अधूरा था. उसने आगे बढ़ के बाबूजी के होठों से अपने होंठ मिलाए और उन्हे चूसने लगी. बाबूजी का मूह थोड़ा सा खुला और जीभ बाहर को आई पर फिर 2 - 3 सेकेंड में वो अंदर चली गई और होंठ सिल गए. मिन्नी का हाथ उनके लंड को पकड़े हुए था पर लंड अचानक से हल्का ढीला पड़ने लगा था. मिन्नी इससे पहले कि कुच्छ और करती या कहती बाबूजी ने उसका हाथ बाहर खींच दिया और जाके अपनी कुर्सी पे बैठ गए.
''बहू अब तू जा और रेस्ट कर. मुझे तेरा जवाब मिल गया और अब मुझे सखी और राखी से अपने तरीके से जवाब लेने हैं. उसके बाद मैं आज रात अपना फ़ैसला तुम लोगों को सुना दूँगा. अगर तुम लोगों को उस फ़ैसले से इनकार होगा तो देखेंगे. अब तुम जाओ..मैं कुच्छ सोचता हूँ. ये सरला का चक्कर भी देखना पड़ेगा..'' आख़िरी सेंटेन्स कहते हुए बाबूजी के चेहरे पे शिकन आ गई और उन्होने एक ठंडी साँस ली.
''ठीक है बाबूजी मैं जाती हूँ ..पर जाने से पहले एक बात आपको बताना ज़रूरी समझती हूँ. जिस औरत को लेके आप परेशान हो रहे हैं उस औरत के भी कुच्छ ऐसे राज़ हैं जो आपको नही पता. मैं ये यकीन से कह सकती हूँ कि अगर आपको वो बातें पता चल जाएँ तो आपकी दुविधा का अंत हो सकता है.'' मिन्नी अपने ब्लाउस के बटन बंद करते हुए बोली.
''क्या मतलब है बहू..सॉफ सॉफ कहो...क्या तुम सरला की बात कर रही हो..?? मेरे, कंचन और तुम्हारे फुफाजी के अलावा ऐसा क्या राज़ है सरला का जो मुझे नही पता..?? बताओ मुझे.'' बाबूजी ने आदेश दिया.
''बाबूजी 2 बातें ध्यान से सोचिएगा कि बच्चों के पैदा होने से पहले सरला आंटी का चेहरा कितना खिला खिला रहता था. और उसकी वजह थी इस घर के मर्द, वो मर्द जिनमे आप शामिल नही थे सिवाए एक बार के शायद. दूसरे जब से बच्चे हुए तब से वो जैसे मुरझा गई हैं. घर के मर्दों से अलग अलग रहती हैं. आपका और उनका रिश्ता समधी समधन का है सबके सामने और कभी कभी लवर्स का पीठ पिछे. पर यहाँ इस घर में 2 या फिर शायद 3 ऐसे मर्द हैं जिन्होने सबकी पीठ पिछे उनके साथ अच्छे ख़ासे संबंध बनाए थे. बस फिलहाल मैं इतना ही कहूँगी. आप सोचिए इन बातों को और अगर कुच्छ समझ ना आए तो मुझे बुला लीजिएगा. मैं सब बता दूँगी.'' मिन्नी थोड़ा सा गुस्से में बोली. बाबूजी का लंड छुड़ाना और उसकी ऑलमोस्ट भीगी हुई चूत को अतृप्त छोड़ देना उसे अच्छा नही लगा था.
इससे पहले कि बाबूजी कुच्छ और कहते मिन्नी उनके कमरे से बाहर चल दी. बाबूजी मूह खोले अवाक उसको जाते हुए देखते रहे और फिर एक गहरी सोच में डूब गए.
शाम को एक बार फिर से ड्रॉयिंग रूम में महफ़िल जमी. सभी सदस्य एक साथ पहुँच गए. बाबूजी और मिन्नी थोड़े सीरीयस मूड में थे. सरला आस यूषुयल थोड़ा बहुत मुस्कुरा रही थी. तीनो बच्चे अपनी अपनी मा के पास थे. राजू और संजय किचन से समान ला रहे थे और सुजीत सबको ड्रिंक्स दे रहा था. आदमियो को विस्की और लॅडीस को शरबत. बच्चों को दूध पिलाने की ड्यूरेशन में तीनो बहुओं ने ड्रिंक्स पे रोक लगा रखी थी. सरला वहीं बैठी तीनो से गप्पें मार रही थी और बीच बीच में मुस्कुरा देती.
बाबूजी थोड़े शांत अपनी जगह पे बैठे सोच रहे थे. सुजीत ने उनकी ड्रिंक साइड टेबल पे रख दी और फिर किचन में चला गया. थोड़ी देर बाद सब इकट्ठे हुए, चियर्स किया और बाबूजी की तरफ देखने लगे. स्नॅक्स का दौर शुरू हुआ. बाबूजी ने एक एक करके सबको गौर से देखा. मिन्नी की नज़रों में गुस्सा और सवाल थे. राखी और सखी नॉर्मल थी. सरला भुजी भुजी थी पर अपने को कंट्रोल करके रखा हुआ था. तीनो भाई नॉर्मल हल्की फुल्की चिटचॅट कर रहे थे और बीच बीच में बच्चों से खेल रहे थे. बाबूजी ने सबको देखते हुए चुप्पी तोड़ी.
''हां तो आज हम सब यहाँ बच्चों के नाम सोचने के लिए इकट्ठे हुए हैं. पर उससे पहले मुझे आप सब से कुच्छ कहना है. सबसे पहले मैं सरला जी के लए कुच्छ कहना चाहता हूँ.
सरला जी आपको हमारे घर में आए हुए करीब 10 महीने हो रहे हैं. इन 10 महीनो में जिस प्रकार आपने मेरी बहुओं का ख़याल रखा है और इस घर के कामो को देखा है उसके लिए मैं और हम सब आपके बहुत आभारी हैं. आपने अपना घर परिवार छोड़ के यहाँ की ज़िम्मेवारियाँ ली ऐसा आजकल कोई नही करता. जब आप यहाँ आई थी तो बिना किसी झिझक के आपने इस परिवार को अपनाया और सबको भरपूर प्यार दिया. पर पिच्छले कुच्छ दिनो से मैं देख रहा हूँ कि आप उदास रहती हैं. अपने में खोई खोई रहती हैं, बहुओं और बच्चों को लेके बिज़ी रहती हैं. क्या ऐसी कोई बात है जो कि आप के मंन को चुभ गई है ? या कोई चिंता है जो कि आपको खाए जा रही है ? मुझे बताइए शायद मैं कुच्छ कर सकूँ..''
''समधी जी ऐसी कोई बात नही है..बस मुझे लगता है कि मुझे वापिस अपने घर जाना चाहिए. बच्चे अब इतने बड़े हो गए हैं कि बहुएँ उन्हे संभाल सकती हैं. मुझे अपने घर की याद सताती है सो मुझे जाने का मंन है. शायद इसी वजह से मैं कभी कभी गुम्सुम रहती हूँ. यहाँ सबके बीच रहते हुए भी कभी कभी अकेली महसूस करती हूँ.'' सरला ने थोड़ा उदास होते हुए कहा.
''ठीक है सरला जी आप जैसा ठीक समझे, वैसे एक बात ज़रूर है ....आप सच नही कह रही. कोई बात है जो आपको खाए जा रही है और वो बात आपको अपने घर जाने के बाद भी परेशान करती रहेगी...खैर आप समझदार है सो मैं और क्या कहूँ...
अब मुझे एक और ज़रूरी बात कहनी है बाकी सबसे. बच्चों आगर तुम्हे याद हो कि कुच्छ समय पहले हमने घर और काम के बटवारे को लेके कुच्छ बातें की थी. उस समय बहुएँ साथ में नही थी. तब तुम सब ने एक राई दी थी कि ऐसा कुच्छ नही होना चाहिए. हम सब एक संयुक्त परिवार है और रहेंगे. पर मुझे बहुत दुख के साथ ये डिसिशन लेना पड़ रहा है कि जैसा मैने सोचा था वैसा बटवारा अब करने का समय आ गया है. '' बाबूजी की बात जैसे बॉम्ब की तरह पड़ी. सबके चेहरे परेशान थे और मूह खुले के खुले. यहाँ तक की सरला भी हैरान थी.
''बाबूजी ये ..ये आप क्या कह रहे हैं बाबूजी....ये सब...अचानक..ऐसा क्यों बाबूजी...क्या हमसे कोई ग़लती हो गई..क्या हुआ प्लीज़ बताइए ..प्लीज़ ऐसा फ़ैसला ना लीजिए ..बोलिए बाबूजी...क्या ग़लती हुई या क्या बात है...'' राजू घर का सबसे बड़ा लड़का एक छ्होटे बच्चे की तरह बिखाल उठा. ऐसा लग रहा था कि वो अभी बोलते हुए फूट पड़ेगा. उसकी ये हालत देख के बाबूजी का मन भी एक बार के लिए डोल गया. पर ये सब उनको कहना और करना था. संयम बरतते हुए उन्होने बात आगे बढ़ाई.
''हां राजू ग़लती तो हुई है तुम लोगों से. सबसे नही पर कुच्छ लोगों से...कौन कौन हैं ये मैं नही जानता. पर इतना जानता हूँ कि आज पहली बार ऐसा कुच्छ हुआ है जो कि घर के मुखिया से च्छुपाया गया है. वो विश्वास और प्यार जो की इस परिवार की नींव है उसपे किसी ने चोट पहुँचाई है. इन हालत में इससे पहले कि ऐसे किस्से और आगे हों और घर के सदस्यों में एक दूसरे के प्रति नफ़रत हो, तो इस घर की बाँट हो जानी चाहिए.'' बाबूजी ने सबकी आँखों में बारी बारी देखते हुए ये शब्द कहे. एक बार को उनको लगा कि सरला की आँखों में डर आ गया और उसने चोर नज़र से सुजीत को देखा. सुजीत और सरला.......बाबूजी को कुच्छ कुच्छ समझ आने लगा. बात कहते कहते उनका दिमाग़ चला और उन्हे पुराने किस्से याद आ गए.
सब एक दूसरे को देखने लगे. सुजीत ने सबकी तरफ देखा. सबके घबराए हुए चेहरे और दबदबाती आँखों को देख के उसे शरम महसूस होने लगी. बाबूजी के इस फ़ैसले के पिछे क्या वजह थी ये उसे समझ आ गया था. शायद ऐसा ही कुच्छ संजय को भी लगा. उसका मन भी बहुत उखड़ा हुआ था. राजू जो कि कम्मो और मुन्नी के साथ किए गए कांड को भूल चुका था, उसे भी अचानक लगने लगा कि कहीं बाबूजी उसकी और इशारा तो नही कर रहे. राखी और सखी दोनो ही हैरान थी पर मिन्नी को समझ आ गया था कि बाबूजी ने बात को कहाँ घुमाया है.
इससे पहले की कोई कुच्छ कहता सरला ने सबसे पहले अपना मूह खोला. उसके मन में बड़ी जबरदस्त उथल पुथल चल रही थी. डर, आत्म्गलानि, शर्मिंदगी, गुस्सा और ना जाने कैसे कैसे भाव एक साथ उसके मन में चल रहे थे.
''समधी जी मुझे लगता है कि मुझे यहाँ से जाना चाहिए क्योंकि ये सब बातें आपके परिवार रिलेटेड हैं...मेरा यहा कोई काम नही.....'' सरला उठ के जाने लगी.
''बैठिए समधन जी. आप हमारे घर की सदस्य हैं. इन सबकी बड़ी हैं. आपका दर्जा मेरे बराबर का है इस घर में और कोई भी ये नही कह सकता कि आप इस घर से अलग हैं. आप ना माने तो आपकी मर्ज़ी पर हम आपको अपना मानते हैं. इसलिए आप कहीं नही जाएँगी ....सब बातें आपके सामने होंगी. '' बाबूजी ने कड़क आवाज़ में आदेश दिया.
''नही समधी जी.....हर रिश्ते की मर्यादा होती है और ये सब बातें जो चल रही हैं......ये इस रिश्ते से बाहर हैं इसलिए मेरा यहाँ रहना ठीक नही है.'' सरला ने अपने कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए.
''और अगर ये रिश्ते की मर्यादा पहले ही भंग हो चुकी हो ...?? और वो भी अगर आपने की हो....खुद....और आपका ऐसा करना ही वो वजह हो जिसकी वजह से मैं ये फ़ैसला ले रहा हूँ..तब भी आप यहाँ से जाएँगी ...???'' बाबूजी की आवाज़ उँची थी और कठोर. उसमे बड़ा सवाल था. सरला के पैर जहाँ थे वहीं जम के रह गए. सखी की आँखें और मूह खुला था और वो अपनी मा को देख रही थी. सबकी तरफ पीठ करके खड़ी सरला पहले तो डर गई और फिर ना जाने क्यों उसके मन में बहुत ज़ोर का गुस्सा आया और वो उबल पड़ी.
''राजपाल जी अब आप मेरी बात ध्यान से सुनिए...'' आज पहली बार उम्र में बड़ी होने के बावजूद सरला ने बाबूजी को नाम से बुलाया था.
"" मा ये तुम क्या कह रही हो...'' सखी के मूह से अचानक तीखे स्वर निकले. उसे अपनी मा से ये उम्मीद नही थी कि वो उसके ससुर को फर्स्ट नेम से बुलाए.
''तुम चुप रहो बहू...ये समधी और समधन के बीच की बात है...कहिए सरला जी मैं सुन रहा हूँ....'' बाबूजी ने गुस्से पे काबू पाते हुए बात आगे की.
'' तो सुनिए आप....मैने कोई मर्यादा भंग नही की ...की है तो आप सब लोगों ने. इन बच्चों को देखिए और पहचानिए इन्हे...... इनके चेहरे आपकी बातों के जवाब दे देंगे. यही वजह है जो मैं इतने दिन से यहाँ से जाना चाहती हूँ. यही वजह है.....कि अब शायद मैं अपनी बेटी को भी बेटी कहना पसंद नही करती..पर मजबूरी है...जनम दिया है कोख से'' कहते हुए सरला रो पड़ी. उसके आँसू बहने लगे और उसकी बातें सुन के सखी भी फूट फूट के रो पड़ी.
''तो ठीक है सरला जी अब आप सुनिए वो सब बातें जो आप कहते हुए कह नही पाई और वो सब चीज़ें जो आप देखते हुए भी देख नही पाई. हां ये सब बच्चे मेरी इन बहुओं की कोख से हुए हैं पर इनके बाप वो नही हैं जो कि समाज को दिखते हैं. ये सब बच्चे एक जोड़े के नही हैं. और इसके पिछे की वजह भी आप को बताउन्गा. पर वो बाद में. पहले आप को वो बता दूं जो आप अब तक देख के भी समझ नही पाई. ये सब बच्चे सब कुच्छ जानते हुए भी इसी परिवार में रहना चाहते है और इन छ्होटे मासूम बच्चों को अपनी औलाद की तरह पालना चाहते हैं. शायद आपने देखा कि सखी का बेटा उसके और सुजीत पे गया है पर प्यार उसे संजय से मिलता है. राखी की बेटी शकल से राजू पे गई है पर हमेशा सुजीत की गोद में खेलती है. उसी तरह संजय का बेटा मिन्नी का दूध पीता है पर बाप कहलाने का सुख राजू का ही है. आप ये सब देख के भी समझ नही पाई कि बहुओं के गर्भ का ठहरना आपके आने से पहले हुआ.
आप के आने से पहले किसके पेट में किसका बच्चा था ये आपको नही पता था. आपने सबको अच्छे से देखा और प्यार दिया. बच्चे होते ही आप सब समझ गई पर क्या कभी ये सोचा कि एक बहू का बच्चा उसके पति का नही होता तो उसके कॅरक्टर पे शक करना सही था. पर जब तीनो के ही अलग अलग थे तो ऐसा क्यों? कभी सोचा कि जो बातें आप देख समझ सकती हैं वो क्या हम सब नही ? कभी सोचा कि इसके बावजूद आज तक किसी बहू या बेटे ने कोई शिकायत या झगड़ा किया ? नही सोचा. तो अब सुनिए वो सब बातें जिस वजह से इनमे इतना प्यार था, है और रहेगा. '' ये कहते हुए बाबूजी ने शॉर्ट में सारी कहानी सरला को सुना दी.
क्रमशः........................
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