Sunday, August 4, 2013

FUN-MAZA-MASTI शुभारम्भ-13

FUN-MAZA-MASTI

शुभारम्भ-13
मैंने हेलमेट का ढक्कन हटाया और उसे बुलाया.....

पिया ने एक सेकंड तो मुझे घुरा फिर पहचान गयी और फिर बोली, " वाव....आज तो क्या बात है......बुलेट पर स्मार्ट लग रहे हो.."

मैंने उसे बैठने के लिए कहा.....वो मेरे पीछे बिंदास लोंन्डों की तरह दोनों और पैर करके बैठ गयी. मैंने गाड़ी जैसे ही आगे बड़ाई गाड़ी झटका खाकर बंद हो गयी. मैंने भगवान का नाम लेकर फिर से स्टार्ट की...हो गयी.
और हम दोनों वहां से निकल लिए.

मैंने गाड़ी उसके घर के रस्ते पर डाली तो वो बोली, "अरे तुम कहाँ जा रहे हो.....?"

मैंने कहा," तुम्हारे घर......क्यों ?"

वो बोली, "अरे तुम पागल हो क्या.....बोला ना की घर पर कॉलेज का बोल कर आई हूँ....."

मैंने कहा, " त त तो अब कहाँ जाओगी......?"

वो बोली, "कहाँ जाउंगी मतलब .........ऐसे पूछो की अब कहाँ चले ?"

मेरी गांड फटी......भेन्चोद सुबह सुबह इस कश्मीर की कली को कहाँ ले जाऊ.

वो बोली, "अच्छा चलो वो तालाब वाली रोड पर चलते है.......मज़ा आएगा."

तालाब वाली रोड.....तालाब के चारो और बनी सड़क थी.....एक तरफ पहाड़ियां और दूसरी तरफ तालाब...........शहर के जितने लैला मजनू थे. वो वहीँ पर पूजा पाठ करते थे मतलब आप समझ ही गए.

मैं तो कभी वहां गया नहीं था.....जाता किसके साथ ?
मगर मेरे कुछ दोस्त जो अपनी अपनी गर्लफ्रेंड के साथ वहां गए थे....किस्से सुना सुना के मेरी गांड जलाते थे. मैंने सोचा चलो आज तालाब वाली रोड भी देख लेते है.

बात करने के कारण मैं बुलेट स्लो चला रहा था. मैंने धीरे से स्पीड बड़ाई और बुलेट हवा से बातें करने लगी. तभी पिया ने अपने हाथ बड़ा कर मेरी जांघ पर रख दिया.
ठीक वैसे ही जैसे बहुत सी भाभियाँ अपने पतियों की जांघ पर हाथ रख कर बैठती है.

मेरे दिमाग के मोबाईल में नेटवर्क आना ही बंद हो गया. उसने बड़े ही आराम से हाथ रखा था मगर मुझे उसका हाथ 10 -15 किलो का लग रहा था. मेरा ध्यान हाथ पर होने के वजह से मुझे स्पीड ब्रेकर नहीं दिखा और मैंने अच्छी स्पीड में ब्रेकर से गाड़ी कूदा दी. बेचारी पिया का भी ध्यान नहीं था. बैलेंस बनाने के चक्कर में वो आगे झुकी और उसके तपते हुए मम्मे मेरी पीठ पर बेदर्दी से आ सटे. पतली सी टी शर्ट में से मुझे उसके निप्पल महसूस हो रहे थे. उसने बैलेंस बनाने के चक्कर में अपने हाथ मेरी जांघ से हटा कर मेरी कमर में डाल लिए थे और मुझसे बिलकुल चिपक कर बैठी थी.

मेरा बाबुराव खुश होकर गाना गा रहा था......"ज़िन्दगी एक सफ़र है सुहाना.........यहाँ कल क्या हो किसने जाना......"

तभी मेरी गांड की फटफटी फुल स्पीड में चालू हो गयी...........

सामने से पिया का भाई........वो सांड........नवजोत भी बाइक पर आ रहा था और उसकी नज़र हमारे ऊपर ही थी. शायद उसने पिया को पहचान लिया था. पिया ने जैसे ही उसको देखा, बोली ,

"शील......फटाफट यहाँ से चलो .....अगर भाई ने तुमको मेरे साथ देख लिया तो गज़ब हो जायेगा................वो कुछ भी नहीं सुनेगा......प्लीज़.......गाड़ी भगाओ......"

उसके बोलने के पहले ही मेरी फटी हुयी गांड से भागने का सिग्नल मेरे दिमाग को मिल चूका था. मैंने बुलेट का कान (एक्सीलेटर) मरोड़ा और फुल स्पीड में तूफान की तरफ निकल लिया. हम जैसे ही नवजोत से क्रोस हुए, वो चिल्लाया...."अबे ओये............ओये पिया.........रुक.........ओये........"

उसकी सांड की आवाज़ सुन के मेरी बचीखुची हिम्मत भी BSNL के नेटवर्क जैसे गायब हो गयी. मैंने गाड़ी ऐसे दौड़ाई की मानो मेरे पीछे सन्नी देओल अपना ढाई किलो का हाथ लेकर आ रहा हो.

बुलेट के आगे उस सांड की बाइक कहाँ ठहरती.....

आगे एक मोड़ था, मैंने मोड़ लिया और बुलेट को एक गली में घुसेड दिया. थोड़े ही देर में नवजोत सांड अपनी बाइक से फुल स्पीड में क्रोस हुआ और सीधा चला गया.
उसने हमें नहीं देखा था. मैंने बुलेट मोड़ी और जिस रस्ते से आये थे उसी पर गाड़ी डाल दी. मेरी तो ठीक पर पिया की गांड भी फट के गले में आ गयी थी. वो बिलकुल चुपचाप बैठी थी.

मैंने उससे कहा, "उस सांड ने ....म.....म.....म.......मेरा मतलब है की नवजोत ने तुम्हे पहचान लिया था क्या ? अब क्या करे ? "

कुछ लड़कियों में गज़ब की डेरिंग होती है..........और कुछ बिलकुल गांडफट.

पिया बोली, "पता नहीं यार........घर चलो........अगर वो पहले पहुँच गया तो हंगामा कर देगा........"

मैंने पिया को तो उसके घर के मोड़ पर ही छोड़ दिया......कहीं सांड बुलेट देख लेता तो..........तुरंत घर आया और कपूर अंकल को उनकी बुलेट सधन्यवाद लौटा दी.

मेरा मन नहीं लग रहा था.......मैंने सोचा पिया से पुछु की क्या हुआ......? उसका मोबाईल लगाया.......बंद था.

मेरी गांड फटी........मगर ये मालूम करना जरुरी था की आखिर क्या हुआ........मैंने हिम्मत जुटाई और उसके घर पर फ़ोन लगाया. घंटी बजी, उस सांड ने ही फ़ोन उठाया. फोन पर उसकी आवाज़ भोंगे जैसी गूंज रही थी......

मैंने कहा, "ह ह हेल्लो.......प प पिया है....."

वो बोला, "कौन बोल रहा है.........."

मैंने अपनी फटती हुयी गांड को काबू में करके कहा, "म म म ....मैं......श श शील......."

वो बोला, "अरे हाँ........शील.........बोल..........क्या हाल है.......आज पढ़ाने नहीं आएगा क्या ?"

मेरी आवाज़ बड़ी मुश्किल से निकली, "ह ह ह हाँ.....वो........श...श....शाम को आऊंगा ना......"

वो बोला, "हाँ......ठीक है.....पिया अभी घर पर नहीं है.........बाद में लगाना......."

ये बोल कर उसने फोन रख दिया और मेरे समझ नहीं आ रहा था की यह हुआ क्या......पिया को तो मैं अभी घर छोड़ कर आया था.

थोड़ी देर में अंकित जो मेरा कॉलेज का फ्रेंड था......फ़ोन आया.......

वो बोला, "अबे आज कॉलेज नहीं आ रहा है क्या ?"

मैंने मना किया तो वो बोला, "अबे सब काम छोड़ आ जा........आज तो गजब सीन है......."

मैंने पूछा, " क्या हुआ ? "

वो बोला, "अबे मेरे को किसीने बताया की सुबह सुबह वो नवजोत सांड की बहन......अरे वो पिया........किसी लौंडे के साथ तालाब वाली रोड पर घूम रही थी, उसको वहां पर सांड ने देख तो लिया था मगर लड़का कौन था ये सांड को पता नहीं......बोले तो लड़के ने हेलमेट लगा रखा था......मगर गाड़ी बुलेट थी......तो कॉलेज के जितने भी लौंडो के पास बुलेट है......उन सबकी तो सांड गांड ही ले रहा है........अबे आजा मज़ा आ जायेगा.........."

जैसे बाईक में पेट्रोल ख़तम हो जाने पर झटके लगते है वैसे ही मेरी बची खुची हिम्मत भी ख़तम होने से मेरी गांड की फटफटी झटके खाने लगी.

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शाम को पिया को पढ़ने का समय नजदीक आ रहा था और मेरा BP बड़ा जा रहा था. मैंने सोचा की कहीं उस सांड ने मुझे पहचान लिया तो...............

मगर अगर मैं पिया को पढ़ने नहीं गया तो भी सांड को शक हो सकता है......भेन्चोद समझ नहीं आ रहा था की करू तो क्या करू.......उसके ऊपर से चाची मुझसे जब भी बात करती तो इस तरह से टेडी मुस्कान मारती मानो कह रही हो की अभी आके ठोक दो.......

मेरा हल्का हल्का सर दुःख रहा था.......मैं छत पर चला गया. बादल छाये थे........हलकी हलकी हवा भी चल रही थी.....और चाची वहां पर कपडे सुखा रही थी. उन्होंने अपने पल्लू को अपनी कमर में फंसा रखा था. इस कारण से उनकी नाभि साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी. पल्लू छाती पर भी इतना कसा था की उनके मम्मे मचल मचल जा रहे थे.

मैं जा कर एक टूटी हुयी कुर्सी पर बैठ गया..........पुरे मोहल्ले में हमारी छत सबसे ऊँची थी और मुझे वहां से सबकी छत दिखाई दे रही थी और दिख रहा था चाची का साडी में लिपटा बदन. मेरी निगाहें चाची के बदन को धीरे धीरे सहलाने लगी. चाची ने एक दो बार मुझे देखा और होंट दबाकर मुस्कुराते हुए कपडे सुखाने लगी. मैं बैठे बैठे उन्हें घूरने लगा......

चाची कपडे सुखाते सुखाते बोली, "क्यों रे लल्ला.......कोई काम धाम नहीं है क्या........निकम्मों जैसे आके बैठ गया........कॉलेज क्यों नहीं गया......."

मैंने बोला, "अरे गया था.....आज कोई सर नहीं आये इसलिए मैं जल्दी आ गया......."

मैं फिर बोला, "चाची.....कपडे ज्यादा है क्या......."

चाची बोली, "हाँ रे..........दो दिन के है ना......."

मैं उठा और उनके पास जाके खड़ा हो गया. मैंने डबल मीनिंग कहा, "आप कहो तो दबा दबा कर पानी निकाल दूँ........."

चाची ने झुके झुके ही मुझे देखा और टेडी मुसकन मारकर बोली, "लल्ला.......दबा दबा कर पानी ढंग से नहीं निकलता रे........अच्छे से दबा कर निचोड़ना भी पड़ता है........अगर अच्छे से दबा कर नहीं निचोड़ा तो मज़ा नहीं आता........कपडे गिले गिले ही रह जाते है..."

साली....इतनी ठरकी है है की क्या बोलू......

मैंने कहा, "चाची......अब आप को खुजली तो नहीं हो रही ना....."

चाची ने अनजान बन के पूछा, "कौन सी खुजली......."

पहले तो मुझ से बोलने नहीं बना फिर मैं पूछा, "वो आपको होती थी ना खुजली......मैंने ट्यूब ला कर दिया था......"

वो बोली, "अरे हाँ वो.......अब तो ठीक है......कभी कभी हो जाती है........तो क्या करू ...? ट्यूब लगा लूँ ना........"

मैंने कहा, "हाँ.....चाची......ऐसे मौसम में वहां पर खुजली ज्यादा ही होती है.........आप क्रीम लगा लिया करो........"

चाची बोली, "हाँ रे......पर बीच में लगाने पर कुछ होगा तो नहीं...."

ठंडी हवा में भी मेरे कान गरम हो गए.......मैंने पूछा, " बी... बी... ...बीच में मतलब......"

चाची ने मेरी आँखों में देखा और कहा, "अरे लल्ला......बीच में मतलब........उस जगह में ......लगा लूँ ना.....क्रीम......वहां पर खुजली हो रही है......."

ठरक के कारण मेरी आवाज़ ही नहीं निकाल रही थी.....चाची ने फिर से एक कपडा उठाया और बड़ी अदा से उसको निचोड़ा.......ऐसा लगा मानो ये मेरा बाबुराव है और चाची उसको.......हाय.......साला जींस में फिर से तम्बू तन गया था.

चाची कपडा निचोड़ कर उसे छत की मुंडेर पर सुखाने लगी. उनकी BMW कार जैसी लम्बी चौड़ी गांड मेरी नज़रों के सामने थी.....चाची कपडा फ़ैलाने के लिए थोडा सा झुकी हुयी थी बार बार कपडा फ़ैलाने के कारण उनकी गांड इस कदर थरथरा रही ही मानो मुझे बुला रही हो.

बाबुराव इस कदर कड़क हो चूका था की लो वेस्ट जींस में उसको जगह ही नहीं मिल पा रही थी. मैंने सोचा की बाबुराव को भी सेट करना पड़ेगा नहीं तो भोसड़ी का जींस फाड़ देगा. मैंने चेन खोली और अन्दर हाल डाल कर मेरे लंड को सही करने लगा........मगर लो वेस्ट जींस की चेन इतनी छोटी होती है की उनमे से मुतने की लिए लंड ही नहीं निकल पाता है....हाथ क्या घंटा अन्दर जाता. मज़बूरी में मैंने जींस का बटन खोला और जींस थोड़ी सी नीचे की, मुझे अपनी अंडरवियर भी थोड़ी सी नीचे करनी पड़ी.
मैं बाबुराव को ऊपर करके सेट करने लगा.

अचानक चाची पीछे मुड़ गयी और मेरे हाथ से जींस छुट गयी.

अंडरवियर तो मैं पहले ही निचा कर चूका था.....बाबुराव आधा अंडरवियर में छुपा चाची को निहारने लगा. चाची ने अपने हाथ मुंह पर रखा और बोली,

"हाय राम.....बेशरम........क्या कर रहा है रे..........खुल्ले आम ही नंगा हो गया हिरसू......हाय राम.........."

मेरे मुंह से कुछ निकला ही नहीं.....मैंने झुक कर जींस उठाने की कोशिश की तो मेरी अंडरवियर नीचे ही खिसक गयी और मेरा खड़ा हुआ बाबुराव फनफना कर बाहर आ गया.

चाची बोली, "राम.......छोरे.....इसको तो अन्दर कर....." उनकी नज़र मेरे लपलपाते लंड पर थी.

मैंने कहा. "चाची .....मैं......वो......अरे ये........अन्दर करता हूँ........वो अंडरवियर में नहीं आ रहा था.......मैं.......वो .....सॉरी...."

तभी नीचे से किसी ने चाची को आवाज़ दी......चाची ने अनसुनी कर दी........फिर से आवाज़ आई तो चाची ने मुंडेर से मुंह निकाल कर नीचे झाँका और चिल्लाई....

" अरे कौन है.......गला फाड़े जा रहा है..........अरे कोमल भाभी........हाँ खाना बन गया .........मैं कपडे सुखा रही हूँ............"

कोमल भाभी हमारे पड़ोस में कुछ ही दिन पहले रहने आये रिषभ भैया की वाइफ.........चाची से उनकी बहुत अच्छी पटती थी.....दोनों दिन भर पटर पटर बाते करती रहती थी. वो ही अपने घर की छत पर खड़ी खड़ी चाची से बातें कर रही थी. कोमल भाभी अपने घर की छत पर थी जो हमारे घर से लगा हुआ था. मगर हमारी छत से एक मंजिल नीचे थी. इसलिए कोमल भाभी को चाची का थोडा सा हिस्सा दिखा रहा था और वो मुझे नहीं देख पा रही थी.

चाची मुझे भूलकर उनसे बातों में लग गयी थी, "और सुनाओ......कल वो मिश्रा आंटी क्या बोल रही थी.......हाँ यार.....उनको तो पूरा मोहल्ले की गोसिप पता है...."

नीचे से कोमल भाभी बोली, "अरे नीलू भाभी.........आप मानोगे नहीं की क्या हुआ.......मिश्रा आंटी बता रही थी की वो कोने वाले घर में जैन साहब रहते है ना उनकी बड़ी बहु का अपने देवर से ही चक्कर है......अरे हाँ तो........"

चाची मुंडेर पर पूरी तरह से झुकी हुयी थी.......उनकी गांड इस कदर उभर कर बाहर आ गयी थी की मेरा मन सावन के मौसम में बावला हो गया.

मैं आगे बड़ा और मैंने अपने हाथ चाची के उभरे नितम्बो पर रख दिया. चाची एक दम से चुप हो गयी......नीचे से कोमल भाभी चिल्लाई...."क्या हुआ नीलू चाची...."

चाची क्या बोलती......मैंने धीरे धीरे से चाची के नितम्बो को सहलाना शुरू कर दिया........चाची एक दम कड़क हो गयी और उन्होंने पीछे पलट कर मुझे देखा. मैंने भी बेशरम जैसे उनकी आँखों में ऑंखें डाल कर उनकी मख्खन गांड को दबाना जारी रखा.

कोमल भाभी फिर से चिल्लाई...." अरे क्या हुआ नीलू चाची...."

चाची ने मुझे घूरते हुए कोमल भाभी से कहा "अरे कुछ नहीं......वो एक दो कपडे निचोड़ना भूल गयी........"

मेरा बाबुराव लपलपा कर अंडरवियर से बाहर आ गया था......सावन की ठंडी ठंडी हवा उसको सहला रही थी.......और वो भड़वा मस्ती में ठुनकी पे ठुनकी मारे जा रहा था.

चाची ने कोमल भाभी से पूछा, "वो जैन साहब की बहु......क्या नाम है उसका........हाँ सुषमा.......सच में उसका अपने देवर से चक्कर है क्या ?"

मैंने चाची की साड़ी धीरे धीरे ऊपर करना शुरू कर दी. भरे दिन में चाची की गदरायी टांगो से साड़ी ऐसे उठ रही थी मानो किसी नाटक के स्टेज से पर्दा उठता है. इंच इंच करकर उनकी चिकनी टंगे नंगी होती जा रही थी. चाची के हाथ मुंडेर पर टिके थे और वो कोमल भाभी की बातें सुनने की कोशिश कर रही थी. चाची ने मेरा हाथ अपनी गांड पर से हटाने के लिए अपनी गांड मटकाई......मगर मैंने उनकी साड़ी ऊपर उठाना जारी रखा.






 शाम को ६ बजे पता ढूंढता हुआ मैं सरदार प्रताप सिंह के घर पहुंचा. घर तो क्या था.....हवेली थी .....आगे जो लॉन बना था वो ही मेरे घर से बड़ा था. सरदार प्रताप सिंह, दारू और govt का बहुत बड़ा ठेकेदार था. येही समझो की सफ़ेद कपड़ो में डोन.
पुलिस हो या नेता.....सब उसकी जेब में रहते थे. इसीलिए तो नवजोत इतनी माँ चुदाता था.

मैंने बेल बजाई.......दरवाजा खुला और उसके साथ मेरा मुंह ही खुल गया ....

जिसने दरवाजा खोला था......हाईट करीब 5 फुट 8 इंच. दूध में मिले गुलाब के जैसा रंग. काला सलवार सूट बदन पर ऐसा कसा हुआ था की एक एक उभार चीख चीख के बुला रहा था. मस्त गदराया हुआ बदन था यार..........
आँखों में गहरा काजल था.......और बिलकुल गुलाबी होंट........और गले पर चिपके दुप्पट्टे के नीचे एक खाई...जी हाँ....खाई....
दो पहाड़ों के बीच की घाटी......उसके मम्मे इतने बड़े थे की उनको मम्मे नहीं थन कहना चाहिए था........
एक दुधारू भैंस के थन. पर अजीब बात यह थी की इतने बड़े मम्मे भी उस पर फब रहे थे क्योकि वो लम्बी भी थी और चौड़ी भी. डनलप का गद्दा थी साली.....सेक्सी आँखों से वो भी मुझे ऊपर से नीचे तक नाप रही थी और मैं तो उसको कभी से नाप चूका था. बल्कि अब तो मेरा सेकंड रिविजन चालू हो गया था.

उसकी शक्ल नवजोत और पिया से मिलती थी, शायद उनकी बड़ी बहन थी. मैं बोला

मैं : न न नमस्ते जी......म म म शील हूँ....व व

वो मेरी बात बीच में ही काट कर बोली, " हाँ हाँ शील बेटा......आओ आओ, पिया भी अभी आई हैं"

बेटा ??? अबे ये है कोन ? तभी अन्दर से पिया की आवाज़ आई.

पिया : कौन हैं मम्मा ?

मम्मा ? ये पटाखा पिया की माँ ? तभी मुझे समझ में आ गया की जब खेत इतना उपजाऊ है तो फसल तो हरी हरी ही आनी हैं.

उन दोनों ने मुझे ले जा कर सोफे पर बिठा दिया. पिया की माँ मेरे सामने बैठी थी और पिया उसके पीछे सोफे का सहारा लेकर खड़ी थी. दोनों की आँखों में वो चमक थी जिसे मैं न सिर्फ देख रहा था बल्कि अपने रोम रोम पर महसूस भी कर रहा था. पिया की माँ खनकती हुयी आवाज़ में बोली, "कहाँ रहते हो शील ? ", मैं जैसे नींद से जगा मैंने कहा, " गुलमोहर में, आंटी".

वो मुंह बनाती हुयी बोली, "आंटी नहीं, पम्मी नाम हैं मेरा, आंटी वांटी मत कहा करो, यु नो अजीब लगता है".

एक मैंने चाची को आंटी बोल दिया था तो पूरा शरीर नापने को मिल गया था. इसको तो आंटी - आंटी बोल कर चोद ही दूंगा.
वो इधर उधर की बातें करती रही और मैं उसको थनों और बैठने से फैली हुयी गांड की साइज़ नापने में लग गया. उनकी बातों से साफ़ था की सरदार प्रताप सिंह के रुतबे और डर की वजह से दोनों माँ बेटी का कोई सामाजिक जीवन नहीं था. सरदार जी को अपने काले कामो से फुर्सत नहीं थी और यहाँ पर इस दुधारू भैंस को कोई पूछने वाला नहीं था. काफी देर बाद पिया बोली, "ओफ्फो मम्मा, वो मुझे पढ़ाने आया है की आप की गोसिप सुनने, आप को भी गोसिप के अलावा कोई काम नहीं. चलो शील स्टडी करना है." मैंने कहा "ठीक हैं तुम बुक्स ले आओ".

"बुक्स ले आओ मतलब", पिया ने माथे पर सल लाके कहा, " मिस्टर, मेरे रूम में स्टडी टेबल हैं"

यह हसीना मुझे, अपने रूम में ले जा रही थी. और इधर उसकी माँ मुझे ऐसा देख रही थी जैसे मैं कोई दिल्ली दरबार में लटका चिकन हूँ. कसम से, मुझे ऐसा लगने लगा था की मेरी ग्रह दशा में कोई बहुत ही बड़ा बदलाव हुआ है. इतना सब कुछ इतने कम समय में हो रहा था की कुछ समझ नहीं आ रहा था.

रूम में जाते ही पिया ने दरवाजा बंद कर दिया, फिर मुझे देखकर बोली, "अरे यार, सब लोग इतना डिसटर्ब करते की पूछो मत.
इसी लिए डोर बंद कर दिया. अब कोई नहीं आएगा क्योकि अगर मेरे रूम का डोर बंद है तो फिर पापा भी पहले नोक करते है."

मैंने मन ही मन सोचा मेडम ये ज्ञान हमे क्यों दे रही हो. फिर मैंने थोडा सिरियस होके उसे पढने के लिया कहा. उसकी टेबल पर मैगज़ीन का अम्बार लगा हुआ था. वो उन्हें हटाने लगी मैंने उसकी स्टडी टेबल की चेयर खिंची और बैठ गया. बैठते ही मुझे लगा की चेयर पर कुछ रखा था, मैं उठा और मैं उस कपडे को उठा कर उसे देने लगा, "ये लो" और तभी मेरी नज़र उस कपडे पर पड़ी और मेरे कान गरम हो गए. वो एक डिज़ाइनर लेस वाली ब्रा थी, जिसका मटेरियल नेट का था. मतलब पूरा पारदर्शी.

उसने लपक के मेरे हाथो से ब्रा छीन ली और ड्रावर में रख ली. वो शर्म से हौले हौले मुस्कुरा रही थी और मुझे उस से भी ज्यादा शर्म आ रही थी.

थोड़ी ही देर में मुझे समझ आ गया की पिया को पढाई में कोई इंटरेस्ट नहीं हैं. मैं जैसे ही कुछ भी एक्सप्लेन करता और वो इधर उधर का टोपिक निकाल लेती. वो बस बातें करना चाहती थी. मुझे समझ आ रहा था की इस के सांड भाई की वजह से ये कभी भी लौन्डों से दोस्ती नहीं कर पाई हैं और अपने माँ बाप को पढाई के नाम पर चुतिया बना कर इस को सिर्फ गप्पे मारनी है.

सिर्फ गप्पे मारनी है या.......

कीड़ा......कुलबुलाने लगा था.
kramashah.............




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