Sunday, August 4, 2013

FUN-MAZA-MASTI शुभारम्भ-2

FUN-MAZA-MASTI

 शुभारम्भ-2
मेरी समझ में कुछ आया नहीं. ओह god कल रात की रास लीला देखके जो माल निकला था वो तो कागज़ फिर से कंप्यूटर टेबल पर ही छोड़ दिया था.
कहीं फिर से चाची ने वो कागज़ तो नहीं देख लिया. मेरी फटी.

मैं : च च चाची ......वो .......म म मेरा मतलब है की वो कागज़ ......आई ऍम सॉरी ......अब नहीं होगा

टेड़ी मुस्कान के साथ बोली : कोनसा कागज़...अच्छा वो वाला.....

मैंने सर नीचे झुका लिया.

चाची: अब तू कॉलेज जाने लगा हे, जवान हो गया है....चलता है मगर थोडा कन्ट्रोल रखा कर.....रोज़ रोज़ कोई करता है क्या ?

मैंने झटके से सर उठाया, चाची कुटिल तरीके से मुस्कुरा रही थी. तभी उन्होंने वो किया जिस से मेरे दिमाग में हतोड़े पड़ने लगे

अचानक वो अपनी टांगों के बीच खुजली करने लगी ये करते हुए तो बेशरमी से मुझ से बातें भी कर रही थी. मुझे तो यह भी नहीं पता की वो क्या बोल रही है. मेरा सारा ध्यान उनकी उंगिलयों के खेल पर था.

चाची : शील तू सुन रहा है न ? शाम को जल्दी आ जाना
में : ह ह हाँ च च चाची

चाची :अच्छा तू लेट हो रहा है. जल्दी कर नहीं तो बस नहीं मिलेगी.

और झुक कर मेरी प्लेट उठाई. हाय क्या नज़ारा दिखा. उनके दोनों संतरे ब्लैक ब्रा में कैद थे और हमेशा की तरह उन्होंने काफी टाईट ब्लाउस पहना था जिसके कारण उनके बूब्स उभर के बहार निकल रहे थे. बूब्स के बीच के घाटी पूरी अन्दर तक दिख रही थी . मेरे बदन की नसे गरम हो गयी और वही मेरा माहोल बन गया. जींस में जैसे तैसे अड्जेस्ट किया. चाची मुझे वो ही बेशरमी भरी मुस्कान से देखे जा रही थी. बड़ी मुश्किल से मैंने बुक्स समेटी और कॉलेज के लिए भागा.
चाची के झटके से मेरा दिमाग घूम गया था.

अनीता चाची जिनका प्यार का नाम नीलू है. मेरे चाचा की बीवी. पिछले साल ही गाँव से आई थी. जब गाँव में बाड़ आने से सब तबाह हो गया और चाचा सड़क पे आ गया, तो मेरे पापा ने उनको शहर बुला लिया और अपने साथ दुकान पे लगा लिया. मेरा बनिया बाप बहुत शाना है. दूकान के दो नोकरों की छुट्टी करके उनका पूरा काम मेरे चाचा से ही कराता था, शायद इसी लिए मेरा चाचा इतना थका रहता था की नीलू की खुजली नहीं मिटा पा रहा था. बेचारी को शादी के ५ साल बाद भी बच्चा नहीं था.
सांवले रंग में ढली उसकी चिकनी काया में अजंता की मूर्तियों जैसे घुमाव और उठाव थे. तीखा नाक जैसे चोंच हो, कंटीली भंवे, थोड़े भरे भरे होंठ और उसके ऊपर एक तिल.

गाँव से आई चाची को डौगी पोसिशन में करना पसंद है यह सोच सोच के मेरा सांप फिर फन उठाने लगा.

अपनों अरमानो की गाड़ी को ब्रेक लगा कर कॉलेज में घुसा. अकाउंट का लेक्चर ख़तम हो चूका था. तभी सामने से आती पिया दिखी. उसने सफ़ेद शर्ट और ब्लू जींस पहनी थी, बाल खुले थे, क़यामत दिख रही थी. वो आई और

पिया : हाय ...मेरे नोट्स लाये हो ना
मैं : ह ह हाय (साला ये हकलापन). हाँ यह लो.

पिया : थेंक्स. तुम्हे जल्दी तो नहीं चाहिए.
मैं : न न नहीं. अ अ आप आराम से कॉपी कर लो.

पिया : यह आप आप क्या लगा रखा है. अरे हम दोस्त है. इतने फोर्मल मत बनो
मैं : थ थ ठीक है.....अ अ आप....मेरा मतलब है की तुम को अब तुम कहूँगा

वो हंसी और उसके गुलाबी होटों के बीच में उसके मोती जैसे दांत चमक उठे. तभी मैं नोटिस किया किया की उसके होटों के ऊपर एक तिल है. ऐसा ही एक तिल चाची के होटों पर भी है. चाची की याद आते ही मेरा दिमाग उनकी रात की और सुबह की बातें याद करने लगा. तभी पिया बोली

पिया : अरे कहाँ खो गए. आज लेट कैसे हो गए. क्लास में तो दिखे ही नहीं आज.
मैं : ह ह हाँ म म मैं वो .....

पिया (शरारती मुस्कराहट के साथ बोली) : पार्क में GF के साथ थे क्या ?

मैं तो एक दम घबरा गया और मेरा मुह लाल हो गया

मैं : म म मेरी कोई gf नहीं हैं.
पिया : अच्छा पुरे कोलेज में ऐसा कोई लड़का या लड़की नहीं जिसका कोई सीन नहीं है

मैं : स स सच में नहीं है. क क कसम से.
पिया : इट्स ओके यार. वैसे तो मेरा भी नहीं पर बोलना येही पड़ता हैं, की कोई है. भाई के डर से सब दूर ही रहते है.
अच्छा चलो मुझे जाना है बाय

आज मुझे अपने हकले होने पर जितना गुस्सा और शर्म आई की क्या बोलू.
घर पे पहुंचा तो पूरा घर खाली था. अपनी चाबी से दरवाजा खोल के जब अन्दर गया और आवाज़ लगायी तो चाची के कमरे से
आवाज़ आई.

चाची : कोन हैं ? शील ?
मैं : हाँ चाची......सब कहाँ गए ?

चाची : अरे सुबह बोला तो था की सब मंदिर में जायेंगे. रणछोड़ दास जी के भजन हैं.

अब मैं क्या बोलू की सुबह मेरा ध्यान कहा था.

चाची : मैं कपडे धो कर आती हूँ. खाना रेडी है.
मैं : अरे चाची...मेरे कपडे भी धो दिए क्या ?

चाची : नहीं....ला दे... जल्दी.

मैं रूम में गया और अपनी जींस, टी शर्ट और अंडरवियर उठाई. जैसे ही बाथरूम में घुसा मेरी साँसे रुक गयी.
चाची गाँव वालो की तरह उकडू बैठ कर कपडे धो रही थी, उनको वाशिंग मशीन में कपडे धोना नहीं आता था. उनका आचल गिरा हुआ था और ऐसे बैठने की वजह से उनके बूब्स मचल मचल के बाहर आ रहे थे. उन्होंने साड़ी घुटनों के ऊपर तक उठा रखी थी जिससे उनकी पानी से भीगी चिकनी जाघें चमक रही थी.

मैं : ये लो च च चाची
चाची : सारे कपडे ले आया ना ?

मैं : हाँ ..जींस ...टी शर्ट ....और ये ........(कहकर मेने अंडरवीयर भी रख दी)
चाची : यहाँ रख दे......( फिर वो ही कुटिल मुस्कान के साथ बोली) ....अंडरवियर की हालत तो कागज़ जैसे नहीं कर रखी ?

मेरे तो कान गरम हो गए.
मैं : न न नहीं चाची

चाची : सुन......ये साड़ी सही कर दे ना.

वो अपने ढलके हुए आंचल की तरफ इशारा कर रही थी. मैंने कांपते हुए हाथों से उनका आंचल जो उनके कंधे से गिर गया था उसे फिर से कंधे पर रखने लगा तभी वो थोडा सा मुड़ी और मेरा हाथ उनके सोफ्ट मम्मो से टकरा गया.
चाची धीरे धीरे मुस्कुरा रही थी. फिर बोली

चाची : लल्ला....ये बाल्टी भी खाली कर के दे दे ना.

मैंने बाल्टी उठाई और मुड़ा. फर्श चिकना होने से मेरा बैलेंस बिगड़ा और बाल्टी मेरे हाथ से छुट कर ठीक चाची के पीछे गिर गयी. उनका पूरा पिछवाडा गीला हो गया.

चाची : हाय राम यह क्या किया. मेरी पूरी साड़ी गीली हो गयी.

और वो खड़ी होकर साड़ी को झटकने लगी.

चाची : क्या करता है लल्ला......अन्दर तक पानी चला गया .....सारे कपडे धो रखे है...मेरे पास तो अलमारी में दूसरा पेटीकोट भी नहीं है.

कह कर उन्होंने साड़ी खोलना शुरू कर दी. मेरे सामने मेरी खुजली वाली चाची बिना आंचल के .. और ....भीगी हुई.......साड़ी खोल रही थी. मेरी जींस में तम्बू तन चूका था. तभी जैसे उसे होश आया बोली

चाची : शील ..बाहर जा. देखता नहीं में कपडे बदल रही हूँ

मैं हकलाता हुआ सॉरी बोलता हुआ बाहर आके खड़ा हो गया.

चाची : मेरे सारे कपडे गीले कर दिए लल्ला. अब मैं क्या पहनू ? जा जाके मेरे रूम में कोई पेटीकोट, ब्लाउस मिले तो ले आ.

मैंने जाके देखा मगर कुछ नहीं था. तभी मुझे चाची का नाईट गाउन दिखा. पूरा पारदर्शी था.

मैं : ये लो चाची.
चाची : अन्दर मत आ. बाहर से ही दे दे.

मैंने दिया और चाची अन्दर से ही चिल्लाई

चाची : लल्ला और कुछ ना मिला क्या ?
मैं : चाची मुझे और कुछ नहीं दिखा.....आप ही तो बोली की सारे ही कपडे धो दिए.

चाची : हाय राम यह तो बहुत झीना हैं. अरे बाहर का दरवाजा बंद है ना ? ऐसे में भाभी और भाई साहब आ गए तो.
मैं : चाची मैं कुण्डी लगा देता हूँ .

मैं जैसे ही मुड़ा चाची बाथरूम से बाहर आई और अपने रूम की तरफ भागी. गाउन सामने से खुला था और अन्दर वो सिर्फ ब्रा और पेंटी में थी. भीगने से उनका गाउन पूरा ही पारदर्शी हो गया था. काली ब्रा और फूल की प्रिंट वाली पेंटी साफ़ साफ़ दिखाई दे रही थी. उनके मम्मे भागने की वजह से जोर जोर से हिल रहे थे और उनके भरे भरे गोल गोल नितम्ब पेंटी के अन्दर बाहर आने के लिए मचल रहे थे. उन्होंने से अपने रूम में घुस कर दरवाजा बंद कर लिया और जोर जोर से हसने लगी. मेरा दिमाग ख़राब हो गया.

चाची : लल्ला ....अब लगा लो कुण्डी ....हा हा हा ......बुद्धू बन गए भोले लल्ला....

मेरा सांप फुफकारे मार रहा था, मुझसे रहा नहीं गया मैं फटाफट रूम में गया और सुबह के न्यूज़पेपर को खोल कर टेबल पार रखा , जींस उतारी और अपना लंड हिलाने लगा. उत्तेजना की वजह से मेरी ऑंखें बंद हो गयी थी. आज सुबह से ही चाची ने मुझे इतना गरम कर दिया था कि रुकना मुश्किल था. बार बार चाची के भीगे बदन का चित्र मेरी आँखों के सामने आ रहा था.
मुझे वो ही सुरसुरी फिर होने लगी मेरा निकलने वाला था. तभी भड़ाक से मेरे रूम का दरवाजा खुला और चाची अन्दर आ गयी.

चाची : चल लल्ला ..साड़ी मिल गयी और खाना लगा दिया है.....आज दाल......हाय राम ये क्या .....

मेरा माल निकलना शुरू हो गया.....मैंने अपने लंड हाथ में छुपाने कि कोशिश कि मगर उसमे से फच ....फच.....धार छुटती
ही जा रही थी. कुछ उड़ कर चाची के पैरों के पास भी गिरी. चाची की आँखों गोल गोल हो गयी थी और वो कभी मुझे और कभी धार पे धार मारते मेरे लंड को देख रही थी. अचानक जैसे उन्हें होश आया और वो बाहर चली गयी.

मैने उसी कागज़ से लंड को पोछा. मेरी गांड फटफटी की तरह फट रही थी. बेटा आज तो गए. बाप जल्लाद है....मार मार के गांड सुजा देगा और माँ मारे शर्म के मार जाएगी. मैं सर झुका के बाहर गया.

मैं : च च च चाची........

चाची मेरी तरफ मुड़ी. उनका चेहरा लाल हो गया था. उनकी वो तीखी नाक कोनो से फूली हुई थी. या तो वो गुस्से में थी या उनको भी मस्ती आ गयी थी.

चाची : लल्ला......हद होती है.....तू बहुत बिगड़ गया हैं......भाभी और भाई साहब को पता चला की तू पढाई छोड़ कर ये सब
हरकते करता है तो उन कर क्या गुजरेगी ? ऐसे आदतों की वजह से ही तेरे चाचा का ये हाल हैं. जो आज तक बाप नहीं
बन पाए

मैं : च च चाची प प प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो. म म माँ और प प पापा को मत बोलना. मैं अब कभी मूठ नहीं मारूंगा.
प प प्लीज़ चाची प्लीज़

चाची एक दम से शांत हो गयी. फिर से उनके चेहरे पे वो ही टेड़ी मुस्कान हलके हलके आई.

चाची : लल्ला.......मैं ये नहीं कहती की बिलकुल मत कर. पर रोज़ रोज़ करना तो गलत है. कमजोरी आ जाएगी. कल तेरी
शादी होगी, फिर क्या करेगा. बहु को खुश नहीं रखेगा तो इधर उधर झाँकेगी. मर्द बनेगा कि ग्वाला ?

मैं : ठ ठ ठीक है चाची ......ध्यान रखूँगा.....

चाची : ये ले खाना खा ले....

मैं : चाची ....ये रोटी पर कितना घी लगाया है ? ? मुझे इतना घी मत दो.
चाची टेड़ी मुस्कान के साथ बोली : अरे लल्ला......घी नहीं खायेगा तो ताक़त कैसे आएगी. घी से ही तो धातु बनती है.

मैं : धातु ? धातु क्या ?
चाची : वो ही जो तुम रोज़ इधर उधर .....कागजों में उड़ाया करते हो.

माँ कसम......अभी मूठ मरी थी और चाची की टेड़ी मुस्कान और ऐसी बातें सुन कर सांप ने फन उठा ही लिया. मैंने अडजस्ट करने के लिए नीचे हाथ लगाया और चाची बोली

चाची : लो अभी घी खाया भी नहीं और फिर निकालने चले ?

मैने घबरा के हाथ ऊपर कर लिया और चाची जोर जोर से हसने लगी. उन्होंने फिर वहीँ पर खड़े खड़े मेरे सामने ही अपनी टांगो के बीच खुजाना शुरू कर दिया. मैं इधर उधर देखने लगा. तभी चाची बोली

चाची : अरे लल्ला....बहुत परेशान हो गयी रे.....मरी इस खुजली के मारे......कोई क्रीम व्रिम ला दे ना.....खुजली मिटती ही नहीं.
kramashah.............










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