Friday, February 11, 2011

हिंदी सेक्सी कहानियाँ मस्तानी हसीना पार्ट--2



हिंदी सेक्सी कहानियाँ

मस्तानी हसीना पार्ट--2
गाटांक से आगे ......
विकी और सुधीर की बातें सुन कर मेरा पसीना छ्छूट गया. मेरा सगा भाई भी मुझे चोदना चाहता है. मैने अब अपनी पॅंटी बाथरूम में कभी नहीं छोड़ी. मुझे डर था की विकी मेरी पॅंटी सुधीर को ना देदे. मुझे विकी से कोई शिकायत नहीं थी. आख़िर वो मेरा छ्होटा भाई था. अगर विकी मुझे नंगी देखने के लिए इतना उतावला था तो हालाँकि मैं उसके सामने खुले आम नंगी तो नहीं हो सकती थी पर किसी ना किसी बहाने अपने बदन के दर्शन ज़रूर करा सकती थी. स्कूल ड्रेस में अपनी पॅंटी की झलक देना बड़ा आसान था. सोफा पर बैठ कर टीवी देखते वक़्त अपनी टाँगों को इस प्रकार फैला लेती की विकी को मेरी पॅंटी के दर्शन हो जाते. एक दिन मैं स्कूल ड्रेस में ही लेटी बुक पढ़ रही थी की विकी के कदमों की आहट सुनाई दी. मैने झट से टाँगें मोड़ कर ऊपर कर ली ओर बुक पढ़ने का नाटक करती रही. मेरी गोरी गोरी मांसल टाँगें पूरी तरह नंगी थी. स्कर्ट कमर तक ऊपर चढ़ गयी थी. मैने ज़्यादा ही छ्होटी पॅंटी पहन रखी थी जो बरी मुश्किल से मेरी चूत को ढके हुए थी. मेरी लंबी घनी झांटें पॅंटी के दोनो ओर से बाहर निकली हुई थी. इतने में विकी आ गया और सामने का नज़ारा देख कर हरबदा कर खड़ा हो गया. उसकी आँखें मेरी टाँगों के बीच में जमी हुई थी. इस मुद्रा की प्रॅक्टीस मैं शीशे के सामने पहले ही कर चुकी थी. मुझे भली भाँति पता था कि इस वक़्त मेरी चूत के घने बॉल पॅंटी के दोनो ओर से झाँक रहे थे. पॅंटी बड़ी मुश्किल से मेरी फूली हुई चूत के उभार को ढके हुए थी. मैने उसे जी भर के अपनी पॅंटी के दर्शन कराए. इतने में मैने बुक नीचे करते हुए पूछा " विकी क्या कर रहा है? कुच्छ चाहिए?" विकी एकदम से हार्बारा गया. उसका चेहरा उत्तेजना से लाल था. " कुच्छ नहीं दीदी. अपनी बुक ढूंड रहा था. उसकी पॅंट के उभार को देख कर मैं समझ गयी उसका लंड खड़ा हो गया है. लेकिन विकी के पॅंट का उभार देख कर ऐसा लगता था कि उसका लंड काफ़ी बड़ा था.
जब से विकी के पॅंट का उभार देखा तब से मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूमने लगी कि किस तरह विकी का लंड देखा जाए. मुझे पता था कि विकी रात को लूँगी पहन कर सोता है. मेरे दिमाग़ में एक प्लान आया. मैं रोज़ सुबह जल्दी उठ कर विकी के कमरे में इस आस में जाती कि किसी दिन उसकी लूँगी खुली हुई मिल जाए या कमर तक उठी हुई मिल जाए और मैं उसके लंड के दर्शन कर सकूँ. कई दिन तक किस्मत ने साथ नहीं दिया. अक्सर उसकी लूँगी जांघों तक उठी हुई होती लेकिन लंड फिर भी नज़र नहीं आता. लेकिन मैने भी हार नहीं मानी. आख़िर एक दिन मैं कामयाब हो ही गयी. एक दिन जब मैं विकी के कमरे में घुसी तो देखा विकी पीठ पे लेटा हुआ है और उसकी लूँगी सामने से खुली हुई थी. सामने का नज़ारा देख कर तो मैं बेहोश होते होते बची. मैने तो सपने में भी ऐसे नज़ारे की कल्पना नहीं की थी. इतना लंबा! इतना मोटा! इतना काला लंड! जैसा की मैने बताया विकी पीठ के बल लेटा हुआ था, लेकिन उसके लंड का सुपरा बिस्तेर पे टीका हुआ था! बाप रे बाप! मैने अपने आप को नोचा, कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही थी. क्या भयंकर लग रहा था विकी का लंड. इसने तो साधु महाराज के लंड को भी मात दे दी. अब तक तो मैं लंड एक्सपर्ट हो चुकी थी. नीलम और मैने अब तक ना जाने कितने छ्होटे छ्होटे पेशाब करते भद्दे से लंड देखे थे. मैं मन ही मन सोचने लगी कि घर में इतना लंबा मोटा लंड मोज़ूद है और मैं बेकार में ही दूसरों का लंड देखने में अपना समय बर्बाद कर रही थी. मुझे तो जैसे साँप सूंघ गया था. अचानक विकी ने हरकत की, और मैं जल्दी से भाग गयी. उस दिन के बाद से तो मेरी नींद हराम हो गयी. रोज़ सुबह पागलों की तरह उठ के विकी के लंड के दर्शन करने उसके कमरे में जाती लेकिन हमेशा निराशा ही हाथ लगती. मैने सोच लिया था कि एक दिन ये लंड मेरी चूत में ज़रूर जाएगा.

मेरी उम्र 20 साल हो चुकी थी. मम्मी पापा मेरे लिए लड़का ढूंड रहे थे. एक बार हम सब कानपुर से एक लड़के को देख कर वापस आ रहे थे. ट्रेन में बहुत भीड़ थी. सिर्फ़ दो ही सीट मिली. वो भी अलग अलग कॉमपार्टमेंट में. पापा मम्मी एक कॉमपार्टमेंट में चले गये और मैं और विकी दूसरे में. मैने सोचा इससे अच्छा मोका कभी नहीं मिलेगा. रात को तो हम दोनो को एक ही सीट पर सोना पड़ेगा. मैं प्लान बनाने लगी की किस प्रकार इस सुनेहरे मोके का पूरा फ़ायदा उठाया जाए. एसी 2 टीएर में साइड वाली सीट थी. विकी मेरी सामने वाली सीट पर बैठा था. मैने लहंगा पहना हुआ था. आज तक काई बार विकी को पॅंटी के दर्शन करा चुकी थी और एक बार तो उसके मुँह पे भी पॅंटी से धकि अपनी चूत रगड़ चुकी थी. क्यों ना इस बार अपनी नंगी चूत के भी दर्शन करा दूं. विकी को इस प्रकार तड़पाने में मुझे बहुत मज़ा आने लगा था. मुझे मालूम था विकी मुझे चोदने के ख्वाब देखता है. मैने जब से उसका लंड देखा था तभी से ठान लिया था कि शादी के बाद विकी से ज़रूर चुदवाउन्गि. शादी से पहले मैं अपना कुँवारापन नहीं खोना चाहती थी. इसके इलावा किसी भी कुँवारी चूत के लिए विकी का मूसल बहुत ख़तरनाक था. मेरी कुँवारी चूत बुरी तरह से फॅट सकती थी, और अगर नहीं भी फटती तो इतनी चौरी हो जाती की मेरे होने वाले पति को पता लग जाता की मैं कुँवारी नहीं हूँ. पापा के मोटे लॉड ने मम्मी की चूत का क्या हाल कर रखा था वो तो मैं खुद ही देख चुकी थी. मैं पेशाब करने के बहाने बाथरूम गयी और अपनी पॅंटी उतार ली. अब मेरी चूत लहँगे के नीचे बिल्कुल नंगी थी. सामने की सीट पर विकी बैठा हुआ था. मैं अपनी सीट पर उसके सामने आ कर बैठ गयी, टाँगें विकी की सीट पर रख लीं, और अपनी सीट का परदा खींच लिया ताकि बाकी लोग मेरी हरकतें ना देख सकें. अगर मैं लहंगा थोड़ा भी ऊपर करती तो वो मेरी टाँगों के बीच झाँक सकता था. मैं नॉवेल पढ़ने का बहाना करने लगी. विकी पूरी कोशिश कर रहा था कि किसी तरह मेरी टाँगों के बीच की झलक मिल जाय. वो तो बेचारा मेरी पॅंटी की झलक पाने की आशा कर रहा था. उसे क्या मालूम कि आज तो उसे शॉक लगने वाला था. मैं भी उसे खूब उतावला करती रही. थोड़ा सा लहंगा ऊपर खींच लेती, लेकिन सिर्फ़ इतना ही की विकी को कुच्छ दिखने की आशा हो जाए पर दिखाई कुच्छ ना दे. फिर थोरी देर में टाँग खुजलाने के बहाने लहंगा थोड़ा और ऊपर कर लेती जिससे विकी को मेरी गोरी गोरी टाँगें नज़र आ जाती पर असली चीज़ नहीं. मेरा इरादा था कि रात को सोने से पहले ही उसे अपनी चूत के दर्शन कारवँगी, क्योंकि सोना तो हमने एक ही सीट पर था. विकी का उतावलापन साफ नज़र आ रहा था. मुझ से ना रहा गया. बेचारे पे बहुत तरस आ रहा था. मैने विकी की सीट से टाँगें उठा कर अपनी सीट पर कर लीं. टाँगें इस प्रकार से चौड़ी करते हुए उठाई की गोरी जांघों के बीच में विकी को मेरी झांतों से भरी हुई चूत के एक सेकेंड के लिए दर्शन हो गये. पॅंट का उभार बता रहा था मेरी चूत का असर. अब तो विकी की हालत और भी खराब थी. बेचारा मेरी आँख बचा कर अपने लंड को पॅंट के ऊपर से ही रगड़ रहा था. कुच्छ देर के बाद मैं टाँगें मोड़ के उकड़ू हो कर बैठ गयी और अपना सिर घुटनों पर टीका के सोने का बहाना करने लगी. लहँगे के नीचे के हिस्से को मैने अपनी मूडी हुई टाँगों में फसाया हुआ था और सामने के हिस्से को घुटनों तक ऊपर खींच रखा था. अब अगर ल़हेंगे का नीचे का या पिच्छला हिस्सा मेरी मूडी हुई टाँगों से निकल कर नीचे गिर जाता तो ल़हेंगे के अंडर से मूडी हुई टाँगों के बीच से मेरी नंगी चूत विकी को बड़ी आसानी से नज़र आ जाती. एक सेकेंड की झलक पा कर ही विकी बहाल था. काफ़ी देर इंतज़ार कराने के बाद मैने अपने घुटनों पे सिर रख कर सोने का बहाना करते हुए टाँगों के बीच फँसा हुआ लहँगे का निचला हिस्सा नीचे गिरने दिया. अब तो मेरी नंगी चूत विकी की आँखों के सामने थी. विकी ज़िंदगी में पहली बार किसी लड़की की चूत देख रहा था. गोरी गोरी मांसल जांघों के बीच में लंबी काली झांतों के अंडर से झँकती हुई मेरी डबल रोटी के समान फूली चूत को देख कर अच्छों अच्छों का ईमान डोल सकता था. विकी तो फिर बच्चा ही था. इस मुद्रा में मेरी चूत के उभरे हुए होंठ घनी झांतों के बीच से झाँक रहे थे. उभरे हुए तो बहुत थे लेकिन उतने चौड़े और खुले हुए नहीं जितने मम्मी की चूत के थे. मम्मी की चूत को पापा का मोटा लॉडा बीस साल से जो चोद रहा था. करीब 5 मिनिट तक मैने जी भर के विकी को अपनी चूत के दर्शन कराए.विकी की तो जैसे आँखे बाहर गिरने वाली थी. अचानक मैने सिर घुटनों से ऊपर उठाया और पूछा,
" विकी कौन सा स्टेशन आने वाला है.?"
विकी एकदम हरबदा गया और बोला,
" पता नहीं दीदी. मैं तो सो रहा था."
" अरे तुझे इतना पसीना क्यों आ रहा है ? तू ठीक तो है?" मैने विकी के माथे पर हाथ रखते हुए पूछा. पसीना आने का कारण तो मुझे अच्छी तरह मालूम था. ऐसा ही पसीना मुझे भी उस दिन आया था जिस दिन मैने विकी का मोटा लॉडा देखा था. विकी के पॅंट का उभार भी च्छूप नहीं रहा था.
" अच्छा चल खाना खा लेते हैं." हम दोनो ने खाना खाया और फिर सोने की तैयारी करने लगे.
" विकी जा कपड़े बदल ले. सीट तो एक ही है मेरे साथ ही लेट जाना."
" दीदी आपके साथ कैसे लेटुँगा?"
" क्यों मैं इतनी मोटी हूँ जो तू मेरे साथ नहीं लेट सकता.?"
" नहीं नहीं दीदी एक बार आपको मोटी कह कर भुगत चुक्का हूँ फिर कह दिया तो ना जाने क्या हो जाएगा. अब आप जवान हो गयी हो. आपके साथ सोने में शरम आती है."
" ओ ! तो तुझे मेरे साथ सोने में शर्म आ रही है. ठीक है सारी रात खड़ा रह मैं तो चली सोने." ये कह कर मैं सीट पर लेट गयी. बेचारा काफ़ी देर तक बैठा रहा फिर उठ के बाथरूम गया. जब वापस आया तो उसने लूँगी पहनी हुई थी. मैं मन ही मन मनाने लगी कि काश विकी ने अंडरवेर भी उतारा हुआ हो. विकी फिर आ कर बैठ गया. थोरी देर बाद मैने कहा,
" जब तेरा शरमाना ख़त्म हो जाए तो लेट जाना. लाइट बंद कर्दे और मुझे सोने दे."
विकी ने लाइट बंद करदी. मैं विकी की तरफ पीठ करके लेटी थी. उसके लेटने की जगह छोड़ रखी थी. ट्रेन में हल्की हल्की लाइट थी. सोने का बहाना करते हुए मैने लहंगा घुटनों से ऊपर खींच लिया था. ट्रेन की हल्की हल्की लाइट में मेरी गोरी गोरी जंघें चमक रही थी. करीब एक घंटे तक विकी ऐसे ही बैठा रहा. शायद मेरी टाँगों को घूर रहा था. थोरी देर में मुझे धीरे से हिला के फुसफुसाया,
" दीदी ! दीदी!. सो गयी क्या?
मैं गहरी नींद में सोने का बहाना करती रही.
" दीदी ! दीदी !" इस बार थोड़ा और ज़ोर से हिलाता हुआ बोला. लेकिन मैने कोई जबाब नहीं दिया. अब उसे विश्वास हो गया था कि मैं गहरी नींद में हूँ. अचानक मुझे महसूस हुआ जैसे कोई मेरा लहंगा ऊपर की ओर सरका रहा हो. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धक धक करने लगा. मैं विकी का इरादा अच्छी तरह समझ रही थी. बहुत ही धीरे से विकी ने मेरा लहंगा इतना ऊपर सरका दिया की मेरी पूरी टाँगें नंगी हो गयी; सिर्फ़ नितंब ही ढके हुए थे. बाप रे ! थोरी ही देर में ये तो लहंगा मेरे नितंबों के ऊपर सरका देगा. मैने विकी से इस बात की आशा नहीं की थी. मैने तो पॅंटी भी नहीं पहनी थी. विकी भी इस बात को जानता था.
" दीदी ! दीदी!" विकी एक बार फिर फुसफुसाया. मैं सोने का बहाना किए पड़ी रही. समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ. इतने में विकी ने लहंगा बहुत ही धीरे से मेरे नितंबों के ऊपर सरका दिया. हे भगवान ! अब तो मेरे विशाल नितंब बिल्कुल नंगे थे. शरम के मारे मेरा बुरा हाल था, लेकिन क्या करती. जिन नितंबों ने पूरे शहर के लड़कों पर कयामत ढा रखी थी वो आज विकी की नज़रों के सामने बिल्कुल नंगे थे. काफ़ी देर तक मेरे नितंबों को निहारने के बाद विकी धीरे से मेरे पीछे लेट गया. थोरी देर दूर ही लेटा रहा फिर आहिस्ता से सरक के मेरे साथ चिपक गया. मेरे बदन में तो मानो बिजली का करेंट लग गया हो. विकी का तना हुआ लॉडा मेरे चूतरो से चिपक गया. मुझे उसके लौदे की गर्मी महसूस होने लगी. ट्रेन के हिचकॉलों के साथ विकी का लॉडा मेरे चूतरो से रगड़ रहा था. लेकिन उसकी लूँगी मेरे नंगे चूतरो और लॉड के बीच में थी. मेरी चूत तो बुरी तरह से गीली हो चुकी थी. अचानक मुझे महसूस हुआ जैसे की विकी के लॉड की गर्मी बढ़ गयी हो. हाई राम ! विकी ने लॉडा लूँगी से बाहर निकाल लिया था ! अब उसने अपने आप को मेरे पीछे इस प्रकार अड्जस्ट किया की उसका लॉडा मेरे चूतरो की दरार में रगड़ने लगा. वो बिना हीले दुले लेटा हुआ था. ट्रेन के हिचकॉलों के कारण लॉडा मेरे चूतरो की दरार में आगे पीछे हो रहा था. कभी हल्के से मेरी गांद के छेद से रगड़ जाता तो कभी मेरी चूत के छेद तक पहुँच जाता. मुझे बहुत ही मज़ा आ रहा था. मैं सोचने लगी की अगर लॉडा गांद के छेद से रगड़ खा कर भी इतना मज़ा दे सकता है तो गांद में घुस कर तो बहुत ही मज़ा देगा. लेकिन विकी के लॉड के साइज़ को याद करके मैं सिहर उठी. जो लॉडा चूत को फाड़ सकता है वो गांद का क्या हाल करेगा? अब तो मेरी चूत का रस निकल कर मेरी झांतों को गीला कर रहा था. इतने में ट्रेन ने ज़ोर से ब्रेक लगाया और विकी का लॉडा मेरी चूत के छेद से जा टकराया. ऊवई मा कितना अच्छा लग रहा था! मन कर रहा था की चूतरो को थोड़ा पीछे की ओर उचका कर लंड को चूत में घुसा लूँ. अचानक विकी ने मुझे गहरी नींद में समझ कर थोडा ज़ोर से धक्का लगा दिया और उसका लॉडा मेरी बुरी तरह गीली चूत में घुसते घुसते बचा. मैं घबरा गयी. अभी मैं विकी के लंड के लिए तैयार नहीं थी. अंडर घुस गया तो अनर्थ हो जाएगा. मैने नींद टूट जाने का बहाना करते हुए एक अंगड़ाई ली . विकी ने झट से अपना लॉडा हटा लिया और लहंगा मेरे चूतरो पर डाल दिया. मैं उठाते हुए बोली," विकी हट बाथरूम जाने दे."
" दीदी, बहुत गहरी नींद में थी. ठीक से सोई कि नहीं. मैं बैठ जाता हूँ. दोनो एक सीट पे सो नहीं पाएँगे."
" मैं तो बहुत गहरी नींद में थी. थक गयी थी ना. तू तो लगता है सोया ही नहीं." ये कह के मैं बाथरूम चली गयी. इतनी देर तक उत्तेजना के कारण प्रेशर बहुत ज़्यादा हो गया था. पेशाब करके राहत मिली. छूटरो पर और चूतरो के बीच में हाथ लगाया तो कुच्छ चिपचिपा सा लगा. शायद विकी का वीर्य था. वापस सीट पर आई तो विकी बोला " दीदी आप सो जाओ मैं किसी दूसरी सीट पे चला जाता हूँ."
" नहीं मैं तो सो चुकी हूँ तू लेट जा. मुझे लेटना होगा तो मैं तेरे पीछे लेट जाउन्गि."
" ठीक है दीदी. मैं तो लेट रहा हूँ." विकी लेट गया. पीठ मेरी ओर थी. मैं काफ़ी देर तक बैठी रही और फिर विकी के पीछे सत के लेट गयी. पता नहीं कब आँख लग गयी. जब आँख खुली तो सवेरा हो चुका था.
क्रमशः.........




Mastaani hasina  paart--2
Gataank se aage ......
Viki aur Sudhir ki baaten sun kar mera paseena chhoot gaya. Mera saga bhai bhi mujhe chodna chaahta hai. Maine ab apni panty bathroom mein kabhi nahin chori. Mujhe dar tha ki Viki meri panty Sudhir ko na dede. Mujhe Viki se koi shikayat nahin thi. Aakhir vo mera chhota bhai tha. Agar Viki mujhe nangi dekhane ke liye itna utavala tha to halanki main uske saamne khule aam nangi to nahin ho sakti thi par kisi na kisi bahane apne badan ke darshan zaroor kara sakti thi. School dress mein apni panty ki jhalak dena bara asaan tha. Sofa par baith kar TV dekhte waqt apni tangon ko is prakar phiala leti ki Viki ko meri panty ke darshan ho jaate. Ek din main school dress mein hi leti book parh rahi thi ki Viki ke kadmon ki aahat sunai dee. Maine jhat se tangen mor kar oopar kar lee or book parhne ka naatak karti rahi. Meri gori gori mansal tangen poori tarah nangi thi. Skirt kamar tak oopar charh gayi thi. Maine zyada hi chhoti panty pahan rakhi thi jo bari mushkil se meri choot ko dhake hue thi. Meri lumbi ghani jhanten panty ke dono or se baahar nikli hui thi. Itne mein Viki aa gaya aur saamne ka nazara dekh kar harbara kar khara ho gaya. Uski ankhen meri tangon ke beech mein jamee hui thi. Is mudra ki practice main sheeshe ke saamne pahle hi kar chuki thi. Mujhe bhali bhanti pata tha ki is waqt meri choot ke ghane baal panty ke dono or se jhank rahe the. Panty bari mushkil se meri phooli hui choot ke ubhar ko dhake hue thi. Maine use jee bhar ke apni panty ke darshan karaye. Itne mein maine book neeche karte hue poocha " Viki kya kar raha hai? Kuchh chaahiye?" Viki ekdum se harbara gaya. Uska chehra uttejna se laal tha. " Kuchh nahin didi. Apni book dhoond raha tha. Uski pant ke ubhar ko dekh kar main samajh gayi uska lund khara ho gaya hai. Lekin Viki ke pant ka ubhaar dekh kar aisa lagta tha ki uska lund kaafi bara tha.
Jub se Viki ke pant ka ubhar dekha tub se mere dimaag mein ek hi baat ghoomne lagi ki kis tarah Viki ka lund dekha jaae. Mujhe pata tha ki Viki raat ko lungi pahan kar sota hai. Mere dimaag mein ek plan aaya. Main roz subah jaldi uth kar Viki ke kamre mein is aas mein jaati ki kisi din uski lungi khuli hui mil jaae ya kamar tak uthi hui mil jaae aur main uske lund ke darhan kar sakun. Kai din tak kismat ne saath nahin diya. Aksar uski lungi jaanghon tak uthi hui hoti lekin lund phir bhi nazar nahin aata. Lekin maine bhi haar nahin maani. Aakhir ek din main kaamyaab ho hi gayi. Ek din jub main Viki ke kamre mein ghusi to dekha Viki peeth pe leta hua hai aur uski lungi saamne se khuli hui thi. Saamne ka nazaara dekh kar to main behosh hote hote bachi. Maine to sapne mein bhi aise nazaare ki kalpana nahin ki thi. Itna lumba! Itna mota! Itna kaala lund! Jaisa ki maine bataaya Viki peeth ke bal leta hua tha, lekin uske lund ka supara bister pe tika hua tha! Baap re baap! maine apne aap ko nocha, kahin main sapna to nahin dekh rahi thi. Kya bhayankar lag raha tha Viki ka lund. Isne to saadhu maharaj ke lund ko bhi maat de dee. Ab tak to main lund expert ho chuki thi. Neelam aur maine ab tak na jaane kitne chhote chhote peshaab karte bhadde se lund dekhe the. Main mun hi mun sochne lagi ki ghar mein itna lumba mota lund mozood hai aur main bekaar mein hi doosron ka lund dekhne mein apna samay barbaad kar rahi thi. Mujhe to jaise saanp soongh gaya tha. Achanak Viki ne harkat ki, aur main jaldi se bhaag gayi. Us din ke baad se to meri neend haraam ho gayi. Roz subah paaglon ki tarah uth ke Viki ke lund ke darshan karne uske kamre mein jaati lekin hamesha nirasha hi haath lagti. Maine soch liya tha ki ek din ye lund meri choot mein zaroor jaaega.

Meri umr 20 saal ho chuki thi. Mummy papa mere liye ladka dhoond rahe the. Ek baar hum sub Kanpur se ek ladke ko dekh kar waapas aa rahe the. Train mein bahut bheer thi. Sirf do hi seat mili. Vo bhi alag alag compartment mein. Papa mummy ek compartment mein chale gaye aur main aur Vicky doosre mein. Maine socha isase achhha moka kabhi nahin milega. Raat ko to hum dono ko ek hi seat par sona parega. Main plan banane lagi ki kis prakar is sunehare moke ka poora faayada uthaya jaye. AC 2 tier mein side wali seat thi. Vicky meri saamne wali seat par baitha tha. Maine lehanga pahna hua tha. Aaj tak kayi baar Vicky ko panty ke darshan kara chuki thi aur ek baar to uske munh pe bhi panty se dhaki apni choot ragar chuki thi. Kyon na is baar apni nangi choot ke bhi darshan kara dun. Vicky ko is prakar tarpane mein mujhe bahut mazaa aane laga tha. Mujhe maloom tha Vicky mujhe chodne ke khwaab dekhta hai. Maine jab se uska lund dekha tha tabhi se thaan liya tha ki shaadi ke baad Vicky se zaroor chudwaungi. Shaadi se pahle main apna kunwarapan nahin khona chahati thi. Iske ilaawa kisi bhi kunwari choot ke liye Vicky ka moosal bahut khatarnaak tha. Meri kunwari choot buri tarah se phat sakti thi, aur agar nahin bhi phatati to itni chauri ho jaati ki mere hone wale pati ko pata lag jata ki main kunwari nahin hun. Papa ke mote laude ne mummy ki choot ka kya haal kar rakha tha vo to main khud hi dekh chuki thi. Main peshaab karne ke bahane bathroom gayi aur apni panty utaar lee. Ab meri choot lehange ke neeche bilkul nangi thi. Saamne ki seat par Vicky baitha hua tha. Main apni seat par uske saamne aa kar baith gayi, taangen Vicky ki seat par rakh lin, aur apni seat ka parda kheench liya taki baki log meri harkaten na dekh saken. Agar main lehanga thora bhi oopar karti to vo meri taangon ke beech jhaank sakta tha. Main novel parhane ka bahaana karne lagi. Vicky poori koshish kar raha tha ki kisi tarah meri tangon ke beech ki jhalak mil jaay. Vo to bechara meri panty ki jhalak pane ki aasha kar raha tha. Use kya maloom ki aaj to use shock lagne wala tha. Main bhi use khoob utaavala karti rahi. Thora sa lehanga oopar kheench leti, lekin sirf itna hi ki Vicky ko kuchh dikhne ki aasha ho jaaye par dikhayi kuchh na de. Phir thori der mein taang khujalane ke bahaane lehanga thora aur oopar kar leti jisase Vicky ko meri gori gori taangen nazar aa jati par asli cheese nahin. Mera iraada tha ki raat ko sone se pahle hi use apni choot ke darshan karaaungi, kyonki sona to humne ek hi seat par tha. Vicky ka utavalapan saaf nazar aa raha tha. Mujh se na raha gaya. Bechare pe bahut taras aa raha tha. Maine Vicky ki seat se tangen utha kar apni seat par kar lin. Taangen is prakar se chauri karte hue uthai ki gori janghon ke beech mein Vicky ko meri jhanton se bhari hui choot ke ek second ke liye darshan ho gaye. Pant ka ubhar bata raha tha meri choot ka asar. Ab to Vicky ki haalat aur bhi kharaab thi. Bechara meri aankh bacha kar apne lund ko pant ke oopar se hi ragar raha tha. Kuchh der ke baad main tangen mor ke ukru ho kar baith gayi aur apna sir ghutnon par tika ke sone ka bahana karne lagi. Lehange ke neeche ke hisse ko maine apni muri hui taangon mein phasaya hua tha aur saamne ke hisse ko ghutnon tak oopar kheench rakha tha. Ab agar lehenge ka neeche ka ya pichhla hissa meri muri hui taangon se nikal kar neeche gir jaata to lehenge ke under se muri hui taangon ke beech se meri nangi choot Vicky ko bari aasani se nazar aa jati. Ek second ki jhalak paa kar hi Vicky behaal tha. Kaafi der intazaar karaane ke baad maine apne ghutnon pe sir rakh kar sone ka bahaana karte hue taangon ke beech phansa hua lehange ka nichla hissa neeche girne diya. Ab to meri nangi choot Vicky ki aankhon ke saamne thi. Vicky zindagi mein pahli baar kisi ladki ki choot dekh raha tha. Gori gori maansal janghon ke beech mein lumbi kaali jhanton ke under se jhankti hui meri double roti ke samaan phooli choot ko dekh kar achhon achhon ka imaan dol sakta tha. Vicky to phir baccha hi tha. Is mudra mein meri choot ke ubhare hue honth ghani jhanton ke beech se jhank rahe the. Ubhare hue to bahut the lekin utne chaure aur khule hue nahin jitne mummy ki choot ke the. Mummy ki choot ko papa ka mota lauda bees saal se jo chod raha tha. Kareeb 5 minute tak maine jee bhar ke Vicky ko apni choot ke darshan karaaye.Vicky ki to jaise aanken baahar girne wali thi. Achanak maine sir ghutnon se oopar uthaya aur poocha,
" Vicky kaun sa station aane wala hai.?"
Vicky ekdum harbara gaya aur bola,
" Pata nahin didi. Main to so raha tha."
" Are tujhe itna paseena kyon aa raha hai ? Tu theek to hai?" Maine Vicky ke maathe par haath rakhte hue poocha. Paseena aane ka kaaran to mujhe achhi tarah maloom tha. Aisa hi paseena mujhe bhi us din aaya tha jis din maine Vicky ka mota lauda dekha tha. Vicky ke pant ka ubhar bhi chhup nahin raha tha.
" Achha chal khana kha lete hain." Hum dono ne khana khaya aur phir sone kitayari karne lage.
" Vicky ja kapde badal le. Seat to ek hi hai mere saath hi lait jana."
" Didi aapke saath kaise laitunga?"
" Kyon main itni moti hun jo tu mere saath nahin lait sakta.?"
" Nahin nahin didi ek baar aapko moti kah kar bhugat chukka hun phir kah diya to na jane kya ho jaaega. Ab aap jawan ho gayi ho. Aapke saath sone mein sharam aati hai."
" O ! to tujhe mere saath sone mein sharm aa rahi hai. Theek hai saari raat khara rah main to chali sone." Ye kah kar main seat par lait gayi. Bechara kafi der tak baitha raha phir uth ke bathroom gaya. Jab wapas aaya to usne lungi pahni hui thi. Main man hi man manaane lagi ki kaash Vicky ne underwear bhi utara hua ho. Vicky phir aa kar baith gaya. Thori der baad maine kaha,
" Jub tera sharmana khatm ho jaye to lait jana. Light bund karde aur mujhe sone de."
Vicky ne light bund kardi. Main Vicky ki taraf peeth karke laiti thi. Uske laitne ki jagah chhor rakhi thi. Train mein halki halki light thi. Sone ka bahana karte hue maine lehanga ghutnon se oopar kheench liya tha. Train ki halki halki light mein meri gori gori janghen chamak rahi thi. Kareeb ek ghante tak Vicky aise hi baitha raha. Shayad meri tangon ko ghoor raha tha. Thori der mein mujhe dheere se hila ke phusphusaya,
" Didi ! Didi!. So gayi kya?
Main gahari neend mein sone ka bahana karti rahi.
" Didi ! Didi !" is baar thora aur zor se hilata hua bola. Lekin maine koi jabaab nahin diya. Ab use vishwas ho gaya tha ki main gahari neend mein hun. Achanak mujhe mahsoos hua jaise koi mera lehanga oopar ki or sarka raha ho. Mera dil zor zor se dhak dhak karne laga. Main Vicky ka iraada achhci tarah samazh rahi thi. Bahut hi dheere se Vicky ne mera lehanga itna oopar sarka diya ki meri poori tangen nangi ho gayi; sirf nitamb hi dhake hue the. Baap Re ! thori hi der mein ye to lehanga mere nitambon ke oopar sarka dega. Maine Vicky se is baat ki aasha nahin ki thi. Maine to panty bhi nahin pahani thi. Vicky bhi is baat ko jaanta tha.
" Didi ! Didi!" Vicky ek baar phir phusphusaya. Main sone ka bahana kiye pari rahi. Samajh nahin aa raha tha kya karun. Itne mein Vicky ne lehanga bahut hi dheere se mere nitambon ke oopar sarka diya. Hey Bhagwan ! ab to mere vishaal nitamb bilkul nange the. Sharam ke mare mera bura haal tha, lekin kya karti. Jin nitambon ne poore shahar ke ladkon par kayamat dhaa rakhi thi vo aaj Vicky ki nazron ke saamne bilkul nange the. Kaafi der tak mere nitambon ko niharne ke baad Vicky dheere se mere peeche lait gaya. Thori der door hi laita raha phir aahista se sarak ke mere saath chipak gaya. Mere badan mein to mano bijli ka current lag gaya ho. Vicky ka tana hua lauda mere chootron se chipak gaya. Mujhe uske laude ki garmi mahsoos hone lagi. Train ke hichkolon ke saath Vicky ka lauda mere chootron se ragad raha tha. Lekin uski lungi mere nange chootron aur laude ke beech mein thi. Meri choot to buri tarah se geeli ho chuki thi. Achanak mujhe mahsoos hua jaise ki Vicky ke laude ki garmi barh gayi ho. Hai Ram ! Vicky ne lauda lungi se baahar nikaal liya tha ! Ab usne apne aap ko mere peeche is prakar adjust kiya ki uska lauda mere chootron ki daraar mein ragarne laga. Vo bina hile dule laita hua tha. Train ke hichkolon ke karan lauda mere chotron ki darar mein aage peeche ho raha tha. Kabhi halke se meri gaand ke chhed se ragar jata to kabhi meri choot ke chhed tak pahunch jata. Mujhe bahut hi maza aa raha tha. Main sochne lagi ki agar lauda gaand ke chhed se ragar khaa kar bhi itna mazaa de sakta hai to gaand mein ghus kar to bahut hi mazaa dega. Lekin Vicky ke laude ke size ko yaad karke main sihar uthi. Jo lauda choot ko phaar sakta hai vo gaand ka kya haal karega? Ab to meri choot ka ras nikal kar meri jhaanton ko geela kar raha tha. Itne mein train ne zor se brake lagaya aur Vicky ka lauda meri choot ke chhed se ja takraya. Oooi maa kitna achha lag raha tha! Mun kar raha tha ki chootron ko thora peeche ki or uchka kar lund ko choot mein ghusa lun. Achanak Vicky ne mujhe gahree neend mein samazh kar thoda zor se dhakka laga diya aur uska lauda meri buri tarah geeli choot mein ghuste ghuste bacha. Main ghabra gayi. Abhi main Vicky ke lund ke liye tayar nahin thi. Under ghus gaya to anarth ho jaayega. Maine neend toot jaane ka bahana karte hue ek angadai lee . Vicky ne jhat se apna lauda hata liya aur lehanga mere chootron par daal diya. Main uthate hue boli," Vicky hut bathroom jaane de."
" Didi, bahut gahari neend mein thi. Theek se soyi ki nahin. Main baith jata hun. Dono ek seat pe so nahin payenge."
" Main to bahut gahari neend mein thi. Thak gayi thi na. Tu to lagta hai soya hi nahin." Ye kah ke main bathroom chali gayi. Itni der tak uttejana ke karan pressure bahut zyada ho gaya tha. Peshaab karke raahat mili. Chootron par aur chootron ke beech mein haath lagaya to kuchh chipchipa sa laga. Shayad Vicky ka veerya tha. Waapas seat par aayi to Vicky bola " Didi aap so jaao main Kisi doosri seat pe chala jaata hun."
" Nahin main to so chuki hun tu lait ja. Mujhe laitna hoga to main tere peeche lait jaaungi."
" Theek hai didi. Main to lait raha hun." Vicky lait gaya. Peeth meri or thi. Main kaafi der tak baithi rahi aur phir Vicky ke peeche sat ke lait gayi. Pata nahin kub aankh lag gayi. Jab aankh khuli to savera ho chuka tha.
kramashah.........




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