Friday, July 11, 2014

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--127

FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--127

 कंटेनर बम्ब


सारे कस्टम एजेंट्स , टर्मिनल आपरेटर गुस्से में बाहर निकल गए।

कुछ शान्ति हुयी तो फिर करन ने काम शुरू किया और तमाम डिस्टर्बेंस के बावजूद , उसने १५ कंटेनर शार्ट लिस्ट कर लिए जिस पे उसे शक था।

लेकिन उसके बाद फिर डेड लाक होगया। उन १५ कंटेनर को खोल के चेक करने में भी तीन से चार घंटे लगते और इतना समय उसके पास नहीं था।

तबतक उसे दुहरी सहायता मिली।

एक तो नेवल सिगनल यूनिट से उसे सुचना मिली की शाम को तीन बजे पोर्ट के कंटेनर टर्मिनल के पास चार सिग्नल आये हैं। पडोसी देश से।



और ये सिगनल अबोटाबाद से जेनरेट हुए थे।

और करन का बल्ब नहीं ट्यूब लाइट जल गयी।

पडोसी देश के जिस कमांड और कंट्रोल सेंटर में उन्होंने सेंध लगायी थी , वहां से केबिल कनेक्शन कई पेरीफेरल सेंटर पे टर्मिनेट होते थे।

और अबोटाबाद वो टर्मिनल था जहाँ से पोर्ट के रास्ते और पोर्ट पे होने वाले हमले कंट्रोल होते थे।

उसने रीत और आनंद दोनों से बात की।

नेवल सिगनल इंटेलिजेंस यूनिट से भी और उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब पता चला की जहाँ से सिगनल आये थे और उस पेरीफेरल टर्मिनल की जगह एक ही थी।

और अब नेवल सिगनल यूनिट के लोग वो चार सिगनल जहाँ टर्मिनटे हुए थे , वो जगह ढूंढ रहे थे।

तब तक आनंद का मेसेज आया , उसके हैकर दोस्त अबोटाबाद के सिस्टम को हैक किये हुए डेटा को डि क्रिप्टकर रहे हैं , और उन्हें चार कंटेनर के नंबर मिल गए है और उस यूनिट के डिटेल जो ट्रांसपॉन्डर और रिसेप्शन यूनिट की तरह उन कंटेनर में काम कर रहे हैं।

उसीके साथ नेवल सिगनल यूनिट के एक सीनियर आफिसर खुद आये और उन्होंने कंटेनर की लोकशन बताई।

करण आनंद से मिले कंटेनर नंबर , कंप्यूटर पे चेक कर रहा था।
और उन की लोकेशन उस ने चेक कर ली थी।

वो वही थी जो नेवल सिगनल यूनिट के लोगों ने लॉकेट की थी।

उन लोगो ने जोर से हाई फाइव किया।

अभी आठ बजने में थोड़ा टाइम कम था और उन के पास दो अपग्रेडेड बॉम्ब डिस्पोजल यूनिट थीं।


लेकिन सबसे बढ़ के पोर्ट के लोगोंको अब खतरे का अहसास हो गया था और उन्होंने रेड इमरजेंसी डिक्लेयर कर दी थी। कुछ क्रेन आपरेटर , हैंडलर और इमरजेंसी सर्विस के लोगों के अलावा बाकी सारे लोगों को २० मिनट में पोर्ट एवैकुएट करने का आदेश देदिया गया था।


सारे कस्टम एजेंट , मशीन आपरेटर , शिपिंग लाइन के लोग जो आधे घंटे पहले हल्ला कर रहे थे , पोर्ट छोड़ने वालों में सबसे पहले थे।

करन ने सी सी टीवी कैमरों और लाइट्स की पोजीशन इसतरह करवा दी थी की उसके टेम्प कंट्रोल रूम में उनकी पिक्चर लगातार आ रही थी .

लेकिन कई बार जब लगता है , सब कुछ सुलझ गया है , तभी फिर से सब उलझ जाता है।

और वही हुआ।

आंनद के फोन से मामला सुलझ गया था , लेकिन अब फिर उसी के फोन ने मामला उलझा दिया था।

एक के बाद एक , कुल तीन बातें उस ने बतायी , और तीनो बुरी खबर थीं।

पहली बात ये थी की बॉम्ब डिस्पोजल स्क्वाड को तुरंत उन कंटेनर्स के पास से हटा दें और उन्हें मना कर दें की अगली सूचना तक उन्हें ना छेड़ें।

करन ने उसे होल्ड करा के तुरंत बॉम्ब डिस्पोजल स्क्वाड वालों को रुकने को बोला। वो कंटेनर के पास पहुँच गए थे।

साथ साथ ही नेवल इंटेलिजेंस यूनिट के लोगो नेभी तुरंत रिएक्ट किया। और नेवल कंट्रोल रूम , जहाँ रीत भी थी , तुरंत एक आर्मी के एस बॉम्ब डिटेक्शन स्क्वाड और दो बॉम्ब डिस्पोजल स्क्वाड कोभेजने को बोला।

अगली दो बातें और खतरनाक थी।

पहली बात से जुडी दूसरी बात थी। कंटेनर के अंदर बॉम्ब नहीं था। कंटेनर खुद ही बॉम्ब था। उसके चारों और सर्किट्स थीं , और एक बार एक्टिवेट पे कोई भी चीज अगर उसकै अंदर पेन्ट्रेट करने की कोशिश करेगी या सर्किट से छेड़छाड़ करेगी , तो बॉम्ब एक्सप्लोड हो जाएगा।

और उसकी कम्यनिकेशन सर्किट भी बहुत इम्पोर्टेन्ट है . वो २० मीटर के आसपास की सभी एक्टिविटी को वाइड ऐंगल लेंस से कवर करता है और रियल टाइम बेसिस पे सब कुछ कमांड सेंटर को बताता है।

तो अगर कमांड सेंटर को लगा की बाम्ब्स को डिफ्यूज किया जा रहा है तो वो एक्सप्लोजन ट्रिगर कर सकते हैं। गनीमत है की , हैकर्स ने पडोसी देश के न सिर्फ कमांड सेंटर बल्कि पेरीफेरल सेंटर के सारे कम्युनिकेशन सेंटर्स को शाम चार बजे से डीसऐबल कर दिया है। इसलिए अब कंटेनर बाम्ब्स के द्वारा कोई भी इमेज ट्रांस्मिट नहीं हो पाएगी।

लेकिन तीन बजे बॉम्ब एक्टिवेट कर दिया गया है इसलिए साढ़े नौ बजे और दस बजे के करीब बॉम्ब का एक्सप्लोजन होगा।

आखिरी बात सबसे घातक थी।

कंटेनर में कोई ट्रेडिशनल एक्सप्लोसिव मात्र नहीं है। उसमें कुछ ऐसे मैटीरीअल हैं जिसके बारे में कुछ ख़ास पता नहीं चल पा रहा है। इसलिए उस मैटीरियल का पता लगना बहुत जरुरी है।

जब करन ने आनन्द से पूछा तो फिर दोनों ने बात करके तय किया की , उन कनेटर्नर्स का हैण्ड हेल्ड स्कैनर्स से स्कैन किया जाय और पोर्टेबल एक्स रे से एक्स रे कर के , पता किया जाय।


 हेलीकाप्टर से आर्मी के स्पेशल सैपर्स एंड माइनर्स , जो बॉम्ब डिस्पोजल और बॉम्ब डिटेक्शन यूनिट के लोग थे आ गए थे।

करन ने सब ब्रीफ किया। कर्नल मूंदड़ा जो इस यूनिट के हेड थे पहला सवाल खड़ा किया , पोर्टेबल एक्स रे यूनिट कहाँ से आएगी।

पोर्ट के हॉस्पिटल में वो यूनिट मिल गयी।

लेकिन कर्नल मूंदड़ा ने जब कंटेनर की जांच शुरू की तो उन्होने अंदर के मैटीरियल की स्पेक्ट्रोस्कोपिक जांच भी की और जो एक्स रे , स्पेक्ट्रोस्कोपिक फोटोग्राफ आये थे उन्हें करन के पास भेजा और करन की हवा निकल गयी।

वो मैटीरियल ,बल्कि उसका फोटोग्राफ उसने देख रखा था।

और जब नेवल इंटेलिजेंस यूनिट के लोगों ने उसे कम्युनिकेशन यूनिट के बारे में बताया तो वो आधा सुन रहा था।

स्कैनिंग से ये पता चला की कंटेनर की तीन स्टेटस थीं , ग्रीन , येलो और रेड।


अभी वो येलो जोन में था।

ग्रीन जोन में रहने पर वो डिऐक्टिवेटेड कंडीशन में रहता है।

शाम को साढ़े तीन बजे किसी कमांड के द्वारा उसे ऐक्टिवेट कर दिया गया है बॉम्ब एक्सप्लोजन का टाइम ९. ५० का है। और जब वो रेड जोन में जाएगा तो उसके ७ मिनट के अंदर वोएक्सप्लोड कर जाएगा।

उसका टाइमर चल रहा था।

और तब तक कर्नल मूंदड़ा भी आ गए।

उन्होंने बोला की करन की सूचना एकदम सही थी ,और उसे डिफ्यूज करना एकदम असंभव है। उसमे सेंसर मोशन डिटेकटर और लाइट डिटेक्टर लगे है। और जैसे ही उसकी किसी भी सर्किट को कोई छुएगा या काटने की कोशिश करेगा वो एक्सप्लोड हो जाएगा।


दूसरी बात ये हैं की नॉर्मली बॉम्ब में एक कंट्रोल या डिटोनेटिंग यूनिट होती हैं। इसमें कमसे कम २५० अलग अलग माइक्रो प्राशेशर लगे हैं। एक बार बॉम्ब ऐक्टिवेट होने के बाद मास्टर कंट्रोल यूनिट सारे कंट्रोल ट्रांसफर कर देता है। इसलिए एक्सप्लोजन रोकने के लिए उन सारे २५० यूनिट्स को डिफ्यूज करना होगा।

दुसरे कंटेनर के अंदर कुछ कोलायड की तरह का पदार्थ भी है और ज्यादातर यूनिट उसके अंदर हैं। इसलिए वहां तक पहुँचना , बहुत मुश्किल है। उन्होंने सारी इन्फो नेवल कंट्रोल और आर्मी एच क्यू को पास कर दी है।

करन चुपचाप सुन रहा था।

उसकी परेशानी यही थी की उसे मालूम था की वो कोलायड क्या था।

और अब जब एकबार उसने उन कंटेनर की लोकेशन देखी , तो उसकी हालत और ख़राब हो गयी और उसने दुश्मन को मन ही मन सलाम किया।

परफेक्ट ,जस्ट परफेक्ट।

चार में से दो कंटेनर बॉम्ब , एन एस आई सी टी के टर्मिनल पर थे। और दोनों बी पी सी एल के लिक्विड कार्गो टर्मिनल पे थे।

और इस समय बी पी सी एल टर्मिनल के दोनों जेटी पर अनलोडिंग चल रही थी। एक पर नेप्था था जो हाइली इन्फ्लेमेबेल और एक्सप्लोसिव है।
और दूसरे पर एल पी जी।


हैंडलिंग दो घंटे पहले ही शुरू हुयी थी और कम से कम १२ घंटे लगते।

इनके पास सिर्फ डेढ़ घंटे का टाइम था।


अनलोडिंग रोकने में ही दो घंटे से कम नहीं लगता , और उससे कुछ ख़ास नहीं होता , क्योंकि दोनों शिप कंटेनर के दायरे में थे।


और उससे बड़ा खतरा सामने था।

वहां से २ किलोमीटर से कम के दायरे पर बूचर आइलैंड था। ओ एन जी सी का तेल यहाँ उतरता था और वहां पर उस के स्टोरेज टैंक थे , वहां से वह पाइप लाइन के जरिये वडाला जाता है , जहाँ उसे रिफाइन कर के स्टोर किया जाता है।

और अगर करन की आशंका सही है तो , इन कंटेनर के एक्सप्लोजन का असर उस आइलैंड पे रखे तेल के भण्डार , और मुम्बई की तेल की पाइप लाइन पर पड़ेगा।

जेटी में खड़े नेप्था और एल पी जी के शिप ,पास के पेट्रोलियम के स्टोरेज टैंक और आइलैंड का तेल भंडार आग से नष्ट होना निश्चित था।


करन ने कम्प्लीट इवैक्युएशन का आदेश दिया। ओ एन जी सी के अधिकारियों को भी बताने को बोला।

और अब उसने बाकी दोनों कंटेनर की लोकशन देखी जो जी आई टी टर्मिनल में थे।

एक जेटी के इतना पास था की कम से कम तीन जेटी पूरी तरह नष्ट हो जाती।
साथ में दो शिप , पोस्ट पैनामेक्स क्रेन्स सब कुछ।


एक कंटेनर , रिफर एरिया में था।

और पूरी रिफिंग फैसिलिटी तबाह हो जाती।

पोर्ट को वापस आने में महीनो लगते और साथ में देश की एक्सपोर्ट फैसिलिटी खत्म हो जाती।

वहां भी उसने खाली कराने का आर्डर दिया।


वह एकदम निराश होगया।


वह इवैक्यूशन केलिए नहीं आया था , बल्कि हमले को नाकाम करने के लिए आया था।


लेकिन उसे कुछ सूझ नहीं रहा था।

१० मिनट उसने आनंद और रीत से कांफ्रेंसिग की।

और अचानक उसे कुछ याद आया , जब वह पिछली बार पडोसी देश केअंदर घुसा था , रा में उसका पहला मिशन।


वहीँ उससे मुलाकात हुयी थी।

और उसने एक बार फिर नयी कोशिश शुरू कर दी।


उसी ने इस मैटीरियल के बारे में बताया था।

एक्स मैटर यही नाम दिया था उसने।

और उसी की तलाश थी उसको।

एकबार फिर करन ने स्पेक्ट्रोस्कोपी ,अल्ट्रास्कैन , और सारी रिपोर्ट्स देखीं , और उसका डर विश्वास में बदलगया।

यही था वो , दुनिया का सबसे भयानकविस्फोटक , जो अभी ट्रायलस्टेज में था और न इसको बनाने वाली कम्पनी ' एक्सप्लोसिका ' और नही वो देश इसके अस्तित्व को स्वीकार करते।

बड़ीबड़ी पहाड़ियों को तोड़ सकता था येऔर सबसे खतरनाक बात ये थी ,इसकी काट नहीं थी।मीलों दूर तक असर होता इसका।


करन ने चारो ओर निगाह दौड़ायी ,



अत्याधुनिक जेटी , ढेर सारे जहाज ,और उसमे से कई पेट्रोलियम से लदे , पेट्रोलियम के टैंक , सामने बूशर आइलैंड और वहांपर पेट्रोल का भण्डार , सब कुछ डेढ़घंटे में धूधूकर जल रहे होंगे।

पोर्ट के सारे इक्विपमेंट बर्बाद हो चुके होंगे।महीनों लगेंगे स्केलटल सर्विस शुरूकरने में।

ज्यादासे ज्यादा वो इवाक्युएट करा सकतेहैं हैं। वो भी पूरी तरह नहीं।

क्या करे कुछ समझ नहीं आरहा था।

सामने दुश्मन हो तो कोई लड़े भी ,लेकिन ये कंटेनर बॉम्ब जिन्हे डिफ्यूज भी नहीं किया जा सकता।

बस एक रास्ता था उस अमेरिकन से बात करे ,लेकिन उसे ढूंढना आसान था क्या।

अमेरिकन सरकार ने उसे हटा दिया था ,और अब वह किसी कैरेबियन आइलैंड में रहता था।

वह अकेला आदमी था जो उसे कुछ बता सकता था।


आई * आई की कस्टडी में दोनों साथ थे ,और भागने मेंदोनों ने मिल के जुगत लगायी थी , उससे वो निकल पाये थे ।

करन उसको सीओ कहता था। उसके अंदर वो सारे गुण भी थे।

डैशल हैमेट के मशहूर नावेल ' रेडहार्वेस्ट ' का मुख्य डिटेक्टिव ' कांटिनेंटल आप ' के नाम पर ,जो बिना हथियार के लड़ लेता था , लोगो के बीच अंतरद्वंद को बढ़ा, भड़का के।

और सीओ के इसी गुण कारण सख्त कैद में भी , वो जुगत लगा पाये।

सीओ उसे भोलाशंकर कहता था।

सीओगिनेचुनेलोगोंमेंथाजो डेल्टा और सील दोनों फोर्सेज में काम चूका था और २००१ में टोराबोरा की पहाड़ियों में ओसामा को पकड़ने के लिए जो चुंनिंदाफोर्स भेगयी थी ,उसका इंचार्ज था।

और उसने टोराबोरा की असली कहानी करन सुनाई और इस 'मैटीरियल ' की कहानी भी उसीसे जुडी हुयी थी।


टोरा बोरा की पहाड़ियां







९/११ के बाद जब अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं ने तालिबानी अफगानिस्तान पर हमला किया तो नार्दर्न अलायन्स ने उनका साथ दिया।



१२ नवम्बर को काबुल का पतन हुआ। उसके ४ दिन पहले तक ओसामा वहीँ पर था। काबुल की लड़ाई खत्म होने के पहले , ओसामा और उसके साथी , पहले जलालाबाद और फिर टोरा बोरा की पहाड़ियों में जा कर छुप गए।

सी ओ ने उस लड़ाई में महत्वपूर्ण हिस्सा लिया था। हाँ , वहां उस कोड नेम डालटन फ्यूरी था , और वो डेल्टा फोर्स का इन्तजार था।

टोरा बोरा , गुफाओ का एक संकुल है , जो सफेद पहाड़ों के बीच है और ये पूर्वी अफगानिस्तान में ,खैबर दर्रे के पास है। ये गुफाएं प्राकृतिक गुफाएं है और इससे पहले भी अस्सी के दशक में , जब अमरीकी फोर्सेज के साथ मिल कर तालिबान सोवियत रूस के साथ लड़ रहे थे , तो उन्होंने इन गुफाओं का इस्तेमाल किया था।


पहले इन गुफाओं के बारे में बड़ी कहानियाँ फैली की इनमे हाइड्रोिेलकटिक पावर है , होटल की सुविधाएं है , टैंक वहां है , और सारी गलत साबित हुईं।

वहां सिर्फ बंकर की तरह गुफाएं थीं , जिन्हे पहाड़ों का प्राकृतिक संरक्षण था।

करन के आँखों के सामने सीओ या डाल्टन फ्यूरी का चेहरा घूम रहा था।


उस लड़ाई का जब भी वो जिक्र करता , एक अजब सी चमक उसकी आँखों में कौंध उठती , लेकिन साथ में गुस्सा और दुःख भी।


वो टोरा बोरा की लड़ाई में शुरू से था। ३ दिसम्बर को सी आई ए की एक टुकड़ी के साथ , डेल्टा फोर्स की एक टुकड़ी , हेलीकाप्टर से जलालाबाद भेजी गयी। डाल्टन फ्यूरी ( कोड नेम ) इस डेल्टा फोर्स का लीडर था।


लेकिन परम्परागत लड़ाई , नार्दर्न फोर्सेज अलायन्स के लोग लड़ रहे थे , जिन्होंने ५ दिसम्बर तक लोवर हिल्स पर कब्ज़ा कर लिया था। लेकिन वहीँ परेशानियां शुरू हुयी।


लड़ाई का समय बहुत मुश्किल था , रात में टेम्प्रेचर ज़ीरो के नीचे होता था , और साथ में रमजान का महीना था। और नारदर्न अलायन्स के लोगों को रात में लड़ने में बहुत मुश्किल थी।

अमेरिकन एयर फोर्स ने लगातार भीषण बमबारी की।


और जिस हमले की बहुत चर्चा हुयी , डेजी कटर की , जो ९ दिसंबर को गिराया गया , १५,००० पाउंड वजन का , उसके बाद बी ५२ बॉम्बर्स ने लगातार बम गिराये। लेकिन करन को याद था सी ओ ने दुखद आवाज में बताया , उसका असर फील्ड में बहुत लिमिटेड था।

इन बॉम्ब अटैक्स में भी उसकी टुकड़ी का बड़ा हाथ था। उसका एक साथी , लेसर सिगनल से मार्क्स को पेंट करता था और बॉम्बर पर हमला करते थे।

लेकिन परेशानी ये थी की उसी लांगीट्यूड और लैटिट्यूड पर एनमी और फ्रेंडली फोर्सेज साथ होती थीं। फरक ऐल्टिट्यूड का होता था। और कई बार जब पाहड़ पे चट्टाने टूट कर लुढ़कती थी तो नार्दन अलायन्स के लोग ज्यादा नुकसान उठाते थे।

लेकिन सबसे बड़ी परेशानी थी , उनकी लोकेशन और सप्लाई लाइन।




ऊपर होने के कारण , उन्हें फायरिंग में एडवांटेज था और नार्दर्न अलायन्स की सेनाएं रिज के आगे नहीं बढ़ पाती थी। दूसरी बात थी उनकी सप्लाई लाइन।

इतनी बम्बारी के बाद भी उन्हें एम्युनिशन मिल रहे थे। तीन ओर से वो घिरे थे , दक्षिण , पश्चिम और उत्तर। लेकिन पीछे की और दर्रो से होता हुआ रास्ता साफ था। डाल्टन फ्यूरी , सिर्फ न कैमोफ्लाज में बल्कि रहनसहन और जुबान में भी अफगानी बन चूका था , पता लगाया।

और जो उसे पता लगा , वो किसी का भी दिल दहलाने के लिए काफी था।

पहले उसने ईस्टर्न अलायन्स के लोगों से सम्पर्क साधा ( वही ग्रुप , हमीद कर्जाई जिसके हैं ) और फिर अनेक ट्राइब के लोगों से।

और उसकी मुलाक़ात म्यूल से भी हुयी। ये वो लोग जो खच्चर पर तालिबान के लिए समान ,एम्युनिशन इत्यादि पाकिस्तान से लाते थे।


और उसे पता लगा की जलालबाद और पश्चिमी पाकिस्तान के फाटा ( फेडरली अड्मिनस्टर्ड ट्राइबल एरिया ) से उनकी सप्लाई लाइन बनी हुयी है। किसी भी आपरेशन में सप्लाई लाइन काटना बहुत जरुरी है।

और फिर उसने सी आई ए के अफगनिस्तान के चीफ , बर्नस्टीन को पूरी हालत बताई , तो उन्होंने एरिया कमांडर को अरजेंट मेसेज दिया , की कम से कम ८०० आर्मी रेंजर चाहिए जो ६X ६ स्क्वायर मील के एरिया को पूरी तरह से सील कर दें , जिससे सप्लाई लाइन बंद की जा सके और एस्केप को भी रोका जा सके।

मेसेज पहुंचा ही होगा की तुरंत , जनरल टॉमी फ्रैंक्स का आदेश आ गया की कोई एक्स्ट्रा फोर्सेज नहीं भेजी जाएंगी। लड़ने का काम नार्दर्न अलायंस के लोग करेंग। और इस आदेश पे डिफेंस सेक्रेटरी रम्सफील्ड की मुहर है।

जब भी वो इस घटना का जिक्र करता , उस के चेहरे पे दुःख और आक्रोश भर उठता।


ये और इसी तरह के अन्य निर्णय इस बात के लिए जिम्मेदार थे , की ओसामा और बाकी अल कायदा के लोग वहां से निकल भागने में सफल हुए। और वो लड़ाई जो दिसंबर २००१ में खत्म हो जाती , अभी तक चल रही है। अमेरिकी सिपाही कब के चले जाते वापस , इराक की लड़ाई शायद नहीं होती।


और इस आदेश के बाद से ही उसे शक था की कुछ गडबड है।

और इस की पुष्टि तब होगयी , जब उसकी फोर्स की रिक्वेस्ट , दो बार और ठुकरा दी गयीं।

एक बार उसने बोला की खैबर और उस के आस पास के दर्रो की सॅचूरेशन बॉम्बिंग की जाय जिससे सप्लाई लाइन तोड़ी जा सके, लेकिन वो भी बात नहीं मानी गयी। और उसी बीच १२ दिसम्बर के आसपास , नार्दर्न अलायन्स के लोगों ने सीजफायर कर दिया।

स्पेशल फोर्सेज की संख्या , १०० से कम थी।


और तभी एक म्यूल से उसे वो बात पता चली जो कहीं भी गोल्डन इन्फो होती।

वहां दवा की बहुत कमी हो गयी थी , और भारी सर्दी में कई लड़ाके , बर्फबारी में मारे गए थे।

मतलब साफ था की वो लोग अब जल्द ही वहां से इवैक्युएट करने वाले हैं।

और अब उसने एक बार फिर परमिशन मांगी की वो फाटा के इलाके में घुस के अपनी टीम के साथ उनका एस्केप रुट काट दे।

और इस बार न सिर्फ उसे मना किया गया , बल्कि वार्निंग भी दे दीगयी की वो आपरेशनल गोल्स को कम्प्रोमाइज मत करे।

और इंडिसीप्लीन माना जाएगा डाल्टन ने बताया की स्थिति खराब होती जा रही थी और उसे समझ में नहीं आरहा था की सेन्ट्रल कमांड हेडक्वार्टर ये बात क्यों नहीं समझ रहा है , की सप्लाई और रिट्रीट रोकने के लिए , खैबर दर्रे और उसके आस पास के रैवाइन्स को ब्लाक करना बहुत जरुरी है।

१० दिसम्बर को उसे सिग्नल इंटेलिजेंस यूनिट ने सूचना दी , " फादर ( बिन लादेन ) इज ट्राईंग टू ब्रेक थ्रू सीज लाइंस " .


अफगान लड़ाकुओं ने भी बताया की , ओसामा उनके साइट में है।

एक और रेडियो इंटरसेप्ट से डेल्टा फोर्स को ये पता चला की ओसामा १० मीटर के दायरे में है। लेकिन कुछ भी कर पाना मुश्किल था। और जब वो आगे बढे तो एक दूसरा रेडियो इंटरसेप्ट मिला जिसमें जो नयी लोकेशन दी गयी थी , वो पहले से दो किलोमीटर दूर थी।

उसके लिए ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था की , कौन बात माने , कौन नहीं माने। फिर भी फर्स्ट इन्फो के मुताबिक़ वो आगे बढ़ा और करीब १,९०० मीटर दूर तक पहुँच गया।

ओसामा के अब वो सबसे नजदीक था। लेकिन उसे आदेश दिया गया की नार्दन एलायंस के अफगान लड़ाकू के बिना वो कोई हमला न करे। उसके दो साथी दूसरी जगह लड़ाई में लगे थे। और शाम के बाद इफ़्तार का टाइम हो गया था और वो अलग हो गए थे।

और एक बार फिर कोई निर्णायक हमला नहीं हो पाया।

११ दिसंबर से ही नार्दर्न अलायन्स के लोगो ने सीज फायर की बात शुरू कर दी। और डाल्टन को ये लग रहा था की ओसामा के लोग टाइम बाई कर रहे हैं।


उसी दिन उस की बात डेल्टा फोर्सेज के हेडक्वारटर्स से
हुयी और उसने अपनी सारी शंका , आशंका बतायी।


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