Wednesday, September 2, 2015

FUN-MAZA-MASTI पराया पिया प्यारा लगे--6

FUN-MAZA-MASTI


पराया पिया प्यारा लगे--6





मैं उस की चूचियों को मसलते मसलते, कभी कभी उस की चूचियों की घुंडी को ज़ोर से दबा देता।
वो मेरे लण्ड को तेज़ी के साथ, सहलाने लगी थी।
मेरे कड़े लण्ड से थोड़ा थोड़ा पानी (प्री-कम) निकलने लगा था, जो लण्ड पे चिकनाई का काम कर रहा था।
अब उसके हाथ मेरे पुरे लण्ड पे तेज़ी के साथ चल रहे थे।
वो मेरे लण्ड पर सुपाड़े से लेकर जड़ तक और कभी कभी मेरे अंडकोष तक, अपने हाथ को घुमाने लगी थी।
उत्तेजना हर पल बढ़ती जा रही थी और हम अब तेज़ी से एक दूसरे के बदन को ज़ोर ज़ोर से दबाने और सहलाने लगे थे।
मैंने उसकी जांघों को थोड़ा फैला कर, अपना हाथ उसकी चूत पे रख कर, उस की चूत की फांको को अपनी उंगली से फैला कर, उस की चूत की दरार में अपने हाथ की बीच की उंगली घुसा दी।
मेरी उंगली उस की चूत के अंदर के दाने को टिक टिक कर के सहला रही थी।
अब उत्तेजना के मारे, वो अपनी कमर हिलाने लगी थी।
उस की चूत के दाने को काफ़ी देर तक सहलाने के बाद, मैं अपनी उंगली चूत के छेद पे रख कर अंदर की तरफ ठेलने लगा।
मेरी उंगली बड़ी आसानी से उसकी चूत में समा गई क्यों की काफ़ी लंबे समय से सहलाए और मसले जाने के कारण, उस की चूत पानी छोड़ने लगी थी।
मैं उस की चिकनी चूत में गचा गच उंगली पेले जा रहा था।
मेरी उंगली तेज़ी से, उस की चूत में अंदर बाहर होने लगी थी।
उस ने अपने होंठो को ज़ोर से दबा रखा था.. शायद उसने अपने मुँह से निकल पड़ने वाली व्याकुल सेक्सी उत्तेजक सिसकारियों को रोकने के लिए, ऐसा किया थी..
अपनी चूत में घुसती निकलती उंगली की तेज गति के साथ लय मिलाकर, वो अपनी कमर हिलाए जा रही थी।
वो मेरे लण्ड को भी ज़ोर ज़ोर से मसलने लगी थी।
हम दोनों उस वक़्त, स्वर्ग का आनंद उठा रहे थे।

फिर मिष्टी ने एका एक, मेरे लण्ड को कस के पकड़ कर अपनी जाँघों की तरफ खींचना शुरू किया।
मैंने अपना दाहिना पैर सीट के ऊपर किया और थोड़ा तिरछा होकर, अपनी कमर को उस की नंगी जाँघों से सटा दिया।
अब मेरा लण्ड उस के जांघों से टकरा रहा था।
उस ने भी अपने दाहिने पैर को सीट पे मोड़ कर रख लिया और मेरे उल्टे डाइरेक्षन में झुकते हुए, अपने चुत्तड़ को मेरे लंड पे सटा दिया।
अब मेरा लण्ड उस के चुत्तड़ के बीच की दरार पर, बस की रफ़्तार के साथ ही हिचकोले खा रहा था।
मैं अपनी कमर को हिलाते हुए उस की गाण्ड के बीच की दरार में, अपने लण्ड का धक्का लगाने लगा।
मेरा लण्ड उस के चुत्तड़ के बीच आगे पीछे घूमते हुए, पूरी मस्ती में उसकी गाण्ड के बीच सफ़र कर रहा था।
सफ़र में कभी मेरा लण्ड उस के गाण्ड के छेद से टकरा जाता तो कभी उस की चूत तक पहुँच जाता।
वो अपने चुत्तड़ को थोड़ा और तिरछा करते हुए, थोड़ा और झुक गई।
मैंने भी अब अपने चुत्तड़ को थोड़ा और तिरछा कर लिया, जिस से मेरा लण्ड अब उसके फुददी के छेद से सट गया।
उस की जांघों को अपने हाथ से पकड़ कर, मैंने अपना लण्ड उस की चूत में ठेलने की कोशिश की.. लेकिन, अंदर जाने के बजाय मेरा लण्ड फिसल कर उस की चूत पे आगे बढ़ गया..
मैं पोज़ बदल बदल कर, उस की चूत में अपना लण्ड घुसाने की कोशिश करता रहा और आख़िर मुझे कामयाबी मिल ही गई।
मेरा लण्ड उस की चूत के अंदर समा गया।
अब मैं उस की चूत में अपनी कमर हिलाते हुए, लण्ड को धकेलने लगा।
मेरा लण्ड उसकी चूत में अंदर बाहर होने लगा।
लेकिन स्थान की कमी के अभाव में धक्के लगाते वक्त, बार बार मेरा लण्ड उस की चूत के बाहर आ जाता था।
लण्ड के चूत से बाहर निकलते ही, वो अपने हाथ से पकड़ कर मेरे लण्ड को अपनी चूत में घुसा लेती थी और मैं फिर से धक्के लगा कर, उस की चूत को चोदने लगता था।

उस की चूत को इस तरह चलती बस में चोदने में, मुझे बड़ा अनोखा मज़ा मिल रहा था।
ऐसा मज़ा उसे या किसी और को चोदने में मुझे कभी नहीं मिला था।
वो भी पूरी मस्ती में अपना चूत चुदवाये जा रही थी।
उस की चूत को चोदते हुए, एका एक मेरे मन में शरारत सूझी।
मैंने सोचा की चूत से बार बार लण्ड बाहर निकल जा रहा है।
उस की चूत की जगह गाण्ड का कोण लण्ड पेलने के लिए, ज़्यादा सुविधा जनक है, इस लिए क्यों ना गाण्ड में ही लण्ड घुसा कर गाण्ड मारने की कोशिश की जाए।

ये सोच कर, मैं एक दम रोमांचित हो गया और अपने हाथ से लण्ड पकड़ कर मैंने उसे मिष्टी के गाण्ड पर टीका कर एक ज़ोर दार धक्का लगा दिया।

मेरे लण्ड का सुपाड़ा, मिष्टी के गाण्ड में फँस गया।
मैंने तुरंत बिना समय गँवाए, दो तीन धक्के उस के गाण्ड में जड़ दिए।
मेरा समुचा लण्ड उस की गाण्ड में समा गया।

जैसा मैंने सोचा था वैसे ही, चूत की बजाए गाण्ड में लण्ड पेलने में ज़्यादा आसानी हो रही थी।
लेकिन, इस का उल्टा असर मिष्टी पे पड़ा।
अचानक गाण्ड में लण्ड के घुसने से, वो एकाएक चीख पड़ी आआआहह हह हह आआह..!

उस की चीख से, हमारे उल्टी रो में बैठी लड़की की आँख खुल गई और हमें इस पोज़ में देख कर उस की आँखें हैरत से फटी रह गई।
लेकिन, मैं इतना ज़्यादा उत्तेजित हो चुका था की उस के देखने का परवाह किए बगैर मैं दनादन मिष्टी के गाण्ड में अपना लण्ड पेलता रहा।

मिष्टी की गाण्ड में घुसता निकलता लण्ड तो वो नहीं देख सकती थी क्यों की हमारा जिस्म चादर से ढाका हुआ था.. लेकिन, हमारे हिलते चूतड़ की गति से वो समझ चुकी थी की चलती बस में हम चुदाई में भिड़े हुए हैं..

उस के लगातार, हमारे तरफ देखते रहने से हम और अधिक उत्तेजित हो गये और मैं तेज़ी से मिष्टी के गाण्ड में अपना लण्ड आगे पीछे ठेलने लगा।

मुझ से भी ज़्यादा मिष्टी उत्तेजित हो चुकी थी और वो काफ़ी बोल्ड भी हो गई।
उस ने धीरे से चादर, हमारे बदन से सरका दी। अब वो लड़की और हैरत से हमारी तरफ देखने लगी थी।





मिष्टी के ब्लाउज और ब्रा खुले हुए थे और उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी जिस से उसकी नंगी, गोरी और सुडौल चिकनी जांघें बस के भीतर की हल्की लाइट में चमक रही थी।

मैं उस लड़की की आँखों के सामने, मिष्टी की गाण्ड में सटा सट अपना लण्ड पेले जा रहा था।

गाण्ड मराने में मिष्टी भी अपनी कमर हिला हिला कर, मेरी मदद कर रही थी और हमारी चुदाई का खेल वो लड़की आँखें फाडे देख रही थी।

करीब दस मिनट के धक्कों के बाद, मैं मिष्टी के गाण्ड में ही झड़ गया।
फिर हम सीधे होकर बैठ गये।

अभी भी हम में से किसी ने अपने कपड़े दुरुस्त नहीं किए थे।
अभी तक शायद वह लड़की मिष्टी की चूत या मेरा लण्ड नहीं देखा पा रही थी।

ठीक उसी समय, आगे से कोई गाड़ी आई जिस की हेडलाइट में हमारा नंगा जिस्म, मेरा लण्ड और मिष्टी की चूत और चूची चमक पड़ी।

मेरा लण्ड और मिष्टी की चूत और चूची को देख कर पता नहीं उस लड़की पे क्या असर पड़ा.. लेकिन, मेरे मन में उसे चोदने की इच्छा जाग उठी..

मैं इसी ख्याल में मिष्टी के होंठों को उस लड़की के सामने, चूमते हुए उस की चूचियों को ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा।
साथ ही मैंने अपने एक हाथ की उंगली से मिष्टी की चूत फैला कर, उस में उंगली घुसेड दी।

मिष्टी मेरे मुरझाए लण्ड को अपने हाथों में लेकर, उस के सामने ऐसे हिलाने लगी.. मानो, वो उस लड़की को चुदवाने का निमंत्रण दे रही हो..

ऐसा करते वक्त, मिष्टी ने उस लड़की की तरफ देखते हुए आँख मार दी।

इस पे उसने लड़की ने अपनी आँख बंद कर के अपना मुँह दूसरी तरफ फेर लिया.. लेकिन, हम देख सकते थे की उस की साँसें बड़ी तेज़ी से चल रही थीं..

कुछ देर तक ऐसे ही हम दोनों चलती बस में नंगे बैठे रहे, फिर हमने अपने कपड़े ठीक कर लिए।
इस घटना के करीब एक घंटे बाद, बस एक सुनसान जगह पे लोगों के पेशाब करने के लिए रुकी।

मैं बस से उतर कर, पेशाब करने चला गया।

मेरे बाद मिष्टी भी उतर कर, एक तरफ चल पड़ी।

उसके बाद वो लड़की भी उसी तरफ चल पड़ी, जिधर मिष्टी गई थी।
मैं उन्हें ही देख रहा था।

पेशाब कर के आते वक्त, वो दोनों आपस में कुछ बातें कर रही थीं।

बस चलने के बाद, मैंने धीरे से मिष्टी से पूछा की तुम्हारी क्या बातें हुई।
उसने बाद में बताने को कह के बात टाल दी।

घर पहुँच कर, उस ने कहा की वो लड़की बंद कमरे में हमारी चुदाई का खेल अपनी आँखों से देखना चाहती है।
उसने इसके लिए अपना नंबर भी दिया है.. ..!

हमारे सफ़र वाले दिन के बाद के अगले शनिवार को, करीब 12 बजे दिन में बस वाली लड़की के द्वारा दिए गये नंबर पे, मिष्टी ने उसे फोन किया।

उस से संपर्क हो जाने के बाद, मिष्टी ने उसे हमारे यहाँ आने का निमंत्रण दिया.. जिसे, उस ने स्वीकार करते हुए हमारा पता पूछा..

मिष्टी ने हमारे घर के पास के एक पार्क में मिल कर, उसे साथ लाने की बात बताकर संपर्क बिछेद कर दिया।
अब हम उस लड़की के बारे में बातें करते हुए, पार्क की तरफ चल पड़े।

रास्ते में मिष्टी ने बताया की बस से उतर कर पेशाब करने जाते समय, उस लड़की ने उसे गाली बकते हुए कहा था तुम्हें और तुम्हारे सौंदर्या को देख कर तुम मुझे बहुत अच्छी लगी थीं.. लेकिन, तुम तो बिल्कुल रंडी ही निकली..! क्या हिम्मत के साथ, तुमने चलती बस में चुदवा लिया..! और तो और, मेरे उठने का भी तुम्हें कोई ख्याल नहीं हुआ..! मुझे तो तुम्हारे रंडी होने का पूरा यकीन तब हुआ, जब तूने चुदवाने के बाद मेरे सामने अपनी चूचियों को और अपनी चूत को पसार कर दिखा दिया..! ऐसे चलती बस में चुदवाने में, वो भी मेरे सामने तुम्हें शरम भी नहीं आई..! क्या घर में भी तुम दूसरों के सामने ऐसे ही, चुदवा कर दिखाती हो..!

मैं बोली ऐसा मौका, आज तक तो नहीं आया..! लेकिन, अगर तुम देखना चाहो तो मैं तुम्हें अपनी चुदाई का खेल दिखा सकती हूँ..! देखना हो तो बोलो, ऐसा मौका बार बार नहीं मिलता..! मुझे चुदवाते देख कर, तुम्हारी भी चूत मस्त हो जाएगी..!

वो लड़की ठीक है..! लेकिन, ये होगा कैसे..! मेरी तो चूत अभी से ही चुलबुला रही है..!

मैं चिंता मत करो..! तुम अपना फोन नंबर दे दो..! मैं तुम से संपर्क कर लूँगी..! और उसने अपना फोन नंबर दे दिया था।
यही बातें करते, हम पार्क में पहुँच गये।










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