FUN-MAZA-MASTI
ट्यूशन का मजा-11
गतांक से आगे.............................
सर ने कहा "शाबास, बस पड़ा रह. तेरा काम हो गया. अब अपने आप सीख जायेगा पूरा लंड लेना" और मेरे सिर को अपने पेट से सटा कर बिस्तर पर लेट गये और मेरे बदन को अपनी मजबूत टांगों के बीच दबा लिया.
मैं मन लगाकर सर का लंड चूसने लगा. उनका लंड अब फ़टाफ़ट खड़ा होने लगा. आधा खड़ा लंड मुंह में भर कर मुझे बहुत मजा आ रहा था. पर एक ही मिनिट में सर का सुपाड़ा मेरे गले तक पहुंच गया और फ़िर मेरे गले को चौड़ा करके हलक के नीचे उतरने लगा. मुझे थोड़े घबराहट हुई, जब मैंने लंड मुंह से निकालना चाहा तो सर ने मेरे चेहरे को कस के अपने पेट पर दबा लिया "घबरा मत बेटे, ऐसे ही तो जायेगा अंदर, गले को ढीला कर, फ़िर तकलीफ़ नहीं होगी"
मेरा दम सा घुटने लगा. मैंने कसमसा कर सिर अलग करने की कोशिश की तो सर मुझे नीचे पटककर मेरे ऊपर चढ़ गये और मेरे सिर को कस के अपने नीचे दबा कर मेरे ऊपर ओंधे सो गये. उनकी झांटों में मेरा चहरा पूरा दब गया. "मैंने कहा ना घबरा मत. वैसे भी मैं तुझे छोड़ने वाला नहीं हूं. ये लेसन अब तुझे मैं पास करवा कर रहूंगा"
सर का लंड अब पूरा तन कर मेरे गले के नीचे उतर गया था. सांस लेने में भी तकलीफ़ हो रही थी. सर ने अपने तलवों और चप्पल के बीच मेरे लंड को पकड़ा और रगड़ने लगे. दम घुटने के बावजूद सर का लंड मुंह में बहुत मस्त लग रहा था. सर की झांटों में से भीनी भीनी खुशबू आ रही थी.
अचानक अपने आप मेरा गला ढीला पड गया और सर का बाकी लंड अपने आप मेरे हलक के नीचे उतर गया. मैं चटखारे ले लेकर लंड चूसने लगा.
"हां ... ऽ ऐसे ही मेरे बच्चे ... हां .... अब आया तू रास्ते पर, बस ऐसा ही चूस. अब ये लेसन आ रहा है तेरी समझ में ... बहुत अच्छे मेरे बेटे ... बस ऐसे ही चूस .... अब घबराना मत, मैं तेरे गले को धीरे धीरे चोदूंगा. ठीक है ना?"
मैं बोल तो नहीं सकता था पर मुंडी हिलाई. सर ने मेरे हाथ पकड़कर अपने चूतड़ों के इर्द गिर्द कर दिये "मुझे पकड़ ना प्यार से अनिल. मेरे चूतड़ दबा. शरमा मत. अपने सर के चूतड भी देख, लंड का मजा तो ले ही रहा है, इसके साथ साथ अपने सर का पिछवाड़ा भी देख. मजा आया ना? ये हुई ना बात, हां ऐसे ही अनिल ... और दबा जोर से"
मैं सर के चूतड़ों को बांहों में भरके उनको दबा रहा था. सर के चूतड़ अच्छे बड़े बड़े थे. सर अब हल्के हल्के मेरे मुंह को चोद रहे थे. मेरे गले में उनका लंड अंदर बाहर होता था तो अजीब सा लगता था, खांसी आती थी. मेरे मुंह में अब लार भर गयी थी इसलिये लंड आराम से मेरे गले में फ़िसल रहा था.
कुछ देर चोदने के बाद सर अपने बगल पर लेट गये और मेरा सिर छोड़कर बोले "अब तू खुद अपने मुंह से मेरे लंड को चोद, अंदर बाहर कर. ये होता है असली चूसना. बहुत अच्छा कर रहा है तू अनिल ... ऐसे ही कर .. आह .... ओह ... अनिल बेटे .... तू तो लगता है अव्वल मार्क लेगा इस लेसन में ... कहां मुझे लगा था कि तू फ़ेल न हो जाये और यहां ऽ ... ओह ... ओह ... तू एकदम एक्सपर्ट जैसा कर रहा है .... एकदम किसी रंडी जैसा .... हां ऐसे ही मेरे राजा ... पूरा निकाल और अंदर ले ... बार बार ... ऐसे ही ...."
सर मस्ती से भाव विभोर होकर मुझे शाबासी दे रहे थे और मेरे बालों में प्यार से उंगलियां चला रहे थे. सर का लंड नाग जैसा फ़ुफ़कार रहा था. मुझे न जाने क्या हुआ कि मैंने अचानक उसे पूरा मुंह से निकाला और ऊपर करके उसका निचला हिसा जीभ रगड़ रगड़ कर चाटने लगा. सर मस्ती से झूम उठे " आह ... हां ... हां मेरी जान ... मेरे बच्चे ... ऐसे ही कर .... ओह ... ओह "एक मिनिट वे मुझसे ऐसे ही लंड चटवाते रहे और फ़िर बाल पकड़कर लंड को फ़िर से मेरे मुंह में घुसाने की कोशिश करने लगे.
मेरी नजर दूसरे कमरे में गयी तो मैडम मुझे बड़े लाड़ से देख रही थीं. दीदी आंखें फाड़ कर मेरे कारनामे देख रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं भी इस तरह से सर का पूरा मूसल मुंह में ले सकता हूं. मैडम ने दीदी को जबरदस्ती अपने सामने बिठा लिया और उसके सिर को अपनी जांघों में जकड़कर अपनी बुर चुसवाने लगीं. मुझे देखकर उन्होंने इशारा किया कि बहुत अच्छे, लगे रहो.
मुझे गोद में लेकर सर बैठ गये और मेरे लंड को तरह तरह से रगड़ने लगे. कभी हथेलियों में लेकर बेलन सा रगड़ते, कभी एक हाथ से ऊपर से नीचे तक सहलाते तो कभी उसे मुठ्ठी में भरके दूसरे हाथ की हथेली मेरे सुपाड़े पर रगड़ते. मैं परेशान होकर मचलने लगा. बहुत मजा आ रहा था, रहा नहीं जा रहा था "सर ... प्लीज़ ... प्लीज़ सर .... रहा नहीं जाता सर"
चौधरी सर मेरा कान प्यार से पकड़कर बोले "ये मैं क्या सिखा रहा हूं मालूम है?"
"नहीं सर"
"मुठ्ठ मारने की याने हस्तमैथुन की अलग अलग तरह की तरकीब सिखा रहा हूं. समझा? और भी बहुत सी हैं, धीरे धीरे सब सिखा दूंगा. और एक बात .... ये सीख ले कि ऐसे मचलना नहीं चाहिये .... असली आनंद लेना हो तो खुद पर कंट्रोल रखकर मजा लेना चाहिये ... जैसे मैंने तुझसे आधे घंटे तक लंड चुसवाया, झड़ने के लिये दो मिनिट में काम तमाम नहीं किया .... समझा ना"
"हां सर ... सॉरी सर अब नहीं मचलूंगा." कहकर मैं चुपचाप बैठ गया और मजा लेने लगा. बस कभी कभी अत्याधिक आनंद से मेरी हिचकी निकल जाती. सामने देखा तो अब मैडम दीदी की टांगों में मुंह डाले बैठी थीं. दीदी उनके सिर को पकड़कर आगे पीछे हो रही थी और मेरी ओर पथरायी आंखों से देख रही थी. बहुत मस्ती में थी.
सर ने दस मिनिट और हर तरह से मेरी मुठ्ठ मारी. फ़िर पूछा "सबसे अच्छा क्या लगा बता ... कौनसा तरीका पसंद आया?"
"सर सब अच्छे हैं सर ... पर जब आप मुठ्ठी में लेकर अंगूठे को सुपाड़े के नीचे से दबाते हैं तो ... हां सर ... ओह ... ओह .. ऐसे ही .... तो झड़ने को आ जाता हूं सर ... हां... ओह ... ओह" मैं सिसक उठा.
सर ने मेरी उंगली मूंह में ली और चूसी. फ़िर बोले "अब तू ये अपनी गांड में कर. अच्छा ठहर, पहले जरा ..."उन्होंने वहां पड़ी नारियल की तेल की शीशी में से तेल मेरी उंगली पर लगाया और बोले "इसे धीरे धीरे अपने छेद पर लगा और उंगली डाल अंदर" शीशी के पास एक छोटी कुप्पी भी रखी थी. मुझे समझ में नहीं आया कि ये कुप्पी यहां क्यों है.
मैंने अपने गुदा में उंगली डाली. शुरू में जरा सा दर्द हुआ पर फ़िर मजा आ गया. क्या मखमली थी मेरी गांड अंदर से. मेरा लंड और तन्ना गया. सर मुसकराये "मजा आया ना? अब उंगली करता रह, मैं तुझे झड़ाता हूं, बहुत देर हो गयी है. यह सच है कि कंट्रोल करना चाहिये पर लंड को बहुत ज्यादा भी तड़पाना नहीं चाहिये" और मेरी मुठ्ठ मारने लगे. मैंने अपनी गांड में जोर से उंगली की और एक मिनिट में तड़प के झड़ गया "ओह ... ओह ... हाय सर ... मर गया सर ... उई मां ऽ "
सर ने मेरे उछलते सुपाड़े के सामने अपनी हथेली रखी और मेरा सारा वीर्य उसमें इकठ्ठा कर लिया. लंड शांत होने पर मुझे हथेली दिखाई. मेरे सफ़ेद गाढ़े वीर्य से वो भर गयी थी.
"ये देख अनिल ... ये प्रसाद है काम देव का ... खास कर तेरे जैसे सुंदर नौजवान का वीर्य याने तो ये मेवा है मेवा. समझा ना? जो ये मेवा खायेगा वो बड़ा भाग्यशाली होगा. अब मैं ही इसे पा लेता हूं, आखिर मेरी मेहनत है ... ठीक है ना... वो देख तेरी मैडम इधर आ रही है"
क्रमशः। ...........................
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सर ने कहा "शाबास, बस पड़ा रह. तेरा काम हो गया. अब अपने आप सीख जायेगा पूरा लंड लेना" और मेरे सिर को अपने पेट से सटा कर बिस्तर पर लेट गये और मेरे बदन को अपनी मजबूत टांगों के बीच दबा लिया.
मैं मन लगाकर सर का लंड चूसने लगा. उनका लंड अब फ़टाफ़ट खड़ा होने लगा. आधा खड़ा लंड मुंह में भर कर मुझे बहुत मजा आ रहा था. पर एक ही मिनिट में सर का सुपाड़ा मेरे गले तक पहुंच गया और फ़िर मेरे गले को चौड़ा करके हलक के नीचे उतरने लगा. मुझे थोड़े घबराहट हुई, जब मैंने लंड मुंह से निकालना चाहा तो सर ने मेरे चेहरे को कस के अपने पेट पर दबा लिया "घबरा मत बेटे, ऐसे ही तो जायेगा अंदर, गले को ढीला कर, फ़िर तकलीफ़ नहीं होगी"
मेरा दम सा घुटने लगा. मैंने कसमसा कर सिर अलग करने की कोशिश की तो सर मुझे नीचे पटककर मेरे ऊपर चढ़ गये और मेरे सिर को कस के अपने नीचे दबा कर मेरे ऊपर ओंधे सो गये. उनकी झांटों में मेरा चहरा पूरा दब गया. "मैंने कहा ना घबरा मत. वैसे भी मैं तुझे छोड़ने वाला नहीं हूं. ये लेसन अब तुझे मैं पास करवा कर रहूंगा"
सर का लंड अब पूरा तन कर मेरे गले के नीचे उतर गया था. सांस लेने में भी तकलीफ़ हो रही थी. सर ने अपने तलवों और चप्पल के बीच मेरे लंड को पकड़ा और रगड़ने लगे. दम घुटने के बावजूद सर का लंड मुंह में बहुत मस्त लग रहा था. सर की झांटों में से भीनी भीनी खुशबू आ रही थी.
अचानक अपने आप मेरा गला ढीला पड गया और सर का बाकी लंड अपने आप मेरे हलक के नीचे उतर गया. मैं चटखारे ले लेकर लंड चूसने लगा.
"हां ... ऽ ऐसे ही मेरे बच्चे ... हां .... अब आया तू रास्ते पर, बस ऐसा ही चूस. अब ये लेसन आ रहा है तेरी समझ में ... बहुत अच्छे मेरे बेटे ... बस ऐसे ही चूस .... अब घबराना मत, मैं तेरे गले को धीरे धीरे चोदूंगा. ठीक है ना?"
मैं बोल तो नहीं सकता था पर मुंडी हिलाई. सर ने मेरे हाथ पकड़कर अपने चूतड़ों के इर्द गिर्द कर दिये "मुझे पकड़ ना प्यार से अनिल. मेरे चूतड़ दबा. शरमा मत. अपने सर के चूतड भी देख, लंड का मजा तो ले ही रहा है, इसके साथ साथ अपने सर का पिछवाड़ा भी देख. मजा आया ना? ये हुई ना बात, हां ऐसे ही अनिल ... और दबा जोर से"
मैं सर के चूतड़ों को बांहों में भरके उनको दबा रहा था. सर के चूतड़ अच्छे बड़े बड़े थे. सर अब हल्के हल्के मेरे मुंह को चोद रहे थे. मेरे गले में उनका लंड अंदर बाहर होता था तो अजीब सा लगता था, खांसी आती थी. मेरे मुंह में अब लार भर गयी थी इसलिये लंड आराम से मेरे गले में फ़िसल रहा था.
कुछ देर चोदने के बाद सर अपने बगल पर लेट गये और मेरा सिर छोड़कर बोले "अब तू खुद अपने मुंह से मेरे लंड को चोद, अंदर बाहर कर. ये होता है असली चूसना. बहुत अच्छा कर रहा है तू अनिल ... ऐसे ही कर .. आह .... ओह ... अनिल बेटे .... तू तो लगता है अव्वल मार्क लेगा इस लेसन में ... कहां मुझे लगा था कि तू फ़ेल न हो जाये और यहां ऽ ... ओह ... ओह ... तू एकदम एक्सपर्ट जैसा कर रहा है .... एकदम किसी रंडी जैसा .... हां ऐसे ही मेरे राजा ... पूरा निकाल और अंदर ले ... बार बार ... ऐसे ही ...."
सर मस्ती से भाव विभोर होकर मुझे शाबासी दे रहे थे और मेरे बालों में प्यार से उंगलियां चला रहे थे. सर का लंड नाग जैसा फ़ुफ़कार रहा था. मुझे न जाने क्या हुआ कि मैंने अचानक उसे पूरा मुंह से निकाला और ऊपर करके उसका निचला हिसा जीभ रगड़ रगड़ कर चाटने लगा. सर मस्ती से झूम उठे " आह ... हां ... हां मेरी जान ... मेरे बच्चे ... ऐसे ही कर .... ओह ... ओह "एक मिनिट वे मुझसे ऐसे ही लंड चटवाते रहे और फ़िर बाल पकड़कर लंड को फ़िर से मेरे मुंह में घुसाने की कोशिश करने लगे.
मेरी नजर दूसरे कमरे में गयी तो मैडम मुझे बड़े लाड़ से देख रही थीं. दीदी आंखें फाड़ कर मेरे कारनामे देख रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि मैं भी इस तरह से सर का पूरा मूसल मुंह में ले सकता हूं. मैडम ने दीदी को जबरदस्ती अपने सामने बिठा लिया और उसके सिर को अपनी जांघों में जकड़कर अपनी बुर चुसवाने लगीं. मुझे देखकर उन्होंने इशारा किया कि बहुत अच्छे, लगे रहो.
मुझे
बड़ा फ़क्र हुआ कि सर को मैं इतना सुख दे रहा हूं. मैंने फ़िर से उनका लंड
मुंह में ले लिया और आराम से निगल लिया. अब लंड निगलने में मुझे कोई तकलीफ़
नहीं हो रही थी, ऐसा लगता था कि ये काम मैं सालों से कर रहा हूं. सर ने
घुटने मोड़े तो मेरा हाथ उनके पैर में लगा. मैं अपना हाथ उनके पैरों के तलवे
और चप्पल पर फ़िराने लगा. सर की चप्पल बड़ी मुलायम थी, उसे छूने में मजा आ
रहा था.
अब मैं सर की मलाई के लिये भूखा था. लगता था कि चबा चबा कर उनका लंड खा जाऊं. मेरे हाथ उनके मजबूत मोटे चूतड़ों पर घूम रहे थे. मेरी उंगली उनकी गांड के बीच की लकीर पर गयी और बिना सोचे मैंने अपनी उंगली उनके छेद से भिड़ा दी. सर ऐसे बिचके जैसे बिच्छू काट खाया हो. अपने चूतड़ हिला हिला कर वे मेरे मुंह में लंड पेलने लगे. "अनिल, उंगली अंदर डाल दे, ये अगले लेसन में मैं करवाने वाला था पर तू ... इतना मस्त सीख रहा है .... चल उंगली कर अंदर"
मैंने सर की गांड में उंगली डाली और चूतड़ पकड़कर सिर आगे पीछे करके अपने मुंह से लंड बार बार अंदर बाहर करते हुए चूसने लगा. बीच में सुपाड़े को जीभ और तालू के बीच लेकर दबा देता. मेरी उंगली उककी गांड बराबर खोद रही थी. सर ऐसे बिचके कि मेरा सिर पकड़ा और उसे ऐसे चोदने लगे जैसे किसी फ़ूटबाल को चोद रहे हों. उनका लंड उछला और मेरे मुंह में वीर्य उगलने लगा. एक दो पिचकारियां सीधे मेरे गले में उतर गयीं.
फ़िर सर ने ही अपना लंड बाहर खींचा और मेरी जीभ पर सुपाड़ा रखकर उसे प्यार से झड़ाने लगे. उनकी सांस तेज चल रही थी "बहुत अच्छे अनिल .... क्या बात है .... अरे तू छुपा रुस्तम निकला बेटे .... तेरी मैडम भी इतना अच्छा नहीं करती .... लगता है तुझे ये कला जनम से आती है .... ले बेटे .... मजे कर .... ले मेरी मलाई खा ...ऐश कर ... गाढ़ी है ना? .... जैसी तुझे अच्छी लगती है?"
मैं चटखारे ले लेकर सर का वीर्य पीता रहा. एकदम चिपचिपा लेई जैसा था पर स्वाद लाजवाब था. मैंने अब भी सर के चूतड़ पकड़ रखे थे और मेरी उंगली उनकी गांड में थी. मेरा ध्यान पीछे के आइने पर गया उसमें सर का पिछवाड़ा दिख रहा था. क्या चूतड थे सर के, पहली बार मैं ठीक से देख रहा था. गोरे गोरे और गठे हुए.
मुझे पूरा वीर्य पिलाकर सर ने मुझे आलिंगन में लिया और मेरे निपल मसलते हुए बोले "भई मान गये आज अनिल, चेला गुरू से आगे निकल गया, तुझमें तो कला है कला लंड चूसने की. अपने सर का प्रसाद अच्छा लगा?"
"हां सर, बहुत मस्त है, इतना सुंदर लंड है सर आपका, दीदी भी कल गुन गा रही थी ...... और स्वाद भी उतना ही अच्छा है सर सर ..... आपकी ....मेरा मतलब है कि आप के .... याने" और सकुचा कर चुप हो गया.
"बोलो बेटे ... मेरे क्या" सर ने मुझे पुचकारा.
"सर आपके चूतड़ भी कितने अच्छे हैं" मैं बोला.
"ऐसी बात है? अरे तो शरमाते क्यों हो? ये तो मेरे लिये बड़े हौसले की बात है कि तेरे जैसे चिकने लड़के को मेरे चूतड़ .... या मेरी गांड कहो ... ठीक है ना? .... गांड अच्छी लगी. ठीक से देखना चाहोगे?"
"हां सर" मैं धीरे से बोला.
"लो बेटे, कर लो मुराद पूरी. वैसे ये तेरा आज का दूसरा लेसन है. बड़ी जल्दी जल्दी लेसन ले रहा है आज तू अनिल, आज ही पढ़ाई खतम करनी है क्या?" कहते हुए सर ओंधे लेट गये. उनके चूतड़ दिख रहे थे. मैं उनके पास बैठा और उनको हाथ से सहलाने लगा. फ़िर एक उंगली सर की गांड में डालने की कोशिश करने लगा, कनखियों से देखा कि बुरा तो नहीं मान गये पर सर तो आंखें बंद करके मजा ले रहे थे. उंगली ठीक से गयी नहीं, सर ने छल्ला सिकोड़ कर छेद काफ़ी टाइट कर लिया था.
"गीली कर ले अनिल मुंह में ले के, फ़िर डाल" सर आंखें बंद किये ही बोले. मैंने अपनी उंगली मुंह में ले के चूसी और फ़िर सर की गांड में डाल दी. आराम से चली गयी. "अंदर बाहर कर अनिल. ऐसे ही ... हां ... अब इधर उधर घुमा.... जैसे टटोल रहा हो... हां ऐसे ही ... बहुत अच्छे बेटे ... कैसा लग रहा है अनिल .... मेरी गांड अंदर से कैसी है .... मैडम की चूत जैसी है?..."
मैंने कहा "बहुत मुलायम है सर ... एकदम मखमली .....मैडम की चूत से ज्यादा टाइट भी है"
"तूने कभी खुद की गांड में उंगली नहीं की?" चौधरी सर ने पूछा.
"सर .... एक बार की थी पर दर्द होता है"
"मूरख.... सूखी की होगी .... वैसे तेरी तो मैडम या लीना की चूत से ज्यादा मुलायम होगी. ये लेसन समझ ले ... गांड भी चूत जैसी ही कोमल होती है और उससे भी चूत जैसा ही .... चूत से ज्यादा आनंद लिया जा सकता है ... ये मैं तुझे अगले लेसन में और बताऊंगा."
फ़िर वे उठ कर बैठ गये. उनका लंड आधा खड़ा हो गया था. "अब आ मेरे पास, तुझे जरा मजा दूं अलग किस्म का. देख तेरा कैसा खड़ा है मस्त"
अब मैं सर की मलाई के लिये भूखा था. लगता था कि चबा चबा कर उनका लंड खा जाऊं. मेरे हाथ उनके मजबूत मोटे चूतड़ों पर घूम रहे थे. मेरी उंगली उनकी गांड के बीच की लकीर पर गयी और बिना सोचे मैंने अपनी उंगली उनके छेद से भिड़ा दी. सर ऐसे बिचके जैसे बिच्छू काट खाया हो. अपने चूतड़ हिला हिला कर वे मेरे मुंह में लंड पेलने लगे. "अनिल, उंगली अंदर डाल दे, ये अगले लेसन में मैं करवाने वाला था पर तू ... इतना मस्त सीख रहा है .... चल उंगली कर अंदर"
मैंने सर की गांड में उंगली डाली और चूतड़ पकड़कर सिर आगे पीछे करके अपने मुंह से लंड बार बार अंदर बाहर करते हुए चूसने लगा. बीच में सुपाड़े को जीभ और तालू के बीच लेकर दबा देता. मेरी उंगली उककी गांड बराबर खोद रही थी. सर ऐसे बिचके कि मेरा सिर पकड़ा और उसे ऐसे चोदने लगे जैसे किसी फ़ूटबाल को चोद रहे हों. उनका लंड उछला और मेरे मुंह में वीर्य उगलने लगा. एक दो पिचकारियां सीधे मेरे गले में उतर गयीं.
फ़िर सर ने ही अपना लंड बाहर खींचा और मेरी जीभ पर सुपाड़ा रखकर उसे प्यार से झड़ाने लगे. उनकी सांस तेज चल रही थी "बहुत अच्छे अनिल .... क्या बात है .... अरे तू छुपा रुस्तम निकला बेटे .... तेरी मैडम भी इतना अच्छा नहीं करती .... लगता है तुझे ये कला जनम से आती है .... ले बेटे .... मजे कर .... ले मेरी मलाई खा ...ऐश कर ... गाढ़ी है ना? .... जैसी तुझे अच्छी लगती है?"
मैं चटखारे ले लेकर सर का वीर्य पीता रहा. एकदम चिपचिपा लेई जैसा था पर स्वाद लाजवाब था. मैंने अब भी सर के चूतड़ पकड़ रखे थे और मेरी उंगली उनकी गांड में थी. मेरा ध्यान पीछे के आइने पर गया उसमें सर का पिछवाड़ा दिख रहा था. क्या चूतड थे सर के, पहली बार मैं ठीक से देख रहा था. गोरे गोरे और गठे हुए.
मुझे पूरा वीर्य पिलाकर सर ने मुझे आलिंगन में लिया और मेरे निपल मसलते हुए बोले "भई मान गये आज अनिल, चेला गुरू से आगे निकल गया, तुझमें तो कला है कला लंड चूसने की. अपने सर का प्रसाद अच्छा लगा?"
"हां सर, बहुत मस्त है, इतना सुंदर लंड है सर आपका, दीदी भी कल गुन गा रही थी ...... और स्वाद भी उतना ही अच्छा है सर सर ..... आपकी ....मेरा मतलब है कि आप के .... याने" और सकुचा कर चुप हो गया.
"बोलो बेटे ... मेरे क्या" सर ने मुझे पुचकारा.
"सर आपके चूतड़ भी कितने अच्छे हैं" मैं बोला.
"ऐसी बात है? अरे तो शरमाते क्यों हो? ये तो मेरे लिये बड़े हौसले की बात है कि तेरे जैसे चिकने लड़के को मेरे चूतड़ .... या मेरी गांड कहो ... ठीक है ना? .... गांड अच्छी लगी. ठीक से देखना चाहोगे?"
"हां सर" मैं धीरे से बोला.
"लो बेटे, कर लो मुराद पूरी. वैसे ये तेरा आज का दूसरा लेसन है. बड़ी जल्दी जल्दी लेसन ले रहा है आज तू अनिल, आज ही पढ़ाई खतम करनी है क्या?" कहते हुए सर ओंधे लेट गये. उनके चूतड़ दिख रहे थे. मैं उनके पास बैठा और उनको हाथ से सहलाने लगा. फ़िर एक उंगली सर की गांड में डालने की कोशिश करने लगा, कनखियों से देखा कि बुरा तो नहीं मान गये पर सर तो आंखें बंद करके मजा ले रहे थे. उंगली ठीक से गयी नहीं, सर ने छल्ला सिकोड़ कर छेद काफ़ी टाइट कर लिया था.
"गीली कर ले अनिल मुंह में ले के, फ़िर डाल" सर आंखें बंद किये ही बोले. मैंने अपनी उंगली मुंह में ले के चूसी और फ़िर सर की गांड में डाल दी. आराम से चली गयी. "अंदर बाहर कर अनिल. ऐसे ही ... हां ... अब इधर उधर घुमा.... जैसे टटोल रहा हो... हां ऐसे ही ... बहुत अच्छे बेटे ... कैसा लग रहा है अनिल .... मेरी गांड अंदर से कैसी है .... मैडम की चूत जैसी है?..."
मैंने कहा "बहुत मुलायम है सर ... एकदम मखमली .....मैडम की चूत से ज्यादा टाइट भी है"
"तूने कभी खुद की गांड में उंगली नहीं की?" चौधरी सर ने पूछा.
"सर .... एक बार की थी पर दर्द होता है"
"मूरख.... सूखी की होगी .... वैसे तेरी तो मैडम या लीना की चूत से ज्यादा मुलायम होगी. ये लेसन समझ ले ... गांड भी चूत जैसी ही कोमल होती है और उससे भी चूत जैसा ही .... चूत से ज्यादा आनंद लिया जा सकता है ... ये मैं तुझे अगले लेसन में और बताऊंगा."
फ़िर वे उठ कर बैठ गये. उनका लंड आधा खड़ा हो गया था. "अब आ मेरे पास, तुझे जरा मजा दूं अलग किस्म का. देख तेरा कैसा खड़ा है मस्त"
मुझे गोद में लेकर सर बैठ गये और मेरे लंड को तरह तरह से रगड़ने लगे. कभी हथेलियों में लेकर बेलन सा रगड़ते, कभी एक हाथ से ऊपर से नीचे तक सहलाते तो कभी उसे मुठ्ठी में भरके दूसरे हाथ की हथेली मेरे सुपाड़े पर रगड़ते. मैं परेशान होकर मचलने लगा. बहुत मजा आ रहा था, रहा नहीं जा रहा था "सर ... प्लीज़ ... प्लीज़ सर .... रहा नहीं जाता सर"
चौधरी सर मेरा कान प्यार से पकड़कर बोले "ये मैं क्या सिखा रहा हूं मालूम है?"
"नहीं सर"
"मुठ्ठ मारने की याने हस्तमैथुन की अलग अलग तरह की तरकीब सिखा रहा हूं. समझा? और भी बहुत सी हैं, धीरे धीरे सब सिखा दूंगा. और एक बात .... ये सीख ले कि ऐसे मचलना नहीं चाहिये .... असली आनंद लेना हो तो खुद पर कंट्रोल रखकर मजा लेना चाहिये ... जैसे मैंने तुझसे आधे घंटे तक लंड चुसवाया, झड़ने के लिये दो मिनिट में काम तमाम नहीं किया .... समझा ना"
"हां सर ... सॉरी सर अब नहीं मचलूंगा." कहकर मैं चुपचाप बैठ गया और मजा लेने लगा. बस कभी कभी अत्याधिक आनंद से मेरी हिचकी निकल जाती. सामने देखा तो अब मैडम दीदी की टांगों में मुंह डाले बैठी थीं. दीदी उनके सिर को पकड़कर आगे पीछे हो रही थी और मेरी ओर पथरायी आंखों से देख रही थी. बहुत मस्ती में थी.
सर ने दस मिनिट और हर तरह से मेरी मुठ्ठ मारी. फ़िर पूछा "सबसे अच्छा क्या लगा बता ... कौनसा तरीका पसंद आया?"
"सर सब अच्छे हैं सर ... पर जब आप मुठ्ठी में लेकर अंगूठे को सुपाड़े के नीचे से दबाते हैं तो ... हां सर ... ओह ... ओह .. ऐसे ही .... तो झड़ने को आ जाता हूं सर ... हां... ओह ... ओह" मैं सिसक उठा.
सर ने मेरी उंगली मूंह में ली और चूसी. फ़िर बोले "अब तू ये अपनी गांड में कर. अच्छा ठहर, पहले जरा ..."उन्होंने वहां पड़ी नारियल की तेल की शीशी में से तेल मेरी उंगली पर लगाया और बोले "इसे धीरे धीरे अपने छेद पर लगा और उंगली डाल अंदर" शीशी के पास एक छोटी कुप्पी भी रखी थी. मुझे समझ में नहीं आया कि ये कुप्पी यहां क्यों है.
मैंने अपने गुदा में उंगली डाली. शुरू में जरा सा दर्द हुआ पर फ़िर मजा आ गया. क्या मखमली थी मेरी गांड अंदर से. मेरा लंड और तन्ना गया. सर मुसकराये "मजा आया ना? अब उंगली करता रह, मैं तुझे झड़ाता हूं, बहुत देर हो गयी है. यह सच है कि कंट्रोल करना चाहिये पर लंड को बहुत ज्यादा भी तड़पाना नहीं चाहिये" और मेरी मुठ्ठ मारने लगे. मैंने अपनी गांड में जोर से उंगली की और एक मिनिट में तड़प के झड़ गया "ओह ... ओह ... हाय सर ... मर गया सर ... उई मां ऽ "
सर ने मेरे उछलते सुपाड़े के सामने अपनी हथेली रखी और मेरा सारा वीर्य उसमें इकठ्ठा कर लिया. लंड शांत होने पर मुझे हथेली दिखाई. मेरे सफ़ेद गाढ़े वीर्य से वो भर गयी थी.
"ये देख अनिल ... ये प्रसाद है काम देव का ... खास कर तेरे जैसे सुंदर नौजवान का वीर्य याने तो ये मेवा है मेवा. समझा ना? जो ये मेवा खायेगा वो बड़ा भाग्यशाली होगा. अब मैं ही इसे पा लेता हूं, आखिर मेरी मेहनत है ... ठीक है ना... वो देख तेरी मैडम इधर आ रही है"
क्रमशः। ...........................
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