Friday, March 7, 2014

FUN-MAZA-MASTI चट मंगनी चट ब्याह-12

FUN-MAZA-MASTI
  
 चट मंगनी चट ब्याह-12

 माला की मनःस्थिति इस समय अवर्णनीय थी - मदिरा, निद्रा, परिश्रम, और संभोग - इन चार विषयों के प्रभाव में वह अचानक ही शिथिल और निर्बल हो कर बिस्तर पर ढेर हो गयी। उसका शरीर किस स्थिति में था, उसको इस समय ऐसी लज्जा और मर्यादा का कोई ध्यान नहीं था। रूद्र खुद भी थोडा खिन्न था - उसने ऐसा कुछ भी करने की सपने में भी नहीं सोची थी, किन्तु आज कुछ परिस्थितियां ही ऐसी थीं, की उसको यह सब करना पड़ा। वह भी अन्यमनस्क सा होकर माला के ऊपर से हट गया। माला लेकिन अपनी दोनों जांघें खोले हुए अपनी अभी अभी भोगी हुई योनि का प्रदर्शन कर रही थी और उसको इसका कोई अभिज्ञान भी नहीं था। उसकी योनि की गुलाब जैसी पंखुडियां सम्भोग के घर्षण से गहरे रंग की हो गयी थीं, और घने बालों के बीच से कुछ अजीब सी दिख रही थी। उन दोनों की मनःस्थिति चाहे कैसी भी रही हो, पल्लवी को एक अबूझ आनंद मिल रहा था और उसकी कामुकता भी अब पूरे शिखर पर थी। ऐसा तो कभी नहीं हुआ - वो चारों एक ही कमरे में पूर्ण नग्न उपस्थित थे।
पल्लवी को अपने पापा के लिए थोडा सा दुःख हो रहा था - योजना के अनुसार रूद्र और पल्लवी के रति-संयोग के दृश्य से प्रेरित होकर पापा और माँ दोनों भी सम्भोग करने वाले थे, किन्तु हो कुछ और गया। पापा को क्या मज़ा आएगा ऐसे? उनको भी चांस मिलना चाहिए - आखिर माँ की योनि पर हक़ तो उन्ही का है! पापा को तैयार करना पड़ेगा। और इसमें कोई दो राय नहीं थी। संभवतः पापा अपनी ही पैदा की हुई इस विचित्र परिस्थिति में अपने आपको असहाय (उनकी पत्नी को कोई और भोग गया) और अपर्याप्त (उनका लिंग रूद्र के लिंग से कमतर था) महसूस कर रहे हैं।

"पा…पा…?"

विराट ने पल्लवी को चौंक कर देखा - पिछले कोई पांच मिनट में कहे गए यह पहले संसक्त शब्द थे। विराट के साथ साथ रूद्र ने भी चौंक कर देखा। माला ने भी अवश्य ही यह शब्द सुने होंगे, लेकिन अभी वह आनंद के सागर में गोते लगा रही थी।

"यू आल्सो हैव टू मेक लव टू माँ …."

मेक लव? कहाँ तो उसने माला की चुदाई का एक मसालेदार प्रोग्राम बनाया था और कहाँ कोई और उसको चोद कर चला गया। रूद्र एक तो जवान था और दूसरा उसका लिंग उसके लिंग के मुकाबले अधिल बलशाली था - इसलिए विराट को बहुत अधिक बुरा नहीं लगा। लेकिन, इस समय उसकी वही हालत थी की हाथ आया और मुँह को न लगा।


'मेक लव तो कर लूँ … लेकिन यह मरा छुन्नू तो खड़ा हो!' विराट ने मन ही मन कोसते हुए सोचा और उसकी सोच के साथ उसकी दृष्टि अपने लिंग पर चली गयी।

पल्लवी अब तक विराट के पास आ गयी थी और उसके लिंग का मानो निरिक्षण कर रही थी। उसका लिंग हाँलाकि स्तंभित नहीं था, लेकिन पूरी तरह से शिथिल अवस्था में भी नहीं था। अगले ही पल उसने देखा की उसका लिंग पल्लवी की उँगलियों के आवरण में ढक गया।

"प्ले विद दीस …." पल्लवी के दूसरे खाली हाथ ने विराट के एक हाथ को पकड़ कर अपने एक स्तन पर रख लिया। उसने कहना जारी रखा, "…. आई कैन नॉट अलाऊ यू टू फ़क मी - दैट वुड बी रॉंग! बट आई मस्ट डू दिस फॉर यू राईट नॉव …"

जैसा की पहले भी चुका है की विराट ने वयस्क मैगज़ीनों के रंगीन पृष्ठों में उसने बहुत सी कंटीली कन्याएँ देखी थी, लेकिन पल्लवी जैसा शरीर उनमें से किसी का भी न था। और उस शरीर के इतने हसीं अंग के इतने अन्तरंग संपर्क से विराट की कामेक्षा पुनः जागने लगी। किन्तु कुछ देर पहले ही संपन्न हुए स्खलन के कारण उसका लिंग अपने उत्तेजन की ए - बी - सी से ऊपर नहीं उठ पा रहा था।


रूद्र आश्चर्यचकित था - पल्लवी के चरित्र में व्यभिचार और प्रेम-निष्ठा का कुछ ऐसा मोहक सम्मिश्रण था की वह किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। पल्लवी के प्रयोग जहाँ उसके यौन जीवन में सुख की उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी करते, वही उसमें कहीं न कहीं इर्ष्या अथवा संशय-भाव भी जागृत करते। लेकिन एक बात का उसको पूरा विश्वास था और वह यह की पल्लवी की योनि में सिर्फ उसी का लिंग जा सकता है। और यह बात पल्लवी के हर प्रयोग को रोचक और रोमांचक बना देता। उसने देखा की पल्लवी विराट के लिंग की त्वचा को बड़ी नरमी से पीछे की तरफ सरका रही थी।

शिश्नग्रच्छद पूरी तरह से पीछे सरक जाने के बाद उसने विराट के अंडकोष पर काम करना शुरू किया - कभी वह उसको सहलाती, तो कभी चिकोटी काटती। एक तरफ अच्छे से अन्वेषण करने के बाद, पल्लवी ने दूसरी तरफ भी यही काम करना शुरू कर दिया। विराट के वृषण मर्दन के साथ साथ पल्लवी उसके लिंग को अपने हाथ से पकड़ कर आगे पीछे करना जारी रखा।

विराट को चिर परिचित कामुक बेचैनी होने लगी। एक अति-सुन्दर स्त्री, भले ही उसकी बेटी ही हो, उसके लिंग तो दुलार रही थी, जिससे की उसमें उत्थान हो और वह रति-क्रिया कर सके। रूद्र ने देखा की पल्लवी की परिचर्या का अभी भी कोई ख़ास प्रभाव विराट पर नहीं आ पाया। विराट के स्थान पर वह होता तो अब तक पूरी तरह 'तैयार' हो चुका होता। बुढ़ापा वाकई डरावना होता है - उसने सोचा। 
 
पल्लवी को भी यह देख कर थोड़ा झटका लगा। रूद्र को तैयार होने में कुछ ही पल लगते थे, लेकिन पापा तो अभी तक नहीं हो पाए। ऐसे तो वो तैयार भी नहीं हो पायेंगे लगता है। कुछ और सोचना पड़ेगा। पल्लवी ने अपनी मैथुनीय खोज में कहीं यह पढ़ा था की पुरुषों में पुरःस्थ ग्रंथि के उत्तेजन से उन पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है, जैसे स्त्रियों में उनकी भगनासे के उत्तेजन से होता है। पल्लवी को रूद्र पर इस प्रयोग की आवश्यकता आज तक कभी नहीं पड़ी - उसका लिंग, यौन संग्राम के लिया सदा ही उद्धत रहता था। किन्तु अभी इस ज्ञान का उपयोग करने का समय आ गया था।

उसने पास ही रखी हुई क्रीम की बोतल उठाई और उसकी प्रचुर मात्रा अपनी हथेली पर उड़ेल ली। अपने दूसरे हाथ की उँगलियों से उसने कुछ क्रीम उठाई और विराट के लिंग पर अच्छे से चुपड़ दिया। कुछ ही समय में उसका लिंग पल्लवी की हथेली पर फिसलने लगा। पल्लवी को यह अनुभव अच्छा लगा - अतः उसने विराट के लिंग को अपने क्रीम में चुपड़े हुए हाथ से सहलाना शुरू कर दिया। उसने कुछ देर लिंग को सहलाया लेकिन अभी तक विराट की उत्तेजना पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।

पल्लवी ने रुक कर अपनी तर्जनी उंगली पर ढेर सारा क्रीम लगाया, और विराट के दोनों पाँव कुछ इस तरह फैला दिए जिससे उसका गुदा द्वार खुल जाए। विराट पूरी तरह चकराया हुआ था - 'आखिर करना क्या चाहती है ये? ये तो उसकी गुप्तता पर अतिक्रमण है!'

इसके पहले विराट कुछ कह पाता, पल्लवी ने उसके गुदा-छिद्र में अपनी तर्जनी घुसेड़ दी। यह तो एकदम अप्रत्याशित था! तनाव के कारण विराट के गुदा की संवरनी (रन्ध्र-संकोचक पेशी) सिकुड़ गयी और पल्लवी तर्जनी को पीसने लगी।
 
"पापा … प्लीज्! रिलैक्स! ट्रस्ट मी!" पल्लवी इतना ही कह पायी। इस कार्य में उसको कोई अनुभव नहीं था, और अगर कुछ भी गलत हो गया तो अन्दर चोट लग सकती थी। विराट ने जैसे तैसे अपने शरीर को ढीला किया। अब पल्लवी ने अपनी उंगली को छिद्र में अन्दर बाहर करना शुरू किया, जिससे क्रीम अच्छी तरह से अन्दर लग जाए।

"पापा, आप लेट जाइये?"

विराट, अपने चेहरे पर अनिश्चित सा भाव लिए बिस्तर पर माला के बगल ही लेट गया। पल्लवी ने उसकी पीठ के पीछे दो तकिया कुछ इस प्रकार लगा दी जिससे विराट की पीठ, बिस्तर से कोई साथ अंश पर उठी रहे। फिर उसने विराट को अपने दोनों घुटने पकड़ने को बोला, ऐसे जिससे गुदा की पहुँच अवरोधित न हो। पल्लवी उसके सामने बिस्तर के नीचे घुटने के बल बैठ गयी।

पल्लवी ने दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली पर पुनः ढेर सार क्रीम लगा लिया और अब बाएँ हाथ से विराट के लिंग को पुनः पकड़ कर उसको धीरे धीरे आगे पीछे करने लगी। विराट को अपने लिंग की अंदरूनी त्वचा पर जानी पहचानी गुदगुदी होने लगी। उसकी आँखे बंद होने लगीं और उसका शरीर शिथिल होने लगा। पल्लवी ने यह सब होते हुए देखा और यह भी की अब समय आ गया है। उसने अपनी मध्यमा उंगली को विराट की गुदा से कुछ इस तरह सटाया की उसकी उंगली विराट के उत्सर्गांतराल और गुदा-छिद्र को एक साथ छूने लगे। उस स्थान के चिकने हो जाने पर पल्लवी ने उसको रगड़ना, मालिश करना और दबाना जारी रखा, और साथ ही साथ उसके लिंग को भी।


पल्लवी ने कोई तीन मिनट तक क्रीम लगा कर विराट की गुदा को सहलाना जारी रखा। अब तक क्रीम का कोई दसवाँ भाग विराट की गुदा में समां गया होगा। और स्पष्ट दिखने लग गया की अबी अगर विराट चाहे भी तो पल्लवी की उंगली को अन्दर जाने से रोक नहीं सकता। वस्तुतः, पल्लवी को भी यह महसूस होने लगा की उसकी उंगली विराट की गुदा के अन्दर स्वतः ही जाने लग गयी थी।
 
पल्लवी ने बहुत ही ध्यान से धीरे धीरे अपनी मध्यमा उंगली को विराट की गुदा में सरकाना आरम्भ किया, और कुछ ही क्षणों में उसकी उंगली पूरी तरह से अन्दर चली गयी। अब वह विराट की पुरःस्थ ग्रंथि को ढूँढने के लिए तैयार थी। उसने अपनी उंगली को थोड़ा ऊपर की तरफ मोड़ा और ऐसा करते ही उसको अन्दर एक अंडाकार उभार महसूस हुआ। उसने इस उभार को अपनी उंगली से हलके से दबाया। विराट पर इस हरकत का असर बेहद रोमांचक था - उसने तुरंत ही अपने लिंग में उत्थान होता हुआ महसूस किया और साथ ही साथ उसको ऐसा लगा की उसका स्खलन होने वाला है। पल्लवी ने कुछ देर पुरःस्थ ग्रंथि को धीरे धीरे दबाया और सहलाया, और फिर लयबद्ध तरीके से अपनी उंगली को गुदा के अन्दर बाहर करना शुरू किया। और साथ ही साथ उसके लिंग को धीरे धीरे से दबाना भी जारी रखा। कोई 2 मिनट में ही विराट पूरी तरह से तैयार हो गया।

पल्लवी ने देखा की उसके पापा का लिंग अब अपने पूर्ण उत्तेजन पर है, अतः उसने अपनी उंगली बाहर निकाल ली और विराट से बोला,

"पापा, फ़क हर नॉव! एंड फ़क हर हार्ड!"

विराट बिस्तर से उठा और असंतुलित डग भरता हुआ माला के सामने पहुँच गया। माला वैसे ही मदिरा, और निद्रा के प्रभाव से शिथिल और निर्बल हो कर बिस्तर पर पसरी हुई थी। माला बेपरवाह सी अपनी दोनों जांघें खोले हुए अपनी ताज़ी ताज़ी भोगी हुई योनि का प्रदर्शन कर रही थी। 
 
"सिली थिंग!" विराट बुदबुदाया और उसके नंगी जांघ पर अपना हाथ फिराया। इतनी देर हो जाने के बाद भी माला की त्वचा काफी गर्म थी। विराट की दृष्टि माला की जाँघों के बीच के बालों से ढके त्रिकोणीय हिस्से पर पड़ी, जिसमे माला की योनि की गुलाब जैसी पंखुडियां दिख रही थीं।

विराट का लिंग, उसकी हाल की स्मृति में सबसे अधिक उत्तेजना पर था। वस्तुतः, उसको इस स्तम्भन की अत्यंत आवश्यकता थी। मैथुन के मैदान में किसी अन्य पुरुष के सामने ऐसे दब्बूपन से हथियार डालना बेहद लज्जास्पद था। लेकिन पल्लवी की परिचर्या से वह समस्या समाप्त हो गयी - न जाने क्या जादू किया उसने! विराट का सामान्य लिंग भी कुछ ऐसी प्रचंडता से स्तंभित था की वह भी माला की योनि के मुकाबले काफी बड़ा लग रहा था। अब कुछ भी सोचने समझने की आवश्यकता नहीं थी - माला की योनि पहले के मैथुन से काफी चिकनी हो गयी थी। विराट ने माला के योनि पटल को अपनी तर्जनी और अंगूठे की सहायता से फैलाया और अपने लिंग-मुंड को वहां पर टिका दिया। उसको वहां की चिकनी आर्द्रता महसूस हुई तो उसने आगे की तरफ जोर लगाया। हाँलाकि माला की योनि, पल्लवी की योनि के मुकाबले ढीली थी, लेकिन विराट के लिए इस तथ्य का कोई प्रभाव नहीं था। उसके लिए वह पर्याप्त कसावट लिए हुई थी। उसने थोडा और जोर लगाया और अपने लिंग को अदृश्य होते देखने लगा।

करीब दो इंच अन्दर गए होंगे की माला की सिसकारी सुनाई दी। उसकी आँखें अभी भी बंद थीं, लेकिन उसका शरीर विराट की क्रिया की पर्तिक्रिया दिखा रहा था। वह अपने नितम्ब उठा रही थी - उसके लिंग का और हिस्सा अन्दर लेने के लिए! उसका सर इधर उधर हिल-दुल रहा था और वह अपने होंठ काट रही थी। विराट ने लिंग को बाहर निकाला और फिर अन्दर ठेल दिया। ऐसा उसने पहले भी कई बार किया था, लेकिन आज बात कुछ और ही थी। इस धक्के से उसका पूरा लिंग माला के अन्दर समां गया। उसके हाथ माला की कमर पर जम गए।

माला कराहने लगी - उसकी आँखें फड़फड़ाने लगी, लेकिन अभी भी खुल नहीं पाईं। विराट ने उसको भली भांति 'चोदना' आरम्भ कर दिया था। माला की कामुक कराहें बढ़ने लगीं - हर धक्के के साथ उसका पूरा वजूद हिल जाता। विराट माला की योनि की जम कर धुनाई करने लगा।

माला की आँखें थोड़ी सी खुलीं और एक अस्फुट सा शब्द निकला,

"व् … व् …. विराट?"

"हाँ जानेमन! तुम आराम से लेती रहो, और मज़े लो!" विराट ने बड़े गर्व से कहा।

विराट के हर एक धक्के से माला की योनि भर जा रही थी - वह कितनी ही मदहोश क्यों न हो, उसकी निजता की इस प्रकार से लूट-मार को वह महसूस कर रही थी। वह कभी हांफती तो कभी कराहती। अंततः उसकी चेतना कुछ कुछ वापस आई। उसने विराट को अपने अन्दर खींचा और साथ ही साथ रिरियाते, और भारी सांसे भरते हुए अपने नितम्ब विराट के हर धक्के के साथ धकेलने लगी। उसकी वासना उसको ऐसी बेसुध हालत में भी निर्लज्ज बना रही थी। हर धक्के के साथ उसके दोनों स्तन उसकी छाती पर लोट रहे थे।

उसी आनंद में वो कुछ कुछ बड़बड़ा भी रही थी,

"यस! ओह यस डार्लिंग! सो गुड इनसाइड मी! फिल मी!"

उसके बेसुध प्रोत्साहन से विराट की ऊर्जा और भी बढ़ गयी। उसके धक्के और बलशाली होने लगे और हर धक्के से उसके वृषण माला के नितम्बों पर जोर जोर से टकराने लगे। माला की कामुक गुर्राहट बढ़ती जा रही थी और अब वह कामोन्माद के चीत्कार में तब्दील होती जा रही थी।

चरमोत्कर्ष के द्वार पर ले जाने वाले धक्के के साथ ही विराट का शरीर अकड़ गया - उसका लिंग माला की योनि के भीतर पूरी तरह समाया हुआ था और उसने माला को पूरे बलपूर्वक जकड़ रखा था। अगले ही पल विराट के लिंग ने वीर्य का एक भारी माल माला के भीतर छोड़ दिया।

माला ने विराट के स्खलन को अपने भीतर महसूस करके एक दीर्घश्वास छोड़ा। उसके बाद उसने विराट के लिंग के कई सारे संकुचन और महसूस किये, और हर संकुचन के साथ विराट का कुछ भाग उसके भीतर समां गया। मुख्य क्रिया समाप्त होने के बाद विराट ने गहरी गहरी साँसे भरीं और माला के स्तनों को चूमा, और उसके स्तानाग्रों को चूसा, जिससे माला को और भी आनंद आया।
 




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