Friday, March 7, 2014

FUN-MAZA-MASTI चट मंगनी चट ब्याह-11

FUN-MAZA-MASTI

 चट मंगनी चट ब्याह-11

 माला अपने बिस्तर पर नैराश्य और विषाद की भावना से ढीली बैठी हुई थी - अपने चारो तरफ से गाफिल, सामने की दिवार को एक टकटकी बांधे देखती हुई। उसका दिमाग भिन्ना रहा था - या यूँ कहिये की दिमाग में चक्रवात चल रहा था। इतने में वहां विराट आया - हाथ में ब्रांडी का गिलास और बोतल लिए। उसने माला को वह गिलास थमा दिया और पीने को कहा। माला ने शुरू में विरोध किया, लेकिन विराट के आग्रह पर उसने पीना शुरू कर दिया। उसका ध्यान कहीं और था, इसलिए बहुत ही तेज़ी से उसने ब्रांडी गटक ली। विराट ने उसका गिलास एक और बार भर दिया। माला मदिरा का सेवन कभी कभी ही करती थी - वस्तुतः उसको इसका व्यसन नहीं था। लेकिन मदिरा की आदत न होने से, पहले ही गिलास के प्रभाव से उसका सर चकराने लगा। फिर भी उसके अन्दर चल रही हलचल कम नहीं हुई। लेकिन अगले गिलास ने उसका सर हल्का कर दिया। साथ ही साथ विराट की स्वान्त्ना भरी बातो और स्पर्श ने उसके मन से नैतिकता के अवसाद को हटा दिया था।

माला ने जब से पल्लवी और रूद्र को रति-गमन करते देखा, उन दृश्यों ने उस पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था। वह यह बात सबके सामने स्वीकार नहीं कर सकती, लेकिन उन दोनों के नग्न शरीरों को देख कर उसके मन की पहली प्रतिक्रिया कामुक लिप्सा की हुई थी। और, रूद्र और प्रियंका के बीच चल रहे कामुक कृत्य के दृश्य से दरअसल उसको इर्ष्या भी हुई थी। उसने एक दो बार यह सोचा भी था, की अगर पल्लवी या प्रियंका की जगह पर वह खुद होती तो उसे कैसा लगता! मदिरा के प्रभाव से यह भावना पूरी तरह अनावृत हो गयी थी, और अब वह इस बारे में सोचे बगैर नहीं रह पा रही थी।

अभी उसके हाथ में ब्रांडी से भरा तीसरा गिलास था ... उसको पीते हुए माला ने देखा की विराट उसकी शलवार को उतार चुका है और इस समय उसके कुर्ते का बटन खोल रहा था। कुछ ही क्षणों में माला सिर्फ ब्रा और पैंटीज में बिस्तर पर बैठी हुई थी। उसका सर इस समय हवा में उड़ रहा था। उसके अपने साथ होने वाली बातो का संज्ञान था, लेकिन उसकी किसी तरह के प्रतिरोध करने की क्षमता काफी कम हो गयी थी। माला ने देखा की विराट इस समय अपना अंडरवियर उतार चुका था, और पूर्णतः नग्न हो गया था।



रूद्र, विराट के बताये हुए प्लान से थोड़ा अनिश्चित लग रहा था।

"पल्लवी, यार .. वहां पर मैं ऐसे नंगा कैसे जाऊँगा? वहां पर पापा और माँ भी तो हैं?"

"माँ के सामने तो वैसे भी नंगे जा चुके हो न? और यह न भूलो की जब हम वहां पर होंगे तो हम चारों लोग ही नंगे रहेंगे। तुम अकेले ही क्यों शर्मा रहे हो?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा। साथ ही साथ पल्लवी ने उसके अंडरवियर को नीचे भी सरका दिया। रूद्र का लिंग अर्ध-उत्थान की अवस्था में आ गया था।

"जनाब रेडी हैं?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा। वह खुद भी इस समय पूर्ण रूप से नंगी थी। "चलें अन्दर?" रूद्र ने स्वीकृति में सर हिलाया।


"जनाब रेडी हैं?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा। वह खुद भी इस समय पूर्ण रूप से नंगी थी। "चलें अन्दर?" रूद्र ने स्वीकृति में सर हिलाया।


माला को समझ नहीं आ रहा था की विराट को अचानक यह क्या सूझी! 

'हमारा दामाद और बेटी दोनों ही ऐसे बर्ताव कर रहे हैं, और यह मेरे कपडे उतार रहे हैं! और इतनी बेताबी की कमरे का दरवाज़ा भी नहीं बंद किया' 

ऐसे ही सोचते हुए माला के स्तन अब आज़ाद हो गए थे। 

'... हाय राम!' माला की सिसकी नक़ल गयी - विराट ने उसके स्तन को काट लिया था।

"कक्क्या क..क..कर रहे हो, य्य्यह?" माला ने नशे में धुत्त आवाज़ में प्रतिरोध किया, लेकिन उसमें कोई दम नहीं था। ऐसी बात से भला विराट कहाँ मानने वाला था! माला की दृष्टि सामने दरवाज़े पर ही लगी हुई थी की कोई आ ना जाए..... ऐसी मत्त अवस्था में भी माला को शर्मिंदगी, घबराहट और उलझन का मिला-जुला एहसास हो रहा था। लेकिन, यही सोचते हुए उसके मन में एक नयी बात कौंध गयी, और वह यह की यदि कोई आ जाए और हम दोनों को नंगेपन की ऐसी अवस्था में देख ले तो?

आगे माला ने जो देखा उसको देख कर उसके दिमाग में मानो कई सारे ज्वालामुखी एक साथ धधक उठे! पल्लवी और रूद्र, दोनों एक दूसरे को चूमते, चाटते, कराहते, सिसकते उसके कमरे में प्रविष्ट हुए। और कोई सामान्य तरीके से नहीं - यौन क्रिया करने की, उन दोनों में न जाने कहाँ की अत्यावश्यकता आ गयी की एक पैसे का धीरज ही नहीं! अपने माँ बाप के कमरे में चले आये - और वह भी नंगे! पूरे नंगे!! 

'हे ईश्वर! यह क्या दिखा रहे हो मुझको? इन दोनों को अपने आस पास का क्या कोई भी होश नहीं है!' माला के लिए यह तो अति हो चली थी। रूद्र, बिलकुल बेपरवाह सा, पल्ले के स्तनों का मर्दन करते और उसको बुरी तरह से चूमता-चाटता हुआ उन्ही दोनों की तरफ आ रहा था। 

'हमारी तरफ! हाय राम!' उसी समय माला को अपने नितांत नंगेपन का एहसास हुआ। वह दोहरी हो कर अपने बिस्तर पर सिमट गयी। लेकिन विराट की क्रिया तो ज्यों-की-त्यों चल रही थी। ऐसा हो ही नहीं सकता था की विराट ने उन दोनो को देखा न हो, लेकिन वह कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं कर रहा था। वस्तुतः, उसकी स्वयं की काम-क्रिया इस युवा जोड़े के आ जाने से थोड़ी और सघन हो चली थी।

इस समय रूद्र पल्लवी को चूमते हुए उसके पीछे खड़ा हुआ था, लिहाजा पल्लवी का सम्पूर्ण सम्मुख शरीर माला और विराट के दर्शन के लिए प्रस्तुत था। पल्लवी उसकी बेटी थी - लेकिन उसको ऐसी अवस्था में देख कर विराट के शरीर में रुधिर का मानो एक भयंकर गोला छूट गया हो। वयस्क मैगज़ीनों के रंगीन पृष्ठों में उसने बहुत सी कंटीली कन्याएँ देखी थी, लेकिन ऐसा शरीर उनमें से किसी का भी न था। और उसी शरीर का भोग रूद्र को करते देख कर विराट की कामेक्षा वाली आग बुरी तरह से धधक उठी। उसका लिंग अपने पूर्ण उत्तेजन पर उठा गया।

पल्लवी और रूद्र की प्रत्येक रति-क्रीड़ा में संभोग की पूर्व क्रीड़ा, जिसको सामान्य भाषा में 'फोरप्ले' भी कहते हैं, सदा ही उपस्थित रहती थी। इस क्रिया के वह दोनों अब मझे हुए खिलाड़ी बन गए थे। आज भी कोई अलग बात नहीं थी। किन्तु उन दोनों ने कभी भी अपनी यौन क्रिया की नुमाइश नहीं की थी। इसलिए, उन दोनों का चाहे जितना भी अनुभव रहा हो, आज की क्रीडा एकदम नया ही अनुभव दे रही थी। पल्लवी ने देखा की उसके पिता ने उसको किस तरह की वासनात्मक और अभीष्ट दृष्टि से देखा, और उसके फलस्वरूप उनके लिंग के आकार में आया परिवर्तन भी उससे छुपा नहीं था। 

रूद्र का हाथ पल्लवी के पीछे से आकर, उसके स्तनों को कुछ इस तरह मींज रहा था, की उसके स्तनाग्र सामने की तरफ पूरी तरह से निकल आ रहे थे। पल्लवी ने महसूस किया की रूद्र बहुत ही उत्तेजित हो गया था। पीछे खड़े होकर उसने अपने लिंग को पल्लवी की जांघों के बीच के हिस्से में कुछ इस तरह से बैठाया था की उसका लिंग, पल्लवी की योनि के नीचे से होते हुए सामने की तरफ दृष्टिगोचर हो रहा था। 

विराट देख रहा था की पल्लवी के स्तन शर्तिया तौर पर माला के स्तनों से छोटे थे, लेकिन जिस तरह से वह निर्बाध होकर रूद्र के हाथो द्वारा दिए जा रहे आवभगत का मज़ा ले रही थी, वैसा मज़ा तो वह माला को कभी नहीं दे पाया था। विराट ने निश्चय किया की वह उन हर चीज़ की नक़ल करेगा जो उसके बेटी और दामाद कर रहे हैं। उसने भी माला के स्तनों का ठीक उसी समान मर्दन करना शुरू कर दिया - माला की कामुक कराह निकल पड़ी। 

रूद्र ने पल्लवी को उसी बिस्तर पर बैठाया और उसके स्तनों को एक-एक करके, छोटे छोटे कौरों में खाने और चूमने लगा। रूद्र की इस स्थिति में, विराट को उसके लिंग का आकार दिखाई दिया। उसका लिंग इतना कड़ा हो गया था, की विराट को लगा उसमें से अभी किसी ही क्षण वीर्य छूट पड़ेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। रूद्र किसी पेशेवर खिलाड़ी के समान अपना मोर्चा सम्हाले हुए था। पल्लवी का हाथ प्रेम-पूर्वक अपने प्रिय डंडे पर लिपटा हुआ था, और बहुत धीरे-धीरे आगे-पीछे हो रहा था। उसकी देखा-देखी माला ने भी विराट के लिंग को अपनी मुट्ठी में बाँध लिया।

विराट का बुरा हाल था। ऐसे सेक्स तो उसने कभी करना तो दूर, सोचा भी नहीं था। 

'ये दोनों हैं क्या! माला सही कर रही थी। कितनी एनर्जी है दोनों में ... मेरा तो कुछ ही देर में छूट जाएगा।' विराट के दिमाग में उधेड़बुन चल रही थी, 'यह आग मैंने लगा तो दी है, लेकिन बुझाने का बूता इस समय मुझ में नहीं है ... क्या किया जाए!?'

सोचते हुए ही उसने मन ही मन में एक निर्णय लिया, और माला की मुट्ठी में ही सम्भोग करने लगा। माला, जो की सामने चलने वाले सीन को देखने में लीन थी .. जब तक उसके नशे में धुत्त दिमाग को समझ आया की क्या हो रहा है, तब तक विराट के लिंग में उबाल आ गया था। वह कुछ कह या कर पाती, उसके हाथ में विराट का सफ़ेद वीर्य भर गया था और काफी कुछ बिस्तर पर भी गिर गया था। विराट ने निवृत्त होकर संतुष्टि की डकार भरी। पल्लवी और रूद्र इस आवाज़ को सुन कर अपनी मोहावस्था से बाहर आ गए और माला और विराट की तरफ देखने लग गए।

माला अपने बेहोशी की अवस्था में भी समझ पा रही थी की उसका कचरा हो गया है .. उसके शरीर में कामाग्नि जल रही थी, और विराट की नासमझी ने गड़बड़ कर दिया था। उसको उस समय तक अपनी योनि पर अजीब सी चिकोटियां काटने जैसा अनुभव होने लग गया था, और तभी ही विराट का पानी निकल गया। उसका दिमाग इस परिस्थिति का विश्लेषण कर पाने में सक्षम था,

'एक तो मैंने यह सब शुरू नहीं किया ... ;यकीन फिर भी यह तमाशा किया। अरे! जब रुक नहीं सकते हो तो करते ही क्यों हो!' माला नें मन हिमं विराट को धिक्कारा।

विराट मानो उसके मनोभावों को समझते हुए उसी समय बोला, "माला, आई नो। बट प्लीज डोंट हेट मी। यह आग मैंने लगाई थी, और उसको बुझाने का इंतजाम भी मैं ही करूंगा ...." कहते हुए उसने रूद्र की तरफ देखा।

"रूद्र बेटा, अपना कुछ हुनर इधर भी दिखाओ ..." कहते हुए उसने माला की तरफ इशारा किया।

माला का दिमाग ऐसी अवस्था में भी भिन्ना गया। रूद्र का भी। लेकिन इस बात ने पल्लवी को उन दोनों के जितना प्रभावित नहीं किया। संभवतः इसलिए क्योंकि उसने पहले भी रूद्र के लिंग को माला की योनि में जाते हुए देखा था, और उसको वह दृश्य बहुत ही रोचक लगा था। जो थोडा बहुत आश्चर्य उसको हुआ, वह इस बात पर की विराट यह बात करेगा। दरअसल, बैठक में विराट ने उनको यह बोला था की उन दोनों को माला और विराट के सामने आकर सेक्स करना होगा, बस ... लेकिन अभी तो बात बहुत आगे बढ़ गयी थी।

कोई कुछ कह पाता की माला ने अपनी टूटी फूटी आवाज़ में अपना विरोध जताया, "विराट मैं कोई रंडी नहीं हूँ, जो किसी से भी यह करते फिरे ... और ये तो मेरी बेटी का पति है, मेरे बेटे जैसा! तुम सोच भी कैसे सकते हो .. छिः!"

"डार्लिंग, मैंने कब तुमको रंडी कहा? यह एक नया एडवेंचर मान लो। ज़रा रूद्र के लिंग को देखो तो .... कितना बढ़िया है! तुमको जन्नत दिखा देगा यह लड़का। और इसके साथ करना सेफ भी है आखिर, ये हमारी बेटी का पति है .... बेटे जैसा!" विराट ने अपनी बात दोहरा दी।

"नहीं नहीं ... ये सब मेरे साथ न करो। कुछ तो सोचो!" माला एक कमज़ोर विनती कर रही थी, "पल्लवी, तू कुछ कह न ..."

"माँ, सच कहूं?" पल्लवी ने कुछ देर तक माला को देखा। उसके मन में बस एक ख़याल आया, 'माँ को एक अन्प्रेसिडेन्टिड (अभूतपूर्व) सेक्सुअल मज़ा मिलना ही चाहिए ....' और फिर आगे कहा, "इसमें मुझे कोई ऑब्जेक्शन नहीं है ... रूद्र आपको एकदम से हैप्पी कर देगा।

"यह क्या कह रही हो पल्लो?" यह रूद्र था, "... मैं माँ के साथ यह क्यों करूंगा?"

पल्लवी को मानो इसी प्रश्न का इंतज़ार था, "वह इसलिए की जनाब पहले भी मेरी माँ के अन्दर जा चुके हैं ... अब बंद करो और शुरू हो जाओ"

"क्या?" विराट और माला लगभग एक साथ ही बोल पड़े। 

"हाँ माँ .." कहते हुए पल्लवी ने माला के बगल लेते हुए सेक्स करने वाली घटना उन दोनों को सुना दी। उसने यह भी बताया की रूद्र ने जो शुरू किया, उसने वह ख़तम नहीं किया - मोरालिटी के चक्कर में। सो, अभी सही समय है उस काम को सुधारने की। पल्लवी की बात ख़तम होते होते विराट भी खुश हो गया की ऐसा दामाद है, जो मौका मिलने पर भी गलत काम नहीं करता। लिहाज़ा, रूद्र को अब माला के साथ सेक्स करना ही होगा।

चारो तरफ से विभिन्न प्रकार की आवाज़े आ रही थी - माला इस समय पूरी तरह आसहाय पड़ी हुई थी। उसका शील कहता था की यह सब तुरंत बंद हो जाए, लेकिन उसकी योनि में लगी हुई आग कह रही थी की इसको बुझाने के लिए आहुति चाहिए - वीर्य की आहुति। 

'आह! रूद्र का लिंग वाकई कितना प्यारा है!! मेरे अन्दर जाने से कैसा लगेगा!' माला के मन में बसने वाली व्यभिचारिणी चिल्लाई। 

"आल द बेस्ट, डार्लिंग!" कह कर विराट ने माला के होंठों पर एक चुम्बन दिया और अलग हट गया - कमरे से बाहर नहीं, बस एक तरफ, किसी दर्शक के समान। अब मोर्चा पल्लवी और रूद्र को सम्हालना था।
 रूद्र भी अब तक समझ चुका था की आज बिना माला से सेक्स किये वह इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं आ सकता। 'ये पल्लवी भी मजे लेने के लिए उसको कैसे कैसे फंसाती है! खैर ...'

रूद्र माला के सामने आ कर खड़ा हो गया। उसकी दृष्टि माला की योनि की तरफ गयी - सुन्दर, गुलाब की पंखुड़ी जैसी, कामुकता के कारण वहां रक्त-संचार बढ़ जाने से, वहां का रंग थोडा गहरा हो गया था। माला के भगोष्ठ पर बालों की अच्छी तादात थी - लम्बाई में मुश्किल से आधा इंच, लेकिन घने। 

'माला का शरीर एकदम मस्त था, खास तौर पर ऐसी कामुक अवस्था में!' रूद्र ने सोचा। 

उसकी दृष्टि अब माला के स्तनों पर गयी - उसको उस दिन किया गया स्तन-पान याद आ गया। रूद्र कभी सोच भी नहीं सकता था की इतनी जल्दी ही उसको माला के स्तन फिर से पीने को मिल सकेंगे। इस लोभ को वह त्याग नहीं पाया - हालाकि वह मैथुन के लिए पूरी तरह तैयार था, और माला भी।

खैर, उसने माला के एक निप्पल को अपने मुँह में भर लिया और अपनी जीभ से दबाव डाला। साथ ही साथ उसने माला के दुसरे स्तन को अपने हाथ में लेकर मसलना शुरू कर दिया। माला का स्तन उसके हाथ में पूरी तरह समां गया था - उसकी कोमलता रूद्र को और कामुक बना रहे थे। माला के दोनों ही स्तनाग्र तुरंत जाग कर खड़े हो गए। ये रूद्र के लिए बहुत ही कामुक दृश्य और अनुभव था। उसने तुरंत माला के मीठे स्तनों को चूसने की गति तीव्र कर दी - रूद्र माला के स्तन को ठीक उसी तरह से प्यार कर रहा था जैसे पल्लवी के स्तनों को करता था। वह माला के स्तनाग्र के चारो तरफ अपनी गर्म जीभ फिरा फिर कर चूस रहा था। 

जैसे जैसे स्तन-पान का समय बढ़ता जा रहा था, माला की साँसे और गहरी होती जा रही थी, साथ ही साथ उसकी योनि की कामुक संवेदना चिल्ला चिल्ला कर एक लिंग की पुकार करने लगी। माला पर कामुकता का बुखार चढ़ता ही जा रहा था - फलस्वरूप उसकी जांघे खुलती गयी। अब रूद्र के सामने माला की योनि पूरी तरह से खुली पड़ी थी। उसने अपने पूर्ण स्तंभित लिंग के शिश्नाग्रच्छाद को पीछे सरकाया और उसको माला की योनि के द्वार से टिकाया।

यह सब विराट और पल्लवी के लिए बहुत ही उत्तेजना भरा दृश्य था। विराट अभी अभी हुए स्खलन से विवश था, इसलिए वह इस घटना को बस देख कर ही आनंद लेना चाहता था। पल्लवी भी अब चुप चाप बैठ कर यह रोमांचक दृश्य देखने लग गयी। 

'पहले जनाब माँ से कर लें, फिर मैं भी करूंगी ....' वह यही सोच कर खुश थी की माँ को आज एक नया अनुभव होने वाला है, और शायद उसके कारण वो रूद्र और प्रियंका के मिलन कराने की उसकी मंशा भी समझ सकेगी।

रूद्र पहले की भांति ही फिर से ठिठक गया। माला के साथ ऐसा कुछ भी करना उसके शील-सिद्धांत के विपरीत होगा। उसने पहले पल्लवी, और फिर विराट की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि डाली। दोनों ने ही सहमती में सर हिलाया

यह देख कर रूद्र ने रति क्रिया जारी रखी। माला के गले से इस समय कामुक आवाजें आ रही थी। व्यभिचारिणी माला ने अब तक उसके पूरे अस्तित्व पर कब्ज़ा कर लिया था। रूद्र ने अपना लिंग-मुंड माला की योनि के ऊपर टिका कर उसकी योनि के दोनों होंठों के बीच फंसा लिया, और आगे जोर लगाया।

उत्तेजना के कारण माला की योनि पूरी तरह से चिकनी हो गयी थी, और वैसी ही उत्तेजना के कारण रूद्र को भी अपने द्वारा लगाए जोर का ठीक अनुमान नहीं लगा। पहले ही झटके में रूद्र का लिंग कम से कम आधा माला की योनि में घुस चुका था। हालाकि माला की योनि की पकड़ पल्लवी कीयोनि की पकड़ के मुकाबले ढीली थी, लेकिन अब यह कार्य करना ही था।

रूद्र ने पहले धीरे धीरे माला की योनि पर प्रहार करना शुरू किया। माला को ऐसे लिंग की आदत नहीं थी - इसलिये उसको आनंद के साथ ही हलके दर्द का भी एहसास हुआ। माला के लिए यह सोचना थोडा असंगत लगा की रूद्र वाकई उसके अन्दर है। हर धक्के के साथ माला को अपनी योनि के अन्दर और योनि के ऊपर अपने भगनासे पर उसके लिंग का दबाव और घर्षण महसूस होने लगा - उसको आनंद आने लगा। रूद्र के लय में लय मिलाने के लिए माला भी अपने नितम्बो से उचक उचक कर धक्का देने लगी। धीरे धीरे उसके जननांग में एक प्रकार का दबाव बढ़ने लगा, जिससे वह पूरी तरह परिचित थी।

रूद्र भी समझ गया की माला बस चरम सुख पाने ही वाली है। उसने अपने धक्को की गति तेज़ कर दी।

माला का आनन्दातिरेक उसके पूरे अस्तित्व को चीरते हुए निकला। उसी समय उसने रूद्र के लिंग को अपनी अन्दर ही स्पंदन करते हुए महसूस किया, और समझ गयी की रूद्र का बीज उसकी कोख में आ चुका है। आनंद के छोटे छोटे लहर माला के अन्दर बनते ही गए, और जब आना बंद हुए, तब तक माला पूरी तरह से थक कर चूर हो गयी थी।
kramashah.................







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