FUN-MAZA-MASTI
चट मंगनी चट ब्याह-2
चाय पीने के बाद पल्लवी अपनी माँ की गोद में सर रख के लेट गयी, और दोनों ही पल्लवी के बचपन की बाते करने लगी। माला ने उसको बताया की जब वो गर्भवती हुई, तो उसका मन था की उसे लड़की हो, जिसे पाल पोस कर वो एक अच्छा इंसान बनाएगी।
माला अपनी बेटी के पालन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती थी, और उसने जहाँ तक संभव था ये कर भी दिखाया था। लेकिन उसको इस बात का मलाल था की पल्लवी सिर्फ 2 महीने ही उसका दूध पी सकी थी। इस बात ने माला की ममता को बहुत ठेस पहुचाई हुई थी, जिसका असर अभी तक नहीं ख़तम हुआ था।
"पल्लवी, तुम जानती हो की तुमने सिर्फ 2 महीने मेरा दूध पिया था? मेरा मन था की मेरी बेटी कम से कम एक साल तक मेरा दूध पिए। लेकिन न जाने कैसे 2 महीने में ही मेरा दूध सूख गया।" बोलते बोलते माला का गला भर आया और आँखें भर आई।
"माँ... आप प्लीज मत रोइये। वो तो पुरानी बात हो गयी और मैंने कोई शिकायत भी नहीं की। और देखिए न, आपके की पालने से तो मई एकदम फिट एंड फाइन हूँ"
लेकिन माला की आँखों से बरसात शुरू हो ही गयी।
पल्लवी थोडा सोच कर बोली, "माँ,मैं तो अभी भी आपकी बच्ची हूँ। उस समय नहीं तो क्या हुआ... मैं अब भी तो आपका दूध पी सकती हूँ.. है न?"
"..... अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है - क्या तुम सच में.....!"
"श्ह्ह्ह्ह्ह..." कहते हुए पल्लवी ने माँ की नाइटी के ऊपर के कुछ बटन खोलने शुरू कर दिए - माला के कुछ कहने से पूर्व ही चार बटन खुल चुके थे, जिससे माला के दोनों सुन्दर स्तन पूर्णतः खुल कर सामने आ गए। उनको देख के पल्लवी का मुंह खुला सा रह गया।
"माँ... आप बहुत बहुत सुन्दर हो। आपने कभी मुझको ये दिखाए ही नहीं। गन्दी मम्मी - मुझे भी आपके जैसे ही ब्रेस्ट्स चाहिए।"
इस अचानक घटे घटनाक्रम से माला थोडा अवाक् रह गयी। लेकिन उसने देखा की पल्लवी किसी छोटे बच्चे की तरह उत्साहित हो गयी थी। भाव-आह्लादित माला ने बहुत प्यार से पल्लवी का सर अपने बाएँ स्तन की तरफ खीचा - पल्लवी ने भी अपनी माँ के सुन्दर और मुलायम स्तन को अपने मुँह में रख लिया।
पल्लवी का मुँह चाय पीने से गरम हो गया था, और इस गर्मी का एहसास माला के स्तनाग्र पर बहुत अच्छा लगा। कुछ देर पल्लवी ने अपनी जीभ से उस पर दुलार किया, फिर उसको चूसना शुरू किया। पल्लवी को माँ के स्तन को पीने की कोई याददाश्त नहीं थी। ये नया अनुभव - उसके माँ के गरम, मुलायम और कोमल स्तनाग्र, जो उसके दुलार और स्तनपान के कारण थोड़े लम्बवत हो गए थे - पल्लवी को बहुत अच्छा लगा।
उसका हाथ अनायास ही माला के दाहिने स्तन पर चला गया और धीरे धीरे उसको दबाने, सहलाने लगा।
"तुमको यह पसंद है?" पल्लवी ने बिना स्तन मुह से निकाले, सहमति में सर हिलाया। "जब तक मन करे तब तक पियो" माला ने ममता भरे स्वर में कहा। स्तनपान करती हुई पल्लवी ठीक वैसी ही लग रही थी जब वो एकदम छोटी सी गुडिया थी। माला का मन भर आया। उसका मन हुआ की यह कभी समाप्त न हो।
कुछ देर और चूसने के बाद,पल्लवी ने दाहिने स्तन पर भी यही क्रिया प्रारंभ कर दी। लेकिन जाने अनजाने पल्लवी के स्तनपान करने का तरीका कुछ इस प्रकार था की माला के स्तनाग्रों से अब दुसरे प्रकार की अनुभूति होने लग गयी थी - कुछ वैसी ही जैसे की कामुक होने पर होती है।
भजन का शांति प्रदान करने वाला प्रभाव ख़तम होने लगा और माला का वात्सल्य भाव अब धीरे धीरे कामुकता की ओर चल पड़ा।
विराट ने कभी उसके स्तनों को इतना आदर नहीं दिया - लेकिन माला जानती थी की ये उसके शरीर के सबसे संवेदनशील अंग हैं। माला तो सिर्फ उनके उपभोग से ही चरम आनंद प्राप्त कर सकती थी। अभी कुछ वैसी ही दशा चल रही थी। हर्षोन्माद के मारे उसकी आँखें बंद हो गयी।
इस दौरान दोनों ही इस बात से अनजान थे की रूद्र पिछले कुछ समय से इस पूरे क्रिया कलाप का सीधा प्रसारण देख रहा था। उसके चेहरे पर कौतूहल, और मनोरंजन का मिला जुला भाव था।
"अरे रूद्र, तुम कब उठ आए?" ये पल्लवी की आवाज़ थी, जिसे सुन कर माला जैसे धरातल पे आ गयी। आँखे खुली तो देखा की रूद्र मुस्कुराते हुए माला के चेहरे और स्तनों को बारी बारी से देख रहा है। हड़बड़ी में वो अपने कपड़े भी ठीक से समेट नहीं पाई, जिसके कारण उसके स्तन अधखुले रह गए और पूरी स्थिति और भी हास्यास्पद हो गयी।
माला लेकिन पूरी तरह हतोत्साहित हो गई - उसका मन सोच रहा था की अपनी मूर्खता में दामाद के सामने नंगा होना पड़ गया। लेकिन भागने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था, क्योंकि पल्लवी का सर अभी भी उसकी गोद में था, और वो बेवक़ूफ़ हटने का नाम ही नहीं ले रही थी।
पल्लवी ने देखा की रूद्र क्या देख रहा है। उसको यह भी मालूम था की रूद्र नारी शरीर में स्तनों को सबसे अधिक पसंद करता है, और उसकी माँ के स्तन तो बहुत ही मनोहर थे। "अब तुमको समझ आया की मैं इतनी सुन्दर कैसे हूँ? मेरी प्यारी माँ की सारी सुन्दरता आई है मुझमे।" रूद्र ने मुस्कुराते और समझते हुए हामी में सर हिलाया।
"तुमको पता है, माँ इस बात से दुखी थी की वो मुझको बचपन में ब्रेस्ट-फीड नहीं करा सकीं, इसलिए मैंने सोचा की उनको ये बताऊँ की दुखी होने वाली बात कुछ भी नहीं है, क्योंकि मैं तो आज भी उनकी वो ही छोटी सी गुडिया हूँ। अब तो मैं जब तक यहाँ हूँ, तब तक माँ के ब्रेस्ट्स एन्जॉय करूंगी। लेकिन तुम इनको देख कर ललचाना मत, क्योंकि मेरी माँ के ब्रेस्ट्स को सिर्फ मैं पी सकती हूँ।"
"है न माँ?" कहते हुए पल्लवी ने बहुत ही भोलेपन से माला को देखा।
"कुछ भी कहती रहती है यह पागल। बेटा तुम चाय लोगे?" अपनी शर्मिंदगी को छुपाने के लिए माला ने बात बदल दी।
"हाँ मम्मी - चाय लूँगा। और आप प्लीज शर्मिंदा न हों। हम लोग तो आपके बच्चे है।"
"कितना अच्छा लड़का है। जितना आकर्षक व्यक्तित्व, उतना ही आकर्षक विचार।" माला ने मन में सोचा और संयत हो के उठ गयी और रसोई में नाश्ते और चाय का प्रबंध करने लगी।
चाय लेकर वापिस आई तो रूद्र ने माफ़ी मांगी और कहा की अब वो दरवाज़ा ठीक से बंद कर लेगा। पल्लवी हँसते हुए बोली, "माँ ने हम दोनों को नंगू पंगू देखा है।" बेचारे रूद्र का चेहरा शर्म से लाल हो गया।
"चल हट्ट बेशरम। कभी तो सोच के बोला कर! बेटे, मैंने पहले भी बोला है, की तुम दोनों ही मेरे बच्चे हो। तुम जैसा बेटा तो कोई भी औरत चाहेगी।"
"यानि की ये भी आपका दूध पी सकता है?" पल्लवी चौंकते हुए बोली।
"हाँ पी सकता है। अब खुश?" माला ने बनावटी गुस्से से कहा। लेकिन बोलने के साथ ही सोचा की कैसा लगेगा अगर रूद्र उसके स्तनों तो छूए, उनको दबाये और उनको चूसे।
"ओह भगवान्! ये कैसे कैसे विचार दे रहे हो तुम मुझको? ये तो मेरे बेटे जैसा है।" "विराट, आप प्लीज जल्दी से आ जाओ और इस अनायास ही भड़की हुई आग को बुझाओ...."
नाश्ते और चाय का समय आराम से बीता। बच्चों के साथ हंसने बोलने से माला का मन हल्का हो गया और सवेरे की अप्रत्याशित घटनाए मष्तिष्क के कोने में चली गयी। नाश्ते के बाद माला नहाने चली गयीं।
उसके जाते ही पल्लवी ने रूद्र के सीने पे प्यार से घूँसा मारते हुए कहा, "क्यों मिस्टर! टुकुर टुकुर क्या देख रहे थे?" रूद्र थोडा शर्मिंदगी से मुस्कुराया, "यार, ऐसा सीन चल रहा हो तो मैं आँखें तो बंद नहीं कर लूँगा न?"
"माँ के ब्रेस्ट्स एकदम अमेजिंग हैं न? तुमको पसंद आये?" पल्लवी की बात पर रूद्र ने सर हिलाया।
"सच बताना, तुम मम्मी को खुश करने के लिए उनके ब्रेस्ट्स पी रही थी, या कुछ और प्लान था?"
"उनको खुश करने के लिए। पता है, माँ के निप्पल्स से स्ट्राबेरी जैसा फ्लेवर आता है। कितने सॉफ्ट हैं!"
"पल्लो, मैं यह सब देख के कस के एक्साइट हो गया हूँ - एक राउंड और हो जाए? क्विकी?"
"कल रात चार बार किया है। तुम थके नहीं अभी तक?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा।
"ऐसी बीवी हो तो कौन गधा थकेगा भला?"
"ह्म्म्म... तो जनाब से कुछ ऐसा करवाते है जिससे ये थक जाएँ!" पल्लवी मुस्कुराते हुए बोली।
रूद्र ने पल्लवी तो चूमने के लिए उसकी कमर को पकड़ के अपनी तरफ खीचा, ऐसा करने के पल्लवी के स्तनाग्र उसके सीने से रगड़ खाने लगे। पल्लवी ने प्यार से उसके गले में बाहें डाल दी और रूद्र के मुह में मुह दाल के उसको चूमने लगी। कुछ देर चूमने के बाद रूद्र ने पल्लवी का टी-शर्ट उसके शरीर से खीच लिया, और बिना समय गवांए अपना भी शर्ट उतार दिया।
रूद्र को पल्लवी के स्तन बहुत प्यारे लगते थे - खास तौर पे उसके स्तनाग्र। उनकी उपमा वो अक्सर डार्क-चॉकलेट से करता था, जिसको पूरा उम्र चूसा, चुभलाया और चूमा जा सकता था।
अब वही कार्यक्रम प्रारंभ हो चला था। उसने पल्लवी के दाहिने स्तनाग्र को अपनी जीभ से कुछ देर पोंछा, और फिर उसको मुह में भर लिया। पल्लवी के मुह से हलकी सिसकारी निकल पड़ी। रूद्र बारी बारी से उसके स्तनों को चूसता जा रहा था। जब वो एक स्तन को अपने होंठो और जीभ से दुलारता, तो दुसरे को अपनी उँगलियों से। इसी बीच उसने अपने खाली हाथ को पल्लवी की निकर के अन्दर दाल दिया। योनि पर हाथ जाते ही उसको कुछ गीलेपन का एहसास हुआ। कुछ देर वहां सहलाने के बाद उसने अपनी उंगली पल्लवी की योनि में डाल कर अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया।
पल्लवी कुछ देर आँखें बंद करके आनंद लेती रही, फिर उसने रूद्र का पजामा नीचे खिसका दिया। रूद्र पूरी तरह उत्तेजित था -उसकी बनावट की सराहना करते हुए पल्लवी ने रूद्र के लिंग को पकड़ लिया और झुक कर उसको अपने मुह में भर लिया।
लिंग चूसे जाने का एहसास आंदोलित करने वाला था। उन्माद में रूद्र सोफे पर ही लेट गया। कुछ देर के बाद पल्लवी रुक गई और अपनी निकर उतार फेंकी। रूद्र के दोनों ओर अपनी टांगे करके वो उसके लिंग को अपनी नम योनि में दाल कर धीरे धीरे नीचे बैठ गयी।
"आअह्ह्ह्ह.... मस्त लग रहा है" पल्लवी की साँसे उन्माद के कारण उखड गयी। "अब देखती हूँ, मेरे राजकुमार थकते हैं या नहीं?"
पल्लवी ने उत्साह के साथ मैथुन करना प्रारंभ कर दिया। सवेरे पल्लवी और माला का रोमांचक प्रसंग देख कर रूद्र वैसे भी बहुत कामोत्तेजित हो गया था। लिहाजा, उसका लिंग एकदम कड़क हो गया था और पल्लवी की चुनौती से और भी दमदार हो गया। वो उसके स्तनों को या फिर उसके नितम्बो को बारी बारी से दबा रहा था।
कुछ 5 मिनटों में ही पल्लवी का शरीर चरमोत्कर्ष पे आकर थरथराने लगा, उसने अपनी कामुक चीख को दबाने के लिए अपने मुह पर हाथ रख लिया। लेकिन अभी रूद्र पूरे उन्माद में था, इसलिए पल्लवी ने कुछ पल रुक कर पुनः धक्के लगाना शुरू कर दिया। 3-4 और मिनट बीत जाने के बाद रूद्र स्खलित हुआ। पल्लवी जैसी सौंदर्य की देवी की योनि में वीर्य की धाराएँ छोड़ने का एहसास बहुत ही सुखद था।
पल्लवी थक के रूद्र के ऊपर ही गिर गयी। उसी अवस्था में दोनों अपनी सांसो पर काबू पाने के लिए आराम करने लगे। रूद्र ने उसको आलिंगनबद्ध कर लिया था और उसके बालों में धीरे धीरे उंगलियाँ चला रहा था साथ ही अपने प्यार का इज़हार भी उसके कानों में कर रहा था।
कुछ देर में पल्लवी उठी और उसने रूद्र के मुलायम होते लिंग को फिर से अपने मुह में लिया और जल्दी से उसमे बचे हुए वीर्य को चूस लिया। "आई लव यू सो मच, रूद्र माई डार्लिंग!" "मैं तुमको पागलो की तरह प्यार करती हूँ।"
"तुम आराम से लेट जाओ।" रूद्र ने अपना पजामा ऊपर चढ़ा लिया और बिना टी-शर्ट के ही लेट गया।
पल्लवी भी बिना कपड़ो के उठ कर जाने लगी तो रूद्र ने पूछा, "कपडे नहीं पहनोगी?"
"अरे, माँ ने देखा ही है मुझको ऐसे। वैसे भी उनसे क्या शर्म?" पल्लवी में मन में एक विचार कौंधा - "क्यूँ न हम लोग आज न्यूडिस्ट हो जाएँ?"
"मम्मी नाराज़ हो जाएँगी"
"नहीं होंगी। मैं तो कहती हूँ की तुम भी नंगे होकर लेटो। माँ नहा के निकलेगी तो उनको भी नंगा होने के लिए राज़ी करती हूँ"
"तुम पागल हो एकदम। वैसे सच में, नंगी हो के एकदम मस्त लगती हो। आज तुम प्लीज कुछ मत पहनो - खूब मज़ा आएगा।" ये बोलते बोलते रूद्र का लिंग फिर से खड़ा होने लगा।
पल्लवी ने माँ को मनाने वाली बात तो बस यूं ही कह दी थी। असल में उसकी हिम्मत इतनी नहीं थी, की अपनी माँ से वो ऐसी बाते करे। रिश्तो की कोई मर्यादाएँ होती है, सीमायें होती है। लेकिन न्यूडिस्ट होने का अनुभव एकदम नया होगा - खास तौर पे तब, जब की घर में उसके पति के अलावा कोई और हो। असल में आई आई टी छात्रावास में भी वो कभी पूर्ण नग्न अवस्था में नहीं रही थी।
"एकदम नया होगा ये..!" उसने सोचा।
अभी अभी सम्पन्न हुए यौन क्रिया के कारण निकले हार्मोनों और साथ ही साथ रूद्र की इच्छा, की वो आज नंगी ही रह जाये, के सम्मिलित प्रभाव ने उसके मन की वर्जनाओं को थोडा दबा दिया और एक नए अनुभव के लिए हिम्मत बांध दी। उसने ठान लिया की आज तो कपडे नहीं पहनेगी और अपने कमरे की तरफ चल दी।
.....
माला नहाने के बाद कपडे पहन कर बार निकल ही रही थी की उसने देखा की पल्लवी तो पूर्णतः नग्न है। माला ने सोचा की लगता है इन दोनों ने फिर से समागम कर लिया है - "बाप रे बाप! कभी थकते ही नहीं ये दोनों।"
उसने सोचा की वो 2 मिनट बाद बाहर निकलेगी, तब तक पल्लवी भी कपड़े पहन लेगी। लेकिन पल्लवी बड़ी देर तक यूँ ही अन्दर बाहर चक्कर लगाती रही। माला समझ नहीं सकी की उसको क्या बोले।
"कितनी सुन्दर लड़की है यह - लेकिन अभी भी ऐसे व्यवहार करती है की जैसे एकदम छोटी सी बच्ची हो। भला 20 साल की लड़की घर में ऐसे नंगे घूमती है कहीं?" 20 साल... कुछ दिनों पहले वो एक बच्ची थी, लेकिन अब देखो!"
सवेरे तो माला ने पल्लवी का सिर्फ आगे का हिस्सा देखा था, लेकिन अभी उसके घूमते टहलते रहने से उसका पीछे का हिस्सा भी दिखा। चिकनी पीठ और मादक नितम्ब, साथ ही सुन्दर जांघें। "कितने गोल पुट्ठे हैं इसके! तराशी हुई जांघे.. इकहरी टाँगे! एफ टीवी पे दिखने वाली न जाने कितनी ही मॉडल्स को ये मात दे सकती है।"
माला ने अंततः सोचा की इसको कुछ पहनने को बोलेगी और जाकर पल्लवी के सामने आकर खड़ी हो गयी।
"अरे तू ऐसी ही रहेगी क्या? कुछ तो शर्म कर! चल कपडे पहन"
"अरे माँ! आप! मैं आपके पास ही आने वाली थी।" पल्लवी मुस्कुराते हुए बोली।
"ऐसे? नंगी? अब तू जवान हो गयी है, कुछ शर्म लिहाज कर" माला दबे स्वर में बोल रही थी, जिससे रूद्र को आवाज न जाये।
"अरे आपने तो सवेरे मुझे ऐसे देखा ही था, और रही रूद्र की बात, तो उसने ही बोला की आज तुम ऐसे ही रहो, ... नंगी, खूब मज़ा आएगा।"
"तुम दोनों न! क्या मेरे जाते ही फिर से शुरू हो गए थे?" जवाब में पल्लवी ने खीसे निपोर दी।
"सच में?! हे भगवान्, कितना स्टैमिना है तुम लोगो में?!"
"हा हा... माँ कल रात से पाँचवी बार है।" पल्लवी ने हँसते हुए, आँख मारते हुए कहा।
"तुझे बिलकुल भी शर्म नहीं है"
"आपसे तो बिलकुल भी नहीं - आप मेरी माँ कम और दोस्त ज्यादा हैं"
"बस बस, मस्का मत लगा, और जा कर कपडे पहन ले।"
"आज तो मा-बदौलत ऐसे ही रहेंगी - पति का आदेश जो है।" पल्लवी ने आँख मटकाते हुए कहा।
"एक तुम और तुम्हारा पति, दोनों ही एक नंबर के बेशरम हो"
"अरे हाँ, मैं ये बताने आई थी की आज मैं और रूद्र दोनों ही न्यूडिस्ट बनने वाले हैं। मतलब, आज हम दोनों ही कपडे नहीं पहनेंगे। सोचा की आपको बता दे, नहीं तो आप शाक्ड हो जाएँगी।"
पल्लवी ने थोडा सोचते हुए आगे कहा "वैसे माँ, कितना मज़ा आएगा अगर आप भी मत पहनिए। फिर हम में से कोई भी संकोच नहीं करेगा" आखिर उसने कह ही दिया - लेकिन उसका दिल धक् से हो गया की उसने ये क्यों बोला!
"मैं नहीं बनती कोई न्यूडिस्ट व्यूडिस्ट। न जाने कहाँ कहाँ से आइडियाज लाते हैं ये दोनों।" माला बुदबुदाई। "कोई छोटा बच्चा हो तो समझ में भी आये! तुम दोनों जवान हो गए हो। मुझे नहीं पसंद है ये सब।"
पल्लवी ने देखा की माँ का प्रतिवाद और गुस्सा ठीक उतना ही है जितना की बिना पूछे, चोरी से रसगुल्ला खाने पर होता है।
फिर भी उसने थोड़ी सतर्कता से बोला, "माँ, प्लीज आप नाराज़ मत होइए। ठीक है आप कपडे पहने रहिएगा, लेकिन मैं अकेले ही ऐसे रहूंगी तो मुझे अजीब सा लगेगा। रूद्र बेचारे को भी अलाऊ कर दीजिये न?" पल्लवी ने किसी छोटे बच्चे की तरह चिरौरी करते हुए कहा।
"मैं कौन होती हूँ अलाऊ करने वाली! अपने कमरे के अन्दर जैसे रहना हो रहो, और जो करना है करो। लेकिन बाहर तो ठीक से रहो"
माला की न नुकुर और पल्लवी की हठ भरे निवेदनो के बीच माला के मन में विचार अवश्य आया की ऐसे सुन्दर नौजवान नग्न देखने को मिलेगा। "ऐसी कोई बुरी बात भी नहीं है, अगर दोनों नग्न रहते हैं। बच्चे ही हैं दोनों। क्या फर्क पड़ता है?" इस तर्क से माला का प्रतिरोध ढीला हो गया।
प्रत्यक्ष में उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन ना ना कहना बंद कर दिया।
kramashah............
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चट मंगनी चट ब्याह-2
चाय पीने के बाद पल्लवी अपनी माँ की गोद में सर रख के लेट गयी, और दोनों ही पल्लवी के बचपन की बाते करने लगी। माला ने उसको बताया की जब वो गर्भवती हुई, तो उसका मन था की उसे लड़की हो, जिसे पाल पोस कर वो एक अच्छा इंसान बनाएगी।
माला अपनी बेटी के पालन में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती थी, और उसने जहाँ तक संभव था ये कर भी दिखाया था। लेकिन उसको इस बात का मलाल था की पल्लवी सिर्फ 2 महीने ही उसका दूध पी सकी थी। इस बात ने माला की ममता को बहुत ठेस पहुचाई हुई थी, जिसका असर अभी तक नहीं ख़तम हुआ था।
"पल्लवी, तुम जानती हो की तुमने सिर्फ 2 महीने मेरा दूध पिया था? मेरा मन था की मेरी बेटी कम से कम एक साल तक मेरा दूध पिए। लेकिन न जाने कैसे 2 महीने में ही मेरा दूध सूख गया।" बोलते बोलते माला का गला भर आया और आँखें भर आई।
"माँ... आप प्लीज मत रोइये। वो तो पुरानी बात हो गयी और मैंने कोई शिकायत भी नहीं की। और देखिए न, आपके की पालने से तो मई एकदम फिट एंड फाइन हूँ"
लेकिन माला की आँखों से बरसात शुरू हो ही गयी।
पल्लवी थोडा सोच कर बोली, "माँ,मैं तो अभी भी आपकी बच्ची हूँ। उस समय नहीं तो क्या हुआ... मैं अब भी तो आपका दूध पी सकती हूँ.. है न?"
"..... अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है - क्या तुम सच में.....!"
"श्ह्ह्ह्ह्ह..." कहते हुए पल्लवी ने माँ की नाइटी के ऊपर के कुछ बटन खोलने शुरू कर दिए - माला के कुछ कहने से पूर्व ही चार बटन खुल चुके थे, जिससे माला के दोनों सुन्दर स्तन पूर्णतः खुल कर सामने आ गए। उनको देख के पल्लवी का मुंह खुला सा रह गया।
"माँ... आप बहुत बहुत सुन्दर हो। आपने कभी मुझको ये दिखाए ही नहीं। गन्दी मम्मी - मुझे भी आपके जैसे ही ब्रेस्ट्स चाहिए।"
इस अचानक घटे घटनाक्रम से माला थोडा अवाक् रह गयी। लेकिन उसने देखा की पल्लवी किसी छोटे बच्चे की तरह उत्साहित हो गयी थी। भाव-आह्लादित माला ने बहुत प्यार से पल्लवी का सर अपने बाएँ स्तन की तरफ खीचा - पल्लवी ने भी अपनी माँ के सुन्दर और मुलायम स्तन को अपने मुँह में रख लिया।
पल्लवी का मुँह चाय पीने से गरम हो गया था, और इस गर्मी का एहसास माला के स्तनाग्र पर बहुत अच्छा लगा। कुछ देर पल्लवी ने अपनी जीभ से उस पर दुलार किया, फिर उसको चूसना शुरू किया। पल्लवी को माँ के स्तन को पीने की कोई याददाश्त नहीं थी। ये नया अनुभव - उसके माँ के गरम, मुलायम और कोमल स्तनाग्र, जो उसके दुलार और स्तनपान के कारण थोड़े लम्बवत हो गए थे - पल्लवी को बहुत अच्छा लगा।
उसका हाथ अनायास ही माला के दाहिने स्तन पर चला गया और धीरे धीरे उसको दबाने, सहलाने लगा।
"तुमको यह पसंद है?" पल्लवी ने बिना स्तन मुह से निकाले, सहमति में सर हिलाया। "जब तक मन करे तब तक पियो" माला ने ममता भरे स्वर में कहा। स्तनपान करती हुई पल्लवी ठीक वैसी ही लग रही थी जब वो एकदम छोटी सी गुडिया थी। माला का मन भर आया। उसका मन हुआ की यह कभी समाप्त न हो।
कुछ देर और चूसने के बाद,पल्लवी ने दाहिने स्तन पर भी यही क्रिया प्रारंभ कर दी। लेकिन जाने अनजाने पल्लवी के स्तनपान करने का तरीका कुछ इस प्रकार था की माला के स्तनाग्रों से अब दुसरे प्रकार की अनुभूति होने लग गयी थी - कुछ वैसी ही जैसे की कामुक होने पर होती है।
भजन का शांति प्रदान करने वाला प्रभाव ख़तम होने लगा और माला का वात्सल्य भाव अब धीरे धीरे कामुकता की ओर चल पड़ा।
विराट ने कभी उसके स्तनों को इतना आदर नहीं दिया - लेकिन माला जानती थी की ये उसके शरीर के सबसे संवेदनशील अंग हैं। माला तो सिर्फ उनके उपभोग से ही चरम आनंद प्राप्त कर सकती थी। अभी कुछ वैसी ही दशा चल रही थी। हर्षोन्माद के मारे उसकी आँखें बंद हो गयी।
इस दौरान दोनों ही इस बात से अनजान थे की रूद्र पिछले कुछ समय से इस पूरे क्रिया कलाप का सीधा प्रसारण देख रहा था। उसके चेहरे पर कौतूहल, और मनोरंजन का मिला जुला भाव था।
"अरे रूद्र, तुम कब उठ आए?" ये पल्लवी की आवाज़ थी, जिसे सुन कर माला जैसे धरातल पे आ गयी। आँखे खुली तो देखा की रूद्र मुस्कुराते हुए माला के चेहरे और स्तनों को बारी बारी से देख रहा है। हड़बड़ी में वो अपने कपड़े भी ठीक से समेट नहीं पाई, जिसके कारण उसके स्तन अधखुले रह गए और पूरी स्थिति और भी हास्यास्पद हो गयी।
माला लेकिन पूरी तरह हतोत्साहित हो गई - उसका मन सोच रहा था की अपनी मूर्खता में दामाद के सामने नंगा होना पड़ गया। लेकिन भागने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था, क्योंकि पल्लवी का सर अभी भी उसकी गोद में था, और वो बेवक़ूफ़ हटने का नाम ही नहीं ले रही थी।
पल्लवी ने देखा की रूद्र क्या देख रहा है। उसको यह भी मालूम था की रूद्र नारी शरीर में स्तनों को सबसे अधिक पसंद करता है, और उसकी माँ के स्तन तो बहुत ही मनोहर थे। "अब तुमको समझ आया की मैं इतनी सुन्दर कैसे हूँ? मेरी प्यारी माँ की सारी सुन्दरता आई है मुझमे।" रूद्र ने मुस्कुराते और समझते हुए हामी में सर हिलाया।
"तुमको पता है, माँ इस बात से दुखी थी की वो मुझको बचपन में ब्रेस्ट-फीड नहीं करा सकीं, इसलिए मैंने सोचा की उनको ये बताऊँ की दुखी होने वाली बात कुछ भी नहीं है, क्योंकि मैं तो आज भी उनकी वो ही छोटी सी गुडिया हूँ। अब तो मैं जब तक यहाँ हूँ, तब तक माँ के ब्रेस्ट्स एन्जॉय करूंगी। लेकिन तुम इनको देख कर ललचाना मत, क्योंकि मेरी माँ के ब्रेस्ट्स को सिर्फ मैं पी सकती हूँ।"
"है न माँ?" कहते हुए पल्लवी ने बहुत ही भोलेपन से माला को देखा।
"कुछ भी कहती रहती है यह पागल। बेटा तुम चाय लोगे?" अपनी शर्मिंदगी को छुपाने के लिए माला ने बात बदल दी।
"हाँ मम्मी - चाय लूँगा। और आप प्लीज शर्मिंदा न हों। हम लोग तो आपके बच्चे है।"
"कितना अच्छा लड़का है। जितना आकर्षक व्यक्तित्व, उतना ही आकर्षक विचार।" माला ने मन में सोचा और संयत हो के उठ गयी और रसोई में नाश्ते और चाय का प्रबंध करने लगी।
चाय लेकर वापिस आई तो रूद्र ने माफ़ी मांगी और कहा की अब वो दरवाज़ा ठीक से बंद कर लेगा। पल्लवी हँसते हुए बोली, "माँ ने हम दोनों को नंगू पंगू देखा है।" बेचारे रूद्र का चेहरा शर्म से लाल हो गया।
"चल हट्ट बेशरम। कभी तो सोच के बोला कर! बेटे, मैंने पहले भी बोला है, की तुम दोनों ही मेरे बच्चे हो। तुम जैसा बेटा तो कोई भी औरत चाहेगी।"
"यानि की ये भी आपका दूध पी सकता है?" पल्लवी चौंकते हुए बोली।
"हाँ पी सकता है। अब खुश?" माला ने बनावटी गुस्से से कहा। लेकिन बोलने के साथ ही सोचा की कैसा लगेगा अगर रूद्र उसके स्तनों तो छूए, उनको दबाये और उनको चूसे।
"ओह भगवान्! ये कैसे कैसे विचार दे रहे हो तुम मुझको? ये तो मेरे बेटे जैसा है।" "विराट, आप प्लीज जल्दी से आ जाओ और इस अनायास ही भड़की हुई आग को बुझाओ...."
नाश्ते और चाय का समय आराम से बीता। बच्चों के साथ हंसने बोलने से माला का मन हल्का हो गया और सवेरे की अप्रत्याशित घटनाए मष्तिष्क के कोने में चली गयी। नाश्ते के बाद माला नहाने चली गयीं।
उसके जाते ही पल्लवी ने रूद्र के सीने पे प्यार से घूँसा मारते हुए कहा, "क्यों मिस्टर! टुकुर टुकुर क्या देख रहे थे?" रूद्र थोडा शर्मिंदगी से मुस्कुराया, "यार, ऐसा सीन चल रहा हो तो मैं आँखें तो बंद नहीं कर लूँगा न?"
"माँ के ब्रेस्ट्स एकदम अमेजिंग हैं न? तुमको पसंद आये?" पल्लवी की बात पर रूद्र ने सर हिलाया।
"सच बताना, तुम मम्मी को खुश करने के लिए उनके ब्रेस्ट्स पी रही थी, या कुछ और प्लान था?"
"उनको खुश करने के लिए। पता है, माँ के निप्पल्स से स्ट्राबेरी जैसा फ्लेवर आता है। कितने सॉफ्ट हैं!"
"पल्लो, मैं यह सब देख के कस के एक्साइट हो गया हूँ - एक राउंड और हो जाए? क्विकी?"
"कल रात चार बार किया है। तुम थके नहीं अभी तक?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए कहा।
"ऐसी बीवी हो तो कौन गधा थकेगा भला?"
"ह्म्म्म... तो जनाब से कुछ ऐसा करवाते है जिससे ये थक जाएँ!" पल्लवी मुस्कुराते हुए बोली।
रूद्र ने पल्लवी तो चूमने के लिए उसकी कमर को पकड़ के अपनी तरफ खीचा, ऐसा करने के पल्लवी के स्तनाग्र उसके सीने से रगड़ खाने लगे। पल्लवी ने प्यार से उसके गले में बाहें डाल दी और रूद्र के मुह में मुह दाल के उसको चूमने लगी। कुछ देर चूमने के बाद रूद्र ने पल्लवी का टी-शर्ट उसके शरीर से खीच लिया, और बिना समय गवांए अपना भी शर्ट उतार दिया।
रूद्र को पल्लवी के स्तन बहुत प्यारे लगते थे - खास तौर पे उसके स्तनाग्र। उनकी उपमा वो अक्सर डार्क-चॉकलेट से करता था, जिसको पूरा उम्र चूसा, चुभलाया और चूमा जा सकता था।
अब वही कार्यक्रम प्रारंभ हो चला था। उसने पल्लवी के दाहिने स्तनाग्र को अपनी जीभ से कुछ देर पोंछा, और फिर उसको मुह में भर लिया। पल्लवी के मुह से हलकी सिसकारी निकल पड़ी। रूद्र बारी बारी से उसके स्तनों को चूसता जा रहा था। जब वो एक स्तन को अपने होंठो और जीभ से दुलारता, तो दुसरे को अपनी उँगलियों से। इसी बीच उसने अपने खाली हाथ को पल्लवी की निकर के अन्दर दाल दिया। योनि पर हाथ जाते ही उसको कुछ गीलेपन का एहसास हुआ। कुछ देर वहां सहलाने के बाद उसने अपनी उंगली पल्लवी की योनि में डाल कर अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया।
पल्लवी कुछ देर आँखें बंद करके आनंद लेती रही, फिर उसने रूद्र का पजामा नीचे खिसका दिया। रूद्र पूरी तरह उत्तेजित था -उसकी बनावट की सराहना करते हुए पल्लवी ने रूद्र के लिंग को पकड़ लिया और झुक कर उसको अपने मुह में भर लिया।
लिंग चूसे जाने का एहसास आंदोलित करने वाला था। उन्माद में रूद्र सोफे पर ही लेट गया। कुछ देर के बाद पल्लवी रुक गई और अपनी निकर उतार फेंकी। रूद्र के दोनों ओर अपनी टांगे करके वो उसके लिंग को अपनी नम योनि में दाल कर धीरे धीरे नीचे बैठ गयी।
"आअह्ह्ह्ह.... मस्त लग रहा है" पल्लवी की साँसे उन्माद के कारण उखड गयी। "अब देखती हूँ, मेरे राजकुमार थकते हैं या नहीं?"
पल्लवी ने उत्साह के साथ मैथुन करना प्रारंभ कर दिया। सवेरे पल्लवी और माला का रोमांचक प्रसंग देख कर रूद्र वैसे भी बहुत कामोत्तेजित हो गया था। लिहाजा, उसका लिंग एकदम कड़क हो गया था और पल्लवी की चुनौती से और भी दमदार हो गया। वो उसके स्तनों को या फिर उसके नितम्बो को बारी बारी से दबा रहा था।
कुछ 5 मिनटों में ही पल्लवी का शरीर चरमोत्कर्ष पे आकर थरथराने लगा, उसने अपनी कामुक चीख को दबाने के लिए अपने मुह पर हाथ रख लिया। लेकिन अभी रूद्र पूरे उन्माद में था, इसलिए पल्लवी ने कुछ पल रुक कर पुनः धक्के लगाना शुरू कर दिया। 3-4 और मिनट बीत जाने के बाद रूद्र स्खलित हुआ। पल्लवी जैसी सौंदर्य की देवी की योनि में वीर्य की धाराएँ छोड़ने का एहसास बहुत ही सुखद था।
पल्लवी थक के रूद्र के ऊपर ही गिर गयी। उसी अवस्था में दोनों अपनी सांसो पर काबू पाने के लिए आराम करने लगे। रूद्र ने उसको आलिंगनबद्ध कर लिया था और उसके बालों में धीरे धीरे उंगलियाँ चला रहा था साथ ही अपने प्यार का इज़हार भी उसके कानों में कर रहा था।
कुछ देर में पल्लवी उठी और उसने रूद्र के मुलायम होते लिंग को फिर से अपने मुह में लिया और जल्दी से उसमे बचे हुए वीर्य को चूस लिया। "आई लव यू सो मच, रूद्र माई डार्लिंग!" "मैं तुमको पागलो की तरह प्यार करती हूँ।"
"तुम आराम से लेट जाओ।" रूद्र ने अपना पजामा ऊपर चढ़ा लिया और बिना टी-शर्ट के ही लेट गया।
पल्लवी भी बिना कपड़ो के उठ कर जाने लगी तो रूद्र ने पूछा, "कपडे नहीं पहनोगी?"
"अरे, माँ ने देखा ही है मुझको ऐसे। वैसे भी उनसे क्या शर्म?" पल्लवी में मन में एक विचार कौंधा - "क्यूँ न हम लोग आज न्यूडिस्ट हो जाएँ?"
"मम्मी नाराज़ हो जाएँगी"
"नहीं होंगी। मैं तो कहती हूँ की तुम भी नंगे होकर लेटो। माँ नहा के निकलेगी तो उनको भी नंगा होने के लिए राज़ी करती हूँ"
"तुम पागल हो एकदम। वैसे सच में, नंगी हो के एकदम मस्त लगती हो। आज तुम प्लीज कुछ मत पहनो - खूब मज़ा आएगा।" ये बोलते बोलते रूद्र का लिंग फिर से खड़ा होने लगा।
पल्लवी ने माँ को मनाने वाली बात तो बस यूं ही कह दी थी। असल में उसकी हिम्मत इतनी नहीं थी, की अपनी माँ से वो ऐसी बाते करे। रिश्तो की कोई मर्यादाएँ होती है, सीमायें होती है। लेकिन न्यूडिस्ट होने का अनुभव एकदम नया होगा - खास तौर पे तब, जब की घर में उसके पति के अलावा कोई और हो। असल में आई आई टी छात्रावास में भी वो कभी पूर्ण नग्न अवस्था में नहीं रही थी।
"एकदम नया होगा ये..!" उसने सोचा।
अभी अभी सम्पन्न हुए यौन क्रिया के कारण निकले हार्मोनों और साथ ही साथ रूद्र की इच्छा, की वो आज नंगी ही रह जाये, के सम्मिलित प्रभाव ने उसके मन की वर्जनाओं को थोडा दबा दिया और एक नए अनुभव के लिए हिम्मत बांध दी। उसने ठान लिया की आज तो कपडे नहीं पहनेगी और अपने कमरे की तरफ चल दी।
.....
माला नहाने के बाद कपडे पहन कर बार निकल ही रही थी की उसने देखा की पल्लवी तो पूर्णतः नग्न है। माला ने सोचा की लगता है इन दोनों ने फिर से समागम कर लिया है - "बाप रे बाप! कभी थकते ही नहीं ये दोनों।"
उसने सोचा की वो 2 मिनट बाद बाहर निकलेगी, तब तक पल्लवी भी कपड़े पहन लेगी। लेकिन पल्लवी बड़ी देर तक यूँ ही अन्दर बाहर चक्कर लगाती रही। माला समझ नहीं सकी की उसको क्या बोले।
"कितनी सुन्दर लड़की है यह - लेकिन अभी भी ऐसे व्यवहार करती है की जैसे एकदम छोटी सी बच्ची हो। भला 20 साल की लड़की घर में ऐसे नंगे घूमती है कहीं?" 20 साल... कुछ दिनों पहले वो एक बच्ची थी, लेकिन अब देखो!"
सवेरे तो माला ने पल्लवी का सिर्फ आगे का हिस्सा देखा था, लेकिन अभी उसके घूमते टहलते रहने से उसका पीछे का हिस्सा भी दिखा। चिकनी पीठ और मादक नितम्ब, साथ ही सुन्दर जांघें। "कितने गोल पुट्ठे हैं इसके! तराशी हुई जांघे.. इकहरी टाँगे! एफ टीवी पे दिखने वाली न जाने कितनी ही मॉडल्स को ये मात दे सकती है।"
माला ने अंततः सोचा की इसको कुछ पहनने को बोलेगी और जाकर पल्लवी के सामने आकर खड़ी हो गयी।
"अरे तू ऐसी ही रहेगी क्या? कुछ तो शर्म कर! चल कपडे पहन"
"अरे माँ! आप! मैं आपके पास ही आने वाली थी।" पल्लवी मुस्कुराते हुए बोली।
"ऐसे? नंगी? अब तू जवान हो गयी है, कुछ शर्म लिहाज कर" माला दबे स्वर में बोल रही थी, जिससे रूद्र को आवाज न जाये।
"अरे आपने तो सवेरे मुझे ऐसे देखा ही था, और रही रूद्र की बात, तो उसने ही बोला की आज तुम ऐसे ही रहो, ... नंगी, खूब मज़ा आएगा।"
"तुम दोनों न! क्या मेरे जाते ही फिर से शुरू हो गए थे?" जवाब में पल्लवी ने खीसे निपोर दी।
"सच में?! हे भगवान्, कितना स्टैमिना है तुम लोगो में?!"
"हा हा... माँ कल रात से पाँचवी बार है।" पल्लवी ने हँसते हुए, आँख मारते हुए कहा।
"तुझे बिलकुल भी शर्म नहीं है"
"आपसे तो बिलकुल भी नहीं - आप मेरी माँ कम और दोस्त ज्यादा हैं"
"बस बस, मस्का मत लगा, और जा कर कपडे पहन ले।"
"आज तो मा-बदौलत ऐसे ही रहेंगी - पति का आदेश जो है।" पल्लवी ने आँख मटकाते हुए कहा।
"एक तुम और तुम्हारा पति, दोनों ही एक नंबर के बेशरम हो"
"अरे हाँ, मैं ये बताने आई थी की आज मैं और रूद्र दोनों ही न्यूडिस्ट बनने वाले हैं। मतलब, आज हम दोनों ही कपडे नहीं पहनेंगे। सोचा की आपको बता दे, नहीं तो आप शाक्ड हो जाएँगी।"
पल्लवी ने थोडा सोचते हुए आगे कहा "वैसे माँ, कितना मज़ा आएगा अगर आप भी मत पहनिए। फिर हम में से कोई भी संकोच नहीं करेगा" आखिर उसने कह ही दिया - लेकिन उसका दिल धक् से हो गया की उसने ये क्यों बोला!
"मैं नहीं बनती कोई न्यूडिस्ट व्यूडिस्ट। न जाने कहाँ कहाँ से आइडियाज लाते हैं ये दोनों।" माला बुदबुदाई। "कोई छोटा बच्चा हो तो समझ में भी आये! तुम दोनों जवान हो गए हो। मुझे नहीं पसंद है ये सब।"
पल्लवी ने देखा की माँ का प्रतिवाद और गुस्सा ठीक उतना ही है जितना की बिना पूछे, चोरी से रसगुल्ला खाने पर होता है।
फिर भी उसने थोड़ी सतर्कता से बोला, "माँ, प्लीज आप नाराज़ मत होइए। ठीक है आप कपडे पहने रहिएगा, लेकिन मैं अकेले ही ऐसे रहूंगी तो मुझे अजीब सा लगेगा। रूद्र बेचारे को भी अलाऊ कर दीजिये न?" पल्लवी ने किसी छोटे बच्चे की तरह चिरौरी करते हुए कहा।
"मैं कौन होती हूँ अलाऊ करने वाली! अपने कमरे के अन्दर जैसे रहना हो रहो, और जो करना है करो। लेकिन बाहर तो ठीक से रहो"
माला की न नुकुर और पल्लवी की हठ भरे निवेदनो के बीच माला के मन में विचार अवश्य आया की ऐसे सुन्दर नौजवान नग्न देखने को मिलेगा। "ऐसी कोई बुरी बात भी नहीं है, अगर दोनों नग्न रहते हैं। बच्चे ही हैं दोनों। क्या फर्क पड़ता है?" इस तर्क से माला का प्रतिरोध ढीला हो गया।
प्रत्यक्ष में उसने कुछ कहा नहीं, लेकिन ना ना कहना बंद कर दिया।
kramashah............
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