FUN-MAZA-MASTI
चट मंगनी चट ब्याह-3
"तो हम लोग आज बिना कपडे के रह सकते हैं?"
माला ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी आँखें कह रही थी की वो कोई विवाद नहीं करेगी।
"थैंक यु माँ!" पल्लवी ने ख़ुशी के मारे जोर से कहा और माँ से कस के चिपक गयी।
माला ने भी उसको प्यार से गले लगा लिया और उसकी पीठ सहलाने लगी। उसके मन में हुआ की पल्लवी के नितम्ब छू कर देखे की कैसे लगते हैं। बचपन में छुआ था, तब से अब तक कितना समय हो गया।
"पल्लवी..." माला उसको उसके नाम से तब बुलाती थी जब वो उसके अपने बराबर का समझती थी।
"हाँ माँ"
"मे आई टच योर बटक्स?" किसी बात को बोलने में जब माला को लज्जा आती थी, तो अंग्रेजी में बोलने लगती थी।
"माँ, यु कैन टच नॉट ओन्ली माई बटक्स, बट आल्सो माय ब्रेस्ट्स एंड देअर। आई विल नेवर माइंड योर टचिंग" बोलते हुए पल्लवी आलिंगन तोड़ के अलग हट गई और माँ की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई।
माला ने बहुत हिचकते हुए पल्लवी के उन्नत नितम्बों को छुआ। "वाकई कितने चिकने हैं... और ठोस भी! गुरुत्व का कोई प्रभाव नहीं। रंग भी कितना साफ है!" उसने अपना हाथ हटाया, तो पल्लवी मुस्कुराते हुए पलट गयी।
माला की दृष्टि में पल्लवी के स्तन सबसे सुन्दर थे। उसको अपने खुद के स्तन बहुत प्यारे लगते थे, लेकिन पल्लवी के स्तनों में जो यौवन की ताजगी थी, उसके कारण वो और भी सुन्दर लगते थे।
"तुम बहुत सुन्दर हो, पल्लवी" माला ने उसके स्तनों को देखते हुए कहा।
"मैं, या मेरे ब्रेस्ट्स?"
"तुम भी और तुम्हारे ब्रेस्ट्स भी" माला की हिचक कम हो रही थी।
पल्लवी गर्व से मुस्कुराई। अगर माँ को मेरे ब्रेस्ट्स पसंद हैं, तो ये ज़रूर ही बेस्ट होंगे!
"माँ, अगर आप मेरे ब्रेस्ट्स को लाइक करती है तो प्लीस, इनको चूम लीजिये...... जैसे आज मैंने आपके चूमे थे"
माला ठिठक गयी, "चूमे कहाँ थे - चूसे थे!" "मैं अपनी बेटी के स्तन चूसूंगी? अपनी माँ के बाद ये पहला स्तन होगा जो माला चखेगी।" ये एक रोंगटे खड़े करने वाला रोमांच था। क्या उसने सही सुना था, निश्चित करने के लिए माला ने पल्लवी की तरफ देखा।
पल्लवी ने प्यार से मुस्कुराते हुए हामी दिखाने के लिए सर हिलाया।
माला ने अनिश्चय भरे तरीके से पल्लवी के छोटे, गहरे लाल-भूरे रंग के आकर्षक बाएं स्तनाग्र को अपने अपने खुले हुए होंठो में भर लिया और जीभ को थोडा पीछे करके हलके से चूसा।
इतने कम अन्तराल में पहले रूद्र और अब माला द्वारा अपने स्तनों पर होने वाली क्रिया से पल्लवी रोमांचित हो गयी। प्रेम-हर्मोनो के प्रभाव और संवेदनशील अंग की छेड़खानी से वो फिर से मदमस्त होने लगी।
थोड़ी थोड़ी देर तक दोनों स्तनों को हल्का हल्का चूसने के बाद माला संयत हो कर अलग खड़ी हो गयी। "अद्भुत है, स्तनपान करना और कराना - दोनों ही! आज सवेरे ही पल्लवी ने इनको पीकर मुझे इतना सुख दिया, और अब अपने स्तन पिला कर फिर से!
"थैंक्स माँ" पल्लवी की आँखों में वो वासना के हलके लाल रंग के डोरे साफ देख सकती थी, और जानती थी की उसकी खुद की आंखे भी यही कहानी कह रही है।
"थैंक्स मुझे कहना चाहिए पगली। तुमको नहीं मालूम, की तुमने मुझे कितनी ख़ुशी दी है।"
दोनों कुछ पल ऐसे ही प्यार से एक दुसरे को देखती रही। अचानक पल्लवी की आँखों में शरारत का भाव आ गया।
वो बोली, "माँ, आपने अभी अभी रूद्र को फ्रेंच-किस किया है"
"क्या..!? मैंने कब....!?" फिर उसको समझ आया - रूद्र ने भी बस कुछ ही देर पहले इन्ही स्तनों को चूमा चूसा होगा, जिसको वो चूस रही थी।
"रूद्र को फ्रेंच-किस! पागल!" इस भावना से उसे खुद ही शर्म आ गयी। "तुम आज सचमुच कुछ नहीं पहनोगी?" माला का स्वर अब एकदम शांत था।
"अगर आपको वाकई पसंद नहीं तो तो पहन लूंगी।" पल्लवी का स्वर भी शांत था - कोई मनुहार नहीं। जैसे उसको मालूम था की माला अब मन नहीं करेगी।
"नहीं। मुझे पसंद नहीं है, ऐसा नहीं है।" माला सावधानी से शब्द चुनते हुए बोली, "तुमको जैसा अच्छा लगे, वैसे रहो। तुम लोगो का घर है।" फिर थोडा सोचकर, "लेकिन, मुझसे नहीं हो पायेगा यह नंगा वंगा होना। तुम लोग जवान हो, जो मन चाहे करो। ....... रूद्र भी चाहे तो 'वैसे' रह सकता है।"
"थैंक यू माँ। मैं वाकई आज पूरी न्यूड रहना चाहती हूँ, चाहे जो हो। देखें तो कैसा लगता है।"
माला ने स्वीकृति में सर हिलाया। फिर पल्लवी से पूछा, "तुम्हारे 'यहाँ' पर बाल नहीं आते?" फिर थोडा ठहर कर, "अच्छा है नहीं आते - कितना झंझट होता है।"
"आते हैं माँ। लेकिन रूद्र को पसंद नहीं हैं। ही लाइक्स टू यूस हिज माउथ देअर, एंड डस नाट लाइक द फील ऑफ़ हेयर। वो मुझे उस फेमस स्किन क्लिनिक में ले गया था। वहां लेज़र से बाल साफ कर देते हैं। दिस एरिया इस नाऊ एस क्लीन एस अ बेबीस।" और कह कर हलके हलके हंसने लगी।
"मैं जा कर रूद्र को ये गुड न्यूज़ सुनाती हूँ और उसको बोलती हूँ की चलो बेटा, कपडे उतारो। आज बर्थ-डे ड्रेस वाला दिन है।"
रूद्र आराम से लेट कर सपने देख रहा था। उस सपने में उसको अपनी सासू-माँ के स्तनों की साफ छवि दिख रही थी। पल्लवी और माला की मज़ेदार करतूत ने उसको इतना उत्तेजित कर दिया था, की पल्लवी के साथ वह पुनः सम्भोग करना चाहता था। न जाने कहाँ से इतनी स्फूर्ति और उर्जा भर गयी थी उसके अन्दर की आधे घंटे के अन्दर ही वो फिर से तैयार हो गया था। ऊपर से यह सपना। उसने सिर्फ पजामा पहना हुआ था, उसके अन्दर कुछ नहीं। ऊपर का शरीर वैसे ही नंगा था। कामोद्दीपन सपने और वासना भरी इच्छाओं के कारण उसके भी हर्मोन अति-सक्रियता से काम कर रहे थे। रूद्र का लिंग पूर्ण उत्तेजित होकर पूरा उर्ध्व हो जाता था क्योंकि उसके जघन क्षेत्र की मांस-पेशियाँ बहुत मजबूत थी। लिंग इस समय पहले से भी अधिक कड़ा हो गया था और पूरी तरह से उर्ध्व होकर मनो पजामे को फाड़ कर बाहर आने को आतुर था। रूद्र लेकिन सपने के सागर में गोते लगा रहा था।
पल्लवी भी रूद्र के इस उपकरण की दीवानी थी। वो जब भी मौका पाते, कम-क्रीडा में लीन हो जाते। लेकिन आनंद देने वाला उपकरण तो रूद्र का लिंग ही था। यदि कभी वो थकी भी होती और यदि कभी मूड न भी होता तो भी इस लिंग में न जाने ऐसी क्या बात थी की जैसे ही उसकी योनि के अन्दर जाता, वैसे ही मानो कोई स्विच 'ऑन' कर देता और पल्लवी मदमस्त हो जाती। उसको मालूम था की रूद्र की वो पूरी तरह गुलाम है। अगर वो चाहे तो दिन के 24 घंटे उसके साथ सम्भोग कर सकता है और वो मन नहीं कर सकती। पुरुष शरीर में लिंग उसका सबसे पसंदीदा अंग था, और लिंगों में रूद्र का लिंग उसके लिए सबसे अच्छा था।
रूद्र - शिव का एक नाम भी है, और शिव का लिंग ही तो पूजा जाता है। पल्लवी वास्तव में रूद्र का लिंग पूजती थी - हाथ से, मुह से और योनि से। पाश्चात्य देशो में इसको ब्लो-जॉब कहते हैं! क्या वाहियात बात है। इसको 'लिंग का मुख-पूजन' कहना चाहिए।
रूद्र को इस प्रकार लेटा देख कर पल्लवी में प्यार उमड़ आया, साथ ही उसकी दृष्टि कस के तने हुए लिंग पर भी पड़ी। मन ही मन खुश हो गयी। पति को जगाने का मस्त तरीका दिमाग में कौंध गया। उसने बहुत धीरे से रूद्र का पजामा नीचे सरकाया और पूरी सराहना के साथ अपने प्यारे खिलौने को देखा। रूद्र का शरीर इकहरा था और कसरती भी। उसमे से इतने गर्व से ऊपर खड़ा हुआ लिंग, हलके भूरे-लाल रंग का एक मोटा स्तंभ, जिसकी लम्बाई कम से कम छह इंच अवश्य थी, और मोटाई तो पल्लवी की कलाई से भी ज्यादा, बहुत ही रोमांचक लग रहा था।
पल्लवी ने धीरे से उसको अपने हाथ के घेरे में लिया और बहुत धीरे से नीचे की और खीचा। इस क्रिया से शिश्नग्रछ्छद पीछे खिसक गया और लिंग के आगे का गुलाबी चमकदार हिस्सा साफ दिखाई देने लगा।
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माला ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी आँखें कह रही थी की वो कोई विवाद नहीं करेगी।
"थैंक यु माँ!" पल्लवी ने ख़ुशी के मारे जोर से कहा और माँ से कस के चिपक गयी।
माला ने भी उसको प्यार से गले लगा लिया और उसकी पीठ सहलाने लगी। उसके मन में हुआ की पल्लवी के नितम्ब छू कर देखे की कैसे लगते हैं। बचपन में छुआ था, तब से अब तक कितना समय हो गया।
"पल्लवी..." माला उसको उसके नाम से तब बुलाती थी जब वो उसके अपने बराबर का समझती थी।
"हाँ माँ"
"मे आई टच योर बटक्स?" किसी बात को बोलने में जब माला को लज्जा आती थी, तो अंग्रेजी में बोलने लगती थी।
"माँ, यु कैन टच नॉट ओन्ली माई बटक्स, बट आल्सो माय ब्रेस्ट्स एंड देअर। आई विल नेवर माइंड योर टचिंग" बोलते हुए पल्लवी आलिंगन तोड़ के अलग हट गई और माँ की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई।
माला ने बहुत हिचकते हुए पल्लवी के उन्नत नितम्बों को छुआ। "वाकई कितने चिकने हैं... और ठोस भी! गुरुत्व का कोई प्रभाव नहीं। रंग भी कितना साफ है!" उसने अपना हाथ हटाया, तो पल्लवी मुस्कुराते हुए पलट गयी।
माला की दृष्टि में पल्लवी के स्तन सबसे सुन्दर थे। उसको अपने खुद के स्तन बहुत प्यारे लगते थे, लेकिन पल्लवी के स्तनों में जो यौवन की ताजगी थी, उसके कारण वो और भी सुन्दर लगते थे।
"तुम बहुत सुन्दर हो, पल्लवी" माला ने उसके स्तनों को देखते हुए कहा।
"मैं, या मेरे ब्रेस्ट्स?"
"तुम भी और तुम्हारे ब्रेस्ट्स भी" माला की हिचक कम हो रही थी।
पल्लवी गर्व से मुस्कुराई। अगर माँ को मेरे ब्रेस्ट्स पसंद हैं, तो ये ज़रूर ही बेस्ट होंगे!
"माँ, अगर आप मेरे ब्रेस्ट्स को लाइक करती है तो प्लीस, इनको चूम लीजिये...... जैसे आज मैंने आपके चूमे थे"
माला ठिठक गयी, "चूमे कहाँ थे - चूसे थे!" "मैं अपनी बेटी के स्तन चूसूंगी? अपनी माँ के बाद ये पहला स्तन होगा जो माला चखेगी।" ये एक रोंगटे खड़े करने वाला रोमांच था। क्या उसने सही सुना था, निश्चित करने के लिए माला ने पल्लवी की तरफ देखा।
पल्लवी ने प्यार से मुस्कुराते हुए हामी दिखाने के लिए सर हिलाया।
माला ने अनिश्चय भरे तरीके से पल्लवी के छोटे, गहरे लाल-भूरे रंग के आकर्षक बाएं स्तनाग्र को अपने अपने खुले हुए होंठो में भर लिया और जीभ को थोडा पीछे करके हलके से चूसा।
इतने कम अन्तराल में पहले रूद्र और अब माला द्वारा अपने स्तनों पर होने वाली क्रिया से पल्लवी रोमांचित हो गयी। प्रेम-हर्मोनो के प्रभाव और संवेदनशील अंग की छेड़खानी से वो फिर से मदमस्त होने लगी।
थोड़ी थोड़ी देर तक दोनों स्तनों को हल्का हल्का चूसने के बाद माला संयत हो कर अलग खड़ी हो गयी। "अद्भुत है, स्तनपान करना और कराना - दोनों ही! आज सवेरे ही पल्लवी ने इनको पीकर मुझे इतना सुख दिया, और अब अपने स्तन पिला कर फिर से!
"थैंक्स माँ" पल्लवी की आँखों में वो वासना के हलके लाल रंग के डोरे साफ देख सकती थी, और जानती थी की उसकी खुद की आंखे भी यही कहानी कह रही है।
"थैंक्स मुझे कहना चाहिए पगली। तुमको नहीं मालूम, की तुमने मुझे कितनी ख़ुशी दी है।"
दोनों कुछ पल ऐसे ही प्यार से एक दुसरे को देखती रही। अचानक पल्लवी की आँखों में शरारत का भाव आ गया।
वो बोली, "माँ, आपने अभी अभी रूद्र को फ्रेंच-किस किया है"
"क्या..!? मैंने कब....!?" फिर उसको समझ आया - रूद्र ने भी बस कुछ ही देर पहले इन्ही स्तनों को चूमा चूसा होगा, जिसको वो चूस रही थी।
"रूद्र को फ्रेंच-किस! पागल!" इस भावना से उसे खुद ही शर्म आ गयी। "तुम आज सचमुच कुछ नहीं पहनोगी?" माला का स्वर अब एकदम शांत था।
"अगर आपको वाकई पसंद नहीं तो तो पहन लूंगी।" पल्लवी का स्वर भी शांत था - कोई मनुहार नहीं। जैसे उसको मालूम था की माला अब मन नहीं करेगी।
"नहीं। मुझे पसंद नहीं है, ऐसा नहीं है।" माला सावधानी से शब्द चुनते हुए बोली, "तुमको जैसा अच्छा लगे, वैसे रहो। तुम लोगो का घर है।" फिर थोडा सोचकर, "लेकिन, मुझसे नहीं हो पायेगा यह नंगा वंगा होना। तुम लोग जवान हो, जो मन चाहे करो। ....... रूद्र भी चाहे तो 'वैसे' रह सकता है।"
"थैंक यू माँ। मैं वाकई आज पूरी न्यूड रहना चाहती हूँ, चाहे जो हो। देखें तो कैसा लगता है।"
माला ने स्वीकृति में सर हिलाया। फिर पल्लवी से पूछा, "तुम्हारे 'यहाँ' पर बाल नहीं आते?" फिर थोडा ठहर कर, "अच्छा है नहीं आते - कितना झंझट होता है।"
"आते हैं माँ। लेकिन रूद्र को पसंद नहीं हैं। ही लाइक्स टू यूस हिज माउथ देअर, एंड डस नाट लाइक द फील ऑफ़ हेयर। वो मुझे उस फेमस स्किन क्लिनिक में ले गया था। वहां लेज़र से बाल साफ कर देते हैं। दिस एरिया इस नाऊ एस क्लीन एस अ बेबीस।" और कह कर हलके हलके हंसने लगी।
"मैं जा कर रूद्र को ये गुड न्यूज़ सुनाती हूँ और उसको बोलती हूँ की चलो बेटा, कपडे उतारो। आज बर्थ-डे ड्रेस वाला दिन है।"
रूद्र आराम से लेट कर सपने देख रहा था। उस सपने में उसको अपनी सासू-माँ के स्तनों की साफ छवि दिख रही थी। पल्लवी और माला की मज़ेदार करतूत ने उसको इतना उत्तेजित कर दिया था, की पल्लवी के साथ वह पुनः सम्भोग करना चाहता था। न जाने कहाँ से इतनी स्फूर्ति और उर्जा भर गयी थी उसके अन्दर की आधे घंटे के अन्दर ही वो फिर से तैयार हो गया था। ऊपर से यह सपना। उसने सिर्फ पजामा पहना हुआ था, उसके अन्दर कुछ नहीं। ऊपर का शरीर वैसे ही नंगा था। कामोद्दीपन सपने और वासना भरी इच्छाओं के कारण उसके भी हर्मोन अति-सक्रियता से काम कर रहे थे। रूद्र का लिंग पूर्ण उत्तेजित होकर पूरा उर्ध्व हो जाता था क्योंकि उसके जघन क्षेत्र की मांस-पेशियाँ बहुत मजबूत थी। लिंग इस समय पहले से भी अधिक कड़ा हो गया था और पूरी तरह से उर्ध्व होकर मनो पजामे को फाड़ कर बाहर आने को आतुर था। रूद्र लेकिन सपने के सागर में गोते लगा रहा था।
पल्लवी भी रूद्र के इस उपकरण की दीवानी थी। वो जब भी मौका पाते, कम-क्रीडा में लीन हो जाते। लेकिन आनंद देने वाला उपकरण तो रूद्र का लिंग ही था। यदि कभी वो थकी भी होती और यदि कभी मूड न भी होता तो भी इस लिंग में न जाने ऐसी क्या बात थी की जैसे ही उसकी योनि के अन्दर जाता, वैसे ही मानो कोई स्विच 'ऑन' कर देता और पल्लवी मदमस्त हो जाती। उसको मालूम था की रूद्र की वो पूरी तरह गुलाम है। अगर वो चाहे तो दिन के 24 घंटे उसके साथ सम्भोग कर सकता है और वो मन नहीं कर सकती। पुरुष शरीर में लिंग उसका सबसे पसंदीदा अंग था, और लिंगों में रूद्र का लिंग उसके लिए सबसे अच्छा था।
रूद्र - शिव का एक नाम भी है, और शिव का लिंग ही तो पूजा जाता है। पल्लवी वास्तव में रूद्र का लिंग पूजती थी - हाथ से, मुह से और योनि से। पाश्चात्य देशो में इसको ब्लो-जॉब कहते हैं! क्या वाहियात बात है। इसको 'लिंग का मुख-पूजन' कहना चाहिए।
रूद्र को इस प्रकार लेटा देख कर पल्लवी में प्यार उमड़ आया, साथ ही उसकी दृष्टि कस के तने हुए लिंग पर भी पड़ी। मन ही मन खुश हो गयी। पति को जगाने का मस्त तरीका दिमाग में कौंध गया। उसने बहुत धीरे से रूद्र का पजामा नीचे सरकाया और पूरी सराहना के साथ अपने प्यारे खिलौने को देखा। रूद्र का शरीर इकहरा था और कसरती भी। उसमे से इतने गर्व से ऊपर खड़ा हुआ लिंग, हलके भूरे-लाल रंग का एक मोटा स्तंभ, जिसकी लम्बाई कम से कम छह इंच अवश्य थी, और मोटाई तो पल्लवी की कलाई से भी ज्यादा, बहुत ही रोमांचक लग रहा था।
पल्लवी ने धीरे से उसको अपने हाथ के घेरे में लिया और बहुत धीरे से नीचे की और खीचा। इस क्रिया से शिश्नग्रछ्छद पीछे खिसक गया और लिंग के आगे का गुलाबी चमकदार हिस्सा साफ दिखाई देने लगा।
"ऐसा इरेक्शन! किसके सपने देख रहे हैं, जनाब?" पल्लवी ने मुस्कुराते हुए सोचा। कामाग्नि से पल्लवी का शरीर पहले से ही दहकने लग गया - ठीक वैसे ही जैसे की 102 बुखार आने पर तपने लगता है। वो इस प्रभाव को अच्छे से जानती थी! उसके हाथ का तापमान वैसे ही अधिक था, लेकिन फिर भी वो रूद्र के लिंग की तपन महसूस कर पा रही थी।
उसने ऐसे ही लिंग को घेरे हुए अपने हाथ को 3-4 बार ऊपर नीचे किया, और कुछ छड़ो के लिए रुक गयी, "कहीं रूद्र जाग तो नहीं गया?" "नहीं... अभी भी सो रहा है" उसने पुनः लिंग की ओर देखा - "उसमे लगता है और तनाव आ गया है.. इसकी नसें एकदम बाहर आ गयी है। इसको तो जल्दी ही रिलीव करना चाहिए।" पल्लवी से अब रहा नहीं जा रहा था।
उसने अपना मुह खोला और उस सुन्दर से लिंग को अन्दर समाहित कर लिया।
रूद्र को अपने लिंग पर हलचल सी महसूस हो रही थी, साथ ही गरमागरम नमी भी। उसकी चेतना, सपने से वापस आने लगी। "क्या पल्लवी मेरे सोते सोते ही सेक्स कर रही है? ... नहीं नहीं.. वैसा तो नहीं लग रहा है। उसकी योनि तो बहुत ही सँकरी और तंग है। कहीं मम्मी तो नहीं...!?" ये विचार आते ही उसकी आँखे एक झटके से खुल गयी। लेकिन सामने पल्लवी को देख के उसको थोड़ी राहत आई। राहत आई, लेकिन बस एक दो पल के लिए ही।
पल्लवी आज उसके लिंग का पान कुछ ऐसे ढंग से कर रही थी की जैसे उसने पहले कभी नहीं किया था। पहले वो इसको हलके से चूसती, और शिश्नाग्र को चुभलाती थी - जिससे लिंग का कड़ापन और बढ़ जाता था। लेकिन अभी की क्रिया तो एकदम भिन्न थी। आज वो अपने दांतों से लिंग को हलके हलके काट रही थी और जोर से चूस रही थी।
इस चूसने का असर वैसा ही था जब वह अपनी योनि की मांस-पेशियों को उसके लिंग पर सिकोड़ती थी। इस क्रिया में बीच बीच में वो रूद्र के शिश्नाग्र के छेद के अन्दर अपनी जीब भी घुसाने का प्रयास कर रही थी। इसके कारण रूद्र को रह रह के बिजली के झटके जैसे लग रहे थे। रूद्र के गले से उन्माद की तेज़ आवाज़ छूट पड़ी, और पूरा शरीर थरथराने लगा।
आवाज़ माला को भी सुनाई दी। "ये दोनों तो क्या हैं? फिर से चालू!" पहले तो उसने सोचा की इसको अनसुना कर दे और अपना काम करती रहे, लेकिन जिज्ञासा ने उसको अभिभूत कर दिया और वो दबे पाओं बैठक की ओर चल दी।
रूद्र तो जैसे स्वर्ग में था - पल्लवी के मुह की गर्मी, कोमल होंठों का उसके लिंग पर स्पर्श, दांतों की हलकी चुभन, यह सब उसको मतवाला करती जा रही थी। वो देख रहा था की पल्लवी का चेहरा उन्माद के मारे लाल होता जा रहा था, और उसकी आँखे बंद होती जा रही थी - मानो की वो किसी और ही दुनिया में चली गयी हो। उसके गले से हलकी 'गूं गूं' की आवाज़ आ रही थी।
रूद्र का मन हो रहा था की पल्लवी को यहीं पटक कर कस के उसका योनि-मर्दन कर दे, लेकिन पल्लवी आज उसको छोड़ने के मूड में नहीं लग रही थी। इसलिए रूद्र ने लेटे हुए ही मज़े लेने का मन बना लिया।
उसने ऐसे ही लिंग को घेरे हुए अपने हाथ को 3-4 बार ऊपर नीचे किया, और कुछ छड़ो के लिए रुक गयी, "कहीं रूद्र जाग तो नहीं गया?" "नहीं... अभी भी सो रहा है" उसने पुनः लिंग की ओर देखा - "उसमे लगता है और तनाव आ गया है.. इसकी नसें एकदम बाहर आ गयी है। इसको तो जल्दी ही रिलीव करना चाहिए।" पल्लवी से अब रहा नहीं जा रहा था।
उसने अपना मुह खोला और उस सुन्दर से लिंग को अन्दर समाहित कर लिया।
रूद्र को अपने लिंग पर हलचल सी महसूस हो रही थी, साथ ही गरमागरम नमी भी। उसकी चेतना, सपने से वापस आने लगी। "क्या पल्लवी मेरे सोते सोते ही सेक्स कर रही है? ... नहीं नहीं.. वैसा तो नहीं लग रहा है। उसकी योनि तो बहुत ही सँकरी और तंग है। कहीं मम्मी तो नहीं...!?" ये विचार आते ही उसकी आँखे एक झटके से खुल गयी। लेकिन सामने पल्लवी को देख के उसको थोड़ी राहत आई। राहत आई, लेकिन बस एक दो पल के लिए ही।
पल्लवी आज उसके लिंग का पान कुछ ऐसे ढंग से कर रही थी की जैसे उसने पहले कभी नहीं किया था। पहले वो इसको हलके से चूसती, और शिश्नाग्र को चुभलाती थी - जिससे लिंग का कड़ापन और बढ़ जाता था। लेकिन अभी की क्रिया तो एकदम भिन्न थी। आज वो अपने दांतों से लिंग को हलके हलके काट रही थी और जोर से चूस रही थी।
इस चूसने का असर वैसा ही था जब वह अपनी योनि की मांस-पेशियों को उसके लिंग पर सिकोड़ती थी। इस क्रिया में बीच बीच में वो रूद्र के शिश्नाग्र के छेद के अन्दर अपनी जीब भी घुसाने का प्रयास कर रही थी। इसके कारण रूद्र को रह रह के बिजली के झटके जैसे लग रहे थे। रूद्र के गले से उन्माद की तेज़ आवाज़ छूट पड़ी, और पूरा शरीर थरथराने लगा।
आवाज़ माला को भी सुनाई दी। "ये दोनों तो क्या हैं? फिर से चालू!" पहले तो उसने सोचा की इसको अनसुना कर दे और अपना काम करती रहे, लेकिन जिज्ञासा ने उसको अभिभूत कर दिया और वो दबे पाओं बैठक की ओर चल दी।
रूद्र तो जैसे स्वर्ग में था - पल्लवी के मुह की गर्मी, कोमल होंठों का उसके लिंग पर स्पर्श, दांतों की हलकी चुभन, यह सब उसको मतवाला करती जा रही थी। वो देख रहा था की पल्लवी का चेहरा उन्माद के मारे लाल होता जा रहा था, और उसकी आँखे बंद होती जा रही थी - मानो की वो किसी और ही दुनिया में चली गयी हो। उसके गले से हलकी 'गूं गूं' की आवाज़ आ रही थी।
रूद्र का मन हो रहा था की पल्लवी को यहीं पटक कर कस के उसका योनि-मर्दन कर दे, लेकिन पल्लवी आज उसको छोड़ने के मूड में नहीं लग रही थी। इसलिए रूद्र ने लेटे हुए ही मज़े लेने का मन बना लिया।
माला ने देखा की पल्लवी का मुह रूद्र के पेट..., नहीं... नहीं, लिंग के ऊपर नीचे हो रहा है। माला ने मुख-मैथुन के बारे में अपनी सहेलियों से ही सुना था, कभी किया नहीं था। उसको थोड़ी घिन आती थी इस ख्याल से - पुनः, बालपन की वर्जनाओं ने उसकी कामुकता पर थोड़े प्रतिबन्ध लगा रखे थे। विराट भी सिर्फ बिजनेस-लाइक तरीके से सेक्स करते थे। इसलिए उसको मालूम नहीं था की आखिर मुख-मैथुन होता क्या है - बस कुछ अधकचरा सा ज्ञान था, जो सहेलियों से मिला था।
यह दृश्य उसके लिए एकदम नया था - जिस दृश्य की कल्पना कर के वो यहाँ आई थी, उससे बहुत भिन्न दृश्य चल रहा था।
माला की आँखें रति-क्रिया के मुख्य स्थल पर जम गयी। पल्लवी के मुह के ऊपर नीचे होने से रह रह कर, लार से सना हुआ चमकदार लिंग दिख रहा था। अत्यधिक रुधिर प्रवाह के कारण वो पूरा फूल गया था, साथ ही उसका रंग भी काफी गहरा हो गया था। "ये तो बहुत मोटा है! ये पतली सी लड़की ऐसे लिंग को झेलती कैसे है, और वो भी दिन में इतनी बार!!"
रूद्र का शरीर रह रह के झटके खा रहा था, और उसके मुह से हलकी हलकी सिस्कारियां निकल रही थी - "इसको दर्द हो रहा है क्या?" "नहीं, ऐसा होना तो नहीं चाहिए, सुना है पुरुषों को ये क्रिया अच्छी लगती है"। माला को दृश्य थोडा खतरनाक, लेकिन रुचिपूर्ण लगने लगा। उसके पेट में एक अपरिचित हलचल और योनि में गीलापन होना शुरू हो गया। उसका हाथ अनायास ही अपनी ब्लाउज के ऊपर आ गया और उसके स्तन से छेड़खानी करने लग गया।
रूद्र से अब सब्र नहीं हो पा रहा था, लेकिन वो पल्लवी को सावधान करना चाहता था। किन्तु उन्माद इतनी पराकाष्ठा पर था की उससे कुछ भी कहते या करते बना नहीं। उसने एक गहरी आह के साथ वीर्य की पहली धार पल्लवी के मुख में छोड़ दी। पल्लवी ने अपने कंठ में गरम वीर्य की धारा महसूस की - मिशन कामयाब। लेकिन वो उसको पूरी तरह से शांत करना चाहती थी। उधर रूद्र का शरीर ऐसे ज़ोरदार स्खलन से ऐंठा जा रहा था। लेकिन पल्लवी ने उसको कमर से पकड़ लिया और लिंग को अपने मुह से छूटने नहीं दिया। रूद्र ने 7-8 बार फुहारे छोड़ी, लेकिन पल्लवी सब पी गयी।
अंततः उसने एक आखिरी बार जोर से चूसा और फिर उसका लिंग छोड़ा। पल्लवी की आँखें अभी भी बंद थी। एक आखिरी घूँट पीने के बाद उसके मुह से आवाज़ आई, "म्म्म्म्म्म ...."
माला ने कामोत्तेजना भरा ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था - ब्लू फिल्म्स में भी नहीं। ये सब कुछ उसको बहुत ही अवास्तविक सा लग रहा था। लेकिन वो जानती थी की यह सब सत्य है। सामने वाले दृश्य के प्रभाव से उसकी सांसे भर आई। उसने महसूस किया की उसके स्तनाग्र बहुत ही व्यग्र होकर बहार निकल आये है और साफ दिखाई दे रहे हैं। योनि के भीतर एक ज्वालामुखी सा फूट पड़ा था, और उसमे एक कामुक मुलायम गुदगुदी हो रही थी।"
काम भावना की अति हो चली थी, जो किसी भजन या स्वहस्त सेवा से कम नहीं होने वाली थी अब। इस समय विराट की बहुत आवश्यकता थी उसको। वो चाहती थी की विराट आकर उसको देर तक भोगे, तब तक जब तक उसकी योनि थक न जाये। उसका कंठ सूख गया था, घुटनों में एक कम्पन और कमजोरी सी लग रही थी। हाथ भी काँप रहे थे।
यह दृश्य उसके लिए एकदम नया था - जिस दृश्य की कल्पना कर के वो यहाँ आई थी, उससे बहुत भिन्न दृश्य चल रहा था।
माला की आँखें रति-क्रिया के मुख्य स्थल पर जम गयी। पल्लवी के मुह के ऊपर नीचे होने से रह रह कर, लार से सना हुआ चमकदार लिंग दिख रहा था। अत्यधिक रुधिर प्रवाह के कारण वो पूरा फूल गया था, साथ ही उसका रंग भी काफी गहरा हो गया था। "ये तो बहुत मोटा है! ये पतली सी लड़की ऐसे लिंग को झेलती कैसे है, और वो भी दिन में इतनी बार!!"
रूद्र का शरीर रह रह के झटके खा रहा था, और उसके मुह से हलकी हलकी सिस्कारियां निकल रही थी - "इसको दर्द हो रहा है क्या?" "नहीं, ऐसा होना तो नहीं चाहिए, सुना है पुरुषों को ये क्रिया अच्छी लगती है"। माला को दृश्य थोडा खतरनाक, लेकिन रुचिपूर्ण लगने लगा। उसके पेट में एक अपरिचित हलचल और योनि में गीलापन होना शुरू हो गया। उसका हाथ अनायास ही अपनी ब्लाउज के ऊपर आ गया और उसके स्तन से छेड़खानी करने लग गया।
रूद्र से अब सब्र नहीं हो पा रहा था, लेकिन वो पल्लवी को सावधान करना चाहता था। किन्तु उन्माद इतनी पराकाष्ठा पर था की उससे कुछ भी कहते या करते बना नहीं। उसने एक गहरी आह के साथ वीर्य की पहली धार पल्लवी के मुख में छोड़ दी। पल्लवी ने अपने कंठ में गरम वीर्य की धारा महसूस की - मिशन कामयाब। लेकिन वो उसको पूरी तरह से शांत करना चाहती थी। उधर रूद्र का शरीर ऐसे ज़ोरदार स्खलन से ऐंठा जा रहा था। लेकिन पल्लवी ने उसको कमर से पकड़ लिया और लिंग को अपने मुह से छूटने नहीं दिया। रूद्र ने 7-8 बार फुहारे छोड़ी, लेकिन पल्लवी सब पी गयी।
अंततः उसने एक आखिरी बार जोर से चूसा और फिर उसका लिंग छोड़ा। पल्लवी की आँखें अभी भी बंद थी। एक आखिरी घूँट पीने के बाद उसके मुह से आवाज़ आई, "म्म्म्म्म्म ...."
माला ने कामोत्तेजना भरा ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था - ब्लू फिल्म्स में भी नहीं। ये सब कुछ उसको बहुत ही अवास्तविक सा लग रहा था। लेकिन वो जानती थी की यह सब सत्य है। सामने वाले दृश्य के प्रभाव से उसकी सांसे भर आई। उसने महसूस किया की उसके स्तनाग्र बहुत ही व्यग्र होकर बहार निकल आये है और साफ दिखाई दे रहे हैं। योनि के भीतर एक ज्वालामुखी सा फूट पड़ा था, और उसमे एक कामुक मुलायम गुदगुदी हो रही थी।"
काम भावना की अति हो चली थी, जो किसी भजन या स्वहस्त सेवा से कम नहीं होने वाली थी अब। इस समय विराट की बहुत आवश्यकता थी उसको। वो चाहती थी की विराट आकर उसको देर तक भोगे, तब तक जब तक उसकी योनि थक न जाये। उसका कंठ सूख गया था, घुटनों में एक कम्पन और कमजोरी सी लग रही थी। हाथ भी काँप रहे थे।
पल्लवी और रूद्र दोनों ही इस बात से बेखबर थे की माला भी वही पास में खड़ी है। पल्लवी ने आखिर आँखें खोली, "गुड मोर्निंग, हस्बैंड!" उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "मज़ा आया तुमको, मेरे जानू?"
"बहुत! ये तो एकदम नया था! कहाँ से सीखा तुमने?"
"बस ऐसे ही मन हुआ की कुछ नया ट्राई करते हैं। तुम सोते समय इतने एक्साईट थे की मुझसे रहा नहीं गया। किसकी याद में थे मेरे जान!?"
रूद्र कुछ बोलता, उससे पहले उसकी नज़र माला पर पड़ी। उसने चौंक कर जल्दी से अपने लिंग को हाथ से ढक लिया.... उसकी इस प्रतिक्रिया से पल्लवी भी पीछे मुड़ी और माँ को देखा।
"माँ, मैं रूद्र को जगा रही थी। इतनी देर तक सोता रहता है।"
'कैसे जगा रही थी यह तो मैंने भी देखा' माला ने सोचा।
"रूद्र, इट इस ओके। डोंट बी शाई। आज मैं और तुम दिन भर नेकेड रह सकते हैं। माँ ने एक्सेप्ट कर लिया है।"
"चलो हाथ हटाओ" बोलते हुए पल्लवी ने रूद्र का हाथ खीच कर उसके लिंग से हटा दिया। कुछ ही देर पहले जो लिंग एक कठोर स्तंभ जैसा खड़ा था, अभी वो एक छोटे मुलायम भिन्डी जैसा हो गया था।
माला बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोक पायी, "बेचारा! इसके मज़े का सत्यानाश हो गया मेरे आने से।"
"बहुत! ये तो एकदम नया था! कहाँ से सीखा तुमने?"
"बस ऐसे ही मन हुआ की कुछ नया ट्राई करते हैं। तुम सोते समय इतने एक्साईट थे की मुझसे रहा नहीं गया। किसकी याद में थे मेरे जान!?"
रूद्र कुछ बोलता, उससे पहले उसकी नज़र माला पर पड़ी। उसने चौंक कर जल्दी से अपने लिंग को हाथ से ढक लिया.... उसकी इस प्रतिक्रिया से पल्लवी भी पीछे मुड़ी और माँ को देखा।
"माँ, मैं रूद्र को जगा रही थी। इतनी देर तक सोता रहता है।"
'कैसे जगा रही थी यह तो मैंने भी देखा' माला ने सोचा।
"रूद्र, इट इस ओके। डोंट बी शाई। आज मैं और तुम दिन भर नेकेड रह सकते हैं। माँ ने एक्सेप्ट कर लिया है।"
"चलो हाथ हटाओ" बोलते हुए पल्लवी ने रूद्र का हाथ खीच कर उसके लिंग से हटा दिया। कुछ ही देर पहले जो लिंग एक कठोर स्तंभ जैसा खड़ा था, अभी वो एक छोटे मुलायम भिन्डी जैसा हो गया था।
माला बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोक पायी, "बेचारा! इसके मज़े का सत्यानाश हो गया मेरे आने से।"
माला के मन के अन्दर की सच्चाई कुछ और ही थी - माला के सामने एक युवा जोड़ा रतिक्रिया से अभी अभी निवृत हुआ था, और माला का मन उसी क्रिया के लिए व्याकुल हो रहा था।
"तुम लोग थोडा आराम कर लो - थक गए होगे" उसने एक अर्थपूर्ण दृष्टि दोनों पे डाली। "मैं भी थोड़ी देर सो लेती हूँ।" माला ने शुष्क गले से इतना कहा और जल्दी से अपने कमरे में चली आई।
सोना माला के मन से कोसो दूर था। उसने विराट को फ़ोन लगाया।
"हेल्लो माला, कैसी हो? अच्छा सुनो मैं आज रात की फ्लाइट से घर आ रहा हूँ। खाना बना के रखना। ओके?"
'इसको खाने की पड़ी है' माला ने गुस्से से सोचा। "विराट...."
"बोलो माला?"
"विराट... मुझे सेक्स करना है"
"क्या??"
"अभी।"
"क्या हो गया तुमको माला? कैसी बाते कर रही हो?"
"आज बच्चो को देखा - सेक्स करते हुए - दो दो बार! मुझसे रहा नहीं जा रहा है"
"माला कहीं घूम आओ। मैं रात में आऊंगा। कल सवेरे कर लेंगे सेक्स।"
"कल सवेरे तक मैं मर जाऊंगी विराट। मेरे शरीर में आग लगी हुई है"
"...."
"विराट! कुछ करो न! प्लीज।"
"तुम तो बिलकुल ही बदल गयी हो माला! ऐसा क्या देख लिया तुमने बच्चो को करते?" विराट ने थोडा मनोविनोद से कहा।
"तुम देखोगे तो तुम्हारा दिमाग भी ख़राब हो जायेगा - दोनों आज नंगे रहने की बात कर रहे थे। पल्लवी ने तो बिना कुछ पहने ही घूमना फिरना शुरू कर दिया है घर में।"
"क्या? तुमने मना नहीं किया?"
"उन दोनों को सेक्स करते देख लिया दो दो बार, मेरा खुद का भी मन हो रहा है अब... तुम जल्दी से कुछ करो और मुझे शांति दो....."
विराट के लिए ये सब जानकारी बहुत ही उलझा देने वाली थी। "दोनों नंगे हैं? पल्लवी सवेरे से ही ऐसी है? दोनों खुले में सेक्स कर रहे हैं?" ये सब बाते तो उसने कभी सोची तक नहीं थी। पूरा नंगा? ऐसा तो वह तब हुआ था जब माला के साथ हनीमून पे गया था। दोनों ने खूब सेक्स किया था (विराट के लिए दिन में 2 बार करना, 'खूब' करना था) उन दिनों।
"विराट, कुछ बोलो भी"
"क्या बोलूँ माला?! मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है।"
"तुम बेकार हो।" ये कह कर माला ने गुस्से में फ़ोन का रिसीवर पटक दिया।
"तुम लोग थोडा आराम कर लो - थक गए होगे" उसने एक अर्थपूर्ण दृष्टि दोनों पे डाली। "मैं भी थोड़ी देर सो लेती हूँ।" माला ने शुष्क गले से इतना कहा और जल्दी से अपने कमरे में चली आई।
सोना माला के मन से कोसो दूर था। उसने विराट को फ़ोन लगाया।
"हेल्लो माला, कैसी हो? अच्छा सुनो मैं आज रात की फ्लाइट से घर आ रहा हूँ। खाना बना के रखना। ओके?"
'इसको खाने की पड़ी है' माला ने गुस्से से सोचा। "विराट...."
"बोलो माला?"
"विराट... मुझे सेक्स करना है"
"क्या??"
"अभी।"
"क्या हो गया तुमको माला? कैसी बाते कर रही हो?"
"आज बच्चो को देखा - सेक्स करते हुए - दो दो बार! मुझसे रहा नहीं जा रहा है"
"माला कहीं घूम आओ। मैं रात में आऊंगा। कल सवेरे कर लेंगे सेक्स।"
"कल सवेरे तक मैं मर जाऊंगी विराट। मेरे शरीर में आग लगी हुई है"
"...."
"विराट! कुछ करो न! प्लीज।"
"तुम तो बिलकुल ही बदल गयी हो माला! ऐसा क्या देख लिया तुमने बच्चो को करते?" विराट ने थोडा मनोविनोद से कहा।
"तुम देखोगे तो तुम्हारा दिमाग भी ख़राब हो जायेगा - दोनों आज नंगे रहने की बात कर रहे थे। पल्लवी ने तो बिना कुछ पहने ही घूमना फिरना शुरू कर दिया है घर में।"
"क्या? तुमने मना नहीं किया?"
"उन दोनों को सेक्स करते देख लिया दो दो बार, मेरा खुद का भी मन हो रहा है अब... तुम जल्दी से कुछ करो और मुझे शांति दो....."
विराट के लिए ये सब जानकारी बहुत ही उलझा देने वाली थी। "दोनों नंगे हैं? पल्लवी सवेरे से ही ऐसी है? दोनों खुले में सेक्स कर रहे हैं?" ये सब बाते तो उसने कभी सोची तक नहीं थी। पूरा नंगा? ऐसा तो वह तब हुआ था जब माला के साथ हनीमून पे गया था। दोनों ने खूब सेक्स किया था (विराट के लिए दिन में 2 बार करना, 'खूब' करना था) उन दिनों।
"विराट, कुछ बोलो भी"
"क्या बोलूँ माला?! मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है।"
"तुम बेकार हो।" ये कह कर माला ने गुस्से में फ़ोन का रिसीवर पटक दिया।
kramashah..................
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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