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चट मंगनी चट ब्याह-8
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चट मंगनी चट ब्याह-8
"ठीक है फिर ..... प्रिया, तुम यहाँ बेड पर आराम से लेट जाओ। अगर नर्वस हो तो आँखे बंद कर लो।"
प्रियंका अब बिस्तर पर लेट गयी - रूद्र ने पहली बार उसके नग्न रूप का आलोकन किया। प्रियंका की आँखें बंद थी, लेकिन घबराहट में उसके शरीर की विभिन्न माँस-पेशियाँ कसी हुई थी। रूद्र ने उसको शिथिल करने का सोचा।
उसने प्रियंका के कान को चूमना आरम्भ किया - यह क्रिया पल्लवी को लगभग तुरंत ही शांत और मादक बना देती थी। वह उसकी कान की लोलकी को कभी चूमता, कभी काटता या कभी चूसता। ऐसे करते करते, धीरे धीरे उसकी ठोढ़ी की तरफ बढ़ते हुए अभी वह उसके होंठो को चूम रहा था। यह दृश्य देख कर पल्लवी के मन में एक अनपेक्षित इर्ष्याभाव जाग गया - 'अच्छा है की रूद्र सिर्फ एक बार करने को राज़ी हुआ।' रूद्र ने प्रियंका के होंठो पर अधिक समय नहीं बिताया और गले से होते हुए शरीर के अन्य भागो को चूमना जारी रखा।
पल्लवी ने देखा की रूद्र इस समय प्रियंका के स्तानाग्रों को चूम रहा है। उसके होंठो पर एक मुस्कान आ गई, क्योंकि वह जानती थी की रूद्र को स्त्रियों के शरीर में स्तन कितने पसंद हैं। हालाकि प्रियंका के स्तन अभी छोटे थे, लेकिन उसके स्तनाग्र आकर्षक और स्वादिष्ट थे। शायद रूद्र ने वहां पर दांत से हल्का सा काट लिया था, क्योंकि प्रियंका की सिसकी निकल गयी। पल्लवी समझ गयी की प्रियंका अब कामोत्तेजित हो गयी थी - उसकी साँसे भारी हो गयी थी, बढ़ते रक्त-संचालन के कारण उसके गोर शरीर में लालिमा आ गयी थी। लेकिन रूद्र उसको अभी छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहा था। वह प्रियंका के शरीर के साथ लगातार छेड़-छाड़ करता जा रहा था।
जब वह उसके योनि क्षेत्र पर पहुंचा तो उसने योनि द्वार को 2-3 बार चाटा और फिर उसकी जांघो के अंदरूनी हिस्से को चूमने और चाटने लगा। प्रियंका अब अपनी उत्तेजना के चरम बिंदु पर पहुच चुकी थी। वह भले ही ऐसा अनुभव लड़कियों के साथ पहले भी कर चुकी थी, लेकिन रूद्र के संरक्षण में हो रहे इस काम से उसका अनुभव बहुत ही भिन्न हो गया था - मन ही मन वह उसकी दासी बन चुकी थी।
रूद्र अब और नीचे नहीं जा रहा था - वह कभी उसकी जांघों, तो कभी उसकी योनि को चूमता-काटता जा रहा था। प्रियंका का शरीर अब थर थर कांप रहा था और साँसे इतनी भारी हो गयी की उसको लगा की शायद उसका दम घुट जायेगा। वह कुछ बोलने की अवस्था में अब नहीं थी, लेकिन फिर भी न जाने कैसे उसके गले से आवाज़ आई, "प्लीईईज़ ...."
"नहींईई ..." रूद्र ने उसको चिढ़ाते हुए कहा, "आई ऍम गेटिंग इवन!"
"दीदी, प्लीज़ जीजू को बोलो की अब मेरे अन्दर आ जाए।"
"सॉरी प्रिया! लेकिन रूद्र इस काम में मेरी भी नहीं सुनता है .. इसलिए तुम बस बर्दाश्त करो" पल्लवी समझ रही थी प्रियंका की क्या दशा है। काम-क्रिया के हर अंक में पल्लवी की यही दशा होती थी। रूद्र में यौन क्रिया को लेकर न जाने कैसी दक्षता थी की अपने यौन-साथी को वह अति-आनंद में लगभग पागल बना देता था और यौन-साथी यौन क्रिया के लिए भीख मांगने लगती।
"यू गाट दैट राईट! वैसे अगला नंबर तुम्हारा ही है पल्लवी!" यह कह कर उसने पुनः प्रियंका की योनि पर अक्रमण कर दिया।
"ओह नो!" पल्लवी ने बनावटी डर से कहा, हालाकि उसका मन बहुत देर से यही सोच रहा था की 'काश! प्रिया की जगह पर वह खुद होती!'
रूद्र अगले 2-3 मिनट तक उसकी योनि के साथ खिलवाड़ करता रहा, और उतनी देर में प्रियंका लगभग रोने को हो आई। पल्लवी ने इस क्षण पर रूद्र के कान में कुछ कहा।
"दी...दी! तुम....ने जीजू से क्या क....हा?" प्रियंका ने टूटी फूटी बोली में पूछा।
"आगे आगे देखो मेरी लाडो" पल्लवी ने ठिठोली ली।
रूद्र ने अपनी तर्जनी प्रियंका की योनि में पहली बार डाली - अन्दर से निकलते यौन रस में वह सराबोर हो गयी। उसने वही उंगली प्रियंका की गुदा में धीरे धीरे प्रविष्ट करा दी।
"ओह गॉड!" प्रियंका की चीख निकल गयी। रूद्र ने उसके मुह को हाथ से बंद किया।
"श्ह्ह्ह! लोग दौड़े चले आयेंगे!"
प्रियंका रिरिया कर रह गयी। रूद्र ने अपनी उंगली को कुछ देर तक उसकी गुदा में ही आगे पीछे चलाया और उसी तर्ज पर प्रियंका के नितम्ब भी आगे पीछे होने लगे।
कुछ ही क्षणों में प्रियंका किसी भी तरह की बातचीत करने में सक्षम नहीं रह गयी। उसकी आँखें अब बंद थी और शरीर बुरी तरह थरथरा रहा था। रूद्र जैसे ही उसकी योनि को छूता, वह उछल पड़ती। इधार पल्लवी से खुद ही नहीं रहा जा रहा था। उसने रूद्र के कंधे को छू कर इशारे से कहा की 'अब ख़तम करो'।
रूद्र ने सर हिलाया और प्रियंका के स्तनों को मसलते हुए पूछा, "प्रिया, अगर मैं ऊपर रहूँ तो तुमको ठीक रहेगा? यह तुम्हारा पहला टाइम है और हर काम तुम्हारे पसंद का होना चाहिए।"
प्रियंका बहुत ही मुश्किल से बोल पाई, "जीजू, मेरे अन्दर कोई ताकत नहीं बची है। आप की करिए"
"ओके!" कह कर रूद्र ने उसकी टांगो को फैला दिया। उसकी योनि का खुला हुआ मुख काम-रस से भीगने के कारण चमक रहा था।
"प्रिया! जस्ट रिलैक्स!" कह कर रूद्र ने एक हाथ से उसकी योनि को थोडा और फैलाया और अपने लिंग को उसकी योनि मुख से सटा दिया। उसने धीरे धीरे आगे की तरफ जोर लगाया, जिससे लिंग अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। रूद्र तब तक नहीं रुका जब तक की उसके लिंग का जड़ प्रियंका की योनि से पूरी तरह नहीं सट गया।
पल्लवी के लिए यह एक मजेदार दृश्य था। प्रियंका का शरीर इकहरा, और पेट और कमर एकदम थे। ऐसे में रूद्र के पुष्ट मांसल लिंग के अन्दर जाने से उसके पेट और योनि का हिस्सा ऊपर की तरफ उभर आया।
"प्रिया! तुम ठीक हो?" रूद्र ने पूछा।
प्रियंका ने हाँ में सर हिलाया। इसके बाद रूद्र ने उसके साथ मैथुन करना शुरू कर दिया - पहले धीरे और फिर थोडा तेज़ गति से। इस पूरे काम में इतना समय लग चुका था की पल्लवी को लगा की यह दोनों अधिक देर तक टिक नहीं पाएंगे। और हुआ भी वही। रूद्र पहले स्खलित हुआ - हर स्खलन में वह अपना लिंग प्रियंका के और अन्दर ठेलने का प्रयत्न कर रहा था। उसके कुछ ही क्षणों के बाद प्रियंका भी अपने सुख के चरम पर पहुच गयी। इस उन्माद में उसकी पीठ एक चाप में मुड़ गयी, जिससे उसके स्तन और ऊपर उठ गए। रूद्र ने एक स्तनाग्र को सहर्ष अपने मुह में ले लिया और प्रियंका के ऊपर ही निढाल होकर गिर गया।
पल्लवी कहने पर रूद्र ने अपने लिंग को प्रियंका की योनि के बाहर नहीं निकाला। उसकी योनि के अन्दर ही रूद्र का पुरुषांग शिथिल पड़ गया और रूद्र प्रियंका पर ही लेटा रहा। अंततः दोनों एक दुसरे से अलग हुए। प्रियंका इस समय किसी नयी नवेली दुल्हन के जैसी शर्मा रही थी। खैर, उसकी मनःस्थिति ठीक किसी दुल्हन के जैसी ही थी, जिसके साथ अभी अभी सम्भोग संपन्न हुआ हो। वह न तो रूद्र से और न ही पल्लवी से आँखे मिला पा रही थी। उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फैली हुई थी।
रूद्र ने पूछा, "प्रिया! तुम ठीक हो?" प्रियंका ने आँख बंद करके हाँ में सर हिलाया।
"मज़ा आया?" प्रियंका के चेहरा इस प्रश्न पर और लाल पड़ गया - वह सिर्फ मुस्कुरा सकी।
प्रियंका अब बिस्तर पर लेट गयी - रूद्र ने पहली बार उसके नग्न रूप का आलोकन किया। प्रियंका की आँखें बंद थी, लेकिन घबराहट में उसके शरीर की विभिन्न माँस-पेशियाँ कसी हुई थी। रूद्र ने उसको शिथिल करने का सोचा।
उसने प्रियंका के कान को चूमना आरम्भ किया - यह क्रिया पल्लवी को लगभग तुरंत ही शांत और मादक बना देती थी। वह उसकी कान की लोलकी को कभी चूमता, कभी काटता या कभी चूसता। ऐसे करते करते, धीरे धीरे उसकी ठोढ़ी की तरफ बढ़ते हुए अभी वह उसके होंठो को चूम रहा था। यह दृश्य देख कर पल्लवी के मन में एक अनपेक्षित इर्ष्याभाव जाग गया - 'अच्छा है की रूद्र सिर्फ एक बार करने को राज़ी हुआ।' रूद्र ने प्रियंका के होंठो पर अधिक समय नहीं बिताया और गले से होते हुए शरीर के अन्य भागो को चूमना जारी रखा।
पल्लवी ने देखा की रूद्र इस समय प्रियंका के स्तानाग्रों को चूम रहा है। उसके होंठो पर एक मुस्कान आ गई, क्योंकि वह जानती थी की रूद्र को स्त्रियों के शरीर में स्तन कितने पसंद हैं। हालाकि प्रियंका के स्तन अभी छोटे थे, लेकिन उसके स्तनाग्र आकर्षक और स्वादिष्ट थे। शायद रूद्र ने वहां पर दांत से हल्का सा काट लिया था, क्योंकि प्रियंका की सिसकी निकल गयी। पल्लवी समझ गयी की प्रियंका अब कामोत्तेजित हो गयी थी - उसकी साँसे भारी हो गयी थी, बढ़ते रक्त-संचालन के कारण उसके गोर शरीर में लालिमा आ गयी थी। लेकिन रूद्र उसको अभी छोड़ने के मूड में नहीं दिख रहा था। वह प्रियंका के शरीर के साथ लगातार छेड़-छाड़ करता जा रहा था।
जब वह उसके योनि क्षेत्र पर पहुंचा तो उसने योनि द्वार को 2-3 बार चाटा और फिर उसकी जांघो के अंदरूनी हिस्से को चूमने और चाटने लगा। प्रियंका अब अपनी उत्तेजना के चरम बिंदु पर पहुच चुकी थी। वह भले ही ऐसा अनुभव लड़कियों के साथ पहले भी कर चुकी थी, लेकिन रूद्र के संरक्षण में हो रहे इस काम से उसका अनुभव बहुत ही भिन्न हो गया था - मन ही मन वह उसकी दासी बन चुकी थी।
रूद्र अब और नीचे नहीं जा रहा था - वह कभी उसकी जांघों, तो कभी उसकी योनि को चूमता-काटता जा रहा था। प्रियंका का शरीर अब थर थर कांप रहा था और साँसे इतनी भारी हो गयी की उसको लगा की शायद उसका दम घुट जायेगा। वह कुछ बोलने की अवस्था में अब नहीं थी, लेकिन फिर भी न जाने कैसे उसके गले से आवाज़ आई, "प्लीईईज़ ...."
"नहींईई ..." रूद्र ने उसको चिढ़ाते हुए कहा, "आई ऍम गेटिंग इवन!"
"दीदी, प्लीज़ जीजू को बोलो की अब मेरे अन्दर आ जाए।"
"सॉरी प्रिया! लेकिन रूद्र इस काम में मेरी भी नहीं सुनता है .. इसलिए तुम बस बर्दाश्त करो" पल्लवी समझ रही थी प्रियंका की क्या दशा है। काम-क्रिया के हर अंक में पल्लवी की यही दशा होती थी। रूद्र में यौन क्रिया को लेकर न जाने कैसी दक्षता थी की अपने यौन-साथी को वह अति-आनंद में लगभग पागल बना देता था और यौन-साथी यौन क्रिया के लिए भीख मांगने लगती।
"यू गाट दैट राईट! वैसे अगला नंबर तुम्हारा ही है पल्लवी!" यह कह कर उसने पुनः प्रियंका की योनि पर अक्रमण कर दिया।
"ओह नो!" पल्लवी ने बनावटी डर से कहा, हालाकि उसका मन बहुत देर से यही सोच रहा था की 'काश! प्रिया की जगह पर वह खुद होती!'
रूद्र अगले 2-3 मिनट तक उसकी योनि के साथ खिलवाड़ करता रहा, और उतनी देर में प्रियंका लगभग रोने को हो आई। पल्लवी ने इस क्षण पर रूद्र के कान में कुछ कहा।
"दी...दी! तुम....ने जीजू से क्या क....हा?" प्रियंका ने टूटी फूटी बोली में पूछा।
"आगे आगे देखो मेरी लाडो" पल्लवी ने ठिठोली ली।
रूद्र ने अपनी तर्जनी प्रियंका की योनि में पहली बार डाली - अन्दर से निकलते यौन रस में वह सराबोर हो गयी। उसने वही उंगली प्रियंका की गुदा में धीरे धीरे प्रविष्ट करा दी।
"ओह गॉड!" प्रियंका की चीख निकल गयी। रूद्र ने उसके मुह को हाथ से बंद किया।
"श्ह्ह्ह! लोग दौड़े चले आयेंगे!"
प्रियंका रिरिया कर रह गयी। रूद्र ने अपनी उंगली को कुछ देर तक उसकी गुदा में ही आगे पीछे चलाया और उसी तर्ज पर प्रियंका के नितम्ब भी आगे पीछे होने लगे।
कुछ ही क्षणों में प्रियंका किसी भी तरह की बातचीत करने में सक्षम नहीं रह गयी। उसकी आँखें अब बंद थी और शरीर बुरी तरह थरथरा रहा था। रूद्र जैसे ही उसकी योनि को छूता, वह उछल पड़ती। इधार पल्लवी से खुद ही नहीं रहा जा रहा था। उसने रूद्र के कंधे को छू कर इशारे से कहा की 'अब ख़तम करो'।
रूद्र ने सर हिलाया और प्रियंका के स्तनों को मसलते हुए पूछा, "प्रिया, अगर मैं ऊपर रहूँ तो तुमको ठीक रहेगा? यह तुम्हारा पहला टाइम है और हर काम तुम्हारे पसंद का होना चाहिए।"
प्रियंका बहुत ही मुश्किल से बोल पाई, "जीजू, मेरे अन्दर कोई ताकत नहीं बची है। आप की करिए"
"ओके!" कह कर रूद्र ने उसकी टांगो को फैला दिया। उसकी योनि का खुला हुआ मुख काम-रस से भीगने के कारण चमक रहा था।
"प्रिया! जस्ट रिलैक्स!" कह कर रूद्र ने एक हाथ से उसकी योनि को थोडा और फैलाया और अपने लिंग को उसकी योनि मुख से सटा दिया। उसने धीरे धीरे आगे की तरफ जोर लगाया, जिससे लिंग अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा। रूद्र तब तक नहीं रुका जब तक की उसके लिंग का जड़ प्रियंका की योनि से पूरी तरह नहीं सट गया।
पल्लवी के लिए यह एक मजेदार दृश्य था। प्रियंका का शरीर इकहरा, और पेट और कमर एकदम थे। ऐसे में रूद्र के पुष्ट मांसल लिंग के अन्दर जाने से उसके पेट और योनि का हिस्सा ऊपर की तरफ उभर आया।
"प्रिया! तुम ठीक हो?" रूद्र ने पूछा।
प्रियंका ने हाँ में सर हिलाया। इसके बाद रूद्र ने उसके साथ मैथुन करना शुरू कर दिया - पहले धीरे और फिर थोडा तेज़ गति से। इस पूरे काम में इतना समय लग चुका था की पल्लवी को लगा की यह दोनों अधिक देर तक टिक नहीं पाएंगे। और हुआ भी वही। रूद्र पहले स्खलित हुआ - हर स्खलन में वह अपना लिंग प्रियंका के और अन्दर ठेलने का प्रयत्न कर रहा था। उसके कुछ ही क्षणों के बाद प्रियंका भी अपने सुख के चरम पर पहुच गयी। इस उन्माद में उसकी पीठ एक चाप में मुड़ गयी, जिससे उसके स्तन और ऊपर उठ गए। रूद्र ने एक स्तनाग्र को सहर्ष अपने मुह में ले लिया और प्रियंका के ऊपर ही निढाल होकर गिर गया।
पल्लवी कहने पर रूद्र ने अपने लिंग को प्रियंका की योनि के बाहर नहीं निकाला। उसकी योनि के अन्दर ही रूद्र का पुरुषांग शिथिल पड़ गया और रूद्र प्रियंका पर ही लेटा रहा। अंततः दोनों एक दुसरे से अलग हुए। प्रियंका इस समय किसी नयी नवेली दुल्हन के जैसी शर्मा रही थी। खैर, उसकी मनःस्थिति ठीक किसी दुल्हन के जैसी ही थी, जिसके साथ अभी अभी सम्भोग संपन्न हुआ हो। वह न तो रूद्र से और न ही पल्लवी से आँखे मिला पा रही थी। उसके चेहरे पर लज्जा की लालिमा फैली हुई थी।
रूद्र ने पूछा, "प्रिया! तुम ठीक हो?" प्रियंका ने आँख बंद करके हाँ में सर हिलाया।
"मज़ा आया?" प्रियंका के चेहरा इस प्रश्न पर और लाल पड़ गया - वह सिर्फ मुस्कुरा सकी।
तीनो ने रात का खाना साथ ही में खा लिया। पल्लवी और रूद्र दोनों को नींद आ रही थी, इसलिए खाने के तुरंत बाद ही दोनों सोने चले गए। माला को तो खैर विराट का इंतज़ार करना था। वो रात के लगभग 12 बजे घर आने वाला था। इसलिए माला एक मैगजीन लेकर पढने बैठ गयी और विराट के आने की राह देखने लगी।
हवाई जहाज में बैठे बैठे विराट का मन माला को 'चोदने' का हो रहा था - वैसे ऐसी इच्छा उसकी आज पूरे दिन भर रही, जब से उसने माला को वेब-कैम अति-मादक हरकतें करते हुए देखा था। उसके जीवन के सबसे हसीं सपनो में भी ऐसी बात कभी नहीं आई थी। माला का एक नया रूप, जिससे वह आज तक अनजान था। वह इस समय अपने यौन जीवन के बारे में बहुत खिन्नता से सोच रहा था, की कैसे उसने यह सब खर्च हो जाने दिया। जब से पल्लवी उसने जीवन में आई थी, तब से मानो कामक्रिया की तिलांजलि दे दी गयी थी। कभी आत्म-संयम, कभी समय न होना, कभी बच्चा रो रहा है, कभी सर दर्द या कभी काम - यह सब बहाने सदा आते रहे, और माला और विराट की कामेक्षा मानो समाप्त हो गयी थी।
जब पल्लवी की विदाई हो रही थी, उस समय विराट के अन्दर का एक रोष बाहर निकल रहा था। वह था उसके वैवाहिक जीवन नीरस और यंत्रवत हो जाना। उस दिन माला के साथ विराट नें मानो बलात्कार किया हो। प्रेम वह कहीं से नहीं था और उस दिन का उसको बहुत पश्चाताप भी हुआ। लेकिन माला को सच बता नहीं पाया, क्योंकि कुछ भी हुआ हो, माला उसके जीवन की सच्ची साथी रही थी और उसने विराट का हमेशा साथ दिया था। प्रेम-विहीन और रोष-लिप्त काम-क्रिया संभवतः बलात्कार की ही श्रेणी में आती है।
लेकिन, आज उसके मन में प्रेम था। कामुक ही सही, लेकिन प्रेम था।
'माला रूप की देवी है। आह! कितने ही बरस बीत गए, उसको अच्छे से बिना वस्त्रों के देखे हुए।'
विराट ने हवाई-अड्डे पर एक दुकान से माला के लिए ब्राइडल अधोवस्त्र (Bridal Lingerie) खरीद लिया था। कहने के लिए यह सिर्फ ब्रा और चड्ढी का सेट था, लेकिन असल में क़यामत था। इसका रंग बेहद फ़ीका गुलाबी था - इतना फीका की मानो सफ़ेद, लेकिन ब्रा और चड्ढी दोनों ही पर सलेटी रंग के धागों से फूलों की कढ़ाई की गयी थी। विराट का दिल यह सोच कर ही फुदक रहा था की इसमें माला कैसी दिखेगी!
घर आते आते विराट को रात के लगभग 12 बजे तक लग जाता, इसलिए उसने माला को खाना खा लेने के लिए बोला था। पल्लवी और रूद्र से वह कल सवेरे मिल लेगा। लेकिन इन सबसे ज्यादा ज़रूरी बात थी माला की 'चुदाई'! आज विराट को यह करना ही है, और उसने यह पक्का ठान ली थी।
हवाई जहाज में बैठे बैठे विराट का मन माला को 'चोदने' का हो रहा था - वैसे ऐसी इच्छा उसकी आज पूरे दिन भर रही, जब से उसने माला को वेब-कैम अति-मादक हरकतें करते हुए देखा था। उसके जीवन के सबसे हसीं सपनो में भी ऐसी बात कभी नहीं आई थी। माला का एक नया रूप, जिससे वह आज तक अनजान था। वह इस समय अपने यौन जीवन के बारे में बहुत खिन्नता से सोच रहा था, की कैसे उसने यह सब खर्च हो जाने दिया। जब से पल्लवी उसने जीवन में आई थी, तब से मानो कामक्रिया की तिलांजलि दे दी गयी थी। कभी आत्म-संयम, कभी समय न होना, कभी बच्चा रो रहा है, कभी सर दर्द या कभी काम - यह सब बहाने सदा आते रहे, और माला और विराट की कामेक्षा मानो समाप्त हो गयी थी।
जब पल्लवी की विदाई हो रही थी, उस समय विराट के अन्दर का एक रोष बाहर निकल रहा था। वह था उसके वैवाहिक जीवन नीरस और यंत्रवत हो जाना। उस दिन माला के साथ विराट नें मानो बलात्कार किया हो। प्रेम वह कहीं से नहीं था और उस दिन का उसको बहुत पश्चाताप भी हुआ। लेकिन माला को सच बता नहीं पाया, क्योंकि कुछ भी हुआ हो, माला उसके जीवन की सच्ची साथी रही थी और उसने विराट का हमेशा साथ दिया था। प्रेम-विहीन और रोष-लिप्त काम-क्रिया संभवतः बलात्कार की ही श्रेणी में आती है।
लेकिन, आज उसके मन में प्रेम था। कामुक ही सही, लेकिन प्रेम था।
'माला रूप की देवी है। आह! कितने ही बरस बीत गए, उसको अच्छे से बिना वस्त्रों के देखे हुए।'
विराट ने हवाई-अड्डे पर एक दुकान से माला के लिए ब्राइडल अधोवस्त्र (Bridal Lingerie) खरीद लिया था। कहने के लिए यह सिर्फ ब्रा और चड्ढी का सेट था, लेकिन असल में क़यामत था। इसका रंग बेहद फ़ीका गुलाबी था - इतना फीका की मानो सफ़ेद, लेकिन ब्रा और चड्ढी दोनों ही पर सलेटी रंग के धागों से फूलों की कढ़ाई की गयी थी। विराट का दिल यह सोच कर ही फुदक रहा था की इसमें माला कैसी दिखेगी!
घर आते आते विराट को रात के लगभग 12 बजे तक लग जाता, इसलिए उसने माला को खाना खा लेने के लिए बोला था। पल्लवी और रूद्र से वह कल सवेरे मिल लेगा। लेकिन इन सबसे ज्यादा ज़रूरी बात थी माला की 'चुदाई'! आज विराट को यह करना ही है, और उसने यह पक्का ठान ली थी।
घर का दरवाज़ा माला ने ही खोला - दोनों अटपटे ढंग से आलिंगनबद्ध हुए - शायद माला आज सवेरे की गयी हरकत से लज्जित थी। फिर विराट ने माला के गाल चूमे और उसके नितम्ब ज़रा से दबा कर एक अर्थपूर्ण मुस्कान दी। माला ने ध्यान दिया की पल्लवी के कमरे से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी - 'चलो' उसने सोचा, 'कम से कम अब जाकर शांत हो ही गए दोनों!'
कमरे में जाकर विराट संलग्न गुसलखाने में हाथ मुंह धोने लगा और दोनों ही इधर उधर की बात करने लगे। अचानक ही विराट ने कहा, "माला, सूटकेस में तुम्हारे लिए कुछ है। ऊपर ही रखा है।"
"अच्छा!" अब चाहे औरत कम-उम्र हो या प्रौढ़, उपहार को लेकर ललायित हमेशा ही रहती हैं। माला ने जल्दी से विराट का सूटकेस खोला और सबसे ऊपर अधोवस्त्र का पैकेट देख कर थोडा हतप्रभ रह गयी।
"ये क्या लाये हो! इस उम्र में मैं यह पहनूंगी?"
"हाँ! फिर कभी पहनो या न पहनो, आज तुम सिर्फ यही पहनोगी" विराट ने प्रेम-पूर्ण लेकिन दृढ़ आवाज़ में, गुसलखाने से बाहर आते कहा।
"चलो, मुझे यह पहन कर दिखाओ। मैं तुम्हारा वेट कर रहा हूँ।"
माला अनमने ढंग से, संकोच और निर्बल विरोध करते हुए, अधोवस्त्र को लेकर गुसलखाने में चली गयी और उसका दरवाज़ा बंद कर लिया। विराट ने इस बीच अपने सब कपडे उतार कर सिर्फ अपना ड्रेसिंग-गाउन, जो आगे से खुलता है और जिसके कमर पर बाँधने के लिए एक पट्टी होती है, पहन लिया। उधर माला अपने को ऐसे कामुक वस्त्र में देख कर पहले से ही उत्तेजित हो गयी और समझ गयी की आज उसके साथ क्या होने वाला है।
कमरे में जाकर विराट संलग्न गुसलखाने में हाथ मुंह धोने लगा और दोनों ही इधर उधर की बात करने लगे। अचानक ही विराट ने कहा, "माला, सूटकेस में तुम्हारे लिए कुछ है। ऊपर ही रखा है।"
"अच्छा!" अब चाहे औरत कम-उम्र हो या प्रौढ़, उपहार को लेकर ललायित हमेशा ही रहती हैं। माला ने जल्दी से विराट का सूटकेस खोला और सबसे ऊपर अधोवस्त्र का पैकेट देख कर थोडा हतप्रभ रह गयी।
"ये क्या लाये हो! इस उम्र में मैं यह पहनूंगी?"
"हाँ! फिर कभी पहनो या न पहनो, आज तुम सिर्फ यही पहनोगी" विराट ने प्रेम-पूर्ण लेकिन दृढ़ आवाज़ में, गुसलखाने से बाहर आते कहा।
"चलो, मुझे यह पहन कर दिखाओ। मैं तुम्हारा वेट कर रहा हूँ।"
माला अनमने ढंग से, संकोच और निर्बल विरोध करते हुए, अधोवस्त्र को लेकर गुसलखाने में चली गयी और उसका दरवाज़ा बंद कर लिया। विराट ने इस बीच अपने सब कपडे उतार कर सिर्फ अपना ड्रेसिंग-गाउन, जो आगे से खुलता है और जिसके कमर पर बाँधने के लिए एक पट्टी होती है, पहन लिया। उधर माला अपने को ऐसे कामुक वस्त्र में देख कर पहले से ही उत्तेजित हो गयी और समझ गयी की आज उसके साथ क्या होने वाला है।
करीब दस मिनट बाद माला बाहर आई - उसकी दशा वैसी ही थी जैसे शादी के बाद दोनों की पहली रात को थी। उसकी आँखों में लज्जा और संकोच के साथ साथ कामुकता के भाव भी थे। विराट की मानो बोलती ही बंद हो गयी - माला निश्चित रूप से स्वयं कामदेव की पत्नी 'रति' लग रही थी। माला के पुष्ट स्तन उसके ब्रा के गद्दीदार कपों में भर गए थे, किन्तु ब्रा की बनावट कुछ ऐसी थी की माला के स्तनों पर से गुरुत्व का प्रभाव मानो समाप्त हो गया था। साथ ही साथ ऊपर की तरफ दबाव के कारण स्तन पूर्णतया गोल प्रतीत हो रहे थे। माला का वक्ष-विदरण (cleavage) बहुत ही सुहाना दिख रहा था। विराट का मन हुआ की उसमे अपना मुह घुस कर ज़ोरदार चुम्बन ले ले। ब्रा की सीधी उर्ध्व पट्टियाँ, माला की जत्रुक हड्डियों (collar-bones) के ऊपर से होते हुए कहीं खो गयी लगती थी। वक्षों का उभार, कमर का संकीर्ण होना और फिर नितम्बो का चौड़ाव - जिसको अंग्रेजी में "आवर-ग्लास फिगर" कहते हैं, की उत्कृष्ट परिभाषा लग रहा था। माला की नाभि उसके पेट के अन्दर थी और पेट कस़ा हुआ, समतल था। सामने से देखने पर उसकी चड्ढी अंग्रेजी के "V" जैसी, लेकिन कमर की तरफ फैलाव लिए और वहां जहाँ पर माला की योनि थी, एक सौम्य उभार लिए हुए थी। माला का शरीर, प्रौढ़ता की तरफ जाते हुए थोड़ा स्थूल हो गया था, लेकिन उसने अपने शरीर का अच्छा ध्यान रखा था। पड़ोस की कई "आंटियों" से कमउम्र लगती थी।
विराट का लिंग आज रात होने वाले कार्यक्रम के पूर्वानुमान से पहले ही खड़ा हो गया था, लेकिन इस दृश्य ने उसके लिंग-स्तम्भन को लगभग स्थाई कर दिया। माला वाकई बहुत खूबसूरत और आकर्षक थी। विराट ने माला के पास जाकर उसको कमर से पकड़ लिया और उसके होंठो पर हलके से चुम्बन लिया। माला की आँखें बंद हो गयीं, और उसके हाथ विराट के गर्दन पर लिपट गए। हलके हलके 3-4 चुम्बनों के बाद अब चुम्बनों की गहराई और तीव्रता दोनों ही बढ़ने लगीं। विराट ने इसी बीच माला को नितम्बो से पकड़ कर उठा लिया और लाकर बिस्तर पर बैठा दिया। चुम्बन अभी भी बा-दस्तूर जारी था, लेकिन इस समय विराट के होंठ माला के गले और कन्धों पर व्यस्त थे।
इस सभी क्रियाकलाप के बीच माला बिस्तर पर लेट गयी और उसकी जांघें, रति के समय स्त्रियों के सामान्य ग्राही वाली अवस्था में, खुल गईं थीं। विराट इस समय उन्ही के बीच में था और अपनी श्रोणि माला की श्रोनि पर रगड़ रहा था - जैसा मैथुन के समय करते हैं। माला स्वयं विराट के लिंग का कडापन महसूस कर पा रही थी। अचानक माला ने महसूस किया की विराट का मुंह उसकी छाती पर चुम्बन ले रहा है। चुम्बन की बौछार धीरे धीरे माला के स्तनों पर, ब्रा के ऊपर से ही, होने लगी। माला ने देखा की विराट आज काफी रचनात्मक था - वह इस समय ब्रा के कपड़े की सीमा के बराबर चुम्बन ले रहा था और उसके हाथ उसकी ब्रा के हुक को खोलने की कोशिश कर रहे थे।
ब्रा हटते ही विराट को अत्यंत सुन्दर स्तनों के दर्शन हुए - वे भरे हुए और गोल थे और उनके बीच में केन्द्रित दो सुहाने, रसीले खड़े हुए स्तनाग्र थे! विराट ने मुह खोल कर माला के एक स्तनाग्र हो अन्दर भर लिया। जहाँ उसकी जीभ इस स्तन के स्तनाग्र के साथ दुलार और खिलवाड़ कर रही थी, वहीँ दूसरे स्तनाग्र से उसकी उंगलियाँ। माला अब मस्ती में आ गयी थी। विराट उसके सुन्दर स्तनों के साथ खेल रहा था - कभी उनको दबाता, कभी उनको थोडा खीचता, बारी-बारी से स्तानाग्रों को मुह में रख कर चूसता और फक्क की ध्वनि से मुंह से बाहर निकाल देता। उसकी हरकतें इस समय किसी शैतान बच्चे जैसी ही थीं। स्तनों का इस प्रकार भक्षण करते हुए विराट ने माला की तरफ देखा। माला इस समय आसमान की ऊँचाइयों में गोते लगा रही थी। उसके मन में दबी हुई इच्छाएं आज पूरी हो रही थी। उसका सर पीछे की तरफ ढलका हुआ था, आँखें बंद थी, मुंह खुला हुआ था और वह हाँफते हुए गहरी साँसे ले रही थी।
विराट अब माला के पेट की ओर बढ़ चला, लेकिन उसके हाथ माला के स्तनों का प्रेम-पूर्वक मर्दन करते रहे। विराट माला के पेट के चुम्बन लेता रहा - गुदगुदी और कामुक स्पर्श के मिले जुले प्रभाव से माला के पेट की पेशियाँ संकुचित हो जाती और वह जैसे चौंक जाती। अंततः विराट का हाथ माला की योनि पर आ ही गया। योनि के ऊपर वाला चड्ढी का हिस्सा बुरी तरह से गीला हो चुका था। विराट समझ गया की अब न तो वह और न ही माला देर तक रुक सकते हैं। उसने अपना ड्रेसिंग-गाउन उतार फेंका और अपना पूरा ध्यान माला की योनि पर केन्द्रित कर दिया।
विराट ने माला की चड्ढी को नीचे की तरफ सरकाया, लेकिन पूरी तरह से उतार नहीं और अपना चेहरा माला की बाल से ढंकी योनि में समाहित कर दिया। माला के हाथ विराट के सर को योनि में और दबा रहे थे। और विराट की जीभ उसकी योनि की गहराई, स्वाद, बनावट इत्यादि का अनुसंधान करने लगी।
कुछ देर ऐसे ही करने के बाद विराट ने कहा, "माला! अब असली एक्ट करें?"
माला कुछ कहने की हालत में नहीं थी - उसने बस सर हिलाया। ऐसी कामुक अवस्था में माला और भी प्यारी लग रही थी। विराट ने उसके होंठो पर कुछ और चुम्बन दिया और फिर वापस अपनी कर्म-स्थली पर आकर खड़ा हो गया। उसने अपने लिंग को माला की योनि-द्वार पर टिकाया - माला के योनि रस ने द्वार को इतना चिकना कर दिया था की अब अधिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी। हलके दबाव से विराट माला में प्रविष्ट हो गया। विराट से रहा नहीं गया और पूरा जोर लगा कर पूरी तरह से माला की गरम गहराइयों में चला गया। अपने लिंग पर माला की योनि की दीवारों का संकुचन विराट के स्तम्भन को और बलवान बना रहा था। उसने अब अन्दर-बाहर का ताल शुरू कर दिया - पहले धीरे धीरे और फिर तेज़।
"आह! विराट! आई लव यू! आई लव यू!"
लगभग 2 मिनट के सम्भोग क्रिया के बाद ही, कामोत्तेजना से भरे दोनों प्रेमी एक ही समय पर चरमोत्कर्ष पर पहुँच गए। विराट ने आहें भरते हुए वीर्य का भार माला की कोख को सौंप दिया। पूरी तरह से खाली हो जाने पर भी विराट ने धक्के लगाना बंद नहीं किया और तब तक करता रहा जब तक उसका लिंग सिकुड़ कर छोटा सा नहीं रह गया।
विराट का लिंग आज रात होने वाले कार्यक्रम के पूर्वानुमान से पहले ही खड़ा हो गया था, लेकिन इस दृश्य ने उसके लिंग-स्तम्भन को लगभग स्थाई कर दिया। माला वाकई बहुत खूबसूरत और आकर्षक थी। विराट ने माला के पास जाकर उसको कमर से पकड़ लिया और उसके होंठो पर हलके से चुम्बन लिया। माला की आँखें बंद हो गयीं, और उसके हाथ विराट के गर्दन पर लिपट गए। हलके हलके 3-4 चुम्बनों के बाद अब चुम्बनों की गहराई और तीव्रता दोनों ही बढ़ने लगीं। विराट ने इसी बीच माला को नितम्बो से पकड़ कर उठा लिया और लाकर बिस्तर पर बैठा दिया। चुम्बन अभी भी बा-दस्तूर जारी था, लेकिन इस समय विराट के होंठ माला के गले और कन्धों पर व्यस्त थे।
इस सभी क्रियाकलाप के बीच माला बिस्तर पर लेट गयी और उसकी जांघें, रति के समय स्त्रियों के सामान्य ग्राही वाली अवस्था में, खुल गईं थीं। विराट इस समय उन्ही के बीच में था और अपनी श्रोणि माला की श्रोनि पर रगड़ रहा था - जैसा मैथुन के समय करते हैं। माला स्वयं विराट के लिंग का कडापन महसूस कर पा रही थी। अचानक माला ने महसूस किया की विराट का मुंह उसकी छाती पर चुम्बन ले रहा है। चुम्बन की बौछार धीरे धीरे माला के स्तनों पर, ब्रा के ऊपर से ही, होने लगी। माला ने देखा की विराट आज काफी रचनात्मक था - वह इस समय ब्रा के कपड़े की सीमा के बराबर चुम्बन ले रहा था और उसके हाथ उसकी ब्रा के हुक को खोलने की कोशिश कर रहे थे।
ब्रा हटते ही विराट को अत्यंत सुन्दर स्तनों के दर्शन हुए - वे भरे हुए और गोल थे और उनके बीच में केन्द्रित दो सुहाने, रसीले खड़े हुए स्तनाग्र थे! विराट ने मुह खोल कर माला के एक स्तनाग्र हो अन्दर भर लिया। जहाँ उसकी जीभ इस स्तन के स्तनाग्र के साथ दुलार और खिलवाड़ कर रही थी, वहीँ दूसरे स्तनाग्र से उसकी उंगलियाँ। माला अब मस्ती में आ गयी थी। विराट उसके सुन्दर स्तनों के साथ खेल रहा था - कभी उनको दबाता, कभी उनको थोडा खीचता, बारी-बारी से स्तानाग्रों को मुह में रख कर चूसता और फक्क की ध्वनि से मुंह से बाहर निकाल देता। उसकी हरकतें इस समय किसी शैतान बच्चे जैसी ही थीं। स्तनों का इस प्रकार भक्षण करते हुए विराट ने माला की तरफ देखा। माला इस समय आसमान की ऊँचाइयों में गोते लगा रही थी। उसके मन में दबी हुई इच्छाएं आज पूरी हो रही थी। उसका सर पीछे की तरफ ढलका हुआ था, आँखें बंद थी, मुंह खुला हुआ था और वह हाँफते हुए गहरी साँसे ले रही थी।
विराट अब माला के पेट की ओर बढ़ चला, लेकिन उसके हाथ माला के स्तनों का प्रेम-पूर्वक मर्दन करते रहे। विराट माला के पेट के चुम्बन लेता रहा - गुदगुदी और कामुक स्पर्श के मिले जुले प्रभाव से माला के पेट की पेशियाँ संकुचित हो जाती और वह जैसे चौंक जाती। अंततः विराट का हाथ माला की योनि पर आ ही गया। योनि के ऊपर वाला चड्ढी का हिस्सा बुरी तरह से गीला हो चुका था। विराट समझ गया की अब न तो वह और न ही माला देर तक रुक सकते हैं। उसने अपना ड्रेसिंग-गाउन उतार फेंका और अपना पूरा ध्यान माला की योनि पर केन्द्रित कर दिया।
विराट ने माला की चड्ढी को नीचे की तरफ सरकाया, लेकिन पूरी तरह से उतार नहीं और अपना चेहरा माला की बाल से ढंकी योनि में समाहित कर दिया। माला के हाथ विराट के सर को योनि में और दबा रहे थे। और विराट की जीभ उसकी योनि की गहराई, स्वाद, बनावट इत्यादि का अनुसंधान करने लगी।
कुछ देर ऐसे ही करने के बाद विराट ने कहा, "माला! अब असली एक्ट करें?"
माला कुछ कहने की हालत में नहीं थी - उसने बस सर हिलाया। ऐसी कामुक अवस्था में माला और भी प्यारी लग रही थी। विराट ने उसके होंठो पर कुछ और चुम्बन दिया और फिर वापस अपनी कर्म-स्थली पर आकर खड़ा हो गया। उसने अपने लिंग को माला की योनि-द्वार पर टिकाया - माला के योनि रस ने द्वार को इतना चिकना कर दिया था की अब अधिक प्रयत्न की आवश्यकता नहीं थी। हलके दबाव से विराट माला में प्रविष्ट हो गया। विराट से रहा नहीं गया और पूरा जोर लगा कर पूरी तरह से माला की गरम गहराइयों में चला गया। अपने लिंग पर माला की योनि की दीवारों का संकुचन विराट के स्तम्भन को और बलवान बना रहा था। उसने अब अन्दर-बाहर का ताल शुरू कर दिया - पहले धीरे धीरे और फिर तेज़।
"आह! विराट! आई लव यू! आई लव यू!"
लगभग 2 मिनट के सम्भोग क्रिया के बाद ही, कामोत्तेजना से भरे दोनों प्रेमी एक ही समय पर चरमोत्कर्ष पर पहुँच गए। विराट ने आहें भरते हुए वीर्य का भार माला की कोख को सौंप दिया। पूरी तरह से खाली हो जाने पर भी विराट ने धक्के लगाना बंद नहीं किया और तब तक करता रहा जब तक उसका लिंग सिकुड़ कर छोटा सा नहीं रह गया।
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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