FUN-MAZA-MASTI
चट मंगनी चट ब्याह-9
सुबह का समय - सूर्य की किरणें खिड़की पर लगे परदों से छन छन कर कमरे में आने लगीं - लेकिन आलस्य और मीठी निद्रा के कारण पल्लवी अपनी आँखें नहीं खोलना चाहती थी। अतः वह ऐसे ही आँखे बंद किए, करवट लिए लेटी हुई थी। ठीक उसी की तरह रूद्र भी करवट लेकर लेटा हुआ था - और पल्लवी के ऊपर से होते हुए उसके एक स्तन को पकडे हुए था। पल्लवी को अपने स्तन पर रूद्र के हाथ की पकड़ बहुत ही सुखद लगती थी - विशेषतः उसके हाथ की गरमी का एहसास! उसी आनंद में अलसाई हुई पल्लवी लेटी हुई थी। लेकिन उसको यह एहसास भी हो रहा था की अब रूद्र जाग रहा था - क्योंकि वह उसके लिंग में आते कड़ेपन को अपने नितम्ब पर महसूस कर रही थी। इस एहसास के आते ही पल्लवी ने स्वतः ही अपने नितम्ब से रूद्र के जघन क्षेत्र का घर्षण शुरू कर दिया। युवा शरीरों की कामेच्छा वर्णनातीत होती है - कल संध्याकाल ही हुए रूद्र और प्रियंका के समागम ने पल्लवी के मन में काम-क्रिया की तीव्र इच्छा जागृत कर दी थी, किन्तु रूद्र तब तक थक चुका था और पल्लवी बस मन मसोस के रह गयी। लेकिन इस समय एक और रति सम्भोग करने की संभावना बढ़ रही थी। इस सम्भावना के पूर्वानुमान से पल्लवी के स्तनाग्र भी अब कड़े हो रहे थे।
धीरे धीरे रूद्र निद्रा से चेतना की तरफ आ रहा था, और ऐसे में उसको सबसे पहला एहसास पल्लवी के कोमल शरीर का हुआ - अपने स्तंभित लिंग पर पल्लवी के कोमल नितम्ब, हाथ में पल्लवी के कोमल स्तन और कठोर होते हुए स्तनाग्र और नथुनों ने पल्लवी की भीनी भीनी महक का एहसास। उसके लिए पल्लवी के साथ सम्भोग सिर्फ सम्भोग नहीं था - बल्कि एक प्रेम संवाद था। भला कोई अपनी प्रेमिका से संवाद करते हुए थकता है? रूद्र अपना हाथ पल्लवी से स्तन से हटा कर उसकी कोमल और चिकनी योनि तक ले गया और उसके जांघो को थोडा सा खोल कर उसके भगनासे से छेड़-छाड़ करने लगा। थोड़ी देर ऐसे ही खिलवाड़ करते हुए अपनी तर्जनी पल्लवी की योनि में प्रविष्ट कर दी। पल्लवी की योनि काम-रस से पहले ही भीग चुकी थी - लिहाजा रूद्र ने अब अपनी उंगली को ही शस्त्र बना कर पल्लवी की योनि के अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया। बीच बीच में वह उसके भगनासे को रगड़ता और छेड़ता रहता।
उसने अपने दायें हाथ की तर्जनी को अपनी लार से तर करके उसकी गुदा में अचानक ही डाल दिया। इस अप्रत्याशित हमले से पल्लवी चिहुक गयी और लड़खड़ा कर रूद्र के ऊपर गिर गयी। किन्तु रूद्र के लिंग की लम्बाई के कारण योनि पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकी। लेकिन अब दोनों को काम-क्रिया का एक नया आसन मिल गया। रूद्र ने पल्लवी को आलिंगनबद्ध कर लिया और उसके होंठो को चूमने लगा। उसके लिंग के धक्के चलते ही रहे, लेकिन साथ ही साथ उसकी तर्जनी भी पल्लवी की गुदा की गहराइयों को टटोलने लगी।
पल्लवी के लिए यह नया अनुभव था - नया और कामुक! हाँलाकि, सम्भोग की गति अब धीरे हो गयी थी, लेकिन इस नए यौन क्रिया, जिसमे उसके तीनो नैसर्गिक छिद्रों का चोदन हो रहा हो, के कारण पल्लवी की रति-निष्पत्ति मानो एक विस्फोट सामान हुई। उन्माद के अतिरेक से शरीर की थरथराहट के साथ साथ उसकी चीख भी निकल गयी, लेकिन रूद्र के मुंह में घुट कर रह गयी। लेकिन इसके बाद भी उसका क्रंदन जारी रहा - पल्लवी की आहें रूद्र के हर धक्के के साथ उन्मुक्त होकर निकल रही थी। पल्लवी का चरम-आनंद सामान्य से थोडा अधिक देर तक चला, लेकिन अंततः वह निढाल होकर रूद्र के ऊपर ही गिर गयी। रूद्र भी आज सामान्य से ज्यादा ही देर तक धक्के लगता रहा, लेकिन अब वह भी नहीं रुक पाया। उसके वीर्य का पहला गर्म गोला पल्लवी ने अपने अन्दर की दीवारों पर साफ़ महसूस किया, फिर अगले 2 सेकंड तक रूद्र ने कम से कम 4-5 बार वीर्य छोड़ा। रूद्र के लिङ्ग का कड़ापन धीरे धीर कम होने लगा, लेकिन पल्लवी ने थोड़ा बहुत कसमसाकर यह सुनिश्चित कर लिया की रूद्र उसकी योनि से बाहर न निकल सके। आनद की लहरें इस समय दोनों ही प्रेमियों को भिगो रही थी। दोनों ही आँख बंद किये एक दूसरे से लिपटे हुए तब तक पड़े रहे जब तक रूद्र का लिंग सिकुड़ कर स्वयं ही बाहर निकल गया।
पल्लवी ने अतिशय संतुष्टि से निःश्वास भरी और साथ ही एक बड़ी सी मुकान उसके होंठो पर फ़ैल गयी।
"पल्लो ..... हैप्पी?"
"ब्लिस्फुली"
रूद्र भी यह सुन कर मुकुराया और पल्लवी को दुलारता और चूमता रहा। दोनों ही देर तक चुपचाप इस उत्कृष्ट अनुभव का स्वाद लेते रहे।
kramashah.................... ..
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चट मंगनी चट ब्याह-9
पूर्ण संतुष्टि मिलने के बाद विराट माला के ऊपर से उतर गया, लेकिन उसने माला को एक हाथ से आलिंगनबद्ध कर रखा था। यह उन दोनों के बीच एक नयी चीज़ का आरंभ था और इस समय मिल रहा सुखद आनंद, उसका ही प्रमाण था। विराट ने अपने पास की माला की नग्न बांह को सहलाया और चुम्बन दिया और कहा, "थैंक यू सो मच, माला! मुझे आज एहसास हुआ है की मैंने तुम्हारे साथ कितना गलत किया है। मैं प्यार तुमको खूब करता हूँ, मेरी जान, लेकिन न जाने क्यों कभी कहा नहीं। और इस मूर्खता में मैंने हम दोनों का ही न जाने कितना समय बर्बाद किया।"
"नहीं विराट! ऐसे मत बोलो। तुम मेरे जीवन के एकलौते प्यार हो और मुझे मालूम है की तुमने भी सिर्फ मुझे ही प्यार किया है। मेरे लिए सिर्फ इतना मालूम होना बहुत है। हमारे बीच में थैंक यू और सॉरी जैसे शब्दों का कोई काम नहीं है। बस तुम मुझे खूब प्यार करो - मुझे बस इतना ही चाहिए।"
"मैं तुमको खूब प्यार करूंगा, मेरी जान! हम लोग 'मच्योर वाइन' के जैसे हैं - अब ज्यादा नशा है हम में! हा हा हा!" विराट के साथ साथ माला भी हंसने लगी। कुछ देर के बाद विराट ने सोच कर पूछा, "तुम कह रही थी की बच्चे आज दिन भर बिना कपडे के थे?"
माला ने हँसते हुए बोला, "नहीं! ये पल्लवी है न, अभी तक बड़ी नहीं हुई है। आज कुछ देर तक ऐसे ही नंगी घूम रही थी घर में।" फिर थोडा ठहर कर, "ये दोनों न जाने कितनी बार सेक्स करते हैं दिन में।" फिर माला ने पल्लवी और रूद्र की काम-क्रिया का निरीक्षित प्रारूप विराट को सुना दिया। जाहिर सी बात है की उसने पल्लवी को स्तनपान कराने, पल्लवी का स्तनपान करने, रूद्र को नग्न देखने और पल्लवी और रूद्र का उसका सम्मिलित स्तनपान और तत्पश्चात मैथुन करने की घटना का वर्णन काट दिया। वस्तुतः, माला ने विराट को ऐसा एहसास दिलाया की उसने उन दोनों की काम-क्रीड़ा की आवाज़ ही सुनी थी - बस, दृश्य नहीं देख पायी।
खैर, एक जवान और जोशपूर्ण जोड़े की कामुकता के वर्णन मात्र से विराट पुनः गरमाने लगा। उसकी आँखों में वासना के डोरे साफ़ दिखाई देने लगे। "माला, तुम बहुत हॉट हो। एंड आई नीड यू नाऊ!"
माला ने कुछ क्षण ठहर कर सोचा, और फिर विराट को आराम से लेटने को कहा। विराट के लेट जाने के बाद माला उठी और उसके कमर वाले स्थान के दोनों तरफ पाँव फैला कर बैठ गई। उसने अपने दोनों हाथेलियों से पहले विराट की छाती सहलाई और फिर उसको चूमने लगी। विराट के सीने को चूमना - यह काम उसने आज अपने जीवन में पहली बार किया था। माला विराट के छोटे छोटे वक्षाग्र को कभी चूमती, कभी चूसती तो कभी अपने दांतों से पकड़ कर खींचती। उसकी हर एक हरकत से विराट उन्माद के सागर के थोडा और अन्दर डूबता जाता। माला कुछ इस प्रकार बैठी थी की उसकी योनि ठीक उसके अर्ध-स्तंभित लिंग पर जमी हुई थी। माला की गर्म और गीली योनि का अपने लिंग पर स्पर्श और उसके मुलायम जीभ के एहसास से, विराट शीघ्र ही तैयार होता जा रहा था।
लेकिन माला के दिमाग में इस समय कोई दूसरी योजना थी। वह भी विराट के शरीर को ठीक उसी प्रकार से चूम रही थी, जैसे अभी कुछ ही देर पहले उसका खुद का शरीर चूमा गया था। अंततः माला का चुम्बन विराट के लिंग के पास तक आ गया। लेकिन माला ने वहां चूमा नहीं - उसने उसके वृषण को हाथ में लेकर उसका हलके हलके मालिश करना शुरू कर दिया। इस प्रकार छुए जाने से विराट के लिंग में तुरंत ही स्तम्भन उत्पन्न हो गया और उसका लिंग उछल पड़ा। माला यह देख कर खुश हो गई - लेकिन उसने विराट के वृषण को मलना जारी रखा। कुछ देर के बाद उसने वृषण को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। विराट के लिए यह आनंद की अति थी - उसने कभी सोचा भी न था की काम-क्रिया (जिसको वह 'चुदाई' कहता था) का क्षेत्र इतना विस्तृत हो सकता था!
"नहीं विराट! ऐसे मत बोलो। तुम मेरे जीवन के एकलौते प्यार हो और मुझे मालूम है की तुमने भी सिर्फ मुझे ही प्यार किया है। मेरे लिए सिर्फ इतना मालूम होना बहुत है। हमारे बीच में थैंक यू और सॉरी जैसे शब्दों का कोई काम नहीं है। बस तुम मुझे खूब प्यार करो - मुझे बस इतना ही चाहिए।"
"मैं तुमको खूब प्यार करूंगा, मेरी जान! हम लोग 'मच्योर वाइन' के जैसे हैं - अब ज्यादा नशा है हम में! हा हा हा!" विराट के साथ साथ माला भी हंसने लगी। कुछ देर के बाद विराट ने सोच कर पूछा, "तुम कह रही थी की बच्चे आज दिन भर बिना कपडे के थे?"
माला ने हँसते हुए बोला, "नहीं! ये पल्लवी है न, अभी तक बड़ी नहीं हुई है। आज कुछ देर तक ऐसे ही नंगी घूम रही थी घर में।" फिर थोडा ठहर कर, "ये दोनों न जाने कितनी बार सेक्स करते हैं दिन में।" फिर माला ने पल्लवी और रूद्र की काम-क्रिया का निरीक्षित प्रारूप विराट को सुना दिया। जाहिर सी बात है की उसने पल्लवी को स्तनपान कराने, पल्लवी का स्तनपान करने, रूद्र को नग्न देखने और पल्लवी और रूद्र का उसका सम्मिलित स्तनपान और तत्पश्चात मैथुन करने की घटना का वर्णन काट दिया। वस्तुतः, माला ने विराट को ऐसा एहसास दिलाया की उसने उन दोनों की काम-क्रीड़ा की आवाज़ ही सुनी थी - बस, दृश्य नहीं देख पायी।
खैर, एक जवान और जोशपूर्ण जोड़े की कामुकता के वर्णन मात्र से विराट पुनः गरमाने लगा। उसकी आँखों में वासना के डोरे साफ़ दिखाई देने लगे। "माला, तुम बहुत हॉट हो। एंड आई नीड यू नाऊ!"
माला ने कुछ क्षण ठहर कर सोचा, और फिर विराट को आराम से लेटने को कहा। विराट के लेट जाने के बाद माला उठी और उसके कमर वाले स्थान के दोनों तरफ पाँव फैला कर बैठ गई। उसने अपने दोनों हाथेलियों से पहले विराट की छाती सहलाई और फिर उसको चूमने लगी। विराट के सीने को चूमना - यह काम उसने आज अपने जीवन में पहली बार किया था। माला विराट के छोटे छोटे वक्षाग्र को कभी चूमती, कभी चूसती तो कभी अपने दांतों से पकड़ कर खींचती। उसकी हर एक हरकत से विराट उन्माद के सागर के थोडा और अन्दर डूबता जाता। माला कुछ इस प्रकार बैठी थी की उसकी योनि ठीक उसके अर्ध-स्तंभित लिंग पर जमी हुई थी। माला की गर्म और गीली योनि का अपने लिंग पर स्पर्श और उसके मुलायम जीभ के एहसास से, विराट शीघ्र ही तैयार होता जा रहा था।
लेकिन माला के दिमाग में इस समय कोई दूसरी योजना थी। वह भी विराट के शरीर को ठीक उसी प्रकार से चूम रही थी, जैसे अभी कुछ ही देर पहले उसका खुद का शरीर चूमा गया था। अंततः माला का चुम्बन विराट के लिंग के पास तक आ गया। लेकिन माला ने वहां चूमा नहीं - उसने उसके वृषण को हाथ में लेकर उसका हलके हलके मालिश करना शुरू कर दिया। इस प्रकार छुए जाने से विराट के लिंग में तुरंत ही स्तम्भन उत्पन्न हो गया और उसका लिंग उछल पड़ा। माला यह देख कर खुश हो गई - लेकिन उसने विराट के वृषण को मलना जारी रखा। कुछ देर के बाद उसने वृषण को अपने मुंह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। विराट के लिए यह आनंद की अति थी - उसने कभी सोचा भी न था की काम-क्रिया (जिसको वह 'चुदाई' कहता था) का क्षेत्र इतना विस्तृत हो सकता था!
कामुकता के पूर्णतया अधीन होकर विराट से रहा नहीं जा रहा था - उसने उठ कर माला के स्तन पकड़ लिए और उनको दबाना, मसलना शुरू कर दिया। वह कभी उनको दबाता तो कभी उसके स्तानाग्रों को अपनी उँगलियों से मसलता या खीचता। उधर माला धीरे धीरे विराट के लिंग को चूमने लगी। माला उसके लिंग की चमड़ी को पीछे करके आगे का गुलाबी-भूरा हिस्सा अपनी जीभ के छोर से गुदगुदाने लगी। मन ही मन वह विराट और रूद्र के लिंग की तुलना किये बिना न रह सकी। 'विराट का लिंग रूद्र के लिंग से थोड़ा छोटा है, और मोटाई सामान ही लग रही है। लेकिन विराट के वृषण थोडा बड़े है। रूद्र के लिंग का स्वाद कैसा होगा?' ऐसे अनेक अनायास ख़याल उसके मन में आ-जा रहे थे, और उसको और कामोत्तेजित कर रहे थे।
अंततः माला ने अधीर होकर विराट का लिंग अपने मुँह में भर लिया - जल्दबाजी में उसने लिंग का काफी हिस्सा अन्दर डाल लिया। इस कारण से उसकी सांस बंद हो गयी और खांसी आ गयी। लेकिन माला ने जल्दी ही अपने आपको संयत करके उसके लिंग को चूसना और साथ ही साथ उसके वृषण को भी हल्का मालिश करना शुरू कर दिया। चूसते समय माला का सर विराट के लिंग पर वैसे ही आजे-पीछे चल रहा था जैसे मैथुन क्रिया के समय गति होती है। कामोन्माद के में गोते लगाते हुए विराट ने अनजाने में ही माला के चूसने से ताल में ताल मिलाते हुए अपनी कमर चलाना शुरू कर दिया। उसके पाँव कांप रहे थे और गले से गहरी गहरी आहें निकल रही थी। माला ने महसूस किया की विराट की पिचकारी छूटने ही वाली है, लेकिन फिर भी उसने लिंग नहीं छोड़ा। उसके बजाय माला ने लिंग चूषण की गति और प्रबलता दोनों ही बढ़ा दी। आज उसके कितने ही सारे दबे कुचले अरमान निकल रहे थे - इसलिए माला यह मौका गंवाना नहीं चाहती थी। अंततः विराट ने एक गहरे धक्के से अपने शरीर में बचे हुए वीर्य को माला के मुँह निकाल दिया। थोड़ी देर पहले किये गए सम्भोग के बाद, विराट के पास अधिक वीर्य नहीं बचा था, इसलिए माला के मुंह में करीब एक चम्मच वीर्य ही छूट पाया। लेकिन माला कोई शिकायत नहीं कर रही थी। उसने मानो लालच के साथ विराट का सारा वीर्य गटक लिया। साथ ही साथ उसने अब तेज़ी से मुरझाते लिंग को जोर जोर से चूस कर यह सुनिश्चित कर लिया की उसके वीर्य की एक बूँद भी बर्बाद न हो।
विराट के लिए यह अनुभव बिलकुल अपरिचित था - उसने ऐसा तो सिर्फ ब्लू-फ़िल्मों में ही होते देखा था। वह सोचता था की ऐसा करना किसी भी स्त्री के लिए अवास्तविक होगा, और इस विचार से भी उसको जुगुप्सा हो जाती थी। लेकिन आज ...... आज का दिन तो कुछ और ही है। वह माला को बताना चाहता था की उसने ऐसा करके उसको कितना सुख दिया है। माला उसके लिए सुख की देवी 'रति' बन चुकी थी। उसने उठ कर लिप्सा, प्रेम, आभार इत्यादि भावों के साथ माला को कुछ देर देखा, और फिर कुछ तय करके अपने होंठों से माला के होंठों पर हमला कर दिया। माला निश्चय नहीं कर पायी की वह अपना मुंह खोले या नहीं - क्योंकि निश्चित तौर पर उसके मुंह के स्वाद में विराट के वीर्य का स्वाद भी मिला हुआ था। लेकिन विराट के होंठों के सशक्त हमले से उसका मुंह खुल ही गया।
विराट की जीभ इस समय माला के मुंह के अंदरूनी हिस्से का मुआयना कर रही थी की उसके अपने ही वीर्य का स्वाद और महक महसूस हुई। वह बस क्षण मात्र को ही ठिठका और फिर पुनः माला को चूमना शुरू कर दिया। इस समय माला, विराट की गोद में बैठी हुई थी - अपने दोनों पैर उसके दोनों तरफ करके। ऐसे में उसकी योनि, जो कामुकता और थोड़ी देर हुए मर्दन के कारण रिस रही थी, विराट के अब मुरझाये हुए लिंग को छू रही थी। खैर, विराट ने माला को आलिंगनबद्ध किये, माला को बेतहाशा चूम रहा था। बीच बीच में वह कभी उसके स्तनों, तो कभी नितम्बो को दबा भी रहा था। ऐसे ही चूमते, सहलाते और दबाते हुए उसने माला को बिस्तर पर फिर से लिटा दिया। और चूमते हुए उसकी योनि पर आ गया। उसने ठहर के पहले उसकी योनि को सूंघा, और फिर उसे चूमना शुरू कर दिया - इसके साथ ही माला की सिसकियाँ और कराहें छूट पड़ी। माला ने विराट को बेहतर पहुँच देने के लिए अपनी टंगे पूरी तरह से खोल दी, जिसके कारण उसका योनि द्वार भी खुल गया। जैसा उसने उम्मीद करी थी, माला ने तुरंत ही विराट की जीभ अपनी योनि के होंठों पर महसूस किया। ऐसे में बीच बीच में विराट की जीभ उसके स्पन्दनशील भगनासे छू और चाट लेती। इस उन्माद में माला का पूरा शरीर ऐंठने लगा। विराट की जीभ अब पूरी निर्लज्जता के साथ माला की योनि के अन्दर तक आ-जा रही थी, साथ ही साथ उसके भगनास को भी चाट रही थी।
अंततः माला ने अधीर होकर विराट का लिंग अपने मुँह में भर लिया - जल्दबाजी में उसने लिंग का काफी हिस्सा अन्दर डाल लिया। इस कारण से उसकी सांस बंद हो गयी और खांसी आ गयी। लेकिन माला ने जल्दी ही अपने आपको संयत करके उसके लिंग को चूसना और साथ ही साथ उसके वृषण को भी हल्का मालिश करना शुरू कर दिया। चूसते समय माला का सर विराट के लिंग पर वैसे ही आजे-पीछे चल रहा था जैसे मैथुन क्रिया के समय गति होती है। कामोन्माद के में गोते लगाते हुए विराट ने अनजाने में ही माला के चूसने से ताल में ताल मिलाते हुए अपनी कमर चलाना शुरू कर दिया। उसके पाँव कांप रहे थे और गले से गहरी गहरी आहें निकल रही थी। माला ने महसूस किया की विराट की पिचकारी छूटने ही वाली है, लेकिन फिर भी उसने लिंग नहीं छोड़ा। उसके बजाय माला ने लिंग चूषण की गति और प्रबलता दोनों ही बढ़ा दी। आज उसके कितने ही सारे दबे कुचले अरमान निकल रहे थे - इसलिए माला यह मौका गंवाना नहीं चाहती थी। अंततः विराट ने एक गहरे धक्के से अपने शरीर में बचे हुए वीर्य को माला के मुँह निकाल दिया। थोड़ी देर पहले किये गए सम्भोग के बाद, विराट के पास अधिक वीर्य नहीं बचा था, इसलिए माला के मुंह में करीब एक चम्मच वीर्य ही छूट पाया। लेकिन माला कोई शिकायत नहीं कर रही थी। उसने मानो लालच के साथ विराट का सारा वीर्य गटक लिया। साथ ही साथ उसने अब तेज़ी से मुरझाते लिंग को जोर जोर से चूस कर यह सुनिश्चित कर लिया की उसके वीर्य की एक बूँद भी बर्बाद न हो।
विराट के लिए यह अनुभव बिलकुल अपरिचित था - उसने ऐसा तो सिर्फ ब्लू-फ़िल्मों में ही होते देखा था। वह सोचता था की ऐसा करना किसी भी स्त्री के लिए अवास्तविक होगा, और इस विचार से भी उसको जुगुप्सा हो जाती थी। लेकिन आज ...... आज का दिन तो कुछ और ही है। वह माला को बताना चाहता था की उसने ऐसा करके उसको कितना सुख दिया है। माला उसके लिए सुख की देवी 'रति' बन चुकी थी। उसने उठ कर लिप्सा, प्रेम, आभार इत्यादि भावों के साथ माला को कुछ देर देखा, और फिर कुछ तय करके अपने होंठों से माला के होंठों पर हमला कर दिया। माला निश्चय नहीं कर पायी की वह अपना मुंह खोले या नहीं - क्योंकि निश्चित तौर पर उसके मुंह के स्वाद में विराट के वीर्य का स्वाद भी मिला हुआ था। लेकिन विराट के होंठों के सशक्त हमले से उसका मुंह खुल ही गया।
विराट की जीभ इस समय माला के मुंह के अंदरूनी हिस्से का मुआयना कर रही थी की उसके अपने ही वीर्य का स्वाद और महक महसूस हुई। वह बस क्षण मात्र को ही ठिठका और फिर पुनः माला को चूमना शुरू कर दिया। इस समय माला, विराट की गोद में बैठी हुई थी - अपने दोनों पैर उसके दोनों तरफ करके। ऐसे में उसकी योनि, जो कामुकता और थोड़ी देर हुए मर्दन के कारण रिस रही थी, विराट के अब मुरझाये हुए लिंग को छू रही थी। खैर, विराट ने माला को आलिंगनबद्ध किये, माला को बेतहाशा चूम रहा था। बीच बीच में वह कभी उसके स्तनों, तो कभी नितम्बो को दबा भी रहा था। ऐसे ही चूमते, सहलाते और दबाते हुए उसने माला को बिस्तर पर फिर से लिटा दिया। और चूमते हुए उसकी योनि पर आ गया। उसने ठहर के पहले उसकी योनि को सूंघा, और फिर उसे चूमना शुरू कर दिया - इसके साथ ही माला की सिसकियाँ और कराहें छूट पड़ी। माला ने विराट को बेहतर पहुँच देने के लिए अपनी टंगे पूरी तरह से खोल दी, जिसके कारण उसका योनि द्वार भी खुल गया। जैसा उसने उम्मीद करी थी, माला ने तुरंत ही विराट की जीभ अपनी योनि के होंठों पर महसूस किया। ऐसे में बीच बीच में विराट की जीभ उसके स्पन्दनशील भगनासे छू और चाट लेती। इस उन्माद में माला का पूरा शरीर ऐंठने लगा। विराट की जीभ अब पूरी निर्लज्जता के साथ माला की योनि के अन्दर तक आ-जा रही थी, साथ ही साथ उसके भगनास को भी चाट रही थी।
मुख-मैथुन का एक लय जम गया था - माला उन्माद के झटके खा रही थी और उसी उन्माद में कभी बिस्तर गद्दा पकड़ती तो कभी विराट का सर।
"ऒऒऒओह्ह्ह!" माला अब कामुक रूप से कराह रही थी। उसके कराहने की ध्वनि अब किसी चीख जैसी हो चली थी। लेकिन, विराट सब बातो को अनदेखा और अनसुना करके माला की योनि का भक्षण करने में आतुर था, और उसकी योनि की नयी नयी गहराइयों में समाता जा रहा था। माला को कामुक उन्माद से अब चक्कर आने लग गए थे। वह आनंद में विह्वल हो चली थी - उसको लग रहा था की मानो वह भारहीन हो गयी थी और आसमान में तैर रही थी। आनंद के झटके उसके पूरे वजूद पर फैल रहे थे।
भावातिरेक माला अंततः अपने आनंद के चरम बिंदु पर पहुच ही गयी। उसकी योनि उसके उन्माद के साथ साथ ही कम्पायमान हो गयी और उसमे से कोई द्रव निकल पड़ा। सिसकी भरी हिचकियों और आहों से कमरे का वातावरण गुंजायमान हो गया। कामुक आनंद के आसमान पर तैरती माला धीरे धीरे सुख के धरातल पर वापस आने लगी। अंततः उसने अपनी आखें खोली - सामने विराट का मुस्कुराता चेहरा देख कर वह स्वयं भी मुस्कुराने लगी। उसने विराट को अपने ऊपर खीचकर आलिंगनबद्ध कर लिया और प्यार की मीठी मीठी बाते करते हुए दोनों धीरे धीरे निद्रा के आगोश में समा गए।
"ऒऒऒओह्ह्ह!" माला अब कामुक रूप से कराह रही थी। उसके कराहने की ध्वनि अब किसी चीख जैसी हो चली थी। लेकिन, विराट सब बातो को अनदेखा और अनसुना करके माला की योनि का भक्षण करने में आतुर था, और उसकी योनि की नयी नयी गहराइयों में समाता जा रहा था। माला को कामुक उन्माद से अब चक्कर आने लग गए थे। वह आनंद में विह्वल हो चली थी - उसको लग रहा था की मानो वह भारहीन हो गयी थी और आसमान में तैर रही थी। आनंद के झटके उसके पूरे वजूद पर फैल रहे थे।
भावातिरेक माला अंततः अपने आनंद के चरम बिंदु पर पहुच ही गयी। उसकी योनि उसके उन्माद के साथ साथ ही कम्पायमान हो गयी और उसमे से कोई द्रव निकल पड़ा। सिसकी भरी हिचकियों और आहों से कमरे का वातावरण गुंजायमान हो गया। कामुक आनंद के आसमान पर तैरती माला धीरे धीरे सुख के धरातल पर वापस आने लगी। अंततः उसने अपनी आखें खोली - सामने विराट का मुस्कुराता चेहरा देख कर वह स्वयं भी मुस्कुराने लगी। उसने विराट को अपने ऊपर खीचकर आलिंगनबद्ध कर लिया और प्यार की मीठी मीठी बाते करते हुए दोनों धीरे धीरे निद्रा के आगोश में समा गए।
सुबह का समय - सूर्य की किरणें खिड़की पर लगे परदों से छन छन कर कमरे में आने लगीं - लेकिन आलस्य और मीठी निद्रा के कारण पल्लवी अपनी आँखें नहीं खोलना चाहती थी। अतः वह ऐसे ही आँखे बंद किए, करवट लिए लेटी हुई थी। ठीक उसी की तरह रूद्र भी करवट लेकर लेटा हुआ था - और पल्लवी के ऊपर से होते हुए उसके एक स्तन को पकडे हुए था। पल्लवी को अपने स्तन पर रूद्र के हाथ की पकड़ बहुत ही सुखद लगती थी - विशेषतः उसके हाथ की गरमी का एहसास! उसी आनंद में अलसाई हुई पल्लवी लेटी हुई थी। लेकिन उसको यह एहसास भी हो रहा था की अब रूद्र जाग रहा था - क्योंकि वह उसके लिंग में आते कड़ेपन को अपने नितम्ब पर महसूस कर रही थी। इस एहसास के आते ही पल्लवी ने स्वतः ही अपने नितम्ब से रूद्र के जघन क्षेत्र का घर्षण शुरू कर दिया। युवा शरीरों की कामेच्छा वर्णनातीत होती है - कल संध्याकाल ही हुए रूद्र और प्रियंका के समागम ने पल्लवी के मन में काम-क्रिया की तीव्र इच्छा जागृत कर दी थी, किन्तु रूद्र तब तक थक चुका था और पल्लवी बस मन मसोस के रह गयी। लेकिन इस समय एक और रति सम्भोग करने की संभावना बढ़ रही थी। इस सम्भावना के पूर्वानुमान से पल्लवी के स्तनाग्र भी अब कड़े हो रहे थे।
धीरे धीरे रूद्र निद्रा से चेतना की तरफ आ रहा था, और ऐसे में उसको सबसे पहला एहसास पल्लवी के कोमल शरीर का हुआ - अपने स्तंभित लिंग पर पल्लवी के कोमल नितम्ब, हाथ में पल्लवी के कोमल स्तन और कठोर होते हुए स्तनाग्र और नथुनों ने पल्लवी की भीनी भीनी महक का एहसास। उसके लिए पल्लवी के साथ सम्भोग सिर्फ सम्भोग नहीं था - बल्कि एक प्रेम संवाद था। भला कोई अपनी प्रेमिका से संवाद करते हुए थकता है? रूद्र अपना हाथ पल्लवी से स्तन से हटा कर उसकी कोमल और चिकनी योनि तक ले गया और उसके जांघो को थोडा सा खोल कर उसके भगनासे से छेड़-छाड़ करने लगा। थोड़ी देर ऐसे ही खिलवाड़ करते हुए अपनी तर्जनी पल्लवी की योनि में प्रविष्ट कर दी। पल्लवी की योनि काम-रस से पहले ही भीग चुकी थी - लिहाजा रूद्र ने अब अपनी उंगली को ही शस्त्र बना कर पल्लवी की योनि के अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया। बीच बीच में वह उसके भगनासे को रगड़ता और छेड़ता रहता।
कुछ देर ऐसे ही खेलने के बाद रूद्र अचानक ही पीठ के बल लेट गया, साथ ही साथ उसने पल्लवी को भी अपने ऊपर ही खीच लिया। दोनों इस समय भी करवट वाली स्थिति में ही थे, बस अंतर यह था की पल्लवी अब रूद्र के ऊपर ही लेटी हुई थी। उसने पल्लवी की गर्दन के पीछे वाले भाग को चूम चूम कर पल्लवी के शरीर के रोंगटे खड़े कर दिए साथ ही साथ उसकी काम भावना के आखिरी तार भी स्पंदित कर दिए। यह सब करते हुए भी उसकी उंगली ने पल्लवी की योनि का साथ नहीं छोड़ा और उसके साथ बराबर मैथुन करती रही।
कुछ देर ऐसे ही करने के बाद उसने पल्लवी को सहारा देकर अपने ऊपर ऐसे बैठा लिया, जिससे दोनों एक दुसरे को देख सकें और जिससे पल्लवी के दोनों पैर रूद्र के शरीर के दोनों ओर हो जाएँ। पल्लवी यह इशारा समझ गयी - उसने बिना कोई देर किये हुए रूद्र के पूर्ण स्तंभित लिंग को पकड़ लिया और उसके शिश्नग्रच्छद को पीछे सरका दिया। उसके बाद उसने रूद्र के नग्न लिंग-मुंड को अपनी योनिमुख पर कुछ देर फिराया जिससे उसका भी उपस्नेहन (lubrication) हो जाए। फिर उसने लिंग को अपनी योनि के मुख पर टिका कर नीचे की ओर जोर लगाया। उसकी योनि कल की अत्यधिक काम-क्रिया के कारण थोड़ी सूज गयी थी और हलकी कष्टदायी हो चली थी - लिहाजा उसके कंठ से आनंद और कष्ट की मिली जुली आह निकल पड़ी। रूद्र भी यह बात जानता था, अतः उसने पल्लवी के नितम्बो को इस तरह सम्हाल रखा था जिससे उसकी गति अधिक तीव्र न हो पाए। कुछ देर पल्लवी ही उसके लिंग पर ऊपर नीचे होती रही, फिर रूद्र ने भी नीचे से धीरे धीरे धक्का लगाना शुरू कर दिया। पल्लवी को हाँलाकि कष्ट हो रहा था, लेकिन रूद्र के लिंग ने उसकी योनि का वह "स्विच" पुनः "ओन" कर दिया था, जो उसको वासना से सराबोर कर देता था। लिहाजा अब वह काम उन्माद के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोच पा रही थी और इसका प्रभाव उसके धक्को की गति और ऊर्जा दोनों पर ही साफ़ दिखाई देने लगा। रूद्र भी नीचे से उसकी गति में गति मिलाए हुए था - उसके हाथ इस समय उसके स्तनों को थामे हुए उनका मर्दन कर रहे थे।
दोनों के शरीरों के टकराने से उत्पन्न होने वाली 'फट फट' की ध्वनि से पूरा कमरा गुंजायमान हो गया। लेकिन इन सब बातो से बेखबर दोनों प्रेमी सम्भोग करते रहे - बस सम्भोग की गति कभी तेज़ तो कभी धीरे होती रहती। यौन क्रिया का ऐसा मादक दृश्य मानो कभी ख़तम ही नहीं होता। रूद्र के हाथ पल्लवी के सारे शरीर पर घूम रहे थे, और जब उसका एक हाथ पल्लवी की गुदा के पास आया तो रूद्र को एक शैतानी सूझी।
कुछ देर ऐसे ही करने के बाद उसने पल्लवी को सहारा देकर अपने ऊपर ऐसे बैठा लिया, जिससे दोनों एक दुसरे को देख सकें और जिससे पल्लवी के दोनों पैर रूद्र के शरीर के दोनों ओर हो जाएँ। पल्लवी यह इशारा समझ गयी - उसने बिना कोई देर किये हुए रूद्र के पूर्ण स्तंभित लिंग को पकड़ लिया और उसके शिश्नग्रच्छद को पीछे सरका दिया। उसके बाद उसने रूद्र के नग्न लिंग-मुंड को अपनी योनिमुख पर कुछ देर फिराया जिससे उसका भी उपस्नेहन (lubrication) हो जाए। फिर उसने लिंग को अपनी योनि के मुख पर टिका कर नीचे की ओर जोर लगाया। उसकी योनि कल की अत्यधिक काम-क्रिया के कारण थोड़ी सूज गयी थी और हलकी कष्टदायी हो चली थी - लिहाजा उसके कंठ से आनंद और कष्ट की मिली जुली आह निकल पड़ी। रूद्र भी यह बात जानता था, अतः उसने पल्लवी के नितम्बो को इस तरह सम्हाल रखा था जिससे उसकी गति अधिक तीव्र न हो पाए। कुछ देर पल्लवी ही उसके लिंग पर ऊपर नीचे होती रही, फिर रूद्र ने भी नीचे से धीरे धीरे धक्का लगाना शुरू कर दिया। पल्लवी को हाँलाकि कष्ट हो रहा था, लेकिन रूद्र के लिंग ने उसकी योनि का वह "स्विच" पुनः "ओन" कर दिया था, जो उसको वासना से सराबोर कर देता था। लिहाजा अब वह काम उन्माद के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोच पा रही थी और इसका प्रभाव उसके धक्को की गति और ऊर्जा दोनों पर ही साफ़ दिखाई देने लगा। रूद्र भी नीचे से उसकी गति में गति मिलाए हुए था - उसके हाथ इस समय उसके स्तनों को थामे हुए उनका मर्दन कर रहे थे।
दोनों के शरीरों के टकराने से उत्पन्न होने वाली 'फट फट' की ध्वनि से पूरा कमरा गुंजायमान हो गया। लेकिन इन सब बातो से बेखबर दोनों प्रेमी सम्भोग करते रहे - बस सम्भोग की गति कभी तेज़ तो कभी धीरे होती रहती। यौन क्रिया का ऐसा मादक दृश्य मानो कभी ख़तम ही नहीं होता। रूद्र के हाथ पल्लवी के सारे शरीर पर घूम रहे थे, और जब उसका एक हाथ पल्लवी की गुदा के पास आया तो रूद्र को एक शैतानी सूझी।
उसने अपने दायें हाथ की तर्जनी को अपनी लार से तर करके उसकी गुदा में अचानक ही डाल दिया। इस अप्रत्याशित हमले से पल्लवी चिहुक गयी और लड़खड़ा कर रूद्र के ऊपर गिर गयी। किन्तु रूद्र के लिंग की लम्बाई के कारण योनि पूर्णतः मुक्त नहीं हो सकी। लेकिन अब दोनों को काम-क्रिया का एक नया आसन मिल गया। रूद्र ने पल्लवी को आलिंगनबद्ध कर लिया और उसके होंठो को चूमने लगा। उसके लिंग के धक्के चलते ही रहे, लेकिन साथ ही साथ उसकी तर्जनी भी पल्लवी की गुदा की गहराइयों को टटोलने लगी।
पल्लवी के लिए यह नया अनुभव था - नया और कामुक! हाँलाकि, सम्भोग की गति अब धीरे हो गयी थी, लेकिन इस नए यौन क्रिया, जिसमे उसके तीनो नैसर्गिक छिद्रों का चोदन हो रहा हो, के कारण पल्लवी की रति-निष्पत्ति मानो एक विस्फोट सामान हुई। उन्माद के अतिरेक से शरीर की थरथराहट के साथ साथ उसकी चीख भी निकल गयी, लेकिन रूद्र के मुंह में घुट कर रह गयी। लेकिन इसके बाद भी उसका क्रंदन जारी रहा - पल्लवी की आहें रूद्र के हर धक्के के साथ उन्मुक्त होकर निकल रही थी। पल्लवी का चरम-आनंद सामान्य से थोडा अधिक देर तक चला, लेकिन अंततः वह निढाल होकर रूद्र के ऊपर ही गिर गयी। रूद्र भी आज सामान्य से ज्यादा ही देर तक धक्के लगता रहा, लेकिन अब वह भी नहीं रुक पाया। उसके वीर्य का पहला गर्म गोला पल्लवी ने अपने अन्दर की दीवारों पर साफ़ महसूस किया, फिर अगले 2 सेकंड तक रूद्र ने कम से कम 4-5 बार वीर्य छोड़ा। रूद्र के लिङ्ग का कड़ापन धीरे धीर कम होने लगा, लेकिन पल्लवी ने थोड़ा बहुत कसमसाकर यह सुनिश्चित कर लिया की रूद्र उसकी योनि से बाहर न निकल सके। आनद की लहरें इस समय दोनों ही प्रेमियों को भिगो रही थी। दोनों ही आँख बंद किये एक दूसरे से लिपटे हुए तब तक पड़े रहे जब तक रूद्र का लिंग सिकुड़ कर स्वयं ही बाहर निकल गया।
पल्लवी ने अतिशय संतुष्टि से निःश्वास भरी और साथ ही एक बड़ी सी मुकान उसके होंठो पर फ़ैल गयी।
"पल्लो ..... हैप्पी?"
"ब्लिस्फुली"
रूद्र भी यह सुन कर मुकुराया और पल्लवी को दुलारता और चूमता रहा। दोनों ही देर तक चुपचाप इस उत्कृष्ट अनुभव का स्वाद लेते रहे।
kramashah....................
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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