FUN-MAZA-MASTI
फागुन के दिन चार--90
गतांक से आगे ...........
रीत करन
एक था गुल और एक थी बुलबुल -
दोनो चमन में रहते थे
है ये कहानी बिलकुल सच्ची
मेरे नाना कहते थे
,,,,
याद सदा रखना ये कहानी
चाहे जीना चाहे मरना
तुम भी किसी से प्यार करो तो
प्यार गुल-ओ-बुलबुल सा करना
( गुड्डी,डीबी , पुलिस रिकार्ड्स एवं बहुत से लोगों से की हुयी बातों के आधार पर )
ये कहानी बहुत पुरानी है , उन तकियों के गिलाफो के मानिंद , जिनपर कितने चुप चुप के रोये हुए आंसुओ के निशाँ पुख्ता हो जाते हैं ...
उन किताबों में छुपे खोये भूले कागजों की माफिक , जिनके हर्फ उड़ गए हैं ...पर जो कभी हंसते गाते , स्याही में लिखे ख़्वाब होते थे ..
ये कहानी तब की है ...जब रीत , रीत नही नवरीत थी।
वो दोनों पड़ोस में रहते थे , परिवारों में भी बहुत दोस्ती थी ..
करन रीत से तक़रीबन चार साल बड़ा था . ...लेकिन बच्चो में इतनी उम्र का फरक कहाँ पता चलता है ...
जैसा फिल्मो में होता है ...बच्चे ..खिलोने से खेल रहे हैं , झगड़ रहे हैं ...और अगले शाट में झट से बड़े होकर ..हीरो हिरोइन बन कर गाना गा रहे हैं बिलकुल वैसे ही ..
नव रीत ( या रीत ..हम सब तो उसे इसी नाम से जानते हैं ना ), बचपन से ही बहुत खूबसूरत थी ,गोल मटोल खूब गोरी सी , हंसती तो गालों में गड्ढे पड़ते ...और किसी की बुरी नजर ना पड़े ..
इसलिए सुबह उठते ही उसे कोई ना कोई दिठोना जरुर लगा देता था। और उसके गोरे गोर माथे पे ... बस लगता था जैसे धुप में कोई अबाबील उडी जा रही है ....लेकिन थी वो बहुत ही चुलबुली , नटखट ...
और करन आम बच्चों से थोडा सा अलग , बला का जहीन ...और जिस उम्र में बच्चे बैट बल्ले माँगते है ..बस वो किताबों की फरमाइश करता था , जब देखो तब किताबो के ढेर में डूबा हाथ पैर मारता ...
और उस के अलावा उसे दूसरा शौक था गिटार का ...बचपन में उसे एक गिटार नुमा कोई चीज ले दी गयी थी और उसे वो बजाया करता था ...
लेकिन रीत से दोस्ती उसकी गजब की थी ...वह किसी और बच्चे को अपनी किताब छूने नहीं देता था ..लेकिन रीत के लिए ...पूरी अलमारी खुल जाती थी ..उसे वो गिटार भी बजा कर सुनाता ...
एक बार रीत ने उसकी किसी किताब का पन्ना फाड़ दिया ...कोई दूसरा बच्चा होता तो खून खराबा हो जाता ..माँये , अपने बच्चो को पकड़ के अपने घरों में ले जाती और दरवाजे पे खड़े होके उंगलिया तोड़ तोड़ के गालीया निकालती , लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ..
करन बस गम सुम हो गया ...मोम की मूरत ..
रीत थोड़ी देर तक बैठी रही की वो अब झगडा करेगा ...लेकिन वो बस चुप
रीत बिना बोले उठी ...अपने घर गयी कोई चिपकाने वाली ट्यूब लायी ...और बड़े ध्यान से उसने वो पन्ना चिपका दिया।
करन उठा अपने कमरे में से कोई पजल लाया और दोनों खेलने लगे ..
अगर शाम को करन ना मिले तो रीत के घर होगा ...
और अगर रीत घर पर न मिले तो करन के घर
और फिर जैसे बाकी बच्चे झट से बड़े हो जाते हैं ...माँ बाप को पता भी नहीं चलता की और परिंदे पर तौलते ...आसमान नापने लगते हैं ...बस उसी तरह ...
रीत और करन बड़े हो गए ...
करन तो पहले से ही जहीन था किताबों को शौक़ीन ,,अब और ,,,स्कूल में अव्वल ...और भी बहुत सिफत ..डिबेट में एस्से लिखने में , कोई क्रिएटिव राइटिंग का कम्म्प्टिशन हो सबमें फर्स्ट ...और बारहवे में पहुँचते ही उसे कालेज का हेड ब्वाय भी बना दिया गया ...
कालेज में कोई फंक्शन उसके बिना पूरा नहीं होता था ...सबमे कम्पीयर भी वही करता था ..
और कालेज वो को एड था ...शहर का सबसे मानिंद अंग्रेजी स्कूल ...
और रीत भी उसी स्कूल में पढ़ती थी . पढाई में वो भी कोई कमजोर नहीं थी , लेकिन अभी भी बहोत ही खिलंदड़ी , ...दौड़ हो स्वीमिंग हो बैडमिन्टन हो सबमें ..वो स्कूल की टीम में थी ...
और साथ में उसे म्यूजिक डांस और पेंटिंग का भी शौक पैदा हो गया था
बस रीत को दो बातों का अफसोस था
एक तो उसको लोग अभी भी बच्चा समझते थे , जबकि वो अच्छी खासी बड़ी हो गयी थी।
लेकिन घर के लोग तो ..
और हम सब लोग ...बच्चियां गुडिया खेलती हैं , उनकी शादियाँ रचाती है ...और देखते देखते उनकी अपनी पालकियां दरवाजे के बाहर आकर खड़ी हो जाती हैं ..
लेकिन उसको सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का था की करन भी उसे बच्ची समझता था ...
वो उसके यहाँ अभी भी उसी तरह बेधड़क आता था लेकिन बस उससे पढाई लिखाई की बातें करने ...या फिर उसे कोई नैन्सी ड्रु या हार्डी ब्वायज टाइप किताबे देने ...जबकि अब वो मिल्स एंड बून पढने लगी थी।
( और मुहल्ले के शोहदों ने कब का सीटिया मार मार कर, उसके उभरते उभारों को घूर घूर कर , कब का उसे बड़ा होने का अहसास दिला दिया था)
दूसरा अफसोस भी उसे करन को लेकर था ...पहले तो बस वो करन के साथ ...अब कितनी लड़कियों ..तितलियों की तरह ...और ख़ास तौर से वो हेड गर्ल ...मुई चिपकी रहती थी , गिरी पड़ती थी जैसे कोई उसे और लड़का ना मिला हो ...
और करन उसे स्कूल में देखता तो बस हाय हेलो ..या पढाई कैसे चल रही है ...
लेकिन रीत के दोनों अफसोस एक दिन एक साथ दूर हो गए .....
ये बात मुझे गुड्डी ने बताई ...उस दिन का एक एक पल उस के जेहन में चस्पा है ...कुछ यादें होती है जो हरदम आपके साथ चलती है ...ये बात बस वैसे ही है लगता है बस कल की बात है
" हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा लें तो .."
ये बात मुझे गुड्डी ने बताई ...उस दिन का एक एक पल उस के जेहन में चस्पा है ...कुछ यादें होती है जो हरदम आपके साथ चलती है ...ये बात बस वैसे ही है लगता है बस कल की बात है
उन दिनों टीवी पर अन्ताक्षरी का बड़ा जोर था ..फिल्मी गानों का
वो लोग करन के घर पर ही थे थे ...
करन , गुड्डी , रीत , करन की एक रिश्ते की भाभी और एक कजिन ...
और करन की उस कजन ने अन्ताक्षरी की बात छेड़ दी ..पर करन ने बहाना बनाया ,,
पांच लोग हैं टीम कैसे बनेगी
तो रीत ने चट जवाब दिया ..वाह ..आप डरते हैं तो बात अलग है ...मैं और भाभी एक साथ हो जाते हैं और आप तीनो एक ओर ..
उस दिन रीत कुछ और शोख लग भी रही थी ..टाप के साथ पहली बार जींस पहन कर आई थी .
करन की कजिन कर से लिपट चिपट कर बोली
हमारे भैया डरने वाले नहीं है ..
करन की भाभी रीत की ओर सरक आयीं और बोलीं ,
" किस अक्षर से करन ने पूछा ..." बात वो भाभी से कर रहा था ...और देख रीत को रहा था
कुछ जोड़ जाड के भाभी ने बोला ...
" ह ...से " और करन तुरंत चालू ...
" हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबु ...हाथ से से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम ना दो ..
सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो ..प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो .."
गा करन रहा था ...नाच रीत की आँखे रहीं थीं ...बड़ी बड़ी कारी कजरारी आँखे
करन के गाना ख़तम होते ही रीत शुरू हो गयी द से
" दीवाना मस्ताना हुआ दिल , जाने कहाँ हो के बहार आई
प म ग म रे ग प म ग म, आआ आ ...सा नी ध प म ग रे सा नी नी नी .
दीवाना "
रीत जैसे सुध उध खो गयी थी। वो तो भाभी ने चिकोटी काटी और कान में छेड़ा ,
" हे अब ऐसा लड़का है तो दीवाना तो हो ही जाएगा दिल ..."
उधर करन भी उसे देख के मुस्करा रहा था .
फायदा करन की कजिन ने उठाया और इ से चालु हो गयी
इन मीना डीका ..
करन और रीत तो बस जैसे सुधबुध खो गए थे ...
और रीत की ओर से भी जवाब भाभी ने दिया जो ज पर पड़ा ...
करन तो बस रीत को देखे जा रहा था ...रीत और भाभी ने छेड़ना शुरू किया
ज १ ज २ ज ३ ...तब जागा करन और रीत की बड़ी बड़ी रतनारी आँखों को देखते हुए गाने लगा सुर में ...छेड़ते हुए
जरा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक ना जाए ज़रा नज़रों से कह दो ,,
रीत थोडा शरमाई लेकिन ...भाभी ने उकसाया ...य से पड़ा है जवाब दो ना ..
और रीत ने शुरू किया
ये दिल दीवाना है दिल तो दीवाना है , दीवाना दिल है ये
दिलकश बहारों में , छुप के चनारो में
गा रीत रही थी लेकिन हलके हलके करन भी साथ दे रहा था ..और जैसे उसने सोच के रखा हो ...जैसे रीत रुकी वो चालु होगया ...
" हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा लें तो .."
और बेसाख्ता रीत के मुंह से अगली लाइन निकल गयी ...
" हम मूँद के पलकों को इस दिल को सजा दें तो ..."
और अब करन का नंबर था ...
" इन जुल्फों में हम गुथेगे ये फूल मुहब्बत के ..."
वो बड़ी शरारत से रीत के शोख चेहरे को देख रहा था ...और रीत ने ज़रा सी जुम्बिश दी अपने चेहरे को और अदा से गाया
" जुल्फों को झटक के हम ये फूल गिरा दें तो ...:"
और फिर रीत और करन साथ साथ ये दुयेट गाने लगे ...
करन की भाभी ने छेड़ा ...करन को ..क्या तुम्हे सिर्फ आँखों पे गाने आते हैं ...तो बिना दुबारा बोले वो चालु हो गया
" फूलों के रंग से ..दिल की कलम से ...गुनगुना रहें हैं भंवरे खिल रही है कली कली "
करन की रिश्ते की भाभी और उस की कजिन उठ के बाहर चले गए थे .
रीत भी उठने लगी तो करन ने छेड़ा ..
" हुजूर इस कदर न इतरा के चलिए ..."
गुड्डी बोल रही थी की बस उस समय लग रहा जो ढेर सारी बातें वो एक दूसरे से कहना चाहते थे ..
.और नहीं कह पा रहे थे ...सारे सोते सपने जग गए हों ..
जैसे किसी ने हजारों साल से सोये तालाब में कंकड़ फेंका हो और हजारों कमल खिल उठे हों , लहरा उठें एक साथ.
रीत एक पल लिए दरवाजे पे ठहरी , अपनी लम्बी गर्दन को जुम्बिश दी , और अदा से एक हाथ से चोटी पकड़ के हिलाती हुयी , गुनगुना उठी
बड़े अरमानो से रखा है बलम तेरी कसम ,
हो बलम तेरी कसम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो
पहला कदम ..
पीछे से करन ने आके धीमे से रीत का हाथ पकड़ लिया और साथ में गाने लगा
जुदा ना कर सकेंगे हमे जमाने के सितम ,
हो जमाने के सितम ...
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो
पहला कदम ..
वो दोनों लान में थे और पीछे पीछे गुड्डी ...
करन ने अपने लान में कुछ पीले गुलाब के पौधे खुद अपने हाथ से लगाये थे ...जिसे वो किसी को छूने भी नहीं देता था ..
उसने एक टटका खिला पीला गुलाब रीत की चोटी में टांक दिया ..
लेकिन करन के हाथ में , एक काँटा चुभ गया और खून की एक बूँद छलछला उठी .
देर बिना किये रीत ने वो उंगली अपने मुंह में ले खून चूस लिया ...और अपना रुमाल निकाल के बाँध दिया।
करन ने रुमाल देखा , उसके कोने में .’के ‘काढा हुआ था .
गुड्डी बोली , रीत घर आई लेकि अपना बहुत कुछ छोड़ आई .
घर पहुँच के गुड्डी ने फिर रीत को छेड़ा ...क्यों रीत दी,.... हो गया ..
रीत की आँखे मुस्करायीं , लजाई ...फिर उसने गुड्डी के पीठ पे जोर का धौल मारा और बोली
जब तेरा होगा ना तो बताउंगी ..
गुड्डी भी ..अपनी शरारती आँखे नचा कर बोली ...वाह चोरी किसी ने की आपके दिल की और मार मुझे पड रही है ..
रीत ने प्यार से गुड्डी को जोर से भींच लिया और बोली ...पिटेगी तो तू कस के ...अगर किसी को कुछ भी ..
" क्या दो मैंने तो ना कुछ देखा ना सूना
और दौड़ती हुयी अपने घर चली गयी।
रीत बार बार चोटी झुलाती हुयी , उसमें लगे पीले गुलाब के देखती। उसकी एक पंखुड़ी में खून की एक बूँद लग गयी थी।
रीत ने उसे वहीँ चूम लिया ...और फिर बाहर खिले पीले चाँद को देखती रही और चाँद को देख के फिर उसने चोटी में लगे पीले गुलाब को देखा ...
उसे लगा जैसे करन ने आसमान से पीला चाँद तोड़कर उसकी चोटी में लगा दिया हो ..
वो वैसे ही शीशे के सामने गयी ..और चोटी नचा कर उसने अपने उभारों पर रख दिया ...और अपने को निहारती रही ...
अब उसे लगा वो में सच में बड़ी हो गयी .
फिर सम्हाल कर उसने गुलाब निकाल कर वास में लगा दिया।
अगले दिन रीत चोटी में वो गुलाब लगा के स्कूल गयी ...बहोत छेड़ा सहेलियों ने उसे ...
और उसका नाम पीला गुलाब पड़ गया।
लौटते हुए गुड्डी ने पूछा ..बात कुछ आगे बढ़ी ...तो रीत ने जोर का धौल जमा दिया और बोली ...सबसे पहले तूझे मालूम पडेगा मेरी नानी .
ये वो जमाना था जब अभी फेसबुक और चैटिंग बनारस ऐसे शहरों में नहीं पहुंची थी ...लेकिन दिल थे और उनमें बातचीत भी होती थी ..
तो जैसा गुलजार साहेब ने कहा है
जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
रीत को अपनी जिंदगी का पहला प्रेमपत्र ...तीन दिन बाद मिला ...
लाने वाली वही गुड्डी ..गुड्डी ट्यूशन से लौट रही थी की करन अपने घर के बाहर मिला और गुड्डी को मैथ्स की किताब देके बोला ..ये ले जा के अपनी दी को देना ...लेकिन जब सिर्फ वही हों ..
गुड्डी को रीत से कम ख़ुशी नहीं हो रही थी वो धड धडाते हुए ऊपर रीत के कमरे में पहुँच गयी।
रीत किसी टेस्ट की तैयारी कर रही थी ...और आज गुड्डी ने उसे खींच के अपनी बांहों में भर लिया और बोली ...मेरी ट्रीट ...रीत ने उसे और जोर से भींच लिया और बोली ...कुछ है क्या
गुड्डी धम्म से कुर्सी पे बैठ गयी और बोली ...नहीं क्यों कुछ आना था क्या ..फिर अपने बैग से उसने जो किताब करन ने दी थी वो निकाली ...
रीत ने छीनने की कोशिश की ...तो गुड्डी ने हाथ ऊपर कर लिए ...और बोली पहले ट्रीट ..
" ओके मेरी नानी दूंगी ना पहले इधर ला " और किताब खींच ली फिर गुड्डी से बोली ...अब तू चल।
" क्यों ..वाह ... अरे ना चाय ना पानी ...ना कुछ बात चीत ...और वो पालथी मार के बैठ गयी .
प्लीज चलो ना चलो ना ..अभी ..." रीत बोली .
" अच्छा पहले बस एक बार दो ..बस ज़रा सा "गुड्डी बोली .
दिखा दूंगी ...कल स्कूल जाते समय आना तो पूरा पढ़ा भी दूंगी ...अब तो जा ...और गुड्डी थम्स अप का साइन देते चली गयी
रीत बहुत देर तक उस किताब को तकती रही। मैथ्स की किताब कभी उसे इतनी अच्छी नहीं लगी ...फिर उसने उसे होंठों से लगाकर सीने में भींच लिया , जैसे किताब ना हो करन हो।
सोचती रही हो खोले ना खोले ...एक दो सहेलियों के लव लेटर देखे थे ...ये लड़के कैसे क्या क्या लिखते है सोच के शर्म आती है ..करन ने कही ऐसा कुछ तो नहीं लिखा होगा ..
उसने पन्ने पलटे कोई लिफाफा नहीं था।
तो क्या करन ने सिर्फ किताब भेजी थी ...उसका दिल जोर जोर से धक् धक् कर रहा था।
उसने फिर एक एक पन्ना पलटा ..कम्पाउंड इंटरेस्ट वाले चैप्टर के बाद एक पेज आलमोस्ट चिपका ...
उसपे कुछ शेर प्रिंट थे ..जल्दी से उसने वो पन्ना निकाला , इधर उधर देखा , आँखों से लगाया , चूमा ...लेकिन वो प्रिंटेड पेज ...और जब उसने ..पीछे देखा तो करन की राइटिंग में चंद अल्फाज ..
".शेर फराज साहब के जरुर है लेकिन बाते मेरी है ..तुम्हारे सामने आकर मेर जुबान बंद हो जाती है इसलिए इन शेरो का सहारा ले रहा हूँ .."
रीत बस पागल नहीं हुयी
कीत्ती बार उसने चूमा होगा उन लफ्जों को जो करन ने लिखे थे
और फिर रीत ने पन्ने को पलटा ...और फिर पहला शेर पढ़ा ...और मुस्कराई ...दुष्ट
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
और उसके बाद फिर दूसरा, तीसरा
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं
एक एक लफ्ज ...
कभी उसे लगता उस गुदगुदी कर रहे हैं , कभी लगता चिकोटियां काट रहे हैं ...
और जब उसने खिडकी से बाहर झांका तो उसे लगा सचमुच चाँद उसे निहार रहा है , एकटक ...और वो अचानक चांदनी में नहा गयी ...
और एक बार उसने अपने होंठो को छुआ तो लगा ...सच में वो गुलाब की पंखुड़ियों को छू रही है ...और फिर उसने आगे पढ़ा ..
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं
उसकी पूरी देह दहक उठी ..साँसे गरम हो रही थी . उसकी छत से करन का कमरा दिखता था ..रीत ने झाँका . कमरे में अँधेरा था लेकिन उसे लगा पूरी कायनात करन हो गयी है ...
सारी रात ना वो सो पायी ना जग पायी
अगले दिन पूरे दिन , उसे तितलियाँ सताती रहीं ...
उन शेरो ने उसके पूरे जिस्म में जेहन में सपने बो दिए थे ...
एक दो बार स्कूल ने करन दिखा भी ..तो बस निगाहों से दुआ सलाम हुयी लेकिन उसे लगा की पूरा जमाना उन दोनों को घूर रहा है ...कोई उस की सहेली उस से पेन्सिल भी मांगती तो लगता की ...करन के बारे में पूछ ना ले ...
अब उसे ख़त का जवाब भी देना था , समझ में उसके नहीं आ रहा था ...उसे कोई शायरी का इल्म भी नहीं था
..करन ने तो बेईमानी की फराज साहब का सहारा लेकर ...
फिर उसने करन का ही सहारा लिया ...
जो गुलाब उस दिन करन ने उसके बालों में लगया था उस पीले गुलाब की दो सूखी पंखुड़िया ...और फिर मुस्कराकर उसने एक कागज के टुकडे को अपने लबो से लगाया और नीचे अपना नाम लिख कर किताब में रख दिया।
सुबह जब स्कूल में करन दिखा तो तुरंत उसने उसे इशारा किया और बोली
'वो आपकी किताब .."
और उसके कुछ बोलने के पहले उसने झट से बैग से किताब निकाल के ...
उसे पकड़ा दी ..और वापस हो ली . उसकी ऊँगली करन के ऊँगली से छु गयी थी और रीत के पूरे बदन में दावानल दहक़ उठे थे ..वह सच में शोला बदन हो उठी थी।
उसके ख़त का जवाब उसी दिन मिल गया ...वो दोपहर में कैंटीन में अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी ...और एक मेज पर करन अकेला ..तभी करन का कोई दोस्त आके टेबल पे बैठ गया ..और करन ने अपने दोस्त से बिना बात कहा ..
" आज शाम को छुट्टी के बाद सोचता हूँ लाइब्रेरी हो आऊं ."
जिससे ये बात की गयी थी ...वो छूट्टी के बाद भागती दौड़ती , कूदती फांदती , लाइब्रेरी पहुंची।
करन वहां पहले से बैठा था . रीत भी वहीँ बैठ गयी ...थोड़ी देर में एक किताब गिरने की आवाज हुयी ...और करन बोला शायद आपकी किताब गिर गयी है ..
किताब तो वो कोई लाइ ही नहीं थी ...फिर भी उसने झुक के किताब उठायी , कोई पोएट्री की थी ,
अपने बैग में रखी। और जब उसने उस ओर नजर घुमाई ..जहाँ करन था वहां ...अब सन्नाटा था ..सिर्फ मेज पर पीले गुलाब की एक अधखिली कली ..
उसने गुलाब अपने बाल में लगाया और तीर की तरह सीधे घर ...
मम्मी नीचे से आवाजें देती रही लेकिन वो सीधे ...अपने कमरे में ..और सब कुछ छोड़ उसने वो किताब निकाली उसे अपने सीने से लगाया ...और धड़कते दिल से खोला,
अबकी फराज साहब के शेर के साथ ..कुछ सतरें ज्यादा थीं ..
और सारी रात वो उन दहकते शेरों के बिछौने पे सुलगती रही ..अध् जागी आँखों से ख़्वाब देखती रही , करवटें बदलती रही ...
कितनी बार उन शेरो को नहीं पढ़ा होगा उसने ...अब तो उसे याद भी हो गए थे ...लेकिन फिर वो तकिये के नीचे से वो पुर्जा निकालती , हौले से खोलती , पढ़ती और फिर पेट के बल लेट कर ....तकिये को भींच लेती।
तू पास भी हो तो दिल बेक़रार अपना है
के हमको तेरा नहीं इंतज़ार अपना है
ज़माने भर के दुखों को लगा लिया दिल से
इस आसरे पे के इक ग़मगुसार अपना है
"फ़राज़" राहत-ए-जाँ भी वही है क्या कीजे
वो जिस के हाथ से सीनाफ़िग़ार अपना है
लेकिन वो छुई मुई वाले दिन जल्दी ही गुजर गए।
एक दिन किसी लड़की ने कहा की आज शाम को इंटर हाउस डिबेट है चलना है ...दूसरी बोली जीतेगा तो अपने हाउस का करन ही ...और उसका नाम सुनते ही रीत को सौ बिछुओं ने एक साथ डंक मार लिया ...
" कब कित्ते बजे ..." उचक कर उसने पूछा। और सब एक साथ हंस पडीं ..
" तुझे डिबेट में कब से दिलचस्पी होने लगी ...तू तो कहती थी बहुत बोरिंग होता है ..."
रीत कुछ नहीं बोली ...जान कर भी सब उसके पीछे ....लेकिन शाम को वो डिबेट में थी।
बाकी समय तो वो उंघती रही लेकिन जब करन का नम्बर आया उसके कानो ने एक एक शब्द पी लिया ...और फिर क्या तालियाँ बजाई ...और जब जीत का ऐलान हुआ ...उस समय तो उसने आसमान सर पर उठा लिया
और फिर तो तो सब लडकियां रीत के पीछे पड गयीं ट्रीट ट्रीट ..वो लाजवंती क्या बोलती तो उन नदीदी और शरीर लड़कियों ने , करन के ऊपर धावा बोल दिया और गुड्डी भी उसमें शुमार थी .
कैंटीन में रीत की किसी सहेली ने बोल दिया " कल रीत का बैडमिन्टन मैच है "
रीत ने बात बनायीं ...अरे कौन सा फाइनल है ..लीग मैच ही तो है ...
लेकिन अगले दिन करन वहां हाजिर था
और फिर कोई डिबेट क्विज इलोक्युशन ...ऐसा हो नहीं सकता था की करन पार्टिसिपेट कर रहा हो और रीत वहां ना हो
और बैडमिन्टन , स्वीमिंग पेंटिंग , डांस, म्यूजिक कम्पटीशन हो ...जिसमें रीत हो और करन ना हो
लोग कहते हैं इश्क चाँद की तरह होता है ...या तो बढ़ता है या घटता है ...
और यहाँ तो शुक्ल पक्ष अभी लगा ही था.
गुड्डी ने बताया की ...वो परवान चढ़ा जब वो लोग लखनऊ गए एक इंटर कालेज कल्चरल फेस्ट में ...
एक तो अपने शहर से दूर , दूसरे लखनऊ वैसे भी मुहब्बत ...और शायरी के लिए मशहूर ..
फेस्ट ल मार्टीनयर स्कूल में था ...और रीत का स्कूल कभी तीसरे चौथे नंबर से ऊपर नहीं आ पाता था. पहले और दूसरे नंबर पे लखनऊ और नैनीताल के कान्वेंट स्कूल ही अक्सर रहते थे .
पहले तो हेड गर्ल ने बहोत नाक भौं सिकोड़ी की कोई नाइन्थ की लड़की जाय ...लेकिन करन की जिद और आधी इवेंट्स में तो वही पार्टिसिपेट करने वाला था
लास्ट इवेंट के पहले तक उनका कालेज चौथे नंबर पर था। लेकिन सबसे ज्यादा बड़ी इवेंट अभी बाकी थी ,
म्यूजिकल क्विज की। रीत ने चार इवेंट में भाग लिया वो एक में फर्स्ट आई थी , वेस्टर्न डांस में , इन्डियन क्लासिकल और फ़िल्म में सेकेण्ड और वेस्टर्न म्यूजिक में थर्ड। करन तीन इवेंट में फर्स्ट आया था और दो में सेकेण्ड ..
म्यूजिकल क्विज की इवेंट पचास नम्बर की थी और इसके तीन राउंड थे
फर्स्ट राउंड के तीस नम्बर थे ...और इसमें फर्स्ट फोर टीम ...सेकेण्ड और थर्ड राउंड में भाग ले सकती थीं।
लेकिन वो राउंड आप्शनल थे और उसमे दस नम्बर मिलते जीतने वाली टीम को और लास्ट आने वाली दो टीम के पांच नम्बर कट जाते . थर्ड राउंड में सर्प्राइज पैकेट भी होता था .
म्यूजिकल क्विज शुरू हुयी और उसमें रीत करन और वो हेड गर्ल तीनो ने भाग लिया ...इस राउंड में तीन की टीम थी .
और इसमें रीत का स्कूल फर्स्ट आगया .
अब ओवर आल रैंकिंग में वो लोग तीसरे पे आ गए थे .
झगडा था नेक्स्ट राउंड में भाग लें की नहीं ...दोनों राउंड इन्डियन फ़िल्म म्यूजिक पर थे ..
हेड गर्ल बोली ...हमें नहीं पार्टिसिपेट करना चाहिए ...अभी हमारी थर्ड पोजीशन तो सिक्योर है ..अगर कही निएगेटिव नंबर मिल गए तो हम फोर्थ पे पहुँच जायगे ...
लेकिन करन बोला यार नो रिस्क नो गेन ...और रीत को लेके पहुँच गया एंट्री देने ..
चार टीमें थी... लखनऊ के दो कालेज लोरेटो और ल मार्टिनियर , नैनीताल से शेरवूड स्कूल
ये राउंड रिटेन था ...और तीन पार्ट में ..स्क्रीन पे एक सब्जेक्ट आता ..और कुछ कंडीशन और सारी टीमों को कागज पे लिख के देना होता
सबकी निगाहें स्क्रीन पे गडी थी ...और एक ट्रेन की फोटो आई ...
सब लोग वेट कर रहे थे ट्रेन के बारे में पिक्चर का नाम ...लेकिन जब डिटेल्स आये तो फूँक सरक गयी ...
ट्रेन बे बेस्ड हिंदी गाने ...ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मो के , फ़िल्म और म्यूजिक डायरेक्टर के नाम के और पांच मिनट में जो टीम सबसे ज्यादा गानों के नाम लिखती वो फर्स्ट
आडियेंस में बैठी लड़के लड़कियों ने जोर से बॊऒ किया ,,,ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मो के गाने ..
करन ने भी परेशान होकर रीत की ओर देखा ...लेकिन रीत कागज़ कलम लेके तैयार ...और जैसे ही अनाउंस हुआ
योर टाइम स्टार्टस नाउ ...
उसने लिखना शुरू किया ...एक दो गाने करन ने भी बताये ..
और पांच मिनट के बाद
पांच मिनट ख़तम होते ही लिस्ट ले ली गयी।
पहली टीम ने सिर्फ पांच गाने लिखे थे ..उसमें से एक क्विज मास्टर ने कैंसल कर दिया ...छैयां छैयां ...कलर्ड होने के कारण यानी सिर्फ चार
दूसरी टीम उसी स्कूल की थी ल मार्टिनियर और क्लैप भी उसे सबसे ज्यादा मिल रहे थे ...उस की लिस्ट में छ गाने थे सारे सही ..
खूब जोर से क्लैप हुआ ...ब्लैक एंड व्हाईट ...और वो भी एक सब्जेक्ट पे
अगला नम्बर लोरेटो का था ...उसके आठ गाने थे ...और अबकी वहां की लड़कियों ने आसमान सर पर उठा लिया ..उनकी जो कान्टेसटेंटस थीं वो दो बार बार्न वीटा क्विज के फाइनल में पहुँच चुकी थीं ..
और एक बार सेकेण्ड भी आई थीं।
अब तय होगया की इन लड़कियों ने जीत लिया मैदान ...वो हाथ हिलाकर लोगो को विश कर रही थीं
अब क्विज मास्टर इन लोगो की लिस्ट चेक कर रहा था ...और कुछ अनाउन्स नहीं कर रहा था ..
उधर आडियेंस शोर कर रही थी रिजल्ट रिजल्ट ...
उन लोगो के बारह गाने थे ...
चौथी आई टीम शेरवूड नैनीताल आउट हो गयी थी ..उसे निगेटिव प्वाइंट मिल गए ...
लेकिन लोग मानने को तैयार नहीं थे ...
सिर्फ लोरेटो की दोनों लड़कियों ने रीत और करन से हाथ मिला कर विश किया ..
क्विज मास्टर ने रीत को इशारा किया की वो अपनी लिस्ट पढ़ कर सुनाये ..
और रीत शुरू हो गयी ..फ़िल्म के नाम के साथ
१. है अपना दिल तो आवारा - सोलवां साल
२. अपनी तो हर आह एक तूफान है -काला बाजार
३. देखोजी एक बाला जोगी - चाइना टाउन
४. दिल थाम चले हम आज किधर -लव इन शिमला
५ .बदल जाये अगर माली - बहारें फिर भी आएँगी
६ औरतों के डिब्बे में मर्द आ गया - मुड मुड के ना देख
७ हमको समझ ना लीजिये -कल्पना
८ तूफान मेल दुनिया ये दुनिया ...जवाब
९ .आई बहार आई बहार ..
और जैसे ही आठ की संख्या पार हो गयी ...आडियेंस का शक भी ख़तम होगया क्विज मास्टर को भी अगले राउंड की ओर बढ़ना था ..
रीत करन का स्कूल फर्स्ट डिक्लेयर हो गया ...
लेकिन अभी दो पार्ट और बाकी थे ...
नेक्स्ट पार्ट वीडयो और बजर राउंड था .. पांच क्लिप्स थीं ...
पहली क्लिप्स शुरू होते ही करन ने बजर दबा दिया ..उसे क्विज का बहुत एक्सपीरिएंस था। जवाब भी सही था
..दूसरी क्लिप्स पे लोरेटो वाली लड़कियां जीतीं एक अंग्रेजी फ़िल्म की क्लिप थी ...एक्टर्स के नाम बताने थे ..
और जैसी ही तीसरी क्लिप आई ...रीत ने बजर दबा दिया ..एक ट्रेन में कुछ लोग गा रहे थे ...लेकिन गाना साइलेंट पे था ...
क्विज मास्टर ने घूर के देखा और बोला मुझे क्वेश्चन तो पूछ लेने दो ...और इस क्लिप पे एक स्पेशल अवार्ड भी है ...सवाल ये नहीं है की गाना क्या है ..सवाल है सिंगर और फ़िल्म दोनों ...
रीत ने बिना रुके बोला ..फिल्म डाक्टर और सिंगर पंकज मालिक ...
ओके यू गाट इट राईट एंड स्पेशल क्वेश्चन ...नो मार्क्स ...बट इफ यु गेट इट राईट ...वेरी स्पेशल अवार्ड ...
एंड स्पेशल क्वेश्चन इज ...व्हाट इज स्पेशल इन दिस सांग ...ट्वेंटी सेकेंड्स ..
रीत ने एक पल सोचा , करन को देखा और जवाब दे दिया ...फर्स्ट टाइम अ सोंग हिज बीन शॉट इन अ मूविंग ट्रेन ..
और जैसे ही क्विज मास्टर ने सही का इशारा दिया ..पूरा हाल तालियों से गूँज उठा।
रीत ने बस करन का हाथ दबा दिया। चौथी क्लिप भी लोरेटो के लड़कियों ने जीती स्कोर २-२
आखिरी क्लिप फिर एक इंग्लिश फ़िल्म की थी एक ट्रेन में मर्डर ..
लेकिन अबकी उन लोगो ने वेट किया क्विज मास्टर का ..उसने बोला ...इस पिक्चर का नाम ...नहीं बताना है ..नाम है मर्डर इन ओरिएण्टल एक्सप्रेस ...हम सब को मालुम है ...ये ट्रेन कहाँ से कहाँ तक चलती थी ये बताना है ...अबकी बजर किसी ने नहीं दबाया ..
रीत ने करन से कुछ खुसफुस की ..और करन ने जवाब दे दिया .. और वो लोग ये राउंड भी जीत गए।
और अब जब नमबर जोड़े गए तो उनका स्कूल दूसरे नम्बर पर आ गया था ...पहले नम्बर पर लोरेटो कान्वेंट ...तीन नम्बर आगे ओवर आल नम्बर में ...
इसके बाद म्यूजिकल क्विज का फाइनल राउंड था ...उसमें सिर्फ दो टीमें भाग ले सकती थी ...उनकी टीम और लोरेटो ...
ये सबसे टफ राउंड भी था ...
और स्क्रीन पर कंडीशंस आयीं ..
१. पचास के दशक का गाना
२. ब्लैक एंड व्हाईट
३ डुएट
४ तीन अलग अलग संगीत कारों के ...जिनकी चिट निकाली जायेगी ..
रीत करन की चिट में रोशन , ओ पी नय्यर और शंकर जयकिशन निकले .
एक बार करन को थोड़ी घबडाहट हुयी लेकिन अबकी रीत ने उसका हाथ दबा दिया ...
सबसे पहले उन्होंने
मांग के हाथ तुम्हारा , मांग लिया संसार ...ओ पी नय्यर का गाया और पूरा हाल तालियों से गूँज उठा
उसके बाद शंकर जयकिशन का ,
याद किया दिल ने कहाँ हो तुम ...
सबसे अंत में रोशन का संगीत दिया मल्हार का रीत का फेवरिट ..और वैसे भी करन , मुकेश के गाने बहुत अच्छा गाता था। रीत ने लता - मुकेश का दुयेट शुरू किया
बड़े अरमानो से रखा है बलम तेरी कसम, हो बलम तेरी कसम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो, पहला कदम
और फिर करन ...
जुदा न कर सकेंगे हमको ज़माने के सितम
हो ज़माने के सितम ,प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो, पहला कदम
पूरा हाल तालियाँ बजा रहा था ...लेकिन रीत और करन सुधबुध खोये , मुस्कराते एक दूसरे को देखते गा रहे थे , जैसे बस वहीँ दोनों हाल में हो ...जब गाना आखिर में पहुंचा
मेरी नैया को किनारे का इन्तजार नहीं
तेरा आँचल हो तो पतवार की भी दरकार नहीं
तेरे होते हुए क्यों हो मुझे तूफान का गम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो, पहला कदम
सारा हाल खड़ा हो गया ...स्टैंडिंग ओवेशन ...
उन्हें दस में दस मिले ...और इस गाने के लिए भी एक स्पेशल अवार्ड ..
उनका कालेज पहली बार इस फेस्ट में फर्स्ट आया था ..
गुड्डी बोली की जब वो दोनों लौट कर आये तो बस कालेज में ....छा गए।
घर लौटते हुए गुड्डी ने रीत से पुछा ..' कुछ हुआ "
और जवाब में जोर का घूंसा ...गुड्डी की पीठ पे पड़ा।
गुड्डी जोर से चिल्लाई ..फिर पूछा ..
" कुछ बोला उसने "
रीत मुस्कराती रही ..
" बोल ना आई लव यू बोला की नहीं " गुड्डी पीछे पड़ी रही।
" ना ..." रीत ने मुस्करा के जवाब दिया
" कुछ तो बोला होगा ..." गुड्डी पीछे पड़ी थी।
" हाँ ...रीत ने मुस्कराकर जुर्म कबूल किया ...वो बोला ..मुझे तुमसे एक चीज मांगनी है ..."
अब गुड्डी उतावली हो गयी बोल ना माँगा उसे दिया तुमने की नहीं ..
रीत बिना सुने बोलती गयी " मैंने बोला मेरे पास तो जो था मैंने बहोत पहले तुम्हे दे दिया है ...मेरा तो अब कुछ है नहीं ...फिर हम दोनों बहुत देर तक चुपचाप , बिना बोले , हाथ पकड़ के बातें करते रहे ."
" बिना बोले बातें कैसे ..." गुड्डी की कुछ समझ में नहीं आया .
" तू बड़ी हो जायेगी ना तो तेरे भी समझ में आ जायेंगी ये बातें ..."
हँसते हुए रीत बोली ...उस का घर आ गया था .
बस एक बात उसे रोकते हुए गुड्डी बोली ..." किस्सी ली उसने ...'
एक जोर का और पड़ा गुड्डी की पीठ पे और रीत धडधडाते हुए ऊपर चल दी ..लेकिन दरवाजे से गुड्डी को देखते हुए मीठी निगाहों से , हलके से हामी में सर हिला दिया ...
गुड्डी ने बोला , रीत ने बाद में बताया था ...एक बहोत छोटी सी ..गाल पे ...लेकिन वो पागल हो गयी थी , दहक़ उठी थी .
दिन सोने के तार से खींचते गए ...
करन का आई एम् ए ( इंडियन मिलेट्री अकेडमी ) देहरादून में एडमिशन हो गया।
ये खबर भी उसने सबसे पहले रीत को दी।
और स्टेशन उसे छोड़ने उस के घर के के लोगों के साथ रीत भी गयी और भी कालेज के बहुत से लोग ..मुहल्ले के भी।
गुड्डी ने हंस कर बोला ...जो काम पहले वो करती थी ...डाक तार वालों ने सम्हाल लिया। और बाद में इंटर नेट वालों ने ...मेसेज इधर उधर पहुंचाने का
गुड्डी उसकी अकेली राजदां थी .
लेकिन वो दिन कैसे गुजरते थे ...वो या तो रीत जानती थी या दिन ...
अहमद फराज साहब की शायरी का शौक तो करन ने लगा दिया ...और दुष्यंत कुमार उसने खुद पढना शुरू कर दिया ...
कविता समझने का सबसे आसन तरीका है इश्क करना , फिर कोई कुंजी टीका की जरुरत नहीं पड़ती ..
जो वो गाती गुनगुनाती रहती थी ...उसने करन को चिट्ठी में लिख दिया
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे
हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे
मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे
जब वह करन को स्टेशन छोड़ने गयी थी ...
तो करन ने उसे धर्मवीर भारती की एक किताब ले कर दे दी थी ...और जब कोई विरह में हो तो संसार की सारी विरहणीयों का दुःख अपना लगने लगता है ...
वह बार बार इन लाइनों को पढ़ती , कभी रोती ...कभी मुस्कराती
कल तक जो जादू था, सूरज था, वेग था
तुम्हारे आश्लेष में
आज वह जूड़े से गिरे जुए बेले-सा
टूटा है, म्लान है
दुगुना सुनसान है
बीते हुए उतस्व-सा, उठे हुए मेले-सा -
मेरा यह जिस्म -
टूटे खँडहरों के उजाड़ अन्तःपुर में
छूटा हुआ एक साबित मणिजटित दर्पण-सा -
आधी रात दंश भरा बाहुहीन
प्यासा सर्वीला कसाव एक
जिसे जकड़ लेता है
अपनी गुंजलक में
अब सिर्फ मै हूँ, यह तन है, और याद है
मन्त्र-पढ़े बाण-से छूट गये तुम तो कनु,
शेष रही मैं केवल,
काँपती प्रत्यंचा-सी
विरह के पल युग से बन जाते ...वो एक चिट्ठी पोस्ट करके लौटती तो दूसरी लिखने बैठ जाती ...
और उधर भी यही हालत थी करन की चिट्ठी रोज ..
.जिस दिन नहीं आती ...गुड्डी उसे खूब चिढाती ..देख के आती हूँ ...कही डाक तार वालों की हड़ताल तो नहीं हो गयी
और जब करन आता ...तो काले कोस ऐसे विरह के पल ...कपूर बन कर उड़ जाते ...लगता ही नहीं करन कही गया था स्कूल और मुहल्ले की खबरों से ले कर देश दुनिया का हाल ...
बस जो रीत उसे नहीं बताती ...वो अपने दिल का हाल ..
लेकिन शायद इसलिए ..की ये बात तो उसने पहले ही कबूल कर ली थी की अब उसका दिल अपना नहीं है
आई एम् ए से वो लौट कर आया ...तो सबसे पहले रीत के पास ...वो भी यूनिफार्म में ..
और उसने रीत को सैल्यूट किया ...
गुड्डी वहीँ थी ..रीत ने उसे बाहों में भीच लिया ...
दोनों कभी हँसते कभी रोते ..
रीत हाई स्कूल पास कर एलेव्न्थ में पहुँच गयी
करन की ट्रेनिंग करीब ख़तम थी
उसे बस पासिंग आउट परेड में जाना था ..
और फिर वो हुआ जो नही होना चाहिए था ...
रीत की छुट्टियां चल रही थी ..क्योंकि उसके कालेज में बोर्ड के इक्जाम का सेंटर था
फागुन का महीन था ..
फागुन वो भी बनारस का ..
अंदर और बाहर दोनों ...पलाश दहक रहे थे ...कित्ते दिन बाद करन आया था ..
रीत उस बार करन को छोड़ने नहीं गयी स्टेशन ....
उसे अपने पैरेंट्स के साथ मंदिर जाना था ..मनौती उसने करन के लिए ही मानी थी
उसे बेस्ट कैडेट का अवार्ड मिले ...
बस उसके घर के सामने उसने उसे छोड़ दिया ...और रीत के नैन दूर तक उसके साथ गए .
रीत पैरेंट्स के साथ संकट मोचन चली गयी
और करन अपने पेरेंट्स के साथ स्टेशन ..
रीत का पैरेंट्स के अलावा कोई नहीं था ...कोई दूर का रिश्तेदार भी नहीं ..
करन भी अपने घर में अकेला था ..
अगले दिन अखबार की हेड लाइन थी ...
७ मार्च , मंगलवार
दो बाम्ब ब्लास्ट , अट्ठाईस लोग मरे , सौ से ऊपर घायल
कम से कम दस लोगों के शव मंदिर में पड़े ..चालीस से उपर घायल , कैंट स्टेशन पर भी जोरदार धमाका ...अठारह से बीस लोगों के स्टेशन पर मरने की आशंका ,
मंदिर में मरने वालों में आठ महिलायें जिनमें तीन लडकिया ..कईयों की पहचान करना असंभव
और इसके बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं थी ..
मुख्यमंती की ओर से पैसे का ऐलान था ...और लोगों से शान्ति बनाये रखने की अपील थी ..
कुछ और राष्ट्रीय अन्तर राष्ट्रीय प्रतिक्रियाये थीं ..
Indian Prime Minister Manmohan Singh condemned the blasts and appealed for calm. India's Cabinet Committee on Securitymet in emergency session.
Chief Minister Mulayam Singh Yadav announced an ex gratia relief for the victims and appealed to the people to maintain peace and order.
In a statement in Lucknow, he said the culprits would not be spared. ``Stern action will be initiated against all those found involved in the incident.''
He announced an ex gratia of Rs. 5 lakh to those killed in the blasts, Rs. 1 lakh to those seriously injured and Rs. 50,000 to those with minor injuries.
Australian Prime Minister John Howard said in Sydney that the incident reminds the need for both India and his country to work together in the fight against the scourge of terrorism.
: British Foreign Office spokesman Kim Howells said the UK remained determined to work closely alongside India in its fight against the evil of terrorism. "I was horrified to hear of today's bombings in Varanasi, which resulted in the loss of innocent lives, and injury to many other victims.
United States Condemned the blasts calling them "acts of terrorism."
कुछ जो जिन्दा बचे थे उनकी हालत मरने वालों से कम बदतर नहीं थी .
रीत उनमे से एक थी .
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फागुन के दिन चार--90
गतांक से आगे ...........
फ्लैश बैक ...
कहानी अचानक पीछे मुड रही है ...एक बहुत शार्प कर्व ...मैं बहुत उहापोह में थी ...की रीत के जीवन का ये प्रकरण लिखूं न लिखू ...लेकिन अब कहानी वहां है ...जहाँ शायद अतीत के उन पन्नो को खोले बिना कोई चारा नहीं है ...
ये कहानी एक लीनियर ढंग से चल रही थी रिजु रेखा में ..एक के बाद एक हो रही घटनाएं ...भले ही उनके स्थान अलग अलग हों ...लेकिन काल क्रम के ढंग से उसका प्रवाह एक सरल ढंग से था ...कहानी कभी ठहरती थी ...कभी मंद पड जाती थी ...तो कभी बस चल निकलती थी ...
लेकिन ये अगले कुछ एपिसोड ना सिर्फ अतीत के हैं ...बल्कि इनका मिजाज भी कुछ अलग सा है ...बस मैं अपने कहानी के सुधी पाठक /पाठिकाओं से अनुरोध करुँगी ...की ..ढेर सारी त्रुटियों को भूलते नजरअंदाज करते ...रीत के जीवन के इन पन्नो को पढ़ें ..बल्कि महसूस करें ...
कहानी थोडा पीछे मुड़ेगी लेकिन फिर आगे बढ़ चलेगी ..
और वैसे भी कहानी बनारस की है ...
कहते हैं की बनारस में गंगा माँ भी एक बार पीछे मुड गयी थी ...(इसलिए यहाँ इन की गति वक्र है ) महादेव की याद में ...और जब भागीरथ ने बहुत गुहार लगायी ...आशुतोष ने खुद कहा की वो यहाँ आके रहंगे उनके पास तो वो आगे बढ़ी ..
तो थोड़ी देर में रीत के जीवन के अनछुए पन्ने ...फ्लैश बैक में
कहानी अचानक पीछे मुड रही है ...एक बहुत शार्प कर्व ...मैं बहुत उहापोह में थी ...की रीत के जीवन का ये प्रकरण लिखूं न लिखू ...लेकिन अब कहानी वहां है ...जहाँ शायद अतीत के उन पन्नो को खोले बिना कोई चारा नहीं है ...
ये कहानी एक लीनियर ढंग से चल रही थी रिजु रेखा में ..एक के बाद एक हो रही घटनाएं ...भले ही उनके स्थान अलग अलग हों ...लेकिन काल क्रम के ढंग से उसका प्रवाह एक सरल ढंग से था ...कहानी कभी ठहरती थी ...कभी मंद पड जाती थी ...तो कभी बस चल निकलती थी ...
लेकिन ये अगले कुछ एपिसोड ना सिर्फ अतीत के हैं ...बल्कि इनका मिजाज भी कुछ अलग सा है ...बस मैं अपने कहानी के सुधी पाठक /पाठिकाओं से अनुरोध करुँगी ...की ..ढेर सारी त्रुटियों को भूलते नजरअंदाज करते ...रीत के जीवन के इन पन्नो को पढ़ें ..बल्कि महसूस करें ...
कहानी थोडा पीछे मुड़ेगी लेकिन फिर आगे बढ़ चलेगी ..
और वैसे भी कहानी बनारस की है ...
कहते हैं की बनारस में गंगा माँ भी एक बार पीछे मुड गयी थी ...(इसलिए यहाँ इन की गति वक्र है ) महादेव की याद में ...और जब भागीरथ ने बहुत गुहार लगायी ...आशुतोष ने खुद कहा की वो यहाँ आके रहंगे उनके पास तो वो आगे बढ़ी ..
तो थोड़ी देर में रीत के जीवन के अनछुए पन्ने ...फ्लैश बैक में
रीत करन
एक था गुल और एक थी बुलबुल -
दोनो चमन में रहते थे
है ये कहानी बिलकुल सच्ची
मेरे नाना कहते थे
,,,,
याद सदा रखना ये कहानी
चाहे जीना चाहे मरना
तुम भी किसी से प्यार करो तो
प्यार गुल-ओ-बुलबुल सा करना
( गुड्डी,डीबी , पुलिस रिकार्ड्स एवं बहुत से लोगों से की हुयी बातों के आधार पर )
ये कहानी बहुत पुरानी है , उन तकियों के गिलाफो के मानिंद , जिनपर कितने चुप चुप के रोये हुए आंसुओ के निशाँ पुख्ता हो जाते हैं ...
उन किताबों में छुपे खोये भूले कागजों की माफिक , जिनके हर्फ उड़ गए हैं ...पर जो कभी हंसते गाते , स्याही में लिखे ख़्वाब होते थे ..
ये कहानी तब की है ...जब रीत , रीत नही नवरीत थी।
वो दोनों पड़ोस में रहते थे , परिवारों में भी बहुत दोस्ती थी ..
करन रीत से तक़रीबन चार साल बड़ा था . ...लेकिन बच्चो में इतनी उम्र का फरक कहाँ पता चलता है ...
जैसा फिल्मो में होता है ...बच्चे ..खिलोने से खेल रहे हैं , झगड़ रहे हैं ...और अगले शाट में झट से बड़े होकर ..हीरो हिरोइन बन कर गाना गा रहे हैं बिलकुल वैसे ही ..
नव रीत ( या रीत ..हम सब तो उसे इसी नाम से जानते हैं ना ), बचपन से ही बहुत खूबसूरत थी ,गोल मटोल खूब गोरी सी , हंसती तो गालों में गड्ढे पड़ते ...और किसी की बुरी नजर ना पड़े ..
इसलिए सुबह उठते ही उसे कोई ना कोई दिठोना जरुर लगा देता था। और उसके गोरे गोर माथे पे ... बस लगता था जैसे धुप में कोई अबाबील उडी जा रही है ....लेकिन थी वो बहुत ही चुलबुली , नटखट ...
और करन आम बच्चों से थोडा सा अलग , बला का जहीन ...और जिस उम्र में बच्चे बैट बल्ले माँगते है ..बस वो किताबों की फरमाइश करता था , जब देखो तब किताबो के ढेर में डूबा हाथ पैर मारता ...
और उस के अलावा उसे दूसरा शौक था गिटार का ...बचपन में उसे एक गिटार नुमा कोई चीज ले दी गयी थी और उसे वो बजाया करता था ...
लेकिन रीत से दोस्ती उसकी गजब की थी ...वह किसी और बच्चे को अपनी किताब छूने नहीं देता था ..लेकिन रीत के लिए ...पूरी अलमारी खुल जाती थी ..उसे वो गिटार भी बजा कर सुनाता ...
एक बार रीत ने उसकी किसी किताब का पन्ना फाड़ दिया ...कोई दूसरा बच्चा होता तो खून खराबा हो जाता ..माँये , अपने बच्चो को पकड़ के अपने घरों में ले जाती और दरवाजे पे खड़े होके उंगलिया तोड़ तोड़ के गालीया निकालती , लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ..
करन बस गम सुम हो गया ...मोम की मूरत ..
रीत थोड़ी देर तक बैठी रही की वो अब झगडा करेगा ...लेकिन वो बस चुप
रीत बिना बोले उठी ...अपने घर गयी कोई चिपकाने वाली ट्यूब लायी ...और बड़े ध्यान से उसने वो पन्ना चिपका दिया।
करन उठा अपने कमरे में से कोई पजल लाया और दोनों खेलने लगे ..
अगर शाम को करन ना मिले तो रीत के घर होगा ...
और अगर रीत घर पर न मिले तो करन के घर
और फिर जैसे बाकी बच्चे झट से बड़े हो जाते हैं ...माँ बाप को पता भी नहीं चलता की और परिंदे पर तौलते ...आसमान नापने लगते हैं ...बस उसी तरह ...
रीत और करन बड़े हो गए ...
करन तो पहले से ही जहीन था किताबों को शौक़ीन ,,अब और ,,,स्कूल में अव्वल ...और भी बहुत सिफत ..डिबेट में एस्से लिखने में , कोई क्रिएटिव राइटिंग का कम्म्प्टिशन हो सबमें फर्स्ट ...और बारहवे में पहुँचते ही उसे कालेज का हेड ब्वाय भी बना दिया गया ...
कालेज में कोई फंक्शन उसके बिना पूरा नहीं होता था ...सबमे कम्पीयर भी वही करता था ..
और कालेज वो को एड था ...शहर का सबसे मानिंद अंग्रेजी स्कूल ...
और रीत भी उसी स्कूल में पढ़ती थी . पढाई में वो भी कोई कमजोर नहीं थी , लेकिन अभी भी बहोत ही खिलंदड़ी , ...दौड़ हो स्वीमिंग हो बैडमिन्टन हो सबमें ..वो स्कूल की टीम में थी ...
और साथ में उसे म्यूजिक डांस और पेंटिंग का भी शौक पैदा हो गया था
बस रीत को दो बातों का अफसोस था
एक तो उसको लोग अभी भी बच्चा समझते थे , जबकि वो अच्छी खासी बड़ी हो गयी थी।
लेकिन घर के लोग तो ..
और हम सब लोग ...बच्चियां गुडिया खेलती हैं , उनकी शादियाँ रचाती है ...और देखते देखते उनकी अपनी पालकियां दरवाजे के बाहर आकर खड़ी हो जाती हैं ..
लेकिन उसको सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का था की करन भी उसे बच्ची समझता था ...
वो उसके यहाँ अभी भी उसी तरह बेधड़क आता था लेकिन बस उससे पढाई लिखाई की बातें करने ...या फिर उसे कोई नैन्सी ड्रु या हार्डी ब्वायज टाइप किताबे देने ...जबकि अब वो मिल्स एंड बून पढने लगी थी।
( और मुहल्ले के शोहदों ने कब का सीटिया मार मार कर, उसके उभरते उभारों को घूर घूर कर , कब का उसे बड़ा होने का अहसास दिला दिया था)
दूसरा अफसोस भी उसे करन को लेकर था ...पहले तो बस वो करन के साथ ...अब कितनी लड़कियों ..तितलियों की तरह ...और ख़ास तौर से वो हेड गर्ल ...मुई चिपकी रहती थी , गिरी पड़ती थी जैसे कोई उसे और लड़का ना मिला हो ...
और करन उसे स्कूल में देखता तो बस हाय हेलो ..या पढाई कैसे चल रही है ...
लेकिन रीत के दोनों अफसोस एक दिन एक साथ दूर हो गए .....
ये बात मुझे गुड्डी ने बताई ...उस दिन का एक एक पल उस के जेहन में चस्पा है ...कुछ यादें होती है जो हरदम आपके साथ चलती है ...ये बात बस वैसे ही है लगता है बस कल की बात है
" हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा लें तो .."
ये बात मुझे गुड्डी ने बताई ...उस दिन का एक एक पल उस के जेहन में चस्पा है ...कुछ यादें होती है जो हरदम आपके साथ चलती है ...ये बात बस वैसे ही है लगता है बस कल की बात है
उन दिनों टीवी पर अन्ताक्षरी का बड़ा जोर था ..फिल्मी गानों का
वो लोग करन के घर पर ही थे थे ...
करन , गुड्डी , रीत , करन की एक रिश्ते की भाभी और एक कजिन ...
और करन की उस कजन ने अन्ताक्षरी की बात छेड़ दी ..पर करन ने बहाना बनाया ,,
पांच लोग हैं टीम कैसे बनेगी
तो रीत ने चट जवाब दिया ..वाह ..आप डरते हैं तो बात अलग है ...मैं और भाभी एक साथ हो जाते हैं और आप तीनो एक ओर ..
उस दिन रीत कुछ और शोख लग भी रही थी ..टाप के साथ पहली बार जींस पहन कर आई थी .
करन की कजिन कर से लिपट चिपट कर बोली
हमारे भैया डरने वाले नहीं है ..
करन की भाभी रीत की ओर सरक आयीं और बोलीं ,
" किस अक्षर से करन ने पूछा ..." बात वो भाभी से कर रहा था ...और देख रीत को रहा था
कुछ जोड़ जाड के भाभी ने बोला ...
" ह ...से " और करन तुरंत चालू ...
" हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबु ...हाथ से से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम ना दो ..
सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो ..प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो .."
गा करन रहा था ...नाच रीत की आँखे रहीं थीं ...बड़ी बड़ी कारी कजरारी आँखे
करन के गाना ख़तम होते ही रीत शुरू हो गयी द से
" दीवाना मस्ताना हुआ दिल , जाने कहाँ हो के बहार आई
प म ग म रे ग प म ग म, आआ आ ...सा नी ध प म ग रे सा नी नी नी .
दीवाना "
रीत जैसे सुध उध खो गयी थी। वो तो भाभी ने चिकोटी काटी और कान में छेड़ा ,
" हे अब ऐसा लड़का है तो दीवाना तो हो ही जाएगा दिल ..."
उधर करन भी उसे देख के मुस्करा रहा था .
फायदा करन की कजिन ने उठाया और इ से चालु हो गयी
इन मीना डीका ..
करन और रीत तो बस जैसे सुधबुध खो गए थे ...
और रीत की ओर से भी जवाब भाभी ने दिया जो ज पर पड़ा ...
करन तो बस रीत को देखे जा रहा था ...रीत और भाभी ने छेड़ना शुरू किया
ज १ ज २ ज ३ ...तब जागा करन और रीत की बड़ी बड़ी रतनारी आँखों को देखते हुए गाने लगा सुर में ...छेड़ते हुए
जरा नज़रों से कह दो जी निशाना चूक ना जाए ज़रा नज़रों से कह दो ,,
रीत थोडा शरमाई लेकिन ...भाभी ने उकसाया ...य से पड़ा है जवाब दो ना ..
और रीत ने शुरू किया
ये दिल दीवाना है दिल तो दीवाना है , दीवाना दिल है ये
दिलकश बहारों में , छुप के चनारो में
गा रीत रही थी लेकिन हलके हलके करन भी साथ दे रहा था ..और जैसे उसने सोच के रखा हो ...जैसे रीत रुकी वो चालु होगया ...
" हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा लें तो .."
और बेसाख्ता रीत के मुंह से अगली लाइन निकल गयी ...
" हम मूँद के पलकों को इस दिल को सजा दें तो ..."
और अब करन का नंबर था ...
" इन जुल्फों में हम गुथेगे ये फूल मुहब्बत के ..."
वो बड़ी शरारत से रीत के शोख चेहरे को देख रहा था ...और रीत ने ज़रा सी जुम्बिश दी अपने चेहरे को और अदा से गाया
" जुल्फों को झटक के हम ये फूल गिरा दें तो ...:"
और फिर रीत और करन साथ साथ ये दुयेट गाने लगे ...
करन की भाभी ने छेड़ा ...करन को ..क्या तुम्हे सिर्फ आँखों पे गाने आते हैं ...तो बिना दुबारा बोले वो चालु हो गया
" फूलों के रंग से ..दिल की कलम से ...गुनगुना रहें हैं भंवरे खिल रही है कली कली "
करन की रिश्ते की भाभी और उस की कजिन उठ के बाहर चले गए थे .
रीत भी उठने लगी तो करन ने छेड़ा ..
" हुजूर इस कदर न इतरा के चलिए ..."
गुड्डी बोल रही थी की बस उस समय लग रहा जो ढेर सारी बातें वो एक दूसरे से कहना चाहते थे ..
.और नहीं कह पा रहे थे ...सारे सोते सपने जग गए हों ..
जैसे किसी ने हजारों साल से सोये तालाब में कंकड़ फेंका हो और हजारों कमल खिल उठे हों , लहरा उठें एक साथ.
रीत एक पल लिए दरवाजे पे ठहरी , अपनी लम्बी गर्दन को जुम्बिश दी , और अदा से एक हाथ से चोटी पकड़ के हिलाती हुयी , गुनगुना उठी
बड़े अरमानो से रखा है बलम तेरी कसम ,
हो बलम तेरी कसम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो
पहला कदम ..
पीछे से करन ने आके धीमे से रीत का हाथ पकड़ लिया और साथ में गाने लगा
जुदा ना कर सकेंगे हमे जमाने के सितम ,
हो जमाने के सितम ...
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो
पहला कदम ..
वो दोनों लान में थे और पीछे पीछे गुड्डी ...
करन ने अपने लान में कुछ पीले गुलाब के पौधे खुद अपने हाथ से लगाये थे ...जिसे वो किसी को छूने भी नहीं देता था ..
उसने एक टटका खिला पीला गुलाब रीत की चोटी में टांक दिया ..
लेकिन करन के हाथ में , एक काँटा चुभ गया और खून की एक बूँद छलछला उठी .
देर बिना किये रीत ने वो उंगली अपने मुंह में ले खून चूस लिया ...और अपना रुमाल निकाल के बाँध दिया।
करन ने रुमाल देखा , उसके कोने में .’के ‘काढा हुआ था .
गुड्डी बोली , रीत घर आई लेकि अपना बहुत कुछ छोड़ आई .
घर पहुँच के गुड्डी ने फिर रीत को छेड़ा ...क्यों रीत दी,.... हो गया ..
रीत की आँखे मुस्करायीं , लजाई ...फिर उसने गुड्डी के पीठ पे जोर का धौल मारा और बोली
जब तेरा होगा ना तो बताउंगी ..
गुड्डी भी ..अपनी शरारती आँखे नचा कर बोली ...वाह चोरी किसी ने की आपके दिल की और मार मुझे पड रही है ..
रीत ने प्यार से गुड्डी को जोर से भींच लिया और बोली ...पिटेगी तो तू कस के ...अगर किसी को कुछ भी ..
" क्या दो मैंने तो ना कुछ देखा ना सूना
और दौड़ती हुयी अपने घर चली गयी।
रीत बार बार चोटी झुलाती हुयी , उसमें लगे पीले गुलाब के देखती। उसकी एक पंखुड़ी में खून की एक बूँद लग गयी थी।
रीत ने उसे वहीँ चूम लिया ...और फिर बाहर खिले पीले चाँद को देखती रही और चाँद को देख के फिर उसने चोटी में लगे पीले गुलाब को देखा ...
उसे लगा जैसे करन ने आसमान से पीला चाँद तोड़कर उसकी चोटी में लगा दिया हो ..
वो वैसे ही शीशे के सामने गयी ..और चोटी नचा कर उसने अपने उभारों पर रख दिया ...और अपने को निहारती रही ...
अब उसे लगा वो में सच में बड़ी हो गयी .
फिर सम्हाल कर उसने गुलाब निकाल कर वास में लगा दिया।
अगले दिन रीत चोटी में वो गुलाब लगा के स्कूल गयी ...बहोत छेड़ा सहेलियों ने उसे ...
और उसका नाम पीला गुलाब पड़ गया।
लौटते हुए गुड्डी ने पूछा ..बात कुछ आगे बढ़ी ...तो रीत ने जोर का धौल जमा दिया और बोली ...सबसे पहले तूझे मालूम पडेगा मेरी नानी .
ये वो जमाना था जब अभी फेसबुक और चैटिंग बनारस ऐसे शहरों में नहीं पहुंची थी ...लेकिन दिल थे और उनमें बातचीत भी होती थी ..
तो जैसा गुलजार साहेब ने कहा है
जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
रीत को अपनी जिंदगी का पहला प्रेमपत्र ...तीन दिन बाद मिला ...
लाने वाली वही गुड्डी ..गुड्डी ट्यूशन से लौट रही थी की करन अपने घर के बाहर मिला और गुड्डी को मैथ्स की किताब देके बोला ..ये ले जा के अपनी दी को देना ...लेकिन जब सिर्फ वही हों ..
गुड्डी को रीत से कम ख़ुशी नहीं हो रही थी वो धड धडाते हुए ऊपर रीत के कमरे में पहुँच गयी।
रीत किसी टेस्ट की तैयारी कर रही थी ...और आज गुड्डी ने उसे खींच के अपनी बांहों में भर लिया और बोली ...मेरी ट्रीट ...रीत ने उसे और जोर से भींच लिया और बोली ...कुछ है क्या
गुड्डी धम्म से कुर्सी पे बैठ गयी और बोली ...नहीं क्यों कुछ आना था क्या ..फिर अपने बैग से उसने जो किताब करन ने दी थी वो निकाली ...
रीत ने छीनने की कोशिश की ...तो गुड्डी ने हाथ ऊपर कर लिए ...और बोली पहले ट्रीट ..
" ओके मेरी नानी दूंगी ना पहले इधर ला " और किताब खींच ली फिर गुड्डी से बोली ...अब तू चल।
" क्यों ..वाह ... अरे ना चाय ना पानी ...ना कुछ बात चीत ...और वो पालथी मार के बैठ गयी .
प्लीज चलो ना चलो ना ..अभी ..." रीत बोली .
" अच्छा पहले बस एक बार दो ..बस ज़रा सा "गुड्डी बोली .
दिखा दूंगी ...कल स्कूल जाते समय आना तो पूरा पढ़ा भी दूंगी ...अब तो जा ...और गुड्डी थम्स अप का साइन देते चली गयी
रीत बहुत देर तक उस किताब को तकती रही। मैथ्स की किताब कभी उसे इतनी अच्छी नहीं लगी ...फिर उसने उसे होंठों से लगाकर सीने में भींच लिया , जैसे किताब ना हो करन हो।
सोचती रही हो खोले ना खोले ...एक दो सहेलियों के लव लेटर देखे थे ...ये लड़के कैसे क्या क्या लिखते है सोच के शर्म आती है ..करन ने कही ऐसा कुछ तो नहीं लिखा होगा ..
उसने पन्ने पलटे कोई लिफाफा नहीं था।
तो क्या करन ने सिर्फ किताब भेजी थी ...उसका दिल जोर जोर से धक् धक् कर रहा था।
उसने फिर एक एक पन्ना पलटा ..कम्पाउंड इंटरेस्ट वाले चैप्टर के बाद एक पेज आलमोस्ट चिपका ...
उसपे कुछ शेर प्रिंट थे ..जल्दी से उसने वो पन्ना निकाला , इधर उधर देखा , आँखों से लगाया , चूमा ...लेकिन वो प्रिंटेड पेज ...और जब उसने ..पीछे देखा तो करन की राइटिंग में चंद अल्फाज ..
".शेर फराज साहब के जरुर है लेकिन बाते मेरी है ..तुम्हारे सामने आकर मेर जुबान बंद हो जाती है इसलिए इन शेरो का सहारा ले रहा हूँ .."
रीत बस पागल नहीं हुयी
कीत्ती बार उसने चूमा होगा उन लफ्जों को जो करन ने लिखे थे
और फिर रीत ने पन्ने को पलटा ...और फिर पहला शेर पढ़ा ...और मुस्कराई ...दुष्ट
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
और उसके बाद फिर दूसरा, तीसरा
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है उसके लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पर इल्ज़ाम धर के देखते हैं
एक एक लफ्ज ...
कभी उसे लगता उस गुदगुदी कर रहे हैं , कभी लगता चिकोटियां काट रहे हैं ...
और जब उसने खिडकी से बाहर झांका तो उसे लगा सचमुच चाँद उसे निहार रहा है , एकटक ...और वो अचानक चांदनी में नहा गयी ...
और एक बार उसने अपने होंठो को छुआ तो लगा ...सच में वो गुलाब की पंखुड़ियों को छू रही है ...और फिर उसने आगे पढ़ा ..
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुज़र के देखते हैं
उसकी पूरी देह दहक उठी ..साँसे गरम हो रही थी . उसकी छत से करन का कमरा दिखता था ..रीत ने झाँका . कमरे में अँधेरा था लेकिन उसे लगा पूरी कायनात करन हो गयी है ...
सारी रात ना वो सो पायी ना जग पायी
अगले दिन पूरे दिन , उसे तितलियाँ सताती रहीं ...
उन शेरो ने उसके पूरे जिस्म में जेहन में सपने बो दिए थे ...
एक दो बार स्कूल ने करन दिखा भी ..तो बस निगाहों से दुआ सलाम हुयी लेकिन उसे लगा की पूरा जमाना उन दोनों को घूर रहा है ...कोई उस की सहेली उस से पेन्सिल भी मांगती तो लगता की ...करन के बारे में पूछ ना ले ...
अब उसे ख़त का जवाब भी देना था , समझ में उसके नहीं आ रहा था ...उसे कोई शायरी का इल्म भी नहीं था
..करन ने तो बेईमानी की फराज साहब का सहारा लेकर ...
फिर उसने करन का ही सहारा लिया ...
जो गुलाब उस दिन करन ने उसके बालों में लगया था उस पीले गुलाब की दो सूखी पंखुड़िया ...और फिर मुस्कराकर उसने एक कागज के टुकडे को अपने लबो से लगाया और नीचे अपना नाम लिख कर किताब में रख दिया।
सुबह जब स्कूल में करन दिखा तो तुरंत उसने उसे इशारा किया और बोली
'वो आपकी किताब .."
और उसके कुछ बोलने के पहले उसने झट से बैग से किताब निकाल के ...
उसे पकड़ा दी ..और वापस हो ली . उसकी ऊँगली करन के ऊँगली से छु गयी थी और रीत के पूरे बदन में दावानल दहक़ उठे थे ..वह सच में शोला बदन हो उठी थी।
उसके ख़त का जवाब उसी दिन मिल गया ...वो दोपहर में कैंटीन में अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी ...और एक मेज पर करन अकेला ..तभी करन का कोई दोस्त आके टेबल पे बैठ गया ..और करन ने अपने दोस्त से बिना बात कहा ..
" आज शाम को छुट्टी के बाद सोचता हूँ लाइब्रेरी हो आऊं ."
जिससे ये बात की गयी थी ...वो छूट्टी के बाद भागती दौड़ती , कूदती फांदती , लाइब्रेरी पहुंची।
करन वहां पहले से बैठा था . रीत भी वहीँ बैठ गयी ...थोड़ी देर में एक किताब गिरने की आवाज हुयी ...और करन बोला शायद आपकी किताब गिर गयी है ..
किताब तो वो कोई लाइ ही नहीं थी ...फिर भी उसने झुक के किताब उठायी , कोई पोएट्री की थी ,
अपने बैग में रखी। और जब उसने उस ओर नजर घुमाई ..जहाँ करन था वहां ...अब सन्नाटा था ..सिर्फ मेज पर पीले गुलाब की एक अधखिली कली ..
उसने गुलाब अपने बाल में लगाया और तीर की तरह सीधे घर ...
मम्मी नीचे से आवाजें देती रही लेकिन वो सीधे ...अपने कमरे में ..और सब कुछ छोड़ उसने वो किताब निकाली उसे अपने सीने से लगाया ...और धड़कते दिल से खोला,
अबकी फराज साहब के शेर के साथ ..कुछ सतरें ज्यादा थीं ..
और सारी रात वो उन दहकते शेरों के बिछौने पे सुलगती रही ..अध् जागी आँखों से ख़्वाब देखती रही , करवटें बदलती रही ...
कितनी बार उन शेरो को नहीं पढ़ा होगा उसने ...अब तो उसे याद भी हो गए थे ...लेकिन फिर वो तकिये के नीचे से वो पुर्जा निकालती , हौले से खोलती , पढ़ती और फिर पेट के बल लेट कर ....तकिये को भींच लेती।
तू पास भी हो तो दिल बेक़रार अपना है
के हमको तेरा नहीं इंतज़ार अपना है
ज़माने भर के दुखों को लगा लिया दिल से
इस आसरे पे के इक ग़मगुसार अपना है
"फ़राज़" राहत-ए-जाँ भी वही है क्या कीजे
वो जिस के हाथ से सीनाफ़िग़ार अपना है
लेकिन वो छुई मुई वाले दिन जल्दी ही गुजर गए।
एक दिन किसी लड़की ने कहा की आज शाम को इंटर हाउस डिबेट है चलना है ...दूसरी बोली जीतेगा तो अपने हाउस का करन ही ...और उसका नाम सुनते ही रीत को सौ बिछुओं ने एक साथ डंक मार लिया ...
" कब कित्ते बजे ..." उचक कर उसने पूछा। और सब एक साथ हंस पडीं ..
" तुझे डिबेट में कब से दिलचस्पी होने लगी ...तू तो कहती थी बहुत बोरिंग होता है ..."
रीत कुछ नहीं बोली ...जान कर भी सब उसके पीछे ....लेकिन शाम को वो डिबेट में थी।
बाकी समय तो वो उंघती रही लेकिन जब करन का नम्बर आया उसके कानो ने एक एक शब्द पी लिया ...और फिर क्या तालियाँ बजाई ...और जब जीत का ऐलान हुआ ...उस समय तो उसने आसमान सर पर उठा लिया
और फिर तो तो सब लडकियां रीत के पीछे पड गयीं ट्रीट ट्रीट ..वो लाजवंती क्या बोलती तो उन नदीदी और शरीर लड़कियों ने , करन के ऊपर धावा बोल दिया और गुड्डी भी उसमें शुमार थी .
कैंटीन में रीत की किसी सहेली ने बोल दिया " कल रीत का बैडमिन्टन मैच है "
रीत ने बात बनायीं ...अरे कौन सा फाइनल है ..लीग मैच ही तो है ...
लेकिन अगले दिन करन वहां हाजिर था
और फिर कोई डिबेट क्विज इलोक्युशन ...ऐसा हो नहीं सकता था की करन पार्टिसिपेट कर रहा हो और रीत वहां ना हो
और बैडमिन्टन , स्वीमिंग पेंटिंग , डांस, म्यूजिक कम्पटीशन हो ...जिसमें रीत हो और करन ना हो
लोग कहते हैं इश्क चाँद की तरह होता है ...या तो बढ़ता है या घटता है ...
और यहाँ तो शुक्ल पक्ष अभी लगा ही था.
गुड्डी ने बताया की ...वो परवान चढ़ा जब वो लोग लखनऊ गए एक इंटर कालेज कल्चरल फेस्ट में ...
एक तो अपने शहर से दूर , दूसरे लखनऊ वैसे भी मुहब्बत ...और शायरी के लिए मशहूर ..
फेस्ट ल मार्टीनयर स्कूल में था ...और रीत का स्कूल कभी तीसरे चौथे नंबर से ऊपर नहीं आ पाता था. पहले और दूसरे नंबर पे लखनऊ और नैनीताल के कान्वेंट स्कूल ही अक्सर रहते थे .
पहले तो हेड गर्ल ने बहोत नाक भौं सिकोड़ी की कोई नाइन्थ की लड़की जाय ...लेकिन करन की जिद और आधी इवेंट्स में तो वही पार्टिसिपेट करने वाला था
लास्ट इवेंट के पहले तक उनका कालेज चौथे नंबर पर था। लेकिन सबसे ज्यादा बड़ी इवेंट अभी बाकी थी ,
म्यूजिकल क्विज की। रीत ने चार इवेंट में भाग लिया वो एक में फर्स्ट आई थी , वेस्टर्न डांस में , इन्डियन क्लासिकल और फ़िल्म में सेकेण्ड और वेस्टर्न म्यूजिक में थर्ड। करन तीन इवेंट में फर्स्ट आया था और दो में सेकेण्ड ..
म्यूजिकल क्विज की इवेंट पचास नम्बर की थी और इसके तीन राउंड थे
फर्स्ट राउंड के तीस नम्बर थे ...और इसमें फर्स्ट फोर टीम ...सेकेण्ड और थर्ड राउंड में भाग ले सकती थीं।
लेकिन वो राउंड आप्शनल थे और उसमे दस नम्बर मिलते जीतने वाली टीम को और लास्ट आने वाली दो टीम के पांच नम्बर कट जाते . थर्ड राउंड में सर्प्राइज पैकेट भी होता था .
म्यूजिकल क्विज शुरू हुयी और उसमें रीत करन और वो हेड गर्ल तीनो ने भाग लिया ...इस राउंड में तीन की टीम थी .
और इसमें रीत का स्कूल फर्स्ट आगया .
अब ओवर आल रैंकिंग में वो लोग तीसरे पे आ गए थे .
झगडा था नेक्स्ट राउंड में भाग लें की नहीं ...दोनों राउंड इन्डियन फ़िल्म म्यूजिक पर थे ..
हेड गर्ल बोली ...हमें नहीं पार्टिसिपेट करना चाहिए ...अभी हमारी थर्ड पोजीशन तो सिक्योर है ..अगर कही निएगेटिव नंबर मिल गए तो हम फोर्थ पे पहुँच जायगे ...
लेकिन करन बोला यार नो रिस्क नो गेन ...और रीत को लेके पहुँच गया एंट्री देने ..
चार टीमें थी... लखनऊ के दो कालेज लोरेटो और ल मार्टिनियर , नैनीताल से शेरवूड स्कूल
ये राउंड रिटेन था ...और तीन पार्ट में ..स्क्रीन पे एक सब्जेक्ट आता ..और कुछ कंडीशन और सारी टीमों को कागज पे लिख के देना होता
सबकी निगाहें स्क्रीन पे गडी थी ...और एक ट्रेन की फोटो आई ...
सब लोग वेट कर रहे थे ट्रेन के बारे में पिक्चर का नाम ...लेकिन जब डिटेल्स आये तो फूँक सरक गयी ...
ट्रेन बे बेस्ड हिंदी गाने ...ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मो के , फ़िल्म और म्यूजिक डायरेक्टर के नाम के और पांच मिनट में जो टीम सबसे ज्यादा गानों के नाम लिखती वो फर्स्ट
आडियेंस में बैठी लड़के लड़कियों ने जोर से बॊऒ किया ,,,ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मो के गाने ..
करन ने भी परेशान होकर रीत की ओर देखा ...लेकिन रीत कागज़ कलम लेके तैयार ...और जैसे ही अनाउंस हुआ
योर टाइम स्टार्टस नाउ ...
उसने लिखना शुरू किया ...एक दो गाने करन ने भी बताये ..
और पांच मिनट के बाद
पांच मिनट ख़तम होते ही लिस्ट ले ली गयी।
पहली टीम ने सिर्फ पांच गाने लिखे थे ..उसमें से एक क्विज मास्टर ने कैंसल कर दिया ...छैयां छैयां ...कलर्ड होने के कारण यानी सिर्फ चार
दूसरी टीम उसी स्कूल की थी ल मार्टिनियर और क्लैप भी उसे सबसे ज्यादा मिल रहे थे ...उस की लिस्ट में छ गाने थे सारे सही ..
खूब जोर से क्लैप हुआ ...ब्लैक एंड व्हाईट ...और वो भी एक सब्जेक्ट पे
अगला नम्बर लोरेटो का था ...उसके आठ गाने थे ...और अबकी वहां की लड़कियों ने आसमान सर पर उठा लिया ..उनकी जो कान्टेसटेंटस थीं वो दो बार बार्न वीटा क्विज के फाइनल में पहुँच चुकी थीं ..
और एक बार सेकेण्ड भी आई थीं।
अब तय होगया की इन लड़कियों ने जीत लिया मैदान ...वो हाथ हिलाकर लोगो को विश कर रही थीं
अब क्विज मास्टर इन लोगो की लिस्ट चेक कर रहा था ...और कुछ अनाउन्स नहीं कर रहा था ..
उधर आडियेंस शोर कर रही थी रिजल्ट रिजल्ट ...
उन लोगो के बारह गाने थे ...
चौथी आई टीम शेरवूड नैनीताल आउट हो गयी थी ..उसे निगेटिव प्वाइंट मिल गए ...
लेकिन लोग मानने को तैयार नहीं थे ...
सिर्फ लोरेटो की दोनों लड़कियों ने रीत और करन से हाथ मिला कर विश किया ..
क्विज मास्टर ने रीत को इशारा किया की वो अपनी लिस्ट पढ़ कर सुनाये ..
और रीत शुरू हो गयी ..फ़िल्म के नाम के साथ
१. है अपना दिल तो आवारा - सोलवां साल
२. अपनी तो हर आह एक तूफान है -काला बाजार
३. देखोजी एक बाला जोगी - चाइना टाउन
४. दिल थाम चले हम आज किधर -लव इन शिमला
५ .बदल जाये अगर माली - बहारें फिर भी आएँगी
६ औरतों के डिब्बे में मर्द आ गया - मुड मुड के ना देख
७ हमको समझ ना लीजिये -कल्पना
८ तूफान मेल दुनिया ये दुनिया ...जवाब
९ .आई बहार आई बहार ..
और जैसे ही आठ की संख्या पार हो गयी ...आडियेंस का शक भी ख़तम होगया क्विज मास्टर को भी अगले राउंड की ओर बढ़ना था ..
रीत करन का स्कूल फर्स्ट डिक्लेयर हो गया ...
लेकिन अभी दो पार्ट और बाकी थे ...
नेक्स्ट पार्ट वीडयो और बजर राउंड था .. पांच क्लिप्स थीं ...
पहली क्लिप्स शुरू होते ही करन ने बजर दबा दिया ..उसे क्विज का बहुत एक्सपीरिएंस था। जवाब भी सही था
..दूसरी क्लिप्स पे लोरेटो वाली लड़कियां जीतीं एक अंग्रेजी फ़िल्म की क्लिप थी ...एक्टर्स के नाम बताने थे ..
और जैसी ही तीसरी क्लिप आई ...रीत ने बजर दबा दिया ..एक ट्रेन में कुछ लोग गा रहे थे ...लेकिन गाना साइलेंट पे था ...
क्विज मास्टर ने घूर के देखा और बोला मुझे क्वेश्चन तो पूछ लेने दो ...और इस क्लिप पे एक स्पेशल अवार्ड भी है ...सवाल ये नहीं है की गाना क्या है ..सवाल है सिंगर और फ़िल्म दोनों ...
रीत ने बिना रुके बोला ..फिल्म डाक्टर और सिंगर पंकज मालिक ...
ओके यू गाट इट राईट एंड स्पेशल क्वेश्चन ...नो मार्क्स ...बट इफ यु गेट इट राईट ...वेरी स्पेशल अवार्ड ...
एंड स्पेशल क्वेश्चन इज ...व्हाट इज स्पेशल इन दिस सांग ...ट्वेंटी सेकेंड्स ..
रीत ने एक पल सोचा , करन को देखा और जवाब दे दिया ...फर्स्ट टाइम अ सोंग हिज बीन शॉट इन अ मूविंग ट्रेन ..
और जैसे ही क्विज मास्टर ने सही का इशारा दिया ..पूरा हाल तालियों से गूँज उठा।
रीत ने बस करन का हाथ दबा दिया। चौथी क्लिप भी लोरेटो के लड़कियों ने जीती स्कोर २-२
आखिरी क्लिप फिर एक इंग्लिश फ़िल्म की थी एक ट्रेन में मर्डर ..
लेकिन अबकी उन लोगो ने वेट किया क्विज मास्टर का ..उसने बोला ...इस पिक्चर का नाम ...नहीं बताना है ..नाम है मर्डर इन ओरिएण्टल एक्सप्रेस ...हम सब को मालुम है ...ये ट्रेन कहाँ से कहाँ तक चलती थी ये बताना है ...अबकी बजर किसी ने नहीं दबाया ..
रीत ने करन से कुछ खुसफुस की ..और करन ने जवाब दे दिया .. और वो लोग ये राउंड भी जीत गए।
और अब जब नमबर जोड़े गए तो उनका स्कूल दूसरे नम्बर पर आ गया था ...पहले नम्बर पर लोरेटो कान्वेंट ...तीन नम्बर आगे ओवर आल नम्बर में ...
इसके बाद म्यूजिकल क्विज का फाइनल राउंड था ...उसमें सिर्फ दो टीमें भाग ले सकती थी ...उनकी टीम और लोरेटो ...
ये सबसे टफ राउंड भी था ...
और स्क्रीन पर कंडीशंस आयीं ..
१. पचास के दशक का गाना
२. ब्लैक एंड व्हाईट
३ डुएट
४ तीन अलग अलग संगीत कारों के ...जिनकी चिट निकाली जायेगी ..
रीत करन की चिट में रोशन , ओ पी नय्यर और शंकर जयकिशन निकले .
एक बार करन को थोड़ी घबडाहट हुयी लेकिन अबकी रीत ने उसका हाथ दबा दिया ...
सबसे पहले उन्होंने
मांग के हाथ तुम्हारा , मांग लिया संसार ...ओ पी नय्यर का गाया और पूरा हाल तालियों से गूँज उठा
उसके बाद शंकर जयकिशन का ,
याद किया दिल ने कहाँ हो तुम ...
सबसे अंत में रोशन का संगीत दिया मल्हार का रीत का फेवरिट ..और वैसे भी करन , मुकेश के गाने बहुत अच्छा गाता था। रीत ने लता - मुकेश का दुयेट शुरू किया
बड़े अरमानो से रखा है बलम तेरी कसम, हो बलम तेरी कसम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो, पहला कदम
और फिर करन ...
जुदा न कर सकेंगे हमको ज़माने के सितम
हो ज़माने के सितम ,प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो, पहला कदम
पूरा हाल तालियाँ बजा रहा था ...लेकिन रीत और करन सुधबुध खोये , मुस्कराते एक दूसरे को देखते गा रहे थे , जैसे बस वहीँ दोनों हाल में हो ...जब गाना आखिर में पहुंचा
मेरी नैया को किनारे का इन्तजार नहीं
तेरा आँचल हो तो पतवार की भी दरकार नहीं
तेरे होते हुए क्यों हो मुझे तूफान का गम
प्यार की दुनिया में ये पहला कदम हो, पहला कदम
सारा हाल खड़ा हो गया ...स्टैंडिंग ओवेशन ...
उन्हें दस में दस मिले ...और इस गाने के लिए भी एक स्पेशल अवार्ड ..
उनका कालेज पहली बार इस फेस्ट में फर्स्ट आया था ..
गुड्डी बोली की जब वो दोनों लौट कर आये तो बस कालेज में ....छा गए।
घर लौटते हुए गुड्डी ने रीत से पुछा ..' कुछ हुआ "
और जवाब में जोर का घूंसा ...गुड्डी की पीठ पे पड़ा।
गुड्डी जोर से चिल्लाई ..फिर पूछा ..
" कुछ बोला उसने "
रीत मुस्कराती रही ..
" बोल ना आई लव यू बोला की नहीं " गुड्डी पीछे पड़ी रही।
" ना ..." रीत ने मुस्करा के जवाब दिया
" कुछ तो बोला होगा ..." गुड्डी पीछे पड़ी थी।
" हाँ ...रीत ने मुस्कराकर जुर्म कबूल किया ...वो बोला ..मुझे तुमसे एक चीज मांगनी है ..."
अब गुड्डी उतावली हो गयी बोल ना माँगा उसे दिया तुमने की नहीं ..
रीत बिना सुने बोलती गयी " मैंने बोला मेरे पास तो जो था मैंने बहोत पहले तुम्हे दे दिया है ...मेरा तो अब कुछ है नहीं ...फिर हम दोनों बहुत देर तक चुपचाप , बिना बोले , हाथ पकड़ के बातें करते रहे ."
" बिना बोले बातें कैसे ..." गुड्डी की कुछ समझ में नहीं आया .
" तू बड़ी हो जायेगी ना तो तेरे भी समझ में आ जायेंगी ये बातें ..."
हँसते हुए रीत बोली ...उस का घर आ गया था .
बस एक बात उसे रोकते हुए गुड्डी बोली ..." किस्सी ली उसने ...'
एक जोर का और पड़ा गुड्डी की पीठ पे और रीत धडधडाते हुए ऊपर चल दी ..लेकिन दरवाजे से गुड्डी को देखते हुए मीठी निगाहों से , हलके से हामी में सर हिला दिया ...
गुड्डी ने बोला , रीत ने बाद में बताया था ...एक बहोत छोटी सी ..गाल पे ...लेकिन वो पागल हो गयी थी , दहक़ उठी थी .
दिन सोने के तार से खींचते गए ...
करन का आई एम् ए ( इंडियन मिलेट्री अकेडमी ) देहरादून में एडमिशन हो गया।
ये खबर भी उसने सबसे पहले रीत को दी।
और स्टेशन उसे छोड़ने उस के घर के के लोगों के साथ रीत भी गयी और भी कालेज के बहुत से लोग ..मुहल्ले के भी।
गुड्डी ने हंस कर बोला ...जो काम पहले वो करती थी ...डाक तार वालों ने सम्हाल लिया। और बाद में इंटर नेट वालों ने ...मेसेज इधर उधर पहुंचाने का
गुड्डी उसकी अकेली राजदां थी .
लेकिन वो दिन कैसे गुजरते थे ...वो या तो रीत जानती थी या दिन ...
अहमद फराज साहब की शायरी का शौक तो करन ने लगा दिया ...और दुष्यंत कुमार उसने खुद पढना शुरू कर दिया ...
कविता समझने का सबसे आसन तरीका है इश्क करना , फिर कोई कुंजी टीका की जरुरत नहीं पड़ती ..
जो वो गाती गुनगुनाती रहती थी ...उसने करन को चिट्ठी में लिख दिया
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे
हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे
मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे
जब वह करन को स्टेशन छोड़ने गयी थी ...
तो करन ने उसे धर्मवीर भारती की एक किताब ले कर दे दी थी ...और जब कोई विरह में हो तो संसार की सारी विरहणीयों का दुःख अपना लगने लगता है ...
वह बार बार इन लाइनों को पढ़ती , कभी रोती ...कभी मुस्कराती
कल तक जो जादू था, सूरज था, वेग था
तुम्हारे आश्लेष में
आज वह जूड़े से गिरे जुए बेले-सा
टूटा है, म्लान है
दुगुना सुनसान है
बीते हुए उतस्व-सा, उठे हुए मेले-सा -
मेरा यह जिस्म -
टूटे खँडहरों के उजाड़ अन्तःपुर में
छूटा हुआ एक साबित मणिजटित दर्पण-सा -
आधी रात दंश भरा बाहुहीन
प्यासा सर्वीला कसाव एक
जिसे जकड़ लेता है
अपनी गुंजलक में
अब सिर्फ मै हूँ, यह तन है, और याद है
मन्त्र-पढ़े बाण-से छूट गये तुम तो कनु,
शेष रही मैं केवल,
काँपती प्रत्यंचा-सी
विरह के पल युग से बन जाते ...वो एक चिट्ठी पोस्ट करके लौटती तो दूसरी लिखने बैठ जाती ...
और उधर भी यही हालत थी करन की चिट्ठी रोज ..
.जिस दिन नहीं आती ...गुड्डी उसे खूब चिढाती ..देख के आती हूँ ...कही डाक तार वालों की हड़ताल तो नहीं हो गयी
और जब करन आता ...तो काले कोस ऐसे विरह के पल ...कपूर बन कर उड़ जाते ...लगता ही नहीं करन कही गया था स्कूल और मुहल्ले की खबरों से ले कर देश दुनिया का हाल ...
बस जो रीत उसे नहीं बताती ...वो अपने दिल का हाल ..
लेकिन शायद इसलिए ..की ये बात तो उसने पहले ही कबूल कर ली थी की अब उसका दिल अपना नहीं है
आई एम् ए से वो लौट कर आया ...तो सबसे पहले रीत के पास ...वो भी यूनिफार्म में ..
और उसने रीत को सैल्यूट किया ...
गुड्डी वहीँ थी ..रीत ने उसे बाहों में भीच लिया ...
दोनों कभी हँसते कभी रोते ..
रीत हाई स्कूल पास कर एलेव्न्थ में पहुँच गयी
करन की ट्रेनिंग करीब ख़तम थी
उसे बस पासिंग आउट परेड में जाना था ..
और फिर वो हुआ जो नही होना चाहिए था ...
रीत की छुट्टियां चल रही थी ..क्योंकि उसके कालेज में बोर्ड के इक्जाम का सेंटर था
फागुन का महीन था ..
फागुन वो भी बनारस का ..
अंदर और बाहर दोनों ...पलाश दहक रहे थे ...कित्ते दिन बाद करन आया था ..
रीत उस बार करन को छोड़ने नहीं गयी स्टेशन ....
उसे अपने पैरेंट्स के साथ मंदिर जाना था ..मनौती उसने करन के लिए ही मानी थी
उसे बेस्ट कैडेट का अवार्ड मिले ...
बस उसके घर के सामने उसने उसे छोड़ दिया ...और रीत के नैन दूर तक उसके साथ गए .
रीत पैरेंट्स के साथ संकट मोचन चली गयी
और करन अपने पेरेंट्स के साथ स्टेशन ..
रीत का पैरेंट्स के अलावा कोई नहीं था ...कोई दूर का रिश्तेदार भी नहीं ..
करन भी अपने घर में अकेला था ..
अगले दिन अखबार की हेड लाइन थी ...
७ मार्च , मंगलवार
दो बाम्ब ब्लास्ट , अट्ठाईस लोग मरे , सौ से ऊपर घायल
कम से कम दस लोगों के शव मंदिर में पड़े ..चालीस से उपर घायल , कैंट स्टेशन पर भी जोरदार धमाका ...अठारह से बीस लोगों के स्टेशन पर मरने की आशंका ,
मंदिर में मरने वालों में आठ महिलायें जिनमें तीन लडकिया ..कईयों की पहचान करना असंभव
और इसके बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं थी ..
मुख्यमंती की ओर से पैसे का ऐलान था ...और लोगों से शान्ति बनाये रखने की अपील थी ..
कुछ और राष्ट्रीय अन्तर राष्ट्रीय प्रतिक्रियाये थीं ..
Indian Prime Minister Manmohan Singh condemned the blasts and appealed for calm. India's Cabinet Committee on Securitymet in emergency session.
Chief Minister Mulayam Singh Yadav announced an ex gratia relief for the victims and appealed to the people to maintain peace and order.
In a statement in Lucknow, he said the culprits would not be spared. ``Stern action will be initiated against all those found involved in the incident.''
He announced an ex gratia of Rs. 5 lakh to those killed in the blasts, Rs. 1 lakh to those seriously injured and Rs. 50,000 to those with minor injuries.
Australian Prime Minister John Howard said in Sydney that the incident reminds the need for both India and his country to work together in the fight against the scourge of terrorism.
: British Foreign Office spokesman Kim Howells said the UK remained determined to work closely alongside India in its fight against the evil of terrorism. "I was horrified to hear of today's bombings in Varanasi, which resulted in the loss of innocent lives, and injury to many other victims.
United States Condemned the blasts calling them "acts of terrorism."
कुछ जो जिन्दा बचे थे उनकी हालत मरने वालों से कम बदतर नहीं थी .
रीत उनमे से एक थी .
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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