FUN-MAZA-MASTI
फागुन के दिन चार--91
गतांक से आगे ...........
रीत - करन II
शेष रही मैं केवल,
अब तक आपने पढ़ा
अब सिर्फ मै हूँ, यह तन है, और याद है
मन्त्र-पढ़े बाण-से छूट गये तुम तो कनु,
शेष रही मैं केवल,
काँपती प्रत्यंचा-सी
अगले दिन अखबार की हेड लाइन थी ...
७ मार्च , मंगलवार
दो बाम्ब ब्लास्ट , अट्ठाईस लोग मरे , सौ से ऊपर घायल
कम से कम दस लोगों के शव मंदिर में पड़े ..चालीस से उपर घायल , कैंट स्टेशन पर भी जोरदार धमाका ...अठारह से बीस लोगों के स्टेशन पर मरने की आशंका , मंदिर में मरने वालों में आठ महिलायें जिनमें तीन लडकिया ..कईयों की पहचान करना असंभव
..
कुछ जो जिन्दा बचे थे उनकी हालत मरने वालों से कम बदतर नहीं थी .
रीत उनमे से एक थी .
आगे
रीत जब अपने पैरेंट्स के साथ पहुंची तो मंदिर में बहुत भीड़ थी।
एक तो मंगल ,और दूसरे बोर्ड के एक्जाम चल रहे थे तो सारे इम्तहान देने वाले लड़के लड़कियां ...
और रीत ने देखा की वहीँ ...
एक शादी भी चल रही थी ...नेपाली दुल्हा दुल्हन ..बहोत यंग ..खूब सजे धजे ...और साथ में घर वाले ..बाजे वाजे बज रहे थे ...उसने पहली बार मंदिर में शादी देखी थी ,,, खूब खुश लग रहे थे ...
दूल्हा ...बस लालचियों की तरह दुलहन को घूरे जा रहा था ...
रीत मन ही मन सोच कर मुस्कराई ...मिलेगी मिलेगी ..क्यों इतने ललचा रहे हो ..सारे लड़के न ऐसे ही नदीदे होते हैं ..बेसबरे ...देखता तो करन भी ऐसे ही है ...
उस के आँख में लड़के की जगह करन और लड़की की जगह अपनी तस्वीर घूम गयी ...
इसे कहते हैं टाइमिंग ...उसी समय करन का मेसेज आया ...वो लोग स्टेशन पहुँच गए है ..शिवगंगा प्लेटफार्म पर लगी हुयी है ...गाड़ी चलने पर रिंग करेगा
सुन रीत ...क्या सोच के मुस्करा रही है ...उस की मम्मी ने ध्यान खींचा।
बहुत भीड़ है तू जाके प्रसाद ला हम लोग यहीं वेट करते हैं
लड़के लडकियों की भीड़ के बीच धक्का मुक्की करते रास्ता बनाते ...वो प्रसाद की दुकान तक पहुँच गयी। वहां भी खचाखच भीड़ ...
उसने वहीँ लगे नल से हाथ धोया ...और दूकान से प्रसाद के लिए लड्डू लिया , और वापस मुड़ी ..
तभी ..
बहोत जोर का धमाका हुआ .
रीत को लगा उसके कान के परदे फट गए ...
वह वहीँ भहरा कर गिर पड़ी .
एक खम्बे से उसके माथे में जोर से चोट लगी ..
बस उसे इतना याद है,
उसे ये भी याद नहीं की वो बेहोश हुयी थी की नहीं
थोड़ी देर में जब उसकी आँख खुली ..तो चारो ओर कुहराम ..भगदड़ . टूटी हुयी बेंचे ...धुंवा ...गिरे हुए लोग ...बहता हुआ खून .
और उसकी निगाह वहीँ पड़ी ..जहां वो दूल्हा दुल्हन थे शादी हो रही थी ...
दुलहन की चुनर खून में डूबी ..वो गिरी ...बस एक मांस के लोथड़े की तरह ..लेकिन उसके कुहनी तक चूड़ी और कंगन से भरे हाथ में ...अभी भी दुल्हे का हाथ था ...दुल्हे के शरीर से अलग
दुल्हे की बाड़ी दूर छिटकी पड़ी थी।
उसके आस पास भी गिरे पड़े थे लेकिन ज्यादा चोट किसी को नहीं थी ...
तभी उसे याद आया की मम्मी पापा भी तो वहीँ थे ...
रीत जोर से चीखी ..." मम्मीईईईईई "
किसी तरह खम्बे का सहारा लेकर उठ कर खड़ी हुयी ...
उसके पैर में भी चोट आई थी ..
लंगडाते घिसटते उधर की और चल पड़ी जिधर उसने मम्मी पापा को छोड़ा था ...
सम्हल के कोई पीछे से चिल्लाया ...
वहां खून इतना फैला था की फर्श पर फिसलन हो गयी थी ...उसके सामने दो लोग वहां फिसल कर गिर पड़े थे .
पास से गुजर रहे किसी आदमी ने बोला ...
" सरवा ...बहुत जबर बम्ब फोडले हौ ...बी एच यु तक आवाज गईल ..."
वो घायलों को लांघते छ्लान्गते ...वहां पहुंची जहां उसने मम्मी पापा को छोड़ा था ...
और वहां पर तो पूरा ढेर एक पर एक ...
कुछ घायल थे , कुछ मरणासन्न थे और ..कुछ बस बाड़ी ...
तब तक और हल्ला हुआ कुछ पुलिस वाले आ गए थे , लोगों को हटा रहे थे
बोल रहे थे ...देखने दीजिये ...और भी बम हो सकते हैं ...गौदौलिया में अभी एक बम्ब और मिला है ...और भीड़ के धक्के के साथ वो पीछे आ गई ...
लेकिन लांघते , छ्लांगते , वो फिर वहीं पहुँच गयी
अब वहां मंदिर के कुछ पुजारी ...कुछ लड़के आ गए थे ...और वो चादर को स्ट्रेचर की तरह बना के घायलों को ले जा रहे थे ...और बाडीज ..को एक तरफ रख रहे थे ...उसने पहले उनसे इशारे से एक ढेर की ओर इशारा किया ...मम्मी पापा को उसने वहीँ छोड़ा था।
तभी उसने दूबे भाभी को देखा ...वो लगता है अभी आयीं थीं ...
दूबे भाभी गुड्डी के घर के नीचे रहती थीं ...और उसी के मुहल्ले की होने की वजह से उसे अच्छी तरह जानती थीं।
उन्होंने उसे दुबका लिया और हलके से पूछा , मम्मी ?
रीत ने सिर्फ सर हिलाया और उंगली से उधर इशारा किया ...जिधर वो ढेर था ...
दूबे भाभी रीत का हाथ पकड़ कर लोगों के शरीर , कराहते घायलों को लांघती वहां पहुँच गयी , और एक पुजारी से रिक्वेस्ट की ,
" पंडित जी एह बिटियवा के माई बाप ...."
पुजारी ने उधर एक बार निगाह डाली , बड़ी निराशा से दूबे भाभी की ओर देख के सर हिलाया।
लेकिन दूबे भाभी ने फिर बोला और वो वहां से उठाने में जुट गया ...
सब नि;शेष शरीर ..
रीत पैर पकडती और वो पुजारी हाथ और,... उठा के वहीँ किनारे रखते जाते
चार को हटाने के बाद के बाद उसे मम्मी दिखीं ...नाक के पास से खून निकलते हुए बस जम गया था ...
पुजारी ने झुक कर उलटे हाथ पे सांस महसूस की और दूबे भाभी की ओर ना के इशारे में सर हिलाया।
लेकिन दूबे भाभी ने खुद झुक के उनकी नाडी चेक की ...फिर दूसरे हाथ की ...जैसे उन्हें विश्वास नहीं हो रहा हो
...उस हाथ के कंगन के पास भी बहुत खून जमा था ...और सर हिलाकर रीत की ओर देखा ...
उनकी निराश आँखों ने सब कुछ कह दिया ...
मम्मी का सर और धड पापा के उपर था .
बाकी बाडीज की तरह , उसने मम्मी का पैर पकड़ा ...और पुजारी ने हाथ ...और किनारे रख दिया।
पापा के शरीर पर चोट का कोई निशान ऊपर नजर नहीं आ रहा था ...उसे कुछ उम्मीद नजर आई ...
लेकिन उसके पहले वो पुजारी ही झुक कर सांस देखी और साथ में स्ट्रेचर वाले को बुलाया ...दूबे भाभी ने भी एक नाडी पकड़ी ...और रीत ने भी ..
लेकिन कुछ नहीं बचा था
तभी लोगो ने देखा ...सर के पीछे जमींन पर ढेर सारा खून ...कुछ जम गया था ...कुछ अभी भी गीला था
तबतक वहां ढेर सारे पुलिस वाले , अम्बुलेंस , सरकारी गाड़ियाँ आ गयीं।
एक पुलिस का इंस्पेक्टर आया और उन लोगो को हटाने लगा ...
चलिए चलिए ..हटिये सारी बाडीज मार्चरी जायेंगी ...
तबतक पुजारी ने उस के कान में कुछ कहा ...
और उस ने ..बाडी ..पापा ... की ओर देखा ...और पहचान लिया
रीत के पापा बनारस क्या पूरे पूर्वांचल के सबसे मशहूर वकील थे ...
अब उस ने रीत की ओर देखा ..और आप ...धीमे से बोला ..
दूबे भाभी बोलीं ...वकील साहेब की लड़की ...
रीत ने पूछा ...हलकी आवाज में ...हम लोग ले जा सकते हैं ...इनको ...मम्मी पापा को ..
सब लोग चुप थे लेकिन फिर इन्स्पेक्टर ने बोला , " हमारी मज़बूरी है , पोस्ट मार्टम करना होगा ...सबसे पहले आपका ही ....कोई आ जाय दस ग्यारह बजे दिन में ..."
तब तक दो मजिस्ट्रेट और सिटी एस पी आ गए थे ...
इंस्पेक्टर ने रीत के पापा की बाड़ी की ओर इशारा किया ...उन लोगो ने भी पहचान लिया।
तब तक कुछ होमगार्ड वाले बाड़ीज को उठा उठा कर पी ऐ सी की ट्रक में रख रहे थे ...जब वो रीत के पापा को ...
मजिस्ट्रेट ने बोला ..सम्हालकर ...
रीत पत्थर की हो गयी थी।
चारो ओर चीख पुकार रोने चिल्लाने की आवाज ...
लेकिन उस की आँख से ना आंसू निकला ना मुंह से बोल ...
वह खड़ी थी इसलिए जिन्दा लग रही थी ...
थोड़ी देर में पूरा इलाका खाली हो गया ...डेड बाडीज , घायल , बचे लोग ..सब चले गए
कुछ तमाशबीन थे , पुलिस उन्हें भी हटा रही थी .
अब सिर्फ बाम्ब डिस्पोजल स्क्वाड वाले , फोरेंसिक टीम , इन्वेस्टिगेशन टीम यही लोग चारो ओर दिख रहे थे ...
और इधर उधर बिखरी चप्पले , जमा बिखरा खून ..
और उन सबके बीच रीत पत्थर की ...
दो बार दूबे भाभी ने उसे चलने का इशारा किया ..एक दो बार पुलिस वालों ने भी बोला ..
लेकिन वह संज्ञा शुन्य हो गयी थी
तभी एक पुलिस इंस्पेक्टर आया, चेतगंज थाना में था और उन लोगो के पास दूबे भाभी के पास रुका ...उनका कोई सम्बन्धी था , और उनको प्रणाम करने के बाद बोला ..
"रेलवे स्टेशन पे तो इससे भी ज्यादा तबाही है ..शिवगंगा में ..स्टेशन पे भी बम फटा है ...बाडी बिछी पड़ी है" ...
दूबे भाभी को कुछ याद आया और रीत को जोर जोर से हिलाते हुयें बोली ...
" हे सुन ...आज करन को जाना था ना शिवगंगा से ...उसके मम्मी पापा छोड़ने गए थे ना उसको ..."
अब रीत होश में आई ..." क्या हुआ करन को "
जवाब इंस्पेक्टर ने दिया ...अईसे बम शिवगंगा ट्रेन और कैंट स्टेशन में भी फूटा है ...बहूत हालत खराब है आप का कोई परिचित था क्या स्टेशन पे ...ट्रेन में ...
हाँ ...रीत की धड़कन फिर से चल रही थी ..
चलिए फिर मेरी बाइक पे बैठ जाइये ...वैसे तो घुसना मुश्किल होगा वहां ...
और रीत उस के बाइक पे बैठ गयी ...वो दुबे भाभी से बोला अच्छा बुआ चलते हैं ...लौट के इनको आप के याहं छोड़ देंगे ...रेक्शा वेक्सा तो मिलेगा नहीं ...
दूबे भाभी बोलीं ...ले जा भैया ...कम से कम उन्हा सब ठीक होय ...करन क कुछ न हुआ हो ..
रीत भी रास्ते भर यही मनाती रही ...
सभी देवता पित्तर , गंगा मैया की आर पार की चुनरी ..क्या क्या नहीं मान लिया उसने ...और बस वो वही बुदबुदा रही थी ...
करन ठीक है ...करन ठीक है , करन को कुछ नहीं हुआ है ...करन को कुछ नहीं हो सकता ...
रस्ते भर सन्नाटा पसरा था सब दुकाने बंद ...कोई रिक्शा गाडी कुछ नहीं ...
सिरफ चीखती अम्बुलेंस ...सायरन बजाती पुलिस की गाडिया और एक दो मीडिया वान ...जव वो स्टेशन पहुंची ...पहला सवाल उसने यही पूछा कोई कुली था ...शिवगंगा ...
वो बिना रुके बोला दो घंटे बाद जायेगी ...लेकिन जायेगी ...
और वो बम वाली बात ..शिवगंगा में ...रीत की धड़कन तेजी से चल रही थी ..
अब वो कुली रुक गया और बोला ...अफवाह थी ट्रेन में कोई बम्ब नहीं था अभी कुत्ता से जांच कर रहे हैं
...लेकिन प्लेटफार्म पर बम्ब बहुत तगड़ा था बहुत लोग मरे हैं ...अब पुलिस वाले किसी को भी घुसने नहीं दे रहे हैं
लेकिन रीत उन पुलिस इंस्पेक्टर के साथ थी इसलिए प्लेटफार्म पे घुस गयी .
वहां का मंजर और खौफनाक था ..प्लेटफार्म पर सिर्फ पुलिस वाले ही नजर आ रहे थे ...कुछ पुलिस वाले डेड बाडीज को एक लाइन में लगा रहे थे .
और वही उसी में रीत ने देखा ...करन के डैड को ...चेहरा उनका बहुत जख्मी था ..आँखे अभी भी खुली थीं।
रीत वहीँ जाके खड़ी होगयी ..और जो पोलिस वाला लिस्ट बना रहा था , उससे उस बाड़ी की ओर इशारा किया ...
" तुम जानती हो इनको ..." पुलिस वाले ने मुड कर पूछा
जी रीत ने बोला ...और उनका नाम पता सारे डिटेल बताए।
और तुम क्या लगती हो इनकी अपना नाम नोट कराओ ..पुलिस वाले ने पुछा
उसके साथ जो दूबे भाभी कारिश्तेदार चेतगंज थाने का इन्स्पेक्टर था उसने बोला पड़ोस की है ..
लेकिन रीत बोली ...मेरा नाम नव रीत है , और मैं पड़ोस की हूँ ...और रिश्तेदार भी।
पुलिस वाले ने नोट कर लिया।
उसकी निगाहें पूरे प्लेटफार्म पर टहल रही थीं पुलिस वालो के अलावा वहां कोई और जिन्दा नहीं था
और करन की ..करन कहीं नजर नहीं आया .
शिवगंगा ट्रेन लगी हुयी थी ...से खींच कर दूसरे प्लेटफार्म पे शिफ्ट किया जा रहा था ...
तभी उस की निगाह एक और बाडी पे पड़ी कोई महिला ...हाथ अलग ...हाथ में कुछ पकडे थीं ....
रीत बढ़ कर वहां पहुंची ...चेहरा पहचानना मुश्किल हो रहा था ...लेकिन रीत के लिए ...
उसने इशारे से पुलिस वाले को बुलाया और बोली ये ...करन ..मेरा मतलब ...करन के डैड की बाड़ी की ओर इशारा कर के बोला ...इनकी वाइफ हैं ...
पुलिस वाले ने नोट कर लिया और बोला की
"अच्छा हुआ की आप आगयीं वरना हम इन्हें अन क्लेम्ड बाडिस में डाल देते ...कल आप मार्चरी में आ जाइयेगा ...बाड़ी हम आप को ही देंगे वरना कई बार काम्प्लिकेशन हो जाती है ."
फिर मुड कर उस के साथ वाले इन्स्पेक्टर से बोला की ब्लास्ट इसी बेंच के पास हुआ था , इसलिए इस के आस पास सब से ज्यादा डैमेज हुआ है और बाडीज भी बहोत खराब हालत में हैं ...
रीत की निगाह भी बेंच की ओर पड़ी और वो बहोत जोर से चीख उठी ....भयानक हृदय विदारक चीख .....
बेंच जली मुड़ी एक ओर को झुकी पड़ी थी ...और उसपर एक अधजला कोट पड़ा था ...और एक सर विहीन पूरी तरह कष्ट विक्षत शरीर ...उसके टुकडे इधर उधर ...
कर…न ...............जोर से चीखी रीत ....
ये बड़े चेक वाले कोट को वो सोते सोते भी पहचान सकती थी ...कितना चिढाती थी उसे ...लेकिन करन नए कोट के लिए तैयार नहीं होता था ...उसकी बड़ी बड़ी पाकेट ...
वो पास आके खड़ी हो गयी ..कोट के ..पथराई निगाहों से देख रही थी ...
कुछ नहीं बचा अब ...मम्मी पापा और अब ...करन
आप ये कोट पहचानती हैं ...पुलिस वाले ने हलके से उस से पूछा ..
रीत ने हामी में सर हिलाया ...और उस की ओर मुड के बोली ...करन ...करन का ..
दूबे भाभी के रिश्तेदार इन्स्पेक्टर ने बोला ...वो जो दोनों बाड़ी देखा था ना ...उन्ही के लड़के
पुलिस वाले ने लिस्ट में करन का नाम नोट कर लिया ..
बेंच से थोड़ी दूर छिटका हुआ एक लैपटाप का बैग अधजला पड़ा था ...
पुलिस वाले ने उसकी ओर इशारा करके पूछा बोला
" इसे पहचानती है ..."
हाँ डबडबाती आँखे ऊपर कर के ...वो बोली ..करन का है है मेरे साथ ही लिया था।
पुलिस वाले ने लिस्ट में कुछ और नोट कर लिया ...
तब तक पुलिस वाले को उसके किसी सीनियर आफिसर ने बुलाया ...और वो उधर मुड गया ..
रीत ने कोट के बाहर की जेब में हाथ डाला ...वो पीला गुलाब जो घंटे भर पहले उसकी चोटी में था ..खून से लथपथ ...
अन्दर की जेब में रीत ने हाथ डाला ...उसकी चिट्ठियों का पुलिंदा ...जो करन हमेशा अपने पास रखता था ...
चिट्ठियाँ और गुलाब रीत के हाथों में थे ...और अब रीत ...पागल हो गयी
वह एक बार फिर से चीखी ...क ..र ...न ...और आस पास ..दौड़ दौड़ कर ...हाथ पैर ...उंगलिया ...ला ला कर लगाने लगी ...जैसे सब जोड़ जोड़ कर अपने करन को वो फिर से जिन्दा कर लेगी ......
आस पास के सारे पुलिस वाले दौड़ पड़े और रीत को पकड़ने लगे ...लेकिन उसके अन्दर ..जैसे दस आदमियों का बल आ गया था ....वह छुडा कर बेंच के नीचे पड़े शरीर के हिस्सों को उठाने लगी ...
किसी तरह पुलिस वाले उसे खींच के वहां से ले गए ...और उसे प्लेटफार्म से बाहर किया ...
तभी किसी ने बोला की की उस बाड़ी का सर मिल गया है ...लेकिन ...ब्लास्ट से वो रेलवे ट्रेक पर फिंक गया था ...और उसी समय एक उसके ऊपर से ..शंटिंग इंजिन ...
दूबे भाभी के रिश्तेदार जो इन्स्पेक्टर थे ..उन्होंने रीत को दूबे भाभी के घर छोड़ दिया.
रीत का घर उन के घर के ही था।
रीत के बिना बोले ही वो समझ गयीं ...कुछ नहीं बचा।
वो उस का हाथ पकड़ कर रीत को , रीत के घर ले आयीं . बाहर बहुत भीड़ थी . सब को धीरे धीरे खबर हो रही थी। उनके जूनियर वकील , शहर के ढेर सारे लोग ...
घर में ताला बंद था।
सब लोग सांत्वना के शब्द उससे कह रहे थे ...पर वह कहने सुनने से कहीं बहुत दूर थी ..
तभी पड़ोस की एक महिला , जिन्हें नहीं मालूम था की क्या हो गया है आयीं ...और रीत के कंधे पे टोकती बोलीं,
" अरे , ताला बंद है , चाभी कहाँ है ..."
" मम्मी के पास ..." रीत बुदबुदाई
" मम्मी ..कहाँ हैं .." वो फिर बोलीं .
रीत ने आसमान की ओर उंगली उठा दी ..बिना बोले ...भगवान् के पास ...
सबकी आँखे नम हो उठीं .
दूबे भाभी खींच कर उस महिला को ले गयीं और कान में फुसफुसाया ...
..
दूबे भाभी की सास नहीं थी लेकिन जब वो विदा हो के आयी तो परछन रीत की मम्मी ने ही किया , सब रस्म ...मुंह दिखाई से लेकर कंगन छुडाने तक ...और जब दूबे जी भारी मुसीबत में फंसे थे थाना कचहरी सब हो जाता ...वकील साहेब रीत के पिता जी ने ही बचाया था ..
किसी वकील ने ताला खोलने वाले को बुला के घर खुलाया ...
अब रीत की कुछ होश आया ...कहीं से ढूंढ कर मम्मी पापा की फोटो ...एक ही फोटो थी ...दोनों की साथ साथ ...ड्राइंग रूम में रखी ..
किसी ने माला लाकर चढ़ा दिया ...
रीत वहीँ चुपचाप बैठी रही , मुंह झुकाए।
गुड्डी ने उससे बोला की करन के कजीन को खबर दे दी गयी है ..गुड्डी के पास उनकी भाभी का नम्बर था ...लेकिन वो लोग परसों शाम तक ही पहुँच पाएंगे ...उन्होंने बोला है की उनका वेट ना करें .
गुड्डी, दूबे भाभी , और मुहल्ले की कुछ औरते ...रात में रीत के साथ ही रहीं
उस रात पूरे मुहल्ले में कहीं चुल्हा नहीं जला ...
और वह मुहल्ला ...बनारस का ऐसा अकेला मुहल्ला ...उस दिन नहीं था
अगले दिन लोगों ने मना किया ...की रीत के मार्चुरी जाने की जरुरत नहीं है बाडीज को रिसीव करने के लिए ...लेकिन वो गयी।
पोस्टमार्टम के बाद एक मैदान में बाडीज रखी थीं . कुल अट्ठाईस बाडीज थी लेकिन बाहर सौ से ऊपर लोग थे।
आठ बाडीज अभी भी आइदेन्तिफाइड नहीं थी . वो लोग भी लाइन में खड़े हो गए . सब लोग चुप दुखी परेशान
...लाइन में लोग अन्दर जाते ...
और अन आइदेन्तिफ़ाइड बाडीज में उनके परिवार के लोग नहीं होते तो चैन की सांस ले बाहर निकलते ...
और जिन्हें अपने घर का कोई मिलता फिर रोना चीखना ...
तीन बाडीज बहुत क्षत विक्षत थीं ...वो कैस्केट में बंद थीं और उनके आगे नाम लिखा था .करन भी वहीँ था
.जो इन्स्पेक्टर रीत से मिला था ...करन के परिवार की भी ...रीत ने ही रिसीव किया .
शाम को मणिकर्णिका घाट पर पूरा बनारस था ..करन के कजिन को कल आना था ...
और रीत ने ही सब कुछ ...एक लड़की के साथ कोई नहीं था घाट वाले जल्दी कर रहे थे ...रीत को उसका चेहरा याद था कल वो मंदिर में जो एक्जाम दे के स्टूडेंट्स आये थे ..उन्ही में से एक थी ..
" मैं हूँ .." रीत ने बोला .
नाम घाट वाले पूछा ...
नव रीत ...रीत ने बोला ...और घाट वाले ने नोट कर लिया ...
उस का भी अंतिम संस्कार उन्ही लोगो ने ...
रीत अकेली नहीं थी। पूरा मोहल्ला , गुड्डी उस का पूरा परिवार , पापा के दोस्त ...सैकड़ों लोग थे
लेकिन जब रात को रीत घर लौटी ...तो अकेली थी।
वैसे घर पे कई लोग रुके उसे दिन रात को ..दूबे भाभी , गुड्डी , पापा के कुछ दोस्त ...
बार बार उस की नजर करन के घर पे पड़ती ...अँधेरे में डूबा ..
लेकिन कुछ दिनों में सब की अपनी जिंदगी अपने काम ..
सिवाय दूबे भाभी के और गुड्डी और उस के परिवार के ...
दूबे भाभी ने उसे कित्ती बार कहा की वो चल के उस के घर चल के रहे लेकिन रीत नहीं मानी।
अब वह बोलती भी नहीं थी .
एक उसकी पुरानी नौकरानी थी ...वो उसके साथ आकर रहने लगी .
इसी बीच गुड्डी के पापा के कुछ दोस्त रेलवे में थे , उन्होंने भी चेक कराया ..
करन की वो सीट ट्रेन में खाली गयी ...वो अपनी सीट पर ..बैठा ही नहीं था ..उन्होंने ऐसी 2 के टी टी से पूछवाया था ..
दिल्ली पहुँचने पर ..पुलिस ने भी पूरी ट्रेन चेक की थी ..
करन के कजिन दो दिन बाद आये ...उसकी भाभी भी ..वो लोग रीत से भी मिलने आये ..
उन्होंने आई एम ए से भी बात की थी ..करन वहां भी नहीं पहुंचा ...
वो करन ही था ...उस कोट में ...ट्रेन चलने में अभी टाइम था ...और उस की माँ की बाड़ी भी एकदम पास मिली थी ...
अब रीत की हिम्मत भी जवाब दे रही थी ...विश्वास भी ...पहले तो वो बुदबुदाती रहती ...करन है ...करन है ...
कुछ कुछ लोग हामी भी भरते ...कौन उसे समझाता हाँ करन ...है ...उसके ख्यालों में ...उसके ख़्वाबों में
लेकिन गुड्डी आती ...रोज आती ...बिना नागा ...घंटों उसके पास बैठती ...
रीत कुछ नहीं बोलती ..तब भी ...और कभी कभी जब वो बोलती ..तो रीत खुद को ब्लेम करती ...
की हर बार वो करन को छोड़ने स्टेशन जाती थी उस बार नहीं गयी ...इसीलिए करन नाराज होकर कहीं चला गया ...
कभी कहती उस दिन अगर प्रसाद लेकर वो जल्दी चली आती ...तो मम्मी पापा के साथ वो भी ...उसे जिन्दा रहने का कष्ट तो नहीं झेलना पड़ता ..
गुड्डी बिचारी क्या बोलती ..बस उसका हाथ पकड के बैठी रहती ..
रीत कभी बोलती ...वो अभिशप्त है ...जिसने उसको प्यार किया ...उसके पास आया ...वो चला गया ...
फिर वो गुड्डी की ओर खाली खाली आँखों से देखती ..और बोलती ..
तू मत आया कर मेरे पास ...वरना जल्दी ही तेरा भी नम्बर आ जाएगा और फिर खाली सूखी हंसी हंसती ...
कोई दूसरा होता तो डर कर भाग जाता ...लेकिन गुड्डी बैठी रहती रीत के पास ..
कुछ लोग कहते की वो जोर जोर से रोई नहीं है इसलिए सदमे से बाहर नहीं आ पा रही है ...कोई डाक्टर को दिखाने के लिए बोलते ...
रीत ने स्कूल जाना छोड़ दिया था ...बल्कि घर से निकलना भी
और एक दिन वो हुआ जो ...
रीत घर से चली गयी ...
गुड्डी कही चार पांच दिनों के लिए गयी थी लौट के आई ...तो पता चला ...
सब लोग परेशान ..सब से ज्यादा दूबे भाभी ...उन्होंने बताया की ...रीत की नौकरानी ने दो दिन पहले आ कर बताया की रीत कहीं गयी थी ...लेकिन नहीं लौटी ...
जब दूबे भाभी ने डांटा तब उसने कबूला की रीत तीन दिन से घर पर नहीं है ...और उसके पहले भी कई बार रात रात भर ...
गुड्डी के पापा ..मुहल्ले के कई लोग खुद दूबे भाभी ...कहाँ कहाँ नहीं गए ...घाटों पर ...रेलवे स्टेशन , बस स्टेशन , कोतवाली शहर के सारे हास्पिटल ...मार्चरी
लेकिन उस दिन किसी ने बोल की चार दिन पहले उसे उन्होंने ...सुखमयी माँ के आश्रम में देखा था ..एक कोने में अकेले बैठी थी
दूबे भाभी दौड़ती भागती आश्रम में पहुंची ..वहां मां योगिनी मिलीं ...
फोटो देखकर उन्होंने बताया की हाँ रीत वहीँ है ...वो एक प्रवचन में बैठी थी ..सब लोग चले गए तो भी वो वहीँ बैठी रही ...माँ ने उस के सर पर हाथ रखा तो माथा तप रहा था ..उसे बहोत तेज बुखार था ...लेकिन अब वह करीब करीब ठीक है ...
दूबे भाभी फफक कर रो पड़ीं ..वो माँ के चरणों में गिर पड़ीं और उन्हें सारी बात कह सुनाई ...
माँ योगिनी सब कुछ सुनती रहीं ...फिर दूबे भाभी से बोलीं ...
"अब आप इसकी चिंता छोड़ दीजिये ....इसे कुछ नहीं होगा ...ये भगवान् आशुतोष के चरणों में है ...यह जियेगी ...और खुशियों के साथ जियेगी ...इसे बहुत बड़े बड़े काम करने है ..."
फिर उन्होने रीत को बुलवाया ...दूबे भाभी को देख कर रीत उन के पास बैठ गयी ..लेकिन
जब योगिनी मा ने उससे जाने के लिए कहा तो वो कहने लगी ...की
नहीं वो आश्रम में रहेगी ...
उन्होंने और दूबे भाभी ने बहुत समझाया ...लेकिन वो तैयार नहीं हुयी ..हार कर योगिनी माँ बोली की आप परसों आ के इसे ले जाइयेगा ..
नियत दिन दूबे भाभी फिर वो आश्रम पहुंची .
योगिनी माँ ने उन्हें बहुत बातें बतायीं समझाई ...औरउनका हाथ पकड़ कर बोला
" अब यह सिर्फ आपकी ही नहीं मेरी भी उतनी जिम्मेदारी है ...और एक बात समझ लीजिये की मैं आप पर या रीत पर कोई कृपा नहीं कर रही ...सिर्फ अपना कर्तव्य निभा रही हूँ ...आज से आपके लिए ये आश्रम , आश्रम नहीं दूसरा घर है ..."
और उन्होंने फिर रीत को बुलवा भेजा।
रीत अब एकदम स्वस्थ लग रही थी और दूबे भाभी को देख के मुस्करायी भी ...लेकिन उसकी वही रट ...वो आश्रम में ही रहेगी
माँ योगिनी ने उसके सर पर हाथ रखा और समझाया ...
" बेटी ये आश्रम तुम्हारा ही है ...और तुम्हे यहाँ से निकालने का हक़ किसी को नहीं है , मुझे भी नहीं ...लेकिन मैं तुम्हे एक ज्यादा कठिन आश्रम में भेज रही हूँ दुनिया के आश्रम में। यहाँ तो हम लोग एक सुरक्षित वातावरण में है , हमने एक छोटी दी दुनिया बना ली है चारो और दिवाले हैं ...लेकिन असली लड़ाई तो बाहर है ...किसी को तो लड़नी होगी ना वो लड़ाई ...फिर मैं तो तुम्हारे साथ ही रहूंगी हर पल ...'
उन्होंने उसके दायें हाथ पर एक धागा बाँधा ...और बोला अब आश्रम तुम्हारे साथ रहेगा हमेशा ...
रीत फिर भी जिद कर रही थी ...ये तय हुआ की वो हर हफ्ते दो दिन आश्रम में रहेगी जिस दिन माँ का प्रवचन होता है ...सोमवार को को आएगी वो और बुधवार को जायेगी ..
अगले सोमवार को फिर दूबे भाभी खुद उसे अपने साथ ले गयीं ...फिर बुधवार को उसे लेने भी गयीं ..और लौटते हुए पहली बार रीत मुस्कराई और उनसे बोली ...
" भाभी , क्यों आती है डरिये मत ...आपकी ननद हूँ ...कहीं नहीं जाउंगी ...जानेवाले गए ...अब तो जब आप मुझे विदा करेंगी तभी जाउंगी ..."
दूबे भाभी की आँखे डबडबा आयीं ...
जब वो ब्याह कर आयीं थी दस पन्द्रह दिन हुए ...रीत अपनी मम्मी का हाथ पकड़ के उसके पास आई थी
...कीती छोटी सी थी ...गोल मोल गुडिया जैसी ...साटन का गुलाबी फ्राक पहने ...टुकुर टुकर देख रही थी ..बटन सी गोल गोल आंखे ..चौथे पांचवें में पढ़ती थी ..
" मैंने सोचा की चलो आज तुम्हे , तुम्हारी छोटी ननद से मिला दूँ ...." हंस कर रीत की माँ बोली ...
दूबे भाभी की न तो सास न ननद ना देवर ....सोचती थी की कैसी ससुराल में जा रही हूँ ...लेकिन रीत की माँ ने तो परछन से ही सास की पूरी जिम्मेदारी अपने सर पे ले ली ...और देवर ननद की कोई कमी नहीं
रीत ने नमस्ते किया तो प्यार से दूबे भाभी ने खींच के उसे गले से लगा लिया ....और बोली
ननद भाभी गले मिलते हैं ...वो भी कस कर ..
रीत की माँ हँसते हुए बोलीं ...
इसी लिए तो लायी हूँ तुम्हारे पास ...पूरी ट्रेनिंग करवा दो इसकी आखिर तुम्हारी छोटी ननद है , तेरी जिम्मेदारी है ...अब आज से ये तेरे हवाले .."
"पूरी ट्रेनिंग करवाउंगी समझ लेना ..डरोगी , भागोगी तो नहीं ..."
दूबे भाभी ने गले लगाए हुए रीत से बोल ...और गाल पे प्यार कर लिया .
रीत बोली मैं डरने नहीं ..
रीत ने दूबे भाभी का हाथ पकड़ कर खींचा और वो यादों के दायरे से वापस आयीं
वह लोग दूबे भाभी के घर के सामने ही खड़ी थीं और रीत खुद उनके घर में आ गयी .
दूबे भाभी ने उसकी मनपसनद , दाल भरी पूड़ी बनाई ...गुड्डी भी आगयी थी ....पुराने दिनों की तरह ...देर तक वो लोग गैप लगाते रहे ...दूबे भाभी ने उससे फिर कहा की वो उन्ही के साथ आ के रहे तो
रीत मुस्करा के बोली ...आउंगी भाभी एक दिन अचानक आ जाउंगी सब सामान वमान लेके भगाइयेगा तो नहीं ..और वो और गुड्डी बतियाते निकल गयी पुराने दिनों की तरह ...
लेकिन पुराने दिन कहाँ आते हैं ...
रीत के पैरों के चक्कर अभी भी बंद नहीं हुए थे ...बस वो भटकती रहती थी ...हाँ बस खाना देर सबेर कुछ खा लेती थी ..थोडा बहुत बोल भी लेती थी ...
एक दिन वो फिर देर रात तक घर नहीं आई तो परेशान होकर वो आश्रम में पहुंची तो माँ ने समझाया ...
" आप मत चिंता करिये उसकी , उसकी रक्षा करना मेरे आपके बस की बात की नहीं ...उसकी रक्षा खुद काशी के कोतवाल करते हैं , चौसठो योगिनिया साथ है उसके ...'
और जब दूबे भाभी लौट के आयीं ...तो रीत मिल गयी अपने घर के गेट पे गुड्डी से बात करती एकदम सहज ...और उसके माथे पे काला टीका था ...भैरव ...काशी के कोतवाल ...उन्ही के यहाँ का टीका था ..
और रीत के पैरों का चक्कर बंद हुआ शीतला घाट पर ...
दिन वही समय वही ...बस खबर थोड़ी अलग ...मुख्यमंत्री अलग लेकिन प्रतिक्रिया वही
दिन मंगलवार ..समय शाम शाम के साढे छह बजे ...
बस तारीख ७ दिसंबर ...जगह शीतला घाट ...दशाश्वमेध घाट के बगल में
और अगले दिन अखबार की खबर थी
One killed, many injured in Varanasi bomb blast
The explosion occurred at Sheetla Ghat, adjacent to the main Dashashwamedh Ghat where the sunset aarti, the evening prayer ritual to the holy river, Ganges had commenced, on these stone steps leading to it, where thousands of worshipers and tourists had gathered. It killed a two-year old girl, sitting on her mother's lap, the mother was one of three critically injured, more than 38 other people were injured. In the ensuing panic after the blast, a railing broke causing a stampede leading to an increase in the number of injuries. The bomb was hidden inside a milk container on the Sheetla Ghat.
Sitala Ghat is the southern extension of the Dashashwamedh Ghat, and its stone steps lead to Sitala Mata Temple.
After the incident 20 injured were admitted to BHU Hospital, 13 in Kabir Chaura Hospital, while 4 were sent to Heritage Hospital in the city. Six foreigners tourist were also injured including an Italian, Alexandeo Mantello, who was later said to be out of danger, French national Rachael, Ki Taro from Japan, South Korean Wan Sen Kim, Italian Lydia de Mayo and a German citizen, Ozel
After the incident the Chief Minister of Uttar Pradesh Mayawati and Union Minister of Home Affairs P. Chidambaram visited the site, and appealed for peace
Additional Director General of Police (ADG)-- Law and Order, said: "The state has been put on high alert. And anti-terrorist sqauds and a bomb disposal squad have been rushed to the site."
और रीत भी वहीँ थी ...ब्लास्ट से मुश्किल से २ ० ० मीटर दूर
दिन वही समय वही ...बस खबर थोड़ी अलग ...मुख्यमंत्री अलग लेकिन प्रतिक्रिया वही
दिन मंगलवार ..समय शाम शाम के साढे छह बजे ...
बस तारीख ७ दिसंबर ...जगह शीतला घाट ...दशाश्वमेध घाट के बगल में
और रीत भी वहीँ थी ...ब्लास्ट से मुश्किल से २ ० ० मीटर दूर ..
और फिर वही दृश्य ...सीढियों से बहता खून ...इधर उधर गिरे पड़े घायल , चीख पुकार ,भगदड़ ...चारो ओर छूटे हुए चप्पल ...
रीत ने एक पल देखा ...फिर अपना दुपट्टा कमर में बाँधा ...और झुक के घायलों को उठाने में जुट गयी ...
थोड़ी देर में उसने देखा ..एक लम्बे तगड़े बुजुर्ग ..साठ से ऊपर के रहे होंगे ...उसके साथ आ गए थे ...और उन लोगो ने मिल कर करीब पन्द्रह बीस घायलों को उठा उठा कर सडक पर खड़ी गाड़ियों और एम्ब्लेंस तक पहुँचाया .
ये फेलू दा से उसकी पहली मुलाकात थी।
वो फेलू दा और एक पंडित जिसे रीत भी जानती थी और फेलू दा भी ...पास के एक मंदिर में बैठे थे ...और रीत बडबडा रही थी ...
" हम सब लोगों को मर जाना चाहिए ..एक एक कर के क्यों मारते हैं ...एक साथ मार दें ना ...बिचारी उस दो साल की बच्ची की ...कितनी जिंदगी थी क्या बुरे कर्म किये होंगे उसने ...
और उस की माँ ...उस की गोद में उस की बच्ची मरी ...जिंदगी भर नहीं सो पाएगी ...
कीड़े मकोडो की तरह बस पड़े पड़े ..किसी ने स्प्रे किया मर गए ...मंदिर में घाट पर स्टेशन पर कभी भी ...हम सब लोग ना लाइन में खड़े होकर गंगा में कूद पडे ...ख़तम करें ये कहानी .. रोज. रोज की ..:"
" मरने से कुछ नहीं होता , मारना पड़ेगा ...अगर वो मार सकते हैं तो हम क्यों नहीं ...जीना पड़ेगा ...मारना पड़ेगा .."
फेलू दा की गुरु गंभीर आवाज के आगे सब चुप हो गए, रीत भी।
पहली बार इस तरह की बात किसी ने बोली थी ..रीत से।
लेकिन पीछे से किसी ने टोका ..
" किसको पकड़ें , किसको मारें ..कायर है ससुरे सब ...छिप के वार करते हैं ..."
फेलू दा ने उसकी ओर मुड के बोला ...
" क्यों ...मिल्क कैन में बम था ...कोई आके रख गया होगा ...दिखाई नहीं पड़ता हमें ..चौक्कने क्यों नहीं रह सकते हम खाली कचर कचर बतियाएंगे ...अगर हम आँख खोल कर रखें ...कान खोल कर रखें ...लेकिन नहीं हम तो बड़ा बड़ा मुंह खोल कर बड़ी बड़ी बाते करते हैं ..."
रीत को लग गया ये इंसान कुछ अलग किस्म का है।
" अरे भगवान ही ..." पंडित जी बोले की उनकी बात तुरंत उन्होंने काट दी
" आप तो पंडित , ज्ञानी हैं कम से कम आप को कम से कम ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए ..राक्षसों को मारने के लिए ..." फेलू दा बोले .
" मनुष्य रूप में अवतरित हुए " पंडित जी बोले .
" मतलब साफ है ...भगवान् को भी मनुष्य बनना पड़ा ...और इ सब कौन हैं टुण्टपुन्जिये ...चिल्लर ...इनसे हम नहीं निपट सकते ."
अब सब लोग चुप थे.
रीत कुछ रुक कर बोली ..." लेकिन कैसे ..."
फेलू दा मुस्कराए , किसी ठेले वाले को जोर से चाय के लिए बोला और रीत की ओर मुंह कर के बोले ..
" अब तुमने इतने दिनों में एक सही बात की है ...उसके लिए पहले जीना शूरु करो ...मरे हुए लोग किसी को नहीं मार सकते .."
फिर पीछे से किसी ने टोका ..इ बिचारी लड़की दुःख की मारी ..."
"आप लोग भी ना .." फेलू दा ने तुरंत काउंटर किया " मधु कैटभ महिषासुर ...किसने मारा था ...देवी माँ ने ना ...तो जिस देश में देवता त्रस्त होकर देवी के पास जाते हैं ...और वही कष्ट दूर करती है उस देश में ...
लड़की का बहाना बनाना ...और दुःख सुख की बात ...इतने दिन पहले अर्जुन को समझा गए ...सुख दुःख कुछ नहीं होता कर्म होता है ...और हम सब भूल गए ... भागो नहीं , लड़ो , बदलो ...
जब तक ये नहीं होगा चप्पे चप्पे पे पुलिस लगा दो ...तब भी कोई आ के मार के चला जाएगा . इस के पहले एक बार और भी हमला ..."
पीछे से किसी ने भूल सुधार किया ..
"एक नहीं दो बार ...यही दशाश्वमेध घाट पे ...ओह समय त पुलिस गैस सिलिंडर ब्लास्ट मानी गयी ...लेकिन बाद में ...नयी धारा लगाई ...और जो बेचारे घायल हुए उ अभी तक ...."
" और अभी फिर हमला करेंगे ससुरे ..." कोई और बोला ....
" एकदम ..." फेलू दा के मन की बात थी ये ...जबतक हम मुड के उनका पंजा ना मोड़ देंगे .."
धीरे धीरे सब लोग उठने लगे।
रीत को फेलू दा एकदम अलग लगे। सब लोग उसे सांत्वना देते , कोई भाग्य को उल्टा सीधा बोलता ...लेकिन पहली बार कोई उसे जीने का मकसद देता हुआ दिखा।
फेलू दा के साथ वो उनके घर आई ...गौदौलिया के बगल में ही रहते थे .
उनके घर पहुँच कर उसने देखा की दीवालों पर जगह जगह ड्राइंग रूम में , सर्टिफिकेट लगे थे . वो अपने जमाने के बंगाल के बड़े मशहूर प्राइवेट डिटेक्टिव थे ...और उसे मजेदार ये लगा की एक दो सर्टिफिकेट कुश्ती और अन आर्म्ड कम्बैट के भी थे ..
फिर एक धुल से पटी फाइल थी ...वो उसने पलटी ..उसमें अखबारों की कटिंग्स थी ...और उसमें भी उन्ही के चर्चे थे , हीरों को चोरी से कलर किड नैपिंग तक के ..
तब तक रीत को उनके आने की आहट सुनाई पड़ी ...और उसने फाइल रख दी .
फेलू दा सन्देश का एक प्लेट ले कर आये थे ..
रीत के दिमाग में एक सवाल कुलबुला रहा था उसने पूछ लिया
हमारे पास हथियार क्या है
फेलू दा ने अपने सर पर खट खट की ...और बोले मगज अस्त्र ...सबसे बड़ा अस्त्र ...मगज अस्त्र ..लेकिन तुम्हारे लिए ...जरूरी है पन्ना पलटो ..
"मतलब ..." रीत की समझ में कुछ नहीं आया।
" समझो ...अगर कोई पन्ना भरा हुआ है ...और तुम उसपर लिखना चाहती हो ...लिख पाओगी क्या ...
और लिख लिया भी तो पढ़ पाओगी क्या ...इसलिए कह रहा हूँ ..पन्ना पलटो ...
नया पन्ना ..सादा पन्ना खोलो ...और नयी कथा लिखो ...नयी बात ...नयी शुरुआत ...होगा नहीं ...उसके बिना ..."
रीत को फेलू दा की बात समझ में आ गयी ...और पसंद भी आ गयी
देर तक वो फेलू दा से बातें करती रही ...और जब वो उठी तो फेलू दा ने बोला ...की वो उसे छोड़ आएंगे ...
रीत ने हंस कर मना कर दिया और बोली की वो घर पहुँच कर उनको फोन कर देगी ...
और जब रीत ने घर पहुँच कर फेलू दा को फोन किया ..
उनकी रिंग टोन थी ...वी शैल ओवरकम ..
रात में ही सब माल असबाब लेकर रीत दूबे भाभी के घर पहुँच गयी ...
और जब दूबे भाभी ने उसे देखा तो आंसू उनके गाल पे छलक आये ...और उन्होंने रीत को अंकवार में भर लिया ..
उन्होंने रीत के लिए पूड़ी बनायीं ...ऊपर से गुड्डी भी आ गयी और रात भर उन लोगो ने चकल्लस की .
रीत ने पन्ना पलट दिया ..अगले ही दिन .
दो दिन बाद अखबारों में एक इश्तहार निकला ...
" मैं नव रीत मेरा हाईस्कूल का रोल नंबर ...मेरा नाम आज से रीत है ..."
करन उसे रीत ही तो कहता था ...वो कहता था नव रीत में नव सुपर फ्लुअस है
और जब रीत ने पुछा क्यों ...तो वो बोला
"देखो ..सुन्दरता की परिभाषा ये है की वो हमेशा नयी लगे , नित नूतन ...और रीत तो खुद सुन्दरता की परिभाषा है ...तो उसके आगे नव या कोई भी विशेषण क्यों लगाओ ...सिर्फ रीत ही कह देना काफी है ..."
दूसरा पन्ना उसने ये पलटा ,
उसने तय किया की वो फिर से कालेज जाना शुरू करेगी ...लेकिन वहां उस कान्वेंट में नहीं जहाँ वह पढ़ती थी ...पग पग पर यादों की झुरमुट थीं वहां ...
एक ट्रेडिशनल से सिर्फ लड़कियों वाले स्कूल में उसने दाखिला ले लिया ...
लेकिन साथ साथ ...देर तक सोने वाली रीत ...सुबह सूरज उगने से पहले उठकर ..पास के सिगरा स्टेडियम में दौड़ने जाती ...पूरे पांच चक्कर ...फिर योगासन , शाम को जिम ...
हफ्ते में तीन दिन उसे कराटे खुद फेलू दा सिखाते ..और ना जाने क्या क्या मोटी मोटी किताबें ...पावर आफ आब्जर्वेशन , डिटेक्टिव टेक्निक ...पढ़ा करती ..
और साथ साथ वो दूबे भाभी के साथ साथ इतनी घुलमिल गयी ...उनके सब कामो की जिम्मेदारी उसने ले ली
दूबे भाभी के पति बाहर रहते थे साल में एक दो बार आते ..
दूबे भाभी के यहाँ ब्लाक प्रिंटिंग का काम होता था ....बनारस में साड़ियों का जो काम होता था ..उसके चक्कर में उन्हें कभी काम की कमी नहीं रहती थी ..दो चार औरतें काम करती थीं ...उसकी भी जिम्मेदारी रीत ने सम्हाल ली ...
और साथ में जो उनकी गप्प गोष्ठी होती थी ...ऊपर से चंदा भाभी आ जाती थीं ...फिर संध्या दीदी ...कुछ दिनों में रीत को उन्होंने अपने रंग में रंग लिया।
.. दूबे भाभी के साथ ठेठ भोजपुरी गाने , शादी में गाई जानेवाली गालियाँ , खुल के मजाक , सब कुछ उसने सीख लिया ...शादी में कोई भी 'रतजगा ' उसके और दूबे भाभी के बिना पूरा नहीं होता था
( रतजगा : पारंपरिक घरों में जहाँ बारात में औरतें नहीं जाती थीं , वहां घर की और मोहल्ले की औरतें ...रात भर जग कर 'रतजगा' करती थीं ...और इसमें चूँकि सिर्फ औरतें रहती थीं ...इसलिए बहुत खुल कर गाने मस्ती धमा चौकड़ी होती थी )
और फिर दूबे भाभी जब अपना भाभी वाला रूप अख्तियार करती थीं ..तो रीत को नहीं बख्शती थीं ...और रीत भी जब ननदों के साथ मिल जाती थी तो ...दूबे भाभी को नहीं छोड़ती थी
दूबे भाभी ने हर चीज में रीत को ट्रेंड कर दिया था ..उनकी चंदा भाभी , संध्या दीदी सब की कोशिश रहती थी ...बस रीत मुस्कराती रहे और रीत भी यही कोशिश करती थी की उनके रंग में रंग जाय
रीत एक दिन गुड्डी के साथ गयी अपने घर , किताबे लाने ...और गुड्डी के साथ मिलकर जीतनी पुरानी उसकी फोटुयें थीं करन की , सारी चिट्ठिया ..यहाँ तक की कालेज मैगजींस ..सब एक बड़े बैग में रख कर आलमारी में बंद कर दिया।
और सिर्फ रीत ने नहीं गुड्डी ने मुझे बताया , सभी लोगों ने चाहे दूबे भाभी या मुहल्ले का कोई और ...जैसे सारे पुराने दिन , पुरानेदिनो की यादों को एक पुराने से सन्दुक में बंद कर ,
उसमें एक भुन्नासी ताला लगाकर ..चाभी नदी में फ़ेंक दें बस वैसा ही
कोई भी रीत के बारे में पूछता तो बस लोग उसे दूबे भाभी की ननद ही कहते ...ना उससे ज्यादा ना उससे कम ..
और उस हादसे की तो कोई पूछने पे भी चर्चा नहीं करता ...
लेकिन गुड्डी ये देखती की कई बार मजाक और हंसी के दौर में जब रीत एकदम बिंदास लगती ..अचानक ...उसकी आँखे सूनी सी लगतीं ...वो कहीं खो जाती ...और फिर थोड़ी देर बाद सायास वापस आती
एक दो बार जब गुड्डी उसके कमरे में अचानक घुसी तो उसने देखा की ...कोई कापी है जिसे रीत वहां से जल्दी से हटा देती है .
एक दिन गुड्डी से नहीं रहा गया ..
रीत वही कापी खोल कर देख रही थी ..गुड्डी घुसी और रीत ने कापी बंद कर दी ...
गुड्डी बहोत धीमे से बोली ...मुझसे भी ...
रीत एक सूखी सी हंसी हंसी और ...सूनी आँखों के साथ कापी उसकी ओर सरका दी
गुड्डी ने कापी खोल ली ...और फिर उसे लगा उसने गलत किया ...
करन की सारी फोटुयें , यहाँ तक की कालेज मैगजीन में छपी उन दोनों ने ...एक बैग में रखकर रीत के घर में ताले में बंद कर दिया था ..
कापी में करन का एक स्केच ...रीत ने खुद बनाया था ...हु बहु ..
नीचे फराज साहब का एक शेर लिखा था ..
उस शख़्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया
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फागुन के दिन चार--91
गतांक से आगे ...........
रीत - करन II
शेष रही मैं केवल,
अब तक आपने पढ़ा
अब सिर्फ मै हूँ, यह तन है, और याद है
मन्त्र-पढ़े बाण-से छूट गये तुम तो कनु,
शेष रही मैं केवल,
काँपती प्रत्यंचा-सी
अगले दिन अखबार की हेड लाइन थी ...
७ मार्च , मंगलवार
दो बाम्ब ब्लास्ट , अट्ठाईस लोग मरे , सौ से ऊपर घायल
कम से कम दस लोगों के शव मंदिर में पड़े ..चालीस से उपर घायल , कैंट स्टेशन पर भी जोरदार धमाका ...अठारह से बीस लोगों के स्टेशन पर मरने की आशंका , मंदिर में मरने वालों में आठ महिलायें जिनमें तीन लडकिया ..कईयों की पहचान करना असंभव
..
कुछ जो जिन्दा बचे थे उनकी हालत मरने वालों से कम बदतर नहीं थी .
रीत उनमे से एक थी .
आगे
रीत जब अपने पैरेंट्स के साथ पहुंची तो मंदिर में बहुत भीड़ थी।
एक तो मंगल ,और दूसरे बोर्ड के एक्जाम चल रहे थे तो सारे इम्तहान देने वाले लड़के लड़कियां ...
और रीत ने देखा की वहीँ ...
एक शादी भी चल रही थी ...नेपाली दुल्हा दुल्हन ..बहोत यंग ..खूब सजे धजे ...और साथ में घर वाले ..बाजे वाजे बज रहे थे ...उसने पहली बार मंदिर में शादी देखी थी ,,, खूब खुश लग रहे थे ...
दूल्हा ...बस लालचियों की तरह दुलहन को घूरे जा रहा था ...
रीत मन ही मन सोच कर मुस्कराई ...मिलेगी मिलेगी ..क्यों इतने ललचा रहे हो ..सारे लड़के न ऐसे ही नदीदे होते हैं ..बेसबरे ...देखता तो करन भी ऐसे ही है ...
उस के आँख में लड़के की जगह करन और लड़की की जगह अपनी तस्वीर घूम गयी ...
इसे कहते हैं टाइमिंग ...उसी समय करन का मेसेज आया ...वो लोग स्टेशन पहुँच गए है ..शिवगंगा प्लेटफार्म पर लगी हुयी है ...गाड़ी चलने पर रिंग करेगा
सुन रीत ...क्या सोच के मुस्करा रही है ...उस की मम्मी ने ध्यान खींचा।
बहुत भीड़ है तू जाके प्रसाद ला हम लोग यहीं वेट करते हैं
लड़के लडकियों की भीड़ के बीच धक्का मुक्की करते रास्ता बनाते ...वो प्रसाद की दुकान तक पहुँच गयी। वहां भी खचाखच भीड़ ...
उसने वहीँ लगे नल से हाथ धोया ...और दूकान से प्रसाद के लिए लड्डू लिया , और वापस मुड़ी ..
तभी ..
बहोत जोर का धमाका हुआ .
रीत को लगा उसके कान के परदे फट गए ...
वह वहीँ भहरा कर गिर पड़ी .
एक खम्बे से उसके माथे में जोर से चोट लगी ..
बस उसे इतना याद है,
उसे ये भी याद नहीं की वो बेहोश हुयी थी की नहीं
थोड़ी देर में जब उसकी आँख खुली ..तो चारो ओर कुहराम ..भगदड़ . टूटी हुयी बेंचे ...धुंवा ...गिरे हुए लोग ...बहता हुआ खून .
और उसकी निगाह वहीँ पड़ी ..जहां वो दूल्हा दुल्हन थे शादी हो रही थी ...
दुलहन की चुनर खून में डूबी ..वो गिरी ...बस एक मांस के लोथड़े की तरह ..लेकिन उसके कुहनी तक चूड़ी और कंगन से भरे हाथ में ...अभी भी दुल्हे का हाथ था ...दुल्हे के शरीर से अलग
दुल्हे की बाड़ी दूर छिटकी पड़ी थी।
उसके आस पास भी गिरे पड़े थे लेकिन ज्यादा चोट किसी को नहीं थी ...
तभी उसे याद आया की मम्मी पापा भी तो वहीँ थे ...
रीत जोर से चीखी ..." मम्मीईईईईई "
किसी तरह खम्बे का सहारा लेकर उठ कर खड़ी हुयी ...
उसके पैर में भी चोट आई थी ..
लंगडाते घिसटते उधर की और चल पड़ी जिधर उसने मम्मी पापा को छोड़ा था ...
सम्हल के कोई पीछे से चिल्लाया ...
वहां खून इतना फैला था की फर्श पर फिसलन हो गयी थी ...उसके सामने दो लोग वहां फिसल कर गिर पड़े थे .
पास से गुजर रहे किसी आदमी ने बोला ...
" सरवा ...बहुत जबर बम्ब फोडले हौ ...बी एच यु तक आवाज गईल ..."
वो घायलों को लांघते छ्लान्गते ...वहां पहुंची जहां उसने मम्मी पापा को छोड़ा था ...
और वहां पर तो पूरा ढेर एक पर एक ...
कुछ घायल थे , कुछ मरणासन्न थे और ..कुछ बस बाड़ी ...
तब तक और हल्ला हुआ कुछ पुलिस वाले आ गए थे , लोगों को हटा रहे थे
बोल रहे थे ...देखने दीजिये ...और भी बम हो सकते हैं ...गौदौलिया में अभी एक बम्ब और मिला है ...और भीड़ के धक्के के साथ वो पीछे आ गई ...
लेकिन लांघते , छ्लांगते , वो फिर वहीं पहुँच गयी
अब वहां मंदिर के कुछ पुजारी ...कुछ लड़के आ गए थे ...और वो चादर को स्ट्रेचर की तरह बना के घायलों को ले जा रहे थे ...और बाडीज ..को एक तरफ रख रहे थे ...उसने पहले उनसे इशारे से एक ढेर की ओर इशारा किया ...मम्मी पापा को उसने वहीँ छोड़ा था।
तभी उसने दूबे भाभी को देखा ...वो लगता है अभी आयीं थीं ...
दूबे भाभी गुड्डी के घर के नीचे रहती थीं ...और उसी के मुहल्ले की होने की वजह से उसे अच्छी तरह जानती थीं।
उन्होंने उसे दुबका लिया और हलके से पूछा , मम्मी ?
रीत ने सिर्फ सर हिलाया और उंगली से उधर इशारा किया ...जिधर वो ढेर था ...
दूबे भाभी रीत का हाथ पकड़ कर लोगों के शरीर , कराहते घायलों को लांघती वहां पहुँच गयी , और एक पुजारी से रिक्वेस्ट की ,
" पंडित जी एह बिटियवा के माई बाप ...."
पुजारी ने उधर एक बार निगाह डाली , बड़ी निराशा से दूबे भाभी की ओर देख के सर हिलाया।
लेकिन दूबे भाभी ने फिर बोला और वो वहां से उठाने में जुट गया ...
सब नि;शेष शरीर ..
रीत पैर पकडती और वो पुजारी हाथ और,... उठा के वहीँ किनारे रखते जाते
चार को हटाने के बाद के बाद उसे मम्मी दिखीं ...नाक के पास से खून निकलते हुए बस जम गया था ...
पुजारी ने झुक कर उलटे हाथ पे सांस महसूस की और दूबे भाभी की ओर ना के इशारे में सर हिलाया।
लेकिन दूबे भाभी ने खुद झुक के उनकी नाडी चेक की ...फिर दूसरे हाथ की ...जैसे उन्हें विश्वास नहीं हो रहा हो
...उस हाथ के कंगन के पास भी बहुत खून जमा था ...और सर हिलाकर रीत की ओर देखा ...
उनकी निराश आँखों ने सब कुछ कह दिया ...
मम्मी का सर और धड पापा के उपर था .
बाकी बाडीज की तरह , उसने मम्मी का पैर पकड़ा ...और पुजारी ने हाथ ...और किनारे रख दिया।
पापा के शरीर पर चोट का कोई निशान ऊपर नजर नहीं आ रहा था ...उसे कुछ उम्मीद नजर आई ...
लेकिन उसके पहले वो पुजारी ही झुक कर सांस देखी और साथ में स्ट्रेचर वाले को बुलाया ...दूबे भाभी ने भी एक नाडी पकड़ी ...और रीत ने भी ..
लेकिन कुछ नहीं बचा था
तभी लोगो ने देखा ...सर के पीछे जमींन पर ढेर सारा खून ...कुछ जम गया था ...कुछ अभी भी गीला था
तबतक वहां ढेर सारे पुलिस वाले , अम्बुलेंस , सरकारी गाड़ियाँ आ गयीं।
एक पुलिस का इंस्पेक्टर आया और उन लोगो को हटाने लगा ...
चलिए चलिए ..हटिये सारी बाडीज मार्चरी जायेंगी ...
तबतक पुजारी ने उस के कान में कुछ कहा ...
और उस ने ..बाडी ..पापा ... की ओर देखा ...और पहचान लिया
रीत के पापा बनारस क्या पूरे पूर्वांचल के सबसे मशहूर वकील थे ...
अब उस ने रीत की ओर देखा ..और आप ...धीमे से बोला ..
दूबे भाभी बोलीं ...वकील साहेब की लड़की ...
रीत ने पूछा ...हलकी आवाज में ...हम लोग ले जा सकते हैं ...इनको ...मम्मी पापा को ..
सब लोग चुप थे लेकिन फिर इन्स्पेक्टर ने बोला , " हमारी मज़बूरी है , पोस्ट मार्टम करना होगा ...सबसे पहले आपका ही ....कोई आ जाय दस ग्यारह बजे दिन में ..."
तब तक दो मजिस्ट्रेट और सिटी एस पी आ गए थे ...
इंस्पेक्टर ने रीत के पापा की बाड़ी की ओर इशारा किया ...उन लोगो ने भी पहचान लिया।
तब तक कुछ होमगार्ड वाले बाड़ीज को उठा उठा कर पी ऐ सी की ट्रक में रख रहे थे ...जब वो रीत के पापा को ...
मजिस्ट्रेट ने बोला ..सम्हालकर ...
रीत पत्थर की हो गयी थी।
चारो ओर चीख पुकार रोने चिल्लाने की आवाज ...
लेकिन उस की आँख से ना आंसू निकला ना मुंह से बोल ...
वह खड़ी थी इसलिए जिन्दा लग रही थी ...
थोड़ी देर में पूरा इलाका खाली हो गया ...डेड बाडीज , घायल , बचे लोग ..सब चले गए
कुछ तमाशबीन थे , पुलिस उन्हें भी हटा रही थी .
अब सिर्फ बाम्ब डिस्पोजल स्क्वाड वाले , फोरेंसिक टीम , इन्वेस्टिगेशन टीम यही लोग चारो ओर दिख रहे थे ...
और इधर उधर बिखरी चप्पले , जमा बिखरा खून ..
और उन सबके बीच रीत पत्थर की ...
दो बार दूबे भाभी ने उसे चलने का इशारा किया ..एक दो बार पुलिस वालों ने भी बोला ..
लेकिन वह संज्ञा शुन्य हो गयी थी
तभी एक पुलिस इंस्पेक्टर आया, चेतगंज थाना में था और उन लोगो के पास दूबे भाभी के पास रुका ...उनका कोई सम्बन्धी था , और उनको प्रणाम करने के बाद बोला ..
"रेलवे स्टेशन पे तो इससे भी ज्यादा तबाही है ..शिवगंगा में ..स्टेशन पे भी बम फटा है ...बाडी बिछी पड़ी है" ...
दूबे भाभी को कुछ याद आया और रीत को जोर जोर से हिलाते हुयें बोली ...
" हे सुन ...आज करन को जाना था ना शिवगंगा से ...उसके मम्मी पापा छोड़ने गए थे ना उसको ..."
अब रीत होश में आई ..." क्या हुआ करन को "
जवाब इंस्पेक्टर ने दिया ...अईसे बम शिवगंगा ट्रेन और कैंट स्टेशन में भी फूटा है ...बहूत हालत खराब है आप का कोई परिचित था क्या स्टेशन पे ...ट्रेन में ...
हाँ ...रीत की धड़कन फिर से चल रही थी ..
चलिए फिर मेरी बाइक पे बैठ जाइये ...वैसे तो घुसना मुश्किल होगा वहां ...
और रीत उस के बाइक पे बैठ गयी ...वो दुबे भाभी से बोला अच्छा बुआ चलते हैं ...लौट के इनको आप के याहं छोड़ देंगे ...रेक्शा वेक्सा तो मिलेगा नहीं ...
दूबे भाभी बोलीं ...ले जा भैया ...कम से कम उन्हा सब ठीक होय ...करन क कुछ न हुआ हो ..
रीत भी रास्ते भर यही मनाती रही ...
सभी देवता पित्तर , गंगा मैया की आर पार की चुनरी ..क्या क्या नहीं मान लिया उसने ...और बस वो वही बुदबुदा रही थी ...
करन ठीक है ...करन ठीक है , करन को कुछ नहीं हुआ है ...करन को कुछ नहीं हो सकता ...
रस्ते भर सन्नाटा पसरा था सब दुकाने बंद ...कोई रिक्शा गाडी कुछ नहीं ...
सिरफ चीखती अम्बुलेंस ...सायरन बजाती पुलिस की गाडिया और एक दो मीडिया वान ...जव वो स्टेशन पहुंची ...पहला सवाल उसने यही पूछा कोई कुली था ...शिवगंगा ...
वो बिना रुके बोला दो घंटे बाद जायेगी ...लेकिन जायेगी ...
और वो बम वाली बात ..शिवगंगा में ...रीत की धड़कन तेजी से चल रही थी ..
अब वो कुली रुक गया और बोला ...अफवाह थी ट्रेन में कोई बम्ब नहीं था अभी कुत्ता से जांच कर रहे हैं
...लेकिन प्लेटफार्म पर बम्ब बहुत तगड़ा था बहुत लोग मरे हैं ...अब पुलिस वाले किसी को भी घुसने नहीं दे रहे हैं
लेकिन रीत उन पुलिस इंस्पेक्टर के साथ थी इसलिए प्लेटफार्म पे घुस गयी .
वहां का मंजर और खौफनाक था ..प्लेटफार्म पर सिर्फ पुलिस वाले ही नजर आ रहे थे ...कुछ पुलिस वाले डेड बाडीज को एक लाइन में लगा रहे थे .
और वही उसी में रीत ने देखा ...करन के डैड को ...चेहरा उनका बहुत जख्मी था ..आँखे अभी भी खुली थीं।
रीत वहीँ जाके खड़ी होगयी ..और जो पोलिस वाला लिस्ट बना रहा था , उससे उस बाड़ी की ओर इशारा किया ...
" तुम जानती हो इनको ..." पुलिस वाले ने मुड कर पूछा
जी रीत ने बोला ...और उनका नाम पता सारे डिटेल बताए।
और तुम क्या लगती हो इनकी अपना नाम नोट कराओ ..पुलिस वाले ने पुछा
उसके साथ जो दूबे भाभी कारिश्तेदार चेतगंज थाने का इन्स्पेक्टर था उसने बोला पड़ोस की है ..
लेकिन रीत बोली ...मेरा नाम नव रीत है , और मैं पड़ोस की हूँ ...और रिश्तेदार भी।
पुलिस वाले ने नोट कर लिया।
उसकी निगाहें पूरे प्लेटफार्म पर टहल रही थीं पुलिस वालो के अलावा वहां कोई और जिन्दा नहीं था
और करन की ..करन कहीं नजर नहीं आया .
शिवगंगा ट्रेन लगी हुयी थी ...से खींच कर दूसरे प्लेटफार्म पे शिफ्ट किया जा रहा था ...
तभी उस की निगाह एक और बाडी पे पड़ी कोई महिला ...हाथ अलग ...हाथ में कुछ पकडे थीं ....
रीत बढ़ कर वहां पहुंची ...चेहरा पहचानना मुश्किल हो रहा था ...लेकिन रीत के लिए ...
उसने इशारे से पुलिस वाले को बुलाया और बोली ये ...करन ..मेरा मतलब ...करन के डैड की बाड़ी की ओर इशारा कर के बोला ...इनकी वाइफ हैं ...
पुलिस वाले ने नोट कर लिया और बोला की
"अच्छा हुआ की आप आगयीं वरना हम इन्हें अन क्लेम्ड बाडिस में डाल देते ...कल आप मार्चरी में आ जाइयेगा ...बाड़ी हम आप को ही देंगे वरना कई बार काम्प्लिकेशन हो जाती है ."
फिर मुड कर उस के साथ वाले इन्स्पेक्टर से बोला की ब्लास्ट इसी बेंच के पास हुआ था , इसलिए इस के आस पास सब से ज्यादा डैमेज हुआ है और बाडीज भी बहोत खराब हालत में हैं ...
रीत की निगाह भी बेंच की ओर पड़ी और वो बहोत जोर से चीख उठी ....भयानक हृदय विदारक चीख .....
बेंच जली मुड़ी एक ओर को झुकी पड़ी थी ...और उसपर एक अधजला कोट पड़ा था ...और एक सर विहीन पूरी तरह कष्ट विक्षत शरीर ...उसके टुकडे इधर उधर ...
कर…न ...............जोर से चीखी रीत ....
ये बड़े चेक वाले कोट को वो सोते सोते भी पहचान सकती थी ...कितना चिढाती थी उसे ...लेकिन करन नए कोट के लिए तैयार नहीं होता था ...उसकी बड़ी बड़ी पाकेट ...
वो पास आके खड़ी हो गयी ..कोट के ..पथराई निगाहों से देख रही थी ...
कुछ नहीं बचा अब ...मम्मी पापा और अब ...करन
आप ये कोट पहचानती हैं ...पुलिस वाले ने हलके से उस से पूछा ..
रीत ने हामी में सर हिलाया ...और उस की ओर मुड के बोली ...करन ...करन का ..
दूबे भाभी के रिश्तेदार इन्स्पेक्टर ने बोला ...वो जो दोनों बाड़ी देखा था ना ...उन्ही के लड़के
पुलिस वाले ने लिस्ट में करन का नाम नोट कर लिया ..
बेंच से थोड़ी दूर छिटका हुआ एक लैपटाप का बैग अधजला पड़ा था ...
पुलिस वाले ने उसकी ओर इशारा करके पूछा बोला
" इसे पहचानती है ..."
हाँ डबडबाती आँखे ऊपर कर के ...वो बोली ..करन का है है मेरे साथ ही लिया था।
पुलिस वाले ने लिस्ट में कुछ और नोट कर लिया ...
तब तक पुलिस वाले को उसके किसी सीनियर आफिसर ने बुलाया ...और वो उधर मुड गया ..
रीत ने कोट के बाहर की जेब में हाथ डाला ...वो पीला गुलाब जो घंटे भर पहले उसकी चोटी में था ..खून से लथपथ ...
अन्दर की जेब में रीत ने हाथ डाला ...उसकी चिट्ठियों का पुलिंदा ...जो करन हमेशा अपने पास रखता था ...
चिट्ठियाँ और गुलाब रीत के हाथों में थे ...और अब रीत ...पागल हो गयी
वह एक बार फिर से चीखी ...क ..र ...न ...और आस पास ..दौड़ दौड़ कर ...हाथ पैर ...उंगलिया ...ला ला कर लगाने लगी ...जैसे सब जोड़ जोड़ कर अपने करन को वो फिर से जिन्दा कर लेगी ......
आस पास के सारे पुलिस वाले दौड़ पड़े और रीत को पकड़ने लगे ...लेकिन उसके अन्दर ..जैसे दस आदमियों का बल आ गया था ....वह छुडा कर बेंच के नीचे पड़े शरीर के हिस्सों को उठाने लगी ...
किसी तरह पुलिस वाले उसे खींच के वहां से ले गए ...और उसे प्लेटफार्म से बाहर किया ...
तभी किसी ने बोला की की उस बाड़ी का सर मिल गया है ...लेकिन ...ब्लास्ट से वो रेलवे ट्रेक पर फिंक गया था ...और उसी समय एक उसके ऊपर से ..शंटिंग इंजिन ...
दूबे भाभी के रिश्तेदार जो इन्स्पेक्टर थे ..उन्होंने रीत को दूबे भाभी के घर छोड़ दिया.
रीत का घर उन के घर के ही था।
रीत के बिना बोले ही वो समझ गयीं ...कुछ नहीं बचा।
वो उस का हाथ पकड़ कर रीत को , रीत के घर ले आयीं . बाहर बहुत भीड़ थी . सब को धीरे धीरे खबर हो रही थी। उनके जूनियर वकील , शहर के ढेर सारे लोग ...
घर में ताला बंद था।
सब लोग सांत्वना के शब्द उससे कह रहे थे ...पर वह कहने सुनने से कहीं बहुत दूर थी ..
तभी पड़ोस की एक महिला , जिन्हें नहीं मालूम था की क्या हो गया है आयीं ...और रीत के कंधे पे टोकती बोलीं,
" अरे , ताला बंद है , चाभी कहाँ है ..."
" मम्मी के पास ..." रीत बुदबुदाई
" मम्मी ..कहाँ हैं .." वो फिर बोलीं .
रीत ने आसमान की ओर उंगली उठा दी ..बिना बोले ...भगवान् के पास ...
सबकी आँखे नम हो उठीं .
दूबे भाभी खींच कर उस महिला को ले गयीं और कान में फुसफुसाया ...
..
दूबे भाभी की सास नहीं थी लेकिन जब वो विदा हो के आयी तो परछन रीत की मम्मी ने ही किया , सब रस्म ...मुंह दिखाई से लेकर कंगन छुडाने तक ...और जब दूबे जी भारी मुसीबत में फंसे थे थाना कचहरी सब हो जाता ...वकील साहेब रीत के पिता जी ने ही बचाया था ..
किसी वकील ने ताला खोलने वाले को बुला के घर खुलाया ...
अब रीत की कुछ होश आया ...कहीं से ढूंढ कर मम्मी पापा की फोटो ...एक ही फोटो थी ...दोनों की साथ साथ ...ड्राइंग रूम में रखी ..
किसी ने माला लाकर चढ़ा दिया ...
रीत वहीँ चुपचाप बैठी रही , मुंह झुकाए।
गुड्डी ने उससे बोला की करन के कजीन को खबर दे दी गयी है ..गुड्डी के पास उनकी भाभी का नम्बर था ...लेकिन वो लोग परसों शाम तक ही पहुँच पाएंगे ...उन्होंने बोला है की उनका वेट ना करें .
गुड्डी, दूबे भाभी , और मुहल्ले की कुछ औरते ...रात में रीत के साथ ही रहीं
उस रात पूरे मुहल्ले में कहीं चुल्हा नहीं जला ...
और वह मुहल्ला ...बनारस का ऐसा अकेला मुहल्ला ...उस दिन नहीं था
अगले दिन लोगों ने मना किया ...की रीत के मार्चुरी जाने की जरुरत नहीं है बाडीज को रिसीव करने के लिए ...लेकिन वो गयी।
पोस्टमार्टम के बाद एक मैदान में बाडीज रखी थीं . कुल अट्ठाईस बाडीज थी लेकिन बाहर सौ से ऊपर लोग थे।
आठ बाडीज अभी भी आइदेन्तिफाइड नहीं थी . वो लोग भी लाइन में खड़े हो गए . सब लोग चुप दुखी परेशान
...लाइन में लोग अन्दर जाते ...
और अन आइदेन्तिफ़ाइड बाडीज में उनके परिवार के लोग नहीं होते तो चैन की सांस ले बाहर निकलते ...
और जिन्हें अपने घर का कोई मिलता फिर रोना चीखना ...
तीन बाडीज बहुत क्षत विक्षत थीं ...वो कैस्केट में बंद थीं और उनके आगे नाम लिखा था .करन भी वहीँ था
.जो इन्स्पेक्टर रीत से मिला था ...करन के परिवार की भी ...रीत ने ही रिसीव किया .
शाम को मणिकर्णिका घाट पर पूरा बनारस था ..करन के कजिन को कल आना था ...
और रीत ने ही सब कुछ ...एक लड़की के साथ कोई नहीं था घाट वाले जल्दी कर रहे थे ...रीत को उसका चेहरा याद था कल वो मंदिर में जो एक्जाम दे के स्टूडेंट्स आये थे ..उन्ही में से एक थी ..
" मैं हूँ .." रीत ने बोला .
नाम घाट वाले पूछा ...
नव रीत ...रीत ने बोला ...और घाट वाले ने नोट कर लिया ...
उस का भी अंतिम संस्कार उन्ही लोगो ने ...
रीत अकेली नहीं थी। पूरा मोहल्ला , गुड्डी उस का पूरा परिवार , पापा के दोस्त ...सैकड़ों लोग थे
लेकिन जब रात को रीत घर लौटी ...तो अकेली थी।
वैसे घर पे कई लोग रुके उसे दिन रात को ..दूबे भाभी , गुड्डी , पापा के कुछ दोस्त ...
बार बार उस की नजर करन के घर पे पड़ती ...अँधेरे में डूबा ..
लेकिन कुछ दिनों में सब की अपनी जिंदगी अपने काम ..
सिवाय दूबे भाभी के और गुड्डी और उस के परिवार के ...
दूबे भाभी ने उसे कित्ती बार कहा की वो चल के उस के घर चल के रहे लेकिन रीत नहीं मानी।
अब वह बोलती भी नहीं थी .
एक उसकी पुरानी नौकरानी थी ...वो उसके साथ आकर रहने लगी .
इसी बीच गुड्डी के पापा के कुछ दोस्त रेलवे में थे , उन्होंने भी चेक कराया ..
करन की वो सीट ट्रेन में खाली गयी ...वो अपनी सीट पर ..बैठा ही नहीं था ..उन्होंने ऐसी 2 के टी टी से पूछवाया था ..
दिल्ली पहुँचने पर ..पुलिस ने भी पूरी ट्रेन चेक की थी ..
करन के कजिन दो दिन बाद आये ...उसकी भाभी भी ..वो लोग रीत से भी मिलने आये ..
उन्होंने आई एम ए से भी बात की थी ..करन वहां भी नहीं पहुंचा ...
वो करन ही था ...उस कोट में ...ट्रेन चलने में अभी टाइम था ...और उस की माँ की बाड़ी भी एकदम पास मिली थी ...
अब रीत की हिम्मत भी जवाब दे रही थी ...विश्वास भी ...पहले तो वो बुदबुदाती रहती ...करन है ...करन है ...
कुछ कुछ लोग हामी भी भरते ...कौन उसे समझाता हाँ करन ...है ...उसके ख्यालों में ...उसके ख़्वाबों में
लेकिन गुड्डी आती ...रोज आती ...बिना नागा ...घंटों उसके पास बैठती ...
रीत कुछ नहीं बोलती ..तब भी ...और कभी कभी जब वो बोलती ..तो रीत खुद को ब्लेम करती ...
की हर बार वो करन को छोड़ने स्टेशन जाती थी उस बार नहीं गयी ...इसीलिए करन नाराज होकर कहीं चला गया ...
कभी कहती उस दिन अगर प्रसाद लेकर वो जल्दी चली आती ...तो मम्मी पापा के साथ वो भी ...उसे जिन्दा रहने का कष्ट तो नहीं झेलना पड़ता ..
गुड्डी बिचारी क्या बोलती ..बस उसका हाथ पकड के बैठी रहती ..
रीत कभी बोलती ...वो अभिशप्त है ...जिसने उसको प्यार किया ...उसके पास आया ...वो चला गया ...
फिर वो गुड्डी की ओर खाली खाली आँखों से देखती ..और बोलती ..
तू मत आया कर मेरे पास ...वरना जल्दी ही तेरा भी नम्बर आ जाएगा और फिर खाली सूखी हंसी हंसती ...
कोई दूसरा होता तो डर कर भाग जाता ...लेकिन गुड्डी बैठी रहती रीत के पास ..
कुछ लोग कहते की वो जोर जोर से रोई नहीं है इसलिए सदमे से बाहर नहीं आ पा रही है ...कोई डाक्टर को दिखाने के लिए बोलते ...
रीत ने स्कूल जाना छोड़ दिया था ...बल्कि घर से निकलना भी
और एक दिन वो हुआ जो ...
रीत घर से चली गयी ...
गुड्डी कही चार पांच दिनों के लिए गयी थी लौट के आई ...तो पता चला ...
सब लोग परेशान ..सब से ज्यादा दूबे भाभी ...उन्होंने बताया की ...रीत की नौकरानी ने दो दिन पहले आ कर बताया की रीत कहीं गयी थी ...लेकिन नहीं लौटी ...
जब दूबे भाभी ने डांटा तब उसने कबूला की रीत तीन दिन से घर पर नहीं है ...और उसके पहले भी कई बार रात रात भर ...
गुड्डी के पापा ..मुहल्ले के कई लोग खुद दूबे भाभी ...कहाँ कहाँ नहीं गए ...घाटों पर ...रेलवे स्टेशन , बस स्टेशन , कोतवाली शहर के सारे हास्पिटल ...मार्चरी
लेकिन उस दिन किसी ने बोल की चार दिन पहले उसे उन्होंने ...सुखमयी माँ के आश्रम में देखा था ..एक कोने में अकेले बैठी थी
दूबे भाभी दौड़ती भागती आश्रम में पहुंची ..वहां मां योगिनी मिलीं ...
फोटो देखकर उन्होंने बताया की हाँ रीत वहीँ है ...वो एक प्रवचन में बैठी थी ..सब लोग चले गए तो भी वो वहीँ बैठी रही ...माँ ने उस के सर पर हाथ रखा तो माथा तप रहा था ..उसे बहोत तेज बुखार था ...लेकिन अब वह करीब करीब ठीक है ...
दूबे भाभी फफक कर रो पड़ीं ..वो माँ के चरणों में गिर पड़ीं और उन्हें सारी बात कह सुनाई ...
माँ योगिनी सब कुछ सुनती रहीं ...फिर दूबे भाभी से बोलीं ...
"अब आप इसकी चिंता छोड़ दीजिये ....इसे कुछ नहीं होगा ...ये भगवान् आशुतोष के चरणों में है ...यह जियेगी ...और खुशियों के साथ जियेगी ...इसे बहुत बड़े बड़े काम करने है ..."
फिर उन्होने रीत को बुलवाया ...दूबे भाभी को देख कर रीत उन के पास बैठ गयी ..लेकिन
जब योगिनी मा ने उससे जाने के लिए कहा तो वो कहने लगी ...की
नहीं वो आश्रम में रहेगी ...
उन्होंने और दूबे भाभी ने बहुत समझाया ...लेकिन वो तैयार नहीं हुयी ..हार कर योगिनी माँ बोली की आप परसों आ के इसे ले जाइयेगा ..
नियत दिन दूबे भाभी फिर वो आश्रम पहुंची .
योगिनी माँ ने उन्हें बहुत बातें बतायीं समझाई ...औरउनका हाथ पकड़ कर बोला
" अब यह सिर्फ आपकी ही नहीं मेरी भी उतनी जिम्मेदारी है ...और एक बात समझ लीजिये की मैं आप पर या रीत पर कोई कृपा नहीं कर रही ...सिर्फ अपना कर्तव्य निभा रही हूँ ...आज से आपके लिए ये आश्रम , आश्रम नहीं दूसरा घर है ..."
और उन्होंने फिर रीत को बुलवा भेजा।
रीत अब एकदम स्वस्थ लग रही थी और दूबे भाभी को देख के मुस्करायी भी ...लेकिन उसकी वही रट ...वो आश्रम में ही रहेगी
माँ योगिनी ने उसके सर पर हाथ रखा और समझाया ...
" बेटी ये आश्रम तुम्हारा ही है ...और तुम्हे यहाँ से निकालने का हक़ किसी को नहीं है , मुझे भी नहीं ...लेकिन मैं तुम्हे एक ज्यादा कठिन आश्रम में भेज रही हूँ दुनिया के आश्रम में। यहाँ तो हम लोग एक सुरक्षित वातावरण में है , हमने एक छोटी दी दुनिया बना ली है चारो और दिवाले हैं ...लेकिन असली लड़ाई तो बाहर है ...किसी को तो लड़नी होगी ना वो लड़ाई ...फिर मैं तो तुम्हारे साथ ही रहूंगी हर पल ...'
उन्होंने उसके दायें हाथ पर एक धागा बाँधा ...और बोला अब आश्रम तुम्हारे साथ रहेगा हमेशा ...
रीत फिर भी जिद कर रही थी ...ये तय हुआ की वो हर हफ्ते दो दिन आश्रम में रहेगी जिस दिन माँ का प्रवचन होता है ...सोमवार को को आएगी वो और बुधवार को जायेगी ..
अगले सोमवार को फिर दूबे भाभी खुद उसे अपने साथ ले गयीं ...फिर बुधवार को उसे लेने भी गयीं ..और लौटते हुए पहली बार रीत मुस्कराई और उनसे बोली ...
" भाभी , क्यों आती है डरिये मत ...आपकी ननद हूँ ...कहीं नहीं जाउंगी ...जानेवाले गए ...अब तो जब आप मुझे विदा करेंगी तभी जाउंगी ..."
दूबे भाभी की आँखे डबडबा आयीं ...
जब वो ब्याह कर आयीं थी दस पन्द्रह दिन हुए ...रीत अपनी मम्मी का हाथ पकड़ के उसके पास आई थी
...कीती छोटी सी थी ...गोल मोल गुडिया जैसी ...साटन का गुलाबी फ्राक पहने ...टुकुर टुकर देख रही थी ..बटन सी गोल गोल आंखे ..चौथे पांचवें में पढ़ती थी ..
" मैंने सोचा की चलो आज तुम्हे , तुम्हारी छोटी ननद से मिला दूँ ...." हंस कर रीत की माँ बोली ...
दूबे भाभी की न तो सास न ननद ना देवर ....सोचती थी की कैसी ससुराल में जा रही हूँ ...लेकिन रीत की माँ ने तो परछन से ही सास की पूरी जिम्मेदारी अपने सर पे ले ली ...और देवर ननद की कोई कमी नहीं
रीत ने नमस्ते किया तो प्यार से दूबे भाभी ने खींच के उसे गले से लगा लिया ....और बोली
ननद भाभी गले मिलते हैं ...वो भी कस कर ..
रीत की माँ हँसते हुए बोलीं ...
इसी लिए तो लायी हूँ तुम्हारे पास ...पूरी ट्रेनिंग करवा दो इसकी आखिर तुम्हारी छोटी ननद है , तेरी जिम्मेदारी है ...अब आज से ये तेरे हवाले .."
"पूरी ट्रेनिंग करवाउंगी समझ लेना ..डरोगी , भागोगी तो नहीं ..."
दूबे भाभी ने गले लगाए हुए रीत से बोल ...और गाल पे प्यार कर लिया .
रीत बोली मैं डरने नहीं ..
रीत ने दूबे भाभी का हाथ पकड़ कर खींचा और वो यादों के दायरे से वापस आयीं
वह लोग दूबे भाभी के घर के सामने ही खड़ी थीं और रीत खुद उनके घर में आ गयी .
दूबे भाभी ने उसकी मनपसनद , दाल भरी पूड़ी बनाई ...गुड्डी भी आगयी थी ....पुराने दिनों की तरह ...देर तक वो लोग गैप लगाते रहे ...दूबे भाभी ने उससे फिर कहा की वो उन्ही के साथ आ के रहे तो
रीत मुस्करा के बोली ...आउंगी भाभी एक दिन अचानक आ जाउंगी सब सामान वमान लेके भगाइयेगा तो नहीं ..और वो और गुड्डी बतियाते निकल गयी पुराने दिनों की तरह ...
लेकिन पुराने दिन कहाँ आते हैं ...
रीत के पैरों के चक्कर अभी भी बंद नहीं हुए थे ...बस वो भटकती रहती थी ...हाँ बस खाना देर सबेर कुछ खा लेती थी ..थोडा बहुत बोल भी लेती थी ...
एक दिन वो फिर देर रात तक घर नहीं आई तो परेशान होकर वो आश्रम में पहुंची तो माँ ने समझाया ...
" आप मत चिंता करिये उसकी , उसकी रक्षा करना मेरे आपके बस की बात की नहीं ...उसकी रक्षा खुद काशी के कोतवाल करते हैं , चौसठो योगिनिया साथ है उसके ...'
और जब दूबे भाभी लौट के आयीं ...तो रीत मिल गयी अपने घर के गेट पे गुड्डी से बात करती एकदम सहज ...और उसके माथे पे काला टीका था ...भैरव ...काशी के कोतवाल ...उन्ही के यहाँ का टीका था ..
और रीत के पैरों का चक्कर बंद हुआ शीतला घाट पर ...
दिन वही समय वही ...बस खबर थोड़ी अलग ...मुख्यमंत्री अलग लेकिन प्रतिक्रिया वही
दिन मंगलवार ..समय शाम शाम के साढे छह बजे ...
बस तारीख ७ दिसंबर ...जगह शीतला घाट ...दशाश्वमेध घाट के बगल में
और अगले दिन अखबार की खबर थी
One killed, many injured in Varanasi bomb blast
The explosion occurred at Sheetla Ghat, adjacent to the main Dashashwamedh Ghat where the sunset aarti, the evening prayer ritual to the holy river, Ganges had commenced, on these stone steps leading to it, where thousands of worshipers and tourists had gathered. It killed a two-year old girl, sitting on her mother's lap, the mother was one of three critically injured, more than 38 other people were injured. In the ensuing panic after the blast, a railing broke causing a stampede leading to an increase in the number of injuries. The bomb was hidden inside a milk container on the Sheetla Ghat.
Sitala Ghat is the southern extension of the Dashashwamedh Ghat, and its stone steps lead to Sitala Mata Temple.
After the incident 20 injured were admitted to BHU Hospital, 13 in Kabir Chaura Hospital, while 4 were sent to Heritage Hospital in the city. Six foreigners tourist were also injured including an Italian, Alexandeo Mantello, who was later said to be out of danger, French national Rachael, Ki Taro from Japan, South Korean Wan Sen Kim, Italian Lydia de Mayo and a German citizen, Ozel
After the incident the Chief Minister of Uttar Pradesh Mayawati and Union Minister of Home Affairs P. Chidambaram visited the site, and appealed for peace
Additional Director General of Police (ADG)-- Law and Order, said: "The state has been put on high alert. And anti-terrorist sqauds and a bomb disposal squad have been rushed to the site."
और रीत भी वहीँ थी ...ब्लास्ट से मुश्किल से २ ० ० मीटर दूर
दिन वही समय वही ...बस खबर थोड़ी अलग ...मुख्यमंत्री अलग लेकिन प्रतिक्रिया वही
दिन मंगलवार ..समय शाम शाम के साढे छह बजे ...
बस तारीख ७ दिसंबर ...जगह शीतला घाट ...दशाश्वमेध घाट के बगल में
और रीत भी वहीँ थी ...ब्लास्ट से मुश्किल से २ ० ० मीटर दूर ..
और फिर वही दृश्य ...सीढियों से बहता खून ...इधर उधर गिरे पड़े घायल , चीख पुकार ,भगदड़ ...चारो ओर छूटे हुए चप्पल ...
रीत ने एक पल देखा ...फिर अपना दुपट्टा कमर में बाँधा ...और झुक के घायलों को उठाने में जुट गयी ...
थोड़ी देर में उसने देखा ..एक लम्बे तगड़े बुजुर्ग ..साठ से ऊपर के रहे होंगे ...उसके साथ आ गए थे ...और उन लोगो ने मिल कर करीब पन्द्रह बीस घायलों को उठा उठा कर सडक पर खड़ी गाड़ियों और एम्ब्लेंस तक पहुँचाया .
ये फेलू दा से उसकी पहली मुलाकात थी।
वो फेलू दा और एक पंडित जिसे रीत भी जानती थी और फेलू दा भी ...पास के एक मंदिर में बैठे थे ...और रीत बडबडा रही थी ...
" हम सब लोगों को मर जाना चाहिए ..एक एक कर के क्यों मारते हैं ...एक साथ मार दें ना ...बिचारी उस दो साल की बच्ची की ...कितनी जिंदगी थी क्या बुरे कर्म किये होंगे उसने ...
और उस की माँ ...उस की गोद में उस की बच्ची मरी ...जिंदगी भर नहीं सो पाएगी ...
कीड़े मकोडो की तरह बस पड़े पड़े ..किसी ने स्प्रे किया मर गए ...मंदिर में घाट पर स्टेशन पर कभी भी ...हम सब लोग ना लाइन में खड़े होकर गंगा में कूद पडे ...ख़तम करें ये कहानी .. रोज. रोज की ..:"
" मरने से कुछ नहीं होता , मारना पड़ेगा ...अगर वो मार सकते हैं तो हम क्यों नहीं ...जीना पड़ेगा ...मारना पड़ेगा .."
फेलू दा की गुरु गंभीर आवाज के आगे सब चुप हो गए, रीत भी।
पहली बार इस तरह की बात किसी ने बोली थी ..रीत से।
लेकिन पीछे से किसी ने टोका ..
" किसको पकड़ें , किसको मारें ..कायर है ससुरे सब ...छिप के वार करते हैं ..."
फेलू दा ने उसकी ओर मुड के बोला ...
" क्यों ...मिल्क कैन में बम था ...कोई आके रख गया होगा ...दिखाई नहीं पड़ता हमें ..चौक्कने क्यों नहीं रह सकते हम खाली कचर कचर बतियाएंगे ...अगर हम आँख खोल कर रखें ...कान खोल कर रखें ...लेकिन नहीं हम तो बड़ा बड़ा मुंह खोल कर बड़ी बड़ी बाते करते हैं ..."
रीत को लग गया ये इंसान कुछ अलग किस्म का है।
" अरे भगवान ही ..." पंडित जी बोले की उनकी बात तुरंत उन्होंने काट दी
" आप तो पंडित , ज्ञानी हैं कम से कम आप को कम से कम ऐसी बात नहीं बोलनी चाहिए ..राक्षसों को मारने के लिए ..." फेलू दा बोले .
" मनुष्य रूप में अवतरित हुए " पंडित जी बोले .
" मतलब साफ है ...भगवान् को भी मनुष्य बनना पड़ा ...और इ सब कौन हैं टुण्टपुन्जिये ...चिल्लर ...इनसे हम नहीं निपट सकते ."
अब सब लोग चुप थे.
रीत कुछ रुक कर बोली ..." लेकिन कैसे ..."
फेलू दा मुस्कराए , किसी ठेले वाले को जोर से चाय के लिए बोला और रीत की ओर मुंह कर के बोले ..
" अब तुमने इतने दिनों में एक सही बात की है ...उसके लिए पहले जीना शूरु करो ...मरे हुए लोग किसी को नहीं मार सकते .."
फिर पीछे से किसी ने टोका ..इ बिचारी लड़की दुःख की मारी ..."
"आप लोग भी ना .." फेलू दा ने तुरंत काउंटर किया " मधु कैटभ महिषासुर ...किसने मारा था ...देवी माँ ने ना ...तो जिस देश में देवता त्रस्त होकर देवी के पास जाते हैं ...और वही कष्ट दूर करती है उस देश में ...
लड़की का बहाना बनाना ...और दुःख सुख की बात ...इतने दिन पहले अर्जुन को समझा गए ...सुख दुःख कुछ नहीं होता कर्म होता है ...और हम सब भूल गए ... भागो नहीं , लड़ो , बदलो ...
जब तक ये नहीं होगा चप्पे चप्पे पे पुलिस लगा दो ...तब भी कोई आ के मार के चला जाएगा . इस के पहले एक बार और भी हमला ..."
पीछे से किसी ने भूल सुधार किया ..
"एक नहीं दो बार ...यही दशाश्वमेध घाट पे ...ओह समय त पुलिस गैस सिलिंडर ब्लास्ट मानी गयी ...लेकिन बाद में ...नयी धारा लगाई ...और जो बेचारे घायल हुए उ अभी तक ...."
" और अभी फिर हमला करेंगे ससुरे ..." कोई और बोला ....
" एकदम ..." फेलू दा के मन की बात थी ये ...जबतक हम मुड के उनका पंजा ना मोड़ देंगे .."
धीरे धीरे सब लोग उठने लगे।
रीत को फेलू दा एकदम अलग लगे। सब लोग उसे सांत्वना देते , कोई भाग्य को उल्टा सीधा बोलता ...लेकिन पहली बार कोई उसे जीने का मकसद देता हुआ दिखा।
फेलू दा के साथ वो उनके घर आई ...गौदौलिया के बगल में ही रहते थे .
उनके घर पहुँच कर उसने देखा की दीवालों पर जगह जगह ड्राइंग रूम में , सर्टिफिकेट लगे थे . वो अपने जमाने के बंगाल के बड़े मशहूर प्राइवेट डिटेक्टिव थे ...और उसे मजेदार ये लगा की एक दो सर्टिफिकेट कुश्ती और अन आर्म्ड कम्बैट के भी थे ..
फिर एक धुल से पटी फाइल थी ...वो उसने पलटी ..उसमें अखबारों की कटिंग्स थी ...और उसमें भी उन्ही के चर्चे थे , हीरों को चोरी से कलर किड नैपिंग तक के ..
तब तक रीत को उनके आने की आहट सुनाई पड़ी ...और उसने फाइल रख दी .
फेलू दा सन्देश का एक प्लेट ले कर आये थे ..
रीत के दिमाग में एक सवाल कुलबुला रहा था उसने पूछ लिया
हमारे पास हथियार क्या है
फेलू दा ने अपने सर पर खट खट की ...और बोले मगज अस्त्र ...सबसे बड़ा अस्त्र ...मगज अस्त्र ..लेकिन तुम्हारे लिए ...जरूरी है पन्ना पलटो ..
"मतलब ..." रीत की समझ में कुछ नहीं आया।
" समझो ...अगर कोई पन्ना भरा हुआ है ...और तुम उसपर लिखना चाहती हो ...लिख पाओगी क्या ...
और लिख लिया भी तो पढ़ पाओगी क्या ...इसलिए कह रहा हूँ ..पन्ना पलटो ...
नया पन्ना ..सादा पन्ना खोलो ...और नयी कथा लिखो ...नयी बात ...नयी शुरुआत ...होगा नहीं ...उसके बिना ..."
रीत को फेलू दा की बात समझ में आ गयी ...और पसंद भी आ गयी
देर तक वो फेलू दा से बातें करती रही ...और जब वो उठी तो फेलू दा ने बोला ...की वो उसे छोड़ आएंगे ...
रीत ने हंस कर मना कर दिया और बोली की वो घर पहुँच कर उनको फोन कर देगी ...
और जब रीत ने घर पहुँच कर फेलू दा को फोन किया ..
उनकी रिंग टोन थी ...वी शैल ओवरकम ..
रात में ही सब माल असबाब लेकर रीत दूबे भाभी के घर पहुँच गयी ...
और जब दूबे भाभी ने उसे देखा तो आंसू उनके गाल पे छलक आये ...और उन्होंने रीत को अंकवार में भर लिया ..
उन्होंने रीत के लिए पूड़ी बनायीं ...ऊपर से गुड्डी भी आ गयी और रात भर उन लोगो ने चकल्लस की .
रीत ने पन्ना पलट दिया ..अगले ही दिन .
दो दिन बाद अखबारों में एक इश्तहार निकला ...
" मैं नव रीत मेरा हाईस्कूल का रोल नंबर ...मेरा नाम आज से रीत है ..."
करन उसे रीत ही तो कहता था ...वो कहता था नव रीत में नव सुपर फ्लुअस है
और जब रीत ने पुछा क्यों ...तो वो बोला
"देखो ..सुन्दरता की परिभाषा ये है की वो हमेशा नयी लगे , नित नूतन ...और रीत तो खुद सुन्दरता की परिभाषा है ...तो उसके आगे नव या कोई भी विशेषण क्यों लगाओ ...सिर्फ रीत ही कह देना काफी है ..."
दूसरा पन्ना उसने ये पलटा ,
उसने तय किया की वो फिर से कालेज जाना शुरू करेगी ...लेकिन वहां उस कान्वेंट में नहीं जहाँ वह पढ़ती थी ...पग पग पर यादों की झुरमुट थीं वहां ...
एक ट्रेडिशनल से सिर्फ लड़कियों वाले स्कूल में उसने दाखिला ले लिया ...
लेकिन साथ साथ ...देर तक सोने वाली रीत ...सुबह सूरज उगने से पहले उठकर ..पास के सिगरा स्टेडियम में दौड़ने जाती ...पूरे पांच चक्कर ...फिर योगासन , शाम को जिम ...
हफ्ते में तीन दिन उसे कराटे खुद फेलू दा सिखाते ..और ना जाने क्या क्या मोटी मोटी किताबें ...पावर आफ आब्जर्वेशन , डिटेक्टिव टेक्निक ...पढ़ा करती ..
और साथ साथ वो दूबे भाभी के साथ साथ इतनी घुलमिल गयी ...उनके सब कामो की जिम्मेदारी उसने ले ली
दूबे भाभी के पति बाहर रहते थे साल में एक दो बार आते ..
दूबे भाभी के यहाँ ब्लाक प्रिंटिंग का काम होता था ....बनारस में साड़ियों का जो काम होता था ..उसके चक्कर में उन्हें कभी काम की कमी नहीं रहती थी ..दो चार औरतें काम करती थीं ...उसकी भी जिम्मेदारी रीत ने सम्हाल ली ...
और साथ में जो उनकी गप्प गोष्ठी होती थी ...ऊपर से चंदा भाभी आ जाती थीं ...फिर संध्या दीदी ...कुछ दिनों में रीत को उन्होंने अपने रंग में रंग लिया।
.. दूबे भाभी के साथ ठेठ भोजपुरी गाने , शादी में गाई जानेवाली गालियाँ , खुल के मजाक , सब कुछ उसने सीख लिया ...शादी में कोई भी 'रतजगा ' उसके और दूबे भाभी के बिना पूरा नहीं होता था
( रतजगा : पारंपरिक घरों में जहाँ बारात में औरतें नहीं जाती थीं , वहां घर की और मोहल्ले की औरतें ...रात भर जग कर 'रतजगा' करती थीं ...और इसमें चूँकि सिर्फ औरतें रहती थीं ...इसलिए बहुत खुल कर गाने मस्ती धमा चौकड़ी होती थी )
और फिर दूबे भाभी जब अपना भाभी वाला रूप अख्तियार करती थीं ..तो रीत को नहीं बख्शती थीं ...और रीत भी जब ननदों के साथ मिल जाती थी तो ...दूबे भाभी को नहीं छोड़ती थी
दूबे भाभी ने हर चीज में रीत को ट्रेंड कर दिया था ..उनकी चंदा भाभी , संध्या दीदी सब की कोशिश रहती थी ...बस रीत मुस्कराती रहे और रीत भी यही कोशिश करती थी की उनके रंग में रंग जाय
रीत एक दिन गुड्डी के साथ गयी अपने घर , किताबे लाने ...और गुड्डी के साथ मिलकर जीतनी पुरानी उसकी फोटुयें थीं करन की , सारी चिट्ठिया ..यहाँ तक की कालेज मैगजींस ..सब एक बड़े बैग में रख कर आलमारी में बंद कर दिया।
और सिर्फ रीत ने नहीं गुड्डी ने मुझे बताया , सभी लोगों ने चाहे दूबे भाभी या मुहल्ले का कोई और ...जैसे सारे पुराने दिन , पुरानेदिनो की यादों को एक पुराने से सन्दुक में बंद कर ,
उसमें एक भुन्नासी ताला लगाकर ..चाभी नदी में फ़ेंक दें बस वैसा ही
कोई भी रीत के बारे में पूछता तो बस लोग उसे दूबे भाभी की ननद ही कहते ...ना उससे ज्यादा ना उससे कम ..
और उस हादसे की तो कोई पूछने पे भी चर्चा नहीं करता ...
लेकिन गुड्डी ये देखती की कई बार मजाक और हंसी के दौर में जब रीत एकदम बिंदास लगती ..अचानक ...उसकी आँखे सूनी सी लगतीं ...वो कहीं खो जाती ...और फिर थोड़ी देर बाद सायास वापस आती
एक दो बार जब गुड्डी उसके कमरे में अचानक घुसी तो उसने देखा की ...कोई कापी है जिसे रीत वहां से जल्दी से हटा देती है .
एक दिन गुड्डी से नहीं रहा गया ..
रीत वही कापी खोल कर देख रही थी ..गुड्डी घुसी और रीत ने कापी बंद कर दी ...
गुड्डी बहोत धीमे से बोली ...मुझसे भी ...
रीत एक सूखी सी हंसी हंसी और ...सूनी आँखों के साथ कापी उसकी ओर सरका दी
गुड्डी ने कापी खोल ली ...और फिर उसे लगा उसने गलत किया ...
करन की सारी फोटुयें , यहाँ तक की कालेज मैगजीन में छपी उन दोनों ने ...एक बैग में रखकर रीत के घर में ताले में बंद कर दिया था ..
कापी में करन का एक स्केच ...रीत ने खुद बनाया था ...हु बहु ..
नीचे फराज साहब का एक शेर लिखा था ..
उस शख़्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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