FUN-MAZA-MASTI
हैलो दोस्तो, सभी को पता ही है कि दिल्ली के लड़के और लड़कियाँ कैसे हैं। मुझे सैक्स के बारे में सब कुछ पता है, सैक्स किया भी है। मेरे दोस्त भी कहते 'साले तुझे इतनी लड़कियाँ लाइन देती हैं, पर तू कभी किसी के साथ कुछ नहीं करता।'
मैं भी कह देता कि भाई प्यार का चक्कर ही खराब है। वैसे मन तो मेरा भी करता था, सैक्स करने का पर कोई सरदर्द ना हो जाए बस यही सोच कर दूर रहता था। स्कूल टाईम में कई बार सैक्स किया है, पर वो फिर कभी। बता दूँ क्लास 11 से ही हाथ से अपनी गर्मी शान्त करता रहता हूँ।
इस साइट पर मैंने काफ़ी कहानियाँ पढ़ी हैं, कुछ तो ऐसी हैं जिन्हें पढ़ कर मजा आया और कुछ तो बकवास होती हैं, जितनी भी कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं उनमें मुझे बड़ा मजा आया, खैर अपनी कहानी पर आ जाता हूँ।
आपको बता दूँ मैं कुछ भी काम नहीं करता, बस पढ़ाई और घूमना-फ़िरना। मेरे घर में हम दो भाई हैं। वो अपना अलग काम करता है। और मैं घर से दूर अलग अपना रूम ले कर रहता हूँ। दोपहर में आने के बाद मैं सारा दिन खाली होता हूँ, मैंने सोचा की पार्ट टाईम कुछ काम किया जाये।
मैंने पास में ही एक कम्प्यूटर सेंटर में चार घन्टे के लिये पढ़ाना शुरु कर दिया। वहाँ पर बहुत सी लड़कियाँ आती थी। उन के बारे में कभी गलत ख्याल मन में नहीं आया, क्यों कि वो सब मुझ से पढ़ने के लिये आती थीं और मैं अपने काम को कभी भी खराब नहीं करता।
मेरे वहाँ पर आने के कुछ दिनों के बाद वहाँ पर दो लड़कियों ने एक साथ एडमिशन लिया दोनों ही मेरी हम-उम्र थीं, उनका नाम था ममता और नैना, दोनों ही अच्छे कद काठी की थीं। मैंने उन्हें कुछ ज्यादा भाव ना दे कर साधारण तौर पर ही लिया।
दोनों ने आकर मुझे अपनी स्लिप दिखा कर पूछा- सर क्या आप ही हमारी क्लास लेंगे?
मैंने कहा- हाँ, आप अन्दर आ जाओ।
और उन्हें बैठने के लिये कह कर वापस क्लास में आ गया। मैं फ़्री होकर उनके पास गया।
मैंने पूछा- नाम क्या है आप दोनों के?
"ममता और नैना !"
"ओके ! पर ममता कौन है और नैना कौन?"
"मैं ममता और यह नैना।"
मैंने एक बात पर गौर किया कि ममता नैना से अधिक तेज-तर्रार है। वो हर बात का जवाब देती रहती थी। पर नैना... वो बस पूछ्ने पर ही जवाब देती थी।
कुछ दिनों के बाद मैंने देखा कि नैना किसी से फ़ोन पर बात कर रही है। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, पर मैंने उसे कहा- तुम बाहर जा कर बात करो, क्लास में मोबाईल का प्रयोग करना मना है।
वो बाहर जाकर बात करने लगी, मैंने देखा कि वो कुछ परेशान है।
मैंने ममता से पूछा- इसे क्या हुआ है?
"अरे सर, बस वही ब्वायफ्रैन्ड का लफ़ड़ा और क्या !"
"ओह… पर यह इतनी दुखी और परेशान??"
"कल मिलने नहीं आया वो इससे, यह भी ना पागल हो गई सर, उस लड़के के चक्कर में !"
फिर ममता अपना काम करने लगी। कुछ देर बाद मैं बाहर आया तो देखा के नैना रो रही है। मैंने कुछ नहीं कहा और वापस क्लास में आ गया।
अगले दिन मैंने देखा की नैना उदास सी थी। मैंने उन दोनों से कहा- आप दोनों ‘थ्योरी-रूम’ में आ जाओ।
दोनों वहाँ जा कर बैठ गईं।
"कैसी हो आप दोनों?"
ममता- मैं तो सही हूँ सर, इसका पता नहीं।
मैंने कहा- क्यों? नैना को क्या हुआ है?
नैना- कुछ नहीं सर, बस ये तो पागल है।
"चलो कोई बात नहीं… और नैना कोई फालतू की टैन्शन मत पालो" मैंने कहा।
नैना- नहीं सर, कोई टैन्शन नहीं है।
"वैसे मुझे सब बता दिया है ममता ने !" और मैं हँसने लगा…
नैना- क्या सर…! क्या बताया सर इसने?
"यही कि तुम कल क्यों रो रही थी !"
यह सुन कर उसने ममता की तरफ देखा और उसे कोहनी मार कर कहा- ममता, तू सर के सामने ये सब बातें क्यों करती है?
मैंने कहा- मैंने ही इससे पूछा था।
ममता- तू परेशान ना हो ! सर किसी से कहेंगे थोड़ी ना… सर की भी कोई बन्दी-वन्दी होगी ! क्यों सर?" और वो यह कह कर हँसने लगी। मुझे भी सुन कर हँसी आ गई… और नैना भी मुसकुराने लगी…
मैंने कहा- चलो अब तो नैना भी हँस दी… अब क्लास शुरु करते हैं।
तभी ममता ने कहा- सर आज रहने दो ना…! मूड नहीं है आज पढ़ने का !
"क्यों? आज क्या है?" मैंने कहा।
ममता- नहीं सर, आज मत पढ़ाओ प्लीज… कल पक्का पूरा टाईम पढ़ेंगे।
"ओ के… लेकिन अब क्या करें?"
ममता- बस सर कुछ बातें करते रहते हैं।
"पर यह नैना तो कुछ बोलती ही नहीं है।"
ममता- अरे सर, आप ही समझा दो इसे, मेरा कहा तो यह मानती नहीं। वो साला इसे पागल बना रहा है और यह है कि खुद ही पागल बन रही है।
नैना ने सर झुका लिया…
"क्यों नैना? यह सच है क्या?"
" पता नहीं सर, यह कहती है कि वो कई लड़कियों के साथ दोस्ती रखता है।"
"तो क्या हुआ ! यह तो आम बात है, तुम्हें यह लगता है तो तुम भी किसी और से दोस्ती कर लो और एक बात, देखो प्यार-व्यार आजकल कोई नहीं करता, बस सभी को टाईम पास करना होता है।"
ममता- हाँ सर, मैं भी यही कहती हूँ। यह सब बकवास है, पर ये माने तब ना !
"हाँ यह तो सही बात है… जब वो सीरियस नहीं है तो तुम भी मत होना। नहीं तो और ज्यादा दुखी हो जाओगी।"
ममता- सुना तूने…! सर, मैं भी यही बोलती हूँ।"
नैना- सर मैंने पहली बार किसी से दोस्ती की है।
ममता- सर आपकी कोई दोस्त नहीं है क्या?
"अरे नहीं मैं तो कभी भी प्यार के लफड़े में नहीं फँसा… हाँ दोस्त तो बहुत सी हैं… सब बहुत अच्छी हैं, पर लवर किसी को नहीं बनाता।"
यह सब नैना बड़े गौर से सुन रही थी।
ममता- क्यों सर? क्या किसी ने दिल तोड़ दिया था आपका?
और वो नैना के साथ हँसने लगी, मेरी भी हँसी छूट गई।
"बस सीरियस रिलेशन से डर लगता है और कोई बात नहीं।"
ममता- सर, आप ना बिल्कुल मेरी तरह सोचते हो, आप से मेरी खूब पटेगी।
तब मैंने कहा- तुम नैना को भी अपने जैसा बना दो, तब यह भी खुश रहा करेगी।
ममता- नहीं सर, आप समझाना इसे, क्या पता आप की बात मान ले !
"कोई बात नहीं मैं कोशिश करूँगा, चलो अब आपका टाईम हो गया है, आप लोगों को घर भी जाना है।"
दोनों ने कहा- बाय सर।
"बाय !"
मुझे कुछ अजीब सा लगा कि इन दोनों की सोच अलग-अलग है, फिर भी कितनी पक्की दोस्ती है इन दोनों में।
अगले दिन…
"हैलो सर !" दोनों ने कहा।
मैंने भी सर हिला कर जवाब दिया- हैलो !
आज नैना कुछ खुश लग रही थी, तभी ममता बोली- सर आप ने तो कमाल कर दिया। आपकी बात मान गई यह लड़की।
मेरी कुछ समझ नहीं आया, बस मुस्कुरा दिया।
क्लास के बाद ममता ने कहा- सर जरा बाहर आना।
बाहर आकर मैंने पूछा- हाँ बोलो क्या हुआ?
ममता- अब बोल ना, तूने कहा मैंने बुला दिया।
मैं उन दोनों को देख रहा था- जल्दी बताओ क्या बात है?
नैना- सर आप सन्डे को फ्री हों, तो आप से मिलना है।
"मैं तो फ्री होता हूँ… पर क्या बात है? अभी बता दो ना!"
नैना- नहीं सर, वो कल वाली बात आपने पूरी नहीं की, बस वही सब बातें।"
"ओह… कोई बात नहीं मुझे बता देना। मैं तुम से मिल लूँगा। आप दोनों आ जाना।"
"ठीक है सर !"
दोनों ने 'बाय' किया और चली गई।
उन्होंने शनिवार को मुझे कहा कि वे रविवार को शाम पाँच बजे पार्क में मिलेंगी।
रविवार को मैं अपनी कैज़ुअल ड्रेस में उनसे मिलने गया। जिस पार्क में वो आने वाली थी मेरे रूम के पास ही था। मैं निक्कर और टी-शर्ट में ही चला गया। सही पाँच बजे वो दोनों आ गईं।
"हैलो सर !"
मैंने भी सर झुका कर जवाब दिया।
"कैसे हो आप?"
ममता- सर मैं तो, आपको पता है मजे में ही होती हूँ। आजकल यह भी मजे में है सर !
मैंने हँस कर कहा- क्यों, यह भी हमेशा मजे में ही होती है, पर लगता है तुम इसे मजे नहीं लेने देती हो।"
ममता- नहीं सर, जिस दिन से आपसे बात की है ना, उस दिन से यह कुछ ज्यादा ही मस्त हो गई है।"
नैना- नहीं सर, वो आपने कहा था ना कि ज्यादा सीरियस मत हो। मैंने घर जा कर सोचा तो लगा कि आप सही कह रहे हैं।
"मेरा तो यही सोचना है देखो… आगे तुम लोगों की मर्जी !"
नैना- हाँ सर, मैंने सोचा तो यही लगा कि मैं कुछ ज्यादा ही दुखी हो रही हूँ, कल मैं उससे मिलने भी नहीं गई।
मैंने पूछा- क्यों नहीं गई तुम?
"वो ना सर कुछ ज्यादा ही जिद कर रहा था और मुझे कुछ जरुरी काम था, तो मैंने मना कर दिया। वो गालियाँ देने लगा तो मैंने फोन काट दिया। उसके बाद से मैंने उस बात भी नहीं की।"
"यह तो गलत है, 'गाली' तो हद हो गई।"
ममता- हाँ सर, वो साला इसे गाली देकर बात करता है।
"उससे सब कुछ खत्म कर दो, वो सही नहीं है, देख लो !" मैंने कहा।
नैना- मैं भी यही सोच रही हूँ सर।
"कोई बात नहीं, जैसा सही लगे वो करना !"
"हाँ सर, ठीक है।"
ममता- और सर आप बताओ आपकी कोई नहीं है क्या?
"मैंने कहा था ना, कोई नहीं है।"
"मजाक मत करो सर, यह हो ही नहीं सकता कि कोई भी ना हो… कोई तो होगी ना !" और वो हँस दी।
फिर हम सब हँस दिये…!
मैंने कहा- अभी तक तो नहीं है, अगर कोई है तो बता दो। लेकिन मेरे टाईप की हो, यह ना हो कि मेरे पीछे ही पड़ जाये।
ममता- ओके सर, मिलने दो कोई भी होगी तो जरुर बताऊँगी।
"क्यों तुम भी तो मेरी तरह सोचती हो। तुम ही बन जाओ ना !" मैंने यह बात मजाक में कही थी।
"आपको कोई भला मना कैसे करेगा, लो मैंने भी हाँ कर दी…" और फिर सभी जोर से हँसने लगे।
मैंने कहा- मजाक कर रहा हूँ, बुरा मत मानना।
आँखें मटकाते हुए उसने कहा- पर सर मैं तो तैयार हूँ, आपका क्या विचार है?
फिर सब जोर से हँसने लगे।
हमने दो घन्टे बात की, फिर वो जाने लगे तो ममता ने कहा- सर मैं आपसे सच कह रही हूँ। जो मैंने कहा है, उसके बारे में सोचना।
मुझे लगा कि वो अब भी मजाक कर रही है- मैं कैसे यकीन करूँ कि तुम सच कह रही हो?
"आप कैसे यकीन करोगे सर?"
"वो तो तुम्हें पता होगा !"
फिर उसने कुछ सोचा और कहा- ठीक है, आप आँखें बन्द करो।
मैंने कहा- नहीं ऐसे ही बताओ।
"नहीं, आप करो तो सही...!"
'ओके !' मैंने आँखें बन्द कर लीं।
कुछ नहीं हुआ।
"अरे गई क्या तुम? मैं आँखें खोल रहा हूँ।"
"नहीं अभी नहीं खोलना !" और फिर वो हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।
"अरे गई क्या तुम? मैं आँखें खोल रहा हूँ।"
"नहीं अभी नहीं खोलना !" और फिर वो हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। ममता ने मुझे होंठों पर चुम्बन किया, करीब 5 सैकेन्ड तक…
मेरी आँखें यूँ ही बन्द रही। जब मैंने खोलीं तो देखा वो दोनों जा रही थीं। ममता हाथ हिला कर मुझे ‘बाय’ कर रही थी।
मुझे होश सा आया तो देखा मैं वहाँ अकेले खड़ा था और रात होने वाली थी।
मैं घर आ गया। अगले दिन वो दोनों आईं, बस मुस्कुराईं और कम्प्यूटर ऑन किया और काम में लग गई।
तभी ममता बोली- सर मुझे प्रोब्लम हो रही है, बता दो।
मैं उसके पास जाकर उसे सही से समझाया और जाने लगा।
वो बोली- सर, बुरा मत मानना कल के लिए।
"नहीं कोई बात नहीं।"
"तो क्या सर आप करोगे मुझसे दोस्ती?"
"हम बाद में बात करते हैं, ओके ! अभी काम करो।"
कुछ देर बाद, "सर आप ने जवाब नहीं दिया?"
मैंने कहा- नहीं ममता, यही मेरा जवाब है।
उसने कहा- कोई बात नहीं सर, पर आप बुरा मत मानना। मेरे मन में जो था, मैंने कह दिया !
"नहीं, कोई बात नहीं।"
"थैंक्स सर !"
"तो ठीक है सर, सण्डे को मिलते हैं, पर इस बार मैं ही आऊँगी अकेली, नैना को उस दिन कहीं जाना है।"
"आ जाना !"
उसने जाते हुए फिर से मुझे एक फ्लाईन्ग चुम्बन दिया, मैं हँस दिया।
शनिवार को ही उसने इतवार को चार बजे आने का कह दिया। मैंने भी उसे सीधे रुम पर आने के लिये कह दिया।
मैं बता दूँ ज्यादातर लड़के अपने कमरे में कम कपड़ों में ही रहते हैं, तो मैं भी कम कपड़ों में ही रुम पर रहता हूँ। या तो निक्कर में या बस तौलिये में।
रविवार को सारा कमरा साफ किया। पूरा काम खत्म कर के दोपहर में टीवी चला कर देखने लगा और देखते-देखते सो गया। मैंने बस टावल ही पहना हुआ था। मुझे पता ही नहीं लगा ममता कब आई। मुझे पता जब चला जब मैंने गेट पर आवाज सुनी।
मैंने देखा कि मेरा तौलिया खुला पड़ा है और मेरा लंड पूरी तरह से तना हुआ है। मैंने तौलिया सही किया और गेट पर जाकर देखा तो ममता खड़ी थी। मैं उसे देख कर चौंक गया, देखा तो घड़ी में चार बजे हुए थे।
मैंने कहा- एक मिनट रुक जाओ।
"क्या हुआ…?"
"मैं कपड़े पहन लूँ।"
"कोई बात नहीं… पहन लीजिए।"
"कपड़े पहन कर मैंने दरवाजा खोल दिया।"
"अन्दर आ जाओ ममता।"
वो अन्दर आकर और बैठ गई।
"और सर क्या कर रहे थे?"
"मैं तो बस काम कर के सो रहा था… आज तुम्हारी सहेली नहीं है साथ?"
"वो सर कहीं गई है, अपनी मम्मी के साथ।" और वो कुछ नहीं बोली।
"तो बताओ क्या बात है… क्यों मिलने के लिये कहा था, बोलो?"
"सर मुझे लगा कि आप उस दिन की बात का बुरा मान गए।"
"मैंने कब कहा कि मुझे बुरा लगा…?"
"नहीं सर वो चुम्बन के बारे में बात कर रही हूँ।"
मैं हँसा, "अरे नहीं कोई बात नहीं… पर तुम्हारा बताने का स्टाईल अच्छा था।"
वो भी हँस दी, "वो सर मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैंने कर दिया।"
"पर तुम्हें चुम्बन करना आता नहीं है," मैं फिर हँस दिया।
"तो आप सिखा दो ना सर !"
"नहीं तुम्हें नहीं सिखा सकता।"
"क्यों?" उसने हँस कर कहा।
"नहीं तुम मेरी स्टूडेन्ट हो।"
"फिर आपने यह क्यों कहा कि मुझे चुम्बन करना नहीं आता।"
"वो तो सच है… तुम्हें नहीं आता।"
"ठीक है आज मैं फिर से करती हूँ… मुझे भी तो पता चले कि मैंने क्या गलती की है।"
"नहीं अब नहीं।"
"आज सर मत रोको, आपको बताना ही पड़ेगा कि मेरे चुम्बन में क्या गलती है।"
"ओके, पर एक बार ही।"
"हाँ ठीक है… आप आँखें बन्द करो।"
मैंने आँखें बन्द कर लीं। उसके बाद ममता ने मुझे चुम्बन करना शुरु किया। जैसे ही उसके होंठ मेरे होंठों से छूए, मुझे एकदम कंपकंपी सी होने लगी, मेरे पूरे शरीर में जलन सी होने लगी। उसने मेरे बालों को पकड़ा और मेरे होंठों को चूसने लगी, जैसे वो कई बरस की प्यास बुझा रही हो। मुझे भी बेहोशी सी छाने लगी मेरी आँखें तो पहले ही बन्द थीं।
अचानक मुझे होश आया तो मैंने आँखें खोली वो बुरी तरह से मुझे चूम रही थी। उसकी आँखें बन्द थी, मैंने उसका चेहरा पकड़ कर अलग कर दिया। लेकिन उसने आँखें नहीं खोली। मैंने उसे छोड़ दिया और उठ कर पानी पीकर आया।
दो मिनट बाद देखा तो वो हँस रही थी।
"क्या सर… अब क्या कहते हो? बोलो !" मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूँ।
"ओके… अब तुम घर जाओ।"
"नहीं, पहले आप बताओ क्या मेरा चुम्बन सही नहीं है।"
मैं हँसा, "पर अब तुम घर जाओ।"
"नहीं, यह बता दो क्या कमी थी? फिर मैं चली जाऊँगी।"
"कल बता दूँगा।"
"नहीं जी आज और अभी।" वो बच्चों की तरह जिद करने लगी और मेरे एकदम सामने आ कर खड़ी हो गई।
"ओके… अब तुम अपनी आँखें बन्द करो।" उस ने हाथ पीछे किए और आँखें बन्द कर लीं। उसके बाद मैंने उस की कमर में हाथ डाल कर उसे कस कर पकड़ा। वो मुस्कुरा रही थी। आज इतने पास उसे देख कर मजा आ रहा था।
जैसे ही मैंने उसके होंठों पर चुम्बन किया वो मस्त सी हो गई। मैं उसे चुम्बन करता रहा। और वो भी मेरा पूरा साथ दे रही थी। उस के होंठों पर काट कर मैं चूमता जा रहा था। उसने भी मुझे अपने और करीब खींच लिया। मेरा हाथ पकड़ कर उसने अपने उरोजों पर रख दिया। मैं उसे मजे से चुम्बन करता रहा। अब मैंने उसके गले पर चुम्बन करना शुरु कर दिया।
उस मुँह से ‘आह’ सी निकलने लगी… "ओह सर यह आपने मुझे क्या कर दिया… आह, मेरे देव सर ! पागल कर दिया आपने मुझे…”
और मेरा हाथ अपने सीने पर दबाने लगी…
मेरे भी तन में आग सी लग चुकी थी। अचानक वह अपना दूसरा हाथ मेरे नीचे ले जाकर मेरे लोअर के ऊपर से ही दबाने लगी। मैंने उसे अपने से अलग कर दिया और उसने बैड पर बैठ कर अपने सर को पकड़ लिया।
"अब पता चल गया ना ! कैसे चुम्बन करते हैं, है कुछ अलग?"
वो कुछ नहीं बोली… फिर कहने लगी, “हाँ… कुछ तो अलग है।" वो मुस्कराई और मेरी ओर अपनी कातिल नजरों से देखने लगी।
"ओके… अब तुम घर जाओ।"
उसका मन बिल्कुल भी नहीं था जाने का, "अरे सर मैं घर पर कह कर आई हूँ, मैं सात बजे तक आ जाऊँगी… मैं अभी नहीं जा रही हूँ।"
"वो, तुम देखो कोई दिक्कत ना हो तुम्हें।"
"नहीं सर, कोई दिक्कत नहीं है।"
मैंने टीवी चला दिया और दोनों देखने लगे, पर दोनों का ध्यान ही टीवी में नहीं था।
अचानक वो बोली, "सर आपने एक बात का जवाब नहीं दिया?"
"हाँ कहो ना।"
"सर, अब आप का क्या विचार है?"
मैंने जानबूझ कर कहा, “चुम्बन के बारे में!”
"दोस्ती के बारे में सर।"
"क्या अब भी मुझे कहना पड़ेगा!" और धीरे से हँस दिया।
"इस का मतलब आपने ‘हाँ’ कर दी।"
"ओके !"
वो मेरे और पास आकर बैठ गई और मुझे गौर से देखने लगी, मैं भी उसे देखने लगा।
उसने मेरे कान के पास आकर कहा- आई लव यू... और मेरा हाथ पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया।
उसके सीने में जैसे ही मेरा हाथ लगा, मेरे लोवर में कड़ापन सा होने लगा जिस पर मैंने अपना हाथ रख लिया। वो बड़े ध्यान से वहाँ पर देखने लगी और धीरे से मुस्कराने लगी।
मैं भी अब बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। मैंने भी अपने होंठ उसके गर्म होंठों पर चिपका दिये और उसे प्यार से चूमने लगा। हम करीब 15 मिनट तक एक-दूसरे को ऐसे ही चूमते रहे। इसी बीच में उसने मेरे लोअर में हाथ डाल कर वहाँ दबाना शुरु कर दिया था और मैं उसके कपड़ों के ऊपर से ही उसके सीने से खेल रहा था। हम दोनों ने ही आँखें बन्द कर रखी थीं।
हम दोनों बैड पर ही लेट कर एक-दूसरे को चूमने लगे। उसने मेरा लोअर खोल दिया, मैंने भी उसके ऊपर के सारे कपड़े उतार दिए। वो शरमाने लगी और मैं उसे बस देखता रहा।
मुझे लगा कि वक्त कहीं रुक सा गया है। मैं पागल सा होकर उसके सीने पर चूमता रहा। उसने भी मेरे बाल पकड़ कर अपने सीने पर चिपका लिया। मैं उसके ऊपर आकर उसके ब्राउन वाले भाग पर अपनी जीभ से उसे छेड़ने लगा। वो पागल सी हो गई और अपना सर इधर-उधर करने लगी, उसके मुँह से ‘आह’ भरी सिसकारियाँ निकल रही थीं।
उसने अपने नीचे से अपने आप ही अपनी सलवार को खोल कर निकाल दिया। अब पूरी तरह से नग्न हो चुकी थी। मैंने भी अपना लोअर नीचे कर दिया। मेरा ‘अंग’ भी पूरी तरह से जाग चुका था, मैंने अपना हाथ उस के पैरों के बीच में ले जाकर ‘वहाँ’ सहलाने लगा। मुझे उसकी ‘वो’ कुछ गीली सी लगी।
मैं उसे बेतहाशा चूम रहा था और वो पागल होकर मुझे पकड़ कर अपने में मिला रही थी। हम दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोल रहा था।
मेरे नीचे का भाग, उसकी टांगों के बीच में पूरे जोश से हिल रहा था। मैंने अपने ‘अंग’ का अगला भाग पकड़ कर उसके पैरों के बीच में लगाया और अन्दर डालने लगा, मुझे लगा जैसे मैंने किसी गर्म चीज पर अपने अंग को रख दिया हो। फिर मैंने धीरे से जोर लगाया तो वो नीचे से थोड़ा उठकर मुझे रोकने लगी, शायद उसे दर्द हो रहा था।
मैंने फिर जोर लगा कर डाला तो मेरा अगला भाग अन्दर जा चुका था। उस मुझे जोर से पकड़ लिया और मुझे जोर से भींचने लगी और एक दबी सी आवाज "आ… आह… आह… हह… ह… ह…" मैं रुक कर उसके होंठों को चुम्बन करता रहा और मैं फिर धीरे से अन्दर डालने लगा। वो ऐसे ही ‘आहें’ भरती रही और मैं अन्दर डालता रहा…
फिर हम एक दूसरी दुनिया में थे। दोनों ने एक-दूसरे को पूरा प्यार किया। वो ‘आहें’ भरती रही और मैं पूरा जोर लगा कर उसके साथ लगा रहा। उसके सीने से सीने को मिलता देख कर मैं और जोर लगाता और वो मेरा पूरा साथ देकर अपने आपको मुझे भी मजे दे रही थी।
बीस मिनट बाद उसने मुझे कर पकड़ा और जोर लगा कर मुझे अपनी ओर खींचने लगी…
और फिर… 'आह… आह… ओ ओ ओ ओ… और जल्दी करो देविन'
फिर मुझे भी कुछ जोश आ गया। मैं जोर लगा कर धक्के मार रहा था। मैंने उसे कस कर पकड़ा और अपना पूरा-पूरा पानी उसके अन्दर छोड़ दिया… हम दोनों यूँ ही दस मिनट तक पड़े रहे… फिर दोनों उठे और कपड़े पहनने लगे।
वो मुझसे नजरें चुरा रही थी… फिर वो बाथरुम से हो कर पाँच मिनट में आ गई। मैं वहीं टीवी देखता रहा।
उसने कहा- सर, मैं चलती हूँ।"
"नहीं, रूक जाओ अभी, मैं छोड़ दूँगा।"
"नहीं, मैं पैदल ही जाऊँगी।"
"अब तुम बोलो, क्या बुरा लगा?"
"नहीं बिल्कुल भी नहीं सर !" वो मेरे चेहरे को देखने लगी।
"ठीक है हम बाद में मिलते हैं, पर ये सब नैना को…?”
"नहीं उसे नहीं पता लगेगा… पर सर आप भी…!"
"फिक्र मत करो…"
फिर वो ‘बाय’ कह कर वहाँ से चली गई।
वो ‘आहें’ भरती रही
हैलो दोस्तो, सभी को पता ही है कि दिल्ली के लड़के और लड़कियाँ कैसे हैं। मुझे सैक्स के बारे में सब कुछ पता है, सैक्स किया भी है। मेरे दोस्त भी कहते 'साले तुझे इतनी लड़कियाँ लाइन देती हैं, पर तू कभी किसी के साथ कुछ नहीं करता।'
मैं भी कह देता कि भाई प्यार का चक्कर ही खराब है। वैसे मन तो मेरा भी करता था, सैक्स करने का पर कोई सरदर्द ना हो जाए बस यही सोच कर दूर रहता था। स्कूल टाईम में कई बार सैक्स किया है, पर वो फिर कभी। बता दूँ क्लास 11 से ही हाथ से अपनी गर्मी शान्त करता रहता हूँ।
इस साइट पर मैंने काफ़ी कहानियाँ पढ़ी हैं, कुछ तो ऐसी हैं जिन्हें पढ़ कर मजा आया और कुछ तो बकवास होती हैं, जितनी भी कहानियाँ मैंने पढ़ी हैं उनमें मुझे बड़ा मजा आया, खैर अपनी कहानी पर आ जाता हूँ।
आपको बता दूँ मैं कुछ भी काम नहीं करता, बस पढ़ाई और घूमना-फ़िरना। मेरे घर में हम दो भाई हैं। वो अपना अलग काम करता है। और मैं घर से दूर अलग अपना रूम ले कर रहता हूँ। दोपहर में आने के बाद मैं सारा दिन खाली होता हूँ, मैंने सोचा की पार्ट टाईम कुछ काम किया जाये।
मैंने पास में ही एक कम्प्यूटर सेंटर में चार घन्टे के लिये पढ़ाना शुरु कर दिया। वहाँ पर बहुत सी लड़कियाँ आती थी। उन के बारे में कभी गलत ख्याल मन में नहीं आया, क्यों कि वो सब मुझ से पढ़ने के लिये आती थीं और मैं अपने काम को कभी भी खराब नहीं करता।
मेरे वहाँ पर आने के कुछ दिनों के बाद वहाँ पर दो लड़कियों ने एक साथ एडमिशन लिया दोनों ही मेरी हम-उम्र थीं, उनका नाम था ममता और नैना, दोनों ही अच्छे कद काठी की थीं। मैंने उन्हें कुछ ज्यादा भाव ना दे कर साधारण तौर पर ही लिया।
दोनों ने आकर मुझे अपनी स्लिप दिखा कर पूछा- सर क्या आप ही हमारी क्लास लेंगे?
मैंने कहा- हाँ, आप अन्दर आ जाओ।
और उन्हें बैठने के लिये कह कर वापस क्लास में आ गया। मैं फ़्री होकर उनके पास गया।
मैंने पूछा- नाम क्या है आप दोनों के?
"ममता और नैना !"
"ओके ! पर ममता कौन है और नैना कौन?"
"मैं ममता और यह नैना।"
मैंने एक बात पर गौर किया कि ममता नैना से अधिक तेज-तर्रार है। वो हर बात का जवाब देती रहती थी। पर नैना... वो बस पूछ्ने पर ही जवाब देती थी।
कुछ दिनों के बाद मैंने देखा कि नैना किसी से फ़ोन पर बात कर रही है। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, पर मैंने उसे कहा- तुम बाहर जा कर बात करो, क्लास में मोबाईल का प्रयोग करना मना है।
वो बाहर जाकर बात करने लगी, मैंने देखा कि वो कुछ परेशान है।
मैंने ममता से पूछा- इसे क्या हुआ है?
"अरे सर, बस वही ब्वायफ्रैन्ड का लफ़ड़ा और क्या !"
"ओह… पर यह इतनी दुखी और परेशान??"
"कल मिलने नहीं आया वो इससे, यह भी ना पागल हो गई सर, उस लड़के के चक्कर में !"
फिर ममता अपना काम करने लगी। कुछ देर बाद मैं बाहर आया तो देखा के नैना रो रही है। मैंने कुछ नहीं कहा और वापस क्लास में आ गया।
अगले दिन मैंने देखा की नैना उदास सी थी। मैंने उन दोनों से कहा- आप दोनों ‘थ्योरी-रूम’ में आ जाओ।
दोनों वहाँ जा कर बैठ गईं।
"कैसी हो आप दोनों?"
ममता- मैं तो सही हूँ सर, इसका पता नहीं।
मैंने कहा- क्यों? नैना को क्या हुआ है?
नैना- कुछ नहीं सर, बस ये तो पागल है।
"चलो कोई बात नहीं… और नैना कोई फालतू की टैन्शन मत पालो" मैंने कहा।
नैना- नहीं सर, कोई टैन्शन नहीं है।
"वैसे मुझे सब बता दिया है ममता ने !" और मैं हँसने लगा…
नैना- क्या सर…! क्या बताया सर इसने?
"यही कि तुम कल क्यों रो रही थी !"
यह सुन कर उसने ममता की तरफ देखा और उसे कोहनी मार कर कहा- ममता, तू सर के सामने ये सब बातें क्यों करती है?
मैंने कहा- मैंने ही इससे पूछा था।
ममता- तू परेशान ना हो ! सर किसी से कहेंगे थोड़ी ना… सर की भी कोई बन्दी-वन्दी होगी ! क्यों सर?" और वो यह कह कर हँसने लगी। मुझे भी सुन कर हँसी आ गई… और नैना भी मुसकुराने लगी…
मैंने कहा- चलो अब तो नैना भी हँस दी… अब क्लास शुरु करते हैं।
तभी ममता ने कहा- सर आज रहने दो ना…! मूड नहीं है आज पढ़ने का !
"क्यों? आज क्या है?" मैंने कहा।
ममता- नहीं सर, आज मत पढ़ाओ प्लीज… कल पक्का पूरा टाईम पढ़ेंगे।
"ओ के… लेकिन अब क्या करें?"
ममता- बस सर कुछ बातें करते रहते हैं।
"पर यह नैना तो कुछ बोलती ही नहीं है।"
ममता- अरे सर, आप ही समझा दो इसे, मेरा कहा तो यह मानती नहीं। वो साला इसे पागल बना रहा है और यह है कि खुद ही पागल बन रही है।
नैना ने सर झुका लिया…
"क्यों नैना? यह सच है क्या?"
" पता नहीं सर, यह कहती है कि वो कई लड़कियों के साथ दोस्ती रखता है।"
"तो क्या हुआ ! यह तो आम बात है, तुम्हें यह लगता है तो तुम भी किसी और से दोस्ती कर लो और एक बात, देखो प्यार-व्यार आजकल कोई नहीं करता, बस सभी को टाईम पास करना होता है।"
ममता- हाँ सर, मैं भी यही कहती हूँ। यह सब बकवास है, पर ये माने तब ना !
"हाँ यह तो सही बात है… जब वो सीरियस नहीं है तो तुम भी मत होना। नहीं तो और ज्यादा दुखी हो जाओगी।"
ममता- सुना तूने…! सर, मैं भी यही बोलती हूँ।"
नैना- सर मैंने पहली बार किसी से दोस्ती की है।
ममता- सर आपकी कोई दोस्त नहीं है क्या?
"अरे नहीं मैं तो कभी भी प्यार के लफड़े में नहीं फँसा… हाँ दोस्त तो बहुत सी हैं… सब बहुत अच्छी हैं, पर लवर किसी को नहीं बनाता।"
यह सब नैना बड़े गौर से सुन रही थी।
ममता- क्यों सर? क्या किसी ने दिल तोड़ दिया था आपका?
और वो नैना के साथ हँसने लगी, मेरी भी हँसी छूट गई।
"बस सीरियस रिलेशन से डर लगता है और कोई बात नहीं।"
ममता- सर, आप ना बिल्कुल मेरी तरह सोचते हो, आप से मेरी खूब पटेगी।
तब मैंने कहा- तुम नैना को भी अपने जैसा बना दो, तब यह भी खुश रहा करेगी।
ममता- नहीं सर, आप समझाना इसे, क्या पता आप की बात मान ले !
"कोई बात नहीं मैं कोशिश करूँगा, चलो अब आपका टाईम हो गया है, आप लोगों को घर भी जाना है।"
दोनों ने कहा- बाय सर।
"बाय !"
मुझे कुछ अजीब सा लगा कि इन दोनों की सोच अलग-अलग है, फिर भी कितनी पक्की दोस्ती है इन दोनों में।
अगले दिन…
"हैलो सर !" दोनों ने कहा।
मैंने भी सर हिला कर जवाब दिया- हैलो !
आज नैना कुछ खुश लग रही थी, तभी ममता बोली- सर आप ने तो कमाल कर दिया। आपकी बात मान गई यह लड़की।
मेरी कुछ समझ नहीं आया, बस मुस्कुरा दिया।
क्लास के बाद ममता ने कहा- सर जरा बाहर आना।
बाहर आकर मैंने पूछा- हाँ बोलो क्या हुआ?
ममता- अब बोल ना, तूने कहा मैंने बुला दिया।
मैं उन दोनों को देख रहा था- जल्दी बताओ क्या बात है?
नैना- सर आप सन्डे को फ्री हों, तो आप से मिलना है।
"मैं तो फ्री होता हूँ… पर क्या बात है? अभी बता दो ना!"
नैना- नहीं सर, वो कल वाली बात आपने पूरी नहीं की, बस वही सब बातें।"
"ओह… कोई बात नहीं मुझे बता देना। मैं तुम से मिल लूँगा। आप दोनों आ जाना।"
"ठीक है सर !"
दोनों ने 'बाय' किया और चली गई।
उन्होंने शनिवार को मुझे कहा कि वे रविवार को शाम पाँच बजे पार्क में मिलेंगी।
रविवार को मैं अपनी कैज़ुअल ड्रेस में उनसे मिलने गया। जिस पार्क में वो आने वाली थी मेरे रूम के पास ही था। मैं निक्कर और टी-शर्ट में ही चला गया। सही पाँच बजे वो दोनों आ गईं।
"हैलो सर !"
मैंने भी सर झुका कर जवाब दिया।
"कैसे हो आप?"
ममता- सर मैं तो, आपको पता है मजे में ही होती हूँ। आजकल यह भी मजे में है सर !
मैंने हँस कर कहा- क्यों, यह भी हमेशा मजे में ही होती है, पर लगता है तुम इसे मजे नहीं लेने देती हो।"
ममता- नहीं सर, जिस दिन से आपसे बात की है ना, उस दिन से यह कुछ ज्यादा ही मस्त हो गई है।"
नैना- नहीं सर, वो आपने कहा था ना कि ज्यादा सीरियस मत हो। मैंने घर जा कर सोचा तो लगा कि आप सही कह रहे हैं।
"मेरा तो यही सोचना है देखो… आगे तुम लोगों की मर्जी !"
नैना- हाँ सर, मैंने सोचा तो यही लगा कि मैं कुछ ज्यादा ही दुखी हो रही हूँ, कल मैं उससे मिलने भी नहीं गई।
मैंने पूछा- क्यों नहीं गई तुम?
"वो ना सर कुछ ज्यादा ही जिद कर रहा था और मुझे कुछ जरुरी काम था, तो मैंने मना कर दिया। वो गालियाँ देने लगा तो मैंने फोन काट दिया। उसके बाद से मैंने उस बात भी नहीं की।"
"यह तो गलत है, 'गाली' तो हद हो गई।"
ममता- हाँ सर, वो साला इसे गाली देकर बात करता है।
"उससे सब कुछ खत्म कर दो, वो सही नहीं है, देख लो !" मैंने कहा।
नैना- मैं भी यही सोच रही हूँ सर।
"कोई बात नहीं, जैसा सही लगे वो करना !"
"हाँ सर, ठीक है।"
ममता- और सर आप बताओ आपकी कोई नहीं है क्या?
"मैंने कहा था ना, कोई नहीं है।"
"मजाक मत करो सर, यह हो ही नहीं सकता कि कोई भी ना हो… कोई तो होगी ना !" और वो हँस दी।
फिर हम सब हँस दिये…!
मैंने कहा- अभी तक तो नहीं है, अगर कोई है तो बता दो। लेकिन मेरे टाईप की हो, यह ना हो कि मेरे पीछे ही पड़ जाये।
ममता- ओके सर, मिलने दो कोई भी होगी तो जरुर बताऊँगी।
"क्यों तुम भी तो मेरी तरह सोचती हो। तुम ही बन जाओ ना !" मैंने यह बात मजाक में कही थी।
"आपको कोई भला मना कैसे करेगा, लो मैंने भी हाँ कर दी…" और फिर सभी जोर से हँसने लगे।
मैंने कहा- मजाक कर रहा हूँ, बुरा मत मानना।
आँखें मटकाते हुए उसने कहा- पर सर मैं तो तैयार हूँ, आपका क्या विचार है?
फिर सब जोर से हँसने लगे।
हमने दो घन्टे बात की, फिर वो जाने लगे तो ममता ने कहा- सर मैं आपसे सच कह रही हूँ। जो मैंने कहा है, उसके बारे में सोचना।
मुझे लगा कि वो अब भी मजाक कर रही है- मैं कैसे यकीन करूँ कि तुम सच कह रही हो?
"आप कैसे यकीन करोगे सर?"
"वो तो तुम्हें पता होगा !"
फिर उसने कुछ सोचा और कहा- ठीक है, आप आँखें बन्द करो।
मैंने कहा- नहीं ऐसे ही बताओ।
"नहीं, आप करो तो सही...!"
'ओके !' मैंने आँखें बन्द कर लीं।
कुछ नहीं हुआ।
"अरे गई क्या तुम? मैं आँखें खोल रहा हूँ।"
"नहीं अभी नहीं खोलना !" और फिर वो हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।
"अरे गई क्या तुम? मैं आँखें खोल रहा हूँ।"
"नहीं अभी नहीं खोलना !" और फिर वो हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। ममता ने मुझे होंठों पर चुम्बन किया, करीब 5 सैकेन्ड तक…
मेरी आँखें यूँ ही बन्द रही। जब मैंने खोलीं तो देखा वो दोनों जा रही थीं। ममता हाथ हिला कर मुझे ‘बाय’ कर रही थी।
मुझे होश सा आया तो देखा मैं वहाँ अकेले खड़ा था और रात होने वाली थी।
मैं घर आ गया। अगले दिन वो दोनों आईं, बस मुस्कुराईं और कम्प्यूटर ऑन किया और काम में लग गई।
तभी ममता बोली- सर मुझे प्रोब्लम हो रही है, बता दो।
मैं उसके पास जाकर उसे सही से समझाया और जाने लगा।
वो बोली- सर, बुरा मत मानना कल के लिए।
"नहीं कोई बात नहीं।"
"तो क्या सर आप करोगे मुझसे दोस्ती?"
"हम बाद में बात करते हैं, ओके ! अभी काम करो।"
कुछ देर बाद, "सर आप ने जवाब नहीं दिया?"
मैंने कहा- नहीं ममता, यही मेरा जवाब है।
उसने कहा- कोई बात नहीं सर, पर आप बुरा मत मानना। मेरे मन में जो था, मैंने कह दिया !
"नहीं, कोई बात नहीं।"
"थैंक्स सर !"
"तो ठीक है सर, सण्डे को मिलते हैं, पर इस बार मैं ही आऊँगी अकेली, नैना को उस दिन कहीं जाना है।"
"आ जाना !"
उसने जाते हुए फिर से मुझे एक फ्लाईन्ग चुम्बन दिया, मैं हँस दिया।
शनिवार को ही उसने इतवार को चार बजे आने का कह दिया। मैंने भी उसे सीधे रुम पर आने के लिये कह दिया।
मैं बता दूँ ज्यादातर लड़के अपने कमरे में कम कपड़ों में ही रहते हैं, तो मैं भी कम कपड़ों में ही रुम पर रहता हूँ। या तो निक्कर में या बस तौलिये में।
रविवार को सारा कमरा साफ किया। पूरा काम खत्म कर के दोपहर में टीवी चला कर देखने लगा और देखते-देखते सो गया। मैंने बस टावल ही पहना हुआ था। मुझे पता ही नहीं लगा ममता कब आई। मुझे पता जब चला जब मैंने गेट पर आवाज सुनी।
मैंने देखा कि मेरा तौलिया खुला पड़ा है और मेरा लंड पूरी तरह से तना हुआ है। मैंने तौलिया सही किया और गेट पर जाकर देखा तो ममता खड़ी थी। मैं उसे देख कर चौंक गया, देखा तो घड़ी में चार बजे हुए थे।
मैंने कहा- एक मिनट रुक जाओ।
"क्या हुआ…?"
"मैं कपड़े पहन लूँ।"
"कोई बात नहीं… पहन लीजिए।"
"कपड़े पहन कर मैंने दरवाजा खोल दिया।"
"अन्दर आ जाओ ममता।"
वो अन्दर आकर और बैठ गई।
"और सर क्या कर रहे थे?"
"मैं तो बस काम कर के सो रहा था… आज तुम्हारी सहेली नहीं है साथ?"
"वो सर कहीं गई है, अपनी मम्मी के साथ।" और वो कुछ नहीं बोली।
"तो बताओ क्या बात है… क्यों मिलने के लिये कहा था, बोलो?"
"सर मुझे लगा कि आप उस दिन की बात का बुरा मान गए।"
"मैंने कब कहा कि मुझे बुरा लगा…?"
"नहीं सर वो चुम्बन के बारे में बात कर रही हूँ।"
मैं हँसा, "अरे नहीं कोई बात नहीं… पर तुम्हारा बताने का स्टाईल अच्छा था।"
वो भी हँस दी, "वो सर मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैंने कर दिया।"
"पर तुम्हें चुम्बन करना आता नहीं है," मैं फिर हँस दिया।
"तो आप सिखा दो ना सर !"
"नहीं तुम्हें नहीं सिखा सकता।"
"क्यों?" उसने हँस कर कहा।
"नहीं तुम मेरी स्टूडेन्ट हो।"
"फिर आपने यह क्यों कहा कि मुझे चुम्बन करना नहीं आता।"
"वो तो सच है… तुम्हें नहीं आता।"
"ठीक है आज मैं फिर से करती हूँ… मुझे भी तो पता चले कि मैंने क्या गलती की है।"
"नहीं अब नहीं।"
"आज सर मत रोको, आपको बताना ही पड़ेगा कि मेरे चुम्बन में क्या गलती है।"
"ओके, पर एक बार ही।"
"हाँ ठीक है… आप आँखें बन्द करो।"
मैंने आँखें बन्द कर लीं। उसके बाद ममता ने मुझे चुम्बन करना शुरु किया। जैसे ही उसके होंठ मेरे होंठों से छूए, मुझे एकदम कंपकंपी सी होने लगी, मेरे पूरे शरीर में जलन सी होने लगी। उसने मेरे बालों को पकड़ा और मेरे होंठों को चूसने लगी, जैसे वो कई बरस की प्यास बुझा रही हो। मुझे भी बेहोशी सी छाने लगी मेरी आँखें तो पहले ही बन्द थीं।
अचानक मुझे होश आया तो मैंने आँखें खोली वो बुरी तरह से मुझे चूम रही थी। उसकी आँखें बन्द थी, मैंने उसका चेहरा पकड़ कर अलग कर दिया। लेकिन उसने आँखें नहीं खोली। मैंने उसे छोड़ दिया और उठ कर पानी पीकर आया।
दो मिनट बाद देखा तो वो हँस रही थी।
"क्या सर… अब क्या कहते हो? बोलो !" मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उससे क्या कहूँ।
"ओके… अब तुम घर जाओ।"
"नहीं, पहले आप बताओ क्या मेरा चुम्बन सही नहीं है।"
मैं हँसा, "पर अब तुम घर जाओ।"
"नहीं, यह बता दो क्या कमी थी? फिर मैं चली जाऊँगी।"
"कल बता दूँगा।"
"नहीं जी आज और अभी।" वो बच्चों की तरह जिद करने लगी और मेरे एकदम सामने आ कर खड़ी हो गई।
"ओके… अब तुम अपनी आँखें बन्द करो।" उस ने हाथ पीछे किए और आँखें बन्द कर लीं। उसके बाद मैंने उस की कमर में हाथ डाल कर उसे कस कर पकड़ा। वो मुस्कुरा रही थी। आज इतने पास उसे देख कर मजा आ रहा था।
जैसे ही मैंने उसके होंठों पर चुम्बन किया वो मस्त सी हो गई। मैं उसे चुम्बन करता रहा। और वो भी मेरा पूरा साथ दे रही थी। उस के होंठों पर काट कर मैं चूमता जा रहा था। उसने भी मुझे अपने और करीब खींच लिया। मेरा हाथ पकड़ कर उसने अपने उरोजों पर रख दिया। मैं उसे मजे से चुम्बन करता रहा। अब मैंने उसके गले पर चुम्बन करना शुरु कर दिया।
उस मुँह से ‘आह’ सी निकलने लगी… "ओह सर यह आपने मुझे क्या कर दिया… आह, मेरे देव सर ! पागल कर दिया आपने मुझे…”
और मेरा हाथ अपने सीने पर दबाने लगी…
मेरे भी तन में आग सी लग चुकी थी। अचानक वह अपना दूसरा हाथ मेरे नीचे ले जाकर मेरे लोअर के ऊपर से ही दबाने लगी। मैंने उसे अपने से अलग कर दिया और उसने बैड पर बैठ कर अपने सर को पकड़ लिया।
"अब पता चल गया ना ! कैसे चुम्बन करते हैं, है कुछ अलग?"
वो कुछ नहीं बोली… फिर कहने लगी, “हाँ… कुछ तो अलग है।" वो मुस्कराई और मेरी ओर अपनी कातिल नजरों से देखने लगी।
"ओके… अब तुम घर जाओ।"
उसका मन बिल्कुल भी नहीं था जाने का, "अरे सर मैं घर पर कह कर आई हूँ, मैं सात बजे तक आ जाऊँगी… मैं अभी नहीं जा रही हूँ।"
"वो, तुम देखो कोई दिक्कत ना हो तुम्हें।"
"नहीं सर, कोई दिक्कत नहीं है।"
मैंने टीवी चला दिया और दोनों देखने लगे, पर दोनों का ध्यान ही टीवी में नहीं था।
अचानक वो बोली, "सर आपने एक बात का जवाब नहीं दिया?"
"हाँ कहो ना।"
"सर, अब आप का क्या विचार है?"
मैंने जानबूझ कर कहा, “चुम्बन के बारे में!”
"दोस्ती के बारे में सर।"
"क्या अब भी मुझे कहना पड़ेगा!" और धीरे से हँस दिया।
"इस का मतलब आपने ‘हाँ’ कर दी।"
"ओके !"
वो मेरे और पास आकर बैठ गई और मुझे गौर से देखने लगी, मैं भी उसे देखने लगा।
उसने मेरे कान के पास आकर कहा- आई लव यू... और मेरा हाथ पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया।
उसके सीने में जैसे ही मेरा हाथ लगा, मेरे लोवर में कड़ापन सा होने लगा जिस पर मैंने अपना हाथ रख लिया। वो बड़े ध्यान से वहाँ पर देखने लगी और धीरे से मुस्कराने लगी।
मैं भी अब बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। मैंने भी अपने होंठ उसके गर्म होंठों पर चिपका दिये और उसे प्यार से चूमने लगा। हम करीब 15 मिनट तक एक-दूसरे को ऐसे ही चूमते रहे। इसी बीच में उसने मेरे लोअर में हाथ डाल कर वहाँ दबाना शुरु कर दिया था और मैं उसके कपड़ों के ऊपर से ही उसके सीने से खेल रहा था। हम दोनों ने ही आँखें बन्द कर रखी थीं।
हम दोनों बैड पर ही लेट कर एक-दूसरे को चूमने लगे। उसने मेरा लोअर खोल दिया, मैंने भी उसके ऊपर के सारे कपड़े उतार दिए। वो शरमाने लगी और मैं उसे बस देखता रहा।
मुझे लगा कि वक्त कहीं रुक सा गया है। मैं पागल सा होकर उसके सीने पर चूमता रहा। उसने भी मेरे बाल पकड़ कर अपने सीने पर चिपका लिया। मैं उसके ऊपर आकर उसके ब्राउन वाले भाग पर अपनी जीभ से उसे छेड़ने लगा। वो पागल सी हो गई और अपना सर इधर-उधर करने लगी, उसके मुँह से ‘आह’ भरी सिसकारियाँ निकल रही थीं।
उसने अपने नीचे से अपने आप ही अपनी सलवार को खोल कर निकाल दिया। अब पूरी तरह से नग्न हो चुकी थी। मैंने भी अपना लोअर नीचे कर दिया। मेरा ‘अंग’ भी पूरी तरह से जाग चुका था, मैंने अपना हाथ उस के पैरों के बीच में ले जाकर ‘वहाँ’ सहलाने लगा। मुझे उसकी ‘वो’ कुछ गीली सी लगी।
मैं उसे बेतहाशा चूम रहा था और वो पागल होकर मुझे पकड़ कर अपने में मिला रही थी। हम दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोल रहा था।
मेरे नीचे का भाग, उसकी टांगों के बीच में पूरे जोश से हिल रहा था। मैंने अपने ‘अंग’ का अगला भाग पकड़ कर उसके पैरों के बीच में लगाया और अन्दर डालने लगा, मुझे लगा जैसे मैंने किसी गर्म चीज पर अपने अंग को रख दिया हो। फिर मैंने धीरे से जोर लगाया तो वो नीचे से थोड़ा उठकर मुझे रोकने लगी, शायद उसे दर्द हो रहा था।
मैंने फिर जोर लगा कर डाला तो मेरा अगला भाग अन्दर जा चुका था। उस मुझे जोर से पकड़ लिया और मुझे जोर से भींचने लगी और एक दबी सी आवाज "आ… आह… आह… हह… ह… ह…" मैं रुक कर उसके होंठों को चुम्बन करता रहा और मैं फिर धीरे से अन्दर डालने लगा। वो ऐसे ही ‘आहें’ भरती रही और मैं अन्दर डालता रहा…
फिर हम एक दूसरी दुनिया में थे। दोनों ने एक-दूसरे को पूरा प्यार किया। वो ‘आहें’ भरती रही और मैं पूरा जोर लगा कर उसके साथ लगा रहा। उसके सीने से सीने को मिलता देख कर मैं और जोर लगाता और वो मेरा पूरा साथ देकर अपने आपको मुझे भी मजे दे रही थी।
बीस मिनट बाद उसने मुझे कर पकड़ा और जोर लगा कर मुझे अपनी ओर खींचने लगी…
और फिर… 'आह… आह… ओ ओ ओ ओ… और जल्दी करो देविन'
फिर मुझे भी कुछ जोश आ गया। मैं जोर लगा कर धक्के मार रहा था। मैंने उसे कस कर पकड़ा और अपना पूरा-पूरा पानी उसके अन्दर छोड़ दिया… हम दोनों यूँ ही दस मिनट तक पड़े रहे… फिर दोनों उठे और कपड़े पहनने लगे।
वो मुझसे नजरें चुरा रही थी… फिर वो बाथरुम से हो कर पाँच मिनट में आ गई। मैं वहीं टीवी देखता रहा।
उसने कहा- सर, मैं चलती हूँ।"
"नहीं, रूक जाओ अभी, मैं छोड़ दूँगा।"
"नहीं, मैं पैदल ही जाऊँगी।"
"अब तुम बोलो, क्या बुरा लगा?"
"नहीं बिल्कुल भी नहीं सर !" वो मेरे चेहरे को देखने लगी।
"ठीक है हम बाद में मिलते हैं, पर ये सब नैना को…?”
"नहीं उसे नहीं पता लगेगा… पर सर आप भी…!"
"फिक्र मत करो…"
फिर वो ‘बाय’ कह कर वहाँ से चली गई।
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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