Saturday, March 8, 2014

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--83

FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--83
गतांक से आगे ...........

 अचानक मंजू ने एक नया मोर्चा खोल दिया ...गुड्डी के ऊपर।

" काहे नाम लेने में सरम लागत है का, बबुनी।'
वो गुड्डी की ओर देख कर बोली।

गुड्डी चुप।

भाभो जा चुकी थीं . बस शीला भाभी, मुस्कारते हुए सामने , और उनके बगल में मंजू और इधर गुड्डी के बगल में मैं।

:" अरे ऊ गदहे का का, तुम कह रही थी की ना की वो रन्जी ,रंडी ..गदहा का ...देख के पनिया रही थी। त नाम लेने में लाज लग रही थी की गदहवा का लंबा लम्बा लटक रहा था , चलो अब बोलो,.."

मंजू ने बात साफ की .
अब मैं भी मुस्कराया, गारी वारी गाना और बात है लेकिन बात चीत में वो भी जहां सिर्फ सहेलियां ना हो खुल्लम खुला बात करना ...

शीला भाभी भी मंजू के साथ आगयीं

" सही तो कह रही है ये अरे हम लोगों के सामने का शर्म ..और ( मेरी ओर इशारा करके ) इससे भी ...बोल ना गदहे का ..क्या देख वो छिनार ललचा रही थी।" वो बोली।

गुड्डी अभी भी हिचकिचा रही थी।

मंजू अब अपने रंग में आ गयी,

" अरे छिनरो, लंड छूने में शरम नहीं, लंड पकड़ने में नहीं सरम नहीं, लंड मुंह में लेने में सरम नहीं, चूत में लंड घोंटने में सरम नहीं ...ता ससुरी ...काहें नाम लेने में सरम ..."

और शीला भाभी भी बोलने लगी ,

" अरे तू समझती नहीं ...जौने के मुंह से लंड का बोल नहीं निकलता फागुन ....में उ लड़की को होलिका देवी का शाप लगता है ...उ तरसने लगती है लंड के लिए ..और जो मजा असली चीज में है उ उंगली में नहीं ...और हम तो कहते है की अगर खूब खोल के लंड बुर सब बोले ...ता का पता ..परमानेंट लंड का इंतजाम हो जाय ...रोज घच्चाघच ...घच्चाघच,’


पता नहीं इस लालच का असर था ..या शीला भाभी , मंजू भाभी के डबल पेस अटैक का असर या शाम की भांग की बर्फी और खाने के साथ की डबल भांग वाली गुझिया का असर ....गुड्डी भी डोलने लगी।

उसने मेरी ओर देखा ...और मैंने भी मुस्करा के शीला भाभी और मंजू का साथ दिया।

लेकिन फिर भी गुड्डी ने मुंह नहीं खोला।

" हूँ उ गदहे का देख रही थी ..." मंजू ने फिर पूछा।
अब वो आके गुड्डी के बगल में बैठ गयी थी।

मैंने हलके से बोला ....बोल दे ना .

गुड्डी पहले मुस्कराई , फिर बोली ..गदहे का ...रुकी ...फिर बोली ...लंड .

हम सब मुस्कराने लगे लेकिन शीला भाभी इत्ती आसानी से नहीं छोड़ने वाली थी। उन्होंने फिर गुड्डी को रगडा,
" हे मैंने सुना नहीं फिर से बोल ना,

गुड्डी एक पल के लिए हिचकी फिर मुस्कराती हुयी अबकी जोर से बोली ..गदहे का ...लंड।

अब शीला भाभी भी आके मेरे और गुड्डी के बीच में बैठ गयी और उसे गले लगाती बोली अब हुयी ना बात।

लेकिन मंजू छोड़ती तब ना , उसने फिर गुड्डी से कहलवाया ...अच्छा ...कित्ता बड़ा रहा होगा उस का जिस से इन का माल नैन मटका कर रहा था।

" डेढ़ दो फीट का रहा होगा ...लंड ...एक दम कडा ..." थूक घोंटते हुए गुड्डी बोली।

भांग का नशा सब के ऊपर चढ़ कर बोल रहा था।
अब शीला भाभी की बारी थी गुड्डी को उकसाने की ...

" बोल तुझे कैसा लंड पसंद है .."
" धत्त ..." गुड्डी गुलाल हो गयी।
" फिर छिनालपना ..." मंजू से घुड़का।

" अरे अगर कही होलिका देवी ने सुन लिया ना तो तडपा देंगी, घोंटने को कौन कहे ..देखने को नहीं मिलेगा। " शीला भाभी समझाते बोलीं।

मैं कहने वाला था की मेरे रहते इसे कोई कमी नहीं पड़ने वाली तब तक गुड्डी चीखी ..मंजू ने उस की स्कर्ट को उठा के पिछवाड़े कस के चिकोटी काट ली थी।

" बताती हूँ ना ...गुड्डी बोली ...लंड लंबा मोटा और कडा ..."
" और हचक कर चोदने वाला ..." बात मंजू और शीला भाभी ने एक साथ पूरी की। मैंने भी बात पूरी की ,

जो भरा नहीं हो झांटो से बहती जिसमे वीर्य धार नहीं।
वह लंड नहीं वो नूनी है जिसको चूतों से प्यार नहीं


सब बौरा गए थे, एक तो फगुनाहट ऊपर से चढ़ती जवानी और सब से ऊपर भांग का नशा ..और आज शाम की होली ने हम सब का अंतर एक दम ख़तम कर दिया था।

क्या क्या नहीं बुलवाया , शीला भाभी और मंजू ने गुड्डी से ...और उससे कबूल्वाया की आगे से हम चारों ( मंजू, शीला भाभी और मेरे अलावा मेरी भाभी भी ) के सामने अगर उसने लंड, चूत, गांड, चुदाई के अलावा कुछ भी बोला तो बस उसकी खैर नहीं .

वो सब लोग लोग टेबल समेट रही थीं ...और मैंने भी थोड़ी हेल्प की। फिर मैंने गुड्डी को सूना के बोला ,

मुझे नींद आ रही मैं कमरे में चलता हूँ। " और अपने कमरे की ओर मुड गया .
गुड्डी भी , बोली बस मैं दो मिनट में आती हूँ और मेरे पीछे पीछे .

कमरे में घुसते ही उसने पहले तो मुझे पलंग पर धकेला ...ये बोल के ..नो कंप्यूटर नो फोन बस लेट जाओ चुप चाप और अलमारी की ओर मुड़ी जहां उसने चन्दा भाभी के दिए 'ख़ास लड्डू ' वाला डिब्बा रखा था।

ये लड्डू कम और 'हर्बल वियाग्रा' ज्यादा था।फर्क सिरफ ये था की , वियाग्रा का असर टेम्पोरेरी होता है और इसका असर टेम्पोरेरी भी और परमानेंट भी ...खाने के आधे घंटे के अन्दर ...से लेकर 7-8 घन्टे तक ...वियाग्रा की फुल डोज से डेढ़ गुना ...और साथ में लम्बे अरसे तक शक्ति वर्धक ..

गुड्डी ने लड्डू निकाला और सीधे मेरे मुंह में ....
और यही नहीं वह नीचे की ओर बढ़ी,

और पल भर में मेरा चर्म दंड उस किशोरी की मुट्ठी में। जैसे कोई नयी नवेली अल्हड ग्वालन , ..दोनों हाथों से मथानी पकड़ के दही बिलोड़े ...बस उसी तरह ...

फर्क सिर्फ इतना की गुड्डी की गोरी गोरी हथेली में चन्दा भाभी का दूसरा गिफ्ट उसकी हथेलियों में लगा ..

सांडे का तेल साथ में स्पेनिश फ्लाई और ना जाने क्या क्या मिला ...

गुड्डी के दोनों अंगूठे साथ साथ मेरे बौराए लिंग के, बेस को कस कस के दबाते
तरजनी साथ में अगवाड़े पिछवाड़े के बीच , छेड़ती , लम्बे नाखूनों से खरोचती

और जैसे इतना ही दंड काफी नहीं था मेरे चर्म दंड को ,

गुड्डी के गुलाबी रसीले होंठों ने मेरे मोटे, तन्नाये कड़े सुपाडे को दबोच लिया
सीधे वहां तक जहा वह बाकी लिंग से मिलता है ,
और कुछ देर में उस चपला की चपल जुबान भी चालू हो गयी


सपड सपड ...सपड सपड
कुछ देर बाद जब सुपाडे को सांस लेना नसीब हुआ तो एक बार फिर पूरी जीभ निकाल कर ...उसकी टिप से उसने पी होल में सुरसुरी कर दी ....

मुझे 440 वोल्ट का झटका लगा ..
उसके एक हाथ ने लिंग को छोड़ दिया ,
लेकिन कस कर अंगूठे और तरजनी से सुपाडे को दबा दिया ..

उस एक आँख वाले ने अपनी आँख खोल दी ,
मेरे सुपाडे ने गुलाबी पी होल चियार दिया और

दूसरे हाथ से गुड्डी ने .टप टप ..चार बूँदे ..उस काम रस उत्तेजक तेल की की ...सीधे उसके अन्दर ...पी होल में

मेरे पूरे बदन में होलिका जल उठी काम की ..

लेकिन गुड्डी को क्या फरक पड़ता ..
उसने चेहरा हटा लिया , मुझे देख के शरारत से अपनी बड़ी बड़ी आँखे नचाई और ..
एक बार फिर मेरे बेताब लिंग को चुम्मी ले कर बोली,

मिलते हैं ब्रेक के बाद ...

और अपने मस्त चूतड मटकाती कमरे के बाहर चली गयी .
बस जाने के पहले मुझे एक चद्दर से ढक दिया और बोल गयी ,
खबरदार जो 'इसको' हाथ लगाया , बस लेटे रहो ...

जाय
और वो गायब ...

थोड़ी देर में बाहर से हंसने खिलखिलाने की आवाज आने लगी।

शीला भाभी और मंजू दोनों मिल कर ...गुड्डी को छेड़ रही थीं , ट्रेन कर रही थीं , एकदम बिंदास ...जैसे दो शेरनिया , किसी शाविका को शिकार करना सिखा रही हों ...और गुड्डी की भी आवाज उसी तरह आ रही थी।

मैंने अपना दिमाग वापस बनारस, बडौदा और मुम्बई की ओर मोडा।

 रीत ने बताया था की वो किसी होटल से उन 'आपरेटर्स' को मानिटर करेगी और उन का पीछा करेगी जिससे बाम्ब के जखीरे का पता चल जाय। मुझे मालूम था कार्लोस और रेहन भी उसके साथ है ...और आई बी के भी कुछ चुने हुए एजेंट भी उस होटल की निगरानी कर रहे हैं. इसलिये चिंता की बात नहीं है ...

लेकिन फिर भी आज की रात्रि काल रात्रि है ...वो सब कुछ भी कर सकते हैं

डी बी ने मुझसे कुछ कहा था लेकिन उस समय मेरी समझ में नहीं आया ..

अब अचानक मेरी चमकी उन्होंने बोला था की वो आज की रात रतजगा करेंगे ...सत्यजित राय के साथ ...फिर खुद ही बोला, सोनार केला, जाय बाबा फेलु नाथ ...

मुझे लगा की उनका मतलब था ये फिल्में रात में देखेंगे ...अब समझ में आया ...आज रात वो फेलु दा के साथ रहेंगे ...उनका घर पोलिस कंट्रोल रूम के पास ही था . और अगर कोई उन्हें मानिटर कर रहा होगा तो उसे ये शक नहीं होगा।

और सबसे बड़ी बात ये थी की ...उन्होंने ये हिंट दे दिया था की अगर किसी इमरजेंसी में उन्हें कानटेक्ट करना हो ....तो मैं फेलु दा को पकड़ सकता हूँ।

फिर मैंने बाम्बे और बडौदा के बारे में सोचना शुरु किया ...लेकिन छोड़ दिया।


मैं जानता था की जब तक और इनपुट ना मिले सोचना बेकार था। और मैं ने बहोत पहले ये सीख लिया था की दिमाग में कम्पार्टमेंट बनाओ और ये इन्श्योर करो की चीजें आपस में मिक्स ना हों ..

खाली दिमाग ...गुड्डी की ओर दौड़ने लगा ...

कुछ खाली दिमाग और कुछ ...भांग और चन्दा भाभी के लड्डू और तेल का असर ...

लेकिन सब से बढ़ कर खुद गुड्डी का असर ..
लेकिन मैंने सोचा ...क्या फायदा वो दो घंटे से पहले तो आएगी नहीं ...जब शीला भाभी सो जायेंगी ...और उस के पहले वो जम के उससे पंचायत करेंगी ....

.कल भी तो 12 बजे के बाद ही आई थी ...और उसने कहा था बत्ति बंद कर लेना ...लेकिन अभी छोटा बल्ब तो जल ही रहा है ऊपर से रानी जी ने बोला है की ...उठना मत ...तो मैं कोई जिनी तो हूँ नहीं ...की हाथ मोड़ा सर झपकाया और बत्ती बंद और फिर जिनी होता तो ..गुड्डी को ही ना पकड बुलाता .

अभी 10 बज रहा था ...दो घंटे और, पूरे दो घंटे या हो सकता है उससे भी ज्यादा ...

ऊपर तो भाभी का एक राउंड चालू भी हो गया होगा।


मैंने सोचा चलो थोडा शट आई कर लें ...
मैंने आँखे बंद कर लीं ...लेकिन जंग बहादुर कहाँ सोने वाले ...उन्हें तो वो दुष्ट बोल गयी थी, मिलते हैं ब्रेक के बाद ..

.लेकिन उन्हें कौन समझाए की लड़कियों की बात का भरोसा नहीं करते ख़ास तौर पे रात को ..
.
दो दिन से रत जगा चल रहा था, परसों की रात बनारस में चन्दा भाभी के साथ और कल यहाँ गुड्डी के साथ

...बस दोनों जगह भोर में थोड़ी देर सोया ...

आँख लग ही गयी।


तंद्रा थी या हलकी नींद पता नहीं पर ...सपना जरुर बहूत खूबसूरत था।
लेकिन सपना सपना ही होता है।

कभी कभी सपने देखते समय बस मन करता है ये सपना ना टूटे ...,बस वैसा ही
पुरवाई के झोंके की तरह झपाक से ...बस दरवाजा खुला और ...बंद हुआ।

मेरी नीम बंद थोड़ी सोयी थोड़ी जागी आँखों ने उस शोख को देखा ...और फिर उस के बाद ...तो बस वही हालत हुयी ...

वो आये बज्म में इतना तो मीर ने देखा , फिर चिरागों में रोशनी ना रही .

मैंने कस के आँखे मींच ली।

मैं नहीं चाहता था की किसी भी हालत में वो के सोने के तार सा ख़्वाब कहीं बिच में ना टूट जाय।
हलकी हलकी सी कदमों की आहट ...और फिर वो महजबीं ....मेरे पैर के पास बैठ गयी ...झन्न से ..

और उसके बाद तो ... उसने चद्दर हटाया ...और बहूत हलके से ...जैसे कोई गुलों से लदी शाख को आहिस्ता से पकडे , की वो लरज ना जाय ,

बस उसे हौले से पकड़ ल़ीया ,

और उसके गजल सरीखे होंठ सीधे 'उसके ' बेस पे ..
फिर धीरे धीरे जीभ ऊपर की ओर ...

बस मैं ये मना रहा था की काश ये ख़्वाब हकीकत में तब्दील हो जाय ...

कनखियों से मैंने मोबाइल में देखा ...और उदास हो गया ..10.20 ...और गुड्डी तो किसी हालत में 12 बजे के पहले आ नहीं सकती थी . मैंने कस के फिर आँख बंद कर लिया और सपना फिर चालू हो गया।

जुबान थी या शहद में लिपटी कोई गुलाब की कली ..

उसकी टिप अब 'उसके' उपरी हिस्से में पहुँच रही थी।
मैंने आँख कस के भींच रखी थी।
कुछ हलकी सी आवाज भी हो रही थी .

मैंने डरते डरते एक आँखे खोली ....
ख़्वाब टूटा नहीं ...

फिर दूसरी आँख भी ...बिना कुछ बोले ...

ये क्या ख़्वाब हकीकत में तब्दील हो गया था।
ये गुड्डी ही थी ...जंग बहादुर उसके हाथ में
मैंने आँख फिर बंद कर ली .


मेरी सारी देह की अनुभूति बस एक जगह केन्द्रित हो गयी थी, जैसे अब मेरी पूरी पूरी देह की संवेदनाएं बस वही हों ,
उन रसीले अधरों की छुवन ....
उन होंठों की काम यात्रा नीचे से ऊपर ....

और मैंने हिम्मत कर फिर आँखे खोलीं ...

वो सुनयना कुछ बोल रही थी ...बल्कि बुदबुदा रही थी ....
मैंने कान पार कर सुनने की कोशिश की ...
शब्दों की एक एक बूँद को ...

" मेरी बात मान लो ....बहूत मजा आएगा।

अरे उस बुद्धू की एकदम मत सुनना। उसी के चक्कर में तुम इतने दिन मजे के बिना रहे ...बहूत मस्त माल है रंजी ...

एकदम कोरी ...कच्ची कली ..कसी कसी ...थोड़ा चीखे चिल्लायेगी , चूतड पटकेगी , लेकिन तुम एकदम मत सुनना ..दोनों टांग उठा के बस हचक के ...चीखेगी ...चिल्ल्लाएगी ...

लेकिन एक बार जब तुम अन्दर घुस जाओगे ना ..और झिल्ली टूटती है तो लौंडिया चिल्लाएगी ही ...अगर ये सोच लिया तो फिर सब लड्किया अन चुदी ही रह जायेंगी। है ना

 गुड्डी एक पल के लिए रुकी।

उसने अपने चेहरे को उपर उठाया , गोर गालों पे आ रही एक नटखट लट को हटाया और फिर मेरे बौराए , पगलाए, मोटे , मस्ती से फूले सुपाडे पर एक चुम्मी ली।

फिर उसकी रसीली जुबान ने उसके चारों ओर एक परिकृमा सी की। और ...जैसे कोई बाज एक झटके में गौरेया को धर दबोचे ..उसके होंठों ने सुपाडे को गपुच लिया और हलके हलके चूसने लगी।

मेरे चूतड अपने आप उसके इशारे पर उपर नीचे होने लगी।
मैं अपना तन मन तो कब का उसे हार चुका था।

मैंने फिर आँखे बंद कर ली।
थोड़ी देर के बाद उसके होंठ अलग हो गए थे और उसकी आवाज फिर सुनाई देने लगी।

वो रसीली, जादुई, मधुमयी ...
फिर वही, ताने , उलाहने, मान, मनुहार ...और टीपिकल गुड्डी की उकसाने वाली बातें ...

" सुन मेरी बात ...वरना घाटा हो जाएगा ...कोई और मैदान मार जाएगा तो फिर मत कहना। रंजी अब एकदम गरम है ...पटाने वटाने का चक्कर छोडो ...

बस अब सीधे अन्दर ...थोड़ा नखड़े बनायेगी ...मत सुनना ...एक बात समझ लो बस एक बार घुस जाओ अन्दर ...कुछ नहीं कर पाएगी ..चूतड पटकती रहेगी साल्ली।एक बात बताऊँ राज वाली ...तुम ऐसे हो ना ...जहां एक बार घुस जाओगे ना ...रंजी हो या कोई और ..रंजी साल्ली की चूत में तो खुद आग लगी है ...जहां एक बार हचक के ...पीछे पीछे घूमेगी ....बस अब सिर्फ मेरी बात सुनना ..देख कित्ते मजे दिलवाती हूँ तुझे ...”

और मुझसे गड़बड़ हो गयी।
मैंने बोल दिया।

" क्या कह रही हो ..."
और वही हुआ जो होता है ...

गुड्डी ने अपनी बड़ी बड़ी आँखे उठा के मुझे देखा और ....घुड़क दिया।

" तुमसे कौन बोला रहा है ....मैं तो अपने 'इससे ' बोल रहीं हूँ ..."

और वो किससे बोल रही है ये जैसे समझाने के लिए उसने उसने सीधे सुपाडे पर तितली की तरह किस कर लिया। और फिर मुंह उठा कर मुझे हड़काना शुरू कर दिया।

" जब दो समझदार लोग बातें कर रहे हो ना तो किसी नासमझ को नहीं बोलना चाहिए बीच में समझे ..बुद्धू कहीं के, मैं इससे बात कर रही हु ...तुम चुप ही रहो ....'.

मैंने बात मान ली और चुप ही रहा।

और गुड्डी और उसका संवाद चालू हो गया। और वही रंजी गाथा ...

गुड्डी ने फिर से एक बार हलके से अपने होंठो को लिंग के बेस पे रगडा, ऊपर तक हलके हलके किस किया सुपाडे के बेस तक ...और फिर ...जैसे कोई नदीदी लडकी लालीपाप लिक कर ले , बड़ी सी जीभ निकाल कर सुपाडे`के बेस से सीधे ऊपर तक उसने चाट लिया।

एक बार ....फिर एक बार ...और सर उठा के मेरी ओर देखा ...जैसे पूछ रही हो कैसा लगा
और फिर बातचीत चालू हो गयी।

" यार बहोत मस्त माल है वो ...पूरा शहर पीछे पडा है उसके ...और वो भी कोई ताला डाल के नहीं बैठी है खुद बांटने को तैयार बैठी है। और एक बार बताऊं ...वो साल्ली ... आगे पीछे दोनों ओर से ...

थोड़ा नखड़ा करेगी पर ...निहुरा के मार लेना साल्ली की ..गांड ....एकदम कसी है ....तुम तो तगड़े ,मोटे भी हो ...बहुत परपराएगी उसकी ...रोने का नाटक भी करे ...लेकिन खबरदार ...जो तुम रुके तो ...पूरा अन्दर घुस कर दम लेना ...फिर तो सटासट सटासट ...

और एक बार में नहीं ...कम से कम दो तीन बार ..मार लोगे ...तो देखना खुद ही पकड़ के अपनी गांड में सटाएगी ..."

इधर गुड्डी , रंजी की गांड का सुन्दर चित्रात्मक वर्णन कर रही थी और मेरे सामने भी रंजी का मस्त पिछवाड़ा घूमने लगा ...

.अब तक दो दिन मैंने काम रस लिया था लेकिन पिछवाड़े का नहीं ...और वैसे भी मै किसी कन्या के साथ अगवाडा पिछवाड़ा डिस्क्रिमिनेशन में विश्वास नहीं करता।

मैंने मन ही मन गुड्डी की बात मान ली ...वैसे भी इतने क़ानून हैं डिस्क्रिमिनेशन के खिलाफ ...क्या पता ये भी किसी क़ानून का वायलेशन हो ...

और मैं भूल के भी क़ानून तोड़ने में यकीं नहीं रखता

और मैंने फिर गड़बड़ कर दी।

मेरी निगाह घडी पर पड गयी . अभी साढे दस बजे थे ...गुड्डी इत्ती जल्दी कैसे ..शीला भाभी से बच के ...कल तो कितनी देर ...12 बजे के बाद ...और मेरी निगाह दरवाजे पर गयी , सिटकनी बस लगी थी। कल तो उसने सिटकनी , बोल्ट सब कुछ अच्छी तह बंद किया था ..लाईट भी आज जल रही थी ...

कहते हैं ना क्युरियासिटी किल्स द कैट ...बस वही हुआ ...

मैंने पूछ लिया।

और गुड्डी ने सोचा की डांट का असर डिस्टेंस के इन्वर्सली प्रपोर्शन होता है . .

.इसलिए अब वह उठ कर सीधे मेरे बगल में बैठ गयी। लेकिन उसके पहले उसने मेरे घुटनों में फंसे बाक्सर शार्ट को उतार कर सीधे फर्श पर फ़ेंक दिया।

मैंने उठने की कोशिश की लेकिन उसने अपने दोनों हाथों से मुझे पलंग पर वापस पुश कर दिया।

उसने मेरे दोनों हाथ उठा के तकिये के नीचे दबा दिए ...और बोली ...इन्हें ऐसे ही रखना

गुड्डी का मुंह मेरे बहूत करीब था। उसके बाल मेरे चेहरे पे लटक रहे थे। उसने अभी भी , जो मैंने उससे फरमाइश की थी वो , अपनी स्कूल की यूनिफार्म वो भी दो साल पहले की पहने थी, खूब टाईट टाप , जिससे उसके उरोज छलक रहे थे।

. बस मन कर रहा था दबा दू,

लेकिन उस शोख ने तो मेरे हाथ तकिये के नीचे दबा दिए थे।

जो कुछ मैं सोच रहा था सब कह डाला। शीला भाभी से इत्ती जल्दी पीछा कैसे छुडा लिया, आज दरवाजा बस ऐसे ही बंद है ...और लाईट भी आन है ....

बोलने को तो मैं बोल गया फिर मुझे लगा डांट पड़ेगी , वो भी कस के .
लेकिन नहीं पड़ी।

गुड्डी ने अपना सर थोडा और झुकाया।

उसके रसीले होंठ,गदराये किशोर जोबन और पास आ गए लगभग मेरे शरीर को छूते ...जैसे कोई फलों से लदी टहनी खुद झुक आये ...

गुड्डी ने अपनी लम्बी सुतवां नाक से मेरी नाक लड़ाई।

होंठ बस 2 सेंटी मीटर दूर थे थे।

फिर वो मेरी आँखों में झांकती मुस्कराती बोली ...

"बुध्दूराम, तुम्हे आम खाने से मतलब है ....या पेड़ गिनने से ."

फिर अचानक उसने अपना चेहरा ऊपर उठा लिया और बोली ..
" ऊप्स मैं तो भूल ही गयी ...तुम आम खाते ही नहीं , बल्कि छूते भी नहीं ,देखते भी नहीं नाम भी नहीं लेते ..."

गुड्डी की बात एकदम सही थी। खाने की मेरी लम्बी 'निगेटिव लिस्ट' थी , लेकिन आम हेट लिस्ट टाईप कोई चीज हो ...जैसे किसी को किसी चीज से चिढ हो ...बस उसी तरह से ...अगर उस टेबल पे कोई खाए तो मैं नहीं बैठ सकता था ...सब लोग इस बात को जानते थे ...

वो मुस्कराई और थोड़ा सरक कर और नीचे झुकी अब उसके टाप फाड़ती चून्चिया, सीधे मेरे होंठों पे ...हलके से उसने रगडा और चिढाते हुए बोली
" बोल, ये बनारस का लंगडा आम चाहिए ..."

उन के लिए तो मैं कुछ भी कर सकता था।

बस मुसीबत ये थी की मेरे दोनों हाथ उसने तकिये के नीचे दबवा दिए थे ...हाँ बोल
तो सकता था तो मैंने बोल दिया ....

एकदम नेकी और पूछ पूछ ..

वो मुस्कराई और बोली ..." ऐसे थोड़ी जैसे मैं बोल रही थी वैसे ...बोलो तो फिर अगर मेरा मन किया तो सोचूंगी "

मैं एक पल के लिए सपकपाया , ठहरा , झिझका ....मैं समझ रहा था वो मुझसे क्या कहलवाना चाहती थी।

लेकिन पास में एक यौवन से लदी किशोरी हो , अपने जोबन की बहार लूटाने को बेताब ...मेरे पास बस एक ही विकल्प था।
मैंने मुस्कराते हुए बोल दिया .... ....
" मुझे ये चाहिए ...ये ...ये तुम्हारे,.... बनारस का लंगडा आम .."

बस बिना कुछ कहे उसने अपना टाप उठा दिया।
ब्रा भी नहीं थी , दोनों गोरे गोरे यौवन के प्याले, रस कलश , छलकते हुए ...


हाथ तो फंसे थे लेकिन मुंह तो खुला था ...मैंने मुंह ऊपर किया तो उसने अपने किशोर जोबन और उपर कर लिए ...और बोली ...एक बार फिर बोलो ...

मैंने दुहरा दिया .ये ...ये तुम्हारे,.... बनारस का लंगडा आम,..."

उसने एक हाथ से मेरा सर पकड़ा और दूसरे हाथ से मेरा गाल दबाया और मेरे मुंह में अपना निपल डाल दिया।

मैंने कस कस के सक करना शुरू कर दिया।

उसने एक हाथ से मेरा सर पकड़ा हुआ था . दूसरे हाथ की उंगलियाँ मेरे बालों से खेल रही थीं,

मैं कस के गुड्डी के निपल को कभी चाटता कभी चूसता।
अब उसने धीरे धीरे करीब आधी चूंची मेरे मुंह में डाल दी थी।
इसी पल के लिए तो मैं इतने दिनों से तरस रहा था .

क्या मस्त रस था , क्या उभार , ..इनके लिए तो मैं कुच्छ भी कर सकता था।

मेरे बाल सहलाती हुयी वो शोख धीरे से मेरे कान में बोली ...
" अभी इसे ले लो ...फिर असली बनारस के लंगड़े को चखाउङ्गि ...और मना करोगे तो हाथ पैर बाँध कर ...और उसके बाद दसहरी, तुम्हारे मायके वालों के सामने ...फट जायेगी उन सबकी ..."

पता नहीं क्यों ..ये सुन के मेरे जंगबहादुर और पागल हो गए , मैं और जोर जोर से गुड्डी की चूंची चूसने लगा।

जैसे जवाब में गुड्डी ने मेरी शर्ट के अन्दर हाथ घुसेड कर कस के मेरे निपल स्करैच कर दिए, और मेरे इयर लोबस को हलके से काट लिया और कान में बोली ...मना तो नहीं करोगे सबके सामने ...वैसे जैसे मैं तुम्हारे मना करने की परवाह ही करुँगी।

और उठ गयी ...और उठते उठते मेरी शर्ट को भी उतार के फर्श पर

.. .लेकिन हाथ फिर तकिया के नीचे ...और बोली ..."आज जो करुँगी मैं करुँगी ..बस तुम ऐसे ही लेटे रहो ...चुपचाप "

मैंने गुड्डी से बोला ,

" हे मुझे तो टापलेस , बाटम लेस सब कर दिया और खुद ...."
चल यार तू भी क्या याद करेगा किस बनारस वाली से पाला पडा है , वो बोली और अपना टाप उतार के सीधे मेरे चेहरे पे ...

उसकी स्कूल यूनिफार्म की स्कर्ट अभी भी उसकी देह पे थी।

मैं सोच रहा था देखूं अब ये क्या करती है।

गुड्डी ने एक बार फिर कस कस के मेरे तन्नाये लिंग को लालीपॉप की तरह जोर जोर से चूसा, फिर मेरे ऊपर।
स्कर्ट कोअपनी कमर पर उसने छल्ले की तरह लपेट लिया और दोनों पैर मेरी कमर के दोनों ओर ....

अब वो धीमे धीमे नीचे हुयी और अपनी गीली चूत मेरे सुपाडे पर रगड़ने लगी।
थोड़ी ही देर में मेरी हालत खराब ...

मैं कसमसा रहा था , बिस्तर पर अपने चूतड रगड़ रहा था , उचक रहा था ...लेकिन वो तो बस आग लगा रही थी , घी डाल रही थी।

लेकिन कामाग्नि का असर ये होता है की ....वो दोनों तरफ जलाती है और गुड्डी ने तो तय किया था की आज वही सब कुछ करेगी।
और उसने कोशिश भी ...

अपनी कसी चुनमुनिया को दोनों अंगूठे के सहायता से उसने फैलाया और मेरे सुपाडे पे रख कर जोर लगाने लगी।
उसके थूक से मेरा सुपाडा खूब चिकना हो चुका था। गुड्डी भी बहूत एथलेटिक थी और उसने पूरी ताकत लगाई ...सूत सूत कर वो अन्दर जाने लगा लेकिन फिर अटक गया,

गुड्डी जोर जोर से अपनी देह को मेरे उपर दबाने की कोशिश कर रही थी ...लेकिन एक तो मेरा सुपाडा बहोत मोटा था और दूसरे वो किशोरी भी नयी नवेली थी।

उसने मेरी ओर देखा लेकिन मेरे हाथ तो उसने खुद मेरे सर के नीचे दबा दिया था।
दुबारा उसने फिर बहोत जोर लगाया , लेकिन फिर वो एक सूत जाने के बाद अटक गया।

गुड्डी ने फिर मुझे देखा। अब मुझसे नहीं रहा गया और मैंने दोनों हाथो से उसकी पतली कमर पकड़ ली और उसे नीचे अपने मोटे लंड पर खींचना शुरू किया।

वो भी अपनी ओर से पूरा जोर लगा रही थी।

मैं सोच सकता था की उसे कितना दर्द भी हो रहा होगा।
वो कस के अपने होंठो को भींचे थी, दांतों से काट रही थी की चीख ना निकल जाय।

लेकिन फिर भी मैंने एक बार कस के उस सारंग नयनी की पतली कमर पूरे जोर से पकड़ी और खूब ताकत लगा कर अपनी ओर खींचा। उसने भी बहोत जोर लगा के दबाया।होंठ उसने भींच रखे थे। माथे पे पसीने की दो चार बूँद छलक उठी।

और मेरा पूरा मोटा लाल पहाड़ी आलू ऐसा सुपाडा अन्दर पैबस्त हो गया।

गुड्डी मुझे देख कर मुस्कराई ...और उसका सारा दर्द उसमे घुल गया।

किसी ने मुझसे कहा था सुहागरात का असली मजा तो दूसरी रात को आता है। पहली रात तो डर, शरम, झिझक , इसे क्या अच्छा लगेगा, अपरिचय के विन्ध्याचल पार करने में निकल जाती है। दूसरी रात सुकून की , मजे लेने की होती है।

किसी को कुछ प्रूफ नहीं करना होता, लेकिन एक नए स्वाद का आनंद भी होता है। चौथे , पांचवे दिन तक वो रूटीन होना शुरू हो जाता है।

गुड्डी के साथ आज मेरी दूसरी रात थी।

उसने बहोत जोर लगाया लेकिन फिर अन्दर और नहीं घुस रहा था।

मैंने उसकी कमर हिला के इशारा किया और वो बजाय ऊपर नीचे करने के , आगे पीछे करने लगी।
और थोड़ी ही देर में उसके चेहरे पे कामोत्तेजना के , मजे के लक्षण उभरने लगे।

ज्यादातर नर्व एंडिंग योनि के शुरू में ही होती है और उसके आगे पीछे होने से, मेरा मोटा सुपाडा उन्हें रगड़ कर, उसे मजा दे रहा था। साथ में नीचे से मैं भी चूतड उचका उचका के उसका साथ दे रहा था।

लेकिन मुझे थोड़ी देर में ही लग गया की इससे ज्यादा कुछ होना मुश्किल है।

अभी 24 घंटे भी तो नहीं हुए थे इस कली को फूल बने। योनिद्वार और प्रेम गली बहोत ही संकरी थी।

मैंने उसकी कमर पकड़ के उसे नीचे लिटा दिया और अब गाडी नाव पे आ गयी थी।


वो मुस्करा रही थी। उसने अपनी मन की कर ली थी , अब मेरी बारी थी।

मेरा सुपाडा अन्दर धंसा हुआ था। उसकी गुलाबी कसी पुत्त्तिया फैली हुयी थी।

ऐसा लग रहा था किसी संकरी बोतल में जबरन , एक मोटा कार्क घुसेड दिया गया हो और अब न वो आगे हो रहा हो , ना पीछे।
उसकी थकी थकी सी, केले के ताने सी चिकनी गोरी जांघे पूरी तरह फैली थीं

मैंने उसकी दोनों लम्बी टाँगे पकड़ के कंधे पे रखी, कमर पकड़ी और पूरी ताकत से ठेला।

उयीईईईईईईईइ ....गुड्डी की चीख निकल गयी ...और मुश्किल से एक सूत अन्दर घुसा होगा .
अब मेरी समझ में आया .

ये कोई ब्ल्यू फ़िल्म या हाट कहानी नहीं थी, जिसमे हीरो किसी को कहीं भी पकड़ कर घुसेड देता है और लड़की बोलती है हाँ और ठेलो हाँ और जोर से चोदो चोदो ...और बिना किसी मुसीबत के लड़का अपना 9 इंच ठेथी।ल देता है ...और छठवीं लाइन लड़की ओह ओह मैं गयी कह कर झड जाती है ....

लेकिन ये असल जिंदगी थी।

मैं समझ गया सिर्फ दूसरा दिन ...बिना कुछ लगाए ये मूसल अन्दर घुसने वाला नहीं।

सुपाडे पे तो गुड्डी ने बहुत ढेर सारा अपना सैलिवा लपेट दिया था तब भी कित्ती मुश्किल से अन्दर गया।

मैं झुका और गुड्डी की सपनीली पलको को चूम कर बंद कर दिया ।

मेरे प्यासे होंठ , फिर उसके गालों, होंठो से होते हुए उसके मदमस्त उभारों पर रुके।
मुझे मल्टी टास्किंग करने की आदत है।

मेरे दोनों हाथ भी मैदान में आ गए। एक ने जोर जोर से उसकी चूंची दबानी शुरू की और दूसरे ने उसकी क्लिट को छेड़ना शुरू किया।

थोड़ी देर में ही गुड्डी जोर जोर से सिसकिया भर रही थी।

एक पल के लिए मैंने उसकी क्लिट को छोड़ा और उस हाथ ने वैसलीन की शीशी को ढूंढ निकाला।
फिर तो बिना कोई इकॉनामि बरते मैंने मेरे लिंग का जो भी हिस्सा बाहर था, उसे खूब लिथड दिया।

फिर थोड़ा सा मैंने पुल किया और अब कुछ सुपाडा भी बाहर था, वहां भी वैसलीन पोत दिया।

गुड्डी की अभी भी आंखे बंद थीं.

और उसके जोबन अभी भी कस के मसले, रगड़े, चूसे , चाटे जा रहे थे।

अब मैं सीधे मेन कोर्स पर आ गया। मैंने एक बार फिर उसकी दोनों लम्बी टांगों को अपने कंधे पे सेट किया , और दोनों हाथ उसकी कमर पे ...और जोर का धक्का मारा ...

उयीईईईईईइ ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ....वो चीखी ...

लेकिन मैं चन्दा भाभी से सीख चुका था कभी कभी लड़कियों की चीख नहीं सुननी चाहीये ...तो मैंने नहीं सुनी और दुबारा और जोर से पुश किया ...

उयीईईईईईइ ओह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ....

और मैंने तिबारा घुसेड़ा ...अब दो तिहाई से ज्यादा लंड अन्दर था ....और रुक गया.

गुड्डी ने जोर से अपने होंठ भींच रखे थे .. दर्द से ...मेरे होंठों ने पहले तो उन्हें किस किया और थोड़ी देर में मेरी जुबान भी अन्दर थी। कल से आज तक हम लोग कितनी बार फ्रेंच किस ले ले चुके थे।

… अब मैं एक बार फिर द्रुत से मध्यम पर आ गया।

मेरी जीभ उसके मुंह में अठखेलियाँ खेल रही थी, उसके मुख का रस ले रही थी।

मेरे दोनों हाथों ने पहले प्यार से हलके हलके फिर कस के जोबन मर्दन शुरू किया। आखिर इन्ही को तो देख के बिचारा मैं ललचाता रहता था। और उसके किशोर उभार थे भी इत्ते प्यारे ..

कभी जोश से पथराये उसके उरोज मैं कस के दबा देता, निचोड़ देता तो कभी कड़े खड़े निपल्स को पुल कर लेता , पिंच कर देता।

वो सिसक रही थी , कस के बार बार मुझे अपने आलिंगन में बांध लेती। उसके लम्बे नाखून मेरी पीठ को, शोल्डर ब्लेड्स के पास खरोंच ले रहे थे।

और फिर मेरे एक हाथ ने नीचे का रास्ता लिया, उसके उभारों को कोई मोहलत नहीं मिली।
वो उभार , जो पूरे बनारस के लडको को सालों से ललचा रहे हों और अब मेरे शहर के लड़कों को,
और सबसे बढ़कर मुझे ...उन्हें इत्ती आसानी से छुट्टी काहें को मिलती।

हाथ की जगह अब मेरे होंठों ने ली और गुड्डी की गदराई मस्त चून्चियों पे मेरे हाथ की और होंठों की जुगलबंदी चालू हो गयी। हाथ तबले की तरह ताल देता तो होंठ उसकी देह वीणा पे राग छेड़ते।

कभी धीमे धीमे मन्द्र सुरों में , चुम्बनों की बारिश करते तो कभी शराफत छोड़कर , उसके उरोज के अग्र भाग पे दांत के निशान बना देते।

( ये ट्रिक भी चन्दा भाभी ने सिखाई थी। उनका कहना था की लड़की जब जब इसे देखेगी तो तुम्हारी याद आएगी और उससे बढाकर वो पल फिर उसे सम्भोग के पल जीने पे मजबूर कर देंगे . और सीने के उपरी भाग पे होने से , जब वो लो टाप पहनेगी तो थोड़ा बहुत नजर भी आयेगा , तो उसकी सहेलियां भी उसे देख कर छेड़ेंगी)

लेकिन मेरे होंठों को सबसे फेवरिट थे उसके मस्त कड़े निपल, वो कभी उसे लिक करते कभी चूस लेते और कभी हलके से काट भी लेते।

हाथ जो नीचे पहुँच चुका था उसने बिना रुके सीधे 440 वोल्ट वाले स्विच को आन कर दिया .
गुड्डी की क्लिट पहले ही मस्ती से फूल चुकी थी।

पहले तो अंगूठे ने उसे दबाया और फिर अंगूठे और तर्जनी के बीच रगड़न मसलन चालू हो गयी।
और साथ में उसकी चुन्मुनिया ने मेरे जंगबहादुर को 2/3 घोंट रखा था। बस दो सवा दो इंच बाहर बचा होगा।
क्लिट और निपल की राग तरंग का असर होना ही था।
गुड्डी अब चूतड उठा रही थी, बिस्तर पर रगड़ रही , थी , मुझे अपनी ओर खींच रही थी , मानो कह रही हो डाल दो ना बाकी का भी अन्दर ...किसके लिए बचा रखा है,

मैंने गुड्डी की अनकही बात मान ली ...प्रिय तो वही है जो प्रियतमा की उठी हुयी पलकों, झुकी हुयी भौंहों , एक तिरछी नजर से अंगडाई से सब समझ जाय ...अगर बोलना पड़े तो प्रिय क्या प्रियतमा क्या ...

एक बार फिर मैंने अपने होंठो से उसके होंठो को सील किया, पूरी जीभ अन्दर घुसेड़ी , दोनों टांगों को अपने कंधे पे सेट किया , एक हाथ उसके जोबन पे और दूसरा पतली कमर पे रखा,

और फिर बहोत अहिस्ता से उसकी योनि में पैबस्त अपने लिंग को थोडा थोड़ा निकाला, और उसी से हो रही रगडन से उसकी देह गिनगिना उठी।
अब सिर्फ सुपाडा अन्दर था।

वो इन्तजार कर रही थी , मैं तडपा रहा था।
मैंने फिर हलके हलके 2-3 इंच अन्दर किया ....और फिर सुपाडे तक बाहर निकाल लिया।
बस ऐसे ही दो तीन बार और, और फिर रुक गया,

गुड्डी को आने वाले तूफान का अहसास हो गया था। उसने कस के मुझे बांहों में भीच लिया ...पूरी ताकत से और,...
और मैंने पूरी ताकत से ...जोर से धक्का मारा,

एक बार ...दो बार, ...तीन बार ...चार बार,...

और अब वो पूरी तरह अन्दर था।
गुड्डी की चीज ...गुड्डी के पास ...मैंने कौन था उसे दूर रखने वाला
अब हचक कर चुदाई शुरू हो गयी थी।

मैं भी पागल वो भी पागल ...

गुड्डी दर्द से सिसक रही थी,
मजे से पिघल रही थी।

मेरे लंड का बेस अब उसके क्लिट को रगड रहा था। लेकिन मैं रुका नहीं ..उसे फिर थोड़ा बाहर किया और अन्दर ...इंजन के पिस्टन की तरह ..अन्दर बाहर ..अन्दर बाहर ..

दो चार मिनट के बाद मुझे जब होश आया मैंने उसके चेहरे की ओर देखा

उसका चेहरा दर्द से नहाया हुआ था।

मैंने अपने होंठो को हटा लिया।

अब उस सुनयना ने धीरे धीरे अपनी बड़ी बड़ीसपनों से लदी पलकें खोली, और एक साथ दो स्नेह से भरे दीप जल उठे।

वो हलके से मुस्कराई और उसके चेहरे पर एक नया राग छिड गया ...आनंद का ...सुख का ...

उसने लता की तरह अपनी दोनों बाहें एक बार फिर मेरे चारों और कस कर भींच ली ...

अब ये भाषा मैं समझता था। मौन की भाषा , असीम सुख की भाषा
मैं चालू हो गया और साथ में वो भी।

मैं हचक कर धक्के लगा रहा था पूरी ताकत से ..उस किशोरी की प्रेम गली में ...और अब वह भी पहले हलके से फिर अपनी पूरी ताकत से अपने नितम्ब उठा उठा कर साथ दे रही थी।

हम दोनों एक दूसरे की देह में गुथे हुए थे , घुसे हुए थे , प्रेम रागिनी अनवरत बह रही थी।

तभी मुझे कुछ याद आया , और मैंने उसके कान में फुसफुसाया।

उसने अपना सर उठा के मुझे जोर से चूम लिया और कस के अपनी दोनों लम्बी टाँगे मेरी कमर पर कस कर बाँध ली , और उसके हाथ तो पहले ही मुझे अपने बंधन में जकड़े हुए थे।

मेरा लंड पूरी तरह अन्दर पैबस्त था।
मैंने भी उसे अपनी बांहों में बाँध लिया ...

लग रहा था वक्त रुक गया है ...
बाहर फागुन की चाँदनी झर रही थी,...

और मैं पलट गया ...
अब वो ऊपर और मै नीचे
जो उसने शरू में कोशिस की थी पर नहीं हो पाया था,

अब वो नवल नागरी भी उतनी अन सीखी नहीं थी ...बनारस की बिंदास बाला ..
मेरे पीठ के नीचे से पैर निकाल कर उसने घुटने मोड़ लिए ...


मैंने कुछ करने की कोशिश की ...तो उस शोख ने बिन बोले अपनी आँखों से बरज दिया,
फिर वो बारिश से लदे बादल की तरह मेरे ऊपर झुकी ...उस सारंग नयनी की मृणाल बाहें मेरे कंधे पर थी ..
फिर उसने अपने रस से लदे होंठों से जैसे मेरा श्रृंगार आरम्भ कर दिया,
( बनारस में होली में तो रीत और संध्या भाभी के साथ मिल कर उसने किया ही था )...


पहले उसके होंठ मेरी मांग में गए और फिर माथे पे ...और फिर मेरे पलको को चूम के जैसे उसने आँखों का श्रृंगार किया ..और फिर और नीचे, मैंने रस में डूब रहा था उतरा रहा था,

साथ में उसकी भृंग सम पतली कटि भी ..सश्रम ...धीमे धीमे सूत सूत ऊपर हो रही थी ...मेरा चर्म दंड दो तीन इंच बाहर हो गया था।

जब मैंने उसे देखा तो वो लजा गयी और फिर उसने तुरंत मेरे दुष्ट नदीदी आँखों के कपाट अपने होंठो से बंद कर दिए ...

लेकिन देखने के लिए आँखे किसे चाहिए ...

अब वो ऊपर से नीचे आ रही थी और एक बार फिर मेरा पागल बावरा ...उसकी पिटारी के अन्दर ...
और अब की उसने फिर कमर उठायी तो और ज्यादा,...
जैसे कोई नया नया खेल सीख ले,

लेकिन
लेकिन थोड़ी देर में ही फागुन के मौसम में भी उसके चाँद से मुखड़े पे पसीने के जेवर खिल उठे ...
और अब मैंने भी उसकी कमर पकड़ ली ...फिर तो जैसे कोई नसेनी पे चढ़ के ऊपर ...और फिर नीचे ...बार बार लगातार ...

मेरे एक हाथ उसकी पतली कमर पर था और दूसरे ने उसके देह आँगन में खिले दोनों पूर्ण चन्द्र का रस लूटना शुर कर दिया ...

लेकिन वो भी ना कभी ..मेरा हाथ हटा कर अपने किशोर नव विकसित उरोज ..मेरे होंठो से छुला के हटा देती ...तो कभी बहोत खुश होती तो एकाध बाईट दे देती,

धक्को की रफ्तार तेज हो गयी थी , वो ऊपर जरूर थी लेकिन पतवार मेरे हाथ में थी .

मैं उसे कभी किनारे तक ले जाता फिर लौटा लाता ..एक दो बार के बाद फिर मैं नहीं रुका और अबकी वो जो किनारे पर पहुंची तो मैंने धक्को की रफ्तार और तेज कर दी ..उसका एक निपल मेरे मुंह में था और दूसरा उँगलियों के बीच ...

वो झड रही थी और मैं देख रहा था ...इतना सुख , इतना आनद उसके चेहरे पर बरस रहा था ...अपरमित

दो पल वो सुस्ता ली और रेस फिर चालू हो गयी …लेकिन कुछ देर बाद मैंने बाजी पलट दी,

अब गाड़ी नाव पर थी।
और अब मैं और रुकना भी नहीं चाहता था।

मैंने उसकी लम्बी गोरी टांगों को खूब फैलाया और उसे दुहरा कर दिया।
उसकी चुन्मुनिया एकदम खुली हुयी थी ...और जैसे कोई धुनिया रूई धुनें बस ...उसी तरह,...
अब ना मैं जोबन मर्दन कर रहा था ना चुम्मी ...

बस सिर्फ चुदाई ...और वो भी हचक के ...

मोटे पिस्टन की तरह मेरा लंड अन्दर बाहर अन्दर बाहर हो रहा था। बीच बीच में मैं लंड को घुसेड़े उसे गोल गोल घुमाता ...जिससे उसकी क्लिट जबर्दस्त रगड़ खाती ...
वो दो बार झड़ी लेकिन मैं रुका नहीं

मेरे कन्धों पर,सीने पर उसके कितने नाखून के निशाना बने पता नहीं ...लेकिन मेरे दांतों ने उसके गोर गुलाबी गालों को मस्त चून्चियों को भी कहां बखशा ...

दूर कहीं 12 का घन्टा बजा और गुड्डी एक बार फिर किनारे पर ....और अबकी उसके साथ मैं भी ...पता नहीं कितनी देर तक झड़ता रहा बरसता रहा

8-10 मिनट हम लोग वैसे ही पड़े रहे फिर थक कर करवट होगये ...लेकिन अभी भी मेरा लिंग उसकी चुन्मुनिया दबोचे थी ...जैसे न जाने कितनी दिन बाद मिली हो,
 
 


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