Sunday, March 9, 2014

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--98

FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--98
गतांक से आगे ...........


 गुड्डी ने मस्ती से मुझे जोर से अपनी बांहों में भींच लिया और मेरे इयर लोब की किस करके बोली ...एक बात पूंछूं ..

गुड्डी की एक उंगली अब सीधे मेरे पिछवाड़े के छेद पे पुश कर रही थी और उत्तेजना के मारे मेरी हालत खराब थी ...

पूछ ना मैंने उसके निपल को कस के काट के बोला
" पूछ ना मेरी जान ..."

" वो जो मेरी मौसी बात कह रही थी सच है क्या ..." गुड्डी झिझकते हुए बोली ...

बात समझ के भी मैंने उसे उकसाया ...क्या कह रही थी बोल ना साफ साफ

थोडा रुक के वो बोली ..." अरे वही की लड़के करते हैं आपस में ...आधे से जयादा मेरी उम्र में ..."

मुझे बस यही लग रहा था की कितनी नासमझ है ये मैंने उसे फिर छेड़ा ..
" मैं समझा नहीं ...हाँ मौसी ने कुछ नाम बताया था न की क्या करते हैं बोल ना ,..."

गुड्डी रुक के बोली ...

" तुम भी ना ...वही ..मौसी ने जो कहा था की आधे लड़के आपस में गांड मरौव्वल करते हैं ...क्या सही बोला था ..."

मैंने पहले उसे चूमा , फिर कस के उसकी चून्चिया रगड़ी ...और फिर हलके से गाल पे काट के बोला ,

" अरे यार तेरी मौसी हों और ...गलत बोले ...हाँ थोडा सा ...उनका अंदाज ..."

गुड्डी नेमुझे जोर से भींच के बोला
" बोल ना उनका अंदाज क्या ...गलत है क्या ..."

" हाँ आधे से ज्यादा बोल था ना उन्होंने ...असल में आधे से जायदा नहीं ...कम से कम तीन चौथाई से ज्यादा ..करते करवाते है ." मैंने कहा .

गुड्डी कुछ शरमाई कुछ झिझकी ...फिर उसकी आँखों में वही शरारत ..मेरी नाक पकड़ के बोली

" सुन ...तू तो भी इत्ते चिकने गोरे हो ..हाँ जो बाल वाल थे नाक के नीचे वो भी अब बनारस में साफ हो गए हैं अब एकदम चिकनी चमेली हो ...तो जरुर तेरे साथ भी किसी ने ...."

और उसीके साथ गुड्डी की मेरे पिछवाड़े के छेद पे छेडती उंगली का टिप ...जोर लगा के अन्दर

मैंने हलके से धत बोला ...और ये बात छुपा गया की मैं मरवाने से ज्यादा मारने में यकीं करता था ...लेकिन गुड्डी भी वो पीछे ही पड गयी और बोली

" अरे यार मुझसे क्यों शर्माते हो ..बताओ ना ..सच सच ...अच्छा प्रामिस मैं किसी को भी नहीं बताउंगी ...तेरी रंजी को भी नहीं ...तेरी सास को भी नहीं ...."

" नहीं यार मैंने ...मेरे साथ किसी ने कभी कुछ नहीं किया मैं तो मौसी की ..." मैने झिझकते हुए बोला ..लेकिन गुड्डी तो अब फूल फार्म में थी ..

मेरी गांड में घुसी अंगुली की टिप जोर से पुश करके ...गोल गोल घुमाती बोली ...

" मतलब कोरी हो ...लग भी रहा है एकदम कसी है ....कल कई बात नहीं मैं हूँ ना अब तेरे साथ कल इसका भी इलाज करवा देती हूँ ..मेरे साथ चलोगे ना बनारस ..बस वहीँ रंग पंचमी में ..हफ्ते भर भी तो तो नहीं बचे है ..."


मैं उसकी इस शरारत का सिर्फ एक तरीके से जवाब दे सकता था ..

हचक हचक के मैंने अपनी दोनों उंगली से उसकी गांड मारनी शुरू कर दी ...लेकिन वो चालू रही कुछ सोच कर बोली

" नहीं रंग पंचमी में चलो तुम्हे बख्श देंगे ..आखिर कोरी है तेरी ..मम्मी से मैं मैं बोल दूंगी ...

दूबे भाभी को समझा देंगी ...सीधे कोहबर में ...बाहर तेरी बहनों की नथ उतारी जायेगी ...और अन्दर कोहबर में तेरी ..घबडाना मत ..."

और फिर मेरे पिछवाड़े अपनी ऊँगली की टिप गोल गोल घुमाते बोली ..

" थोडा मम्मी की चमचा गिरी करना मना लेना ..तो बिलकुल सूखे नहीं ...

तेरी कुप्पी में दो चार बूँद सरसों के तेल की डाल देंगी अब गाँव में वैसलीन क्रीम तो चलती नहीं हीं और ...

तुम एकदम मत घबड़ाओ ...परेशान मत हो ...इतने दिन का तेरा नुक्सान ..अब सूद ब्याज समेत… पहले कोहबर में फिर ससुराल में,… सब मजा मिल जाएगा ...इधर का भी ..."

गुड्डी फिर कुछ रुक कर बोली ..." अभी कोहबर में टी दो महोने से भी ज्यादा बाकी हैं ,

मैंने गहरी सांस ली ..चलो इसकी रिकार्ड का टोन तो बदला ...और मैंने भी हामी भरी ...

" कैसे कटेंगे ये दो महीने ..."

हम दोनों करवट एक दुसरे को बाहों में बांधे लेटे थे ...तभी गुड्डी ने मुझे धक्का देकर मुझे पीठ के बल कर दिया और मेरे ऊपर आकर बोली

" तेरी तो दो महीने बाद कोहबर में जम कर ली जायेगी ...उस के बाद ससुराल में , भूल ना जाना तुमने वायदा किया है जब तक बनारस में रहोगे , चाहे ट्रेनिंग या पोस्टिंग ...हम लोगो केसाथ रहोगे ...लेकिन वो तो दो महीने बाद ..अभी तो गुड्डी तेरी ले लेगी (उस की ऊँगली की टिप अभी भी मेरे अन्दर थी , पिछवाड़े )

गुड्डी की विपरीत रति की ये तोसरी कोशिश थी .

पहली बार तो वो एकदम फेल रही , दूसरी बार थोड़ी बहुत मेरी सहायता से ...लेकिन अब वो चतुर प्रवीन हो गयी थी ...घुड सवारी करने में ...और अब मेरा घोडा भी तो बस उसके कहने पे चलता था ..

उसने अपने हाथ मेरे दोनों कंधो पे रखे ..इशारे से मुझे , मेरेहाथ दूर रखने को कहा ...अपने पैर मोडे ...और अब उसकी गीली भीगी रामप्यारी बस मेरे घोड़े को कभी पुचकारती, कभी सहलाती ...

चूत की दरार सीधे सुपाडे पे ...कुछ देर तक उसने मुझे और तड़पाया , ललचाया और जो जोर से धक्का मारा ...तो एक बार में पूरा सुपाडा अन्दर ...उसके आँखों में सफलता की मुस्कान नाक रही थी और जैसे सावन के बादल नाचते झूमते आके धरती को चूम लें ...

.झुक कर उसने मेरे मुंह को चूम लिया ...अब वह एक दम साजन थी ...और मैं सजनी

जैसा मेरी गुड्डी चाहे ..

ये चार आँखों का खेल ऐसा खेल है जिसमें हार के भी जीत मिलती है

उस मीठे रसीले पलंग तोड़ पान की महक मुझे गुड्डी के मुंह से आ अहि थी और उस का रंग भी अब गुड्डी के होंठो पे चढ़ा हुआ था ...वो जोड़ा पान , मैं भूल ही गया था की चित्तोड़ गढ़ की लड़ाई के बाद से ...गुड्डी के मुंह में ही था वो उसे चुभला रही थी ..

और साथ में अब वो अपने किशोर उभारों को मेरे साइन से कभी छुला देती , कभी रगड देती ...और मेरे पूरे देह में होली किआग दहक उठती

बाहर हवाओं में होली की फगुनाहट भीन रही थी ...अभी भी कही दूर से कभी कबीर तो कभी होली गाने की आवाजें रुक रुक के आ रही थीं ....

चौदहवीं का चाँद अपनी यात्रा के आखिर पड़ाव पे था

दूर कहीं से एक होली के गाने की आवाज तेजी से गूंजी ...

अरे नकबेसर कागा ले भागा अरे सैयां अभागा ना जागा ...

अरे उड़ उड़ कागा चोलिया पे बैठा , अरे चोलिया पे बैठा ....
अरे जुबना का , अरे मोरे जुबना का सब रस ले भागा ...मोरा सैयां अभागा ना जागा .


और उसी के ताल पे गुड्डी ने दूसरा धक्का मारा ...और मेरे जंगबहादुर अब लगभग पूरी तरह उसके अन्दर थे ...
और साथ ही गुड्डी के होंठ ...जिन्हें छूने के लिए मेरे होंठ हरदम बेसबरे रहते थे ...खोद झुके और मेरे होंठो पे एक उड़ाती हुयी हलकी सी चुम्मी ...

और फिर उन दुष्टों ने सीधे मेरेनिपल्स पे बाईट ले ली ...और कुछ दर्द कुछ जोश से मेरी हालत खराब हो गयी

और जवाब मेरी कमर ने दिया ..नीचे से धक्का लगा के ...जैसे मस्त होके गुड्डी मेरे धक्कों का जवाब धक्के से देती थी ...

 और उधर गुड्डी के होंठ तितली की तरह ...कभी मेऋ पलकों पे बैठ के उसे मुंद देते , सपनो से उसका श्रृंगार कर देते ...

तो कभी माथे पे वो चूम लेती जैसे वहां बिंदी लगा रहा हो ...और कभी कचकचा के गाल काट लेती जैसे कह रही हो ...काटने मसलने का काम सिर्फ तेरा ही नहीं है मेरे साजन अब ये खेल मैं भी सीख गयी हूँ ...

और फिर अचानक उसने अपने एक हाथ से मेरे गाल कस के दबाये ...

और चिड़िया के चोंच की तरह मेरे होंठ खुल गए ...

और उसने आँखों से बरजा की ..खबरदार जो होंठ बंद किया ...

उसके होंठ झुके लेकिन मेरे खुले होंठो से दो तीन इंच दूर ही रुक गए

पहली बार भी मुझे पान गुड्डी ने ही खिलाया था ..जबरन,... बनारस में , अपने होंठो में ले के ..

लेकिन आज उसके मुंह में देर से घुलता , उसके मुख रस में पगा ...और जब उसने होंठ खोला तो ..

पान का सब घुल हुआ रस , साथ में उसका मुख रस ...पान के छोटे छोटे टुकडे

बूँद बूँद कर मेरे मुंह में ...मैं हिलने की हिम्मत नहीं कर सकता था ...

मैं क्या ...समय , खिड़की से झांकता चाँद , फागुनी हवाएं सब रुकी थी

और तिन चौथाई पान मेरे मुंह में गया होगा की गुड्डी ने झुक कर अपने होंठो से मेरे मुंह को सील कर दिया ...
और गुड्डी के रस में भीगे उस नशीले रसीले पान का रस मेरे मुंह में मेरी पूरी देह में घुलने लगा ...

और जैसे इतना ही काफी नहीं था ....

अब उसने अपनी जुबान भी मेरी मेरे मुंह में घुसेड दी ...और अब डीप फ्रेंच किसिंग चालु हो गयी

कभी मैं गुड्डी के किशोर रसीले होंठ चूसता तो कभी वो भी उसी शिद्दत से मेरे होंठ चूसती , कभी हलके से काट लेती ...और मैं जवाब में मुंह में घुसे उसकी जुबान को चूसता चुभलाता ..

हमला चौतरफा था ..
वो प्रवीन ..सारंग नयनी किशोरी , अपने जोबन मेरे सीने से रगड़ रही थी ...अपनी प्रेम गली में घुसे मेरे जंगबहादुर को प्यार से भींच रही थी , दबा रही थी ...

देह की होली , मन की होली चल रही थी ..और अब मैंने भी अपनी बाहों में उसे बाँध लिया था ...मेरा एक हाथ उसकी पीठ पे था और दूसरा उसके सर पे ..

तभी गुड्डी के फोन पे कोयी मेसेज आया और उसने एक पल के लिए अपना सर हटा के मेसेज देखा , मुस्कराई और अब उसके होंठ मेरे कानो पे थे ...

अपनी जीभ से पहले तो उसने मेरे कान में सुरसुरी की फिर बोली ...तुम दिन में पूछ रहेथे ने रीत ने मेसेज में क्या गिफ्ट दिया है ...हाँ मैंने बेताब हो के अपना सर हिलाया

उसने जवाब मेरे इयर लोबस को चूम लिया और बोली ..

जबर्दस्त गिफ्ट है ...ना सिर्फ तेरे लिए बल्कि मेरी उस छिनार ननद रंजी के लिए भी बल्कि ....

मेरी सारी होने वाली ननदों के लिए ...और फिर वो मुझसे बोली ...चूत चोदव्वल गांड मराव्वाल लंड घुसव्वाल ....और फिर मेरे कान में उसें पूरा मन्त्र सूना दिया ..

और फिर मेरे सर को दोनों हाथो से पकड़ के मंत की विधि भी बताई ...और उसका असर भी ...

"सुन होली के अगले दिन से रंग पंचमी के बीच ये मन्त्र जगाना होता है ...इसके लिए कुँवारी लड़की चाहिए अनचुदी ...और पूरा असर होने के लिए सगी बहन हो तो बेस्ट है ...
"
मैं कुछ पूछता ...उसके पहले गुड्डी ने ऊँगली के इशारे से मुझे चुप्प रहने को बोला और फिर समझाया ...

" अरे यार मुझे मालूम है की तेरी कोई सगी बहन नहीं है ...वो मैंने रीत से पूछा था ...तो वो बोली जो भी

सबसे नजदीक की हो ...तो रंजी है ना तेरी ममेरी ..सबसे नजदीक की बहन ...सगी सरीखी ही ...तो बस

...होली के अगले दिन यानी परसों या उसके एक दो दिन के अन्दर ...बस जब उसकी झिल्ली फाड़ना ....तो ये मन्त्र पांच बार पढ़ना और ...झडते समय भी ..सारा वीर्य उसकी चूत में गिरना चाहिए

.और सिर्फ इसी से मन्त्र सिद्ध नहीं होगा ...चौबीस घंटे के अन्दर ...तुम्हे उसकी गांड भी मारनी होगी और मुंह में झड़ना होगा ...और हर बार सारा वीर्य उसके अन्दर जाना चाहिये ...और हर बार इसी मन्त्र का पाठ ..

अब मुझसे नहीं रहा गया और मैंने पूछ ही लिया ...लेकिन इस मन्त्र का असर ...

तुम भी ना ..वो नाराज हो गयी ....फिर प्यार से पुचकारते बोली ...

अरे ये स्तम्भन मन्त्र है ..बनारस में किसी ने रीत कोबताया था ..इस शर्त के साथ की वो किसी एक को सिर्फ बता सकती है ...और उसने तुम्हे चुना कित्ती अच्छी है ना वो

रीत के अच्छी होने के बारे में मुझे क्या पूरी दुनिया को कोई संदेह नहीं है ..सभी कहते हैं ...इस्ट या वेस्ट रीत इस बेस्ट ...लेकिन मैं चुप रहा और गुड्डी ने आगे समझाया ..


इस मन्त्र को एक बार जगा लोगे तो बस …तुम जब चाहोगे तभी झडोगे ...और तब तक तुम्हारा ये एकदम टन्न ....और जैसे समझाने के लिए उसने अपनी चूत मेरे तन्नये लंड पे भींच ली ...फिर तो तुम हचक हचक के जब तक चाहो चोदो

और हाँ उसका एक असर जिस पे तुम मन्त्र जगाओगे उस पे भी होगा ...लेकिन अब उस का कुछ नहीकिया जा सकता ...वो लड़की जिस पे तुम मन्त्र जगाओगे वो फिर एकदम छिनार हो जायेगी ...

लेकिन रंजी ...रंजी क्या मेरी सारी ननदे ...वैसे ही छिनार है ...

तो इसलिए उसकी कोई चिन्ता की बात नहीं ...फिर मेरे बनारस के लड़कों का और तेरे शहर के भी लड़कों का फायदा हो जाएगा ना ...होगा ये की उसकी चूत में हरदम चींटियाँ काटेंगी और जो लड़का ज़रा भी कोशिश करेगा , उससे लिफ्ट मांगने की ...तो बस वो उसके आगे अपनी स्कर्ट पसार देगी ...

किस्सी को भी मना नहीं करेगी सबका मन रखेगी मेरी प्यारी ननद , रंजी .

मन्त्र तो अब जगाना ही होगा मैं बस ये सोच रहा था की गुड्डी ने आगे की भी बात बतायी ...

और वो जो तुम होलिका की राख ले आये थे ना ...और वो बित्ते भर की लकड़ियाँ ...( मैं क्या बोलता की मैं ले आया था या उसने मुझसे बोला था की लाने के लिए ) ,

गुड्डी चालु रही ...

.बस वो राख मैं , तुम से तो होगा नहीं तुम शर्माते रह जाओगे ....रंजी की चूत और चूंची पे मसल दूंगी ...और जब तुम उसको चोद चुकोगे ना ...

तो एक लकड़ी मैं रंजी की चूत में डालूंगी और दूसरी उसकी गांड में ..बस एक घंटे वो रखे रहेगी तो ... जो दर है ना तुमको की कही सबसे चुदवा चुदवा के उसका भोसड़ा ना हो जाए ...वो नहीं होगा ...

चाहे जीतनी बार चाहे जिससे चुदवाये ..एकदम सोलह साल की कुँवारी कली की तरह रहेगी तेरी रंजी बस रंजी का भी भला और तेरे पूरे शहर के लड़कों का भला ...लेकिन सबसे पहले वो अपने इस भैया कम सैंया ज्यादा का भला करेगी ...जो उसके जोबन देख के ना जाने कब से लार टपका रहा है ...

बात गुड्डी की सोलहे आने सही थी . रंजी के जोबन थे ही ऐसे गद्दर ..

 भाभी जब से उस का नाम लगा के मुझे चिढाती थीं ...गालियाँ गाती थीं ...

हमारे गाँव में सरसों फुलाई हमार ननदी , अरे रंजी साल्ली , हमरे देवर से चुदवाई ...

मैं ऊपर से मुंह बनाता ...

लेकिन मेरे मन में आँखों के सामने बस मानो लगता की मैं रंजी को ..रहा ...चोद रहा हूँ ...

और वो भी कम नहीं थी ..भाभी जब गालियाँ गाती तो बस वो खिल्ख्लाती रहती ...

मेरी ओर देखती रहती ...मानो वो भी वाही सोच रही हो जो मैं सोच रहां हूँ ...उसके जोबन के फूल जब से निकलना ही शुरू हुए थे ...वो कुछ ऐसा करती की मेरी निगाहें वहीँ पहुँच जाती ..और कई बार तो जब मैं जान बूझ के नासमझ बनता तो वो जिस शोख अदा से बुद्धू कहती ...

अब मैं समझ सकता था उसके मन में क्या था , कब से उसको खुजली मच रही थी ...

और वो अब तो और ...उस दिन उस के कमरे के बाहर से जो मैं बाते सुन रहा था ...जब गुड्डी उसके साथ अन्दर बाते कर रही थी ...की कैसे उसके लव लेटर वाले के साथ वो पूरा मन बना के थी गयी थी ...वो तो ऐन मौके पे उसका मकान मालिक आ गया ...और फिर सिनेमा हाल में कैसे उस लड़के ने और उके दोस्त ने

... और प्रामिस था की जब अप्रैल में वो दो लौटेंगे तो रंजी दोनों के साथ

वो तो चन्दा भाभी ने उसे बनारस में मजा लेना सिखा दिया था और समझा भी दिया था की इस होली में लेना मजा वरना कोई और नेवान कर लेगा ...

लेकिन उन से भी कर गुड्डी ने जिस तरह से सीन सेट की ...और आज शाम को होली की रंजी की रगड़ाई में उसे शामिल कर लिया ...बिना कपडे के ड्राई हम्पिंग ...रंजी का टाप उन लोगों ने गले तक उठा रखा था और उस के हाथ पकड़ के रंजी के मस्त जोबन पे शीला भाभी ने दबा रखे थे ...

कित्ते मस्त रसीले कड़े कड़े उभार है न उस के ...अज तो वो सब के सामने खुल के दबा रहा था और रंजी ..बिना ना नुकुर के मिजवा रही थी और पीछे से .

मंजू ..उस का लंड सीधे उसके चूतड के बीच में गांड को दररते रगड़ते ...आगे पीछे ...गुड्डी ना कहती तो भी उसे मालूम था की रंजी की गांड मारने में खूब आयेगा ...जिस तरह से उसे देख के वो चूतड मटकाती थी ....वो उस की गांड ना मारना सख्त नाइन्साफी थी .

एक ही दो बार तो उसके साथ वो बाजार गया लेकिन कम से कम पांच छ तो ऐसे थे जिन से उस की अच्छी जान पहचान थी और लार टपकाने वाले और कमेन्ट करने वालों की तो गिनती नहीं ...

लेकिन वो लड़कों को क्यों ब्लेम दे ..रंजी पर जवानी आई ही थी ऐसी गद्दर मस्त , खूब गोरी , लम्बी बड़ी बड़ी आँखे ...जिनसे जब वो अदा से देखती ...

तो बस अंखियन से गोली मारे , जुबना से तीर ...वाली बात होती ...

और जोबन भी गुड्डी से बीस ही थे फिर जिस स्टाइल से वो उभारती , कभी मुद के कभी झुक के छैलों को उसकी झलक दिखाती ...पानी में आग लग जाती

मेरे मन की बात और गुड्डी को पता न लगे ...ये हो नहीं सकता ..

गुड्डी ने हचक के धक्का मारा ..अबकी पूरा लंड अन्दर ...

अब वो विमेन आन टाप की एक्सपर्ट हो गयी थी , और साथ में आँख नचा कर मुस्करा कर बोली ...क्यों उस साल्ली छिनार रंजी के बारे में सोच रहे थे ना ...

खैर तेरी गलती नहीं है माल ही है इतनी मस्त ...बस दो दिन इन्तजार करो ...

होली और उस के अगले दिन ..अब तो मन्त्र भी उस पे जगाना है ...अपने सामने हचक के चुदवाउंगी उसे बहुत दिनों से मेरे यार को तड़पा रही है ...

अपनी ख़ुशी जताते जवाब में मैंने नीचे से एक धक्का मारा ...और उसे अपनी बांहों में भींच लिया
खुशी से मेरे गाल को काट के गुड्डी बोली ...जानते हो उस मन्त्र में एक और बात है ...

क्या ...मैंने अपने नाख़ून गुड्डी की पान सरीखी चिकनी पीठ में गडाते पूछा ...

एक तो तुम झड़ोगे नहीं जब तक तुम खुद ना चाहो ..इसलिए मन भर चोद सकते हो और दूसरे ...जैसे ही तुम किसी मस्त माल को देखोगे ना ...तो तुम्हारा अपने आप खड़ा हो जाएगा ...

और रंजी ऐसा मस्त माल तो मिलेगा नहीं ...उसे देखे कर तो पूरे शहर के लौंडो का खड़ा रहता है ...तो बस जब चाहो , ,निहुराओ सटाओ चोदो ...गुड्डी जोर जोर से ऊपर से धक्के लगाते बोली

फाड़ देना साल्ली की

नेकी और पूछ पूछ हंस के मैं बोला ...बस मौका मिलने दो आगे पीछे दोनॉओर

और मैं अपनी ख़ुशी जिस तरह जाहिर करता हूँ मैंने उसी तरह की ...
मैंने गुड्डी को खीच के नीचे करदिया ...और अब गाडी नाव पे थी ...मैं ऊपर वो नीचे

और अब मैं पूरी ताकत से हचक हचक के चोद रहा था ..साथ में गुड्डी की मस्त चून्चिया भी मसल रहा था .
नीचे से चूतड उठा उठा के साथ देते हुए मजे से गुड्डी मुझे छेड़ते बोली है ,

" क्या बात है मैं जब तेरी बहनों का नाम लेके छेड़ती हूँ तुम्हारा जोश दुना हो जाता है ..."

जवाब में मैंने कस के उस के रसीले गाल कच कचा के जोर से काट लिए और एक अंगूठे से उसकी कड़ी क्लिट मसल दी ...
वो जोर से चीखी और सिसक दी ...फिर बोली ...रंजी के बाद मैं तेरा नंबर तेरी एक और बहन से लगवाने वाली हूँ ...
मैंने उसके पैर मोड़ कर दुहरे किये , लंड सुपाडे तक बाहर निकाला ...और फिर पूरी ताकत से धक्का मार के पूछा ..
" कौन सी ...."
" वो जो तेरी चचेरी बहन है ..मझली से दो चार महीने छोटी ही होगी ..."

" वो ...उसका नाम तुझे कैसे पता चला ..." मैंने गुड्डी के निपल चूसते हुए पूछा .

हंस के वो शोख बोली ..." मुझे सब पता चल जाता है ...मैंने तेरी भाभी से तुम्हारी सारी , ममेरी मौसेरी, चचेरी कजिन्स के नाम ले लिए हैं ..आखिर सब का नाम लगा के तुझे गालियाँ जो मिलेंगी ससुराल में

...और मैंने मम्मी को पास भी कर दी हैं ...और जहाँ तक तेरी उस चचेरी बहन का का सवाल है ...फेसबुक जिंदाबाद ...मैंने तो अब उससे दोस्ती भी कर के पटा लिया है ...उसकी फिगर भी पूछ ली है और लेटेस्ट फोटो भी ...

बड़े साइज के टिकोरे हैं लेकिन है मजा लेने के लायक ...वो बनारस आने वाली है मई जून में बस ...तुम्हे टिकोरे का मजा चखा दूंगी ....सच्ची मजाक नहीं कर रही ...."

" हे तू मुझे बनाना क्या चाहती है ..." उसके गुलाबी रसीले गाल जोर से काट के मैंने पूछा ...

" बहनचोद ...." वो पहले चीखी फिर हंस के बोली ...और फिर जोड़ दिया ...लेकिन तुम्हे बहन चोद बनाने की क्या जरूरत ...वो तो तुम हो ही ....बहनचोद ...."

" सिर्फ बहन चोद ही ...या इसके आगे भी कुछ ..." हंस के धक्के लगाते मैंने पूछा

वो भी हंसी और कस के उसने अपनी कसी चूत में मेरे लंड को भींच लिया और बोली ...

" आगे का इलाका मम्मी का है ..देखना तुम्हे क्या क्या बनवाती हैं ..अभी तो बस शुरूआत है ...."

मैंने गुड्डी की लम्बी टाँगे अपने कंधे पे सेट की दोनों चूतड पकडे और जोर से चोदते हुए बोला ...
" तेरी मम्मी की तो ...."

और मेरी निगाह उस के पिछवाड़े के छेड़ पे पड गयी ...रात में जहाँ सिर्फ एक पतली सी भूरी दरार दिख रही थी अब वहां एक बहुत छोटा सा छेद दिख रहा था ...जो मैंने हचक के उसकी गांड मारी थी और उसके बाद दोनों ऊँगली से ...देर तक ऊँगली की थी ..उसका नतीजा था ये .

अब मेरा मन फिर पिछवाड़े की और ललचाने लगा मैंने पहले एक ऊँगली फिर दूसरी ऊँगली गुड्डी की गांड में पेल दी ..और जवाब में गुड्डी ने भी गांड उचकाते हुए मेरी बात का जवाब दिया ...

" हिम्मत नहीं है क्या ...जो आधी बात बोलते हो मेरी मम्मी का क्या ..."

और मेरा जवाब था मैंने गुड्डी की क्लिट को पिंच कर दिया और धक्के पे धक्का मारने लगा ...
साथ में पिछवाड़े मेरी दो उंगलियाँ गुदा मंथन में लग गयी पूरी तेजी से ..

और अब वो घडी आ गयी ...


 मैंने पलंग पे जित्ते तकिये, कुशन थे सब ले के गुड्डी के मस्त चूतड के नीचे लगा दिए और अब उस का पिछवाड़े का छेद साफ दिख रहा था .

मैंने उसकी दोनों लम्बी लम्बी टांगो को मोड़ के उसे दुहरा कर दिया और लंड सीधे गांड के मुहाने पे दोनों हाथों के अंगूठे से मैंने पूरी ताकत से गांड का छेद फैला के ...अपना सुपाड़ा उस पे सेट कर दिया ...और धीरे धीरे रगड़ने लगा ...

मेरी मलाई पूरी तरह गांड के अन्दर भरी थी ...लेकीन अभी भी सुपाड़ा अन्दर घुस नहीं पा रहा था ....

एक बार फिर से मैंने दोनों अंगूठे पूरी ताकत से गुड्डी के गांड के अन्दर घुसेड दिए ...

और जोर से गांड का छेद चियार कर ..उसने सुपाडा फंसा दिया और फिर ....पूरी ताकत से धक्का मारा ...
सुपाडा अन्दर घुसा लेकिन गांड का छल्ला अभी भी उसे रोक रहा था ....

मैंने और जोर से पुश किया ...और फिर दोनों चूतड पकड कर एक के बाद एक चार पांच धक्के पूरी बेरहमी से मारे ....

उयीईइ ..माँ आअ ....गुड्डी जोर से होंठ काटते हुए भी चीखी ...

और जवाब में मैंने दो धक्के और फिर पूरी तेजी से मारे ...

मैंने ये सीख लिया था की गांड मारना ...और बेरहमी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं

और अब ...सुपाड़े के साथ मेरा मोटा लंड भी आधे से ज्यादा घुस गया था अब वोलाख चूतड पटके ...बिना गांड मरवाए कोई बचत नहीं थी ..

अब एक पल के लिए मैंने एक हाथ उसकी चूंची पे रखे और दूसरी उसकी क्लिट पे और दोनों को पूरी ताकत से मसल दिया ...
वो फिर चीखी कुछ मजे से कुछ दर्द से ...और


मैंने सुपाड़ा थोड़ा सा पीछे खीच के फिर जोर से पेल दिया ...
उई मां ...वो फिर जोर से चीखी ..दो तिहाई लंड अन्दर था

उसके गालों पे चूमते हुए मैं बोला

अरे जानम मेरे तेरे ये तेरी मम्मी कहाँ से आ गयी ..गांडमैं तेरी मार रहा हूँ ...कहीं उनका भी तो

...और मेरी बात पूरी होने के पहले ही जवाब में गुड्डी ने जोर से मेरे गाल पे काट लिया

और जवाब में दोनों हातो से कस के उसकी चून्चिया मसलते हुये मैंने लंड पूरी ताकत से पेल दिया और बोला ...

" तेरी सारी मायके वालियों की मस्त गांड मारू ..मार मार के उनकी गांड का भोंसडा बना दूँ ..."

अब गुड्डी को भी मरवाने में मजा आने लगा था ...उसने जोर से मुझे अपनी बाहों में भींच लिया और उसी तरह से मेरे कान में बोली

" मेरी सारी ससुराल वालियों की गांड में ...मेरे मर्द का मस्त मोटा लंड ..."

और अब मेरे हर धक्के के जवाब में वो बजाय चीखने के एक गाली देती ..और जवाब में मैं भी ...

जल्द न मैं झडने वाला था ना वो हार मानने वाली

साथ में , मैं चूत को भी मजे दे रहा था ..मेरी दो उंगलिया लगातार उसकी बुर चोद रही थीं साथ में कभी निपल कभी क्लिट पिंच करता ...कभी जोबन मर्दन

मैं उसे झड़ने के कगार पे ले जाता फिर रोक देता ..
कुछ देर बाद मैंने पोजीशन बदल ली ..

अब मैं उसके पीछे था , करवट ले के और उसकी एक टांग उठी हुयी थी ...

और मैं मस्ती से उसकी चूंची दबाते मसलते गांड मार रहा था ..इस आसन का आराम ये था अकी इसमें गुड्डी की किशोर उभरती चून्चियों का मजा मैं खूब ले सकता था और उसकी गांड में लंड भी खूब रगड़ ते , दरेरते , घिसटते जा रहा था ..

गुड्डी भी मस्ती में कभी अपनी गांड मेरे लंड पे भींच लेती ...कभी जोश में आके पीछे मेरे लंड पे धक्के देती ..अब उसको गांड मराने में पूरा रस आने लगा था

आसन बदल बदल कर हम दोनों मस्ती ले रहे थे ..वो दो बार झडी ..

और तीसरी बार जब मैं फिर पीछे से उसकी गांड मार रहा था ...वो झड़ी तो उसकी गांड ने इत्ते जोर से मेरे लंड को भींचा , दबाया निचोड़ा की ..साथ साथ में मैं भी झड गया ...

मेरा लंड पूरी तरह उसकी गांड में पैबस्त था ...और मेरी कम से कम एक कटोरी गाढ़ी मलाई उसकी गांड में ...धीमे धीमे बह गयी ...

और हम दोनों साथ वैसे ही सो गए ...


कुछ देर बाद मेरी नीद हलकी सी खुली ...

अभी भी मैं उसी पोज में सो रहा था ..उसे अपने आलिंगन में चिपकाए ,

पीछे से मेरे दोनों हाथ उसके जोबन पे थे और लंड अभी भी दो तिहाई गुड्डी की गांड में ...

बस थोड़ी सी मेरी मलाई ...और उस का मक्खन छलक कर बाहर आ रहा था

और मेरी निगाह उन कोल्ड ड्रिंक्स की की बोतलों पे गयी ...जो कमरे में होली के लिए गुड्डी ने तैयार कर के रखी थी और मेरे मन में वो सीन याद आ गया ...जब मैं कमरे में घुसा था और वो इन बोतलों को ले के कुछ कर रही थी

मैंने गुड्डी से पुछा ,
" ये तुम क्या कीमिया गिरी कर रही हो ..."

तो उसने बताया ...कल होली की युध्स्थल हमारा घर ही था ...हर साल कहीं एक जगह होली की शुरुआत होती थी मोहल्ले के औरतों और लड़कियों की ...भाभियों और ननदों की ...नो होल्ड्स या यूँ कहें ..नो होल्स बार्ड होली ...

और भाभियों की टीम का नेतृत्व , हर साल की तरह इस बार भी मिश्राइन भाभी करने वाली थीं ...छ सात भाभियाँ और छ सात ननदें आतीं ...

दो चार घन्टे धमाचौकड़ी होती ...और फिर पास पड़ोस के बाकी घरों में ..दोपहर दो बजे तक ...

मिश्राइन भाभी ने उसे होलिका दहन के समय कुछ टिप्स दी थीं ...और भाभी ने तो सारी जीम्मेदारी ...गुड्डी के कंधे पे डाल दी थी ...

गुड्डी ने बनारस में मेरी कीमियागिरी देखी थी और उसका असर भी बस ..

कोक में रम , क्लियर या व्हाईट ड्रिंक में वोदका , जिन ...
और वो बस वही कर रही थी ...

भाभी के यही इंस्ट्रक्शन थे सब टुन्न होने चाहिए ..
मैंने पूछा ...कुछ हेल्प चाहिए ...तो वो बोली नहीं ..

और मैंने गुड्डी से एक टेढा सवाल पुछा ..

" मान लो कोयी कोल्ड ड्रिंक नहीं पिए तो .. ख़ास तौर से ...कोई थोड़ी ज्यादा उम्र की औरत ..या किसी लड़की को ही शक हो जाय या हेल्थ कांशस हो ..."

गुड्डी के पास इसका कोई जवाब नहीं था .

मैंने बोला ..." यार सिम्पल जो ज्यादा नखड़ा करे ...ज्यादा नक्शेबाजी करे ना ...तो मेरे हिसाब से तो उसकी खूब जम के रगड़ाई होनी चाहिए ..सबसे ज्यादा ...और हचक के पेला जाना चाहिए उसे ..."

गुड्डी हँसते हुए बोली ..." सत्य वचन ..लेकिन कैसे ..विचार तो मेरे भी यही हैं .."

मैंने गुड्डी से कहा ..." आरेंज या कोई और फ्रूट जूस है क्या ..."

' एकदम दो कार्टन तो मैंने आ ज ही ले आई थी ..." वो बोली और जाके ले आई ..और मैंने आरेंज वोदका की एक बाटल निकाली .

..और गुड्डी के हाथ से कार्टन ले के उसके बैक में एक छोटा छेद किया और उससे आधा आरेंज जूस धीरे धीरे कर के बाहर पोर कर दिया .....और उसकी जगह आरेंज वोडका ...और फिर छेद के कागज को चिपका कर बंद कर दिया और फिर वही दूसरे कार्टन के साथ ...

गुड्डी टुकुर टुकुर देख रही थी .

फिर मैंने उसे समझाया ..

." देखो जब तुम उसे टेबल पे रखोगी तो ये छेद नीचे रहेगा ...और ऊपर से सील बंद है इसलिए किसी को कोई शक नहीं होगा ...और नीचे भी मैंने वही कागज लगाया है तो बहुत ध्यान से देखने पे भी पता नहीं चलेगा ...

और जो जायदा स्मार्ट बन के फ्रूट जूस पियेंगी ...ना तो इस वोदका में नार्मल वोदका का दूना नशा है ...इस लिए एक ग्लास भी टुन्न होने के लिए काफी है .और जो पहली बार पीयेगी ना ...वो तो कपड़ा फाड़ के नाचने लगेगी ..."

गुड्डी मुस्कराने लगी और बोली , " यही तो हम लोग चाहते हैं , ननदों का कपडा फाड़ने की मेहनत हम क्यों करें ..."

फिर उसने दूसरी प्राब्लम पेश कर दी ...

" हे मैंने मिला तो दिया ...लेकिन सील ...तुम सील खोलना तो जानते हो लेकिन क्या सील जोड़ना भी जानते हो ..." गुड्डी हंस के बोली .

और फिर मैने कुछ ऐसी 'जुगाड़ टेक्नोलाजी लगाई और सील बंद कर दी। अब कोई जासूस भी नहीं पता कर सकता था की इसकी सील ..एक बार खुल चुकी है .

गुड्डी ने जोर से हाई फाइव किया ...मैंने जवाब दिया लेकिन साथ में उसकी शर्ट भी एक झटके में उतार दी ...वो क्यों पीछे रहती और अब हम दोनों टाप लेस थे ...और मैंने खिंच कर उसे अपनी गोद में बिठा लिया .
जंगबहादुर को नब्बे डिग्री होने में कितना टाइम लगता है ...खूंटा खड़ा

गुड्डी कुनमुनाई नहीं बस थोडा सा काम और ..उसके बाद ..लेकिन मैं कहाँ छोड़ने वाला था ..
मैंने बोला तुम अपना काम करो ..और मैं अपना ..

वो बची हुयी कोल्ड ड्रिंक की बाटल्स में मिलावट करती रही ...और मैंने कैन से बियर निकाल के ग्लास में बर्फ मिलाना शुरू कर दिया ..

और हम लोगों की मस्ती शुरू हो गयी .
..
रात बाहर झड रही थी और गुड्डी मेरी बाहों में ..कुछ देर में ही होली की सुबह होने वाली थी .
मैंने देखा गुड्डी के मोबाइल पे कुछ मेसेज , खुले अनखुले पड़े थे ..

आज की होली अलग थी ढेर सा खुशियाँ और सिर्फ मेरे लिए ही नहीं ..रीत को करन मिल गया था और
मुझे गुड्डी

मैंने गुड्डी को बाहों में भींच लिया। मेरे हाथ उभार पर थे . गुड्डी ने नींद में ही , अपने हाथों को मेरे हाथ पे रख कर अपने सीने पे और जोर से दबा लिया ...और मुझे फिर नींद आ गयी ...


 सुबह जब मेरी आँख खुली ...बल्कि जब गुड्डी ने मुझे चाय की प्याली ले साथ जगाया ...तो दिन काफी चढ़ आया था।

यही तो मैं चाहता था हर रात गुड्डी की बाहों में बीते और हर सुबह उसकी चाय की प्याली से शुरू हो ...रात भी उसकी दिन भी उसके ..

" हे उट्ठो ना कित्ती देर हो गई है सब लोग तैयार भी हो गए हैं ...चाय ठंडी हो जायेगी " मुझे झिझ्कोराते हुए वो बोली।

" तैयार तो मैं भी हूँ आ जाओ ना ...और मैंने गुड्डी को बांहों में भींच लिया और फिर उसे चूमते हुए बोला ,

" चाय की हिम्मत ..की इत्ती हाट हाट मेरी गुड्डी के हाथ में ठंडी हो जाय ..."...

और जब मेरी निगाह गुड्डी पे पड़ी तो वो वास्तव में तैयार थी , होली के लिए ...मैंने उससे कहा था , बनारस में ही की होली खेलने के लिए वो अपनी स्कूल की की यूनिफार्म ही ले चले ..

.सफेद टाप और नेवी ब्ल्यू स्कर्ट में वो गजब की लगती थी लेकिन जितना मैंने कहा था ... उसने उस से भी बढ़ के किया ..वो यूनिफार्म तो तब की थी जब वो आठवें में पढ़ती थी आज से दो साल से भी पहले ..

.और उस समय उसके उभार बस कुनमुना रहे थे ..और अब उसके जोबन तो गजब के गद्दर हो गए थे खूब उभरे, मस्त , कड़े कड़े ...

इसलिए इस टाप में उनके समाने का सवाल ही नहीं था ..ऊपर की एक बटन उसके खोल रखी थी तब भी गुड्डी की नयी आई जवानी टाप फाड़ रही थी ,,निप्स साफ दिख रहे थे ...

गुड्डी को खींच के मैंने गोद में बैठा लिया मेरे दोनों हाथ सीधे उसके उभार पे और चाय मैं उसके हाथ से पी रहा था ..कभी वो चुसकी लेती तो कभी मैं ...

मैंने उससे पूछा की भाभी कहाँ है तो वो बोली ..

कब की होली के लिए तैयार हो चुकीं , भैया तुम्हारे तो होली खेलने चले भी गए ...शीला भाभी और मंजू किचेन का काम आलमोस्ट निपटा चुकी हैं ...

बस तुम्ही बचे हो तैयार होने को थोड़ी देर में मोहल्ले की तुम्हारी भौजाइयों की टीम धमकती ही होगी ..

गुड्डी की बात सही थी . बाहर से होली के हुड़दंग की आवाज साफ सुनाई दे रही थी ...पिचकारी की छ्र्र्ररर
...गालियों की साथ में बौछार ..कबीर गानेवालों की आवाज ...

तब तक मुझे गुड्डी के हाथ में मोबाइल दिखा और मेरे दिमाग में घूमता सवाल बाहर आ गया ...

"हे रात में तुम किससे मेसेज बार बार एक्सचेंज कर रही थी ...'

"और कौन ...रीत इत्ते दिनों बाद करन मिला है तो वो भी उधार सूद समेत चुकता कर रहा है ले देख लो .."

और मैंने मोबाइल खोल के देखा पहला मेसेज रित का था रात के करीब दो बजे का ...
"करन के दो राउंड हो चुके ..."

इधर से गुड्डी का जवाब था ..
मैं कौन बची हूँ ...पिछवाड़े भी यहाँ सेंध लग गयी ..हैटट्रिक होने पे मेसेज देना

साढ़े तीन बजे करीब रीत का मेसेज था ..चल तेरी मर्जी भी होगयी ..हो गयी हैट ट्रिक तेरा स्कोर क्या है ...'

कुछ देर बाद गुड्डी का जवाब था ...कांग्रेट्स ..मेरी भी पिछवाड़े ..दुबारा बाजा बज गया .

सुबह सुबह फिर दोनों का हैप्पी होली का मेसेज था ...

मैं आगे कुछ देखता की गुड्डी ने मेरे हाथ से मोबाइल छीन लिया और मेरे होली के पहनने के कपडे मुझे देते हुए बोली ...जल्दी तैयार हो जाओ देर तुम करोगे डांट मुझे पड़ेगी ...

कल शाम को ही ये तय हो गया था की होली खेलने के लिए कौन क्या कपडे पहनेगा ..भाभी ने पाने लिए एक पुरानी साडी निकाली थी ,

गुड्डी का कहना था की मैं या तो शार्ट्स टी शर्ट पहनूं या कुरता पाजाम ..लेकिन मंजू और भाभी ने मुझे बचा लिया ..

.बोलीं अरे शार्ट तो एक झटके में उतर जाएगा ..और कुर्ता पाजाम तो देखते देखते तेरी भुअजाइयान चिथड़े कर देंगी ...फटेगी तो पेंट शर्त भी लेकिन टाइम लगेगा ...और तभी तो मजा आयेगा और तय ये हुआ की मैं टी शर्ट और पेंट पहनूं ..

उन कपड़ों के पास एक साडी ब्रा और कुछ नकली गहने रखे थे , चूड़ियाँ भी जो मैंने कल गुड्डी के साथ मंदिर जाने के पहले ख़रीदे थे ...

"हे ये सब किसके लिए है ..."मैंने चौंक के पूछा और गुड्डी ने घुडक लिया ...

" कोई जरुरी है सब चीज तुम्हे मालूम हो ..."लेकिन भाभी ने मेरा साथ दिया और बोलीं ..

"हो जाएगा मालूम जल्दी ही घबडाते क्यों हो ..."और गुड्डी से कहा वो ले आई थी इसके अन्दर वाली ...

हंस के गुड्डी बोली ..."वो सब चीजें मैं नहीं भूलती ...एकदम सही साइज की है और उसके उपर फिट करने वाली दो छोटी छोटी गोलियां भी हैं

मेरा ध्यान फिर गुड्डी कीओर चला गया ...वो अपने हाथ में क्रीम लगा रही थी मेरे हाथ पैर में लगाने के लिए ...रंग से बचाने के लिए ..

"रंग लगाओ भी तुम और प्रोटेक्शन भी तुम करोगी ..""

'पैर में क्रीम लगाते मुस्करा के वो बोली ..."और कौन करेगा ...बाद में छुडाना भी तो मुझी को पडेगा ...और वो तेरी छिनाल रंडी मेरा मतलब रंजी तो आएगी नहीं . उस के घर के बाहर तो सुबह से उसके यारों का छैलों का मेला लगा होगा , उसके जोबन मर्दन करने वालों का ...."

और जब तक मैं उसकी बात का जवाब देता , उसने मेरे नितम्ब उचका के अपनी दो उँगलियों में खूब क्रीम लगा के , एकदम अन्दर तक उँगलियाँ डाल के ...वहां भी क्रीम लगा दी .

"हे ये क्या कर रही हो ..."चौंक कर , चिहुंक कर मैंने पूछा ...

"अरे यार होली है बुरा ना मानो ...क्या पता किसी तेरी रंगीली रसीली भाभी का मन उधर भी ललक जाए ...तुम्हे ही आराम हो जाएगा ..."

""लगाना था तो आगे भी लगाती "...मैंने अपने तन्नाये जंग बहादुर की ओर इशारा कर के कहा ..

तब तक गुड्डी अलमारी से कुछ निकाल रही थी ...वो बोतल ले के मेरे पास आके मुस्करा के बोली

"लगाउंगी वहां तो जरुर लगाउंगी ...भौजाइयों के साथ तेरी कुछ मोहल्ले के रिश्ते की बहने और हमारी छिनाल ननदें भी तो आएँगी ..होली में उनकी चोली तो तुमसे फड़वाउंगी ही , भरतपुर भी फडवाउंगी ...'

और बोतल में से हथेली भर के तेल उसने निकाल लिया

ये बोतल भी चन्दा भाभी की गिफ्ट थी ..सांडे के तेल के साथ साथ , इसमें स्पेनिश फ्लाई और ना जाने क्या क्या मिला था ..उनके पति दुबई से लाये थे और उसका असर गजब का होता था ..

अपने दोनों हथेली में तेल लगा के , गुड्डी ने पहले तो बेताब लंड पे नीचे से ऊपर तक लगाया और फिर एक झटके में सुपाडे का चमडा खोल दिया गुसाया टमाटर सा लाल सुपाड़ा ..

तेल की बुँदे सीधे उस पे टपकाती वो बोली ...

आज होली का जम के मजा लूटना , मेरी रण्डी ननदों के साथ ...और फिर दो ऊँगली से सुपाडा का उपरी हिस्सा जोर से दबा दिया ...

नतीजा हुआ की उसका छेद ...पी होल ..पूरी तरह खुल गया ..

गुड्डी का निशाना कभी गलत नहीं होता ...
उसने सीधे पांच बूँद तेल की उसके अन्दर ...

बहुत जोर से छर छराया ..लेकिन असर तुरंत हुआ ..लंड लोहे का खम्भा हो गया ...

होली के गानों की हंगामे की आवाज घर के आपस आने लगी थी ...मैंने गुड्डी की सहायता से तुरत फुरत होली वाले कपडे पहने .....भाभी बाहर से गुड्डी को आवज लगा रही थीं ..और वो चाय का प्याला ले के एकदम सीधी बच्ची की तरह बाहर चली गयी ...बस बाहर निकलते हुए उसने अपने मस्त चूतड मुझे दिखा के मटका दिए और ...मैं पागल हो गया

उसकी स्कर्ट भी तो आठवें क्लास की थी ...इस समय घुटने से कम से दो बालिश्त ऊपर ...गोरी गोरी जांघो का तो पूरा नजारा मिल रहा था वो थोड़ा सा भी झुकती तो मस्त चूतड भी नजर आ जा रहे थे ...

मैं ने थोड़े से रंग पेंट जेब में रखे जैसे ही बाहर निकला तो दरवाजे पे धाप धाप की आवाज हो रही थी ...लगता है कुछ पड़ोस की भौजाइयां आ गयी थीं ...

बरामदे में जो गुड्डी ने कीमिया गिरी की थी वो दारु मिश्रित कोल्ड ड्रिंक की बोतले और भाग की ठंडाई , गुझिया दहीबड़े सब लगे थे ..आँगन में भी होली की पूरी तैयारी थी

दरवाजे के बाहर से ही किसी भौजाई की आवाज थी ...अरे खोलो जल्दी ...फिर तो अभी देवर की खोलनी है ...

मंजू दरवाजे पे गयी , दरवाजा खोलने और मैं ...सेफ्टी फर्स्ट ..जितना देर बच सकूँ उतना देर तो बच लूं ..सीढी से सीधे छत पर ...

और वहां पर मैं पकड़ा गया

भागने की तेजी मैंने कभी सोचा भी नहीं था कोई छत पे छिपा होगा ..


सीढ़ी वाले कमरे से जैसे मैं बाहर निकला ...वो पीछे छुपी खड़ी थी ..
दोनों हाथों में गाढ़ा लाल रंग ..

और उसने मुझे पीछे से दबोच लिया ...
वो किशोरी , सारंग नयनी , जोबन के मद से लदी ...
उसकी हथेली तो मैं सपने में भी पहचान लेता ..

मेरे गालों पर खूब मसल रगड़ कर रंग लगाया उसने ...लता की तरह मुझसे चिपटी ...लिपटी

गुड्डी ..


और फिर मेरी बारी ...
मैंने अपने गालों से ही उसके गोरे गुलाबी कपोलों पे रगड़ रगड़ के रंग लगाया ..

वो मुस्करा के बोली अब शुरू हो गयी अपनी होली ..और

मैं बोला ..सात जन्मों वाली होली है ...

बाहर हुरियारों का झुण्ड गा रहा था


आज अवध में होरी रे रसिया ..होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया ...
अपने अपने घर से निकरी कोई साँवर कोई गोरी रे रसिया ...
कोई युवती कोई जोबन की थोरी रे रसिया ....


 अपने अपने घर से निकली ...

होरी के हुरियारे गा रहे थे ...और मैं और गुड्डी छज्जे के किनारे आ गए ...

ह्म लोगों का घर एकदम सडक से सटा हुआ था ...और जो भी होली के हुड़दंग वाले निकलते , लड़के लड़की बन के जोगीरा में निकलते ...छत से सब दिखता था ...और सडक से छत पर जो खड़ा हो वो भी ...

गुड्डी छज्जे से सट के खड़ी थी ....और मैं गुड्डी के ठीक पीछे ...गुड्डी से सट के ..बल्कि चिपक के ..और हम दोनों की होली जारी थी ...

पहली बाजी गुड्डी के हाथ जरुर थी

लेकिन अब मेरे दोनों हाथों में लड्डू थे ...हाँ गुड्डी के टाप में घुस कर ..मेरे दोनों हाथों में अब तक लाल पेंट भी लग चुका था और मैं जम कर उसके गदराये जोबन रगड़ मसल रहा था ...

यही नहीं मैं उसकी छोटी सी स्कर्ट उठा कर उसके कमर पे खोंस चुका था ..और अब मेरा पैंट फाड़ता लिंग ...थोड़ी देर की ड्राई हम्पिंग के बाद मुझ से नहीं रहा गया और ...गुड्डी तो मुझसे भी मेरी मन की बात जानती है तो उसी ने हाथ पीछे कर के मेरा जिपर खोल दिया

और अब लंड सीधे गुड्डी के मस्त भरे भरे चूतड की दरार के बीच , रगड़ता , दरेरता ..

बजाय नारमल चड्ढी पहनने के गुड्डी ने एक बहुत छोटी सी थांग पहन रखी थी वो भी लेसी
गुड्डी बाहर सडक पर गुजर रहे होली वालों को देख रही थी ...

तब तक होली के इक बज्जर हुडद्न्गियों का दल आता दिखाई दिया

बीस तीस लड़के रहे होंगे कम से कम ..साथ में एक ठेला जिस पे रंग का ड्रम ..साथ में एक लड़का लड़की बना हुआ नाचता ...और उसी ठेले पे एक लाउड स्पीकर जिस पर कभी तो भोजपुरी के होली के एकदम खुल्लम खुल्ल़ा छाप गाने बजाते तो कभी जोर सा शुद्ध गाली वाला नारा गूंजता या कोई कबीर सूना देता ...

अगल बगल के घरों की छतों पे जो थोड़ी बहुत लड़कियां औरतें थी वो सब हट गयीं ...

हे हट जायं क्या ...गुड्डी ने सर मेरी ओर मोड़ के पूछा ...

अरे मजा लेते हैं ना ...मैंने उसके रंग लगे गाल चूम के बोला ..

और एक हाथ से उसकी थांग थोड़ी सी सरका दी ...बस मेरे लंड राज अब सीधे कभी गांड के मुहाने पे के ठोकर मारते तो कभी अपने सहेली चूत रानी से गले मिलते ..

तब तक नीचे से जोर से हंगामा हुआ ...

और उन सबसे ऊपर मिश्रायिन भौजी की हुंकार गूंजी ...कालोनी कई लडकिया , औरतें अब आ चुकी थी ..और नीचे होली का घमासान शुरू ही होने वाला था.

लगता है नीचे किसी लड़की ने ठंडाई पीने में नखड़ा किया तो मिश्रायिन भौजी की आवाज गूंजी ...

"अरे साल्ली की शलवार खोल के , पिछवाड़े से पिला दो ...ना "

और मेरी भाभी की आवाज .."और क्या जाएगा तो दोनों और से पेट में ही .."

उस लड़की की आवाज भाभियों की खिलखिलाहट में गूंज गयी ...
वो बिचारी बोली नहीं नहीं मैं कोल्ड ड्रिंक ...ये लिम्का या स्प्राईट ले लेती हूँ

मैं और गुड्डी दोनों साथ साथ मुस्कराए ...उसमे इतनी वोदका और जिन मिली थी की एक ग्लास में ही ठंडाई का दूना नशा हो जाना था

प्लान ये था की होली की जो पार्टी आती ...पहले वो खा पी लेती ...उसके बाद होली शुरू होती क्योंकि होली में एक बार हाथ में इतना रंग लग जाता की खाना पीना मुश्किल हो जाता ...

और दूसरा ज्यादा इम्पोर्टेंट रीजन ये था की भाभियाँ ननदों को ख़ास तौर से कुँवारी और कच्ची कलियों को टुन्न कर देना चाहती थीं जिनसे उन के साथ वो खुल कर और 'खोल कर 'होली की मस्ती कर सकें . और उसी खाने 'पीने' के साथ छेड़ खानी मस्ती शुरू हो जाती .

मिश्रायिन भाभी ने शादी के बाद लौट के आई अपनी किसी ननद को छेड़ते हुए बोला,

"क्यों नंदोई जी तो अभी नहीं है ...काम कैसे चलता है .."

वो जवाब देती उसके पहले मेरी भाभी बोल पड़ीं ..

"अरे इन्हें क्या दिक्कत ...इनका मायका है सब बचपन के यार हैं ...एक बुलाएं चार आते हैं चार लाइन लगा के इन्तजार करते हैं ... "

तब तक कोई और मोहल्ले की भाभी बोल पड़ी ..

"बिन्नो ..कोई बात नहीं तब तक हमारे वाले से चाहो तो काम चला लो ...ननदोई से कम नहीं होंगे गारंटी ...""

तब तक मेरी भाभी ने फिर चिढाया ..

"अरे लल्ली ...चलो अच्छा अदला बदली कर लेते हैं ...रंग पंचमी में तो नंदोई जी आयेंगे ना ना ...मेरे सैयां तेरे साथ और तेरे सैयां मेरे साथ ...नीचे वाले मुह का भी तो स्वाद बदलना चाहिए .."


वो विवाहित ननद बोली हंस के बोली ...( आवाज मेरी पहचानी लग रही थी लेकिन मैं प्लेस नहीं कर पा रहा था )..
"अच्छा भाभी मेरे भैया का मेरे साथ ...ये आपके यहाँ होता होगा ..चलिए मेरे भैया भी आपको मुबारक और सैयां भी ..एक आगे से एक पीछे से ..."

तब तक मिश्रायिन भाभी की आवाज आई ..

"अरे तू बता अभी पिछवाड़े का नम्बर लगा की नहीं ..वरना आज होली का मौका भी है ...होली में तुझे नंगा तो नचाएंगे ही यहीं आँगन में पटक के गांड भी मारेंगे ..और मक्खन मलाई भी चटाएंगे ...

मुझे कल शाम की बात याद आ गयी जब मंजू और शीला भाभी ने रंजी को नंगा तो किया ही था मेरे खड़े लंड पे भी बैठाया था ...और आज तो होली का दिन है और ऊपर से मिश्रायिन भौजी तो मशहूर हैं इन चीजों के लिए

लेकिन तब तक नीचे से आ रही आवाजें दब गयी ...पास आगये होली के हुड़दंगीयों के शोर में ...

लाउड स्पीकर पे होली के 'टिपिकल 'गाने बज रहे थे ..

"अरे होली में ...होली में ...महंगा अब सरसों का तेल होई ..महंगा अब सरसों का तेल होई ,
अरे जबरन जो डरीबा तो ...""


गुड्डी मेरी और देख के मुस्कारायी और मैं समझ गया

( रात में मेरे पिछवाड़े छेड़ते वो बोली थी, तेरी कोरी है तो चलो कोई बात नहीं बनारस में , बल्कि कोहबर में नथ उतार ली जायेगी तेरी भी ...हाँ ज़रा मेरी मम्मी की चमचा गिरी करना मक्खन लगाना तो ...तेरी कुप्पी में दो चार बूंद सरसों का तेल डाल , देंगी नथ उतारने के पहले )

जवाब में मैंने जोर का धक्का मारा , गुड्डी की लेसी थांग तो सरकी ही थी , सुपाडा गांड को दरेरता , रगड़ता सीधे चूत के मुहाने पे जा लगा ...और चूत की पुत्तियाँ अपने आप थोड़ी खुल गयीं

और उन होली के हुरियारों में किसी ने गुड्डी को देख लिया ...

फिर तो वो हंगामा हुआ ...आकाश से पाताल तक ...

मैं गुड्डी से इस तरह पीछे चिपक के खड़ा हुआ था की मुझे देखना मुश्किल था ..

और अब मैंने दोनों हाथ भी गुड्डी की पतली कमर से बाँध लिए थे ...गुड्डी एक पल के लिए तो कुनमुनाई, सकपकाई , लेकिन मैं पीछे से उसे इस तरह दबोचे था की ...उसका छज्जा छोड़ के जाना क्या ..हिलना भी मुश्किल था ..और अपनी दोनों टाँगे उसकी टांगो में डाल के मैंने उसकी टाँगे भी फैला रखी थीं ..साथ में लंड तो उसकी गांड और बुर को दरेर रहा ही था ...

किसी ने लाउड स्पीकर पे गुड्डी को देख केसुना के कबीर गाना शुरू कर दिया ...

हो कबीरा सारा रा रा ...
किस यार ने चूंची पकड़ी और किस यार ने चोदा ...हो कबीरा सारा रा रा ...

अरे इस छैला ने चूंची पकड़ी ..और उस छैल ने चोदा .. कबीरा सारा रा रा ...
अरे होली की आई बहार चुदवाई लो ...

अरे चोदिहैं ..छैला तोहार ...चोदिहें गुन्डा हजार चुदवाई लो ...


 जोगीडे का लौंडा ( लड़की बना लड़का ) उस गाने की ताल पे नाच रहा था .. बाकी लड़के गुडी को दिखा दिखा के , अंगूठे और तरजनी का छेड़ बना के चुदाई का इंटर नेशनल सिगनल दिखा रहे थे ,

तभी उन्ही में से किसी ने एक रंग भरा गुब्बारा गुड्डी के ऊपर मारा ...लेकिन गुड्डी भी बनारसी चतुर सुजान थी , ऐन मौके पे सरक के बच गयी . लेकिन होली में तो डलवाने की होती है बचने की थोड़ी ..और मेरी भावनाएं भी उन हुरियारों के साथ थी ...

इसलिए जब अगला गुब्बारा आया तो मैंने पीछे से कस के गुड्डी को दबोच लिया और वो सीधे उस के मस्त उरोज पे ...और फिर तो चार पांच एक साथ ...

गुड्डी की टाप की बटन टूट गयीं और अब उसकी रसीली चूंची खुल के दिख रही थी ...उन गोरे कबूतरों के पंख लाल हो गए थे

लेकिन गुड्डी तो गुड्डी थी ...पूरी बनारसी ...और उसने भी जबर्दस्त जवाब दिया , पहले मुझे फिर नीचे हुरियारों को।

अगला गुब्बारा उसने कैच कर के सीधे मेरे कमर के नीचे ...

और जंगबहादुर लाल गुलाल हो गए . यही नहीं जो रंग गिरा उसके कोमल कोमल हाथों ने जम कर सिर्फ मेरे चर्म दंड पर ही नहीं बल्कि , नीचे बाल्स पर और पिछवाड़े भी मसला रगडा।

और नीचे से गुब्बारे, फ़ेंक रहे रंग और गालियों की बौछार कर रहे हुरियारों को भी उसने नहीं बख्शा . कुछ तो उन्ही के गुब्बारे उनको लौटाए और कुछ , उसने एक बाल्टी में रखे रंग भरे गुब्बारे उठा उठा के…

गालियों के नारों का एक नया जोश नीचे से शुरू हुआ और अब वो एकदम हम लोगों के छत के नीचे थे तो लाउड स्पीकर की भी जरूरत नहीं थी ..

ये भी बुर में जाएंगे , लौंडे का धक्का खायेंगे ...

सब लौंडे नीचे से बोल रहे थे ...

लेकिन गुड्डी बिना हिले उसी तरह से जवाब दे रही थी ...और मैं भी उन की बातें सुन के अब पूरी ताकत और जोश से ...

उसके गुब्बारे का निशाना सीधे जोगीड़ा वाले लौंडे पे पड़ा ...और अगला जो उनका लीडर था

गुड्डी की थांग तो पहले ही सरक गयी थी ...और गुड्डी छज्जे पे निहुरी भी थी ...तो बस कमर पकड के ...मैं हचक ह्चक के ..उसकी गांड और चूत की दरार में लंड का धक्का जोर जोर से मार रहा था ...साथ ही उन पर जो रंग गुड्डी ने लगाया था वो सीधे अब सूद ब्याज सहित उसके चूतड और चूत पे

कुछ देर में हुर्यारे चले गए , पर अपना असर छोड़ गए ...कुछ रंगों की बौछार का असर ...और कुछ

कुछ रंगों की फुहार , कुछ गालियों की बौछार , फागुन की फगुनाहट , होली की मस्ती ...
हुरियारे चले गए थे ...लेकिन मुझे और बेताब कर गए थे ...

और मुझसे ज्यादा ...गुड्डी चुद्वासी हो रही थी ...

हम लोग छत के दूसरे ओर चले गए ...और वहां छज्जे के पास ...जो आँगन से लगा था और जहाँ छत बहुत नीची थी ...

मेरे बिना कहे गुड्डी डागी पोजीशन में आ गयी ...और चूतड उचका दिए ...इस पोजीशन के तीन फायदे थे ...

एक तो अगल बगल से कोई हमें देख नहीं सकता था ( वैसे भी पास पड़ोस में कोई घर इतने नजदीक नहीं थे )

दूसरे , डागी पोजीशन का अपना मजा ...मैं मस्ती से उसकी चूंची दबा सकता था , हचक के चोद सकता था ...पूरी ताकत से धक्के मार सकता था ...और गुड्डी भी चूतड मटका मटका के चुदवा सकती थी ...

लेकिन सबसे बढ़कर था तीसरा फायदा ..

हम आँगन में होली पूरी तरह देख सकते थे , छत नीची थी इस लिए सब बातें भी सुनाई पड सकती थी ...और आँगन से कालोनी की लड़कियां , भौजाइयां हमें नहीं देख सकती थी ...

स्कर्ट गुड्डी ने खुद ही ऊँची कर दी थी ...मैंने थांग उतारने की कोशिश की ...लेकिन गुड्डी ने सर पीछे कर के अपनी बड़ी बड़ी आँखों से मुझे बरज दिया ...थांग सरका के

वैसे भी उस एक अंगुल के थांग का रहना ना रहना बराबर था ...और अभी छज्जे पे ,

मैंने गुड्डी को पीछे से दबोच के , थांग सरका के ...जब हुरियारे निचे से गुड्डी के ऊपर गुब्बारे और गालियों की बौछार कर रहे थे , मैं सटासट सटासट ..उसकी गांड और बुर में लंड दरेर रहा था

तो बस मैंने पानी पेंट घुटने तक उतारी , उसकी थांग एक किनारे सरकाई ..दो उँगलियों में थूक लगा के पहले तो उसकी बुर को फैलाया ...और फिर सुपाडा वहां सटा के हचक के पेल दिया ..

एक धक्के में मोटा जोश में पागल , सुपाडा ..गुड्डी की चूत में पैबस्त था


गुड्डी ने हलकी सी सिस्की भरी ..

और उसकी पतली कमर पकड़ के मैंने दो तीन धक्के ..जोर जोर से मारे ..आधा मूसल अन्दर ...और अब मेरा एक हाथ ऊपर की ओर ...उसका कसे टाप की सारी बटने पहले ही होली की बौछार में टूट चुकी थी , और

टाप भी उसने ऊपर तक उठा रखा था ...

मेरे हाथों ने सीधे गुड्डी की टीन ब्रा में सेंध लगायी और दोनों जवानी के फूल मेरे हाथ में ...बस एक बात थी ...अबकी मेरे हाथों में गाढ़ा पक्का लाल पेंट भी लगा था ...और चूंची की रगड़ाई और होली साथ साथ चल रही थी ...

गुड्डी भी मस्ती में अपने किशोर चूतड पीछे कर के मेरे धक्के का जवाब धक्के से दे रही थी ...

कभी उसकी प्यारी रसीली चुन्मुनिया , मेरे जंगबहादुर को जोर से भींच लेती , तो कभी उसे निचोड़ लेती ..लंड सटासट अन्दर बाहर जा रहा था

और अब मेरी और गुड्डी दोनों की निगाह नीचे आँगन में और बरामदे में पड़ी जहाँ होली की धमा चौकड़ी शुरू हो चुकी थी ....

मैं सोच भी नहीं सकता था ...

मेरी निगाह पहले बरामदे में गयी ...गुड्डी की किमियागरी का नमुना ..आधे से अधिक दारु मिलीं कोल्ड ड्रिंक की बोतलें खलास चुकी थी ...

और फिर कालोनी की लडकियां , मेरी भाभियों की ननदें ...आठ दस तो कम से कम रही होंगी ..तीन चार शादी शुदा भी थीं और ... बाकी दो तीन तो गुड्डी से भी छोटी रही होंगी ...2 8 -3 0 साइज की ..

.गुड्डी के शब्दों में बड़े टिकोरे वाले ...और बाकी बत्तीस -चौतीस साइज की ...कुछ फ्राक में , बाकी टाप स्कर्ट में एक दो शलवार सूट में और जो साडी में थी वो शादी शुदा ननदे थीं ..

और उतनी ही भाभियाँ ..चौबीस से चौतीस तक की उम्र की ..और चौतीस से छत्तीस तक की साइज की ....

लेकिन भाभियों की टीम कों एक एडवांटेज था ...बल्कि दो एडवांटेज, ...

एक तो मेरे घर की पलटन अबकी शीला भाभी की उपस्थिति से समृद्ध हो गयी थी ...उनका गाँव का अनुभव ...और 'कन्या प्रेम ' तो भाभियों की संख्या में मेरी भाभी ...शीला भाभी और मंजू जुड़ गयीं थी सब एक से एक ...( और गुड्डी भी )

दूसरी बात कैप्टेन शिप की थी ...मिश्रायिन भाभी की कप्तानी का कोई जवाब नहीं था ...

और होली में अभी ही भाभियों की टीम आगे नजर आगे लग रही थी ...एक दो ने तो तक के जो कच्ची कलियाँ थी सीधे उन्ही पे हाथ साफ करना शुरू कर दिया था ...रंग तो सिर्फ बहाना था ..जस्ट उभरती , गदराती चून्चिया , मसले रगड़ी जारही थी ...और ना ना करते करते वो भी मजा ले रही थी ,

जो थोड़ी बड़ी थी , गुड्डी या उससे थोड़ी बड़ी ...इंटर में पढने वाली या कालेज वाली ...वो तो बराबर का मुकाबला भी कर रही थीं ..लेकिन


असली मुकाबला आगन में चल रहा था




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