Sunday, March 9, 2014

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--97

FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--97
गतांक से आगे ...........


 मेरे दोनों हाथ मोड़ कर मेरे सर के नीचे ...और मेरे इयर लोबस को किस कर के वो बोली ...

तुम रानी बनो साजन ...मैं राजा बनूँगी ...

मैं कौन होता था ..अपनी सजनी को ना बोलने वाला ..

और समर्पण का सुख मैं देख चूका था ...

गुड्डी के गुलाबी रसीले होंठो ने मेरे पलकों को चूमा ...
मेरी आँखे बंद हो गयी

फिर वो होंठ मेरे होंठो पे आये ...
और मेरी बोली बंद हो गयी ...

और अब उसके शरारती , नकलची होंठ मेरे निपल पे ...

पहले तो उसने अपनी जीभ से फ्लिक किया , लम्बे लम्बे नाखुनो से स्क्रैच किया ...और फिर अचानक हलके से बाईट कर लिया ...और जैसे इतना ही काफी नहीं था ..आइस क्यूब से ...

निपल को वो रगड़ने लगी ..एक क्यूब उसके मुंह में भी था ...तो आइस कोल्ड किस ...कभी गालों पे कभी इयर लोब्स पे और कभी निपल पे ..

तंग वो ऊपर कर रही थी लेकिन हालत खराब नीचे हो रही थी ...
झंडा जबर्दस्त खड़ा था ...
जंगबहादुर सोच रहे थे मेरा नम्बर कब आएगा ...
एकदम तने , मस्ती से पागल ..

गुड्डी भी कम दुष्ट नहीं थी ...उस का भी टार्गेट तो वही था ...

उस ने आइस क्यूब ट्रे की ओर हाथ बढाया ...लेकिन ..अब ज्यादातर गल के छोटे छोटे टुकड़े हो गए थे ...उसने पांच छ छोटे छोटे क्यूब एक साथ मुंह में भर लिए ..

.और जो एक बचा क्यूब उसके हाथ में था ...सीधे मेरी बाल्स ...बाल्स और लिंग के बेस पे ...और धीरे धीरे ....बहोत धीरे ...बेस से सीधे सुपाडे की ओर ....

अब मैं उचक रहा था ...सिसक रहा था ...

और गुड्डी ने एक झटके में ...मेरा पूरा मोटा गोल ..बड़ा सा सुपाडा ...अपने मुंह में ...

मुझे लगा जैसे एक साथ सौ बिच्छुओं ने डंक मारा है ....
पूरा सुपाडा ...जैसे मधुमखियों के छत्ते में घुस गया है ...

दर्द ..चुभन ..लेकिन बहुत मादक रसीला दर्द ...और चुभन .

और उसके साथ ही गुड्डी ने लंड चूसना शुरू किया ...

वो होंठो से जोर से दबा के सक करती ..नीचे से उसकी मखमली जुबान रगडती ...और साथ में नीचे से उसके कोमल हाथ कभी मेरे बाल्स को छेड़ते ..कभी तन्न्नाये लंड पे ऊपर नीचे होते ..

और साथ में वो बर्फ के छोटे छोटे हीरे की तरह कड़े चमकते टुकडे , मेरे सुपाडे पे रगड़ते ...और बर्फ से ठंडी गुड्डी की जुबान और होंठ भी ...

मस्ती से मैं चूतड पटक रहा था


गुड्डी के चूसने की रफ्तार तेज हो गयी थी अब आधे से भी ज्यादा लंड उसके कोमल मुंह में था ...और उसकी एक ऊँगली मेरे पिछवाड़े के छेद आस पास चक्कर काट रही थी ...कभी सहला देती ...तो कभी टिप अंदर पुश करने की कोशिश करती ...

और उसके गाल थोड़े थक गए चूसते चूसते ...तो उसने लंड को बाहर निकाल कर दोनों अपने बूब्स के बीच में रगड़ना शुरू कर दिया ...और जैसे ये काफी नहीं था ..एक छोटा सा आइस क्यूब वहां भी ...

मस्ती के मारे मेरी हालत खराब थी ...अब मैंने उसे धक्का देके ..बिस्तर पे ...पेट के बल ...वो लेटी थी ...

गुड्डी के मस्त गुदाज , उभरे हुए चूतड मुझे दावत दे रहे थे , गोरे गोरे ...भरे भरे ...खूब फूले ..जब चूतड मटका के चलती थी ...

तो बस यही मन करता था ...गांड मार लूँ

अब आज तो बचने से रही ये ...

और वैसे भी गुड्डी के गुलाबी होंठो ने चूस चूस कर ...मेरे लंड की हालत खराब कर रखी थी

मैंने उसकी मुट्ठी में आ जाए वैसी पतली कमर पकड़ कर उठा लिया और अब उसके चूतड हवा में ऊठे थे ...एकदम कसी हुयी ..हलकी सी बस दरार ...छेद भी नहीं ..दोनों गुलाबी नितम्बो के बीच ..

लेकिन तब तक जंगबहादुर ने अपनी प्यारी गुलाबी सहेली को आंसू बहाते देखा ...और उनका दिल उस पे मचल गया ...और भरतपुर की गली का मजा लेने के लिए वो बेचैन थे

मेरे एक हाथ की उँगलियों ने प्रेम द्वार खोल और दूसरे ने जंग बहादुर को संकरी गली का रास्ता दिखा दिया ..


और सुपाडा गुड्डी की कसी मस्त संकरी चूत में अटक गया ..आइस क्यूब के खेल ने उसकी चूत को वैसे ही पनीली बना दिया था ..इसलिए जब गुड्डी की कमर पकड़ एक हलब्बी धक्का मारा ...सुपाडा हचक के अन्दर घुस गया ...

गुड्डी की रोकते रोकते चीख निकल गयी ...उसने जोर से दोनों हाथों से तकिये को भींच रखा था ....

लेकिन मैंने अब ये सिख लिया था की ये मौका दया माया दिखाने का नहीं होता ...और दूसरा धक्का पहले से भी जोरदार था ...और गुड्डी काँप गयी ..

लेकिन लंड आधे से ज्यादा अन्दर पैबस्त था .

गुड्डी की चूत इत्ती चुस्त, कसी, संकरी थी की लग नहीं रहा था की मेरा मोटा मुसल अब आगे सरक पायेगा।

लेकिन हिम्मत हारना मैंने सीख नहीं था ...और मुझे मालुम था जहाँ सीधे से काम ना चले ..वहां पुचकारना पड़ता है ...और उससे भी न काम चले तो जबरदस्ती ...और मैंने दोनों इस्तेमाल करने का फैसला किया ...

मेरे दोनों हाथ गुड्डी की पतली कमर पे ...लेकिन अब मैंने एक हाथ सीधे उसके मस्त उभारों पे रखा ...जिन्होंने सालों से मेरी रात की नींद और दिन का चैन उड़ा रखा था ...और पहले हलके फिर जोर जोर से मसलने लगा ..साथ में उसके निपल भी ...

और दूसरा हाथ अब उसकी राम पियारी की 'जादुई बटन ' पे ...

थोड़ी देर में ही मस्ती से उसकी आँखे लाल हो गयीं , चून्चियां पथरा गयी और अब उसकी चूत कस कस के मेरे अन्दर घुसे लंड को दबोच रही थी ..मैंने गियर बदला ..अंगूठे और तरजनी के बीच उसके क्लिट को जोर जोर से दबाना शुरू किया ...वो और गीली हो रही थी ...फिर थोडा सा लंड बाहर निकाला और अब ...

उसके दोनों मस्त चूतडो को पकड़ कर ....पूरी ताकत से ..एक धक्का ...वो बिलबिला उठी ..

लेकिन बिना रुके मैंने दूसरा तीसरा चौथा धक्का मार ..और अब तीन चौथाई से जयादा लंड ....जैसे किसी संकरे गले वाली बोतल में कोई मोटा कारक ठूंस दे ..बस वही हालत हो रही थी ...


फिर मेरी निगाह ..उस 'दरवाजे ' पे पड़ी जो अभी भी बंद था और जिसके लिए पूरा बनारस पागल था ..

दोनों फैले नितम्बो के बीच की हलकी सी दरार ...

मैंने तरजनी हलकी सी गीली की ..और उस पे लगा के हलके से दबाने लगा ...लेकिन लगा की टिप भी घुसानी मुश्किल है ......मैं सहलाता रहा रगड़ता रहा ...और साथ साथ लंड ..गुड्डी की प्यारी प्रेम गली में धीरे धीरे आगे पीछे हो रहा था ...


और फिर अचानक मैंने लंड बाहर निकाल लिया ...और उस की जगह मेरी दो उंगलिया एक दम जड़ तक एक झटके में अन्दर ..धंस गयीं ....और मैं उसे गोल गोल घुमाने लगा ..गुड्डी के प्रेम रस से वो पग गयीं ...


उस सारंग नयनी ने अपनी गर्दन मोड़ कर , कुछ सहम कर कुछ शिकायत के तौर पे मेरी ओर देखा ...सहम के इस लिए की क्या मैं अब आगे से पीछे की और रुख तो नहीं कर रहा ..और शिकायत इस बात की ...की अब उसे भी चुदाई में मजा आरहा था ...

मैं कौन होता था अपनी जानेमन को नाराज करने वाला ...उंगली निकाल के मैंने एक बार लंड फिर ठेल दिया ...और अबकी इतनी जोर से धक्का मारा ...की ऑलमोस्ट पूरा आठ इंच अन्दर था ..

गुड्डी की जोर से चीख निकल गयी ..लेकिन बिना उसकी परवाह किये .., यही सब डागी पोजीशन का फायदा है , मैंने उसकी दोनों टांगों के बीच अपने पैर घुसा के ...उसे जोर से फैला दिया ...पूरी ताकत से ...

मेरा एक हाथ उसके कोमल गोरे गुलाबी चूतडों को सहला रहा था फिर मेरे अंगूठे और तर्जनी ने उसके पिछवाड़े के छेद को पूरी ताकत से चियारा ...और गुड्डी के चूत रस में पगी भीगी ...तर्जनी को पूरे जोर से अन्दर धंसाया ...और अब बहुत जोर पे उसकी टिप घुस गयी ..

.फिर तो मुझे रास्ता मिल गया ...अब मैं कभी उसके निपल , कभी क्लिट पिंच करता ...और जब गुड्डी का ध्यान उधर जाता ...गांड में उंगली का जोर बढ़ जाता ...थोड़ी देर में मेरी बायीं तर्जनी के दो नक़ल तक अन्दर थे ....


 लेकिन मेरा काम इससे नहीं चलने वाला था ...और मैंने अब अपने लंड को आलमोस्ट बाहर तक निकला ....और फिर एक जबर्दस्त झटके में पूरा का पूरा ..पोरे जड़ तक अन्दर ठेल दिया

गुड्डी मस्ती और दर्द दोनों से दुहरी हो गयी और अब उसका ध्यान पिछवाड़े की ओर एकदम नहीं था ..और उसी पल कुछ बाहर निकाल कर लंड की तरह उंगली भी मैंने जड़ तक अन्दर ठोंक दी ...

" हे उधर नहीं प्लीज ...लगता है ..." गुड्डी बोली ..

और जवाब में मैंने कचकचा के उसके गुलाबी गाल काट लिए ..और उंगली जोर जोर से पिछवाड़े अन्दर बाहर करने लगा ..
अब उसके दोनों छेद साथ साथ चुद रहे थे एक लंड से और एक ऊँगली से ...

उंगली कभी अन्दर बाहर होती , कभी गोल गोल घुमती ...फिर मैंने चम्मच की तरह मोंड के , उस ऊँगली से उसकी गांड की दीवारों को कचोरना भी शुरू कर दिया ..

एक गूई सी गीली गीली ...फीलिंग ...

और उसका असर सीधे जंगबहादुर पे हुआ ...वो और जोर जोर से फुफकारने लगा ...

गुड्डी के पेट के नीचे लगाने के लिए मैंने दो कुशन उठाये ..और मैंने देखा ...

उसके नीचे के वाई जेली की एक बड़ी सी ट्यूब ...


तो इसका मतलब गुड्डी रानी ...ना सिर्फ मरवाना चाहती थीं बल्कि ....मरवाने की पूरी तैयारी भी की थी ...इसलिए तो मैं उस पे इतना फिदा था


अब तो बस 'चित्तौड़ गढ़ ' लूटना ही था ...

मैंने पिछवाड़े से उंगली बाहर निकाली , जेली के ट्यूब की नोजल ने उसकी जगह ली , और जब तक गुड्डी कुछ समझे समझे , मैंने ट्यूब दबाई और ...आधी जेली उसकी गांड में ..और साथ साथ मेरी तरजनी भी ...और अबकी थोडा सा ही जोर लगाने से उंगली अन्दर थी पूरी ..

और अब घचाक घचाक अन्दर बाहर ...सटा सट सटा सट कभी कभी गोल गोल ...और अब मैंने मंझली उंगली पे भी थोडा जेल लगाया ...और अब जब उसने अन्दर घुसने की कोशिश की ...तो

गुड्डी फिर चीख ..प्लीज आज नहीं ...फिर कभी ..लग रहा है नहीं जायेगी ये ....

लेकिन वो अन्दर चली गयी ...

मैंने पूरी ताकत लगायी और जुगत भी .घुसी हुयी तरजनी को थोडा ऊपर उठा के ...ठीक उसके नीचे ...और साथ में एक बार उसकी मस्त गांड को भूल कर ..हचक के चुदाई शुरू कर दी ...

वो भी पूरे लंड से साथ में मैं कभी थोड़ी देर क्लिट सहलाता , दबाता , पुल करता तो कभी निपल पिंच करता ...गुड्डी एकदम झड़ने के कगार पे पहुँच गयी थी ..लेकिन मैं रुक जाता ...और कुछ देर बाद फिर ...

और इस के चक्कर में गुड्डी पिछवाड़े घुसी दोनों उंगली भूल चुकी थी ...और मैंने दूसरी उंगली भी पूरी तरह अन्दर घुसेड दी ...लेकिन कभी कभी जब अन्दर घुसी दोनों उंगली मैंने वी की शकल में या कैंची के फाल की तरह फैला देता तो वो चीखने लगती ....

फिर मैंने लंड बाहर निकाल लिया और उंगली भी गुड्डी भी समझ गयी थी की अब चूतड गढ़ में सेंध लगेगी ही

..उसने कस के दोनों हाथों से तकिये पकड लिए थे ...होंठ भिचं लिए थे ...और मैंने दोनों अंगूठो से अब उस के पतले छोटे से छेद को पूरी ताकत से फैला के सुपाड़ा फंसा दिया ...


मैं साथ में धीरे धीरे से इसकी पीठ सहला रहा था ...बोल रहा था ...बस थोडा सा ...जस्ट रिलैक्स ...रिलैक्स ...

उसने मेरी ओर देख के एक दर्द भरी मुस्कान दी ...

बस अब इससे बड़ा ग्रीन सिग्नल क्या हो सकता था …
मैंने पूरी ताकत से लंड अन्दर पेल दिया ...पूरे जोर का धक्का ..दोनों हाथों से मैंने उसके नितम्ब पकड़ रखे थे ...

उसने अपने होंठ भींच रखे थे तकिये को दबोच रखा था ...और मैंने फिर दूसरा ...तीसरा धक्का लगाया ...कुछ जेली का असर ..कुछ मेरी दोनों उँगलियों का कमाल और सबसे बढ़ कर गुड्डी की हेल्प ..इत्ते दर्द के बावजूद ...उसने अपनी देह को खास तौर से पिछवाड़े को ढीला छोड़ रखा था ...

और मेरा पूरा मोटा, पहाड़ी आलू के बराबर , गुस्सैल सुपाडा , अन्दर था ..

लेकिन अब स्फिन्क्टर , गांड के छल्ले ने उसे पकड़ , जकड लिया ...

जैसे कोहबर में दुल्हे को , दुलहन की बहन और सहेलियां रोक देती हैं बस वैसे ...

चाहते दोनों है की वो अन्दर जाय , लेकिन कुछ आदत , कुछ रस्म रिवाज और कुछ छेड़ छाड़ ..

और दुलहा जैसे कुछ पटा के कभी गाना सूना के , कभी सालियों को घुस दे के और कभी धक्का लगा के अन्दर घुस जाता है ...
वही काम मैंने किया ...

एक हाथ से मैंने उसका चूतड पकडे रहा हालांकि मुझे मालूम था की वो लाख चूतड पटके ...एक बार जब पूरा सुपाडा उसकी गांड के अन्दर घुस गया है ...तो अब वो बाहर नहीं आ सकता ...

और दूसरा हाथ कबि उसके जोबन सहलाता , कभी निपल पिंच कर देता ...और कभी उसकी जादुई बटन ...क्लिट को छेड़ देता और गुड्डी फिर सिसकियाँ भरने लगी थी ...

बस मौका देख कर एक बार मैंने फिर उसकी पतली कमर पकड़ी ..अपनी टांगों से उसके पैर को थोडा और फैलाया ...और हचक के धक्का मारा ..एक बार दो बार तीन बार ..

क्या मजा आ रहा था मैं बता नहीं सकता ...जैसे कोई मुट्ठी में ले के कस कस के भींचे ..दबाए उसी तरह से उसकी कुँवारी कसी गांड मेरे लंड को दबोच रही थी

और मेरा मोटा सख्त लंड , उसको दरेरता, रगड़ता , घिसटता , जबरदस्ती ...सूत सूत आगे बढ़ रहा था ...बस मुझे लग रहा था ये मस्त मजा मैंने पहले क्यों नहीं लिया ...

लेकिन अब आगे घुसाना मुश्किल हो रहा था ...पर मैं अब इतना अनाडी भी नहीं था ...

मैंने धीरे धीरे लंड बाहर निकाला , सिर्फ सुपाडा अन्दर था ...और के वाई जेली की ट्यूब से ढेर सारा लुब ...उसके ऊपर लिथेड़ दिया ...और फिर इंच इंच अन्दर ...

और एक बार फिर गुड्डी के चूतड पकड़ के जोर के धक्के एक एक बाद ..वो हलके हलके दर्द से चीख रही थी पर मैं अन सुनी कर बस ...और अब आलमोस्ट तीन चौथाई मेरे आठ इंच के लंड का अन्दर था ...

उसकी गांड जोर से जकड़े थी ...

तभी गड़बड़ हो गयी मैने गुड्डी के गालों की ओर देखा। एक कतरा आंसू का नजर आया ...उसका चेहरा दर्द से डूबा लग रहा था . बस इतना काफी था .
मुझसे रहा न गया। मजा तो मुझे बहुत आ रहा था ....लेकिन गुड्डी के चेहरे का दर्द ...वो आंसू का कतरा ,

जिसमे मैं सब कुछ डूबा सकता था ...मैं हलके हलके बडबडाने लगा ...अपने मजे के लिए मैं कुछ भी ...कित्ता दर्द हो रहा है ..अपने मजे के लिए ...मैं निकाल ले रहा हूँ ..

और हलके हलके लिंग मैंने बाहर निकालना शुरू किय. सिर्फ सुपाडा अन्दर रह गया ...तो मैंने गुड्डी से कहा ...
" तुझे बहुत दर्द हो रहा है मैं निकाल ले रहा हूँ ...मुझे नहीं मालूम था की तुम्हे इत्ता दर्द होगा ." और मैंने सूत सूत उसे बाहर निकालना शुरू किया तबतक गुड्डी की भंगिमा एकदम बदल गयी .


 " तुझे बहुत दर्द हो रहा है मैं निकाल ले रहा हूँ ...मुझे नहीं मालूम था की तुम्हे इत्ता दर्द होगा ." और मैंने सूत सूत उसे बाहर निकालना शुरू किया तबतक गुड्डी की भंगिमा एकदम बदल गयी .

वो दर्द से डूबी कातर हिरनी की जगह, गुस्से में धधकती शेरनी बन गयी .

उसके चेहरे से दर्द के निशान एकदम गायब हो गये. उसने कस के अपनी योनि में मेरे सुपाडे को भींच लिया और और मेरी ओर गर्दन मोड़ कर ( हम दोनों अभी भी डागी पोज में ही थे )मुझसे पूछा ,

" ये मेरा है की तुम्हारा ..."

" तुम्हारा ..." मैंने तुरंत जवाब दिया।

" तो ...तुम कौन होते हो इसे बाहर निकालने वाले ...बिना इसका काम पूरा हुए ..." गुड्डी ने उसी मुद्रा में पूछा।

मुझसे कोई जवाब नहीं बन पड रहा था

सहमकर मैंने हलके से बोला ...असल में तुम्हारे चेहरे पे इतना दर्द ...बस मुझे लगा ...मुझसे तुम्हारा दर्द देखा ....

गुड्डी के चेहरे पे हलकी सी मुस्कान खिल उठी ...उसने फिर मुझे बड़े जोर से डांटा ...

“कैसे बुद्धू के पल्ले पड गयी हूँ ...तुम भी ना ...बुद्दू ...दर्द तो होगा ही ना ...बिना दर्द के कैसे ...मैंने तुमसे कहा था क्या की ...अच्छा ये बोलो ...बच्चा होते समय दर्द होगा की नहीं ..."

गुड्डी बोली .
मैं क्या बोलता चुप रहा .

वही बोली ..." देखो मैं कहे देती हूँ , मुझे छ बच्चे चाहिए ...चाहे जितना दर्द हो ...अब ये तो नहीं बोलोगे की मैं गाभिन भी ना हॊउं ..."

मैं एक मिनट के लिए चौंका , छ बच्चे ...लेकिन गुड्डी से बहस करने की मेरी हिम्मत नही थी।

लेकिन मैं मतलब समझ गया और मैंने सुपाडा थोडा सा और बाहर खींचा ...और फिर पूरी ताकत से अन्दर पेल दिया ...जैसे किसी बहुत पतली गर्दन वाली बोतल में कोई मोटा कार्क ठुंसे ...

लेकिन बोतल अगर खुद कहे तो ...

" मैंने तुम्हे कित्ती बार समझाया मुझे चाहे जीतता दर्द हो , चाहे मैं चिखू चिल्लाऊं ...चूतड पटकूं लेकिन तुम ..." गुड्डी बोल रही थी

और अचानक जोर से चीखी ...." उयीइ अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह क्या करते हो ...तेरी बहन साल्ली रंजी का भोंसडा नहीं है ओह्ह्ह ...आआअह ...."

लेकिन अब मैं रुकने वाला नहीं था ...मैंने थोडा लंड पीछे खींचा ...और फिर दूने जोर से ...हचक के धक्का मारा ...और अब आलमोस्ट पूरा लंड अन्दर था .

गुड्डी फिर चीखी ...लेकिन अब मैंने हमला तिहरा कर दिया था ...

मेरा एक हाथ उसकी मस्त चूंची दबा रहा था , सहला था मसल रहा था ...और दूसरे हाथ की एक उंगली गुड्डी की चूत में कभी अन्दर बहार होती कभी गोल गोल घुमती और साथ में अंगूठा उसकी क्लिट को मसल रहा था पुल कर रहा था ...

लंड अभी गांड के अन्दर धंसा था ...लेकिन अब गुड्डी मजे से सिसक रही थी , बहक रही थी ,

उसकी साँसे लम्बी हो रही थी , चून्चियां मारे जोश के पत्थर हो गयी थी , निपल खूब कड़े हो गए थे ...

और फिर मैंने हचक के गांड मारनी शुरू कर दी ...जब लंड अन्दर जाता तो चूत से उंगली बाहर निकल आती और जब लंड बाहर निकालता तो सट से उंगली अन्दर ..और अब एक की जगह दो उँगलियाँ बुर में थीं

जब उंगलियाँ बुर में घुसतीं तो उसकी बुर उन्हें भींच लेती और जब लंड अब गांड में घुसता ...तो लंड को गांड सिकोड़ कर भींच लेती

अब गुड्डी को भी गांड मराने में मजा आने लगा था ...

और मैंने फिर आधे सुपाडे तक लंड बाहर निकाल कर ....उसकी दोनों चुन्चिया एक साथ पकड़ कर एक हलब्बी धक्का मारा ...और ....आलमोस्ट पूरा लंड हचक कर अन्दर ...

गुड्डी ने जोर से अपने होंठों को भींचा ...फिर भी हलकी सी चीख निकल गयी .
उस सारंग नयनी ने मेरी ओर अपनी पतली सी गर्दन मोड़ कर कहा ...एक बार में पूरा डाल दिया ...

अब गुड्डी से तो मैंने झूठ बोल नहीं सकता ...इसलिए मेरे मुंह से निकल गया ...नहीं ...अभी भी दो इंच के करीब बाकी होगा ...

और मेरी शामत आगई ...

" क्यों क्या वो अपने चचेरी, ममेरी, मौसेरी बहनों के लिए बचा रखा है ...उनकी चिंता अब छोड़ दो तुम, .....मेरे गाँव के लडके हैं ना उनका ख्याल करने के लिए जब बारात में आएँगी ना तो सबकी चूत का वो ...सब की सब भोंसड़ी वाली बन के जायेंगी ...जो कच्ची कलि होंगी वो भी ....एक एक पे दो दो तीन तीन चढवाउंगी ...आगे पीछे सब ..."

गुड्डी चालू हो गयी
और गुड्डी एक बार चालु हो जाय तो इतनी जल्दी रुकने वाली नहीं ...वो चालु रही ...

" अब ये मत कह देना की की वो तेरी चचेरी, फुफेरी बहने ...उन का आदमियों से कुछ नहीं होने वाला ...वो तुम्हारी उस गधे वाली गली वाली की तरह ...

उन्हें भी गदहे , कुत्ते ...दूबे भाभी का राकी है न ...उस पर बारहों महीने कातिक सवार रहता है ...उस का भी स्वाद बदल जाएगा ...और तेरी बहनों का भी ....( मुझे याद आ गया , भाभी रंजी को कैसे छेड़ रही थी ...एक बार अंदर घुसेड कर नाट लगा देगा ना ...तो बस ...और बनारस में हर गाली में वैसे भी अंत में उस का नाम जोड़ ही दिया जाता था )....

गुड्डी को रोकने का एक ही तरीका था और मैंने वही किया ....आधा लंड बहार निकाल कर , उसके दोनों मस्त चूतडो को पकड़ कर ...हचक कर पेल दिया ....टाँगे उसकी पूरी तरह फैली थीं ...पूरी ताकत से ....

और वो अबकी जोर से चीखी ....

लेकिन अब एक सूत भी बाहर नही था ...

पूरा लंड ...पूरा आठ इंच उसकी मस्त गांड ने घोंट लिया था ...
मान गया मैं गुड्डी को …पहली बार गांड मरवा रही थी ...और ...पूरा ....

उसकी गांड मेरे लंड की आदी हो जाय ...इसलिए पूरा लंड अन्दर छोड़ कर मैंने आगे का रुख किया

मैं उसकी दोनों गद्दर चून्चिया जोर जोर से मसल रहा था , और कभी हचक कर उसकी बुर में जड़ तक दो उंगली पेल देता ...जोर से उसकी क्लिट रगड़ देता ...कुछ ही देर में वो झड़ने के कगार पे आ गयी तो मैंने फिर गांड मारनी शुरू की ....पूरे लंड से

सुपाडे तक लंड निकाल के एक झटके में अब मैं जड़ तक पेल देता , कभी आधे लंड को गांड में डाले डाले जोर से घुमाता , कभी उसके चूतड पकड़ कर पेलता तो कभी दोनों चून्चिया जोर से मसलते हुए गांड मारता ...

तो कभी उसकी चिकनी पीठ पे बलखाती चोटी और परांदे को पकड के उसे अपनी ओर खिंच लेता ....दोनों टांगों के बीच उसकी राने सिकोड़ लेता ...और हचक हचक के गांड मारता ....

और वो भी पूरा साथ दे रही थी ...जोर से वो अपनी गांड बार बार मेरे लंड पे भींच लेती ...कभी अपने चूतड पीछे की ओर ठेलती ...एक पल दर्द से कराह उठती तो अगले पल मजे से सिसकती ....

दो तीन बार वो झड़ने के कगार पे पहुंची लेकिन मैं रोक देता ...

लेकिन अबकी बार मैंने खुद कस के उस्के क्लिट पिंच कर दिए ....और उसका बदन कांपने लगा ....वो जोर जोर से सिसकियाँ भरने लगी .....और साथ में उसकी कसी गांड मेरे लंड को भींचने लगी ...

.और मैं भी ...मैंनेआलमोस्ट पूरा लंड बाहर निकाल कर ...एक झटके में ठेल दिया ....जड तक और साथ में मैं भी …

मेरा पूरा लंड अन्दर , गुड्डी की गांड में धंसा हुआ था ...पूरी गहराई तक ...और मैं

सिहर रहा था ...काँप रहा था ...मेरा कोई भी कंट्रोल मेरे ऊपर नहीं था ...


मेरी आँखे बंद थीं ...जैसे मेरी पूरी देह मथ रही थी ...जैसे मेरी पूरी ताकत ...पूरा सत् निकल रहा हो ...
गुड्डी की गांड अभी भी हलके हलके भींच रही थी ....

मुट्ठी भर से ज्यादा ही मलाई निकली होगी ...

मुझे लग रहा था मैं हिल भी नहीं पाऊंगा ...

गुड्डी ने मेरी ओर मुड के देखा , शरारत से मुस्कराई और ...एक बार फिर उसकी कसी गांड ...सर्प बंध की तरह ...भींचने लगी ....

और मैं फिर ...बूँद बूँद ..फिर एक बार आधी अंजुरी भर ...उसके अन्दर रीत गया ...


बड़ी देर तक हम दोनों बिस्तर के सहारे उसी डागी पोज में पड़े रहे ...
पता नहीं कब तक

और फिर जब हम बिस्तर पर शिथिल होक गिर गए ....तो भी उसी तरह पड़े रहे ...

मैं उसके अन्दर ...

और थोड़ी देर बाद गुड्डी उठी ...तो मैंने उसके हाथ पकड लिए ...

कहाँ जा रही हो ...

" कहीं नहीं मेरे बेसबरे बालम ..अगले सात जनम के लिए कही नहीं जाउंगी घबड़ाओ मत ..


 और वो लौटी तो उसके हाथ में चंदा भाभी के दिए दो लड्डू थे

चंदा भाभी के लड्डू ...लड्डू कम तोप के गोले ज्यादा थे.

उनपर उन की गुड्डी को हिदायत की रोज वो मुझे सोने के पहले एक जरूर खिलाये ...और गुड्डी उन की पटु और आज्ञाकारी शिष्या ...तो बचने की कोई गुंजाइश नहीं थी .

रोज तो 'काम धाम ' शुरू होने के पहले ही वो खिला देती थी लेकिन आज शायद हम दोनों ज्यादा जोश में थे इसलिए ...लड्डू हर्बल वियाग्रा से भरपूर थे और उन का असर आयातित वियग्रा से भी दुगुना और ज्यादा देर तक होता था और सबसे बड़ी बात ये की ...उस का कुछ असर परमानेंट भी होता था ...लेकिन आज दो ...

मैंने हिम्मत कर के गुड्डी से एक डबल डोज का कारण पूछ ही लिया ...

और जवाब में उसने मेरे मुंह में एक लड्डू ठूंस दिया और मेरा मुंह बंद हो गया ...

और उसने वही जवाब दिया जिसकी मुझे उम्मीद थी ...

"तुम सवाल बहुत पूछते हो , तुम्हारा हर चीज जानना जरुरी है क्या "

खैर उसका दिल पसीज गया और उसने बता ही दिया ...

" कल होली है ...तुम्हारी भौजाइया भी होंगी और मेरी ननदे छिनार भी ...क्या पता ...कित्ती बार कहाँ नमबर लगाना पड़े इसलिए डबुल डोज ..."

और उसने दूसरा लड्डू भी मेरे मुंह में ठूंस दिया।

और उसके बाद वो सारंग नयनी तिरछी नज़रों से मुझे घायल करते मुड़ी ...और फिर आलमारी की ओर ...और उसने वो पलंग तोड़ चांदी के बर्क में लिपटे पान का जोडा निकाला ...जो हम लोग लाये थे ....

उस मेरे होंठ से छुलाया और गप्प से अपने मुंह में और पान चुभलाते मेरे पास आके लेट गयी और गलबहिंया डाल कर बोली ,

" तुम तो पान खाते नहीं ...और बार बार की जबरदस्ती भी ठीक नहीं लगती ..इसलिए मैंने ही ..."

गुड्डी का एक हाथ मेरे पीठ पे था ...और मेरा हाथ और कहाँ ...गुड्डी के गदराये किशोर उभारों पे ...और दूसरा उसके नितम्बो पे ...

हम दोनों ने एक दूसरे को भींच लिया ...मैं तो बोल नहीं सकता था ....मेर मुंह उसने लड्डू से बंद कर दिया था ...वो भी एक नहीं दो दो
इसलिए पान चुभलाते ...बात गुड्डी ने ही शुरू की ...

"क्यों छ बच्चों की बात सुन के घबडा तो नहीं गए ...वैसे तुम ज्यादा चाहो तो मुझे ऐतराज नहीं है ..."

मेरा मुंह अभी भी बंद था ...

" देखो दो ढाई साल तक तो मैं भी कुछ नहीं चाहती ...फूल मस्ती नान स्टाप ...लेकिन उसके बाद ...गुड्डी बोली .

मेरे मुंह का लड्डू ख़तम हो चूका था लेकिन अब मैं दूसरे काम में बीजी था ...मेरा जा हाथ उसके नितम्बो को सहला रहा था उसकी तरजनी बी सीधे गांड के दरार पे थी ...अन्दर घुसी मलाई कुछ छलक के बाहर आगयी थी.

...टिप उसे लगाकर अन्दर सेंध लगाने की कोशीश कर रही थी ..और इधर गुड्डी ने भी हलके से अपने 'जंगबहादुर' को हलके हलके प्यार से सहलाना शुरू कर दिया था .

गुड्डी ने फिर एक बार मेरे गाल पे किस कर बोलना शुरू किया ...

" मैं तेरी परेशानी समझ सकती हूँ ...लेकिन उसका एक इलाज है मेरे पास ...मिनी ( गुड्डी की मझली बहन ) को बुला लेंगे ना ..उन दिनों के लिए ...बल्कि अगर तुम मान जाओ तो जब वो प्लान करेंगे ना ...तो उस साल का एडमिशन जहाँ तुम्हारी पोस्टिंग होगी वही करवा देना ..दो साल में वो स्कूल से कालेज में पहुँच जायेगी

...और एक बात कहे देती हूँ ...मेरी किसी ननद वनद को अपनी किसी माय्केवाली को मत बुलाना ...हरदम बोलेगी ..भाभी ये मत करो ..भाभी वो मत करो ...मिनी ही रहेगी हम लोगों के पास उस समय ..."

" हाँ ठीक है ...तेरा ख्याल रखेगी ..." मैंने मस्का लगाने की कोशिश की लेकिन चाल उलटी पड़ी


मेरी नाक मरोड़ के वो शोख अदा से बोली ...
" एकदम गलत ...मेरा ख्याल रखने के लिए ...ये लड़का है ना ...बस वही एकदम काफी है ...मुझे और किसी की भी जरूरत नहीं है ."

मैंने फिर ट्राई मारी ..." तो क्या मेरा ख्याल रखने के लिए ..."

और गुड्डी ने फिर मुझे गलत सिद्ध कर दिया ...." इस ख्याल में मत रहो ...."

और फिर गुड्डी ने ही जवाब दिया ..

मेरे अब धीरे धीरे जागते जंग बहादुर को अपने कोमल किशोर हाथों से जोर से दबा कर जवाब दे दिया और बोला भी ..

" बुद्धू हो तुम ...इत्ते दिन इस बिचारे का ख्याल कौन रखेगा ....तो क्या ये बिचारा भूखा रहेगा "

मैं एक पल के लिए झेंप गया तो गुड्डी प्यार से जंगबहादुर को मुठियाते , आगे पीछे करते बोली ...

"अरे क्या लौंडियों की तरह शर्मा रहे हो ...तेरी छोटी साल्ली है , तेरा भी हक़ है उस पे और उसका भी है इसपे ..."

और अबकी गुड्डी ने एक झटके में सुपाडे का चमड़ा नीचे खिंच दिया ...नतीजा जो होना था वही हुआ, लंड पूरी तरह तन्ना गया .

बात गुड्डी की एकदम सही थी ...लेकिन मेरा स्वभाव ...

गुड्डी लंड को जोर से दबाते बोली ...

"कित्ता मजा लिया था तूने गुंजा के साथ ...खुल के उसकी चून्चिया दबायीं , मसली रगडी थी , उसे लंड चुसाया था ...और मेरी मझली ...मिनी ...गुंजा से तो थो थोड़ी ही छोटी है ..."

बात गुड्डी की एकदम सही थी ....

मेरे मन में गुंजा के साथ होली याद आगयी ...कित्ता छेड़ा था गूंजा और गुड्डी ने मिल के मुझे ...और छत पर जब वो स्कूल से लौटी तो ...होली का सारा जोश ...उसके स्कूल के टाप के अन्दर हाथ डालकर ...

फिर खोल के बाहर निकाल के मैंने जबर्दस्त उसकी चून्चिया रगड़ी थी ...कड़ी कड़ी छोटी छोटी थीं ...

लेकिन खूब मस्त ...और मेरे जंगबहादुर पे हाथ गुंजा ने ही डाला था ...हाँ उकसाया गुड्डी ने उसे जरूर था

...और फिर मैंने उसके छोटे छोटे किशोर मुंह में पेल दिया ....वो गों गों करती रही ..लेकिन जोश में कौन देखता है ..और जब थोड़ी देर में उसने चूसना चाटना शुरू किया ...मजा आगया था ...

उससे तो मैंने वायदा भी कर लिया था की बनारस जब लौटूंगा तो उसकी चुन्मुनिया में पूरे आठ इंच घुसाउङ्गा ...

गुड्डी के एक हाथ ने मुझे उसकी ओर खिंच रखा था और दूसरा ...लंड को अब जोर जोर से रगड़ रहा था ...गुड्डी की बात मुझे यादों से वापस ले आई ..

""गुंजा से थोड़ी ही छोटी है ..और जब तूम हम लोगों के साथ रहोगे ..

तुम ...तुम्हारी छोटी साल्ली है ...बिना मीजे रगड़े तुम थोड़ी छोड़ोगे ...तो देखना थोड़े ही दिन में गूंजा से भी बड़े बड़े हो जायेंगे .."

मेरी आँखों के सामने उभरते हुए किशोर उभार घुमने लगे ...मस्त गदराते ...ना ना करते भी जिनकी आँखों में आमन्त्रण हो ...मौका देख के मैं दबा दूँ और बिना छुडाने की कोशिश करते वो बोले ...

"छोडो ना जीजू कोई देख लेगा ..."और मैं और जोर से दबा दूँ ..और उसका असर मेरे जंगबहादुर पे हुआ जो एकदम बौरा गए ...

और गुड्डी ने तुरंत बात समझ ली ..मेरे गाल को कचकचा के काटती बोली ...

"क्यों साल्ल्ली के बारे में सोच रहे हो क्या ...""

और जवाब में मैंने भी गुड्डी के निपल्स काट लिए और बोला ..."साल्ली मस्त होगी तो सोचूंगा ही ..."

मस्त तो होनी ही है आखिर बहन किसकी है "...गुड्डी बड़ी शोख अदा से बोली .

फिर आँख नचा के , अपनी हथेली मेरे मस्ताये सुपाडे पे रगडती बोली ..." ."आखिर बहन किसकी है ....मस्त तो होनी है ...और छुटकी ...टिकोरों के बारे में क्या ख्याल है ..."

और मेरी आँखों के सामने स्कूल से निकलती लड़कियां ...नाच गयी ..जिनके बस उठते हुये , नवांकुर से , समीज को बेधते , छोटे छोटे छोटे ..चून्चिया उठान जिसे कहते है ...

एकदम लोलिता टाइप ..उनको देख के ही मन एकदम कसमसा जाता था बस मन करता था की उन्हें गोद में बिठा के बस उठते हुए निपल , अंगूठे और तरजनी के बीच दबा कर मसल दूँ ,

मुंह लगा के उन जस्ट उभरती हई चून्चियों को चूम लूँ , हलके से कचकचा कर काट लूँ ...और छुटकी के तो बड़े बड़े टिकोरे थे ...

मैंने जवाब गुड्डी के निपल को कस के काट के दिया ...

और गुड्डी ने तिहरा हमला बोल दिया, उसने मेरे लंड के बेस पे जोर से दबाया और अपनी टाँग ऊठा के मेरी कमर पे इस तरह रख दी की अब सुपाडा सीधे उसकी चुन्मुनिया पे रगड़ खा रहा था , और वो भी गीली हो रही थी .

उसका दूसरा हाथ सीधे मेरे नितम्ब पे था , उसें मुझे कस के अपनी ओर भींच रखा था और उस हाथ की उंगलिया नितम्ब के दरार के आसपास शैतानी से सहला रही थीं ...और उसने कचकचा के मेरे निपल्स को काट लिया ...
और साथ में बोली ..


तुम अपनी सगी छोटी साल्लियों के साथ करने के पहले इतना झिझकोगे शरमाओगे , सोचोगे ..उनके साथ तो तुम्हारा हक़ भी है , रिश्ता भी है ...

मारे ख़ुशी के गुड्डी की गांड के छेद , पे छेड़खानी कराती मेरी ऊँगली ..घचाक से ..अंदर घुस गयी ...

कुछ तो गांड मारने से ताज़ी टटकी फैली गांड ...और उससे भी ज्यादा उसके अन्दर भरी मेरी गाढ़ी सफेद कटोरी भर मलायी का असर था ..



और मुझ से भी ज्यादा दुगुनी ख़ुशी से गुड्डी की गांड ने मेरी ऊँगली को अन्दर भींच लिया
और अपनी बात आगे बढाई ..."तो बड़ी सालियों के साथ क्या करोगे ...वो तो तुम्हे खुद ही खा जायेंगी ..."

अब मेरी चौंकने की बारी थी ...गुड्डी की गांड में ऊँगली जोर जोर से आगे पीछे करते गोल गोल घुमाते मैंने उसे प्यार से चूम लिया और पूछा ...ये बड़ी सालिया कौन ...

गुड्डी ने मुझे प्यार से चूमते हुए कहा .."तू भी ना ..बताया तो था तूझे ."


 मुझे इतना याद था की गुड्डी ने एक बार कहा था की उसकी कुछ कजिन है , जिनके साथ उसका पैक्ट है की उनमें से जिसकी भी पहली शादी होगी , बाकी उसके पति के साथ ..मजे लेंगी ..एकदम खुल के

...उसके बाद ही उस को इजाजत होगी की ...उससे ज्यादा ना उसें बताया ना मेरी पूछने की हिम्मत पड़ी ..

गुड्डी ने मुझे बांहों में कस के भींच लिया और इयर लोबस पे चूमते हुए हाल खुलासा बयान करना शुरू कर दिया

"अरे वही मेरी मौसी की लड़कियां ...जब उन्हें पता चलेगा ना की मेरी शादी तय हो गयी है तो बहुत खुजली मचेगी उन को ..."

"कौन है नाम वाम तो बताओ ..."मैंने पुछा और डांट पड़ गयी

"अरे बता तो रही हूँ सब बताउंगी ...और तूझे उनके नाम से मतलब है या आम से ...सोच रहे होगे छोटे हैं की बड़े हैं ...लालची ..."

और गुड्डी ने एक बार फिर से सारी गाथा शुरू की

गाथा शुरू हुयी उसके गाँव से ..रात अमराई में गुड्डी ने अपने गाँव के अमराई के बारे में जो बताया था उसके बाद से ही मेरा मन डोल रहा था ...

गुड्डी ने बोला, उसके गाँव का घर बहुत ही बड़ा है ..और हर साल वहां गर्मी की छुट्टियों में , और जाड़े में उसकी मौसियाँ सभी इकठ्ठा होती है है और उनके बच्चे भी .

गुड्डी की मम्मी की दो बहने और हैं और गुड्डी की मम्मी सबसे छोटी . मैं गुड्डी की मौसी के बारे में कुछ पूछता की गुड्डी खुद बताने लगी ...

"उसकी मझली मौसी दिल्ली में रहती हैं ...और तुमने मम्मी की गालियाँ सुनी है ना ..."

मैं कहाँ भूलने वाला था ...चन्दा भाभी के साथ मिल के बनारस में उन्होंने मेरे सारे खानदान के नाम किस किस के साथ नहीं जोड़ दिए थे ....गुड्डी ने बात आगे बढाई

"मम्मी के गाने में अगर नमक था ना ..तो मझली मौसी के हार बात में असली लाल मिर्च रहती है ...बिना गाली के तो बात ही नहीं ...और वही हालत है बड़ी मौसी की ...और छुट्टियों में आदमियों को तो छुट्टी मिलती नहीं ...

तो मौसा जी लोग तो मुश्किल से कभी हफ्ते भर के लिए कभी वो भी नहीं ...और इसलिए एकदम खुला छेड़ छाड़ ..ख़ास तौर से मेरी बुआ को तो मम्मी , मौसियाँ मिल के ...
"


"तुम लोगों के सामने भी ...."मुझसे रहा नहीं गया और मैने पूछ लिया।
"एकदम ...गुड्डी बोली .

"असल में गारी तो हम लोगों का नाम ले के ही दी जाती थी ...ना तो मौसी लोग बुआ का नाम लेतीं और ना ही बुआ उनका ...तो जब मौसी लोग बुआ को छेड़तीं तो कहतीं ...

अरे गुड्डी की बुआ बड़ी चुद्वासी ....और बुआ भी जवाब देतीं तो बोलतीं की गुड्डी की मौसी पक्की छिनार

..और तो और ...एक काम करने वाली थी वहां बसंती ...शादी होक दो तिन महीने पहले ही आई थी ...खूब चुलबुली ...और गाँव के रिश्ते से हम लोगों की भौजी लगती थी ...वो तो इतना छेडती थी ..ख़ास तौर से मुझे

..और मैं छुटकी ( गुड्डी की सबसे छोटी बहन )के बराबर रही होउंगी उस समय .."

"टिकोरे वाली साइज की ...मैंने उसे छेड़ा .

हंस के उसने जोर से मेरा लंड भींच दिया और बोली ...

"एकदम ..लेकिन लगता है अब तेरा मन भी टिकोरों का रस लेने का करने लगा है ..चलो दिलवा दूंगी यार "

..."फिर अपनी बात आगे बढाई ...

"बसंती मुझे देख के बोलती ...गुड्डी की चू ...गुड्डी तेरी चू ...तेरी चू ..फट गयी तेरी चू ...लेकिन मुझे होती जब वो ...भो ...भो कह के चिढाती ..गुड्डी की भो ...गुड्डी तेरी भो ...गुड्डी की भो फैल गयी .."

एक दिन हम दोनों अकेले थे ...तो मैंने पूछ लिया
"हे भौजी ..हरदम हमको भो भो ..कह के क्या चिढाती हो मुझे नहीं अच्छा लगता है ...


बसंती ने मुझे अंकवार में भर लिया और मेरी फ्राक उठा के बोलने लगी ...

"अ री अब टिकोर ए इतने मस्त आ गए हैं तो अच्छा भी लगना लगेगा ..और मेरी छोटी सी चड्ढी में हाथ दाल के उसे दबोच लिया और बोली ,

"ये है तुम्हारी चूत ..जिंदगी का सबसे ज्यादा मजा यही से मिलता है ..अभी इतनी कसी कच्ची कली है ....तो कुछ दिन के बाद जब तेरी शादी हो जायेगी ना ...और दूल्हा रोज , न दिन देखेगा ना रात ..हचक हैक के अपना लंड इस चूत में पलेगा ...तो चूत से ये भोंसडा हो जायेगी ..."

वो फांक के बीच में अपनी उंगली घुमा रही थी ..और मैं पनिया रही थी ...पहली बार किसी की उंगली लगी थी वहां

जवानी का अहसास हो रहा था मुझे ...मस्ती चढ़ रही थी ...तब तक मझली मौसी आ गयीं ...और आते ही बसंती के ऊपर चढ़ गयीं

" क्यों क्या टोय रही हो ...अभी झांटे वांटे आयीं की नहीं ..."

"अरे बढियां ..छोटी छोटी रेशम के डोर की तरह ...."बसन्ती ने बिना मेरी चड्ढी से हाथ निकाले हँसते हुए बोला लेकिन मंझली मौसी की डांट फिर पड़ गयी ..


"अरे कैसी भौजाई हो खुद तो दिन रात मजा लेती रहती हो , ननद जवान हो रही है ...कम से कम ऊँगली वुन्गली तो सिखा दो ..."

बसन्ती की उंगली दोनों फांको के बीच तेजी से चलने लगी और वो खिलखिला के हंस पड़ी , बोली

""यही तो इसको समझा रही थी की बस कुछ दिन सब्र करो शादी ,होगी दुल्हा आयेगा तो दिन रात चढ़ा रहेगा ...और चोद चोद कर तुम्हारी चुनमुनिया को भोंसडा बना देगा ...तब तक इसका ख्याल रखा करो ....""

और तब तक बड़ी मौसी आगयीं और फिर वो बसंती के ऊपर ...चालु हो गयीं ...

बड़ी मौसी के हाथ मेरा गाल सहलाते सहलाते बड़े बड़े टिकोरों पे आगये और बसंती को उन्होंने हडकाया ,

"क्यों मेरी बिटिया को डरा रही हो ...क्या इतना इन्तजार करना पड़ेगा उसे ...दुल्हे के आने तक ...तब तक क्या बिचारी की रामप्यारी भूखी रहेगी ..."

और फिर मेरे टिकोरों को हल्के से दबा के मुझसे लाड से बोलीं ,

"तू जरा भी चिंता मत कर ...अरे साल डेढ़ साल में, मैं नीली की शादी कर दूंगी ...बस ...तू सबसे छोटी साल्ली है ( नीली मेरी सबसे बड़ी मौसेरी बहन है , मुझसे तीन साल बड़ी ...बहोत ही फारवर्ड और मेरी मौसियों की तरह मजाक और बोलने में एक नंबर की ...पटियाला में रहती है ...एकदम मस्त पंजाबी जट्टन लगाती है ...)

तो बस ...तू चाहे लाख ना नुकुर करती रहे ...मना करे ...बिना चोदे वो छोड़ेगा थोड़े ही ...आखिर तू सबसे छोटी साल्ली है ....हाँ बस जरा अपनी फुद्दी का ख्याल व्याल रख ...जल्द ही इसको यार मिलेगा ..."

और अब मंझली मौसी भी मैदान में आ गयीं ...

"और क्या ...पहले नीली का मर्द ...फिर मेरी वाली दोनो खट्टी मिट्ठी ...नीली के साल भर के अन्दर ..उन दोनों की भी लग्न हो जायेगी

( मंझली मौसी के दो जुड़वां लडकियां है , खट्टी -मीठी , मुझसे दो साल बड़ी ...पक्की दोस्ती है मुझसे )

और उन दोनों के मर्द भी ...गुड्डी यार तेरे तो मजे आ जायेंगे ...तीन तीन जीजू ...दिन रात तेरी चक्की चालू हो जायेगी ...तुझे अपने दुल्हे के के इंतजार की कोई जरूरत नहीं है ...तेरे दुल्हे के आने के पहले ही नीली और खट्टी मीठी के मर्द , तेरे जीजू तेरी ..."

और उनकी बात काट कर बड़ी मौसी मेरे टिकोरों को पिंच करती बोली ,

"तेरी चूत का भोसड़ा बना देंगे ..."

और तब तक मेरी तीनो मौसेरी बहने ...नीली , खट्टी मीठी एक साथ आगयीं गुड्डी बोली ... और फिर मेरी शामत आ गयी .

सबसे पहले नीली दीदी मेरे गाल पिंच करते करते बोलीं ...एक एक पे तीन बहुत मजा आयेगा गुड्डी तेरे को ..हमारे वालों को भी मजा आयेगा कच्ची कली जो मिलेगी लेकिन तेरे मर्द का क्या होगा ...

खट्टी ने बात पूरी .की ...उसे तो पोखर मिलेगा खूब गहरा ...

नीली दी ने बात और बढ़ाई ..अपने दोनों हाथों से खूब बड़ा सा होल बना के दिखाते हुए और हंस के कहा लेकिन ये भी तो सोच उसे मेहनत नहीं करनी पड़ेगी ...मेरे तेरे ..सब काम तो पहले ही आर चुकेहोंगे ...और वैसलीन का खर्च भी नहीं ...

मैंने कुछ बोलने के लिए मुंह खोल तो गुड्डी ने अब मेरा गाल पिंच करते हुए मेरा मुंह बंद करा दिया ..

मैं जानती हूँ तुम क्या पूछना चाहते हो ....नीली दी और खट्टी मीठी लगती कैसी हैं ...बताती हूँ बताती हूँ

...फिर गुड्डी ने मेरे तन्नाये , बेताब जंगबहादुर ...को हलके हलके आगे पीछे करते बताना शुरू किया ..
.
नीली दीदी ...मुझसे तीन साल बड़ी हैं ...अभी बीए में पढ़ती हैं ..एकदम टंच माल है ...खूब कड़क ...पक्की पंजाबी जट्टन जैसी ...खूब भरी पूरी,... नीचे भी और ऊपर भी ...

कत्तई जीरो फिगर वाली नहीं ...गाल भी भरे भरे एक दम गुलाबी ...कचकचा के काटने लायक ..हाँ समझ रहीं हूँ तूम किसके बारे में के लिए उतावले हो रहे हो ...वो भी खूब गदराया , मस्त कम से कम ३ ४ सी होगा

बल्कि ज्यादा ...एकदम कड़ा ...और सबसे मस्त है उनकी अदाएं और बात ..एकदम मेरी मौसियों पे गयी हैं ...तुझसे तो बिना गाली के बात नहीं करेंगी ...और जब से वो टेंथ में गयी थीं,

तब से चार -पांच भवरे तो हरदम उनके आगे पीछे ...और वो हम लोगों से कहती भी थीं की यार ये बिचारे लड़के ...लेकिन घबढाओ मत ...कमर के नीचे ...वो एकदम कुँवारी हैं ...उंगली भी ठीक से नहीं ...


गुड्डी एक मिनट सांस लेने के लिए रुकी फिर चालु हो गयी ...

नीली दी बड़ी मौसी की अकेली लड़की हैं लड़के भी नहीं है उनके ....और मंझली मौसी के लडकियां ...जुड़वां

..खट्टी मीठी ..दो ततैया ...हरी मिर्च ...मुझसे दो साल बड़ी है एकदम एक जैसी ..हम सब खूब मजा करते हैं की दोनों के मर्दों के लिए भी मुश्किल होगी पहचानने में शादी किसी से सुहाग रात किसी से ...बस हेयर स्टाइल फर्क है एक शोल्डर कट और एक लम्बे बाल वाली ..अभी दोनों ने बारहवीं का इम्तहान दिया है ...

दिल्ली से ..दोनों ही कालेज के मिस टीन रह चुकी हैं ...और फिगर तो बस मुझसे दो साल बड़ी हैं तो जोड़ लो ...आलमोस्ट ३ ४ ...सी ...गोरी हाई चीक बोन्स और भरे हुए हिप्स ...देख के हालत खराब हो जायेगी तेरी ...


 मेरे लंड की तो सुन के ही हालत खराब हो गयी थी

मेरे मुंह से निकला फिर ...और गुड्डी ने आगे की बात बतायी ...

दोनो मौसियाँ भी उन शैतान कजिन्स का साथ दे रही थीं ...मैं एक दम उदास और अकेली पड़ गयी थी तब तक मम्मी आयीं और उन्होंने मुझे बचा लिया ...

क्योंक्या बोल उन्होंने की तुम्हे उन के मर्द के साथ ...मैंने बच में बोलनेकी हिम्मत की और हमेशा की तरह एक तो मैं गलत निकला और दूसरे गुड्डी ने बीच में बात काट दी ..और बोली

एकदम गलत ..मेरी मम्मी तो और आग में घी डालने वाली हैं ...लेकिन वो मुझे समझाते हुए बोलीं ...

अरी तू परेशान क्यों है ... इन तीनो को चिढाना चाहिए ...मैं छोटी साल्ली हूँ मेरा तो हक़ है ....तुम लोग सोचो ...मुझे तो तीन तीन का मजा मिलेगा और तुम बिचारियों को एक से ही संतोष करना पड़ेगा ...

और ऊपर से मेरा हक़ पहला है तो बस मैं निचोड़ के छोड़ दूंगी एकदम ...."

उस के बाद तो उस दिन से ...बस वही मजाक ...रात में हम चारों एक साथ सोते ...तो कभी खट्टी मेरे एक बूब्स पे हाथ से छु के कहती ये तो मेरे वाले का है और दूसरे बूब्स को मीठी मसल के कहती ये मेरे वाले का है

..और नीली दी ने तो सीधे भरतपुर पे कब्ज़ा जमा लिया था वो तो सबके सामने मेरी दोनों जांघो के बीच ..हाथ डाल के दबा के बोलतीं ये मेर वाले का है और रात में तो ...

खट्टी मीठी मेरे हाथ पकडतीं और वो चड्ढी खोल के पूरा उस का मुआयना करती , सहलाती पुचकारती ...देखतीं कित्ती झांटे आ गयी है ...और मुझे हड़काती ...कितना भी मन करे न ...नो कैंडलिंग ...ऊपर से तू भले सहला ले ...

तो एक तरह से मेरी सेक्स एजुकेशन रात में चलती और दिन में तो बसंती और मौसीयां थी ही ...

मै गुड्डी की मस्त बातें बातें सुन के और मस्त हो रहा था ..उसे बाहों में भींचे , , जकडे मेरा एक हाथ उस के किशोर उभार को जोर जोर से मसल रहा था ...और दूसरा ...

उस के नितम्ब पे जिसकी एक उंगली गुड्डी की गांड में पैबस्त थी और मैं जोर से अन्दर बाहर कर रहा था ...और कभी पूरी अंगुली अंदर कर गोल गोल घुमा देता ...

गुड्डी ने किस्सा आगे बढाया ..

अगले दिन वो अपनी तीनो मौसेरी बहनों के साथ ताश खेलने में लगी थी ...और फिर वहीँ बात गयी ...औरइस बार खट्टी ने छेड़ना शुरू किया नील दी का सहारा लेकर ..उसने नील दी से पुछा ,


" दी जब तक आपके वो अकेले रहेंगे तबी तक कोई बात नहीं लेकिन जब हम दोनों के भी मैदान में आ जायेंगे तो कनफूजन नहीं होंगा ...कौन पहले करे ...तीन , तीन जीजू और बिचारी गुड्डी एक अकेली ...

' अरे पुर्जी निकाल लेंगे वो और क्या ..."

नील दी ने हँसते हुए जवाब दिया और अपने पत्ते देखने लगी ...

तब तक मंझली मौसी भी पत्तों के खेल में शामिल हो गयीं पत्ते फेंटते हुए उन्होंने पूछा की तुम तीनो इत्ती हंस क्यों रही हो ...


तो नीली दी ने बोला की जब तीनो के पति एक साथ होंगे तो गुड्डी के लिए पुर्जी निकाली जायेगी ..

मंझली मौसी ने हंस के मेरे गाल पे हाथ पे हाथ फेरा ..और बोलीं

" अरे मेरी गुड्डी को समझा क्या है तुम तीनो ने अपने जीजू को क्यों इंतजार कराएगी ...अरे पुर्जी क्यों निकालेगे ...तीनो एक साथ ..."

हम चारों के मुंह से एक साथ चीख निकल गयी ...मेरी थोड़ी डर मिश्रित और मेरी तीनों मौसेरी बहनों की मजे से मिली जुली ..

" अरे पत्ते उठाओ ना अपने ...गुड्डी को समझा क्या है तुम सब ने ..एक आगे ...एक मुंह में और एक पिछवाड़े ...हो गए ना तीनों एडजस्ट "

" पिछवाड़े भी ...' वो तीनो एक साथ बोलीं मैं तो खैर बोलने की हालत में नहीं थी , गुड्डी बोली

" क्यों इत्ता मस्त पिछवाड़ा है इसका क्या बुराई है ...उन तीनो को मौसी ने घुड़का और मेर्रे ऊपर हाथ फेरते बोलीं


" अरे तू काहे घबडाती है ..करना तो उन को है ना ...वैसे भी तू क्या सोचती है बचा रहेगा तेरा पिछवाड़ा ...अरे उनमे से कोई निहुराअयेगा ...दोनो हान्थ से कुँवारी कच्ची गांड फैलाएगा ..सुपाडा सटाएगा ...एक जोर का धक्का मारेगा ..सुपाड़ा अन्दर

उसके बाद तो तुम लाख चूतड पटकोगी ...बिना तेरी गांड मारे वो छोड़ेगा नहीं ..दो चार बार गांड मरा लेगी आदत पड जायेगी

गुड्डी बोली मुझसे नहीं रहा गया और पत्ते उत्थाते हुए मैंने मौसी से बोल ही दिया ...

" लेकिन मौसी अभी ..."
मेरी बात काट के वो बोली

" अरे अभी तुझसे कौन कह रहा है ..साल दो साल तो लगेगा ही ...तब तक तू हाईस्कूल में पहुँच जायेगी ...चूतड मटका मटका के चलने लगेगी ...सारे बनारस के लौंडे तेरी गांड के दीवाने हो जायेंगे ...

तब तक हम सब ने पत्ते फ़ेंक दिए थे और मंझली मौसी बाजी जीत चुकी थीं ...फिर से पत्ते फेंटते वो बोलीं ..


" इत्ता मुंह बना रही है ...जरा लडकों से तो पूछ ...उस उमर तक तो ...आधे लडके गांड मरौवल शुरू कर देते हैं ...शायद ही कोई चिकना नमकीन लौंडा बचता हो और तू इतनी ...कमसिन बन रही है।

आखिर जब उस उम्र में लौंडे गांड मरा सकतेहैं तो तू क्यों नही मरा सकती बोल ... उन सबों की ऐसी तैसी है क्या और तेरे में सुरखाब के पर लगे हैं ..."

और उन्होंने मेरे गाल पिंच कर दिए और उधर नीली दी बुजुर्गों के अंदाज में बोली ,

" अरे मरवा लेगी ये भी नहीं तो तो हम तीनो किस मर्ज की दवा है ...हाथ पैर पकड़ के मरवाएंगे इसकी ...'
वो बाजी मैंने जीती .

और रात में जब हम लोग सोने गए नीली दी, खट्टी , मीठी के साथ तो मैंने एक नया पत्ता फेंका ..

मान लो मेरी शादी पहले हो जाय तो ..

वो तीनो खिलखिला के हंसने लगी ...फिर नील दी बोलीं ...

"यार एक तो तू हम तीनो से छोटी है ..इसलिए वैसे तो तेरी शादी हम से पहले होने से रही ..दूसरी बात मान ले तू खुद चक्कर चलाये ...तो तू इत्ती सीधी है की ये भी तेरे बस का नहीं है ...बस तू मना की हम तीनो की जल्दी शादी हो जाय तो तूझे भी मजा लेने का मौका मिल जाएगा

लेकिन मैं अड़ी रही ...मान लो हो ही जाय ....अच्छा चलो मेरी नहीं ...कही खट्टी या मीठी की हो जाय ...तो नीली दी आपको भी ...फिर ये नहीं कहेगा की मैं बड़ी हूँ ...

नीली दी ने मुझे बांहों में भर के कहा अरे बुद्धू मजे लेने के मामले में बड़ा छोटा नहीं देखा जाता ...साल्ली तो साल्ली ..

और खट्टी मीठी भी मेरे साथ पीछे पद गयी तो वो मान गयी और उन्होंने घोषणा कर दी

" अरे यार ..सुन छोटों की जिद्द ...तो चल गुड्डी की ये जिद्द मान लेते हैं जानतेहैं हम सब के मर्दों से गुड्डी को मरवाना पडेगा लेकिन अगर ये कहती है तो ठीक है ..."

और फिर उसी रात ये तय हो गया की ..हम चार मौसेरी बहन में से जिसकी भी शादी पहले होगी उस के मर्द का ...हक़ बल्कि बाकी तीन बहनों का हक़ ...उस पे पूरा हक़ होगा ....

और तीनो उस के साथ पूरा खुल के मजे लेंगी ..उस की वाली के सामने और उसे चुप चाप सिर्फ देखना होगा


अब गुड्डी की बात का मतलब तो मैं अब समझ गया था लेकिन गुड्डी ने साफ साफ बताया ...जिस दिन वो मेरी शादी की बात सुनेंगी ...उस दिन गुड्डी की ऐसी की तैसी होगी लेकिन ....उससे ज्यादा मेरी ...

और मैंने अपनी खुशी का इजहार ...

गुड्डी के गांड पे सहलाती अपनी दूसरी ऊँगली को हचाक से उसकी गांड में एक बार में पूरा पेल कर की ...और अब दो उंगलिया गुड्डी की ताजा चुदी गांड में एक साथ ...कभी अन्दर बाहर ...तो कभी गोल गोल ...और

गुड्डी नेभी अपनी गांड मेरी ऊँगली पे कस के भींच कर अपनी खुशी का अहसास जताया . और मेरा गाल जोर से काट के बोली

"याद होनेवाली सालियों की है और उंगली मेरी कर रहे हो ..."

" एकदम सही ...जब साल्लिया मिलेंगी तो उनकी भी नहीं छोड़ने वाला मैं ...." मैंने अपना इरादा जताया और साथ में उसकी गांड में दोनों उंगलिया कैंची के फाल की तरह फैला दी .
वो हलकी सी चीखी और बोली ...

" मेरे बेसबरे बालम ...मैं कहाँ कहती हूँ उनकी छोडो ...मैं तो ये कहती हूँ की उनके भी चित्तौड़ गढ़ का उदघाटन तुम्ही करना ...लेकिन याद आरहे इ उसके पहले तुम्हे अपनी बहन कम छिनाल माल रंजी की भी गांड मारनी है और ...

वो भी सूखे ...नो वैसलीन नो जेल्ली ...नो तेल ...तेरा चूस के वो जितना चिकन कर दे बस वो हचक के मरना साल्ली की ...'
गुड्डी को चूम के मैंने कहा तेरा हुक्म टालने की हिम्मत है मेरी ...और उसकी गांड में दोनों ऊँगली एक बार फिर से कचाक से पेल दी .




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