Tuesday, July 7, 2015

FUN-MAZA-MASTI फागुन के दिन चार--177

  FUN-MAZA-MASTI

   फागुन के दिन चार--177




गुड्डी -रंजी


फिर कुछ देर बाद किसी तरह गुड्डी उठी और , रंजी की गांड फैला कर डिल्डो बाहर निकाला। मैंने भी दोनों हाथों से गांड फैलाकर उसकी मदद की।

मैं और रंजी लेकिन अभी भी उसी तरह गुथे पड़े रहे , अलसाये ,थके ,अगल बगल।

न उठने की उसे जल्दी ,न मुझे।

अबतक वो मेरे ऊपर थी लेकिन अब केलि क्रीड़ा केअंत में , एक दूसरे की बाँहों में अगल बगल पड़े , मैं उसके अंदर धंसा , वो मुझे बाँहों में भींचे उस 'आफ्टरग्लो ' का आनंद ले रहे थे जो शब्दातीत है।

रंजी की दीये ऐसी बड़ी बड़ी आँखे बंद थी ,जैसे इस सपने को उसने कैद कर रखा हो और पलक खोलते ही वो कपूर की तरह उड़ जाएगा।

जैसे अँधेरी रात में कोई बच्चा अपनी मुट्ठी में एक जुगनू को पकड़ के रखे और उसकी रोशनी बाहर छलछला रही हो।

कुछ देर बाद हलके से धीमे धीमे , मैंने उसे अपने नीचे किया और अब जब मैं उसके उपर था , मैंने सारे कुशन ,पिलो उसके चूतड़ के नीचे लगा दिया। लंड अभी भी उसकी चूत में जड़ तक फंसा था , जैसे रंजी की बाहें मुझे छोड़ने को तैयार नहीं थी वही हालत ,उसके मखमली योनि की थी ,जोर से भींचे हुए , दबोचे हुए।

रंजी को मैंने दुहरा कर रखा था , और अब धीमे धीमे अपने लिंग को बाहर खींचना शुरू किया ,

और ऐसा इसलिए की मेरी मेहनत की सारी कमाई ,सारी गाढ़ी मलाई उसके चूत के अंदर रहे।

क्योंकि उस से अच्छा चूत के लिए न कोई टॉनिक है न लुब्रिकेंट।

और अभी तो पूरी रात बाकी थी।

रंजी की चूत सफेद गाढ़ी थक्केदार रबड़ी से भरी थी ,एकदम ऊपर तक छलक रहा था।

और उसके दुहरे करने के बावजूद कुछ मलाई बहके नीचे उसके पिछवाड़े की सुरंग तक पहुँच गयी , जहाँ अभी गुड्डी ने दुर्दांत हमला किया था। जैसे कोई चोट पर मरहम लगाये , बस उसी तरह पिछवाड़े के छेद को वो राहत दे रहा था। गुड्डी ने और अपनी ऊँगली से उसे अंदर तक लगा दिया।

रंजी ने सुबह खिलते कमल की तरह अपनी आँखे खोली ,पहले मुझे देखा , मुस्कराई और फिर घडी को।

गालियों की बारिश चालू हो गयी , गुड्डी और मुझपर दोनों पर।

पूरी बाल्टी भर गालियां उसने मुझपर और गुड्डी पर उड़ेल दी।

गलती थी घडी रानी की और जैसे कहते हैं न ,

धोबी से पार न पावे गदहे का कान ऐठे बस उसी तरह , मिसेज टिक टिक की गलती की सजा मुझे और गुड्डी को मिल रही थी।

और मिसेज टिक टिक उसी तरह मुस्कराते टिक टिक करते चल रही थीं।

बात सिर्फ इतनी थी की रंजी का मॉडलिंग एजेंसी के डायटिशियन से इंटरएक्शन था , जिसमे अब सिर्फ १५ मिनट बचे थे।

और गुड्डी भी न ,उसने और आग में घी डाला।


" अरे जानू , पन्दरह मिनट बहुत होते हैं , इसमें तो एक राउंड क्विकी हो सकती है। "

" क्विकी की बच्ची तेरे सारे खानदान की ऐसी तैसी करुँगी अभी आने दो , लौटके " रंजी झुँझला के बोली बाथरूम में धंस ली।

लौट के पांच मिनट में निकली ,तो दूसरी क्राइसिस , उसके कपडे नहीं मिल रहे थे।

वो कुछ देर तक झुंझलाती रही फिर मेरी सफेद लांग शर्ट उठा के उसने पहन ली।

' चल यार बैठ के बात करेगी , और वैसे भी वो कोई लड़की है , नीचे कुछ नहीं पहनेगी तो भी चलेगा। " गुड्डी ने समझाया।

सिर्फ ८ मिनट बचे थे।

रंजी धड़धडाते , सीढ़ियों से नीचे उतरी लेकिन पांच छ सीढ़ियों तक उतर के फिर वापस लौट आई।


और झट्ट से गुड्डी के कान से चिपक गयी। और फिर न जाने क्या क्या , और एक बार वो मैडम टिक टिकी को भूल गयी थी ,मैंने याद दिलाया , सिर्फ पांच मिनट बचे है

लेकिन तभी भी चलने से पहले वो जोर से गुड्डी से बोली , तुझे तेरी मेरी दोनों की कसम , समझ लेना।

" अरे कमीनी जा न , बोला तो। पंद्रह मिनट का ही तो इंटरव्यू है जा। '

 लेकिन तभी भी चलने से पहले वो जोर से गुड्डी से बोली , तुझे तेरी मेरी दोनों की कसम , समझ लेना।

" अरे कमीनी जा न , बोला तो। पंद्रह मिनट का ही तो इंटरव्यू है जा। '



गुड्डी की ओर देखती , रंजी झट दौड़ती हुयी सीढ़ियों से नीचे भागी और मैंने गुड्डी से पुछा ,


" हे क्या बात हो रही थी?"

और तुरंत डांट पड़ गयी , " बहुत लड़कियों की बात सुनने का शौक है। मैं नहीं बताती। "

मेरी शर्ट तो मेरी गौरैया ले उड़ चली थी। मैं अपने बॉक्सर शार्ट में धंस लिया और गुड्डी ने भी अपना रैप बस ओढ़ , लपेट लिया।


……………।
तब तक गुड्डी के व्हाट्सऐप पे कुछ चमका , कुछ सुनगुन हुयी और सब कुछ भूल के गुड्डी व्हाट्सऐप में खो गयी।

" हे, किसका है ," मैंने सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए पूछा ?

बजाय सामान्य ज्ञान मिलने के डांट पड़ गयी ,

" किसी का हो तुमसे मतलब " वो बोली और हाथ से ज़ूम किया , और देखते ही उस पर हंसी का ऐसा दौरा पड़ा की पूछिये मत।

मेरी उत्सुकता और बढ़ गयी थी ,लेकिन दुबारा पूछने का मतलब दुहरी डांट।

मन मसोस कर बैठ गया , लेकिन कहते हैं न , बताने वाले से पूछने वाला बड़ा होता है।


गुड्डी के लिए कुछ छुपाना बड़ा मुश्किल है , वो बोल पड़ी।

" ये रीत भी न , इसका जवाब नहीं ,… "

"क्यों रीत का है न , " मैंने सवाल दाग दिया।

" हाँ तो , कोई जरूरी है मैं तुम्हे रीत की हर चीज दिखाऊं , गर्ल्स टाक " वो मुंह चिढ़ा के बोली।


" वो तो ठीक है , लेकिन बस एक झलक प्लीज। " मैंने निहोरा किया और वो थोड़ा पिघली।

" बस ज़रा सा दिखाउंगी , आधे मिनट के लिए लेकिन तुम कोई आइडिया मत ले लेना "गुड्डी ने टैब मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा ,


मेरे पास आइडिया है ही नहीं , मैं बोला और देखने लगा।

ये तो मुझे मालूम था की रीत और करन हजीरा पहुँच गए हैं जहाँ मीनल उनका वेट कर रही है।

बहुत मुश्किल था , आइडिया न लेना।



करन एक फोर पोस्टर बेड पे , और उसके दोनों हाथ कैंची की तरह क्रास करके , बेड के हेड पोस्ट से बंधे थे , लेसी सफेद साटिन की टीन ब्रेसियर , रीत की। और मीनल की पिंक ब्रेजियर से उसके पैर बंधे थे।

और इस तरह की वो हिल दुल डुल भी नहीं सकता था।

एक ओर मीनल और दूसरी ओर रीत।


मीनल इस तरह झुकी थी की उसके उरोज , करन के होंठों से बस इंच भर दूर ,

और रीत ने अपने लम्बे घने काले काले बालों के रस्से में उस खूंटे को मजबूती से बाँध रखा था।



मन तो मेरा बहुत हुआ की किसी जादू से टेलीपोर्ट होकर उस तस्वीर से सीधे रीत के पास पहुँच जाऊं ,

लेकिन ये हो नहीं सकता और मन मसोस कर रह गया।



आज रीत का मस्ती का दिन था। बल्कि दिन रात , और वो अपनी सहेली -छोटी बहन-करन की साली के साथ मिलकर , करन की ऐसी की तैसी करने में लगी थी।

और कितनी रातों के बाद , आज वो निश्चिन्त थी। कल कहीं उसे दुष्ट दमन करने नहीं जाना था।

और सबसे बढ़ कर , करन जिसे वो सोच रही थी , वो हमेशा के लिए खो चुकी है , एक बार फिर उसके पास था , उसकी बाहों में था , कभी उसके ऊपर कभी उसके नीचे।

बीते हुए कल की रात नेवी हॉस्पिटल आई एन एस अश्विन में गुजरी थी , सिर्फ आराम करते हुए ,इत्ते दिनों की थकान , तनाव मिटाते।

और उससे बढ़कर उससे पहले वाली रात ,

रीत के जीवन की सबसे खतरनाक रात थी वह , काली स्याह रात की चादर में डूबी अरब सागर के थपेड़ों पे लड़ना पड़ा था उसे , और फिर हर तरह के हथियारों से लैस उस आतंकी शिप पर भी , जो बॉम्बे हाई में न सिर्फ हमला बोलने वाला था , वहां पेट्रोलियम निकालने वाले शिप को हाइजैक करने के साथ , वो वहां पेट्रोल के भण्डार में ऐसी आग लगाता जो महीनो नहीं बुझती।

और किसी को शुरू में पता नहीं था की वो शिप कौन सा था ,

सिर्फ आधे घंटे पहले आनंद बाबू की खुफिया गणित ने सुराग दिया की , सोमालिया से सी जैक किया , एल एन जी से लदा वह शिप है जो मुंबई पर हमला करने वाला है।

और तब तक वह उतना नजदीक आ गया था की उसपर अटैक करना मुश्किल नहीं असंभव था। सिर्फ आयल प्लेटफार्म ही नहीं , आस पास का एरिया तेल के कुँओं से और पाइप लाइन से भरा है। तो अगर वो शिप दूर भी एक्सप्लोड हुआ , तो वो पाइप लाइन और वेल में आग पकड़ लेगी और फिर वो आग चारो और फैल जाएगी। इसलिए कुछ भी ऐसा नहीं कर सकते जिस से एल पी जी टैंक एक्सप्लोड हो। और कहीं से भी शिप को अटैक करेंगे तो टैंक एक्सप्लोड होने का चांस रहेगा। कुछ नहीं होगा तो वो खुद एक्सप्लोड करा देंगे। इसलिए अटैक की स्ट्रेटजी रूल्ड आउट हो गयी.

अब क्या करें ?

११. ०७ - अरब सागर,

अरब सागर गाढ़ी नीली स्याही के संगमरमर के रंग का लग रहा था।

चुपचाप , शांत , गंभीर।

थोड़ी देर पहले की मची उथल पुथल अब पूरी तरह शांत हो गयी थी। बीच बीच में कहीं कहीं डॉट्स की तरह शिप्स नजर आ रही थीं। आसमान शांत था। हलके हलके बादल कभी चांदनी को छिटका देते , कभी छिपा देते।



अरब सागर की लड़ाई



११. ०७ - अरब सागर,

अरब सागर गाढ़ी नीली स्याही के संगमरमर के रंग का लग रहा था। चुपचाप , शांत , गंभीर। थोड़ी देर पहले की मची उथल पुथल अब पूरी तरह शांत हो गयी थी। बीच बीच में कहीं कहीं डॉट्स की तरह शिप्स नजर आ रही थीं। आसमान शांत था। हलके हलके बादल कभी चांदनी को छिटका देते , कभी छिपा देते।

चार सी किंग हेलीकाप्टर ( एच सी 4 /वेस्टलैंड कमांडो ) अपनी पूरी स्पीड से उड़ रहे थे। उनकी अधिकतम गति करीब २०० किलोमीटर। शिप की लोकेशन तक पहुंचने में उन्हें करीब १५ -१८ मिनट इस गति से लगने वाले थे। आपरेशन के लिए कुल बीस मिनट की विंडो थी। और इसमें एक एक मिनट का समय सिंक्रोनाइज्ड होना जरुरी था।

हेलीकाप्टर में चार कमांडो बैटल फैटिग में थे। उनके चेहरे पर कैमोफ्लाज पेंट पुता हुआ था। नाइट विजन ग्लासेज , खुखरी , फ्लेयर्स , ग्रेनेड , स्पेशल एक्सप्लोसिव्स , पिस्टल और भी बहुत कुछ उनके ड्रेस का पार्ट था। चार में से तीन मार्कोस ( इण्डियन मरीन कमांडो ) के पार्ट थे।

चौथी रीत थी।


रीत वो रात कभी नहीं भूल सकती। ७२% रिस्क था उस आपरेशन में , लेकिन चारा भी क्या था।


साथ रीत की टीम शिप के वाल पे चढ़ चुकी थी। सब से आगे मार्कोस का लीडर था , जिसने नेवी सील्स के साथ एक साल ट्रेनिंग की थी , कई ऐक्चुअल एंटी टेरर आपस में भाग लिया था।

उस ने गैस मास्क लगा लिया और उस के साथ बाकी लोगों ने भी।

सबसे पहले उसने शिप के फ्लोर पर दो स्मोक बॉम्ब लुढ़का दिए और फिर पूरी ताकत से टियर गैस के कैनिस्टर फेंके।


जब तक स्मोक बाम्ब्स का धुँआ छा जाता , वो चारों शिप के अंदर थे।


रीत और उसका साथी जगह लोकेट कर रहे थे , तभी एक केबिन खुला और बिजली की तेजी से किसी ने रीत पर हमला किया।


हर कमांडो के चार आँखे चार कान होते हैं , लेकिन रीत के दस थे।

वो फुर्ती से पीछे हटी ,उसका घुटना अटैकर के पेट में और हाथ से कराते का चाप , गरदन पे।
और जब तक वो सम्हलता , रीत ने उसके माथे के पास एक नस दबा दी , जिससे उसके ब्रेन पे सीधे असर पड़ा और वो आधे घंटे से ज्यादा के लिए बेहोश हो गया।

लेकिन ये शुरुआत थी।

उसके बाद दो ने और हमला किया , एक साथ।

उन दोनों केहाथ में चाक़ू था।

और वो दोनों जुडो के एक्सपर्ट थे।


चाकू का पहला हमला गर्दन पर हुआ। रीत झुक गयी।

हमला बेकार होगया ,लेकिन उसकी कैप गिर गयी और उसके लम्बे बाल नीचे तक फैल गए।

" अरे ये तो लौंडिया है "

बस यही गलती हो गयी।

शब्द भेदी बाण कीतरह , रीत की शब्द भेदी देह थी।

बात पूरी नहीं हुयी और रीत की कोहनी और पैर दोनों एक साथ चले।

एक ही काफी था। उसके प्राण पखेरू उड़ाने के लिए।

रीत की आँखों में बार बार वो रात याद आ रही थी। लेकिन सबसे ज्यादा खतरा तब हुआ , जब वो एस्केप कर रहे थे।


रीत रस्सी पर चढ़ गयी थी और उस के ठीक पीछे , मार्कोस का लीडर।

उन्हें जल्दी से यह जगह खाली करनी थी।


तभी नीचे से मार्कोस के लीडर की चीख और चेतावनी सुनाई पड़ी।

कैप्टेन के बाद रिजक्यू किया हुआ आदमी रोप से चढ़ा था वो हेलीकाप्टर की विन्च पर से झुक कर रोप चाक़ू से काट रहा था।

चीख सुन कर , हेलीकाप्टर के कमांडो ने, पिस्टल के शॉट से उस आदमी को खत्म कर दिया।

रस्सी अभी भी झूल रही थी , लेकिन रीत मार्कोस लीडर के वजन से वह टूट गयी।


मार्कोस लीडर तो इन्फलेटबल बोट के जस्ट बाहर गिरा , और वापस बोट में चढ़ गया।

लेकिन रोप के झटके से रीत बोट से दो सौ मीटर दूर सीधे समुद्र में जा गिरी।


बस रीत को विश्वास था , काशी के कोतवाल उस की रक्षा कर रहे हैं तो उसका कौन कुछ बिगाड़ सकता है।

गहरा काला अरब सागर , अँधेरे में डूबा।

होली के अगले दिन का चाँद , बादलों से लुकाछिपी करते ... कुछ चांदनी कभी कभी बरसा देता।

दुर्दांत भयावह काल की तरह पास में वो विशाल काय टेरर शिप ,


और समुद्र की लहरों से लड़ती , थपेड़ों से जूझती , बिंदास बनारसी बाला ,



बहादुर ललना :

रीत


दुर्दांत भयावह काल की तरह पास में वो विशाल काय टेरर शिप ,


और समुद्र की लहरों से लड़ती , थपेड़ों से जूझती , बिंदास बनारसी बाला ,


सिर्फ एक लकड़ी के टुकड़े के सहारे।




तैरती ,समुद्र की ताकत अपनी बाहों से नापती , जूझती , रीत।

और तभी उसको एक इन्फेलटेबल बोट दिखी , वही जिससे पहले चार लोग हेलीकाप्टर में चढ़े थे।

किसी तरह वह उसमें चढ़ी ,

और एक पल केलिए उसने गहरी सांस ली।

और हेलीकाप्टर उसके बोट के ठीक ऊपर आकर रुका , विन्च नीचे आगयी थी और रोप लहरा रही थी।


उम्मीद की आखिरी किरण की तरह ,

उछल कर उसने रोप पकड़ ली।

रोप मार्कोस के लीडर कंट्रोल कर रहे थे।

बिना नीचे देखे वो दोनों हाथों थे रस्सी पकड़ , हेलीकाप्टर में पहुँच गयी।

और जैसे ही वो अंदर घुस रही थी , उसने नीचे देखा।

सी बहुत चापी हो गया था।

वह जिस बोट पर थी , समुद्र की लहरों पर गेंद कीतरह उछल रही थी।


शिप उसी तरह था।


मार्कोस कमांडर ने बताया की उन्हें नेवल कंटोल ने बोला है की वो यहीं आधे घंटे तक और रहेंगे , और जब तक शिप पूरी तरह सिंक नहीं कर जाता उसे ऑब्जर्व करेंगे। कम्प्लीट सिंक होने के पन्दरह मिनट बाद ही वह वहां से निकलेंगे।

और तब तक वो शिप के ओरिजिनल कैप्टेन को डी ब्रीफ करेंगे।

रीत उनकी बात सुन रही थी लेकिन उसकी निगाह नीचे शिप से चिपकी थी।

अब वह काफी तिरछा हो गया था.

पहला आयल वेल अभी भी , शिप से ५०० मीटर दूर था।
...


वह रात एक दुःस्वपन की तरह थी , लेकिन अब वह रात उन आतंकियों के लिए दुःस्वप्न बन गयी थी।

चोट उसे आई थी लेकिन ज्यादा नहीं। लेकिन उसे उसी रात नेवी के हॉस्पिटल में पहुंचा दिया गया था।

और वह रात और दिन भर वो सिर्फ सोती रही ,लेटी रही। कुछ दवाएं कुछ केयर जब वह आज सुबह वहां से करन के साथ हजीरा के लिए निकली तो एकदम फ्रेश ताजा दम।
काशी के कोतवाल और दसों महाविद्याओं का आशीर्वाद ,

उस पर किया हुआ हर वार बेकार होना था। उस पर कोई चोट नहीं कर सकता था ,

लेकिन वो जिसपर चाहे उसपर चोट कर रही थी , और आज उसकी चोट का शिकार था , करन। 
 
अँखियों से गोली मारे ,जोबना से तीर से ,

और इस हमले में उसके साथ थी मीनल , उसकी मुँहबोली छोटी बहन और करन की साली।

मीनल ने तो पहली मुलाकात में करन की ऐसी की तैसी कर दी थी , बड़ौदा में जब वो महाराजा एक्सप्रेस से पहुंचे थे , उदयपुर से तब। वो ट्रेन में ही आई थी।

रीत को एक एक सीन याद है ,

दरवाजा खोलकर मीनल दाखिल हुयी। आज वो चोली साड़ी में थी और गजब लग रही थी। छोटी सी चोली, कच्छी कढ़ाई, आलमोस्ट बैकलेस और आगे से डीप लो कट, पुश अप बहुत छोटी सी। उसके 34सी पुष्ट सीने को उभारती ज्यादा छुपाती कम। और छोटी इतनी की पूरा गोरा पेट पेट साफ दिख रहा था। कमर इतनी पतली की मुट्ठी में समा जाए और इस पतली कमर पे जोबन और गद्दर लग रहे थे। साड़ी उसने कूल्हों के भी नीचे बाँध रखी थी। भरे हुए नितम्ब साफ दिख रहे थे।
करन का मुँह खुला रह गया।


“साली का नाम लिया… साली हाजिर…” हँसते हुए रीत बोली और इंट्रो कराया- “मीनल मेरी छोटी बहन तुम्हारी साली। और ये करन तेरे जीजू…”


मीनल और रीत का इंट्रो आनंद ने करा दिया था। फिर तो फेसबुक, जी टाक और स्काइप। कब वो पक्की दोस्त बनी और कब मीनल ने रीत दी मान लिया और रीत ने उसे अपनी प्यारी बहन। पता नहीं। लेकिन अब दोनों दूध पानी की तरह मिल चुकी थीं।
मीनल भी करन की ओर देख रही थी। करन ने नमस्ते के लिए हाथ उठाया और मीनल ने मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया।
और रीत ने दिया- “क्या… साली, जीजू न हाथ मिलाते हैं और न नमस्ते वमस्ते…”

“मालूम है…” खिलखिलाते हुए मीनल ने बात पूरी की और करन को अपने बाँहों में लेते हुए बात पूरी की- “जीजू से गले मिलते हैं और ये तो मेरे एकलौते जीजू हैं…”

करन पहले तो कुछ सकपकाया फिर उसने भी मीनल को बाँहों में बांध लिया, उसके जवानी के फूलों को…
मीनल जानती थी, करन को क्या पसन्द होगा। जब से वो आयी चोरी छुपे करन की निगाहें वहीं तो सहला रही थीं। और फिर हर लड़का तो उसके जवानी के फूलों का दीवाना था। मीनल ने शरारत से अपने उभरे गदराये लो कट चोली से झांकते मुश्कुराते उभार जोर से करन के सीने में गड़ा दिये और अपने बाँहों के बंधन भी जोर से भींच लिए। और जो हुआ उसका मीनल को अंदाज भी नहीं था।
करन का एक बित्ते का मोटा खूंटा जीन्स को फाड़ता सीधे मीनल की जांघों के बीच, रामप्यारी पे धक्का मार रहा था। मुश्कुराकर मीनल ने रीत की ओर देखा, दोनों ने एक दूसरे से आँखों ही आँखों में हाई फाइव किया। और रीत ने इशारा किया- लगी रह यार तू छोटी बहन है मेरी तेरा तो हक़ बनता है।

“हे कैसे जीजू हो… सुबह से साली साली का पहाड़ा रट रहे थे। अब आयी है तो कम से कम एक किस्सी तो ले लिए होते…” रीत ने करन को चिढ़ाया और पैकेट लेकर बाथरूम में कपड़े बदलने चली गयी।
लेकिन जवाब मीनल ने दिया। हंस कर- “अरे दी सिर्फ किस्सी… मेरे एकलौते जीजू है…”
“तुम दोनों जो चाहे लेन देन करो। जीजा साल्ली के बीच में मैं नहीं बोलने वाली…” रीत मुश्कुरा के चेंज करने चली गयी

और जब वो लौटी तो लेन देन तो नहीं हो रही थी। हाँ जीजा साली एकदम चिपक के बैठे कबूतर की तरह गुटरगूं कर रहे थे। हाँ मीनल का आँचल ढलका हुआ था और उसका एक उभार एकदम खुला था और दूसरा भी बस लुका छिपी कर रहा था। और करन के नदीदे हाथ भी मीनल के कंधे पे थे और उंगलियां उसके डीप लो कट बैकलेस चोली से खुल कर झांकते उरोज हलके से सहला रहे थे। रीत को देख के ना तो मीनल ने आँचल ठीक किया ना करन ने उरोजों से ऊँगली हटाई।

उसने मीनल को टोका- “हे सुन एक पेयर टाप जींस तू ले आयी है ना, एक्स्ट्रा… तू भी पहन ले। वहाँ साड़ी में…”
और उसकी बात काटके करन- “और क्या तुम दोनों की नाप एक ही है। जोर से खिलखिला के…”
मीनल और रीत जोर से खिलखिला के हंसी।
रीत ने चिढ़ाया- “अच्छा, तो तुम मीनल की भी नाप ले चुके। तभी कह रहे हो हम दोनों की नाप एक ही है…”
करन झेंप गया फिर मीनल की ओर देखते हुए बात बना के बोला- “अरे नहीं मैं तो निगाहों से ही नाप ले लेता हूँ…”
फिर दोनों हंसी। दो लड़कियों से एक साथ पार पाना आसान नहीं। अबकी मीनल ने तीर चलाया- “लगता है बचपन से ही अपनी माँ बहनों की नापते रहे हैं, दीदी। इसलिए पक्की प्रैक्टिस हो गयी है…”
लेकिन उसके तरकश में तीर ख़तम नहीं हुए थे। आखिर रीत की छोटी बहन थी। झुक के अपनी गोलाइयों का जादू चलाते हुए बोली- “अरे जीजू… आप भी… नाप लीजिये ना… फिर शाम को ले चलूंगी आपको माल में, ड्रेसेज खरिदवाने…”
बेचारा करन सकपका गया। और मीनल उठ के जींस टाप ले के चेंज करने के लिए जाने लगी। तो करन को शरारत सूझी।
उसने मीनल को छेड़ा- “अरे साल्ली जी। जीजू से क्या शरम। यहीं चेंज कर लीजिये ना…”
मीनल कौन पीछे रहने थी ठहर गयी और बोली- “अरे जीजू आप लजा के बीर बहुटी हो रहे थे इसलिए मैं जा रही थी। चलिये यहीं चेंज कर लेती हूँ…”
करन ने थोड़ी और हिम्मत जुटाई- “और चढ्ढी बनियाइन भी…”
वो बोली- “जीजू आप क्या हलकी फुल्की शर्त लगाते हैं। चलिए ये चढ्ढी बनयान मैं आपको गिफ्ट कर देती हूँ। हाँ इसके बदले में शाम को नयी लेनी होगी…” मीनल मुश्कुराते हुए बोली और साड़ी घुमा के उसने उतार उतार दी और फेंका तो सीधे करन के ऊपर।
करन शर्मा गया और… रीत और मीनल एक बार फिर फुलझड़ी हो गयीं- ““जीजू के ऊपर साड़ी कित्ति अच्छी लग रही है…” मीनल ने चिढ़ाया।

करन और शर्मा गया। लेकिन उसका मुस्टंडा, बित्ते भर का, सर उठाये खड़ा रहा, एकदम बेशर्मी से। मीनल ने अब मुस्टंडे को देखा, पैंट में तम्बू बनाये और उसे देखते रीत ने मीनल को देखा और उसके कान में कुछ फुसफुसाया।
सिर्फ चोली साये में, मीनल के गद्दर जोबन न सिर्फ बेकाबू हो रहे थे, बल्कि उसकी पतली कमर पान सा चिकना पेट। और मीनल ने एक जान मारु अंगड़ाई ली और थोड़ा झुकी। लो कट चोली से बस उसके मस्त किशोर गोरे गोरे उभार छलक के बाहर हो रहे थे। जैसे दो कबूतर उड़ने को बेचैन हो रहे हों।


और करन और बेकाबू हो गया। लग रहा था अब उसका मुस्टंडा जींस फाड़ के ही दम लेगा।
रीत ने मीनल को कुछ इशारा और मीनल नागिन सी बलखाती, इठलाती, मचलती, करन के पास गयी और सीधे उसके गोद में बैठ गयी। उसकी ओर पीठ करके बिना साड़ी बैकलेस चोली में गोरी मक्खन सी चिकनी पीठ पूरी तरह खुली थी। सिर्फ एक पतली सी स्ट्रिंग में चोली बंधी थी। यही नहीं मीनल इस तरह बैठी की उसके भारी नितम्ब सीधे तने खड़े मुस्टंडे पे पड़ें। और जोर से अपने चूतड़ उस पे रगड़ दिए और अपनी पतली गर्दन घुमा के, अदा से करन से चोली के बन्ध की ओर इशारा करके बोली- “जीजू आप ही खोल दो न इसे…”

बस बिजली नहीं गिरी।

करन ने चोली के बंध खोल दिए। लेकिन चतुर चालाक मीनल ने दोनों हाथों से चोली को सम्हाले रखा। और उठते समय जैसे सहारा ले रही हो। जोर से अपने कोमल कमल से हाथों से, जोर से उस ‘मुस्टण्डे’ को मसल दिया और रीत के पास आके खड़ी हो गयी।

करन का गला सूख रहा था। मीनल अभी भी दोनों हाथों से चोली पकड़े खड़ी थी। करन कुछ बोलता उसके पहले उसने उसे एक फ्लाइंग किस दी और चोली उसकी ओर उछाल दी। वो सीधे मुस्टंडे के ऊपर जा पड़ी। अब मीनल सिर्फ ब्रा और साये में थी। और ब्रा भी आलमोस्ट शियर… लेसी और हाफ कप बस उसके उभारों को सपोर्ट करते। सिर्फ कबूतर ही नहीं बल्कि उनकी लाल गुलाबी चोंच भी साफ दिख रही थी।

अब करन की आवाज खुली- मीनल… खोल दो, खोल दो।

मीनल ने एक खूब मीठी सी मुस्कान दी और मुड़ गयी। ब्रा फ्रंट ओपन थी। ब्रा खोलते हुए उसने रीत से कहा- “दीदी अब ये जहाँ पड़ेगी, वो चीज मेरी हो जायेगी…” एकदम हंसती हुयी रीत बोली।

करन की ओर पीठ किये हुए ही। मीनल ने अपनी फ्रंट ओपन लेसी पिंक ब्रा खोली और जैसे कोई आँख पे पट्टी बाँध के शब्दबेधी बाण चलाये। उसने ब्रा उछाल दी।
मीनल का निशाना एकदम अचूक। सीधे मुस्टंडे पे… ब्रा गिरी और मीनल ने अपना टाप पहन लिया। और करन की ओर मुड़ गयी।
“हे बेईमानी… पैंटी…” करन चिल्लाया।
सबसे ज्यादा जीजा साली का खेल तमाशा देखकर रीत खुश हो रही थी। कित्ते दिनों बाद।

मीनल मुश्कुरायी- “जीजू सिर्फ पैंटी…”

रीत ने करन को उकसाया- “अरे साली बोल रही है। मांग लो ना पैंटी के अंदर वाली चीज। गुलाबी बुलबुल…”

करन अभी भी झेंप रहा था और मीनल उसे और चिढ़ा रही थी। उसने साया घुटनों तक उठा दिया। उसकी गोरी पिंडलिया, लम्बी सुन्दर टांगे, स्वर्ग की नसेनी की तरह। ललचा रही थी बुला रही थी। पर्दा थोड़ा और ऊपर उठा। गोरी चिकनी मांसल जांघे।

करन की सांस रुकी हुयी थी।

और तब मुश्कुरा के मीनल ने अपने साये में झुक के हाथ डाला। जैसे जादूगर हैट में हाथ डालता है खरगोश निकालने के लिए। बजाय खरगोश के सिल्कन गुलाबी पैंटी निकली। और इस बार… वो सीधे करन के चेहरे पे। और जब तक करन कुछ समझता बोलता। स्किन टाइट जींस साये के अंदर… मीनल ने पहन ली और फिर साये का नाड़ा खोल के, वो भी करन के ऊपर।

“ये बेईमानी है…” करन जोर से चिल्लाया। असली चीज तो वो देखने से रह ही गया।


“एकदम नहीं…” रीत ने अम्पायर की तरह मीनल की ओर से फैसला सुनाया- “मेरी छोटी बहन ने, जो तुमने कहा वो किया। तुम्हारे सामने चेंज किया और ब्रा पैंटी भी तुम्हें दे दी…”
मीनल हँसते हुए करन के बगल में जा बैठी और उसे गुदगुदी करने लगी। फिर बोली- “अरे जीजू… कुछ चाहिए तो मांग लो। आज होली के दिन ये साल्ली मना नहीं करेगी…”

रीत भी पास में बैठ के बोली- “करन मौका बढ़िया है मेरी ओर से खुली छूट। और कैसे जीजू हो साली से मांगते थोड़ी हैं उसकी तो बस… ले लेते हैं…”
“एकदम दीदी… लगता है जीजू को साली पसंद नहीं आयी। क्यूँ जीजू…” उसके गले में हाथ डाल की मीनल बोली।

करन मुश्कुरा दिया और मीनल को गले लगाते बोला- “पसंद तो बहुत आयी। बस रंग गुलाल नहीं है वरना। तुम्हें होली के रंग आज दिखा देता…”
रीत ने फिर ललकारा- “कैसे बनारस वाले हो अरे… भूल गए बनारस में जीजा साल्ली की होली कैसे होती है…”


करन को अच्छी तरह याद था था पर अभी भी मीनल से वो कुछ झेंप रहा था। लेकिन मीनल झेंपने वाली नहीं थी। आखिर रीत की छोटी बहन जो थी।
वो बोली- “अरे दीदी… आप ही याद दिला दो न इन्हें। वरना इनके भरोसे तो…”
रीत चालू हो गयी- “अरे साल्ली के गाल करो लाल, चूम के चूस के, चूची करो लाल रगड़ के काट के…”
करन ने बीच में रोकने की कोशीश की तो मीनल ने ही रीत को उकसाया- “अरे नहीं दी सुना दो पूरा… वरना ये कहेंगे की आखिरी दरवाजा तोड़ने के समय सो गये थे…”
“अरे साली की चूत लाल करो चोद चोद के…” रीत ने बनारस की जीजा साली की रीत पूरी बतायी।



पहल साली ने ही की होली की। अपने रसीले दहकते होंठ जीजू के गाल पे रगड़ के, लिपस्टिक के रंग से होली खेल के। और फिर जीजा साली की होली चालू हो गयी। एकदम बनारसी स्टाइल।
मीनल के होंठ लाल हुए, फिर टाप उठा और अब तो ब्रा का कवच भी नहीं था। इत्ते देर से उसके किशोर उरोज… करन को ललचा रहे थे, उकसा रहे थे। अब उन्हें पता चला किससे पाला पड़ा था। पहले पहले तो करन के हाथ थोड़े झिझक रहे थे लेकिन आग में घी डाला रीत और फिर मीनल ने।

रीत बोली- “कैसे हलके से दबा रहे हो लगता है साल्ली नहीं बहन है…”

“अरे नहीं दी… उनके तो खूब जम के दबाते होंगे। आखिर बचपन से प्रैक्टिस तो उन्हीं के साथ की होगी…” मीनल ने छेड़ा।

फिर तो करन चालू हो गया। कभी मीनल के मस्त उभारों को चूमता कभी चूसता। तो कभी छोटे छोटे निपल काट लेता।


रीत कभी मीनल की ओर हो जाती तो कभी करन की तरफ।
और मीनल भी अच्छी तरह से उसकी मोटी पिचकारी की नाप जोख कर रही थी। लेकिन होली बिलो द बेल्ट पहुंचे। उसके पहले एक हादसा हो गया।



बुरा हो ग्राहम बेल का जिन्होंने टेलीफोन की खोज की।
दो टेलीफोन एक साथ घनघनाये।


एक करन का मोबाइल और दूसरा। केबिन का इंटरकाम
मोबाइल पे पुलिस कमिश्नर थे। आधे घंटे में वो गुजरात रिफायनरी पहुंचने वाले थे। वहाँ उनके साथ साथ डिफेंस के एक्सपर्ट, बाम्ब डिस्पोजल के लोग और बाकी अफसर भी होंगे। उन्होंने करन से बोला था की वो भी वहीं पहुँच जाए।


तो असली काम बचा रह गया ,साली का भरतपुर लूटने का।

लेकिन मीनल ने वायदा लिया था , मुम्बई से बनारस जाने के पहले वो लोग उसके पास आएंगे और एक दिन रात उसके साथ। 

  


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