FUN-MAZA-MASTI
जल्दी कर ले नहीं तो माँ आ जायेगी--1
सबसे पहले आपको आज से १२-१३ साल पहले लिये चलता हूँ , उस समय मै दसवीं का एक्जाम देने वाला था | घर में केवल मै और मेरी माँ (कमला) रहती थी जिसकी उम्र उस समय ३९-४० साल थी | पापा का देहांत तक़रीबन १० वर्ष पहले हो चूका था ( वो कालेज में लेक्चरार थे ) | चूँकि मेरी माँ भी ग्रेजुएट थी इसलिए पापा के कालेज में ही पापा की जगह माँ को लेखा विभाग में नौकरी लग गयी | हम पांच भाई- बहन है | बड़ी बहन 'विभा' जो उस समय २४ साल की थी, जीजाजी के साथ दिल्ली में रहती थी | जीजाजी एक मल्टीनेशनल कम्पनी में उच्च पद पर कार्यरत थे |उनकी एक बेटी भी है जो ६ साल की थी | भैया उस समय २२ साल के थे और भाभी के साथ भोपाल में रहते थे | भैया से छोटी शोभा दीदी है जो उस समय २० साल की थी और जीजाजी के साथ कानपुर में रहती है| उनका कोई बच्चा नहीं था |छोटे जीजाजी, शोभा दीदी से तक़रीबन १० साल बड़े है, लेकिन माँ-बाप के इकलोते है और परिवार बहुत समृद्ध है| सबसे छोटी आभा दीदी उस समय १७ साल की थी और १२वी की टेस्ट देने वाली थी | चूँकि भाभी को बच्चा हने वाला था इसलिए आभा दीदी भैया-भाभी के साथ भोपाल में रह रही थी |
मै पढने में काफी तेज था और दसवीं में काफी अच्छे नम्बरों से पास होने की उम्मीद कर रहा था, वही पड़ोस में एक मोहल्ले की रिश्ते की बुआ पिछले २ साल से दसवी में फेल हो रही थी |तभी उसकी माँ, मेरी माँ के पास आकर बोली -बहु , जरा राजन को कहो ना क़ि वो श्यामली (बुआ का नाम ) को शाम को एक घंटा पढ़ा दे, पास कर जाएगी तो इस साल इसकी शादी कर देंगे | चूँकि परीक्षा में केवल तीन -चार महीने रह गए थे इसलिए मै बहुत आनाकानी के बाद शाम को बुआ के पास जाने लगा | दो - तीन दिन में ही मुझे पता चल गया क़ि वो दिमाग से पैदल है और दुसरे उसे बाते बनाने में बहुत मजा आता था | वो हमेशा कैजुअल ड्रेस में रहती जैसे नाइटी| गणित के सवाल में बुआ सामने से इतना झुक जाती क़ि आधे से अधिक मम्मे की गोलाइयों के दर्शन हो जाते| इतने में ही मेरा हलक सूखने लगता और पेट में गैस के गोले उठने लगते | उस समय घर में कोई नहीं होता था -उनका भाई यानि मेरे चाचाजी दूकान पर रहते और रात के दस बजे ही लौटते, उनकी भाभी प्रिगनेंट थी और मैके गयी थी और माँ शाम को मंदिर चली जाती | बुआ धीरे- धीरे मुझे सिड्यूस कर रही थी |
एक दिन जब मै बुआ के घर गया तो कमरे में घुसते ही सन्न रह गया | बुआ घाघरा और एक ढीली ढली टी- शर्ट पहने कुर्सी पर बैठी थी, बल्कि यूँ कहिये की वो अधलेटी थी | सर पर चुन्नी बाँध रखा था, पैर बिस्तर पर मोड़ कर अधलेटी थी | घाघरा जांघो को घुटनों तक ऊपर से तो ढका हुआ था पर नीचे से बिस्तर के सामने से पूरी नंगी दुधिया जांघे चमक रही थी ,बस जांघो के जोड़ के पास क्रीम कलर की मुड़ी पैंटी मदमस्त गदराई जवानी को ढके हुए थी, जिसे देखकर मेरा दिमाग सनसना रहा था | तभी मेरे मुह से निकल गया - क्या हुआ बुआ ? बुआ ने अपनी आँखे खोली और पैरो को नीचे करते हुए कमजोर आवाज में बोली - आ गए तुम ! देख न , मेरा पूरा शरीर दर्द कर रहा है और सर में भी बहुत तेज दर्द है | शो ख़त्म होने से निराश मै बोला - आज पढाई तो होगी नहीं , मै चलता हूँ|
बुआ : थोड़ी देर बैठ न , माँ कीर्तन में गयी हुई है २ घंटे से पहले नहीं आएगी , मै अकेली बोर हो जायूँगी | तू थोडा मेरी हेल्प कर और मेरे सर में बाम मल दे , वहाँ खिड़की पर बाम रखा है |
मै बाम लेकर बुआ के माथे पर धीरे-धीरे बाम मलने लगा , फिर बुआ ने दोनों कनपट्टी के पास हौले -हौले दबाने को कहा | मै कुर्सी के पीछे आकर दोनों अंगुठे से हलके-हलके कनपट्टी को दबाने लगा , इस क्रम में मेरी हथेली और उंगलियाँ बुआ के गालो को छु रही थी और कुर्सी के पीछे से गदराई चूचियो के नज़ारे मेरे अन्दर एक बिलकुल अनजान एवं नवीन उत्तेजना का संचार कर रहे थे और रोमांच से मेरा हाथ काँप रहे थे |
तभी बुआ ने कहा- राजन एक काम करेगा
मैंने पूछा- क्या बुआ ?
बुआ बोली - मेरे पुरे शारीर में दर्द हो रहा है , तू पैर और पीठ दबा देगा और इससे पहले मै कुछ जबाब देता वो पेट के बल जाकर बिस्तर पर लेट गयी | मै धड़कते दिल से जाकर अपना हाथ बुआ के पैरो पर घुटनों और टखनो के बीच मांसल हिस्से पर रखा | वहां हाथ रखते ही शारीर झनझना उठा , लगा जैसे बिजली के नंगे तारो को छु लिया , मैंने अपनी जिन्दगी में ऐसा चिकना , मुलाएम और गुदाज चीज को नहीं छुआ था | अब मै बुआ के पैरो को नीचे से जांघो तक दबाने लगा | अनुभवहीन होते हुए भी मानवीय प्रकृति मेरा मार्गदर्शन कर रही थी और मेरी कोशिश ये थी कि घाघरे को क्रमशः शरकाकर चुतरों के ऊपर कर दिया जाय |घाघरा धीरे-धीरे ऊपर शरक रहा था और मेरा हाथ जांघो कि गहराई नाप रहा था, तभी पैंटी कि झलक मिली और मेरी सांस भारी होने लगी | चूँकि बुआ थोडा भी बिरोध नहीं कर रही थी इसलिए मेरा साहस बढ़ रहा था | अब मैंने घाघरा रूपी दीवार को ख़त्म करने का निर्णय लिया और जांघो से पीठ कि तरफ बढ़ना शुरू किया | जैसे ही मेरा हाथ चुतरों पर पंहुचा मैंने उसे हलके से दबाया तो बुआ के मुंह से हल्की सिसकी निकल पड़ी | हाथ पीठ तक ले जाकर घाघरे को कमर के ऊपर कर दिया और फिर सीधा वापस जांघो पर आकर दबाना - सहलाना शुरू कर दिया | अब मै केवल जांघो के जोड़ो को और चुतरों को दबा रहा था , बीच - बीच में चुतरों कि दरारों में भी उँगलियाँ चला देता | तभी बुआ पलट गयी , अब वो पीठ के बल लेटी थी , आँखे बंद थी और गहरी साँसे ले रही थी |मैंने एक बार बुआ के चेहरे कि तरफ देखा और फिर अपना ध्यान अस्त-व्यस्त पैंटी से ढकी हुई पुए जैसी फूली हुई बुर कि तरफ केन्द्रित कर दिया |मैंने पैंटी के ऊपर से अपनी हथेली से बुआ के बुर को सहलाया, बुआ सिसकी .. | पूरी पैंटी भींगी हुई थी , पहले तो मै पूछना चाहा कि बुआ आपने थोडा मूत दिया है क्या ? फिर खुद ही मैंने प्रेम के अन्तरंग क्षणों में कुछ बोलना ठीक नहीं समझा | मै अहिस्ते -अहिस्ते सहलाता रहा , बुआ हौले -हौले सिसकती रही | तभी मैंने जोर से बुर को पूरी हथेली में भरकर दबाया और बुर के ऊपर से पैंटी को बगल में खिसकाकर अपनी एक ऊँगली बुर में घुसा दिया | बुआ चींखकर आधी उठ के बैठ गयी और मेरा दाहिना हाथ , जिसकी ऊँगली बुर के अन्दर थी , अपने बाएं हाथ से पकड़ लिया |वो मेरा हाथ हटा भी नहीं रही थी , उसकी आँखे नशीली , मुह खुला हुआ और होंट सूखे थे |कुछ देर तक वो मुझे ऐसे ही देखती रही और अचानक मेरे गले में बाहें डालकर मेरे होटों पर अपने होंट रखकर मुझे चूमने लगी | फिर मुझे अपने ऊपर गिरा कर खुद लेट गयी | उसकी दोनों टांगों के बीच मेरा कमर था जिसके ऊपर उसने अपनी टांगो को उठाकर मेरे पैरो के इर्द-गिर्द लपेट रखा था | ऐसे में मेरा लंड जो पहले ही वासना में फुफकार रहा था , अपनी पहली सखी 'बुआ की बुर' को इतना नजदीक पाकर मचलने लगा और कपड़ो के अन्दर से ही उसे अपनी कठोरता का एहसास दिलाने हेतु हल्की-हल्की थपकी देने लगा | बुआ की बांहों का घेरा मेरी पीठ पर कस रहा था और नरम चुंचियां मेरे सीने से रगड़ खा रही थी | हम दोनों एक - दुसरे के होंटों को चूसने लगे | मैंने अपने दोनों हाथो से उसकी दोनों चुंचियो को भींच रहा था और बीच - बीच में निप्पल को चुटकी से मसल देता , वो कसमसा रही थी
अब बुआ ने मुझे अपने ऊपर से गिराकर बगल में लिटा लिया और अपनाहाथ नीचे ले जाकर मेरे लंड को कपड़ो के ऊपर से सहलाने लगी और फुसफुसाई - राजन जल्दी कर ले नहीं तो माँ आ जायेगी | मैंने भी उनकी पैंटी को खीचकर पैरो से बाहर निकाल दिया | अब बुआ बिलकुल नंगी थी और मैं बुआ के चिकनी बुर को अपनी हथेली से सहला रहा था , फिर बुआ ने मेरा पाजामा ढीला कर मेरे लंड को बाहर निकाल लिया | लंड बाहर आते ही बुआ बिलकुल चौंक गयी और कूदकर बिस्तर से उतरकर खड़ी हो गयी और अपने मुह को हथेली से ढकती हुई बोली - हाय राम इतना बड़ा !! तुम आदमी हो ? तुम तो जानवर लगते हो | मैंने घबराते हुआ पूछा -क्या हुआ बुआ ? बुआ बोली इतना बड़ा लंड कहीं आदमी का होता है | मौका हाथ से निकलते देख मैंने समझाते हुए कहा - बुआ सबका इतना बड़ा ही होता है , आपने कौन सा किसी का देखा है | बुआ बोली - नहीं मैंने कई लोगो का देखा है खिड़की से बाहर सड़क पर पेशाब करते हुए , बाप रे तुम्हारा कितना मोटा और बड़ा है मेरी तो फट ही जायेगी | (मै मन ही मन सोचने लगा कहीं सचमुच कुछ गड़बड़, कोई बिमारी तो नहीं है , बचपन में जब आम के बगीचे में अपने दोस्तों के साथ जाता था तो सुसु करते समय उनका नूनी देखा करता था , उन सब से उस समय भी मेरा दूना था और सब मुझे गधा कहकर चिढाते थे , उसके बाद बड़े होने पर किसी के साथ तुलना करने का मौक़ा ही नहीं मिला, न ही अपना खुद कभी नापा ) फिर मैंने बुआ से प्रत्यक्ष बोला - कुछ नहीं होगा बुआ , सरसों तेल लगा के करूँगा देखना तुम्हे पता भी नहीं चलेगा | बुआ थोडा शांत होते हुए बोली -अब इस अबस्था में सरसों तेल लाने किचेन में कौन जाएगा , वहां ड्रेसिंग टेबल पर नारियल तेल है वही लगा लो | फिर मैंने नारियल तेल लगा कर लंड को चिकना कर लिया | बुआ टाँगे फैला कर लेट गयी और अपने प्रथम मर्दन का आँखे मूंदकर इन्तजार करने लगी |
मैंने लंड को बुर के छेद पर टिकाकर जोर लगाने लगा लेकिन हर बार असफल हो जाता | अब इसे मेरा अनारीपन कहिये या नारियल तेल की चिकनाई का कमाल या कुवांरी चूत के कपोतो का कड़कपन , मै चूत के अन्दर घुस ही नहीं पा रहा था | जिस सुरंग को पैंटी के अन्दर भी उँगलियों ने एक झटके में ही ढूंढ़ निकाला था उसी सहचरी सुरंग में मेरा लंड उसे देखकर भी नहीं घुस पा रहा था | कुवांरी चूत चोदने में कितना जोर लगता है पहली बार महसूस कर रहा था | फिर बुआ ने अपने हाथो से लंड को पकरकर एक जगह रखा और मुझे पेलने के लिए कहा | मैंने पूरा जोर लगाया ,लंड का सुपाड़ा चूत के कपोतो को चीरता हुआ अन्दर घुसा , बुआ चींखी .., पहले मैंने बुआ के मुह पर हाथ रखा और पेलना रोक लिया और बोला - चीखकर लोगो को इक्कठा करेगी क्या | फिर मैंने धीरे -धीरे एक चौथाई लंड बुर में घुसा दिया और उतने हिस्से को आगे पीछे करके चोदने लगा | बुआ सिसकने लगी .... फिर मैंने एक जोर का झटका मारा ... मेरा आधा लंड बुर की गहराई नापने लगा | बुआ फिर चीखकर दोहरी हो गयी और मुझे धक्का देकर गिरा दिया | चूत खून से सन गया था और खून की कुछ बुँदे मेरे लंड पर भी चमक रही थी | बुआ रोने लगी -हे भगवान् ! साले ने फाड़ दिया मेरी बुर को .. जानवर कहीं का | मैंने प्यार से पुचकारना चाहा वो मेरी तरफ गुस्से से देखी और एक कपड़ा लेकर अपनी बुर पर रखकर दबाने लगी | फिर उठकर फटाफट कपडे पहनकर बाथरूम में भाग गयी | मैंने भी अपने कपडे पहने और अपनी जल्दबाजी को कोसता हुआ अपने घर चला आया |
घर पर रात में मुझे लंड में काफी जलन महसूस हुआ , अगले दिन नहाते समय देखा की मेरा लंड कई जगह से छिल गया है और सुपाडे के ऊपर की चमड़ी भी ज्योइंट से कट गया है | दो दिन लगे उसे ठीक होने में | तीसरे दिन जब मै बुआ के घर शाम को गया तो उसकी माँ घर पर ही थी और उसने बताया की श्यामली बुआ के पाँव में तीन दिन से मोच है | बुआ कमरे में अभी भी मुझसे ठीक से बात नहीं कर रही थी | तीन - चार दिन तक ऐसा ही चलता रहा | फिर मुझे गुस्सा आ गया की शुरुआत तो उस ने ही किया था और नाराज मुझपर हो रही है इसलिए मैने उनके यहाँ जाना छोड़ दिया | एक हफ्ते बाद बुआ मेरे घर आई वो सलवार सूट पहने थी , मै ऊपरवाले कमरे में पढ़ रहा था और माँ कालेज गयी थी | मै टेबल से उठकर खिड़की पे चला गया और वहाँ से नीचे देखने लगा | बुआ मेरे नजदीक आयी और मेरे से सटकर खिड़की से बाहर देखते हुए बोली - राजन नाराज हो ? सौरी | उनके बालो की खुशबु मुझे मदहोश कर रही थी और उनकी बातो से पता नहीं क्या हुआ की मेरी सारी नाराजगी बह निकली और मैंने बुआ के पीछे आकर उनके गर्दन पर किस किया | फिर मैंने उन्हें पीछे से जकड लिया और दोनों हथेलिओ में उनकी दोनों चुचिओं को कपड़ो के ऊपर से पकड़ कर दबाने लगा और इधर मेरा लंड कड़क होकर उनके गांड के दरारों के बीच सलवार के ऊपर ही फिसलने लगा | फिर मैंने सूट के अन्दर हाथ डालकर ब्रा को ऊपर खिसका कर नंगी चुंचियो का मर्दन करने लगा | फिर एक हाथ सलवार-पैंटी के अन्दर घुसाकर बुर को मुट्ठी में भरकर भींचा और एक उंगली बुर के दरारों में चलाने लगा और होटों से उनके गालो को चूमने - चूसने लगा | बुआ की साँसे काफी गहरी चल रही थी और मेरे उंगलियो के ताल पर सिसक रही थी | अचानक वो पलटी और सामने से मुझे बांहों में भरकर मेरे होंटों को चूमने लगी | मैंने भी दोनों हाथ उनके चूतरों पर ले जाकर उसे जोर -जोर से दबाने लगा और अपनी उँगलियों से गांड के छेद को छेड़ने लगा , वो उत्तेजना में थरथरा रही थी | फिर मैंने बुआ को गोद में उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और सलवार एवं पैंटी को उतारकर गीली चूत को निहारने लगा | वो बोली इसे क्या देख रहा है मुझे बहुत शर्म आ रही है और तू अपना भी तो खोल | मैंने अपना लोअर उतारकर अपने खड़े लंड को बुआ के हाथ में पकड़ा दिया | वो बड़े प्यार से उसे सहलाने लगी और बोली देख ये तो मेरी मुट्ठी में भी नहीं आ रहा है और मेरी चूत अभी बहुत छोटी है , तू ऐसा कर ऊँगली पेल कर ही काम चला ले और मै भी हाथ से सहलाकर तेरा पानी निकाल देती हूँ | मैंने देखा बुआ अभी भी डर रही थी लेकिन मै भी चोदने की जिद पर अड़ा रहा और उनके हाथो से लंड को लेकर चूत के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया और चूत से बहते रस से लंड को सनकर चूत के मुहाने पर टिका दिया | अब मैंने लंड को धीरे धीरे चूत में सरकाना शुरू कर दिया | बुआ ने साँसे खीचकर आँखे बंद कर ली थी और बेडशीट को मुट्ठियों से भींच रखा था | थोड़े लंड के घुसते ही पीड़ा के कारण चेहरा लाल और ठण्ड के महीने में पसीने से तर-बतर हो गया | वो इसबार चीख तो नहीं रही थी लेकिन दर्द से हौले- हौले कडाहने लगी - आँ..आँ ....छोड़ दे ..बबुआ आ.आ आ और उसके आँख से आंसू गिरने लगे , फिर मैं उतने लंड से ही बुआ को चोदने लगा | उसने मुझे जकड लिया और लगभग दो मिनट बाद ही उनका शारीर अकड़ने लगा और वो मध्यम आवाज में चिल्लाई - आआह्ह्ह्ह.. मै गईईईईईईइ.. और तभी मैंने अपने लंड पर हल्का गरम फुहार महसूस किया जिससे मेरे अन्दर जैसे कुछ फूटने लगा और मेरे शारीर से कुछ निचुड़ कर लंड के मध्यम से निकलने लगा | ये था मेरा प्रथम वीर्यदान बुआ के चूत में |
क्रमशः......................
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जल्दी कर ले नहीं तो माँ आ जायेगी--1
सबसे पहले आपको आज से १२-१३ साल पहले लिये चलता हूँ , उस समय मै दसवीं का एक्जाम देने वाला था | घर में केवल मै और मेरी माँ (कमला) रहती थी जिसकी उम्र उस समय ३९-४० साल थी | पापा का देहांत तक़रीबन १० वर्ष पहले हो चूका था ( वो कालेज में लेक्चरार थे ) | चूँकि मेरी माँ भी ग्रेजुएट थी इसलिए पापा के कालेज में ही पापा की जगह माँ को लेखा विभाग में नौकरी लग गयी | हम पांच भाई- बहन है | बड़ी बहन 'विभा' जो उस समय २४ साल की थी, जीजाजी के साथ दिल्ली में रहती थी | जीजाजी एक मल्टीनेशनल कम्पनी में उच्च पद पर कार्यरत थे |उनकी एक बेटी भी है जो ६ साल की थी | भैया उस समय २२ साल के थे और भाभी के साथ भोपाल में रहते थे | भैया से छोटी शोभा दीदी है जो उस समय २० साल की थी और जीजाजी के साथ कानपुर में रहती है| उनका कोई बच्चा नहीं था |छोटे जीजाजी, शोभा दीदी से तक़रीबन १० साल बड़े है, लेकिन माँ-बाप के इकलोते है और परिवार बहुत समृद्ध है| सबसे छोटी आभा दीदी उस समय १७ साल की थी और १२वी की टेस्ट देने वाली थी | चूँकि भाभी को बच्चा हने वाला था इसलिए आभा दीदी भैया-भाभी के साथ भोपाल में रह रही थी |
मै पढने में काफी तेज था और दसवीं में काफी अच्छे नम्बरों से पास होने की उम्मीद कर रहा था, वही पड़ोस में एक मोहल्ले की रिश्ते की बुआ पिछले २ साल से दसवी में फेल हो रही थी |तभी उसकी माँ, मेरी माँ के पास आकर बोली -बहु , जरा राजन को कहो ना क़ि वो श्यामली (बुआ का नाम ) को शाम को एक घंटा पढ़ा दे, पास कर जाएगी तो इस साल इसकी शादी कर देंगे | चूँकि परीक्षा में केवल तीन -चार महीने रह गए थे इसलिए मै बहुत आनाकानी के बाद शाम को बुआ के पास जाने लगा | दो - तीन दिन में ही मुझे पता चल गया क़ि वो दिमाग से पैदल है और दुसरे उसे बाते बनाने में बहुत मजा आता था | वो हमेशा कैजुअल ड्रेस में रहती जैसे नाइटी| गणित के सवाल में बुआ सामने से इतना झुक जाती क़ि आधे से अधिक मम्मे की गोलाइयों के दर्शन हो जाते| इतने में ही मेरा हलक सूखने लगता और पेट में गैस के गोले उठने लगते | उस समय घर में कोई नहीं होता था -उनका भाई यानि मेरे चाचाजी दूकान पर रहते और रात के दस बजे ही लौटते, उनकी भाभी प्रिगनेंट थी और मैके गयी थी और माँ शाम को मंदिर चली जाती | बुआ धीरे- धीरे मुझे सिड्यूस कर रही थी |
एक दिन जब मै बुआ के घर गया तो कमरे में घुसते ही सन्न रह गया | बुआ घाघरा और एक ढीली ढली टी- शर्ट पहने कुर्सी पर बैठी थी, बल्कि यूँ कहिये की वो अधलेटी थी | सर पर चुन्नी बाँध रखा था, पैर बिस्तर पर मोड़ कर अधलेटी थी | घाघरा जांघो को घुटनों तक ऊपर से तो ढका हुआ था पर नीचे से बिस्तर के सामने से पूरी नंगी दुधिया जांघे चमक रही थी ,बस जांघो के जोड़ के पास क्रीम कलर की मुड़ी पैंटी मदमस्त गदराई जवानी को ढके हुए थी, जिसे देखकर मेरा दिमाग सनसना रहा था | तभी मेरे मुह से निकल गया - क्या हुआ बुआ ? बुआ ने अपनी आँखे खोली और पैरो को नीचे करते हुए कमजोर आवाज में बोली - आ गए तुम ! देख न , मेरा पूरा शरीर दर्द कर रहा है और सर में भी बहुत तेज दर्द है | शो ख़त्म होने से निराश मै बोला - आज पढाई तो होगी नहीं , मै चलता हूँ|
बुआ : थोड़ी देर बैठ न , माँ कीर्तन में गयी हुई है २ घंटे से पहले नहीं आएगी , मै अकेली बोर हो जायूँगी | तू थोडा मेरी हेल्प कर और मेरे सर में बाम मल दे , वहाँ खिड़की पर बाम रखा है |
मै बाम लेकर बुआ के माथे पर धीरे-धीरे बाम मलने लगा , फिर बुआ ने दोनों कनपट्टी के पास हौले -हौले दबाने को कहा | मै कुर्सी के पीछे आकर दोनों अंगुठे से हलके-हलके कनपट्टी को दबाने लगा , इस क्रम में मेरी हथेली और उंगलियाँ बुआ के गालो को छु रही थी और कुर्सी के पीछे से गदराई चूचियो के नज़ारे मेरे अन्दर एक बिलकुल अनजान एवं नवीन उत्तेजना का संचार कर रहे थे और रोमांच से मेरा हाथ काँप रहे थे |
तभी बुआ ने कहा- राजन एक काम करेगा
मैंने पूछा- क्या बुआ ?
बुआ बोली - मेरे पुरे शारीर में दर्द हो रहा है , तू पैर और पीठ दबा देगा और इससे पहले मै कुछ जबाब देता वो पेट के बल जाकर बिस्तर पर लेट गयी | मै धड़कते दिल से जाकर अपना हाथ बुआ के पैरो पर घुटनों और टखनो के बीच मांसल हिस्से पर रखा | वहां हाथ रखते ही शारीर झनझना उठा , लगा जैसे बिजली के नंगे तारो को छु लिया , मैंने अपनी जिन्दगी में ऐसा चिकना , मुलाएम और गुदाज चीज को नहीं छुआ था | अब मै बुआ के पैरो को नीचे से जांघो तक दबाने लगा | अनुभवहीन होते हुए भी मानवीय प्रकृति मेरा मार्गदर्शन कर रही थी और मेरी कोशिश ये थी कि घाघरे को क्रमशः शरकाकर चुतरों के ऊपर कर दिया जाय |घाघरा धीरे-धीरे ऊपर शरक रहा था और मेरा हाथ जांघो कि गहराई नाप रहा था, तभी पैंटी कि झलक मिली और मेरी सांस भारी होने लगी | चूँकि बुआ थोडा भी बिरोध नहीं कर रही थी इसलिए मेरा साहस बढ़ रहा था | अब मैंने घाघरा रूपी दीवार को ख़त्म करने का निर्णय लिया और जांघो से पीठ कि तरफ बढ़ना शुरू किया | जैसे ही मेरा हाथ चुतरों पर पंहुचा मैंने उसे हलके से दबाया तो बुआ के मुंह से हल्की सिसकी निकल पड़ी | हाथ पीठ तक ले जाकर घाघरे को कमर के ऊपर कर दिया और फिर सीधा वापस जांघो पर आकर दबाना - सहलाना शुरू कर दिया | अब मै केवल जांघो के जोड़ो को और चुतरों को दबा रहा था , बीच - बीच में चुतरों कि दरारों में भी उँगलियाँ चला देता | तभी बुआ पलट गयी , अब वो पीठ के बल लेटी थी , आँखे बंद थी और गहरी साँसे ले रही थी |मैंने एक बार बुआ के चेहरे कि तरफ देखा और फिर अपना ध्यान अस्त-व्यस्त पैंटी से ढकी हुई पुए जैसी फूली हुई बुर कि तरफ केन्द्रित कर दिया |मैंने पैंटी के ऊपर से अपनी हथेली से बुआ के बुर को सहलाया, बुआ सिसकी .. | पूरी पैंटी भींगी हुई थी , पहले तो मै पूछना चाहा कि बुआ आपने थोडा मूत दिया है क्या ? फिर खुद ही मैंने प्रेम के अन्तरंग क्षणों में कुछ बोलना ठीक नहीं समझा | मै अहिस्ते -अहिस्ते सहलाता रहा , बुआ हौले -हौले सिसकती रही | तभी मैंने जोर से बुर को पूरी हथेली में भरकर दबाया और बुर के ऊपर से पैंटी को बगल में खिसकाकर अपनी एक ऊँगली बुर में घुसा दिया | बुआ चींखकर आधी उठ के बैठ गयी और मेरा दाहिना हाथ , जिसकी ऊँगली बुर के अन्दर थी , अपने बाएं हाथ से पकड़ लिया |वो मेरा हाथ हटा भी नहीं रही थी , उसकी आँखे नशीली , मुह खुला हुआ और होंट सूखे थे |कुछ देर तक वो मुझे ऐसे ही देखती रही और अचानक मेरे गले में बाहें डालकर मेरे होटों पर अपने होंट रखकर मुझे चूमने लगी | फिर मुझे अपने ऊपर गिरा कर खुद लेट गयी | उसकी दोनों टांगों के बीच मेरा कमर था जिसके ऊपर उसने अपनी टांगो को उठाकर मेरे पैरो के इर्द-गिर्द लपेट रखा था | ऐसे में मेरा लंड जो पहले ही वासना में फुफकार रहा था , अपनी पहली सखी 'बुआ की बुर' को इतना नजदीक पाकर मचलने लगा और कपड़ो के अन्दर से ही उसे अपनी कठोरता का एहसास दिलाने हेतु हल्की-हल्की थपकी देने लगा | बुआ की बांहों का घेरा मेरी पीठ पर कस रहा था और नरम चुंचियां मेरे सीने से रगड़ खा रही थी | हम दोनों एक - दुसरे के होंटों को चूसने लगे | मैंने अपने दोनों हाथो से उसकी दोनों चुंचियो को भींच रहा था और बीच - बीच में निप्पल को चुटकी से मसल देता , वो कसमसा रही थी
अब बुआ ने मुझे अपने ऊपर से गिराकर बगल में लिटा लिया और अपनाहाथ नीचे ले जाकर मेरे लंड को कपड़ो के ऊपर से सहलाने लगी और फुसफुसाई - राजन जल्दी कर ले नहीं तो माँ आ जायेगी | मैंने भी उनकी पैंटी को खीचकर पैरो से बाहर निकाल दिया | अब बुआ बिलकुल नंगी थी और मैं बुआ के चिकनी बुर को अपनी हथेली से सहला रहा था , फिर बुआ ने मेरा पाजामा ढीला कर मेरे लंड को बाहर निकाल लिया | लंड बाहर आते ही बुआ बिलकुल चौंक गयी और कूदकर बिस्तर से उतरकर खड़ी हो गयी और अपने मुह को हथेली से ढकती हुई बोली - हाय राम इतना बड़ा !! तुम आदमी हो ? तुम तो जानवर लगते हो | मैंने घबराते हुआ पूछा -क्या हुआ बुआ ? बुआ बोली इतना बड़ा लंड कहीं आदमी का होता है | मौका हाथ से निकलते देख मैंने समझाते हुए कहा - बुआ सबका इतना बड़ा ही होता है , आपने कौन सा किसी का देखा है | बुआ बोली - नहीं मैंने कई लोगो का देखा है खिड़की से बाहर सड़क पर पेशाब करते हुए , बाप रे तुम्हारा कितना मोटा और बड़ा है मेरी तो फट ही जायेगी | (मै मन ही मन सोचने लगा कहीं सचमुच कुछ गड़बड़, कोई बिमारी तो नहीं है , बचपन में जब आम के बगीचे में अपने दोस्तों के साथ जाता था तो सुसु करते समय उनका नूनी देखा करता था , उन सब से उस समय भी मेरा दूना था और सब मुझे गधा कहकर चिढाते थे , उसके बाद बड़े होने पर किसी के साथ तुलना करने का मौक़ा ही नहीं मिला, न ही अपना खुद कभी नापा ) फिर मैंने बुआ से प्रत्यक्ष बोला - कुछ नहीं होगा बुआ , सरसों तेल लगा के करूँगा देखना तुम्हे पता भी नहीं चलेगा | बुआ थोडा शांत होते हुए बोली -अब इस अबस्था में सरसों तेल लाने किचेन में कौन जाएगा , वहां ड्रेसिंग टेबल पर नारियल तेल है वही लगा लो | फिर मैंने नारियल तेल लगा कर लंड को चिकना कर लिया | बुआ टाँगे फैला कर लेट गयी और अपने प्रथम मर्दन का आँखे मूंदकर इन्तजार करने लगी |
मैंने लंड को बुर के छेद पर टिकाकर जोर लगाने लगा लेकिन हर बार असफल हो जाता | अब इसे मेरा अनारीपन कहिये या नारियल तेल की चिकनाई का कमाल या कुवांरी चूत के कपोतो का कड़कपन , मै चूत के अन्दर घुस ही नहीं पा रहा था | जिस सुरंग को पैंटी के अन्दर भी उँगलियों ने एक झटके में ही ढूंढ़ निकाला था उसी सहचरी सुरंग में मेरा लंड उसे देखकर भी नहीं घुस पा रहा था | कुवांरी चूत चोदने में कितना जोर लगता है पहली बार महसूस कर रहा था | फिर बुआ ने अपने हाथो से लंड को पकरकर एक जगह रखा और मुझे पेलने के लिए कहा | मैंने पूरा जोर लगाया ,लंड का सुपाड़ा चूत के कपोतो को चीरता हुआ अन्दर घुसा , बुआ चींखी .., पहले मैंने बुआ के मुह पर हाथ रखा और पेलना रोक लिया और बोला - चीखकर लोगो को इक्कठा करेगी क्या | फिर मैंने धीरे -धीरे एक चौथाई लंड बुर में घुसा दिया और उतने हिस्से को आगे पीछे करके चोदने लगा | बुआ सिसकने लगी .... फिर मैंने एक जोर का झटका मारा ... मेरा आधा लंड बुर की गहराई नापने लगा | बुआ फिर चीखकर दोहरी हो गयी और मुझे धक्का देकर गिरा दिया | चूत खून से सन गया था और खून की कुछ बुँदे मेरे लंड पर भी चमक रही थी | बुआ रोने लगी -हे भगवान् ! साले ने फाड़ दिया मेरी बुर को .. जानवर कहीं का | मैंने प्यार से पुचकारना चाहा वो मेरी तरफ गुस्से से देखी और एक कपड़ा लेकर अपनी बुर पर रखकर दबाने लगी | फिर उठकर फटाफट कपडे पहनकर बाथरूम में भाग गयी | मैंने भी अपने कपडे पहने और अपनी जल्दबाजी को कोसता हुआ अपने घर चला आया |
घर पर रात में मुझे लंड में काफी जलन महसूस हुआ , अगले दिन नहाते समय देखा की मेरा लंड कई जगह से छिल गया है और सुपाडे के ऊपर की चमड़ी भी ज्योइंट से कट गया है | दो दिन लगे उसे ठीक होने में | तीसरे दिन जब मै बुआ के घर शाम को गया तो उसकी माँ घर पर ही थी और उसने बताया की श्यामली बुआ के पाँव में तीन दिन से मोच है | बुआ कमरे में अभी भी मुझसे ठीक से बात नहीं कर रही थी | तीन - चार दिन तक ऐसा ही चलता रहा | फिर मुझे गुस्सा आ गया की शुरुआत तो उस ने ही किया था और नाराज मुझपर हो रही है इसलिए मैने उनके यहाँ जाना छोड़ दिया | एक हफ्ते बाद बुआ मेरे घर आई वो सलवार सूट पहने थी , मै ऊपरवाले कमरे में पढ़ रहा था और माँ कालेज गयी थी | मै टेबल से उठकर खिड़की पे चला गया और वहाँ से नीचे देखने लगा | बुआ मेरे नजदीक आयी और मेरे से सटकर खिड़की से बाहर देखते हुए बोली - राजन नाराज हो ? सौरी | उनके बालो की खुशबु मुझे मदहोश कर रही थी और उनकी बातो से पता नहीं क्या हुआ की मेरी सारी नाराजगी बह निकली और मैंने बुआ के पीछे आकर उनके गर्दन पर किस किया | फिर मैंने उन्हें पीछे से जकड लिया और दोनों हथेलिओ में उनकी दोनों चुचिओं को कपड़ो के ऊपर से पकड़ कर दबाने लगा और इधर मेरा लंड कड़क होकर उनके गांड के दरारों के बीच सलवार के ऊपर ही फिसलने लगा | फिर मैंने सूट के अन्दर हाथ डालकर ब्रा को ऊपर खिसका कर नंगी चुंचियो का मर्दन करने लगा | फिर एक हाथ सलवार-पैंटी के अन्दर घुसाकर बुर को मुट्ठी में भरकर भींचा और एक उंगली बुर के दरारों में चलाने लगा और होटों से उनके गालो को चूमने - चूसने लगा | बुआ की साँसे काफी गहरी चल रही थी और मेरे उंगलियो के ताल पर सिसक रही थी | अचानक वो पलटी और सामने से मुझे बांहों में भरकर मेरे होंटों को चूमने लगी | मैंने भी दोनों हाथ उनके चूतरों पर ले जाकर उसे जोर -जोर से दबाने लगा और अपनी उँगलियों से गांड के छेद को छेड़ने लगा , वो उत्तेजना में थरथरा रही थी | फिर मैंने बुआ को गोद में उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और सलवार एवं पैंटी को उतारकर गीली चूत को निहारने लगा | वो बोली इसे क्या देख रहा है मुझे बहुत शर्म आ रही है और तू अपना भी तो खोल | मैंने अपना लोअर उतारकर अपने खड़े लंड को बुआ के हाथ में पकड़ा दिया | वो बड़े प्यार से उसे सहलाने लगी और बोली देख ये तो मेरी मुट्ठी में भी नहीं आ रहा है और मेरी चूत अभी बहुत छोटी है , तू ऐसा कर ऊँगली पेल कर ही काम चला ले और मै भी हाथ से सहलाकर तेरा पानी निकाल देती हूँ | मैंने देखा बुआ अभी भी डर रही थी लेकिन मै भी चोदने की जिद पर अड़ा रहा और उनके हाथो से लंड को लेकर चूत के ऊपर रगड़ना शुरू कर दिया और चूत से बहते रस से लंड को सनकर चूत के मुहाने पर टिका दिया | अब मैंने लंड को धीरे धीरे चूत में सरकाना शुरू कर दिया | बुआ ने साँसे खीचकर आँखे बंद कर ली थी और बेडशीट को मुट्ठियों से भींच रखा था | थोड़े लंड के घुसते ही पीड़ा के कारण चेहरा लाल और ठण्ड के महीने में पसीने से तर-बतर हो गया | वो इसबार चीख तो नहीं रही थी लेकिन दर्द से हौले- हौले कडाहने लगी - आँ..आँ ....छोड़ दे ..बबुआ आ.आ आ और उसके आँख से आंसू गिरने लगे , फिर मैं उतने लंड से ही बुआ को चोदने लगा | उसने मुझे जकड लिया और लगभग दो मिनट बाद ही उनका शारीर अकड़ने लगा और वो मध्यम आवाज में चिल्लाई - आआह्ह्ह्ह.. मै गईईईईईईइ.. और तभी मैंने अपने लंड पर हल्का गरम फुहार महसूस किया जिससे मेरे अन्दर जैसे कुछ फूटने लगा और मेरे शारीर से कुछ निचुड़ कर लंड के मध्यम से निकलने लगा | ये था मेरा प्रथम वीर्यदान बुआ के चूत में |
क्रमशः......................
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !


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