Monday, March 10, 2014

FUN-MAZA-MASTI सहारा खातून

FUN-MAZA-MASTI


सहारा खातून


ढाका से मेरा ट्रांसफर रंगपुर हुआ और मैंने मन ही मन में कम्पनी के सभी बॉस की ढेरों गालियाँ दी। साले पूरी पिलाई कर देते हैं आप की, खालिदा के चूतड़ों जैसे बड़े इलाके में सेल्स बनाओ और फ़िर वो कहेगा कि चल अब यहाँ की चुदाई छोड़ो और कहीं और जाकर किसी हसीना की मार और मरवा ! मैं उब गया था यह सब देख कर लेकिन बीए पास के लिए आजकल नौकरी पाना ही मुश्किल है, यह जॉब मुझे करनी पड़ रही है, बस इसमें तबादले वाली बात मुझे चुभती है।
रंगपुर आकर पहले तो मैंने एक दरमियाने से होटल को अपना घर बनाया और यहाँ की टीम से मिला, फिर वही रोज सुबह और शाम एस्टेट एजेंट के दफ्तरों के चक्कर लगाना और घरों और कमरों को देखना ! घर तो काफी थे लेकिन किराया गाण्ड फाड़ू था सभी का जो मेरे बजट से बाहर था। साले हमारे ढाका के बराबर के रेट और ऊपर से भारी पेशगी मांग रहे थे सारे !
एक दिन मैं ऑफिस में था, तभी एक एस्टेट एजेंट पुलोक दत्ता का फोन आया- हेल्लो देशमुख जी, एक कमरा है स्टेशन के पास, देखोगे? सामने एक बूढ़े की आवाज थी।
"जरुर ! पर मेरे बजट में है ना?" मैंने पहले ही पूछ लिया।
"जी हाँ, बिल्कुल बढ़िया जगह है, आपके बजट में ही है, वैसे मैं बाहर जा रहा हूँ इसलिए अपनी बेटी सहारा खातून को आपका नंबर दे रहा हूँ, वो आप को जगह दिखा देगी। पुलोक ने कहा।
मैंने ओके कह कर फोन काटा और ऑफिस के काम में लग गया। तभी मुझे ख्याल आया कि कहाँ तो इस मादरचोद एजेन्ट का नाम पुलोक दत्ता और इसकी बेटी का नाम सहारा खातून? समझ नहीं आया कि यह क्या चक्कर है?
यकीन मानिये अभी तक मैंने यह सोचने तक की तकलीफ़ नहीं की थी कि सहारा खातून कैसी होगी, फिर सेक्स के कीड़े के मन में रेंगने का तो सवाल ही नहीं होता है। हाँ, ढाका में तो बहुतों की चुदाई कर दी है मैंने लेकिन रंगपुर के भविष्य में शायद सहारा खातून की ही चूत लिखी थी।
शाम को साढ़े चार के करीब एक फ़ोन आया- हेलो देशमुख जी, मैं सहारा खातून बोल रही हूँ, मेरे पिताजी पुलोक दत्ता ने बात की थी ना आपसे ! मैं वो जगह दिखा देती हूँ आपको ! आप मुझे स्टेशन पर मिल सकते हैं और कितने बजे?
उधर से करीब 30 साल के करीब की एक जनाना आवाज आ रही थी।
"जी मेरा ऑफिस स्टेशन के करीब ही है, आप आयें उसके 5 मिनट पहले मुझे फ़ोन कर दें, मैं दो मिनट के भीतर आ जाऊँगा।" मैंने कहा।
"ठीक है सर !" सहारा खातून ने कहा।
पूरे 15 मिनट के बाद घंटी बजी और मैंने अपना लैपटोप बैग उठाया और स्टेशन की तरफ चल दिया। अभी तो मैं अपनी बाइक भी नहीं लेकर आया था यहाँ, इसलिए पैदल ही जाना था।
सहारा खातून अपनी स्कूटी लेकर खड़ी थी, मुझे देख शायद वो पहचान गई और हाथ हिलाने लगी, मैं उसके पास खड़ा हुआ और उसने मुझे इशारे से स्कूटी पर बैठने को कहा। मैंने एक नजर उसे देखा, करीब 30 की थी वो ! उसके चूचे तो उसके दुपट्टे के पीछे छिपे थे लेकिन चूतड़ जरूर बड़े थे उसके !
मैं स्कूटी पर बैठा और उसने एक्सेलेटर दे दिया। मैं उसके बालों में उलझे हुए फूलों की सुगंध सूंघ रहा था और वो बातें करने लगी।
"सर, आप मेरिड नहीं हैं क्या?" उसने पूछा।
"जी मैं मेरिड हूँ लेकिन बीवी को अभी रंगपुर नहीं आना था इसलिए एक कमरे की जगह ही लेनी है मुझे !" मैंने समझाया।
"ओके सर।" उसने बात खत्म की।
स्टेशन के पास एक छोटी सी गली में उसने स्कूटी मोड़ी जहाँ पे रास्ते की चुदाई हो चुकी थी। मैंने देखा कि रास्ते में बहुत गड्डे थे और उस वक्त ही मेरे मन में चुदाई का कीड़ा पहली बार उठा। मैंने सोचा कि अगर थोड़ा आगे हो जाऊँ तो इन सहारा खातून की गाण्ड से अपने लंड को लड़वाने का सही मौका था उस खुरदरी गली में। मैंने लैपटोप जो मेरे और सहारा खातून के बीच में थी उसे हटा के पीछे ले लिया और खुद थोड़ा आगे सरक गया।
सहारा खातून की स्कूटी जैसे ही पहले खड्डे में थोड़ी उछली मैं और आगे खिसका। अब मेरा लंड सहारा खातून की गांड में कभी कभी घिस रहा था और जिन्होंने अपनी गाण्ड में कभी खड़े लंड का स्पर्श लिया है, उन्हें तो पता ही होगा की आगे वाले को पता चल ही जाता है कि पीछे कुछ गर्म लगा हुआ है।
और मैं जानता था की सहारा खातून भी समझ गई थी कि यह मेरा लंड ही हैं जो अभी उसकी गांड की दरार में बीच बीच में छू रहा है। तभी एक बड़ा गड्डा आया और मैंने अपनी जगह और थोड़ा आगे कर दी। अब तो मेरा लंड बिल्कुल उसके पिछवाड़े में जैसे घुसा हुआ था। सहारा खातून जैसी कि कुछ हुआ ही ना हो, उस तरह स्कूटी चलाती गई।
और इधर मैंने ख्यालों में ही उसकी चुदाई करके दो बच्चे भी पैदा कर दिए थे।
तभी सहारा खातून ने अपनी स्कूटी एक झटके से रोक दी। मेरा पूरा बदन अब जाकर उसकी कमर को सट गया। उसने मेरी ओर देख कर कहा- देशमुख जी, कमरा आ गया !
मैंने कहा- सच में स्टेशन से काफी नजदीक है, बड़ी जल्दी आ गया।
सहारा खातून समझ गई कि मेरा मतलब क्या था। मुझे लगा था कि यह कमरा किसी मकान मालिक के घर के ऊपर होगा लेकिन वैसा नहीं था। यह कमरा तो इन्डेपेंडेंट था, नीचे दुकानें थी।
सहारा खातून ने कमरा खोला, मैंने देखा कि मेरे लिए सही जगह थी वो, छोटा सा कमरा, बाहर सड़क की तरफ खुलती खिड़की और दुकानों के ऊपर भी कुर्सी लगा कर बैठा जा सकता था। मैंने टॉयलेट बाथरूम देखने की इच्छा जताई और सहारा खातून मुझे पहले टॉयलेट दिखा लाई। अब हम दोनों बाथरूम की ओर गए। बाथरूम छोटा सा था, के अंदर ही पानी की टंकी थी जिससे दोनों जगह सप्लाई होता था पानी।
मैंने सहारा खातून से पूछा- पानी की किल्लत तो नहीं है ना जी?
"अरे कोई किल्लत नहीं है देशमुख जी, देखें ऊपर बहुत बड़ी है टंकी एक आदमी के लिए।" इतना कह के वो कमरे में वापस गई और कुर्सी लेकर आई। उसने बाथरूम में ही कुर्सी लगाई और ऊपर चढ़ के टंकी में देखने लगी।
बाप रे ! वो बड़ी गांड देख कर लंड चुदाई के बारे में ना सोचे?
मेरे लंड के साथ साथ आण्डों ने भी उस बड़े कूल्हों को जैसे ऊपर होकर सलामी दी। सहारा खातून का यह पिछवाड़ा किसी नपुंसक को भी एक बार चुदाई का ख्याल जरूर दे सकता था।
तभी मेरे शैतानी दिमाग ने एक योजना बनाई, मैंने फट से अपने हाथ सहारा खातून की गांड के साइड में रख दिए, मैं बोला- अरे ऊपर कहाँ चढ़ी हैं आप? कहीं गिर विर ना जाएँ !
"देशमुख जी, हमारा तो रोज का है यह सब, कहीं पर भी चढ़ना उतरना पड़ता है।" सहारा खातून हंस कर बोली।
"सही है, ढाका में हम भी बहुत चढ़-उतर करते थे लेकिन रंगपुर अभी नया हैं ना हमारे लिए।" मैंने उसी बात को दोहरे मीनिंग में कह दिया और मेरे हाथ अभी भी सहारा के चूतड़ों पर ही थे।
सहारा खातून हंस कर बोली- कोई बात नहीं, आप यह कमरा ले लो, चढ़ने-उतरने का सिलसिला चालू हो जायेगा।
उसकी बात में भी पॉइंट था।  
मैंने कहा- ऐसी बात है तो मैं अभी चेक कर लेता हूँ।
बिना कुर्सी के बारे में ख्याल किये मैं भी उसके ऊपर आ गया और टंकी में झाँकने लगा। मेरा चुदाई के नशे में चूर लंड फिर से सहारा खातून की गांड पर था। सहारा खातून आगे की ओर झुकी हमारे बीच में गैप बनाने के लिए। लेकिन मैं भी आगे बढ़ा और गांड और लंड के बीच की दूरी को खत्म कर दिया।
सहारा खातून की साँसें बढ़ रही थी जिसका अंदाजा मुझे उस सुनसान कमरे के बाथरूम में आराम से हो गया। बिना कोई पल गंवाए मैंने अपने हाथ उसकी गांड से हटा के उसके चूचों पर रख दिए और कहा- सच में कमरा भी सही है और कमरा दिखाने वाली भी !
तभी मेरे शैतानी दिमाग ने एक योजना बनाई, मैंने फट से अपने हाथ सहारा खातून की गांड के साइड में रख दिए, मैं बोला- अरे ऊपर कहाँ चढ़ी हैं आप? कहीं गिर विर ना जाएँ !
"देशमुख जी, हमारा तो रोज का है यह सब, कहीं पर भी चढ़ना उतरना पड़ता है।" सहारा खातून हंस कर बोली।
"सही है, ढाका में हम भी बहुत चढ़-उतर करते थे लेकिन रंगपुर अभी नया हैं ना हमारे लिए।" मैंने उसी बात को दोहरे मीनिंग में कह दिया और मेरे हाथ अभी भी सहारा के चूतड़ों पर ही थे।
सहारा खातून हंस कर बोली- कोई बात नहीं, आप यह कमरा ले लो, चढ़ने-उतरने का सिलसिला चालू हो जायेगा।
उसकी बात में भी पॉइंट था।
मैंने कहा- ऐसी बात है तो मैं अभी चेक कर लेता हूँ।
बिना कुर्सी के बारे में ख्याल किये मैं भी उसके ऊपर आ गया और टंकी में झाँकने लगा। मेरा चुदाई के नशे में चूर लंड फिर से सहारा खातून की गांड पर था। सहारा खातून आगे की ओर झुकी हमारे बीच में गैप बनाने के लिए। लेकिन मैं भी आगे बढ़ा और गांड और लंड के बीच की दूरी को खत्म कर दिया।
सहारा खातून की साँसें बढ़ रही थी जिसका अंदाजा मुझे उस सुनसान कमरे के बाथरूम में आराम से हो गया। बिना कोई पल गंवाए मैंने अपने हाथ उसकी गांड से हटा के उसके चूचों पर रख दिए और कहा- सच में कमरा भी सही है और कमरा दिखाने वाली भी !
सहारा खातून ने थोड़ी एक्टिंग की और वही पुराना डायलोग मारा- देशमुख जी कोई आ गया तो?
मैंने उसके भारी चूचों को मसलते हुए कहा- अरे, कोई नहीं आयेगा सहारा खातून जी, हम दरवाजा अंदर से बंद कर लेंगे।
मेरा लंड उसकी गांड को छू रहा था और उसके अंदर चूत में जाने की अजब उतावली लगी हुई थी। मैंने सहारा खातून के ब्लाउज के ऊपर के खुले हुए भाग में अपना हाथ डाला और उसके उरोजों को सीधा स्पर्श करने लगा। सहारा खातून ने अपना सीधा हाथ पीछे किया और मेरे लंड को पकड़ा। मेरा लंड तो कब से तैयार ही था, सहारा खातून के छूते ही जैसे उसके ऊपर बिजली आ गिरी थी।
मैंने सोचा कि अगर कुर्सी पे थोड़ी मस्ती और की तो उसके चारों के चार पैर टूट जायेंगे। यह सोच कर मैं नीचे उतरा और सहारा खातून को भी नीचे उतार दिया। मैंने उसे बाथरूम के फव्वारे की पाइप पकड़ कर उल्टा खड़ा किया और मैंने उसकी साड़ी को उतारना चालू कर दिया।
जैसे ही उसकी साड़ी दूर हुई, मुझे उसकी नीले रंग की ब्लाउज और वही रंग की पेटीकोट नजर आई। मैंने ब्लाउज के बटन आगे हाथ डाल के खोल डाले और उसे साइड में टांग दिया। सहारा ने खुद अपने हाथों से पेटीकोट का नाड़ा खोला और उसे उतार फेंका।
सहारा अब मेरे सामने सस्ती ब्रा और पेंटी में थी। मेरा मन तो किया कि उसे वहीं पर दबोच कर उसे तुरंत चोद दूँ लेकिन बहुत दिन के बाद ऐसा बड़ा शिकार हाथ आया था इसलिए मैंने सोचा कि थोड़ा आराम से करते हैं।
सहारा आहें भर रही थी और उसकी साँसें और भी तेज होने लगी थी। मैंने अपनी पतलून और शर्ट को उतारा और वही बाथरूम के हेंगर में टांग दिया। मैंने अब धीरे से पेंटी को गांड के ऊपर से उतारना चालू किया और मुझे सहारा खातून की चूत और गांड के ऊपर के बाल नजर आने लगे। बड़ा ही कामुक कर देनेवाला नज़ारा था वो तो !
सहारा खातून ने अपने बड़े चूतड़ों को पीछे किया ताकि मैं उसकी कच्छी आराम से उतार सकूँ। मैंने चड्डी हटा दी और फिर मेरे हाथ उसकी ब्रा पर चले गए, ब्रा उतारने से पहले मैंने उसकी बड़ी बड़ी चूचियों में अपने हाथ डाल दिए, उसकी चूचियाँ और एक बार मसलनी चालू कर दी !
सहारा खातून अपनी बड़ी गांड को पीछे कर के खड़ी थी और मेरा लंड उसे बड़े मजे से छू रहा था। अब मैंने अपने एक हाथ को उसके चूचे पर रखा और दूसरे हाथ को उसकी बालों वाली चूत के ऊपर ले गया। मैंने अपनी दूसरी लंबी उंगली को उसके चूत के छेद पर मसलना चालू किया और सहारा खातून को जैसे करंट लग रहा हो, वैसे वो हिलने लगी।
मैंने अपन उंगली को चूत के अंदर डाल दिया और अंदर उसे सहलाने लगा। सहारा खातून की साँसें बढ़ती ही जा रही थी और वो बड़ी मचल रही थी। उसने अपने हाथ मेरे माथे पर रखा और वो मुझे अपने और भी करीब खींचने लगी। मैं समझ गया कि उसकी चूत में सही खुजली मच चुकी है जिसे मिटाना अब मेरा कर्तव्य बन चुका है।
मैंने सहारा खातून को कंधे से पकड़ कर नीचे बिठा दिया और अपने फनफना रहे लंड को उसके मुँह के आगे रख दिया। सहारा ने एक पल भी नहीं गँवाया और अपने लबों को खोल दिया। मैंने उसकी चोटी को अपने हाथ में लिया और लौड़े को सीधा उसके मुख में रख दिया। सहारा ने जैसे ही अपने होंठों को मेरे लण्ड पर फ़िसलाया, मुझे सुख की एक जबरदस्त लहर का अहसास पूरे बदन में हुआ।
क्या जबरदस्त अहसास था वो ! हल्की हल्की गर्मी जब पूरे लंड में आती है तो अलग सा सरूर आ जाता है बदन में !
सहारा ने मेरे टट्टे अपने हाथ में लिए और वो उन्हें धीरे धीरे दबाने लगी। वाह, क्या मजा था उस वक्त ! वो लंड को मुँह में पूरा भर के बैठी थी और गोलियों को सहला रही थी। मैं जैसे स्वर्ग के झूलों में झूल रहा था और सहारा खातून मेरा ख़याल रखने वाली अप्सरा थी। सहारा खातून जैसे मावा मलाई वाली कुल्फी मुँह में ले रही थी, वो मेरे लण्ड को बाहर निकालने के मूड में ही नहीं थी। मेरे मन के मोर जोर जोर से कूद रहे थे। मैंने मन ही मन कहा कि देशमुख जी, आपके लंड की एक दीवानी आपको मिल ही गई है।
सहारा खातून ने तभी मेरे लंड को अपने मुँह से बाहर निकाला। मुझे लगा कि शायद वो मुझे अपनी चूत में लंड घुसाने के लिए कहेगी। या फिर उसकी इच्छा अपनी बड़ी गांड के अंदर लेने की भी हो सकती थी। मैंने कुछ औरतों को ऐसे भी देखा था जो सिर्फ पीछे यानि की अपनी गांड में ही लेना चाहती हैं। ऐसा कुछ औरतें इसलिए करती हैं कि कहीं पेट ना फूल जाए। और कुछ लड़कियों और औरतों को तो गांड मरवाने में ही बड़ा मजा आता है।
लेकिन सहारा खातून ने मुझे ना आगे देने के लिए कहा, ना उसने अपनी बड़ी गांड में मेरा डण्डा लेने की इच्छा जताई। मेरे आनन्द की कोई सीमा ही नहीं थी जब उसने मेरे टट्टे अपने मुँह में भर लिए। उसने मेरे लवड़े को हाथ में पकड़ कर ऊपर कर दिया और नीचे अपने होंठों को मेरे टट्टों के ऊपर चलाने लगी।
सहारा के मुँह में मेरे टट्टे सही तरह फिट बैठ गए थे और वो उन्हें बड़े ही प्यार से चाट रही थी। किसी सपनों की दुनिया के जैसा नजारा था यह तो।
कहाँ कुछ देर पहले हम दोनों अनजान थे और अभी वो मेरे लौड़े को और गोलियों को ऐसे चूस रही हो जैसे हमारा चुदाई का रिश्ता बहुत ही पुराना हो। मेरे तन बदन में उसकी चुदाई कर देने की भावना बसी हुई थी। सहारा खातून अभी भी मेरे टट्टों को अपनी जबान से चाट रही थी। सच में ऐसा करवाने का मौका आज से पहले कभी नहीं मिला था, इसलिए मुझे वो अनुभव और भी मजेदार लग रहा था।
सहारा खातून ने पांच मिनट और इस तरह ही मजे दिए और फिर मुझ से बर्दाश्त नहीं हो सका, मुझे लगा कि अगर यह बड़ी गांड वाली एस्टेट एजेंट मेरे लंड को और जरा भी चूसेगी तो वीर्य की नदी बह उठेगी। मैंने अपने लंड को और गेंदों को उसके मुँह के सामने से दूर किया।
सहारा खातून अब खड़ी हुई और उसका इरादा भी अपनी चूत मरवा लेने का ही लग रहा था। मैंने फिर से उसके स्तन मसले और उससे पूछा- कहाँ चुदना है आपको? बाथरूम में या बेडरूम में…?
मेरा ऐसा करने का मकसद यह था कि मेरे लंड की उत्तेजना कुछ हद तक कम हो जाए। सहारा खातून ने मेरे लंड को अपने हाथ में पकड़ा और वो मेरे आगे आगे चलने लगी। उसने मुँह से जवाब नहीं दिया लेकिन वो मुझे बेडरूम की ओर ले गई। अब यह कमरा तो अभी बिल्कुल खाली था। उसमे बेड तो था लेकिन उसके ऊपर गद्दा या चादर कुछ नहीं था। सहारा खातून मेरे आगे अपनी बड़ी नंगी गांड दिखा कर चलती रही और मैं बेड पे डालने का सामान देख रहा था। तभी मेरी नजर एक पुराने अखबार के ऊपर पड़ी। मैंने उसे हाथ में लिया ताकि मैं उसे बेड पर बिछा सकूँ। सहारा खातून ने अब मेरे लंड को छोड़ा और मैंने अखबार को बेड के ऊपर डाल दिया। मैंने अख़बार के पन्नों को बेड पर फैला दिया जैसे कि उसके ऊपर अखबार की चादर बिछाई हो।
सहारा खातून अपनी बड़ी गांड उठा कर उस पर चढ़ गई और वो मेरे तरफ मुँह करके लेट गई। मुझे उसके हल्के बालों वाली चूत के मस्त दर्शन हो रहे थे। मैंने अपना हाथ आगे बढ़ा के उसकी चूत को थोड़ा सहलाया और फिर चूत के छेद में उंगली की। सहारा खातून ने हलकी सी सिसकारी ली। उसकी चूत पानी छोड़ चुकी थी और उसे अब बस अपने अंदर लंड का पानी लेना था।
मैं भी पलंग के ऊपर आ गया और सहारा की दोनों टांगों के बीच में बैठ गया। सहारा खातून की टांगों को फैलाते ही मुझे उसकी मस्त चूत दिखाई दी।
इस सेक्सी औरत से भी अब रुका नहीं गया। उसने मेरे लंड को पकड़ के अपने चूत के मुख के आगे रख दिया। अब ऐसी स्थिति में तो मुझे सिर्फ एक धक्का ही लगाना था। मैंने सहारा खातून की कमर के ऊपर हाथ रखा और एक जोर का झटका दे दिया। लंड चूत की गहराई में जाकर बैठ गया। उसकी चूत की मस्त गर्मी मेरे लंड को बहला रही थी। लंड के अंदर जाते ही खातून ने जोर से सिसकारी ली और वो मेरे गले से लिपट गई।
मैंने भी अपने हाथ उसके विशाल कूल्हों के ऊपर रख दिए और उसे अपनी तरफ खींच लिया। मेरा लंड चूत की तह तक घुस चुका था और सहारा खातून हल्के हल्के से अपने बड़े चूतड़ को हिलाने का प्रयत्न कर रही थी। उसके गांड हिलाते ही मेरा लंड उसकी चूत में अंदर बाहर होने लगा। मैंने अपने हाथ उसके कूल्हों पर ही रहने दिए और मैं भी अपनी जांघों को हिलाने लगा। सहारा खातून की स्पीड धीरे धीरे बढ़ने लगी और अब तो वो बहुत जोर जोर से अपनी गांड को झटके देने लगी।
सहारा खातून के बड़े चूतड़ों के ऊपर हाथ दबा कर मैं भी अपने लंड की अंदर तक डाल रहा था और फिर एक ही झटके में उसे बाहर निकाल रहा था। मेरा लंड सुपारे तक बाहर आ रहा था जिसे मैं फिर से सहारा खातून की चूत के अंदर डाल देता था। सहारा खातून अपनी बड़ी गांड को वही गति से हिला हिला कर मुझे मजे दिए जा रही थी और मैं उसे और भी जोर जोर से चुदाई के झटके दिए जा रहा था।
सहारा खातून की चूत से झाग निकल रहा था और वो मेरे बाहर आते हुए लंड के ऊपर साफ़ देखा जा सकता था। मैंने सहारा खातून के चुच्चे पकड़े और अपने लंड के बड़े बड़े झटके देते जा रहा था। सहारा खातून भी पूरी मस्ती में आ गई थी और वो भी हिल हिल के मजे ले दे रही थी।
मैंने अब अपने लंड को बाहर निकाला और सहारा खातून की बड़ी गाण्ड के अंदर उसे डालना चाहा। लेकिन वो फट से हट गई और बोली- नहीं नहीं देशमुख जी पीछे नहीं ! मेरा गूँ निकल जायेगा लंड डाला तो !
मैं हंस पड़ा कि साला लंड डालने से भी गूँ निकलता है क्या ! मैंने कहा- चलो छोड़ो, कौन उलझन में पड़ेगा, मुफ्त की चूत मिल रही है, ले लेते हैं।
मैंने अपने लंड को फिर से चूत में डाला और अपने झटके चालू रखे। सहारा खातून अब अपने विशाल चूतड़ों को और भी जोर जोर से हिला कर मुझे मजे दे रही थी। सहारा खातून की चूत और मेरा लंड दोनों ही थक चुके थे। मैंने अपने झटकों की तेजी और भी बढ़ा दी और सहारा खातून के मुँह से आह… आह… हाआ…आ… आह्ह्ह… ह्ह… निकल पड़ा।
मैंने उसके बाल पकड़ लिए और एक झटका उसकी चूत में दिया। मेरे लंड से वीर्य निकल के उसकी झांटों वाली चूत को भिगोने लगा। सहारा खातून ने अपनी चूत को कस कर मलाई अंदर ही ले ली। मैं थक गया था तो उसके उपर ही लेट गया।
5 मिनट के बाद हम लोग कपड़े पहन चुके थे। मैंने सहारा खातून को कह दिया- मैं यही कमरा फायनल कर रहा हूँ।
साथ मैं मैंने उसे यह भी कहा- कभी कभी मुझे यहाँ पर आकर मजे दे दिया करें।
सहारा खातून ने हंस कर मुझे हाँ कहा और उसने दरवाजे का रास्ता नापा।
मैं उसकी हिलती हुई बड़ी गांड को ही देख रहा था, उसमें मुझे गोता लगाना था…!
बाद की चुदाइयों में मैंने उससे पूछा था कि तेरे दल्ले बाप का नाम पुलोक दत्ता और तुझ रंडी का नाम सहारा खातून कैसे?
तो उसने बताया- असल में मेरा नाम समीरा था, मेरा बाप पुलोक दत्ता बहुत बड़ गाण्डू है, उसको गाण्ड मरवाने का शौक है, एक शख्स अनवर से पुलोक गांड मरवाता था और अनवर पुलोक की बीवी, यानि मेरी मम्मी को भी चोदता था। एक बार अनवर ने पुलोक की सहमति से मुझे चोद दिया तो मेरे शोर मचाने पर अनवर ने मेरा धर्म और नाम बदलवा कर मुझसे शादी कर थी लेकिन कुछ दिनों बाद तीन बार तलाक तलाक तलाक बोल कर मुझे छोड़ दिया था। तब से मेरा नाम सहारा खातून हो गया था।
समाप्त।
हजारों कहानियाँ हैं फन मज़ा मस्ती पर !
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